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Friday, February 17, 2017

फिल्‍म समीक्षा : रनिंग शादी



फिल्‍म रिव्‍यू
मूक और चूक से औसत मनोरंजन
रनिंग शादी
-अजय ब्रह्मात्‍मज
 अमित राय की फिल्‍म रनिंग शादी की कहानी का आधा हिस्‍सा बिहार में है। पटना जंक्‍शन और गांधी मैदान-मौर्या होटल के गोलंबर के एरियल शॉट के अलावा पटना किसी और शहर या सेट पर है। अमित राय और उनकी टीम पटना(बिहार) को फिल्‍म में रचने में चूक गई है। संवादों में भाषा और लहजे की भिन्‍नता है। ब्रजेन्‍द्र काला की मेहनत और पंकज झा की स्‍वाभाविकता से उनके किरदारों में बिहारपन दिखता है। अन्‍य किरदार लुक व्‍यवहार में बिहारी हैं,लेकिन उनके संवादों में भयंकर भिन्‍नता है। शूजित सरकार की कोचिंग में बन रही फिल्‍मों में ऐसी चूक नहीं होती। उनकी फिल्‍मों में लोकल फ्लेवर उभर कर आता है। इसी फिल्‍म में पंजाब का फ्लेवर झलकता है,लेकिन बिहार की खुश्‍बू गायब है। टायटल से डॉट कॉम मूक करने से बड़ा फर्क पड़ा है। फिल्‍म का प्रवाह टूटता है। इस मूक-चूक और लापरवाही से फिल्‍म अपनी संभावनाओं को ही मार डालती है और एक औसत फिल्‍म रह जाती है।
भरोसे बिहारी है। वह पंजाब में निम्‍मी के पिता के यहां नौकरी करता है। उसकी कुछ ख्‍वाहिशें हैं,जिनकी वजह से वह बिहार से पंजाब गया है। सामान्‍य मध्‍यवर्गीय बिहारी परिवार का भरोसे कुछ करना चाहता है। चुपके से उसकी ख्‍वाहिशों में निम्‍मी भी शामिल हो जाती है। निम्‍मी से दिल टूटने और नौकरी छूटने पर वह अपने दोस्‍त सायबर के साथ मिल कर एक वेबसाइट आरंभ करता है। उसके । जरिए वह प्रेमीयुगलों की शादी भगा कर करवाता है। उसका वेंचर चल निकला है,लेकिन 50वीं कोशिश में वह स्‍वयं फंस जाता है। फिल्‍म भी यहीं आकर फंस जाती है। एक नया विचार कल्‍पना और जानकारी के अभाव में दम तोड़ देता है।
कलाकारों में तापसी पन्‍नू निम्‍मी के किरदार में उपयुक्‍त लगती हैं। आरंभिक दृश्‍यों में उनके लुक पर मेहनत की गई है। बाद में व‍ि हिंदी फिल्‍मों की हीरोइन हो जाती है। यह फिल्‍म देखते हुए दर्शकों को याद रहना वाहिए कि रनिंग शादी उनकी पिंक के पहले की फिल्‍म है। इससे उनकी निराशा कम होगी। किरदारों को गढ़ने में टीम का ढीलापन भरोसे और अन्‍य किरदारों में भी दिखता है। भरोसे के लहजे में बिहारी टच नहीं है। अमित साध ने संवाद और भाषा का अभ्‍यास नहीं किया है। हो सकता है उन्‍हें बताया या गाइड ही नहीं किया गया हो। सायबर के किरदार में हर्ष बाजवा सही लगते हैं। उन्‍होंने नायक का साथ निभाया है। पटना प्रसंग में पंकज झा और ब्रजेन्‍द्र काला पहचान में आते हैं। वहां के चरित्रों के लिए कलाकारों का चयन बेहतर है। उनकी भाव-भंगिमाओं में अनोखापन है। नेहा,नेहा का प्रेमी,मामी आदि चरित्र सुंदर बन पड़ हैं।
अमित राय निर्देशन की पहली कोशिश में फिसल गए हैं। उन्‍हें सही कोचिंग नहीं मिली है या कोच का ध्‍यान अपनी टीम के अन्‍य खिलाडि़यों(निर्देशकों व फिल्‍मों) में लगा रहा। पिंक की खूबसूरती और कामयाबी का श्रेय शूजित सरकार को नलता है। रनिंग शादी की फिसलन और कमी के लिए उन्‍हें ही दोषी माना जाएगा।
अवधि-115 मिनट
** दो स्‍टार  

दरअसल... पर्दे से गायब आज के प्रेमी युगल



दरअसल...
पर्दे से गायब आज के प्रेमीयुगल
-अजय ब्रह्मात्‍मज
आसपास में नजर दौड़ाएं। कई प्रेमीयुगल मिल जाएंगे। शहर की आपाधापी में नियमित जिंदगी जी रहे ये प्रेमी युगल आकर्षित करते हैं। उनके बीच कुछ ऐसा रहता है कि दूसरे प्रभावित और प्रेरित होते हैं। दकियानूसी और रूढि़वादी प्रौढ़ों और बुजुर्गो को उनसे चिढ़ हो सकती है। उनकी खुली सोच और एक-दूसरे को दी गई आजादी उन्‍हें खल सकती है,लेकिन कभी उनसे बात कर देखें तो वे दिल में दबे प्रेम का किस्‍सा बयान करने से नहीं चूकेंगे। साथ में यह भी जोड़ देंगे कि हमारी कुछ मजबूरियां थीं,कुछ जिम्‍मेदारियां थीं... नहीं तो आज हम भी अपनी या अपने उनके साथ रह रहे होते। प्रेम और साहचर्य ऐसी मजबूरियों और जिम्‍मेदारियों के बीच ही होता है। सबसे पहले जरूरी होता है कि हम समाज के रूढि़गत ढांचे से निकलें। जाति,धर्म और लिंग की पारंपरिक धारणाओं से निकलें। कई बार यह परवरिश से होता है,लेकिन ज्‍यादातर सोहबत व संगत से होता है।
वैलेंटाइन डे तीन दिन पहले ही बीता है। इस मौके पर सोशल मीडिया आबाद रहा। खास कर युवाओं के बीच बहुत उम्‍दा उत्‍साह रहा। अच्‍छी बात है कि कट्टरपंथियों ने किसी प्रकार का उत्‍पात नहीं किया। हालांकि कुछ पोंगा पंडित इस अवसर पर भी कुछ और याद दिलाने की कोशिश करते रहे। प्रेम मनुष्‍य को स्‍वच्‍छंद करता है। असल प्रेमी न तो बंधन स्‍वीकार करता है और न किसी पर बंधन थोपता है। गौर करें तो प्रेम में दोनों मुक्‍त होते हैं। यह कथित आध्‍यात्मिक मोक्ष के पहले का चरण है। प्रेमहीन या प्रेमबाधित मनुष्‍य को इसका एहसास नहीं हो सकता। हिंदी फिल्‍मों में प्रेम के विभिन्‍न रूपों को फिल्‍मकार दिखाते रहे हैं। लंबे समय तक हिंदी फिल्‍मों में प्रेम एक विद्रोही विचार रहा है। आजादी के बाद के सालों के समाज और फिल्‍मों में प्रेम हासिल कर लेना आसान नहीं था। नायक-नायिका का पूरा संघर्ष इसी प्रेम के लिए रहता था। समय और परिस्थिति के हिसाब से प्रेम के दुश्‍मन बदलते रहे। प्रेम का स्‍वरूप भी बदला,लेकिन आज भी प्रेम हिंदी फिल्‍मों का स्‍थायी भाव है। वह झांक ही जाता है। पिछले कुछ समय से देखा जा रहा है कि हिंदी में शुद्ध प्रेम कहानियां नहीं बन रही हैं। नायिक-नायिका का मुख्‍य कार्य व्‍यापार प्रेम नहीं रह गया है। अच्‍छी रोमांटिक फिल्‍में नहीं आ रही हैं।
इन दिनों इम्तियाज अली के अलावा और कोई ऐसा फिल्‍मकार नहीं दिखता,जो प्रेम को एक्‍सप्‍लोर कर रहा हो। इस साल उनकी रहनुमा आएगी। यह थोड़ी मैच्‍योर लव स्‍टोरी है। तमाशा के बाद वे फिर से विदेश की धरती पर अंकुरित होते प्रेम को दिखाएंगे। यही शिकायत है। हमें ऐसी प्रेम कहानियां नहीं मिल रही हैं,जिनमें आज के महानगर हों। देश के कस्‍बे और छोटे शहर हों। छोटे शहरों से बड़े शहरों में आए युवक-युवतियों के सपनों और आकांक्षाओं के बीच पनपती प्रेम कहानियां हों। प्रेम हो,लिव इन रिलेशन हो और विवाह हो। हम आसपास के प्रेमी युगलों पर ही फिल्‍में बनाएं तो कई सकारात्‍मक और उम्‍मीदों से भरी कहानियां आ जाएंगी। न जाने क्‍यों फिल्‍मों के मुख्‍य विषय के लिए प्रेम अवांछित हो रहा है। प्रेम कहानियां शुरू भी होती हैं तो वे भटक जाती हैं। शहर छूट जाता है। गलियां नहीं दिखती। प्रेमी युगलों के ठिए नजर नहीं आते। हर नुक्‍कड़ पर बने कैफे नहीं दिखते। फिल्‍मों में कैफे में विचरते युवा कॉफी की खुश्‍बू के साथ नहीं आ पाते। प्रेम कहानियां भी भावनाओं और उलझनों की कंदराओं में घुस जाती है। दो किरदार...नायक और नायिका रह जाते हैं। समय और समाज गायब हो जाता है।
सचमुच समकालीन यानी आज की प्रेम कहानियों की जरूरत है। हमारे आसपास के प्रेमी युगल जिंदा चरित्र हैं। उन्‍हें कहानियां में लाने की जरूरत है।
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मुझ में है साहस - कंगना रनोट




-अजय ब्रह्मात्‍मज

दस साल तो हो ही गए। 2006 में अनुराग बसु की गैंगस्‍टर आई थी। गैंगस्‍टर में कंगना रनोट पहली बार दिखी थीं। सभी ने नोटिस किया और उम्‍मीद जतायी कि इस अभिनेत्री में कुछ है। अगर सही मौके मिले तो यह कुछ कर दिखाएगी। कंगना को मोके मिले। उतार-चढ़ाव के साथ कंगना ने दस सालों का लंबा सफर तय कर लिया। कुछ यादगार फिल्‍में दीं। कुछ पुरस्‍कार जीते। अपनी खास जगह बनाई। आज कंगना हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री की अगली पंक्ति की हीरोइन हैं। और यह सब उन्‍होंने बगैर किसी खान के साथ काम किए हासिल किया है। गौर करें तो किसी लोकप्रिय निर्देशक ने उनके साथ फिल्‍म नहीं की है। वह प्रयोग भी कर रही हैं। अपेक्षाकृत नए निर्देशकों के साथ काम कर रही हैं। अपने रुख और साफगोई से वह चर्चा में बनी रहती हैं। याद करें तो पहली फिल्‍म गैंगस्‍टर में उनका नाम सिमरन था और उनकी आगामी फिल्‍म सिमरन है,जिसके निर्देशक हंसल मेहता हैं।
विशाल भारद्ाज की फिल्‍म रंगून निर्माण के स्‍तर पर कंगना रनोट की सबसे मंहगी और बड़ी फिल्‍म है। हालांकि विशाल भारद्वाज का बाक्‍स आफिस रिकार्ड अच्‍छा नहीं रहा है,फिर भी उन्‍होंने दर्शकों और इंडस्‍ट्री के बीच नाम हासिल किया है। उनकी शैली अलग है। कंगना कहती हैं,अभी तक मैंने ज्‍यादातर सीमित बजट की ही फिल्‍में की हैं। पहली बार बड़े स्‍केल की फिल्‍म कर रही हूं। ऐसी फिल्‍मों में दर्शकों के मनोरंजन के लिए भरपूर मसाले होते हैं। दूसरे विश्‍व युद्ध की पृष्‍ठभूमि में बनी यह अभिनेत्री जूलिया की कहानी है। वह रूसी बिलमोरिया की मिस्‍ट्रेस है। दोनों के रिश्‍ते में लस्‍ट है। मलिक नवाब से जूलिया को प्‍यार हो जाता है। इस प्रेमत्रिकोण पर ही पूरी फिल्‍म है। चूंकि विशाल भारद्वाज फिल्‍म के निर्देशक हैं,इसलिए किरदारों के साथ ही तब के हालात पर भी जोर है। मुझे यकीन है कि दर्शकों को मनोरंजन के साथ जानकारी भी मिलेगी। वे उस समय की दुनिया और भारत से परिचित होंगे।
अपनी फिल्‍म के किरदार पर बात करते-करते कंगना रनोट समाज की भी बातें करने लगती हैं। वह मानती हैं कि हमेश सोसायटी में दो तरह के लोग होते हैं। एक जिनका राज होता है,जो समाज का ऊपरी तबका होता है। दूसरे वे लोग होते हैं,जो उनकी तरह होने की कोशिश करते हैं। उनकी जमात में शामिल होना चाहते हैं। उसके लिए वे कुछ भी कर सकते हैं। हीनभावना की वजह से वे ज्‍यादा आक्रामक हो जाते हैं। जूलिया कुछ ऐसे ही मिजाज की लड़की है। वह ज्‍वाला देवी से जूलिया बन जाती है। दर्शकों को जूलिया और कंगना में कई समानताएं दिख सकती हैं।
इस फिल्‍म में साथ काम करने के अनुभव से कंगना मानती हैं, सैफ अली खान बेहद चार्मिंग इंसान हैं। वे पांच मिनट में किसी को भी आकर्षित कर सकते हैं। किसी भी एज ग्रप और इंटरेस्‍अ के व्‍यक्ति को वे पसंद आ जाएंगे। यह उनकी खूबी है। मुझे तो बहुत अच्‍छा लगा। शाहिद भी अच्‍छे हैं। मुझे उनके साथ इंटरैक्‍ट करने का ज्‍यादा मौका नहीं मिला। जितना समझ पाई,उस हिसाब से वे दिल के अच्‍छे व्‍यक्ति लगे।
कंगना रनोट आज डिमांड में हैं और वह डिमांड भी करने लगी हैं। उनके बारे हर महीने कोई खबर आ जाती है। उनके नखरों और मांग की बातें की जाती हैं। कहा जाता है कि वह निर्देशक को बहुत परेशान करती हैं। कंगना इन सवालों का जवाब देना फिजूल मानती है। वह अपने बारे में कहती हैं, अभी मुझे अलग-अलग स्क्रिप्‍ट मिल रही हैं। मैं चुन सकने की स्थिति में हूं। हालांकि कंफ्यूजन भी है। मैं अपने हिसाब से रास्‍ता बुन रही हूं। छोटी-मोटी बातें तो चलती ही रहती हैं। हर व्‍यक्ति के काम करने की जगह पर खटपट चलती रहती है। बिल्‍कुल शांति का माहौल कैसे रह सकता है। ऐसी शांति तो मरने के बाद ही होती है। मैं कभी पीठ नहीं दिखाती। पीठ दिखाने की कोई वजह भी नहीं है। अगर कोई मुझे चिढ़ा या सता रहा है तो मैं पलट कर जवाब देती हूं। समय ने मुझे सब कुछ सीखा दिया है। मेरे अंदर साहस है। खराब वक्‍त से मैं निकल आई हूं। मैं किसी को भी टपकी मार कर जाने की अनुमति नहीं दूंगी।
कंगना रनोट अपने लेखन में लगी हैं। वह डायरेक्‍शन के साथ फिल्‍म निर्माण के अन्‍य क्षेत्रों से भी जुड़ना चाहती हैं।वह जोर देकर कहती हैं, आने वाली फिल्‍मों में मेरी हिस्‍सेदारी और भी डिपार्टमेंट में रहेगी।

Thursday, February 16, 2017

फिल्‍म समीक्षा : द गाजी अटैक



फिल्‍म रिव्‍यू
युद्ध की अलिखित घटना
द गाजी अटैक
-अजय ब्रह्मात्‍मज
हाल ही में दिवंगत हुए ओम पुरी की मृत्‍यु के बाद रिलीज हुई यह पहली फिल्‍म है। सबसे पहले उन्‍हें श्रद्धांजलि और उनकी याद। वे असमय ही चले गए।
द गाजी अटैक 1971 में हुए भारत-पाकिस्‍तान युद्ध और बांग्‍लादेश की मुक्ति के ठीक पहलं की अलिखित घटना है। इस घ्‍सटना में पाकिस्‍तानी पनडुब्‍बी गाजी को भारतीय जांबाज नौसैनिकों ने बहदुरी और युक्ति से नष्‍ट कर दिया था। फिल्‍म के मुताबिक पाकिस्‍तान के नापाक इरादों को कुचलने के साथ ही भारतीय युद्धपोत आईएनएस विक्रांत की रक्षा की थी और भारत के पूर्वी बंदरगाहों पर नुकसान नहीं होने दिया था। फिल्‍म के आरंभी में एक लंबे डिस्‍क्‍लेमर में बताया गया है कि यह सच्‍ची घटनाओं की काल्‍पनिक कथा है। कहते हैं क्‍लासीफायड मिशन होने के कारण इस अभियान का कहीं रिकार्ड या उल्‍लेख नहीं मिलता। इस अभियान में शहीद हुए जवनों को कोई पुरस्‍कार या सम्‍मन नहीं मिल सका। देश के इतिहास में ऐसी अनेक अलिखित और क्‍लासीफायड घटनाएं होती हैं,जो देश की सुरक्षा के लिए गुप्‍त रखी जाती हैं।
द गाजी अटैक ऐसी ही एक घटला का काल्‍पलिक चित्रण है। निर्देशक संकल्‍प ने कलाकारों और तकनीशियनों की मदद से इसे गढ़ा है। मूल रूप से तेलुगू में सोची गई द गाजी अटैक भारतीय सिनेमा में विषय और कथ्‍य के स्‍तर पर कुछ जोड़ती है। निर्माता और निर्देशक के साथ इस फिल्‍म को संभव करने में सहयोगी सभी व्‍यक्तियों को धन्‍यवाद कि उन्‍होंने भारतीय दर्शकों को एक रोचक युद्ध फिल्‍म दी। हिंदी में युद्ध फिल्‍में नहीं की संख्‍या में हैं। कुछ बनी भी तो उनमें अंधराष्‍ट्रवाद के नारे मिले। दरअसल,ऐसी फिल्‍मों में संतुलन बनाए रखना मुश्किल होता है। राष्‍ट्रीय चेतना की उग्रता अंधराष्‍ट्रवाद की ओर धकेल देती है। द गाजी अटैक में लेखक-निर्देशक ने सराहनीय सावधानी बरती है। हालांकि इस फिल्‍म में जन गण मन और सारे जहां से अच्‍छा एक से अधिक बार सुनाई देता है,लेकिन वह फिल्‍म के कथ्‍य के लिए उपयुक्‍त है। युद्ध के दौरान जवानों का मनोबल ऊंचा रखने के लिए यह आवश्‍यक है।
द गाजी अटैक सीमित संसाधनों में बनी उल्‍लेखनीय युद्ध फिल्‍म है। यह मुख्‍य रूप से किरदारों के मनोभावों पर केंद्रित रहती है। संवाद में पनडुब्‍बी संचालन के तकनीकी शब्‍द अबूझ रहते हैं। निर्देशक उन्‍हें दृश्‍यों में नहीं दिखाते। हमें कुछ बटन,स्‍वीच,पाइप और यंत्र दिखते हैं। पनडुब्‍बी का विस्‍तृत चित्रण नहीं है। किरदारों के कार्य व्‍यापार भी चंद केबिनों और कमरों तक सीमित रहते हैं। पनडुब्‍बी के समुद्र में गहरे उतरने के बाद निर्देशक किरदारों के संबंधियों तक वापस नहीं आते। नौसेना कार्यालय और उनके कुछ अधिकारियां तक घूम कर कैमरा भारतीय पनडुब्‍बी एस-21(आईएनएस राजपूत) और पाकिस्‍तानी पनडुब्‍बी पीएनएस गाजी के अंदर आ जाता है।
पाकिस्‍तानी पनडुब्‍बी के कैप्‍टर रजाक हैं,जिनके कुशल और आक्रामक नेतृत्‍व के बारे में भारतीय नौसैनिक अधिकारी जानते हैं। भारतीय पनडुब्‍बी की कमान रणविजय सिहं को सौंपी गई है। रणविजय की छोटी सी पूर्वकथा है। उनका बेटा 1965 में ऐसे ही एक क्‍लासीफायड अभियान में सरकारी आदेश के इंतजार में शहीद हो चुका है। रणविजय पर अंकुश रखने के लिए अर्जुन को संयुक्‍त कमान दी गई है। उनके साथ पनडुब्‍बी के चालक देवराज हैं। तीनों अपनी युक्ति से गाजी के मंसूबे को नाकाम करने के साथ उसे नष्‍ट भी करते हैं। रणविजय और अर्जुन के सोच की भिन्‍नता से ड्रामा पैदा होता है। दोनों देशहित में सोचते हैं,लेकिन उनकी स्‍ट्रेटजी अलग है। लेखक दोनों के बीच चल रहे माइंड गेम को अच्‍छी तरह उकेरा है। उनके बीच फंसे देवराज समय पर सही सुझाव देते हैं। युद्ध सिर्फ संसाधनों से नहीं जीते जाते। उसके लिए दृढ़ इच्‍छाशक्ति  और राष्‍ट्रीय भावना भी होनी चाहिए। यह फिल्‍म पनडुब्‍बी के नौसेना जवानों के समुद्री जीवन और जोश का परिचय देती है।
मुख्‍य कलाकारों केके मेनन,अतुल कुलकर्णी,राहुल सिंह और राणा डग्‍गुबाती ने उम्‍दा अभिनय किया है। सहयोगी कलाकारों के लिए अधिक गुजाइश नहीं थी। फिल्‍म में महिला किरदार के रूप में दिखी तापसी पन्‍नू का तुक नहीं दिखता।
अवधि- 125 मिनट
स्‍टार तीन स्‍टार

फिल्‍म समीक्षा - इरादा



फिल्‍म रिव्‍यू
उम्‍दा अभिनय,जरूरी कथ्‍य
इरादा
-अजय ब्रह्मात्‍मज

फिल्‍म के कलाकारों में नसीरूद्दीन शाह,अरशद वारसी और दिव्‍या दत्‍त हों तो फिल्‍म देखने की सहज इच्‍छा होगी। साथ ही यह उम्‍मीद भी बनेगी कि कुछ ढंग का और बेहतरीन देखने को मिलेगा। इरादा  कथ्‍य और मुद्दे के हिसाब से बेहतरीन और उल्‍लेखनीय फिल्‍म है। इधर हिंदी फिल्‍मों के कथ्‍य और कथाभूमि में विस्‍तार की वजह से विविधता आ रही है। केमिकल की रिवर्स बोरिंग के कारण पंजाब की जमीन जहरीली हो गई है। पानी संक्रमित हो चुका है। उसकी वजह से खास इलाके में कैंसर तेजी से फैला है। इंडस्ट्रियल माफिया और राजनीतिक दल की मिलीभगत से चल रहे षडयंत्र के शिकार आम नागरिक विवश और लाचार हैं।
कहानी पंजाब के एक इलाके की है। रिया(रुमाना मोल्‍ला) अपने पिता परमजीत वालिया(नसीरूद्दीन शाह) के साथ रहती है। आर्मी से रिटायर परमजीत अपनी बेटी का दम-खम बढ़ाने के लिए जी-तोड़ अथ्‍यास करवाते हैं। वह सीडीएस परीक्षाओं की तैयारी कर रही है। पिता और बेटी के रिश्‍ते को निर्देशक ने बहुत खूबसूरती से चित्रित और स्‍थापित किया है। उनका रिश्‍ता ही फिल्‍म का आधार है। परमजीत एक मिशन पर निकलते और आखिरकार कामयाब होते हैं। हालांकि कहानी बाद में बड़े फलक पर आकर फैल जाती है और उसमें कई किरदार सक्रिय हो उठते हैं।
हमें प्रदेश की भ्रष्‍ट,वाचाल और बदतमीज मुख्‍यमंत्री रमनदीप(दिव्‍या दत्‍ता) मिलती है। प्रदेश के इंडस्ट्रियलिस्‍ट पैडी(शरद केलकर) से उसका खास संबंध है। पैडी के कुकर्मो में शामिल उसके गुर्गे हैं। पैडी की फैक्‍ट्री में हुए ब्‍लास्‍ट की तहकीकात करने एनआईए अधिकारी अर्जुन(अरशद वारसी) आते हैं तो कहानी अलग धरातल पर पहुंचती है। पत्रकार सिमी(सागरिका घटगे) की विशेष भूमिका है। वह इस षडयंत्र को उजागर करने में लगी है। सभी किरदार अपने दांव खेल रहे हैं। नागरिकों के जीवन और स्‍वास्‍थ्‍य जुड़ा एक बड़ा मुद्दा धीरे-धीरे उद्घाटित होता है। उसकी भयावहता डराती है। वही भयावहता अर्जुन को सच जानने के लिए प्रेरित करती है। ढुलमुल और लापरवाह अर्जुन की संजीदगी जाहिर होती है। वह बेखौफ होकर षढयंत्र का पर्दाफाश करता है।
लेखक-निर्देशक जनहित के एक बड़े मुद्दे पर फिल्‍म बनाने की कोशिश की है। अपने इरादे में वे ईमानदार है। फिल्‍मी रूपातंरण में वे तथ्‍यों को रोचक तरीके से नहीं रख पाए हैं। ऐसी घटनाओं पर बनी फिल्‍मों में किरदार कथ्‍य के संवाहक बनते हैं तो फिल्‍म बांधती है। इरादा में तारतम्‍यता की कमी है। ऐसा लगता है कि किरदार आपस में जुड़ नहीं पा रहे हैं। कुछ अवांतर प्रसंग भी आ गए हैं। इरादा में मुख्‍य किरदारों की पर्सनल स्‍टोरी के झलक भर है। लेखक उनके विस्‍तार में नहीं जा सके हैं। अर्जुन और उसके बेटे की फोन पर चलने वाली बातचीत और कैंसर पीडि़ता की सलाह पर अर्जुन का रेल का सफर,मुख्‍यमंत्री रमनदीप का परिवार,सिमी और उसके दोस्‍त का साथ,परमजीत और बेटी का रिश्‍ता... निर्देशक संक्षेप में ही उनके बारे में बता पाती है।
नसीरूद्दीन शाह और अरशद वारसी पर्दे पर साथ होते हैं तो उनकी अदा और मुद्राएं स्क्रिप्‍ट में लिखी पंक्तियों के भाव भी दर्शाती हैं। दोनों ने बेहतरीन अभिनय किया है। दिव्‍या दत्‍ता अपने किरदार को नाटकीय बनाने में ओवर द टॉप चली गई हैं। शरद केलकर संयमित और किरदार के करीब हैं। बेअी रिया की भूमिका में रुमाना मोल्‍ला आकर्षित करने के साथ याद रहती है। पिता के सामने उसकी चीख बीइंग गुड इज ए बिग स्‍कैम बहुत कुछ कह जाती है।
अवधि- 110 मिनट
स्‍टार तीन स्‍टार   

Monday, February 13, 2017

दरअसल : डराती है हकीकत



दरअसल...
डराती है हकीकत
-अजय ब्रह्मात्‍मज

आज देश के कुछ सिनेमाघरों में जॉली एलएलबी2 रिलीज होगी। रिलीज के हफ्ते में यह चर्चा में रही। सभी जानते हैं कि इस फिल्‍म में जज और देश की न्‍याय प्रणाली के चित्रण पर एक वकील ने आपत्ति की। कोर्ट ने उसका संज्ञान लिया और फसला फिल्‍म के खिलाफ गया। फिल्‍म से चार दृश्‍य निकाल दिए गए। उन दृश्‍यों की इतनी चर्चा हो चुकी है कि दर्शक समझ जाएंगे कि वे कौन से सीन या संवाद रहे होंगे। कुछ सालों के बाद इस फिल्‍म को देख रहे दर्शकों को पता भी नहीं चलेगा कि इस फिल्‍म के साथ ऐसा कुछ हुआ था। हां,फिल्‍म अध्‍येता देश में चल रहे सेंसर और अतिरिक्‍त सेंसर के पर्चों में इसका उल्‍लेख करेंगे। निर्माता ने पहले सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी,लेकिन उन्‍होंने उसे वापिस ले लिया। उन्‍होंने लेखक-निर्देशक को सीन-संवाद काटने के लिए राजी कर लिया। लेखक-निर्देशक की कचोट को हम समझ सकते हैं। उनका अभी कुछ भी बोलना उचित नहीं होगा। उससे कोट्र की अवमानना हो सकती है। सवाल है कि क्‍या कोर्अ-कचहरी की कार्य प्रणाली पर सवाल नहीं उठाए जा सकते? क्‍या उनका मखौल नहीं उड़ाया जा सकता या कोई प्रहसन नहीं तैयार किया जा सकता? अभी जो लोग खामोश है,वे याद रखें कि ऐसा ही चलता रहा तो अतिरिक्‍त सेंसर की तलवार अभिव्‍यक्ति के सभी माध्‍यमों को क्षत-विक्षत करेगी। यह खतरनाक संकेत है।
कुछ दिनों पहले संजय लीला भंसाली के सेट पर पहुंच कर एक सेना विशेष ने हड़कंप मचाया। पुलिस और प्रशासन की निष्क्रियता या उासी ही कहें कि संजय लीला भंसाली ने शूटिंग रोक दी। उन्‍होंने उक्‍त सेना के प्रतिनिधियों से बातचीत की और आश्‍वस्‍त किया कि फिल्‍म में ऐसा कुछ नहीं है। अजीब सी प्रतिक्रियाएं आईं। जिस दुर्घटना के वीडियो वायरल हुए। उसके संदर्भ में हड़कंप के हिमायती तर्क दे रहे हैं कि संजय लीला भंसाली ने ही एफआईआर नहीं किया तो पुलिस और प्रशासन क्‍या करे? तो क्‍या जरूरी है कि अनाचार और अत्‍याचार के खिलाफ भुक्‍तभोगी शिकायत करे तभी कोई कार्रवाई होगी? और फिर ये कौन लोग हैं,जो संस्‍कृति और इतिहास के संरक्षक के तौर पर उग आए हैं। समाज और राजनीति में अनुदारता और असहिष्‍णुता बढ़ रही है। भारतीय समाज में यह कोई नई दुर्घटना नहीं है,लेकिन पहले उसे ऐसा समर्थन नहीं मिलता था।
ऐसी दुर्घटनाओं और उनके परिणाम से स्‍पष्‍ट है कि लेखक,निर्देशक और निर्माता इस प्रकार के विषयों पर फिल्‍में बनाने से हिचकेंगे। फिल्‍म की रिलीज के समय निर्माता किसी प्रकार के विवाद में नहीं पड़ना चाहता। सभी निर्माता प्रकाश झा और अनुराग कश्‍यप के तरह अपने सृजन के साथ खड़े होने और सिस्‍टम से टकराने का साहस नहीं कर पाते। दबाव और मजबूरी में ज्‍यादातर फिल्‍मकार घुटने टेक देते हैं। गौर करें तो पिछले कुछ सालों में फिल्‍मकारों ने अपनी कहानियों में स्‍थान,किरदार और उनके चित्रण में वास्‍तविकता पर जोर दिया है। कुछ दशक पहले तक हिंदी फिल्‍मों के किरदारों का कोई शहर ही नहीं होता था। स्‍थान और काल से भी कहानी का संबंध नहीं होता था। नायक-नायिका प्रेम या बदला लेने के अलावा कुछ नहीं करते थे। उनका कोई पेशा नहीं होता था। वे काम नहीं करते थे। इधर लेखकों और निर्देशकों ने स्‍थान,काल और किरदारों की वास्‍तविकता पर जोर देना शुरू किया तो कुछ समूहों और व्‍यक्तियें को आपत्ति होने लगी। उन्‍हें डर लगने लगा है। चित्रण वास्‍तविक होगा तो वह असंतुष्‍टों को खटकेगा। उन्‍हें लगेगा कि यह अनुचित है। वे आपत्ति करेंगे और फिर सीन व संवाद कटते रहेंगे। फिल्‍में फंसती रहेंगी।
ऐसी रोक-टोक,पाबंदी और पवित्रता हमें जड़ता की ओर ही ले जाती है। कला और अभिव्‍यक्ति के क्षेत्र में कल्‍पना और प्रयोग से ही कथ्‍य का विस्‍तार होता है। हमें इस दिशा में उदारता और सहिष्‍णुता बरतनी होगी।
बााक्‍स आफिस
पिछलें हफ्ते की फिल्‍मों में सीमित रिलीज की फिल्‍म  जैागम इमाम की अलिफ का कलेक्‍शन उल्‍लेखनीय नहीं है। दूसरी फिल्‍म जैकी चान की कुंगफु योगा है। इस फिल्‍म ने चीन में पहले हफ्ते में 943 करोड़ का कलेक्‍शन किया है। भारत में अधिकतम कलेक्‍शन की हिंदी फिल्‍म दंगल है,जिसने 385 करोंड़ का कलेक्‍शन किया है। इसकी वजह यह है कि चीन और भारत में सिनेमाघरों की संख्‍या में पांच गुने का भारी अंतर है। कुंगफू योगा को भारत के दर्शकों ने स्‍वीकार नहीं किया। फिल्‍म का कलेक्‍शन सामान्‍य से भी कम रहा।

Saturday, February 11, 2017

फिल्‍म समीक्षा : जॉली एलएलबी 2



फिल्‍म रिव्‍यू
सहज और प्रभावपूर्ण
जॉली एलएलबी 2
-अजय ब्रह्मात्‍मज

सुभाष कपूर लौटे हैं। इस बार वे फिर से जॉली के साथ आए हैं। यहां जगदीश त्‍यागी नहीं,जगदीश्‍वर मिश्रा हैं। व्‍यक्ति बदलने से जॉली के मिजाज और व्‍यवहार में अधिक फर्क नहीं आया है। लखनऊ में वकालत कर रहे जगदीश्‍वर मिश्रा उर्फ जॉली असफल वकील हैं। मुंशी के बेटे जगदीश्‍वर मिश्रा शहर के नामी वकील रिजवी के पंद्रहवें सहायक हैं। हां,उनके इरादों में कमी नहीं है। वे जल्‍दी से जल्‍दी अपना एक चैंबर चाहते हैं। और चाहते हैं कि उन्‍हें भी कोई केस मिले। अपनी तरकीबों में विफल हो रहे जगदीश्‍वर मिश्रा की जिंदगी में आखिर एक मौका आता है। पिछली फिल्‍म की तरह ही उसी एक मौके से जॉली के करिअर में परिवर्तन आता है। अपनी सादगी,ईमानदारी और जिद के साथ देश और समाज के हित वह मुकदमा जीतने के साथ एक मिसाल पेश करते हैं। जॉली एक तरह से देश का वह आम नागरिक है,जो वक्‍त पड़ने पर असाधारण क्षमताओं का परिचय देकर उदाहरण बनता है। हमारा नायक बन जाता है।
सुभाष कपूर की संरचना सरल और सहज है। उन्‍होंने हमारे समय की आवश्‍यक कहानी को अपने पक्ष और सोच के साथ रखा है। पात्रों के चयन,उनके चित्रण और प्रसंगों के चुनाव में सुभाष कपूर की राजनीतिक स्‍पष्‍टता दिखती है। उन्‍होंने घटनाओं को चुस्‍त तरीके से बुना है। फिल्‍म आम जिंदगी और ख्‍वाहिशों की गली से गुजरते हुए जल्‍दी ही उस मुकाम पर आ जाती है,जहां जगदीश्‍वर मिश्रा कोर्ट में शहर के संपन्‍न और सफल वकील प्रमोद माथुर के सामने खड़े मिलते हैं। मुकाबला ताकतवर और कमजोर के बीच है। अच्‍छी बात है कि फिल्‍म में इस मोड़ के आने तक जगदीश्‍वर मिश्रा हमारी हमदर्दी ले चुके होते हैं।
लोकप्रिय अभिनेता अक्षय कुमार ने जगदीश्‍वर मिश्रा की पर्सनैलिटी और एटीट्यूड को आत्‍मसात किया है। उन्‍होंने लखनऊ में वकालत कर रहे कनपुरिया वकील की लैंगवेज और बॉडी लैंग्‍वेज पर मेहनत की है। वे किसी भी दृश्‍य में निराश नहीं करते। लेखक और निर्देशक सुभाष कपूर ने लोकप्रिय अभिनेता की खूबियों को निखारा और विस्‍तार दिया है। अभिनेता अक्षय कुमार को जॉली एलएलबी2 में देखा जा सकता है। निश्चित ही यह फिल्‍म उनकी बेहतरीन फिल्‍मों में शुमार होगी। प्रतिद्वंद्वी वकील के रूप में अन्‍नू कपूर का योगदान सराहनीय है। इस फिल्‍म में कलाकारों के चुनाव और उनके किरदारों के चित्रण में खूबसूरत संतुलन रखा गया है। थिएटर के कलाकारों ने फिल्‍म के कथ्‍य को मजबूती दी है। चंद दृश्‍यों और छोटी भूमिकाओं में आए कलाकार भी कुछ न कुछ जोड़ते हैं। जलगदीश्‍वर के सहयोगी बीरबल की भूमिका में राजीव गुप्‍ता याद रह जाते हैं। हां,ऊपरी तौर पर पुष्‍पा पांडे(जगदीश्‍वर की पत्‍नी) की कोई खास भूमिका नहीं दियती,लेकिन वह जगदीश्‍वर की जिंदगी की खामोश उत्‍प्रेरक है। ऐन मौके पर वह उन्‍हें प्रेरित करती है और साथ में खड़ी रहती है। हुमा कुरैशी ने अपने किरदार को पूरी तल्‍लीनता से निभाया है। जज के रूप में सौरभ श्‍ुक्‍लाा पिछली फिल्‍म की तरह फिर से प्रभावित करते हैं। वे हंसाने के साथ न्‍याय के पक्ष में दिखते हैं। हिना की भूमिका में सयानी गुप्‍ता असर छोड़ती हैं। उनकी आंखें दर्द बयान करती हैं।
जॉली एलएलबी2 चरमरा चुकी देश की न्‍याय प्रणाली की तरफ संकेत करने के साथ लोकतंत्र में उसकी जरूरत और जिम्‍मेदारी को भी रेखांकित किया है। सुभाष कपूर की जॉली एलएलबी2 में हाई पिच ड्रामा नहीं है और न ही लोक लुभावन डॉयलॉग हैं। सरल शब्‍दों और सहज दृश्‍यों में कथ्‍य और भाव की गंभीरता व्‍यक्‍त की गई है। यह फिल्‍म सोच और समझ के स्‍तर पर प्रांसगिक और उपयोगी बातें करती है। अंतिम जिरह में जगदीश्‍वर मिश्रा जोरदार शब्‍दों में कहता है कि हमें इकबाल कादरी और सूर्यवीर सिंह दोनों ही नहीं चाहिए। दोनों ही देश और मानवता के दुश्‍मन हैं। अब जज को फैसला करना है कि दोनों जायज हैं कि दोनों ही नाजायज हैं।
जॉली एलएलबी2 में गानों की गुजाइश नहीं थी। ऐसा लगता है कि लोकप्रिय अभिनेता के प्रशंसकों के दबाव और फिल्‍म के प्रचार के लिए ही उन्‍हें रखा गया है। ठीक ही है कि निर्देशक ने उन्‍हें फिल्‍म में अधिक स्‍पेस नहीं दिया है।
अवधि- 136 मिनट
चार स्‍टार

Friday, February 10, 2017

इस बार कैनवास बड़ा है - सौरभ शुक्‍ला



सौरभ शुक्‍ला
सुभाष कपूर की फिल्‍म जॉली एलएलबी2 का शहर बदल गया है। दोनों वकील बदल गए हैं,लेकिन जज वही है। जज की भूमिका में फिर से सौरभ शुक्‍ला दिखेंगे। पिछली बार इसी भूमिका के लिए उन्‍हें राष्‍ट्रीय पुरस्‍कार से सम्‍मानित किया गया था।
-जॉली एलएलबी2 के बारे में क्‍या कहेंगे? वकील बदल गए,लेकिन आप बरकरार हैं।
0 यह दूसरे शहर की दूसरी कहानी है। फिल्‍म का विषय वही है। कानून और कोर्ट वही हैं। जज का ट्रांसफर दिल्‍ली से लखनऊ हो गया है। इसमें वकीलों की भूमिका निभा रहे कलाकारों का अलग अंदाज है। दोनों ने बहुत अच्‍छा काम किया है।
-अक्षय कुमार के अभिनय और रोल को लकर जिज्ञासा है। क्‍या आप कुछ बता सकेंगे?
0 अक्षय कुमार काफी समय से अलग प्रकार की फिल्‍में कर रहे हैं। उनकी पिछली फिल्‍मों की लिस्‍ट देख लें। उन्‍होंने कमर्शियल फार्मेट में ही सफल प्रयोग किए। उन्‍होंने पहली बार एनएसडी और थिएटर के बैकग्राउंड के सभी कलाकारों के साथ काम किया। वे प्रशिक्षित कलाकारों के साथ काफी खुश थे। मैंने पहली बार उनके साथ काम किया है। वे बहुत कामयाब स्‍टार हैं। उन्‍होंने इसका एहसास नहीं होन दिया। ने अनुशासित हैं। कभी सेट छोड़ कर नहीं जाते थे। दूसरों को क्‍यू देने के लिए खड़े रहते थे।
-अक्षय कुमार के और क्‍या गुण हैं?
0  किसी भी प्रशिक्षण से प्रतिभा नहीं आती। मैं खुद एनएसडी से नहीं हूं। अक्षय सीखते और समझते हैं। वे सीन के बारे में साचेचते हैं। अक्षय कुमार ने इस किरदार को अपना रंग दिया है। मुझे तो वे खाकी के समय से अच्‍छे लग रहे हैं। इस फिल्‍म में उन्‍होंने जॉली को अपना लिया। किरदार को आत्‍मसात करने में थिएटर जैसे ही रहे।
-इस फिल्‍म में लख्‍नऊआ रंग है। उसे सभी ने कैसे हासिल किया?
0 यह डायरेक्‍टर की उपलब्धि है। डायरेक्‍टर ही अपने किरदारों को रंग और ढंग देता है। डायरेक्‍टर का सुझाव और निर्देश ही काम आता है। मैं सुभाष कपूर को बधाई देना चाहूंगा। सुभाष की सभी फिल्‍मों में एक मुद्दा होता है। सुभाष पत्रकार रहे हैं। उनके नजरिए में उसका प्रभाव दिखता है।

Thursday, February 9, 2017

हीरो बनने की है तैयारी : मोहम्मद जीशान अय्युब


हीरो बनने की है तैयारी : मोहम्मद जीशान अय्युब
    -अजय ब्रह्मात्‍मज
रईस में रईस की परछाई है सादिक। उसे समर्थ अभिनेता मोहम्मद जीशान अय्युब ने निभाया है। उनके काम से खुद शाह रुख खान भी बड़े खुश व संतुष्‍ट हैं। उन्होंने खुलकर जीशान अय्युब की तारीफें की हैं।
    अभिभू‍त जीशान अय्युब कहते हैं, यह उनका बड़प्पन है। मैं तो ऐसे रोल कई बार कर चुका हूं। यह चौथी बार था। मैंने सादिक को गरिमा की चादर ओढाई। इससे वह महज हीरो का आम सा दोस्त नहीं लगा। वह अलग रंग-ढंग में नजर आया। आमतौर पर ऐसे किरदारों को खुली छूट नहीं मिलती। यहां ऐसा नहीं हुआ। शाह रुख ने मुझे पूरी आजादी दी। वे लगातार कहते रहे कि फलां डायलॉग जीशान से बुलवाओ। फलां बातचीत में दोनों के बीच समान बहस होनी चाहिए। यह नहीं कि रईस ही सादिक पर भारी पड़े। वे खुद को जमकर रिहर्सल करते हैं हीं, मुझे भी खूब करवाते थे। सीन को टिपिकल फिल्मी शूटिंग की तरह नहीं, बल्कि जैसा थिएटर में नाटकों के दौरान कलाकारों का तालमेल होता है, उस मिजाज से शाह रुख खान ने काम किया। करवाया भी।
    अक्सर सेट पर हीरो के फ्रेंड को अलग तरीके से ट्रीट किया जाता है। वह यूं कि माइक पर चिल्लाते हुए हीरो के दोस्त को बुला लाओ। उसे कहीं भी खड़ा कर दो। बस। यहां ऐसा नहीं था। सादिक को भी अहम किरदार के तौर पर ट्रीट किया गया। इससे मुझे मोटिवेशन तो मिली ही, मुझे खुद में जिम्मेदारी का एहसास भी हुआ। सादिक इस मायनों में भी अलग रहा कि वह सच्चे हितैशी की तरह अपने जिगरी दोस्त से सवाल करता रहता है। हर फैसलों की परिणति की ओर आप का ध्‍यान अवगत करवाता है। रईस दरअसल पूरी फिल्म ही फैसले लेने को समर्पित है। सादिक उसमें मदद करता है।
    इस दोस्ती से ऊबन नहीं हुई है। रील दोस्ती निभाते-निभाते इंडस्ट्री में कइयों से रियल दोस्ती भी हो गई है। मैं इस कथित टाइपकास्ट होने को नकारात्‍मक तौर पर नहीं लेता हूं। हालांकि हर कलाकार की ख्‍वाहिश ऐसे किरदारों से होते हुए मेन लीड की तरफ का सफर तय करने की होती है। मेरी जहां तक बात है, उस दिशा में मेरी तैयारी है। अलबत्ता वह मौका मिलने पर आप पर दायित्‍व बहुत बढ़ जाता है। उस लिहाज से कथा की है। वह रिलीज होनी है। इसमें मैंने नसीर साहब वाला रोल किया है। एक समीर की शूटिंग पूरी की है। एक और फिल्म की शूटिंग लखनऊ में की है। उसमें भी हीरो मैं ही हूं। मतलब यह कि उस मिजाज की फिल्में मिल तो रही हैं, पर कई ऐसे ऑफर भी मिले हैं, जिन्हें महज करने की खातिर करने का जी नहीं करता। आप यकीन नहीं करेंगे, अब तलक मुझे 17 ऐडल्ट कॉमेडी ऑफर हुई थीं। मुझे बड़ी हैरानगी हुई। मैंने ऑफर करने वालों से पूछा भी कि उन्हें मेरा कौन सा काम देख कर लगा कि मैं सेक्स कॉमेडी कर सकता हूं। असल में जबकि पूरे करियर में मैंने कभी उस किस्म की कॉमेडी नहीं की।
    काम के अलावा अपनी रचनात्‍मक खुराक के लिए मैं कविताओं और नाटकों के सतत संपर्क में रहता हूं। उनमें की गई मेहनत से अदायगी में रवानगी बनाए रखने में मदद मिलती है। खासकर शूटिंग के दौरान मैं कविताएं इत्‍यादि पढ़ता रहता हूं। इससे दिमाग अलर्ट रहता है। साथ ही लिखे गए शब्दों के क्या मायने निकालने हैं, उस पर सक्रियता बनी रहती है। उस दौरान किस किस्म की भाव-भंगिमा रखनी है, उसका पता चलता रहता है। चीखना, चिल्लाना तो हम तीन महीनों में भी सीख जाते हैं, पर हर भाव को किस हद तक जाहिर करना है, वह सलाहियत मुझे साहित्‍य से आती है।
    मिसाल के तौर पर रईस के दौरान मैं प्रेमचंद की कहानियां पढ़ रहा था। खासकर मानसरोवर। मैंने दो मानसरोवर पढ़ डाली। वह इसलिए कि यहां हर क्षण नई चुनौतियां उसके व रईस के समक्ष उत्‍पन्न हो रही थीं। तभी मैं उपन्यास में नहीं गया, वरना वो किसी और जोन में ले जाती मुझे। करियर को लेकर भी मेरा अप्रोच अलग है। मैं बेचैनी वाले जोन में नहीं रहता। वह इसलिए कि पहले तो कुछ भी नहीं था मेरे पास। अब सोच से अधिक ही मिल रहा है। तो मैं खुश रहता हूं। हालांकि सोशल मीडिया और कुछ दोस्तों की त्‍वरित प्रतिक्रियाएं डराती भी हैं।
    इस तरह अब अतीत के पन्ने पलटता हूं तो मुझे मुंबई आने का फैसला सही लग रहा है। वह इसलिए कि मैं तो अमेरिका जा रहा था न्‍यू स्‍ट्रासबर्ग में पढ़ाने। मैं तो मुंबई महज घूमने को आया था पत्नी को सेटल करने भी। चूंकि वे मराठी हैं तो उन्हें अतिरिक्त भाषा की फिल्म व शो मिलते हैं। मैं एक साल हैदराबाद भी पढ़ा था। यहां स्कूल भी खोलने को था, पर देखिए कि जिंदगी ने क्या मोड़ ले लिया। पत्नी अब इंडियाज बेस्ट ड्रामेबाज की मेंटॉर भी है। हमारी नाट्य संस्‍था भी है। बीइंग एसोसिएशन। इसकी भी कर्ता-धर्ता वे ही हैं। साहित्‍य को प्रोमोट करने के लिए हम इसके तहत रंग पाठ भी करते हैं। यानी अलग-अलग लेखकों की कहानियों का मजेदार ढंग से पाठ। यह हम हर महीने करते हैं।


Tuesday, February 7, 2017

मजेदार किरदार है जगदीश्‍वर मिश्रा- अक्षय कुमार




-अजय ब्रह्मात्‍मज
मंगलवार को जगदीश्‍वर मिश्रा फिल्‍मसिटी में द कपिल शर्मा शो की शूटिंग कर रहे थे। लखनऊ के जगदीश्‍वर मिश्रा वकील की वेशभूषा में ही थे। कपिल शर्मा को भी पहली बार समझ में आया कि किसी वकील से मजाकिया जिरह करने में भी पसीने छूट सकते हैं। यह अलग बात है कि कपिल शर्मा की मेहनत का यह पसीना छोटे पर्दे पर हंसी बन कर बिखरेगा। शो से निकलत ही जगदीश्‍वर मिश्रा प्रशंकों से घिर गए। जो पास में थे,वे सेल्‍फी लेने लगे और जो दूर थे वे उनकी तस्‍वीरें उतारने लगे। जगदीश्‍वर मिश्रा की पैनी निगाहों से कोई बचा नहीं रहा। वे सभी का अभिनंदन कर रहे थे। इस बीच चलते-चलते ड्रेसमैन ने उनका काला कोट उतार दिया। जगदीश्‍वर मिश्रा ने कमीज ढीली की और परिचित मुस्‍कराहट के साथ अक्षय कुमार में तब्‍दील हो गए। आप सभी को पता ही है कि सुभाष कपूर की नर्द फिल्‍म जॉली एलएलबी2 में अक्षय कूमार वकील जगदीश्‍वर मिश्रा की भूमिका निभा रहे हैं। वे पहली बार वकील का किरदार निभा रहे हैं।
अनुशासित और समय के पाबंद अक्षय कुमार फिल्‍मों की रिलीज के पहले कुछ ज्‍यादा व्‍यस्‍त हो जाते हैं। उन्‍होंने इंटरव्‍यू के लिए समय निकाला तो यह आग्रह किया कि फिल्‍मसिटी ही आ जाएं। यहां से जुहू लौटते समय रास्‍ते में बातचीत कर लेंगे। फिल्‍मसिटी से जुहू लौटने के 14 किलोमीटर के सफर में यह बातचीत उनकी गाड़ी में ही हुई। मुंबई में कुछ फिल्‍म स्‍टार ट्रेफिक का यह उपयोगी इस्‍तेमाल करते हैं। हमारी बातचीत मुख्‍य रूप से जॉली एलएलबी2 को ही लेकर हुई। फिल्‍मसिटी से निकलते ही अक्षय कुमार के नजर सामने पेड़ की डालियों पर उछलते-कूदते बंदर पर पड़ी और वे गाड़ी रोक कर बंदर देखने-दिखाने लगे।
अक्षय कुमार अपनी फिल्‍मों को लकर बहुत चूजी हैं। जॉली एलएलबी2 के चुनाव की वजह क्‍या रही? सुभाष कपूर,स्क्रिप्‍ट या फिर प्रोडक्‍शन बैनर? अक्षय बताते हैं,मैंने स्क्रिप्‍ट चुना। मुझे पार्ट 1 अच्‍छी लगी थी। मैंने स्क्रिप्‍ट के साथ आए सुभाष कपूर को भी चुना और प्‍लस मैंने फॉक्‍स स्‍टार के साथ पहले कोई फिल्‍म नहीं की थी। तो एक के बाद एक तीनों बातें हो गई,लेकिन पहली वजह स्क्रिप्‍ट ही रही। वास्‍तविक घटनाओं को लेकर लिखी गई यह स्क्रिप्‍ट मुझे बहुत अच्‍छी लगी।डिटेल में कुछ और बताने के आग्रह पर वे आगे कहते हैं, मैंने कभी वकील का रोल किया ही नहीं था। मैं अपनी फिल्‍मों के लिए नए किरदारों की तलाश में रहता हूं। उनके माध्‍यम से ही कुछ नया करने का मौका मिलता है। मुझे जगदीश्‍वर मिश्रा मजेदार किरदार लगा। यह सच होने के साथ एंटटेनिंग है। हमारी फिल्‍म न्‍यायपालिका की दिक्‍कतों की भी बात करती है। हमारे पास कम जज हैं। यही कारण है कि मुकदमों के फैसले में वक्‍त लगता है। अब आप ही बताएं न 21 हजार जज साढ़तीन करोड़ मुकदमों का फैसला कितनी जल्‍दी सुना पाएंगे?’क्‍या जगदीश्‍वर मिश्रा के बारे में भी कुछ बता सकेंगे? अक्षय मना कर देते हैं,वह बताऊंगा तो कहानी जाहिर हो जाएगी। एक हफ्ते के बाद आप खुद ही देख लेना न...
फिर भी उत्‍तर भारत के इस किरदार को निभाने और लखनऊ-बनारस में जाकर शूटिंग करने का अलग उत्‍साह तो रहा होगा। कैसा रहा अनुभव? अक्षय कुमार के लिए निर्देशक सुभाष कपूर ने जमीनी तैयारी कर दी थी। वे कहते हैं, मेरा आधा से ज्‍यादा होमवर्क सुभाष ने ही कर दिया था। वे मुझे गाइड करते रहे। इस फिल्‍म के कारण पहली बार बनारस गया और उफनती गंगा में डुबकी मारी। मैंने सोचा कि डुबकी लगा लो मेरे पाप भी धुल जाएंगे। पाप तो हो ही जाते हैं,बड़े हों या छोटे। बनारस के खान और पान का स्‍वाद लिया। मैं खाने का शौकीन हूं। मैं तो सभी से कहता हूं कि दिन में एक-डेढ़ घंटे कसरत करो और शाम में साढ़े छह बजे तक खा लो। फिर न तो कोई बीमारी होगी और न तकलीफ होगी। बनारस और लखनऊ के लोग प्‍यार और इज्‍जत देना जानते हैं। उनके मिजाज में थोड़ी मस्‍ती रहती है,लेकिन वही तो जिंदगी का मजा है।
जॉली एलएलबी2 में अक्षय कुमार के साथ हुमा कुरैशी हैं। अक्षय के पास उनकी तारीफ में बताने के लिए बहुत कुछ है,हुमा बेहतरीन एक्‍ट्रेस हैं। उन्‍होंने राष्‍ट्रीय पुरस्‍कार से सम्‍मानित फिल्‍मों में काम किया है। उन्‍हें भी अच्‍छा किरदार मिला है। पहली बार पर्दे पर दिखेगा कि हीरो घर में रोटियां सेंकता है।सब्जियां बनाता है। हुमा ने तो एक इंटरव्‍यू में कहा कि मुझे रियल लाइफ में ऐसा ही पति चाहिए। हुमा इस फिल्‍म में मुझे संभालती और नैतिक बल देती हैं। वह मुझे हिम्‍म्‍ती बनाती है।
अक्षय बताते हैं कि सुभाष कपूर ने पहले भी किसी के जरिए इस फिल्‍म के लिए मुझे अप्रोच किया था। तब बात नहीं बन सकी थी। बाद में मुलाकात हुई तो सब तय हो गया। हर फिल्‍म का वक्‍त होता है। अक्षय कुमार सुभाष कपूर को एकदम नया फिल्‍मकार नहीं मानते। वे कहते हैं,वैसे भी मेरे साथ नए फिल्‍मकारों ने ही काम किया है। यह कुछ संयोग है। मुझे लगता है कि नए फिल्‍मकार ज्‍यादा जोश  के साथ काम करते हैं। वे नई सोच और उम्‍मीद ले आते हैं। वे कुछ कर दिखाना चाहते हैं। सुभाष कपूर फिल्‍मों में आने के पहले जर्नलिस्‍ट रहे हैं। समाज मनोरंजन के साथ कहते हैं। उनकी समझ पैनी है और फिर वे कुछ बड़ी बात मनोरंजन के साथ करते हैं। उनकी फिल्‍मों का हास्‍य हंसाने के के साथ कचोटता भी है। जॉली एलएलबी2 को रेगुलर कॉमेडी फिल्‍म नहीं समझें। यह फिल्‍म जगदीश्‍वर मिश्रा के बहाने बहुत कुछ कहती है।