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Tuesday, January 23, 2018

सिनेमालोक : हिंदी समाज(मिडियम) की जीत



सिनेमालोक
हिंदी समाज(मिडियम) की जीत
-अजय ब्रह्मात्‍मज
पिछले शनिवार को फिल्‍मफेअर पुरस्‍कार समारोह हमेशा की तरह ग्‍लैमर और भव्‍यता से युक्‍त था। स्‍टेज पर मेजबान के रूप में शाह रूख खान मौजूद थे। मजबानी में साथ देने के लिए करण जौहर की जुगलबंदी थी। हर साल की तरह सितारों का हैरतअंगेज,लुभावना और आकर्षक परफारमेंस भी चलता रहा। पूरे माहौल में रंगीनी और मादकता थी। बस,एक ही चीज थोड़ी अलग और चौंकाने वाली रही। पॉपुलर श्रेणी के पुरस्‍कारों की घोषणा होने लगी तो एक-एक आ रहे विजेताओं के नाम हाल में मौजूद दर्शकों को चौंका रहे थे। 2017 की श्रेष्‍ठ फिल्‍म के रूप में ‘हिंदी मिडियम’ की घोषणा ने स्‍पष्‍ट तौर पर जाहिर कर दिया कि इस बार पुरस्‍कारों में वोटरों और निर्णायक मंडल का झुकाव अलग था। उन्‍होंने पहले की तरह चकाचौंध से भरी मेनस्‍ट्रीम फिल्‍मों से अलग जाकर वैसी फिल्‍मों और उनके कलाकारों को प्राथमिकता दी,जिन्‍हें आम तौर पर ‘आउट ऑफ बॉक्‍स’ फिल्‍में कहा जाता है। कुछ सालों पहले तक उन्‍हें अधिक से अधिक ‘क्रिटिक अपार्ड’ कैटेगरी में जगह मिल पाती थी। कहना मुश्किल है कि अगले साल भी यह झुकाव बना रहेगा कि नहीं? फिलहाल इस बात की खुशी है कि अभी तक परिधि पर मौजूद जमात केंद्र में चमक रही है।
‘हिंदी मिडियम’ पिछले साल बनी एक फिल्‍म है। इसके साथ यह एक मानसिकता भी है। इस बार फिल्‍म के साथ ही इस मानसिकता की भी जीत हुई है। लंबे समय के बाद हिंदी फिल्‍मों के पॉपुलर पुरस्‍कार में खांटी हिंदी समाज और हिंदी मानसिकता की फिल्‍मों को पहचान मिली है। उनमें सक्रिय प्रतिभाओं को पुरस्‍कृत किया गया है। यह एक बड़ी उपलब्धि है। साथ ही इस बात की खुशी भी है कि दर्शकों की सराहना की अनदेखी नहीं की गई। ‘हिंदी मिडियम’ के ही नायक इरफान को 2017 के श्रेष्‍ठ अभिनेता के तौर पर स्‍वीकार किया गया है। यह इरफान की व्‍यक्तिगत उपलब्धि भर भी नहीं है। यह उस समाज की सामूहिक आकांक्षा की जीत है जो लंबे समय से सेंट स्‍टेज पर आने को आकुल और व्‍याकुल है। साधारण नैन-नक्‍श का आम भारतीय नायक पुरस्‍कार के योग्‍य समझा गया। गौर करें तो इस फिल्‍म का नायक राज बत्रा चांदनी चौक,दिल्‍ली का एक सामान्‍य नागरिक है। बीवी के दबाव में वह बेटी को इंग्लिश मिडियम में पढ़ाने की विडंबना से गुजर रहा है। वह हिंदी फिल्‍मों की मुख्‍य धारा का नायक नहीं है। इसी कैटेगरी में अक्षय कुमार,शाह रूख खान,रितिक रोशन और वरुण धवन भी थे। कहते हैं अक्षय कुमार और इरफान के बीच बराबर की टक्‍कर थी। पलड़ा इरफान के पक्ष में भारी हुआ। उल्‍लेखनीय है कि तमाम देशी-विदेशी उपलब्धियों के बावजूद अभी तक इरफान इस पुरस्‍कार की पत्रिका के कवर पर कभी नहीं आए। शायद अब उन्‍हें इस योग्‍य समझा जाए।
अन्‍य पुरस्‍कारों में भी मेनस्‍ट्रीम की फिल्‍मों और कलाकारों का दरकिनार किया गया है। श्रेष्‍इ अभिनेत्री विद्या बालन(तुम्‍हारी सुलु) ने मध्‍यवर्गीय परिवार की सुलोचना का किरदार निभाया है। वह परिवार और समाज में खुद के लिए स्‍पेस चाहती है। परिवार के सदस्‍यों के लांछनों और छींटाकशी के बावजूद अपनी जिद से उसे हासिल करती है। उसे अपने पति का सहयोग मिलता है। सुलोचना भी हिंदी फिल्‍मों की चहेती और प्रचलित नायिका नहीं है। इस बार के नायक और नायिका दोनों ही गृहस्‍थ जीवन में प्रवेश कर चुके व्‍यक्ति हैं। वे पिता और मां हैं। हिंदी फिल्‍मों के प्रेमी-प्रेमिका की उम्र पार कर चके हैं। निर्णायक मंडल की सोच-समझ का यह बदलाव स्‍वागत योग्‍य है। सहायक अभिनेता-अभिनेत्री के लिए भी राजकुमार राव(बरेली की बर्फी) और मेहर विज(सीक्रेट सुपरस्‍टार) को चुना गया। इसी प्रकार श्रेष्‍ठ निर्देशन के लिए ‘बरेली की बर्फी’ की निर्देशक अश्विनी अय्यर तिवारी चुनी गईं।
वास्‍तव में पिछले साल हिंदी फिल्‍मों में हिंदी समाज का जोर रहा। लगभग एक दर्जन से अधिक फिल्‍मों में हिंदी समाज की धड़कनें सुनाई पड़ीं। हिंदी समाज हिंदी फिल्‍मों के मनस्‍ट्रीम में आया।

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Wednesday, January 17, 2018

सिनेमालोक : विनीत का लाजवाब गुस्सा



मित्रों,
लोकमत समाचार में मेरा नया कॉलम सिनेमालोक आरंभ हुआ है.आप के प्यार और प्रतिक्रिया का इंतज़ार रहेगा. 

सिनेमालोक
विनीत का लाजवाब गुस्सा
-अजय ब्रह्मात्‍मज
पिछले हफ्ते रिलीज हुई अनुराग कश्‍यप निर्देशित ‘मुक्‍काबाज’ में दर्शकों ने विनीत कुमार सिंह को नोटिस किया। उत्‍तर प्रदेश के बैकड्रॉप बनी इस फिल्‍म में अनुराग कश्‍यप ने स्‍‍थानीय राजनीतिक और सामाजिक विसंगतियों के बीच एक बेरोजगार युवक के बॉक्‍सर बनने की कहानी है। वह तमाम अवरोधों और बाधाओं के बीच जूझता है। अपनी जिद और कुछ शुभचिंतकों के सपोर्ट से बॉक्‍सर बनने का ख्‍वाब पूरा करता है,लेकिन....। इस लेकिन में फिल्‍म का क्‍लाइमेक्‍स है। हम फिल्‍म में मुख्‍य भूमिका अभिनेता विनीत कुमार सिंह ने निभाई है। सभी समीक्षाओं में विनीत कुमार सिंह की अदाकारी की तारीफ हुई है। अगर आप ट्वीटर पर उनका नाम सर्च करें तो तारीफ के अनेक ट्वीट मिल जाएंगे। फिल्‍म देखने के बाद शबाना आजमी ने अनुराग कश्‍यप की आत्‍मविश्‍वास के साथ वापसी का स्‍वागत करते हुए विनीत के लिए कुछ शब्‍द अलग से कहे। उन्‍होंने कहा कि मैंने भारतीय सिनेमा में अमिताभ बच्‍चन के बाद किसी और अभिनेता को इतने सहज और ठोस तरीके सं गुस्‍सा जाहिर करते नहीं देखा। इस लिहाज से विनीत कुमार सिंह नई सदी के एंग्रीयंग मैन हुए। अब यह मुंबई के निर्देशकों पर निर्भर करता है कि वे उन्‍हें आगे कैसी फिल्‍मों और भूमिकाओं में चुनते हैं।
कौन है विनीत कुमार सिंह? विनीत कुमार सिंह 18 साल पहले मुंबई आए। बनारस के शिक्षाप्रेमी परिवार में पले-बढ़े विनी कुमार सिंह को पिता के दबाव में अनिच्‍छा से मेडिकल की पढ़ाई करनी पड़ी। वे एनएसडी जाना चाहते थे(लिकिन पिता की स्‍पष्‍ट ना ने उन्‍हें पिता की मर्जी की पढ़ाई करने के लिए विवश किया। बहुत आसान होता है ऐसे मामलों में पिता को दोषी ठहरा देना। गौर करें तो वे अपने समाज और परिस्थिति के कारण संतानों पर ऐसे फैसले लादते हैं। बहरहाल,विनीत कुमार सिंह ने नागपुर से आयुर्वे में डिग्री और एमडी की पढ़ाई पूरी करने के बाद प्रैक्टिश करने का लाइसेंस भी ले लिया। मन तो उनका मुंबई में अटका हुआ था। वह छोटे भाई-कहनों से अपने सपने शेयर किया करते थे। एक दिन बहन ने ही अखबार में दिखाया कि मुंबई में किसी प्रोडक्‍शन हाउस को नए टैलेंट की जरूरत है। विनीत कुमार सिंह मुंबई आ गए।
रोजाना सैकड़ों युवा प्रतिभाएं आंखों में सपने लिए मुंबई आती हैं। उनमें से ही कुछ शाह रूख खान और मनोज बाजपेयी बनते हैं। संघर्ष तो सभी को करना पड़ता है। खास कर किसी आउटसाइडर के लिए मुंबई की हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री में घुस पाना पुराने जमाने के किसी किले में घुसने से कम नहीं होता। शुरू में विनीत निर्देशकमहेश मांजरेकर के सहयक बन गए। इस तकलीफ को कलाकार ही बता सकता है कि दिल में एक्‍टर बनने के तमन्‍ना लिए शख्‍स को किसी और एक्‍टर के आगे-पीछे घूमना पड़ता है। मन मसोस कर विनीत ने यह सब किया। इस संघर्ष में उन्‍होंने अपने सपनों को कुचलने नहीं दिया। और एक दिन उन्‍होंने तय किया कि अब वे अभिनय करेंगे। आरंभ में छोटी-मोटी भूमिकाएं मिलीं। फिर एक दिन अनुराग कश्‍यप ने उन्‍हें ‘गैंग्‍स ऑफ वासेपुर’ में दानिश खान की भूमिका दी। अनुराग के साथ ही उन्‍होंने ‘बांबे टाकीज’ की ‘मुरब्‍बा’ की। और फिर अनुराग की ही फिल्‍म ‘अग्‍ली’ के नायक बने। इन मौकों के बावजूद विनीत की छटपटाहट कम नहीं हो रही थी। उन्‍होंने तय किया कि अब वे खुद को नायक बना कर अपनी कहानी लिखेंगे। उन्‍होंने क‍हानी लिखी। वही कहानी विकसित और परिवर्द्धित रूप में ‘मुक्‍काबाज’ बनी।
विनीत कुमार सिंह ‘मुकाबाज’ की कहानी लेकर निर्देशकों के पास घूम रहे थे तो सिी ने घास नहीं डाली। उन्‍हें उनमें हीरो मैटेरियल नहीं दिख रहा था। वे उनकी कहानी तो पसंद कर रहे थे,लेकिन किरदार किसी और कलाकार को सौंप देना चाहते थे। विनीत ने साफ मना कर दिया। अनुराग कश्‍यप फिर से उनकी जिंदगी में आए। उन्‍होंने विनीत में विश्‍वास किया और भरोसा दिया कि मैं फिल्‍म बनाऊंगा। एक ही शर्त है कि फिल्‍म के नायक की तरह तुम बॉक्‍सर बन कर आ जाओ। विनीत ने अनुराग कश्‍यप की सलाह गांठ बांध ली। वे बॉक्‍सर की ट्रेनिंग लेने लगे। बॉक्सिंग में दक्ष होने के बाद वे लौटे। उसके बाद की बाकी चीजें अभी ‘मुक्‍काबाज’ के रूप में दिख रही हैं। यह फिल्‍म निर्देशक और अभिनेता के परस्‍पर विश्‍वास और भरोसे से बनी फिल्‍म है।आखिरकार एक प्रतिभा चमकी।

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Saturday, January 13, 2018

अनोखे गीत १ ,ऐ बेबी ऐ जी



अनोखे गीत 

ऐ बेबी
ऐ बेबी ऐ जी ऐ बेबी ऐ जी
इधर आओ आ गया घूम जाओ घूम गया
मान जाओ मान गया कहो क्‍या खाओगे जलेबी
ऐ बेबी ऐ जी ऐ बेबी ऐ जी
इधर आओ आ गया घम जाओ घम गया
मान जाओ मान गया कहो क्‍या खाओगे जलेगी

रुत है रंगीली हवा भी है नशीली आ प्‍यारे
रुत है रंगीली हवा भी है नशीली आ प्‍यारे
मगर भूख मेरी मिटा तो ना सकेंगे नजारे
मगर भूख मेरी मिटा तो ना सकेंगे नजारे
इधर आओ आ गया बैठ जाओ बैठ गया
उठ जाओ उठ गया कहो क्‍या खाओगे कलेजी ऐ बेबी
देखो ते वों पंछी मधुर सी सदा में क्‍या बोले
देखो ते वो पंछी मधुर सी सदा में क्‍या बोले
भूखा है या प्‍यासा तड़प के बेचारा मुंह खोले
भूखा है या प्‍यासा तड़प के बेचारा मुंह खोले
इधर आओ आ गया रुक जाओ रुक गया
झुक जाओ झुक गया अब कहो क्‍या खाओगे जलेबी ऐ बेबी
हम तो तुम्‍हारे जी मेहमान बन के हाय मर गए
हम तो तुम्‍हारे जी मेहमान बन के हाय मर गए
बहुत शुक्रिया जी ये एहसान हम पे जो कर गए
बहुत शुक्रिया जी ये एहसान हम पे जो कर गए
इधर आओ नहीं आऊंगा घूम जाओ नहीं घूमुंगा
मान जाओ नहीं मानूंगा
भूखे ही क्‍या जाओंगे कुछ ले भी ऐ बेबी
ऐसे तो ना रुठो कहो तो पड़ जाऊं मैं पैयां
ऐसे तो ना रुठो कहो तो पड़ जाऊं मैं पैयां
सजा तो हम देंगे इधर जरा लाओ ये बैयां
सजा तो हम देंगे इधर जरा लाओ ये बैयां
इधर आओ आ गई बैठ जाओ बैठ गई
मान जाओ मान गई अब कहो क्‍या खाओगे
जो देगी ऐ बेबी



गायक मोहम्‍मद रफी आशा भोंसले
संगीत इकबाल कुरैशी
गीत राजेन्‍दर कृष्‍ण
फिल्‍म लव इन शिमला 1960

आर के नैय्यर निर्देशित ‘लव इन शिमला’ साधना की पहली फिल्‍म थी। इस फिल्‍म की शूटिंग के दौरान ही साधना और आर के नैय्यर का रोमांस हुआ थ,जो बाद में शादी में फलीभूत हुआ। शुरू में इस फिल्‍म में धर्मेन्‍द्र हीरो की भूमिका निभाना चाहते थे,लेकिन आर के नैय्यर ने जॉय मुखर्जी को प्राथमिकता दी। वैसे भी फिल्‍म के निर्माता शशधर मुखर्जी थी। ‘लव इन शिमला' 1960 की सर्वाधिक हिट फिल्‍म थी। जॉय मुखर्जी और साधना की जोड़ी ने इसके बाद ‘लव इन टोकियो’ फिल्‍म में काम किया। फिल्‍म ने 1 करोड़ 70 लाख की कमाई थी। इस फिल्‍म शोभना समर्थ और दुर्गा खोटे भी खास भूमिकाओं में थीं। 1963 मे सोवियत यूनियन में रिलीज होने पर यह कमाई के मामले में तीसरे नंबर पर रही थी।

https://www.youtube.com/watch?v=ne27V00Jb2Y