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Thursday, August 25, 2016

फिल्‍म समीक्षा : ए फ्लाइंग जट्ट




साधारण फैंटेसी

-अजय ब्रह्मात्‍मज

रेमो डिसूजा की ए फ्लाइंग जट्ट सुपरहीरो फिल्‍म है। हिंदी फिल्‍मों में सुपरहीरो फिल्‍में बनाने की कोशिशें होती रही हैं। सभी एक्‍टर और स्‍टार सुपरहीरो बन कर आकाश में उड़ना चाहते हें। इसमें अभी तक केवल रितिक रोशन को बड़ी कामयाबी मिली है। ए फ्लाइंग जट्ट में बच्‍चों के बीच तेजी से लोकप्रिय हो रहे टाइगर श्रॉफ को यह मौका मिला है। टाइगर श्रॉफ में गति और चपलता है,इसलिए वे डांस और एक्‍शन के दृश्‍यों में मनमोहक लगते हैं। एक्टिंग में अभी उन्‍हें ल्रंबा सफर तय करना है। सभी फिल्‍मों में नाटकीय दृश्‍यों में उनकी सीमाएं जाहिर हो जाती हैं। यही कारण है कि उनके निर्माता-निर्देशक ऐसी कहानियां चुनते हैं,जिनमें कम बोलना पड़े और दूसरे भाव कम से कम हों। सभी निर्देशक टाइगर श्रॉफ से डांस और एक्‍शन के बहाने गुलाटियां मरवाते हैं। उनकी गुलाटियां बच्‍चों को अच्‍छी लगती हैं। गौर करें तो पब्लिक इवेंट में भी टाइगर श्रॉफ का आकर्षण गुलाटियां ही होती हैं।
बहरहाल,ए फ्लाइंग जट्ट अमन नामक युवक की कहानी है। वह नशे की आदी मां के साथ रहता है। स्‍कूल में मार्शल आर्ट्स सिखाता है। उसके घर के पास एक पुरान पेड़ है,जिस पर सिख धर्म का प्रतीक खंडा चिह्न है। उस पवित्र पेड़ से मांगी गई मन्‍नतें पूरी हो जाती हैं। उसी शहर में एक व्‍यापारी भी है,जो अपने लाभ के लिए उस पेड़ को कटवा देना चाहता है। यहां से फिल्‍म में संघर्ष आरंभ होता है। हम देखते हैं कि अमन की पीठ पर वह खंडा चिह्न उभर आता है और वह असीम शक्तियों का मालिक हो जाता है। मां उकसाती है कि अब उसे दीन-दुनिया को बचाने का काम करना चाहिए। सभी की मदद करनी चाहिए। स्थितियां ऐसी बनती हैं कि अमन और शहर का व्‍यापारी आमने-सामने आ जाते हैं। अमन को मारने के लिए व्‍यापारी राका नामक दैत्‍याकार व्‍यक्ति को भेजता है। कूड़ा-कर्कट और प्रदूषण ही राका का आहार है। धीरे-धीरे फिल्‍म स्‍वच्‍छता अभियान से जुड़ जाती है। हमें लगता है कि स्‍वच्‍छ भारत अभियान से जुड़ रही यह फिल्‍म प्रधानमंत्री के राष्‍ट्रीय संदेश को मनोरंजक तरीके से पेश कर रही है। इस फिल्‍म की सबसे बड़ी कमजोरी यही है। स्‍वच्‍छता के व्‍यापक संदेश को चंद दृश्‍यों में समेट कर निर्देशक ने ओढ़े गए दायित्‍व की इतिश्री कर ली है।
यह फिल्‍म कहानी,संरचना और प्रस्‍तुति के स्‍तर पर लचर और कमजोर है। फिल्‍म ने सिख धर्म की आड़ में मनोरंजन परोसने की कोशिश की है। हमें ध्‍यान रखना चाहिए कि कहीं हम धर्म के सहारे अंधविश्‍वास को बढ़ावा तो नहीं दे रहे हैं। फिल्‍म में सिखों और सिख धर्म से संबंधित किंवंदतियों का खुलासा किया गया है। अचानक ग्राफिक्‍स के जरिए बताया जाता है कि सिखों के लिए 12 बजने का क्‍या महत्‍व है। शोध का विषय हो सकता है कि क्‍या नादिरशाह के आक्रमण के समय घड़ी आ गई थी? ऐसी और भी भांतियों का फिल्‍म सहारा लेती है। चूंकि यह फिल्‍म बाल दर्शकों को ध्‍यान में रख कर बनाई गई है,इसलिए ज्‍यादा सावधानी बरतनी चाहिए थी। फिल्‍म में सुपरहीरो की फैंटेसी रचने में लेखक-निर्देशक लंबा वक्‍त लेते हैं। जो रचा जाता है,वह अनेक फिल्‍मों के टुकड़ों से जोड़ा गया प्रतीत होता है। और फिर जबरन उसे स्‍वच्‍छता अभियान से जोड़ कर संदेश दिया जाता है कि सभी चीजों का विकल्‍प है,लेकिन धरती मां का नहीं।
टाइगर श्रॉफ समेत सभी अभिनेता प्रभावहीन हैं। केवल टाइगर श्रॉफ के दोस्‍त बने अभिनेता और अमृता सिंह ने अपने किरदारों के साथ न्‍याय किया है। टाइगर श्रॉफ नाटकीय दृश्‍यों में दो-ती एक्‍सप्रेशन से आगे नहीं बढ़ पाते। उन्‍हें संवाद अदायगी पर भी धान देने की जरूरत है। डांस और एक्‍शन में वे सक्षम हैं। इस फिल्‍म में भी उन्‍हें इन प्रतिभाओं के प्रदर्शन के अवसर मिले हैं। केके मेनन बिल्‍कुल नहीं जंचे हैं। उनके लुक पर भी काम नहीं किया गया है। जैक्‍लीन फर्नांडिस को केवल मुस्‍कराने के साथ अपनी मूर्खता जाहिर करनी थी। उसे भी वे ढंग से नहीं निभा पातीं।
ए फ्लाइंग जट्ट मनोरंजक सोच के साथ बनाई गई कमजोर फिल्‍म है। यह अपने उद्देश्‍यों पर ही खरी नहीं उतरती।
अवधि-151 मिनट
स्‍टार- दो स्‍टार

Wednesday, August 24, 2016

समकालीन सिनेमा(5) : डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी

डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी




इन दिनों मैं कोई विदेशी सिनेमा देखता हूं या सीरियल देखता हूं तो कतई नहीं लगता है कि मैं कोई विदेशी सिनेमा देख रहा हूं, क्योंकि अब वह मेरे परिवेश का हिस्सा हो गया है। अब एडर्वटाइजमेंट देखता हूं तो उसमें विदेशी मॉडल है, टेलीविजन  देखता हूं तो उसमें विदेशी मॉडल है। अब मैं अखबार खोलता हूं तो वहां पर विदेशी ¸ ¸ ¸ अब मैं जहां से दिन शुरू करता हूं,सभी विदेशी दिखते हैं। देशी-विदेशी का अंतर भी मिटता जा रहा है। बाजार उनके हाथ में जा रहा है। इस दौर में अगर हम भारत के सिनेमा की पहचान बना कर रख सकें तो अच्छा होगा। चाहने वाली बात है। यह मुमकिन है। ऐसा होगा कि नहीं होगा ऐसा कहना आज मुश्किल है। 
मुझे लगता है कि पिंजर बनाते समय मैं बाजार को इतना समझ नहीं रहा था। इसलिए वह भावना से प्रेरित फिल्‍म थी। उस समय मल्टीप्लेक्स की शुरूआत हुई थी। आज मल्टीप्लेक्स का चरम है। सितारे बहुत बड़े नहीं थे, कास्ट नहीं थी। अब कहीं न कहीं आपको सितार और कॉस्ट के तालमेल को बैठाना होगा। मेरे साथ समस्‍या रही है कि मेरा कैनवास बड़ा रहा है,कैरेक्टर और एक्‍टर से परे। उस कैनवास को छोटा करना बड़ा मुश्किल होता है। मोहल्‍ला अस्‍सी में मुझे अच्छा लगा कि इसका कैनवास बहुत बड़ा है,लेकिन लागत कम है। 
यह आपको अजीब बात लग सकती है कि ऐसा किस तरह हो सकता है? बनारस का कैनवास बहुत बड़ा है। मेरी जो क्रिएटिविटी एक्सप्रेशन रहती हैं, मेरी जो आकांक्षा होती है कि मेरे पास विशाल पृष्ठभूमि हो,जिसके सामने मैं अपने चरित्रों को प्रस्‍तुत कर सकूं। मेरे पास गंगा है। गंगा के घाट है। मेरे पास वे दृश्य हैं,जो भारतीयों के लिए लगभग अंजान हैं। जो बनारस नहीं गया है,वह इय विशालता को नहीं समझ सकता। जब तक मैं बनारस नहीं गया था,तब तक मैं गंगा की विशालता को, उसके घाटों की विशालता को, जिसको बाहरी अलंग कहते हैं उसकी विशालता या विविधता का मुंबई में अनुमान भी नहीं लगा सकता था। वहां अतीत और वर्तमान साथ में है। पुरातन और नवीन साथ में है। संस्कृति और बदलता हुआ भारत दोनों आप देख सकते हैं। कभी पांच हजार साल पहले का भारत दिख जाएगा। कभी 2010 का भी भारत आपको दिख जाएगा। 
मुझे बहुत अच्छा लगता है कि मैं ऐसे  भारत में काम कर सकूं। ये मेरा क्रिएटिव एक्सप्रेशन है। आकर्षण है। पूरा का पूरा बैकड्रॉप मुझे बनारस दे रहा है। और उसके अपनी चुनौतियां भी हैं। चुनौतियां ऐसी हैं कि बनारस तीर्थ स्थल और पर्यटन स्थल है,इसलिए बहुत भीड़ रहती है। अगर वहां कुछ सितारे मैं ले जाता हूं तो उन्‍हें देखने की आकांक्षा में सैकड़ों लोग वहां पर जमा हो जाते हैं। पूरे भारत में दर्शकों का दबाव आप पर बना रहता है। एक ओर कुछ लाभ है तो कुछ नुकसान भी है। मैं अपनी फिल्‍मों में कैनवास ढूंढता हूं। पिंजर में बड़ा कैनवास था। मोहल्‍ला अस्सी में भी बड़ा कैनवास है। कैनवास मेरी जरूरत है। मैं विजुअल चरित्र ढूंढ़ रहा होता हूं। मैं कथा ढूंढ़ रहा होता हूं और वह कथा जिसका सीधा संबंध भारत से हो। पिंजर का सीधा संबंध भारत से है। उसके चरित्र असाधारण थे। मोहल्‍ला अस्सी में भी असाधारण कथा है, लेकिन उसमें आज का भारत है। दस वर्ष बाद, बीस वर्ष वाद, तीस वर्ष बाद ¸ ¸ ¸ जैसे आज पिंजर में, एक काल खंड का इतिहास दिखता है,जबकि इतिहास रचने की कोशिश नहीं हुई। फिर भी फिल्म में तत्‍कालीन समाज है। उसी तरह जब मोहल्‍ला अस्सी कोई देखेगा तो उसे 1986 से 2000 तक का बनारस की, मनीषा और कथा समझ में आ जाएगी। अत्‍यंत रोचक कहानी जो काशीनाथ सिंह ने लिखी थी। पिंजर  में यह सब नहीं था। पिंजर मूलत: एक गंभीर विषय था। यह विषय भी गंभीर है,लेकिन जिस तरह से काशीनाथ सिंह जी ने कहा है,वह मुझे बहुत ही रोचक लगा। मेरे लिए भी वह एक नया जॉनर है। जिसको मैं सटायर कहूंगा। यह कॉमेडी के पास है और कॉमेडी से दूर भी है और सार्थक है। सबसे बड़ी बात सार्थक है। विषय बहुत मौजूं है। इतनी सारी बात एक फिल्म में आ जाए तो इसको मैं अपना भाग्य मानता हूं और काशीनाथ जी ने कॉपी राइट दिया भी। इसको हमलोगों ने डेढ़-दो सालों में लिखा।
एक चीज मैंने सीखा कि कैनवास ढूंढ़ते समय ये ध्यान रखा जाए कि जो आप रिस्क लेने जा रहे हैं उसमें बहुत बड़े कलाकार न भी मिल पाएं, मध्य श्रेणी के कलाकार भी आएं तो कैनवास और उन दोनों की लागत में तालमेल बैठ जाए। दूसरा जो दृश्य न जरूरी हो, वह बिल्कुल न लिखा जाए। एक दिन भी एक्स्ट्रा शूटिंग न हो। फिल्म की लेंग्‍थ जितनी छोटी होगी, संभावना रहेगी कि आपको उतने ज्‍यादा दर्शक मिलें। पिंजर की सबसे बड़ी कमजोरी मुझे उस समय भी समझ आ गई थी कि उसकी लेंग्‍थ है। कई वर्षो के बाद मुझे समझ में आया कि मुझे कहां से काटना चाहिए। इसलिए मैंने मोहल्‍ला अस्सी को मैंने बहुत छोटा रखा। दूसरे मुझे यह भी ध्यान में रखना था कि हर दशक में दर्शकों की अभिरुचि बदलती रहती है। आपको अपडेट रहना पड़ेगा।

Sunday, August 21, 2016

समकालीन सिनेमा(4) : डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी



डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी
कमर्शियल सिनेमा रहा है। शुरू से रहा है। दादा साहेब फालके की पहली फिल्म राजा हरिश्चन्द्र अपने समय की व्यावसायिक फिल्म थी। आज हम उसे कला से जोड़ देते हैं। कलात्मकता से जोड़ देते हैं। मैं निश्चित तौर से कह सकता हूं कि आज कोई राजा हरिश्चन्द्र बनाना चाहे तो उसे समर्थन और निवेश नहीं मिलेगा।  अभी तो अतीत के प्रति सम्मान है और न उस प्रकार के विषय के लिए सम्मान है। उल्टा वह टैबू है। उसे दकियानूसी कहा जाएगा। कहा जाएगा कि यह क्या विषय हुआ? बात बिल्कुल तय है कि कमर्शियलाइजेशन बढ़ता जा रहा है और कमर्शियलाइजेशन में सबसे पहली चिंतन और कला की हत्‍या होती है। मैं फिर से कह सकता हूं कि सब कुछ होगा,आकर्षण के सारे सेक्टर मौजूद होंगे, लेकिन उसमें हिंदुस्तान की आत्मा नहीं होगी। मैं कतई गलत नहीं मानता कि आप विदेशों में जाकर क्‍यों शूट कर रहे हैं सिनेमा। पर देखिए कि धीरे-धीरे फिल्‍में न केवल अभारतीय हो रही हैं बल्कि वे धीरे-धीरे भारत की जमीन से हट कर भी शूट हो रही है। यह गलत है, मैं ऐसा नहीं मानता। मैं जिस वजह से बाहर जाते रहता हूं और शूट करते रहता हूं उसके ठोस कारण हैं। 
मोहल्‍ला अस्‍सी को काशी में शूट करने की इच्छा थी। उसका कारण यह था कि जिस बनारस को मैं आज देख रहा हूं, जिस अस्सी को आज देख रहा हूं,मैं यकीनन कह सकता हूं कि दस साल बाद मैं उस बनारस और अस्‍सी को नहीं देखूंगा। जिस तेजी से परिवर्तन हो रहा है, उसमें हमारी जितनी सांस्कृतिक धरोहर है, सांस्कृतिक अवधारणाएं हैं, सभी चीजें तेजी से बदलेगी। जिन-जिन वस्तुओं पर गौरव होता था,वह चाहे हमारी भाषा हो, चाहे वह संस्कृति हो, चाहे वह स्थान हो, चाहे वह इतिहास हो,वह सब जिस रफ्तार के साथ ऑडियो विजुअल में बदलेगा कि मूल के लिए कोई जगह नहीं होगी। अस्सी घाट जो आज आप देख रहे हैं या दशाश्‍वमेध जो आज देखते हैं, राजा घाट जो आज देखते हैं...वह सब...मुझे कोई आश्चर्य नहीं होगा कि सब के सब किसी मोबाइल फोन के, किसी फूड कॉर्नर,रेस्‍तरां और पित्‍जा के अड्डे होंगे। वे आज हमारे लिए सांस्कृतिक क्षेत्र हैं,कल वे हमारे लिए किसी मॉल में परिवर्तित हो जाएंगे। इसीलिए जैसे ही मुझे मौका मिला मैंने कहा कि मैं अस्‍सी पर शूटिंग करंगा।  
मोहल्‍ला अस्‍सी की शूटिंग से तीन वर्ष पहले मैं बनारस गया था तो बनारस में किसी नाव पर किसी मोबाइल फोन का नाम नहीं था। अब मैं काशी के फोटोग्राफी करने गया था तो मैं देखा कि अब सारे नौकाओं पर मोबाइल फोन के साइनेज पेंट किए जा चुके हैं। अब आपको गंगा नदी में नौकाएं नहीं दिखती हैं। अब आपको गंगा नदी में चलते-फिरते एडवर्टाइजमेंट दिखाई देते हैं। जहां पर पुरुष-स्त्रियां कपड़े बदलते हैं, जहां पर सिर्फ चारदीवारी हुआ करती थी,अब वहां पर किसी टेलीफोन, मोबाइल कंपनी का एडवर्टाइजमेंट लगा है। जहां भी आंखें जा सकती हैं, जहां भी हम देख सकते हैं, वे जितने सुंदर स्‍थान हों, तीर्थ स्थल हों, सांस्कृतिक स्थल हो... वे सब थोड़े दिनों में किसी एक कॉमोडिटी के,किसी एक वस्तु के प्रचार के केंद्र हो जाएंगे। क्या हम इसको रोक पाएंगे? उत्तर है नहीं। पर जिसके पहले ये बदलाव इन सारी चीजों को निगल जाएं मैं एक फिल्मकार के नाते उन्‍हें सुरक्षित रख सकता हूं,इसलिए मैं उन्‍हें सेल्यूलायड में रख लेना चाहता हूं। मैं भी सोचने लग गया हूं कि इंग्लैंड में शूटिंग करना ज्‍यादा आसान है। यदि मुझे मौका मिलता है तो जाऊंगा। वहां बेहतर सुविधाएं हैं, वहां जिंदगी की रेलमपेल नहीं है। जिस तरह से हमारा संसार सिमट गया है, उसमें अब दर्शक को कोई अंतर नहीं पड़ता है कि ये भारत का सिनेमा है कि नहीं है? क्योंकि वह लगातार इंटरनेशनल सिनेमा देख रहा है। एक ही चैनल पर एक साथ भारतीय और  विदेशी सिनेमा देख रहा है। धीरे-धीरे सीमाएं मिट रही हैं।

Friday, August 19, 2016

फिल्‍म समीक्षा : हैप्‍पी भाग जाएगी




सहज और मजेदार

-अजय ब्रह्मात्‍मज

मुदस्‍सर अजीज की फिल्‍म हैप्‍पी भाग जाएगी हैप्‍पी रखती है। उन्‍होंने भारत-पाकिस्‍तान के आर-पार रोचक कहानी बुनी है। निर्माता आनंद एल राय की फिल्‍मों में लड़कियां भाग जाती हैं। यहां मुदस्‍सर अजीज के निर्देशन में हैप्‍पी भाग जाती है। वह अनचाहे ही पाकिस्‍तान पहुंच जाती है। पाकिस्‍तान के लाहौर में बिलाल अहमद के घर में जब वह फलों की टोकरी से निकलती है तो खूब धमाचौकड़ी मचती है। दो भाषाओं,संस्‍कृतियों,देशों के बीच नोंक-झोंक की कहानियों में अलग किस्‍म का आनंद होता है। असमानता की वजह से चुटकी और मखौल में हंसी आती है। इस फिल्‍म में हिंदी-उर्दू,लाहौर-अमृतसर और भारत-पाकिस्‍तान की असमानताएं हैं।
हैप्‍पी अमृतसर में पली तेज-तर्रार लड़की है। उसे आपने परिवार के परिचित लड़के गुड्डु से प्‍यार हो जाता है। गुड्डु साफ दिल का लड़का है। ट़ुनटुना(गिटार) बजाता है और हैप्‍पी से प्‍यार करता है। वह हैप्‍पी के बाउजी से शादी की बात करे इसके पहले ही शहर के कारपोरेटर बग्‍गा से हैप्‍पी की शादी तय हो जाती है। हैप्‍पी एक तरफ शादी की रस्‍मों में शामिल है और दूसरी तरफ गुड्डु के साथ भाग जाने की योजना बनाती है। वह भागती है,लेकिन गु्ड्डु के पास पहुंचने के बजाए लाहौर पहुंच जाती है।
लाहौर के बिलाल अहमद अपने अब्‍बा के साथ एक डेलिगेशन में अमृतसर आए हैं। उनका दिल तो क्रिकेट में लगता था,लेकिन उनके अब्‍बा एक्‍स गर्वनर जावेद अहमद चाहते हैं कि वे पॉलिटिक्‍स में आएं। उनकी राय में इससे पाकिस्‍तान की हिस्‍ट्री बदल जाएगी। वे अपने बेटे को भावी जिन्‍ना के रूप में देखते हैं। बिलाल अ‍हमद की मंगनी भी हो चुकी है। लाहौर में एक उस्‍मान आफरीदी पुलिस अधिकारी भी हैं। उनके अलावा घर में मामू कहे जाने वाले मैनेजर और नौकरानी रिफत हैं। इन किरदारों के जिक्र की खास वजह है। तीनों ही किरदार पिछली सदी के सातवें दशक की हिंदी फिल्‍मों से निकाल कर 2016 की फिल्‍मों में टांक दिए गए हैं। उनकी हरकतों में उस दौर के सिनेमा के किरदारों की साफ झलक है।
बहरहाल,मुदस्‍सर अजीज ने इस सिटकॉम फिल्‍म में हंसाने का पूरा इंतजाम किया है। अपने किरदारों को कैरीकेचर होने से बचाते हुए वे कथा रचते हैं। यों लगता है कि फिल्‍म अभी फिसलेगी और फूहड़ हो जाएगी,लेकिन हर बार वे करीने से अपने किरदारों को संभाल लेते हैं। निश्चित ही उन्‍हें डायना पेंटी के रूप में एक समर्थ अभिनेत्री मिली है। डायना पेंटी ने हैप्‍पी के एटीट्यूड को अच्‍छी तरह समझा है। उन्‍हें को-एक्‍टर्स से भरपूर मदद मिली है। अभय देओल,जिम्‍मी शेरगिल,अली फजल,पियूष मिश्रा,जावेद शेख,मोमल शेख और कंवलजीत ने हंसी की गति बनाए रखी है। हां,पियूष मिश्रा का राजेंछ्र नाथ की स्‍टायल में आना खटकता है।
फिल्‍म की कहानी,पटकथा,संवाद और गीत मुदस्‍सर अजीज के हैं। इस फिल्‍म के अनेक दृश्‍यों में संवादों की जगह गीत के बोलों से काम लिया गया है। मुदस्‍सर खूबसूरती से दोनों के मेल से अपने दृश्‍यों को प्रभावशाली बाते हैं। उनके संवादों में छींटाकशी है। वे लाहौर के दृश्‍यों में हंसी-मजाक और मखौल रचते हैं। भारतीय दर्शकों को यह मजेदार लगेगा। ऐसे मजाक में अजीब सी तृप्ति मिलती है।
लाहौर और अमृतसर आजादी कि पहले पड़ोसी शहर थे। दोनों में अनेक समानताएं थीं। विभाजन के बाद दोनों शहरों में बड़ा फर्क आ गया है। उस फर्क को बात-व्‍यवहार के लहजे से मुदस्‍सर अजीज ने लाने की कोशिश तो की है,लेकिन कई बार कुछ-कुछ छूट सा गया है। दोनों शहरों की बोलचाल में केवल बाहर और बाहिर या आइए और आएं का ही फर्क नहीं है। और भी बहुत कुछ है। लाहौर के आभिजात्‍य परिवारों के मर्द और औरतों की नफासत हैप्‍पी भाग जाएगी में नहीं आ पाई है। लाहौर शहर भी नहीं दिखा है।
कुछ कमियों के बावजूद हैप्‍पी भाग जाएगी मजेदार फिल्‍म है। हल्‍के-फ़ुल्‍के तरीके से वह हिंदी फिल्‍मों का वह संसार रचती है,जो बासु चटर्जी,हृषीकेष मुखर्जी,गुलजार और सई परांजपे की फिल्‍मों में दिखता था। हैप्‍पी भाग जाएगी हिंदी फिल्‍मों की परंपरा की फिल्‍म है।
अवधि-125 मिनट
स्‍टार-साढ़े तीन स्‍टार

Thursday, August 18, 2016

दरअसल : ट्रेलर लांच इवेंट

-अजय ब्रह्मात्‍मज
पिछले दिनों एमएस धौनी : द अनटोल्‍ड स्टोरी का मुंबई में ट्रेलर लांच था। नीरज पांडे की इस फिलम के प्रति जबरदस्‍त रुझान है। इस रुझान को धौनी की लोकप्रियता ने बल दिया है। धौनी की कहानी प्रेरक और अनुकरणीय है। क्रिकेटप्रेमी तो उनके खेल और अदाओं के दीवाने हैं। धीरे-धीरे उनका व्‍यक्तित्‍व और खेल करिश्‍माई हो गया है। जाहिर सी बात है कि ऐसे लिविंग लिजेंड के बारे में सभी विस्‍तार से जानना चाहते हैं। हम क्रिकेट और फिल्‍म जगत की मशहूर हस्तियों की जिंदगी से वाकिफ रहते हैं। कोई नई जानकारी या प्रसंग पता चले तो बेइंतहा खुशी होती है। अभी एमएस धौनी : द अनटोल्‍ड स्टोरी दर्शकों को ऐसी ही खुशी दे रहा है। हां तो ट्रेलर लांच के इवेंट में धौनी के आने की जानकारी मिलने पर मीडियाकर्मी भी उत्‍सुक हो गए। उन्‍होंने देरी से आरंभ हुए इवेंट में धौनी का इंतजार किया। धौनी आए और हमेशा की तरह बेधड़क दिल से बातें कीं। मगर इवेंट के दौरान फैन से बातें करने और उनके सवालों के जवाइ देने के बाद वे निकल लिए। मीडियाकर्मी मुंह ताकते रह गए और उनके सवाल सुने ही नहीं गए। बाद में बताया गया कि मीडिया से तो धौनी की बात होनी ही नहीं थी।
यह एक प्रकार का छल रहा। एसएमएस निमंत्रण में साफ लिखा था कि ट्रेलर लांच में धौली,संतोष सिंह राजपूत और नीरज पांडे मौजूद रहेंगे। फिल्‍म पत्रकारों के लिए धौनी से सवाल करना का मौका मिलना ही इस इवेंट की खास बात थी। वही नहीं हुआ। ताज्‍जुब तब हुआ कि जब नीरज पांडे समेत आयोजकों ने मीडिया की शिकायत पर कंधे उचका दिए। मजबूरी में मीडियाकर्मी सुशांत और नीरज से सवाल पूछ कर संतुष्‍ट हो गए। हालांकि नीरज पांडे ने माफी मांगी,लेकिन वह माफी महज औपचारिकता थी। उनके चेहरे और शब्‍दों से यह नहीं लग रहा था कि उन्‍हें कोई अफसोस है। इन दिनों कामयाब निर्देशकों का अहंकार ऐसे इवेंट में दिख रहा है। वे मीडिया को ऐंवे ही लेते हैं। उनकी रुचि सिर्फ बाइट देने में रहती है। इलेक्‍ट्रानिक और ऑन लाइन मीडिया के साथियों का काम तस्‍वीरों और वीडियो से चल जाता है। प्रिंट मीडिया के साथी छक जाते हैं। उन्‍हें लिखने और पाठकों को बताने के लिए कुछ खास नहीं मिल पाता। मूवी और मीडिया के संबंध के इस संक्रांति काल से निकलने के रास्‍ते बनेंगे। फिलहाल अवरोध बन चुका है।
दरअसल,धौनी ने एक दिन का समय दिया था। इस एक दिन में उन्‍हें लुधियाना,दिल्‍ली और मुंबई के इवेंट में मौजूद होना था। उन्‍होंने अपन तरफ से कोशिश भी की,लेकिन उड़ान के विलंब और ट्रैफिक जाम ने उनके तयशुदा कार्यक्रम समय से नहीं होन दिए। नतीजा यह हुआ कि मुंबई में दो इवेंट और इंटरैक्‍शन(फैन और मीडिया) को एक साथ करना पड़ा। दिक्‍कत और परेशानी इसलिए हुई कि मीडिया को सही जानकरी नहीं दी गई। और न उनकी जिज्ञासाओं का खयाल रखा गया। इन दिनों आयोजकों को लगता है कि लोग जाएंगे कहां...वे बैठे रहेंगे। सच्‍चाई भी यही है कि पत्रकार बैठे रहते हैं। प्रतियोगिता इस कदर बढ़ गई है कि किसी एक की फुटेज दूसरे की नौकरी निगल सकती है। इस डर और दबाव में मीडिया का मनचाहा इस्‍तेमाल हो रहा है।
ट्रेलर लांच इवेंट में ट्रेलर दिखाने के बाद सवाल-जवाब होते हैं। सभी एक-दूसरे की तारीफ कर रहे होते हैं। मुश्किल सवाल पूछे नहीं जाते। टेढ़े सवालों पर निर्माता,निर्देशक और स्‍टार मखौल के मूड में आ जाते हैं। वे सवालों की खिल्‍ली उड़ाते हैं। मीडिया से मजाक करते हैं। परस्‍पर पीठ सहलाने के बाद वे निकल जाते हैं। ऐसे इवेंट के फुटेज टीवी पर चलते हैं। कुछ चटपटी खबरें अखबारों में आ जाती हैं। पता करना चाहिए कि ऐसे कवरेज पाठकों और टीवी दर्शकों को थिएटर तक ला पाते हैं क्‍या? अगर वे फिल्‍म के दर्शकों में तब्‍दील होकर थिएटर में जाते तो कोई भी फिल्‍म फ्लॉप नहीं होती। जिस ट्रेलर या गानें के मिलियन-मिलियन हिट बताए जाते हैं,दनके तो दर्शक भी मिलियन-मिलियन में होनो चाहिए। ऐसा होता नहीं है। अखबारों में पढ़ना और टीवी पर देखना बिल्‍कुल अलग शगल है। फिल्‍में देखने का फैसला दर्शक ट्रेलर लांच जैसे इवेंट से नहीं करते। आमिर खान ने गजिनी से इसे आरंभ किया था,लेकिन अब यह केवल रस्‍म अदायगी भर रह गई है। ट्रेलर लांच समय और धन की बर्बादी है।
सभी जानते हैं कि ट्रलर लांच करते ही वह यूट्यूब पर उपलब्‍ध हो जाता है। फिर पांच-दस मिनट पहले देखने के लिए घंटों समय देना मीडिया के लिए भी तार्किक और उपयोगी नहीं है।

करीबियों की नजर में गुलज़ार




प्रस्‍तुति-अजय ब्रह्मात्‍मज
गुलजार के बारे में उनके तीन करीबियों अशोक बिंदल,पवन झा और सलीम आरिफ की स्‍फुट बातों में उनके व्‍यक्तित्‍न की झलक मिलती है। फिलवक्‍त तीनों से उनका लगभग रोजाना संवाद होता है और वे उनके सफर के साथी हैं।

अशोक बिंदल
(मुंबई निवासी साहित्‍यप्रेमी और रेस्‍तरां बिजनेस में सक्रिय अशोक बिंदल का गुलज़ार से 20-22 साल पुराना परिचय है,जो पिछले सालों में सघन हुआ है।)
सुबह 10 बजे से शाम 5 बजे तक रोजाना आफिस में बैठते हैं। दोपहर में आधे घंटे का लंच और छोटे नैप के बाद फिर से आफिस आ जाते हैं। अभी उम्र की वजह से दो घंटे के बजाए एक घंटा ही टेनिस खेलते हैं। एक घंटा वाक या योगा करते हैं। रात को दस बजे तक रिटायर हो जाते हैं।
सलाह देते हैं कि एक गजल लिखनी है तो कम से कम सौ गजल पढ़ो। उनके आसपास किताबें रहती हैं। उन्‍हें पढ़ते हैं। उनमें निशान
लगे रहते हैं।
किसी से भी मिलते समय वे उसे इतना कंफर्ट में कर देते हैं कि उसे सुकून होता है। 82 की उम्र में कोई इतना एक्टिव नहीं दिखता है।
वे चलते हैं और हमें दौड़ना पड़ता है।
नाराज नहीं होते। विनोदी स्‍वभाव के हैं। आसपास के लोगों की चुटकी लेना और खुद पर भी हंसना।
सुबह को हल्‍का नाश्‍ता और शाम को बढि़या खाना और खाने के बाद मिठाई। कहते भी हैं कि मिठाई के लिए ही तो खाते हैं।
खुद का लेखन,अनुवाद,फिल्‍में...राकेश ओमप्रकाश मेहरा और शाद अली की फिल्‍में कर रहे हें।
युवाओं से कनेक्‍ट करते हैं। वे आम बुजुर्गों की तरह कुढ़ते नहीं हैं।
ऐसा नहीं ळै कि वे चिढ़ते हैं,लेकिन बगैर तैयारी के कोई बात करे तो नाराज हो जाते हैं। उनका यही कहना होता है कि बात करने से पहले थोड़ा मेरे बारे में और मेरा लिखा तो पढ़ लें। कोई नया सवाल आए तो मुझे भी अच्‍छा लगेगा।
कोशिश के समय भोपाल की साथ आरुषि से जुड़े। मूक-वधिरों की इस संस्‍था से वे 35 सालों से जुड़े हैं। उनके लिए अपने तरीके से योगदान करते हैं। भापाल की ही बच्‍चों की पत्रिका चकमक से जुड़े हुए हैं। उनके लिए लिखते हैं। बच्‍चों से उनका लगाव बना रहता है। हर महीने बच्‍चों को दो पक्तियां देते हैं चित्र बनाने के लिए। बोस्‍की से आरंभ हुआ बच्‍चों के लिए लिखने का सिलसिला जारी है। वहां वे बच्‍चों के सवालों के जवाब भी देते हैं।
नई उम्र के लोगों से भी कुछ पूछने और जानने में उन्‍हें संकोच नहीं होता। एक जिज्ञासु बच्‍चा उनके साथ रहता है।

पवन झा
(जयपुर निवासी पवन झा को गुलजारकोष कह सकते हें। उनके पास गुलजार से संबंधित तमाम सामग्रियां हैं। इंटरनेट के आरंभिक दौर में ही उन्‍होंने गुलजार ऑनलाइन वेबसाइट बनाई थी।)
82 की उम्र में भी रोल मॉडल हैं अपने व्‍यक्तित्‍व की वजह से। अमूमन सेलिब्रिटी से मिल लेने पर उनकी चमक कम होती है। इसके विपरीत गुलजार से हर मुलाकात में चमक बढ़ती जाती है।
यह गलतफहमी है कि वे मीडिया से नाराज रहते हैं। यह सच नहीं है। वे मीडिया से उम्‍दा सवालों की उम्‍मीद करते हैं।
82 में फिट हैं। ऊर्जा से भरपूर हैं। उनके साथ चलने में हम पिछड़ जाते हैं।
वे तेल से बनी चीजें बिल्‍कुल नहीं खते हैं। मीठा उन्‍हें बहुत पसंद है। जयपुर की गजक खास तौर पर पसंद है। उम्र उन पर हावी नहीं हुआ है।
अभी तक टेनिस खोल रहे हैं लगातार। पिछले दिनों तो उन्‍होंने टूर्नामेंट भी जीता था। उनकी चुस्‍ती बरकरार है।
भीड़ में उन्‍हें लोगों से निभाना आता है। वे प्रशंसकों का खयाल रखते हैं। चार-चार घंटों तक बुक साइनिंग करते हैं।
फिल्‍मी पार्टियों में नहीं जाते। समय पर सो जाना जरूरी रहता है,क्‍योंकि उन्‍की सुबह सवेरे हो जाती है।
वे एक्‍सप्‍लोरर स्‍वभाव के हें। आठवें और नौवे दशक में अपनी फिल्‍मों की शूटिंग के लिए रेकी करने के लिए वे खुद कार ड्राइव करते थे। उन्‍होंने पूरा भारत देखा है।
सेल्‍फी जेनरेशन से वे खुश नहीं रहते। खास कर उनकी बेअदबी और बेशऊर रवैए से दुखी होते हैं। हां,नए लोगों को सुनने और प्रोत्‍साहित करने में उनकी रुचि रहती है।
वे 31 भाषाओं की 365 कनिताएं अनुवाद कर रहे हैं। वे बड़े जतन से यह काम कर रहे हैं। वे टैगोर के साथ नए रचनाकारों का भी अनुवाद करते हैं। वे कुसुमाग्रज के साथ सौमित्र का अनुवाद भी समान भाव से करते हैं।
उनके गीत हर पीढ़ी के निर्देशक की जरूरत के हिसाब से बदलती रही है। वे कंटेम्‍पररी बने हुए हैं। 1995 से 2005 के बीव उनके गीतों में अनेक प्रयोग मिलते हैं। उन्‍होंने हमेशा आज की भाषा को अपनाया। उसके साथ नास्‍टेलजिया को भी जोड़े रखा। आज की पीढ़ी भी उनकी फैन है।
सलीम आरिफ
(रंगकर्मी सलीम आरिफ और गुलजार का रिश्‍ता टीवी शो मिर्जा गालिब के जमाने से है। सलीम आरिफ ने उनकी रचनाओं को खूबसूरती से मंच पर पेश किया है।)
गुलजार खेल के शौकीन हैं। टेनिस और क्रिकेट मैच देखते और दिखाते हैं। वीएचएस के जमाने में वे खेलों की रिकार्डिंग मेंगवाते थे और हमें दिखाते थे। लार्डसे में सुनील गावस्‍कर के 188 की इनिंग का वीडियो मैंने उनके साथ देखा।
एकांतिक व्‍यक्ति हैं। अकेले रहना उन्‍हें पसंद है। अकेले होने पर बहुत काम करते हैं। वक्‍त का अच्‍छा और पपॅजीटिव इस्‍तेमाल सीखना चाहिए।
अपने ही घर में वे तैयार होकर ऊपर से नीचे आते हैं और टेबल पर बैठ कर काम करते हैं। वे इसे नौकरी की तरह ट्रीट करते हैं।
लेखन निरंतर चलता रहता है। रचनाओं को छांटने के बाद ही वे उन्‍हें प्रकाशित करते हैं। समय की दूरी बना कर वे फिर से पढ़ते हैं। और फिर फायनल करते हैं।
मैंने उनकी अप्रकाशित रचनाओं का नाटक में इस्‍तेमाल किया है। वे कहते हैं कि मैं उनकी जेब काट लेता हूं। खराशें और लकीरें से इसकी शुरूआत हुई। मुझे नए नाटक के लिए जब भी कंटेंट की जरूरत पड़ती है तो मैं उनकी तरफ ही उम्‍मीद से देखता हूं।
उनका सेंस ऑफ ह्यूमर गजब का है। यह उनकी रचनाओं और फिल्‍मों में दिखता है। वे रेगुलर बातचीत में भी परिचितों की खिंचाई करने से नहीं हिचकते।
नए गीतकार गुलजार से ऑफगीट इमैजरी तो ले लेते हैं,लेकिन अल्‍फाज चुनने में लड़खड़ा जाते हैं। गुलजार साहब के पास अल्‍फाज का खजाना है। दूसरे उनका सौंदर्यबोध आला दर्जे का है।
18 से 22 साल के लड़के-लड़कियां भी उनके फैन हैं। 82 का व्‍यक्ति 18 की उम्र से कनेक्‍ट करता है,क्‍योंकि वे उनकी जुबान में बातें करते हैं। वे आज की लैंग्‍वेज लिखते हैं। वे चौंका देते हैं।
गुलजार हिंदी कविता या उर्दू शायरी के रवायत में नहीं हैं। यह उनका खास पहलू है।
कभी किसी के बारे में निगेटिव बात नहीं करते। मैंने कभी उन्‍हें यह कहते नहीं सुना कि फलां को काम नहीं आता। वे जजमेंटल भी नहीं हैं।
सहज भाष में उनके संवाद होते हैं। आनंद के एक संवादमैं तो यह भी नहीं कह सकता कि तुम्‍हें मेरी उम्र लग जाए को सुन कर ही जितेन्‍द्र ने उनके साथ काम करने की इच्‍छा जाहिर की थी। फिर परिचय और खुश्‍बू बनी।
यात्रा में उनका मन लगता है। फिल्‍मोंं के दौरान और फिल्‍मों के बाद वे खुद ड्राइव करते हुण्‍ घूमने जाते रहे हैं। भूषण वनमाली उनके खास साथी थे। वे खंडहरों और पुरानी इमारतों पर गौर करते हैं।
आरडी बर्मन उन्‍‍हें सफेद कौआ और खुद को काला कौआ कहते थे। कभी मुलाकात नहीं होने पर बता कर जाते थे कि बोल देना कि काला कौआ आया था।
अभी वे फुर्सत में पेंटिंग करते हैं।


Wednesday, August 17, 2016

समकालीन सिनेमा(3) : डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी



डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी

मुझे लगता है कि अब दर्शकों के पास चुनाव भी बहुत हो गए हैं। पहले एक वैक्यूम था। आप सातवें-आठवें दशक में चले जाइए आपके पास समांतर सिनेमा का कोई पर्याय नहीं था। आप जरा भी कला बोध अलग रखते हैं, अलग कला अभिरुचि रखते हैं तो आपके पास दूसरे सिनेमा का विकल्‍प था। तब के भारत के दर्शकों को विदेशी फिल्में सहजता से उपलब्ध नहीं होती थी।
आज के सिनेमा के लिए टीवी भी जिम्‍मेदार है। टेलीविजन पर शुरू में प्रयोग हुए, अब टेलीविजन अलग ढर्रे पर चला गया है। अभी टेलीविजन चौबीस घंटे चलता है। चौबीसों घंटे न्यूज का चलना। जो विजुअल स्पेस था,उस स्पेस में बहुत सारी चीजें आई जो दर्शकों के मन को रिझाए रखती हैं। दर्शकों के लिए सार्थक है या सार्थक नहीं है मायने नहीं रख रहा है। दूसरा सार्थक सिनेमा के नाम पर हमलोग जो सिनेमा बनाते रहे,वह या तो किसी पॉलिटिकल खेमे में रहा या किसी के एजेंडा में बना। इसलिए वह सिनेमा भी आखिरकार आम दर्शक का सिनेमा नहीं बन पाया। जब कभी भी इस तरह की फिल्में बनती हैं तो अक्सर मैं देखता हूं,वे दंगे से ग्रस्त हैं या तो दंगे के खिलाफ हैं या उसके पीछे खास राजनीतिक दृष्टिकोण रहा है। उनसे भारत का आम दर्शक बहुत आसानी से नहीं जुड़ता है।
दूसरे समांतर सिनेमा के समर्थ फिल्‍मकार, जिनके पास खास दृष्टिकोण था,कला बोध था। जो सफल थे। वे भी मेनस्ट्रीम सिनेमा में सफलता की कोशिश करने लगे। उन्हें भी लगने लगा कि छोटी-छोटी सफलताएं देख ली है,अब बड़ी सफलता देखनी है। हिंदी सिनमा में सफलता का आधार तो सबसे बड़ा कलाकार ही है। आप देख लीजिए कि जिस विषय में निपुण¸  थे,जिस विषय में प्रचंड थे, प्रखर थे। उस विषय को छोड़ कर जैसे ही मेनस्‍ट्रीम में गए,उन्हें आशातीत सफलता नहीं मिली। मैं यहां पर नाम भी लेना चाहूंगा। आप श्याम बेनेगल को देख लें या गोविंद निहलानी को देख लें। उन्होंने जैसे ही धारा बदलने की कोशिश की,वे भटक गए। आज भी उन दोनों की श्रेष्ठ फिल्में वही हैं,जो उन्होंने बीस साल पहले बनाई थी। आज भी गोविंद निहलानी का नाम लेते हुए अर्द्धसत्य और आक्रोश ही याद आती है,न कि देव। श्याम बाबू का नाम लेते निशांत और अंकुर या जुनून हमें याद आती है न कि उनकी हालिया फिल्में जहां उन्होंने प्रयोग करने की कोशिश की। इसके बावजूद मैं यहां पर जोर देना चाहूंगा कि किसी ट्रांसफरमेंशन में ऐसा हर व्यक्ति के साथ होता है। हर निर्देशक अपने कैनवास को बड़ा करना चाहता है। वह चाहता है कि मैं बड़े पैमाने पर पेंटिंग करूं।
मुझे अच्छा लगता है कि प्रकाश झा उस में एक हद तक सफल हो गए। प्रकाश झा ने दामुल से शुरूआत की थी। आज वे राजनीति बना रहे हैं। उन्‍होंने पहले बिल्कुल नए कलाकार,थिएटर के कलाकार और एक-दो सिनेमा के कलाकारों के साथ फिल्‍में बनाईं। आज वे बड़े कलाकारों के साथ बड़े पैमाने पर फिल्‍में बना रहे हैं।
ऐसा नहीं है कि हमारे पास उदाहरण नहीं है। विश्व सिनेमा और भारतीय सिनेमा में ऐसे लोग हैं जो अभी भी अपने बातों पर अड़े हुए हैं, कायम है। चाहे वह गिरीश कासरवल्ली हो या अदुर गोपाल कृष्णणन हो या बंगाल में बहुत सारे ऐसे निर्देशक हैं जो अभी भी वही काम कर रहे हैं। उनके पास दर्शक है। वे अपनी भाषाओं में फिल्‍में बना रहे हैं। हिंदी दर्शक के साथ सबसे बड़ी समस्या है कि उसकी अभिरुचियां अलग-अलग है। और हर साल दो-तीन सौ फिल्में बनती हैं। तमिल और तेलुगू में भी कमोबेश इतनी फिल्‍में बनती है। बांग्ला फिल्में और कन्नड़ फिल्म इतने बड़े पैमाने पर नहीं बनतीं। सिनेमा की संस्‍कृति और स्‍वीकृति में लिट्रेसी का भारी संबंध रहा है। जिस प्रकार से वहां मूवमेंट रहा है,जिस प्रकार से वहां थिएटर आंदोलन रहा है, कला के प्रति रुझान रहा है,उसकी वजह से भी वहां पर इस प्रकार के प्रयोगों को समर्थन मिलता रहा है। हो सकता है कि कल वहां भी वही हो,जो आज हिंदी सिनेमा के साथ हो रहा है। अभी मैं उस पर कुछ नहीं कह सकता।

Tuesday, August 16, 2016

समकालीन सिनेमा(2) : डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी

-डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी


अभी जो लोग यह निर्णय कर रहे हैं कि फिल्म कौन सी बननी चाहिए, वे सौभाग्य या दुर्भाग्य जो भी कह लें,डीवीडी फिल्में देख कर ही निर्णय करते हैं। अभी तक हमारी फिल्में किसी और देश के सिनेमा पर आधारित हैं। कॉरपोरेट की बाढ़ आने से अधिकतर निर्देशकों को शुरू में यह विश्वास था कि नए सिरे कहानियों का मूल्यांकन शुरू होगा, जो बाद भ्रम साबित हुआ। उम्‍मीद थी कि नए सिरे से कथाओं का मूल्यांकन होगा और नए प्रयोगधर्मी  फिल्में बनेगी। आशा के विपरीत परिणाम दूसरा है। मैं कह सकता हूं कि इस प्रकार के निर्णय जो लोग लेते हैं, वे लोग बाबू किस्म के लोग होते हैं। उन्‍हें साल के अंत में एक निश्चित लाभ दिखाना होता है। इसलिए वे भी यही मानते और तर्क देते हैं कि बड़ा कलाकार, बड़ा निर्देशक और सफलता। वे उसके आगे-पीछे नहीं देख पा रहे हैं  ¸ ¸ ¸ 

 सबसे बड़ी बात हमारे पास लंबे समय से ऐसा कोई निकष नहीं रहा,जिसके आधार पर कह सकते हैं कि कॉरपोरेट के अधिकारी वास्तव में कथा के मूल्यांकन के योग्य भी है। हमारे यहां योग्यता का सीधा पर्याय सफलता है। जो सफल है,वही योग्य है। समरथ को नहीं दोष गोसाईं। जो समर्थ है,वही योग्य है। यह दोषारोपण की बात नहीं है, यह विडंबना ही है कि इस देश में भाषा के स्तर पर, कला के स्तर पर, साहित्य के स्तर पर इतनी विविधता है,फिर भी इस देश में पिछले कुछ वर्षों में पुरस्कार के स्तर पर देख लें या तथाकथित ऑस्कर के लिए भेजी फिल्‍मों को देख लें, उनमें हिंदी सिनेमा का प्रतिनिधित्व नहीं होता है। राष्ट्रीय स्तर पर भी जो सिनेमा पुरस्‍कृत हो रहा है,वह हिंदी का सिनेमा नहीं है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी जो सिनेमा बाहर जा रहा है,वह भी हिंदी का सिनेमा नहीं है। कुल मिलाकर इस समय परिदृश्य ऐसा है कि हमारे यहां कथाओं में विविधता है ही नहीं। मैं तो कहूंगा कथाएं ही नहीं हैं हमारे पास। हम बिना कथा के कई कथाओं को जोड़ कर फिल्‍में बना रहे हैं। कहीं का ईंट कहीं का रोड़ा,भानुमति ने कुनबा जोड़ा के तर्ज पर मनोरंजक फिल्में बन रही हैं। हर व्यक्ति चाहता है कि वह मनोरंजक फिल्म बनाए। कुछ लोग बना पाते हैं, कुछ नहीं बना पाते हैं। 

हमारे फिल्में साधारण और साधारण के नीचे की हैं। और मैं नहीं मानता कि यह दृश्य नहीं बदलेगा। फिलहाल मुझे नहीं दिखता कि भविष्य तुरंत बदलाव होने वाला है। आने वाले दिनों के सिनेमा का भी मापदंड यही रहने वाला है कि सफल निर्देशक और सफल कलाकार मिल जाएं तो सफलता संभावना और गारंटी हो जाती है।
  

Monday, August 15, 2016

समकालीन सिनेमा - डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी



समकालीन सिनेमा पर इस सीरिज की शुरूआत डॉ. चंद्र प्रकाश द्विवेदी के लेख से हो रही है। अगली सात-आठ कडि़यों में यह लेख समाप्‍त होगा। इस सीरिज में अन्‍य निर्देशकों को भी पकड़ने की कोशिश रहेगी। अगर आप किसी निर्देशक से कुछ लिखवा या बात कर सकें तो स्‍वागत है। विषय है समकालीन सिनेमा.... 

डॉ.चंद्रप्रकाश द्विवेदी

       
हिंदी सिनेमा कहते ही मुझे हिंदी साहित्‍य और संस्‍कृति की ध्‍वनि नहीं सुनाई पड़ती। जैसे कन्नड़ का एक अपना सिनेमा है, बंगाल का अपना एक सिनेमा है, तमिल का अपना एक सिनेमा है। उन भाषाओं के सिनेमा में वहां का साहित्‍य और संस्‍कृति है। कन्नड़ में गिरीश कासरवल्ली लगभग पच्चीस फिल्में बनाईं। वे कम दाम की रहीं, कम बजट की रहीं। उनकी सारी फिल्में किसी न किसी कथा, लघुकथा या उपन्यास पर आधारित हैं। उन्होंने पूरी की पूरी प्रेरणा साहित्य से ली। दक्षिण के ऐसे कई निर्देशक रहे जो लगातार समांतर सिनेमा और वैकल्पिक सिनेमा को लेकर काम करते रहे। हमारे यहां लंबे समय तक श्याम बेनेगल, गोविंद निहलानी उस सिनेमा के प्रतिनिधि रहे। उसके बाद मैं जिनको देख सकता हूं जिन्होंने समानांतर और व्यावसायिक दोनों का अच्छा संयोग करने की कोशिश की वे हैं प्रकाश झा। 
अब अगर आप देखें तो हिंदी फिल्मों में सार्थक सिनेमा के लिए कम जगह बची है। उसके अपने व्यावसायिक कारण भी हैं। सच्चाई यह है कि हिंदी सिनेमा ने यह घोषणा कर दी है कि उसका साहित्य से या सार्थकता से उसका कोई संबंध नहीं है। जब तक सिनेमा सिर्फ मनोरंजन करता है, वह सार्थक नहीं है। उसमें कथा, नहीं है। उसमें चुटकुलेबाजी है, लतीफेबाजी है। यह सिनेमा नहीं है। अफसोस है कि दर्शक ने उसे स्वीकार कर लिया है। फिल्‍मकारों ने उसे स्वीकार कर लिया है। पहले ऐसा माना जाता था कि सिनेमा कला और व्यवसाय दोनों का योग है। अब सिनेमा कला है, इस पर अपने-आप प्रश्न चिह्न लग गया है। अगर यह कला है तो कला का उद्देश्य क्या हैं? कला का मापदंड क्या है? फिर आप पाएंगे कि कला वाली कोई बात रह नहीं गई है। कुल मिला कर बहुत ही संक्षेप में मैं यही कह सकता हूं कि हिंदी का सिनेमा धीरे-धीरे व्यवसायिक‍ लक्ष्य की ओर बढ़ रहा है। उसे व्‍यावसायिकता के गर्त में जाते देखा जा सकता है। इसीलिए हिंदी सिनेमा का मेनस्ट्रीम सिनेमा विषयों की ओर नहीं है। विषयों की ओर से मेरा कहने का मतलब है कि कथा और प्रयोग के स्तर पर कोई विविधता नहीं है। न ही हिंदी सिनेमा हमारे समाज का प्रतिनिधित्व करता है। न ही हिंदी सिनेमा भारत के अतीत का और न वर्तमान का प्रतिनिधित्व करता है। न ही हिंदी सिनेमा भारतीय समाज के संघर्ष का प्रतिनिधित्व करता है। 
कभी-कभार कुछ छिट-पुट कुछ घटनाएं हो जाती हैं जो बहुत योजनाबद्ध तरीके से नहीं हो रही है। कभी कोई अनुराग कश्यप कोई ऐसी फिल्म बना लेते हैं, जो प्रासंगिक हो जाती है। कभी कोई प्रकाश झा कोई ऐसी फिल्म बना लेते हैं, जो प्रासंगिक हो जाती है। कभी कोई श्याम बेनेगल ऐसी फिल्म बना लेते हैं,जो प्रासंगिक हो जाती है। परंतु उनके भी प्रयत्न संघर्ष ही हैं। इसलिए मैं इस बात को मानने के लिए तैयार नहीं हूं कि हिंदी सिनेमा एक ऐसे बिंदु पर आ गया है,जहां विषयों की तलाश हो। विविधता के साथ भारतीय पहचान की फिल्‍में नहीं बन रही हैं। हिंदी सिनेमा मूलत: कुछ चेहरों की बदौलत बन रहा है। सफलतम कलाकार,जो स्‍टार हैं, ऐसे निर्देशक जो सफल हैं। उनके साथ में आने से बाजार के निवेशकों में विश्वास उत्पन्न होता है कि उनका संयुक्‍त करिश्मा किसी जादू की तरह दर्शकों को अपनी ओर खींचेगा। इसीलिए उनका लक्ष्‍य और उद्देश्य उस जादू चलने तक ही सीमित रहता है। 
हमारे यहां का निवेशक मान ही नहीं रहा है कि कहानी का अपना कोई जादू होता है। इसीलिए तमाम फिल्में, मैं कह सकता हूं कि 99 प्रतिशत फिल्में किसी एक सेलीब्रेटी पर टिकी या ड्रिवेन हैं। किसी एक नायक या महानायक के दम पर चल रही हैं। यह गलत हो रहा है, मैं ऐसा भी नहीं कहूंगा। निश्चित ही जो निवेशक है,उसे उसकी राशि मिलना चाहिए। उसका निवेश वापस आना चाहिए। अन्‍यथा वह दूसरी फिल्म भी नहीं बना पाएगा। मैं पहले भी कह चूका हूं क्रिएटिव माध्यमों में यह ऑडियो विजुअल सबसे महंगा माध्यम है और सबसे व्यापक माध्यम है। इसमें अभिरुचियां भी बहुत अलग-अलग है। जिस प्रकार का प्रयोग हम पश्चिम के सिनेमा में या ईरान के सिनेमा में या साउथ-ईस्ट के सिनेमा में हम देख लेते हैं उनसे हम कोसों दूर हैं।

Friday, August 12, 2016

फिल्‍म समीक्षा : मोहेंजो दारो



-अजय ब्रह्मात्‍मजंं
अभी हमलोग 2016 ई. में हैं। आशुतोष गोवारीकर अपनी फिल्‍म मोहेंजो दारो के साथ ईसा से 2016 साल पहले की सिंधु घाटी की सभ्‍यता में ले जाते हैं। प्रागैतिहासिक और भग्‍नावशेषों और पुरातात्विक सामग्रियों के आधार पर आशुतोष गावारीकर ने अपनी टीम के साथ रचा है। उनकी यह रचना कल्‍पनातीत है। चूंकि उस काल के पर्याप्‍त साक्ष्‍य नहीं मिलते,इसलिए आशुतोष गोवारीकर को मोहेंजो दारो की दुनिया रचने की छूट मिल गई। इन तथ्‍यों पर बहस करना अधिक महत्‍व नहीं रखता कि कपड़े,पहनावे,भाषा और व्‍यवहार में क्‍या होना या नहीं होना चाहिए था? मोहेंजो दारो में लेखक और निर्देशक सबसे ज्‍यादा कदाचित शब्‍द का इस्‍तेमाल करते हैं। कदाचित का सरल अर्थ शायद और संभवत: है। शायद जोड़ते ही हर बात अनिश्चित हो जाती है। शायद एक साथ हां और ना दोनों है। फिल्‍म के संवादों में हर प्रसंग में कदाचित के प्रयोग से तय है कि फिल्‍म के लेखक और निर्देशक भी अपने विवरण और चित्रण के प्रति अनिश्चित हैं। उनकी अनिश्चितता का असर फिल्‍म के विधि-विधान पर स्‍पष्‍ट है।
4032 साल पहले हड़प्‍पा से भ्रष्‍टाचार की वजह से निकाला गया भ्रष्‍ट और क्रूर प्रशासक मोहेंजो दारो में आता है। वह छल से विराट सभा(पार्लियामेंट) का सदस्‍य बनता है। वह साजिश रचता है। वहां के न्‍यायप्रिय और ईमानदार प्रशासक सुरजन को मरण दंड देता है। उसका भाई दुरजन अपने भतीजे सरमन को लेकर पास के आमरी गांव चला जाता है। सरमन को सपने आते हैं। सपने में वह एकसिंघा देखता है,जो मोहेंजो दारो का प्रतीक है। हिंदी फिल्‍मों के हीरो ऐसे सपनों से प्रेरित होकर प्रयाण करते हैं। अमिताभ बच्‍चन की फिल्‍में याद कर लें। बहरहाल,सरमन भी प्रयाण करता है और मोहेंजो दारो आ जाता है। शहर की बनावट और वस्‍तु से भौंचक्‍के सरमन का चानी से नैन मटक्‍का हो जाता है। मोहेंजो दारो के लोभ-लालच और खोट से घबराया और गांव लौटने के लिए बेताब सरमन रुक जाता है। चानी के प्रेम में गिरफ्तार सरमन निडर और बहादुर युवक के रूप में अन्‍य शहरियों का भी ध्‍यान खींचता है। उधर नए महम के अत्‍याचार बढ़ते जाते हैं। अच्‍छे दिनों के लालच में वह नित नए कर लादता जाता है। सरमन नए कर का भी विरोध करता है। सरमन एक साथ दो मोर्चो पर मुकाबला कर रहा है। वह महम से भिड़ गया है। महम के बेटे मुंजा से भी उसकी ठन गई है,क्‍योंकि मुंजा पुजारी की बेटी चानी को अपनी संगिनी बनाना चाहता है। चानी सरमन से प्रेम करने लगती है। सरमन को मरण दंड की सजा मिलती है। इस दंड से माफी मिलने पर सरमन का मुकाबला बकर और जोकार जैसे खूंखार नरभक्षियों से होता है। हर मुकाबले में दुश्‍मनों को परास्‍त करता हुआ सरमन विजयी होता है। उसे चानी भी मिल जाती है।
आशुतोष गोवारीकर के पास ठोस कहानी नहीं है। फिल्‍म में ढेर सारी घटनाएं और गतिविधियां हैं। कदाचित यह उनका रक्षात्‍मक शिल्‍प है। वे उन घटपाओं और गतिविधियों की विशद कल्‍पना करते हैं। फिल्‍म के क्‍लाइमेक्‍स में वीएफएक्‍स और सीजी प्रभाव से रोमांचक प्रभाव पैदा होता है। सब कुछ विशाल और काल्‍पनिक होने के साथ बड़े पैमाने पर है। इस स्‍केल पर हिंदी में कम फिल्‍में बनती हैं। पिछले साल बाहुबली आई थी। संजय लीला भंसाली की फिल्‍मों में भी ऐसी भव्‍यता रहती है। आशुतोष गोवारीकर की यह खूबी तो है ही कि वे बड़ा सोचते हैं। यहां भी वे बड़ी सोच के साथ मौजूद हैं। कमी है तो कहानी की। अगर वे कहानी के साथ प्रागैतिहासिक काल को जोड़ पाते तो फिल्‍म और रोचक हो जाती। मोहेंजो दारो में सरमन और चानी की प्रेमकहानी से उसकी पृष्‍ठभूमि डिलीट कर दें तो यह साधारण प्रेम कहानी रह जाती है। प्रेम की अभिव्‍यक्ति और अहसास में भी नवीनता नहीं है। वहीं आंखें मिलना,स्‍फुरण होना,चुंबन-आलिंगन,बिछ़ड़ने का डर और एक-दूसरे को पाने की कोशिश... कह सकते हैं कि मोहेंजो दारो के काल से 2016 तक हिंदी फिल्‍मों में प्रेम के उपादान और लक्षण नहीं बदले हैं। यह भी लिखा जा सकता है कि मोहेंजो दारो में आज के तौर-तरीकों को प्रागैतिहासिक काल में जड़ दिया गया है।
रितिक रोशन ने किरदार के अनुसार अभिनय और व्‍यवहार किया है। चूंकि किरदार के चित्रण में नवीनता नहीं है,कदाचित इसी कारण से वे अपनी बेहतर फिल्‍मों की तरह प्रभावशाली नहीं हो पाए हैं। हां,फिल्‍म के एक्‍शन दृश्‍यों में उनकी चपलता देखते ही बनती है। नई अभिनेत्री पूजा हेगड़े को सुंदर दिखना था। मेकअप और कॉस्‍ट्यूम से इसे पूरा किया गया है। वह दृश्‍य के हिंसाब से मुस्‍करा लेती हैं। मनीष चौधरी ने पुजारी के रूप में प्रभावित किया है। वे उसके द्वद्व और प्रायश्‍चय को अच्‍छी तरह अभिव्‍यक्‍त करते हैं। लंबे समय के बाद नितीश भारद्वाज दिखे हैं। कबीर बेदी के पास भारी-भरकम आवाज है,जो उनके किरदार के निर्वाह में मदद करती है। अरूणोदय सिंह निराश करते हैं। छोटी भूमिकाओं में सरमन के साथी,शहर के रखपाल,विराट सभा के सदस्‍य की भूमिकाओं में आए कलाकारों का सहयोग सराहनीय है।
आशुतोष गोवारीकर की मोहेंजो दारो कल्‍नपातीत रोमांचक दृश्‍यात्‍मक अनुभवों के लिए देखी जानी चाहिए। जबरदस्‍त विजुअल्‍स हैं। इस फिल्‍म का आनंद छोटे पर्दे पर नहीं मिल सकता।
भारतीय संस्‍कृमत और इतिहास के जानकार बता सकेगे कि क्‍या सिंधु नदी और घाटी की सभ्‍यता के नष्‍ट होने पर गंगा के किनारे सभ्‍यता बसी थी?  
अवधि- 155 मिनट
स्‍टार- तीन स्‍टार