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Monday, September 26, 2016

‘पार्च्ड’: ‘सूखी ज़मीन’ पर तिरछी डगर ले चली ‘नदियों’ की कहानी



लीना यादव की 'पार्च्‍ड' राजस्‍थान की पृष्‍ठभूमि में चार औरतों की कहानी है। खिखलाहट और उम्‍मीद की यह कहानी झकझोरती है। शहरी दर्शकों 'पिंक' को समझ पाते हैं। उनके लिए 'पार्च्‍ड' ओझल सच्‍चाई है। 'पार्च्‍ड' पर विभावरी ने लिखा है। उम्‍मीद है कि और भी लेख मिलेंगे...        

-विभावरी
यह फिल्म सिर्फ़ उन चार औरतों की कहानी नहीं है जिनके इर्द-गिर्द इसे बुना गया है...यह इस देश, इस दुनिया की उन तमाम औरतों की कहानी है जिन्होंने नहीं जाना कि, घुटन भरी ज़िंदगी की क़ैद के बाहर की हवा कितनी खुशनुमा हो सकती है!! जिन्होंने नहीं जाना कि उनकी उदास चीखों के बाहर भी एक दुनिया बसती है...जहाँ खुशियों की खिलखिलाहट है!! जिन्होंने नहीं जाना कि उनका खुद का शरीर भी एक उत्सव है...प्रेम के चरागों से रौशन उत्सव!!
दरअसल फिल्म चार केन्द्रीय स्त्री- चरित्रों के मार्फ़त हमारे समाज की उस मानसिकता से रूबरू कराती है जहाँ औरत महज एक देह है. एक देह जिसे पितृसत्ता जब चाहे खरीद और बेच सकती है...फिर वह शादी जैसी संस्था की आड़ में हो या बाजारू औरत होने के तमगे की आड़ में! हाँ, अपने ही इस शरीर पर उस औरत का कोई हक़ नहीं! उसे रंडी से लेकर बाँझ तक की नवाज़िश इसी पितृसत्ता की सहूलियत और सलाहियत के अनुसार मिलती रहती है!
राजस्थान के रेगिस्तान की पृष्ठभूमि में रची यह फिल्म स्पेस के लिहाज़ से औरत की ज़िंदगी के मरूस्थल को बखूबी रूपायित करती है. लेकिन यह फिल्म सिर्फ़ औरत की ज़िंदगी के मरूस्थल के बारे में नहीं है...दरअसल यह फिल्म अपनी जिंदगियों के ऊसर में पानी तलाश रही औरतों की है...अपनी सीमाओं से बाहर निकलने को बेसब्र औरतों की है.
पिछले दिनों आई फिल्म पिंक अपने बोल्ड विषय और ट्रीटमेंट को लेकर चर्चा में रही. पिंक   अलग-अलग पृष्ठभूमि से आकर मेट्रो सिटी में काम कर रही उन तीन दोस्तों की कहानी है जो अपने शरीर पर अपने अधिकार के तहत ना कह पाने की आज़ादी के लिए लड़ रही हैं.     इसी क्रम में पार्च्ड उस अर्द्ध- वृत्त को पूरा करने का ज़िम्मा उठाती है जिसे स्त्री जीवन के एक कठोर सच वर्जिनिटी और चरित्र की शुद्धता की त्रिज्या लेकर पिंक ने खींचा है.क्योंकि पार्च्ड लगभग इसी विषय को ग्रामीण पृष्ठभूमि में रचती है.  पार्च्ड, जिस बेबाकी से औरत के शरीर पर उसके हक़ की बात करती है वह आश्चर्य में डालता है. राधिका आप्टे के किरदार लाजो का वह संवाद कि “दुनिया में मेरी जैसी बाँझ नहीं होती तो बच्चों का अलग प्रदेश ही बन गया होता!” से मुझे कृष्णा सोबती की मित्रो बेतरह याद आई! मित्रो का उसकी सास से संवाद कि “मेरा बस चले तो गिनकर सौ कौरव जन डालूँ अम्मा, अपने लाडले बेटे का भी तो कोई आड़तोड़ जुटाओ...निगोड़े मेरे पत्थर के बुत में भी तो कोई हरकत हो!” जैसे लाजो के संवाद का परिवर्धित रूप है, जो लाजो के चरित्र की विकास यात्रा में एक पड़ाव भर है. पड़ाव इसलिए क्योंकि फिल्म, स्त्री के माँ बनने में उसकी पूर्णता नहीं देखती बल्कि स्त्री से सवाल करती है कि क्या वह माँ सिर्फ़ इसलिए बनना चाहती है कि समाज ऐसा चाहता है, या कि उसका खुद का मन इस बात का हामी है?? इस सवाल के साथ ही यह फिल्म स्त्री के देह पर उसके अपने हक़ की मुहर लगाती है.
फिल्म, बिजली के चरित्र के माध्यम से भी अपने शरीर पर अपने हक़ के तहत ना कहने की उसी बात को बार-बार रेखांकित करती है जिस पर पिछले दिनों पिंक ने बहस छेड़ी है. ना कहने के अपने अधिकार को बिजली का चरित्र बिंदास साफगोई से अवेल करता है. बावजूद इसके कि पितृसत्तात्मक समाज उसके शरीर को अपनी सार्वजनिक संपत्ति मानता है.
रानी और जानकी के किरदारों के मार्फ़त जहाँ फिल्म स्त्री-जीवन में प्रेम के महत्त्व को रेखांकित करती है वहीं लाजो का किरदार, स्त्री- देह की पीड़ा से लेकर उसके उत्सव तक का प्रतीक बन जाता है. पति के हाथों हर रोज़ शारीरिक यातना का शिकार होती लाजो को देखना जितना भयावह है एक साथी के रूप में आदिल हुसैन के किरदार के साथ शरीर का उत्सव मनाती लाजो को देखना कलात्मक रूप से उतना ही संतुष्टिदायक!! संतुष्टिदायक इसलिए भी कि लाजो के चरित्र में इस बात को लेकर कोई गिल्ट नहीं है!! ...और इस चरित्र की इस पूरी रेंज के साथ फिल्म स्त्री-शरीर की द्वंद्वात्मक अनुभूतियों और उसके कारणों की पड़ताल करती चलती है.
इन तमाम बिंदुओं के साथ फिल्म की खूबियों में रसेल कारपेंटर की बेहतरीन सिनेमैटोग्राफी और पॉल एन. जे. ऑटसन की खूबसूरत साउंड डिज़ाइनिंग है. रसेल कारपेंटर टाइटेनिक के लिए बेस्ट सिनेमैटोग्राफर का एकेडमी अवार्ड जीत चुके हैं तो पॉल एन. जे. ऑटसन, द हार्ट लॉकर, जीरो डार्क थर्टी और स्पाइडर मैन टू के लिए तीन बार एकेडमी अवार्ड विजेता रहे हैं. वहीं केविन टेंट की बेहतरीन एडिटिंग आपको अपनी सीट से हिलने भर का मौका भी नहीं देती.
फिल्म का बेहतरीन कैमरा वर्क एक तरफ छोटे और संकरे स्पेस को यूज़ करता हुआ स्त्री जीवन के घुटन को रूपायित करता है तो दूसरी तरफ राजस्थान के खूबसूरत लैंडस्केप को लॉन्ग शॉर्ट्स के ज़रिये स्त्री-मन की आज़ादी को अभिव्यक्त करता है. बावड़ी की सी उस लोकेशन पर अपनी चूनरी को लगभग परचम बनाए सीढ़ियों से उतरती...अपनी आज़ादी का जश्न मनाती औरतों का वह दृश्य भूलता नहीं है...वैसे ही रात के स्याह अँधेरे में चाँद की रौशनी से झिलमिलाती झील के किनारे बेख़ौफ़ लेटी औरतों की वह निर्द्वन्द्व हँसी कानों में अक्सर गूँज जाती है!! (काश कि  ऐसे दृश्य, सिनेमा के फ्रेम से बाहर निकल सकें...) ज़ाहिर है कैमरे के खूबसूरत संयोजन ने इन दृश्यों में इतना जीवन उड़ेल दिया है कि इसके सच होने का भ्रम पैदा होता है और यह सस्पेंशन ऑफ डिसबिलीफ़ पैदा कर पाना एक सिनेमा की कलात्मक सफलता में से एक है.    
पूरी फिल्म में स्याह, धूसर और पीली रौशनी का उपयोग फिल्म के कथ्य की अभिव्यंजना को और मुखर बना देता है.
फिल्म, स्त्री की तकलीफों के विभिन्न संभव आयामों को न सिर्फ़ छूती है बल्कि बेहद स्पष्ट समझ के साथ उसे आगे भी ले जाती है. फिर चाहे वह नार्थ- ईस्ट का एंगल हो या शिक्षा और  आर्थिक आत्मनिर्भरता जैसे सवाल. बाल विवाह जैसी सामाजिक कुरीति हो या फिर एक विधवा के प्रति समाज की सोच का सवाल. और इन सबको खुद में समाहित करता सबसे महत्त्वपूर्ण प्रश्न, स्त्री की देह पर उसके अधिकार को लेकर है जिसे फिल्म बेहद संजीदगी से निरुपित करती है. फिर चाहे वह बिजली की ना के मार्फ़त हो या लाजो की हाँ के मार्फ़त!!         
तनिष्ठा चैटर्जी, राधिका आप्टे, सुरलीन चावला, आदिल हुसैन, लहर खान, रिद्धि सेन और सयानी गुप्ता जैसे कलाकारों की बेहतरीन अदाकारी, इस फिल्म की तमाम खूबियों के एक्ज़ीक्यूशन को संभव बना पाती है. परदे पर कुछ मिनट के लिए आए आदिल हुसैन अपनी गज़ब की अदाकारी से उस दृश्य को इतना जीवंत कर जाते हैं कि उनका स्पेशल लुक फिल्म खत्म होने के बाद भी याद रह जाता है.        
जानकी के किरदार के रूप में लहर खान ने तमाम प्रतिष्ठित कलाकारों के बीच अपनी विशेष उपस्थिति दर्ज कराई है. अपनी आँखों और भंगिमाओं के खूबसूरत संयोजन से उन्होंने ऐसे दृश्यों को भी बेहद संप्रेषणीय बना दिया है जहाँ उनके संवाद नहीं हैं. गौरतलब है कि जलपरी में अपने बेहतरीन अभिनय से उन्होंने दर्शकों और फिल्म समीक्षकों का ध्यान आकर्षित किया है. इसके लिए उन्हें बेस्ट चाइल्ड ऐक्ट्रेस के पुरस्कार से नवाज़ा जा चुका है. इस बेहरतरीन अदाकारा को भविष्य के लिए ढेर सारी शुभकामनाएँ!
फिल्म का गीत और संगीत भी सुन्दर बन पड़ा है.
इस बेहतरीन फिल्म की बागडोर संभालने वाली डायरेक्टर लीना यादव को बधाई और शुभकामनाएँ. वे इसके पहले शब्द और तीन पत्ती जैसी फ़िल्में डायरेक्ट कर चुकी हैं.                    

Saturday, September 24, 2016

कौन हैं बंदी युद्ध के? ... -निखिल आडवाणी




-अजय ब्रह्मात्‍मज
युद्ध के बंदी कौन हैं? युद्ध के दौरान मोर्चे पर तैनात सैनिकों को गिरफ्तार कर कैदी बना लिया जाता है। उनके बारे में कोई जानकारी उनके परिवार वालों को नहीं मिल पाती। शहीदों की सूची में उनका नाम न हो परिवार की आस बंधी रहती है कि उनका बेटा,पति और पिता लौट कर आएगा। यह आस भी किसी कैद से कम नहीं है। पूरा परिवार इस उम्‍मीद का बंदी हो जाता है। निखिल आडवाणी ने कारगिल युद्ध की पृष्‍ठभूमि में दो सैनिकों और उनके परिवारों की यही कहानी गढ़ी है। यह टीवी शो इजरायल के मशहूर टीवी शो हातुफिम्‍ पर अधारित है। निखिल आडवाणी ने मूल थीम के अनुरूप भारतीय परिवेश और संदर्भ की कहानी चुनी है।
स्‍टार प्‍लस से निखिल आडवाणी को इस खास शो के निर्माण और निर्देशन का ऑफर मिला तो उन्‍होंन पहले इंकार कर दिया। वजह यह थी कि ओरिजिनल शो का प्रारूप भारत में नहीं दोहराया जा सकता था। अपने देश की सुरक्षा एजेंसियां अलग तरीके से काम करती हैं। सैनिकों और उनके परिवारों का रिश्‍ता भी अलग होता है। बाद में वे राजी हुए तो उन्‍होंने पूरी तरह से उसका भारतीयकरण कर दिया। 1999 में हुए कारगिल युद्ध में 527 सैनिक शहीद हुए थे। 1363 सैनिकों के हताहम होने की जानकारी है। कुछ सैनिकों के बारे में जानकारी ही नहीं है कि वे कहां लापता हैं। निखिल आडवाणी कहते हैं,यह कमाल की स्‍टोरी है। हमारा टायटल बंदी युद्ध के है,लेकिन गौर करें तो असल युद्बबंदी तो दोनों सैनिकों की बीवियां और उनकी फैमिली है। वे 17 सालों से उनका अनिश्‍चय इंतजार कर रहे हैं। मान लें कि लापता सैनिक दूसरे देश के जेल में यातना सह रहे होंगे,लेकिन यहां उनके परिवार की आपदा उससे भारी है। वे अपनी उम्‍मीदों के ही कैदी हो गए हैं। उनके जीवित लौट आने के इंतजार में सब कुछ ठहर गया है। वे आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं।
निखिल आडवाणी आरंभ से ही स्‍पष्‍ट थे कि उन्‍हें टीवी पर शानदार शो करना है। उन्‍होंने अपनी टीम को पहली हिदायत दी कि कोई भी इस शो की प्‍लानिंग में यह नहीं कहेगा कि टीवी में ऐसा नहीं होता1 हमें टीवी की सीमाएं तोड़नी है। हमें अपने बजट में ही सोच और कल्‍पना का विस्‍तार करना है। निखिल आडवाणी कहते हैं,मैंने चैनल से पूरी आजादी लेने के बाद ही काम शुरू किया। शो देखने के बाद वे संतुष्‍ट हुए। उन्‍होंने माना कि शो में इमोशन का सही चित्रण है। असल बात है कि आप के किरदारों का दर्शकों से कनेक्‍शन बने। वे आप को अपने या कम से कम पड़ोसी परिवार का हिस्‍सा मानें तो उनकी रुचि बढ़ जाती है। यह शो दर्शकों में राष्‍ट्रीय भावना का संचार करेगी।
निखिल बताते हैं कि इस शो में एक किरदार कहती है, जब हमलोग सैनिक से शादी करते हैं तो यह मान लेते हैं कि हम तो सौतन हैं। हमारे पतियों की शादी तो देश से हो चुकी रहती है। हम जानती हैं कि मोर्चे पर जाने के बाद आप शायद वापस न आएं1 निखिल की राय में ऐसी औरतें ही सच्‍ची राष्‍ट्रभक्‍त हैं। वे आगे कहते हैं,अपने रिसर्च के दौरान मुझे सैनिकों की पत्नियों ने बताया कि हम तो लापता पतियों की शहादत के पत्र का इंतजार करती हैं। उम्‍मीद ही न रहे तो जिंदगी आगे बढ़ती है। मुझे उनकी बातों से झटका लगा,लेकिन यही कड़वी और इमोशनल सच्‍चाई है।
बंदी युद्ध के में  सत्‍यदीप मिश्रा,पूरब कोहली,मनीष चौधरी,संध्‍या मृदुल,रसिका दुग्‍गल और अमृता पुरी जैसे सिद्धहस्‍त कलाकार हैं। होगा।

Friday, September 23, 2016

फिल्‍म समीक्षा : बैंजो



मराठी फ्लेवर
-अजय ब्रह्मात्‍मज
मराठी फिल्‍मों के पुरस्‍कृत और चर्चित निर्देशक रवि जाधव की पहली हिंदी फिल्‍म है बैंजो। उन्‍होंने मराठी में बाल गंधर्व,नटरंग और बालक पालक जैसी फिल्‍में निर्देशित की हैं। इनमें से बालक पालक के निर्माता रितेश देशमुख थे। प्रोड्यूसर और डायरेक्‍टर की परस्‍पर समझदारी और सराहना ही बैंजो की प्रेरणा बनी। इसके साथ ही दोनों मराठी हैं। बैंजो के विषय और महत्‍व को दोनों समझते हैं। लेखक-निर्देशक रवि जाधव और एक्‍टर रितेश देशमुख की मध्‍यवर्गीय परवरिश ने बैंजो को फिल्‍म का विषय बनाने में योगदान किया। बैंजो निम्‍न मध्‍यर्गीय वर्ग के युवकों के बीच पॉपुलर सस्‍ता म्‍यूजिकल इंस्‍ट्रूमेंट है। महाराष्‍ट्र के साथ यह देश के दूसरे प्रांतों में भी लोकप्रिय है। मुंबई में में इसकी लोकप्रियता के अनेक कारणों में से सार्वजनिक गणेश पूजा और लंबे समय तक मिल मजदूरों की रिहाइश है। निर्देशक रवि जाधव और निर्माता कृषिका लुल्‍ला को बधाई।
बैंजोकी कहानी कई स्‍तरों पर चलती है। तराट(रितेश देशमुख),ग्रीस(धर्मेश येलांडे),पेपर(आदित्‍य कुमार) और वाजा(राम मेनन) मस्‍ती के लिए बैंजो बजाते हैं। चारों के पेशे अलग-अलग है,लेकिन त्‍योहारों और अवसरों पर उनकी म्‍यूजिकल संगत होती रहती है। संयो से उनके संगीत का एक टुकड़ा न्‍यूयॉर्क पहुंच जाता है। भारतीयू मूल की क्रिस(नरगिस फाखर) उस संगीत की खोज में मुंबई आती है। यहां उसकी मुलाकात तराट से हो जाती है। पहली ही मुलाकात में तराट को क्रिस अच्‍छी लगती है। हिंदी फिल्‍मों में प्रेम का यह फार्मूला कहानी के मूल उद्देश्‍य से भटका देता है। बैजो में भी यही हुआ है। तराट और क्रिस के रोमांटिक ट्रैक में बैंजो का ट्रैक गड्डमड्ड हो गया है। फिर भी रवि जाधव बैंजो बजाने वालों के दर्द और आनंद को पर्दे पर लाने में एक सीमा तक सफल रहते हैं। कहानी में बिल्‍डर,माफिया,करपोरेटर और दूसरे ट्रैक से भी कहानी भटकती है।
रितेश देशमुख पारदर्शी अभिनेता है। परफारमेंस में उनकी ईमानदारी झलकती है। कामेडी और सेक्‍स कामेडी में उनकी प्रतिभा का दुरूपयोग होता रहा है। बैंजो उन्‍हें प्रतिभा प्रदर्शन का बेहतरीन मौका देती है। उन्‍होंने लगन और ऊर्जा के साथ इस किरदार को निभाया है। उनकी मोजूदगी फिल्‍म में मराठी लोकेल और फ्लेवर ले आती है। निर्देशक पर इसे हिंदी फिल्‍म बनाने का दबाव रहा होगा,तभी यह फिल्‍म स्‍थानीय विशेषता के बावजूद बार-बार मेनस्‍ट्रीम सिनेमा के फार्मूले में घुसती है। कलाकारों का सटीक चुनाव फिल्‍म की खासियत है। आदित्‍य कुमार,धर्मेया येलांडे और राम मेनन ने अपने किरदारों को स्‍थनीय रंग और तेवर दिया है। भाष,लहजा और एटीट्यूड में वे अपने किरदारों की खूबियां जाहिर करते हैं। लेखक ने तीनों सहयोगी किरदारों को बराबर अवसर दिए हैं। नरगिस फाखरी को खुद के व्‍यक्तित्‍व से बहुत अलग नहीं जाना था,इसलिए वह भी ठीक लगी हैं।
हिंदी में स्‍थानीय विशेषताओं की फिल्‍में बनती रहनी चाहिए। बैंजो में मुंबई के उस चालीस प्रतिशत बस्‍ती की कहानी है,जहां मेनस्‍ट्रीमा हिंदी फिल्‍मों के कैमरे नहीं जाते हैं। अगर कभी गए भी तो उनके ग्रे शेड ही नजर आते हैं। इस फिल्‍म में शहर की मलिन बस्तियां जिंदगी और जोश से लबरेज हैं। स्‍थानीय फ्लेवर की फिल्‍मों का मेनस्‍ट्रीम सिनेमा के तत्‍वों से उनका कम घालमेल हो तो हम हिंदी सिनेमा का विस्‍तार कर पाएंगे। बैंजो अच्‍छी कोशिश है।
अवधि- 138 मिनट
*** तीन स्‍टार

फिल्‍म समीक्षा : वाह ताज

-अजय ब्रह्मात्‍मज
जीत सिन्हा की 'वाह ताज' विशेष आर्थिक क्षेत्र और किसानों की समस्या को लेकर बनाई गई फिल्म है। उन्होंने आगरा के ताजमहल को केंद्र में लेकर कथा बुनी है। उद्योगपति विरानी अपने पिता के सपनों को पूरा करने के लिए किसानों को उनकी उपजाऊ ज़मीन से बेदखल कर देता है। गांव के किसानों का नेता तुपकारी विरोध करता है तो वह एक राजनीतिक पार्टी के नेता और गुंडों की मदद से उसकी हत्या करवा देता है। यह बात विदेश में पढाई कर रहे उसके छोटे भाई विवेक को पता चलती है तो वह गांव लौटता है। उसके साथ उसकी गर्लफ्रेंड रिया भी आ जाती है। दोनों मिलकर एक युक्ति सोचते हैं। 'वह ताज' इसी युक्ति की फिल्म है।
इस युक्ति के तहत दोनों होशियारी से कागजात जमा करते हैं और ताजमहल पर दावा ठोक देते हैं। वे महाराष्ट्र के तुकाराम और सुनंदा बन जाते हैं। अपने साथ एक लड़की को बेटी बना कर ले आते हैं। विवेक का दावा है कि उसके दादा के परदादा के परदादा की यह ज़मीन है। मुग़ल बादशाह शाहजहांं ने उसे हथिया लिया था। मामला कोर्ट में पहुंचता है। वहां विवेक के जमा किए कागजातों को गलत साबित करना संभव नहीं होता। ताजमहल के दर्शन पर स्टे आ जाता है। यह बड़ी ख़बर बन जाती है। फिर सेंटर और स्टेट की राजनीति आरम्भ होती है। स्टेट में विरोधी पार्टी पहले से सक्रिय है। उसके नेता विवेक की मदद कर रहे हैं। मुश्किल में फंसती सरकार विवेक उर्फ़ तुकाराम को देश में कहीं भी ज़मीन देने का वादा कर बैठती है।
सुनंदा भारत के नक़्शे पर कुछ जगहों पर छड़ी रखती है तो वो क़ुतुब मीनार और संसद निकलते हैं। दोनों के लिए मना होने के बाद वे अपने गांव के खेत चुनते हैं। यहां फिर से उनकी भिडंत विरानी और उसके गुर्गों से होती है।निर्देशक अजीत सिन्हा की बेतुकी कोशिश एक प्रहसन बन कर रह जाती है। फिल्म के कुछ दृश्यों और प्रसंगों में हंसी आती है, लेकिन पूरी फिल्म से जुड़े रहने के लिए वे नाकाफी हैं। श्रेयश तलपडे औंर मंजरी फडनीस की मेहनत भी काम नहीं आती। एक सीमा के बाद वे भी हंसा नहीं पाते। हांं, श्रेयश मराठी लहजे और उच्चारण से प्रभावित करते हैं, लेकिन उनका किरदार एकांगी रह जाता है। सहयोगी कलाकारों में विसर्जन यादव की भूमिका में हेमंत पाण्डेय देसी बोली और लहजा ठेठ और सही तरीके से ले आते हैं। उस बोली को नहीं समझने वाले दर्शकों को थोड़ी दिक्कत हो सकती है। लम्बे समय के बाद पर्दे पर आए हेमंत किरदार की सीमाओं के बावजूद प्रभावित करते हैं। अन्य कलाकारों में कोई भी उल्लेखनीय नहीं है।
सही मुद्दे पर व्यंग्यात्मक फिल्म बनाने की कोशिश में लेखक-निर्देशक असफल रह जाते हैं। दृश्यों से संयोजन और चित्रण में बारीकी नहीं है। यूं लगता है कि सीमित बजट में सब कुछ समेटने की जल्दबाजी है।
* एक स्‍टार

जीत सिन्हा की 'वाह ताज' विशेष आर्थिक क्षेत्र और किसानों की समस्या को लेकर बनाई गई फिल्म है। उन्होंने आगरा के ताजमहल को केंद्र में लेकर कथा बुनी है। उद्योगपति विरानी अपने पिता के सपनों को पूरा करने के लिए किसानों को उनकी उपजाऊ ज़मीन से बेदखल कर देता है। गांव के किसानों का नेता तुपकारी विरोध करता है तो वह एक राजनीतिक पार्टी के नेता और गुंडों की मदद से उसकी हत्या करवा देता है। यह बात विदेश में पढाई कर रहे उसके छोटे भाई विवेक को पता चलती है तो वह गांव लौटता है। उसके साथ उसकी गर्लफ्रेंड रिया भी आ जाती है। दोनों मिलकर एक युक्ति सोचते हैं। 'वह ताज' इसी युक्ति की फिल्म है।
इस युक्ति के तहत दोनों होशियारी से कागजात जमा करते हैं और ताजमहल पर दावा ठोक देते हैं। वे महाराष्ट्र के तुकाराम और सुनंदा बन जाते हैं। अपने साथ एक लड़की को बेटी बना कर ले आते हैं। विवेक का दावा है कि उसके दादा के परदादा के परदादा की यह ज़मीन है। मुग़ल बादशाह शाहजहांं ने उसे हथिया लिया था। मामला कोर्ट में पहुंचता है। वहां विवेक के जमा किए कागजातों को गलत साबित करना संभव नहीं होता। ताजमहल के दर्शन पर स्टे आ जाता है। यह बड़ी ख़बर बन जाती है। फिर सेंटर और स्टेट की राजनीति आरम्भ होती है। स्टेट में विरोधी पार्टी पहले से सक्रिय है। उसके नेता विवेक की मदद कर रहे हैं। मुश्किल में फंसती सरकार विवेक उर्फ़ तुकाराम को देश में कहीं भी ज़मीन देने का वादा कर बैठती है।
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Thursday, September 22, 2016

फिल्‍म समीक्षा : पार्च्‍ड



फिल्‍म रिव्‍यू
अनगिन औरतों में से तीन
पार्च्‍ड
-अजय ब्रह्मात्‍मज
एक साल से भिन्‍न देशों और फिल्‍म फेस्टिवल में दिखाई जा रही लीना यादव की पार्च्‍ड अब भारत में रिलीज हुई है। शब्‍द और तीन पत्‍ती का निर्देशन कर चुकी लीना यादव की यह तीसरी फिल्‍म है। इस फिल्‍म में बतौर फिल्‍मकार वह अपने सिग्‍नेचर के साथ मौजूद हैं। सृजन के हर क्षेत्र में कते रहते हैं। लीना यादव ने तन,मन और धन से अपनी मर्जी की फिल्‍म निर्देशित की है और यह फिल्‍म खूबसूरत होने के साथ यथार्थ के करीब है।
पार्च्‍ड के लिए हिंदी शब्‍द सूखा और झुलसा हो सकता है। राजस्‍थान के एक गांव की तीन औरतों की सूखी और झुलसी जिंदगी की यह कहानी उनके आंतरिक भाव के साथ सामाजिक व्‍यवस्‍था का भी चित्रण करती है। 21 वीं सदी में पहुंच चुके देश में कई समाज और गांव आज भी सदियों पीछे जी रहे हैं। उनके हाथों में मोबाइल आ गया है। टीवी और डिश एंटेना आ रहा है,लेकिन पिछड़ी सोच की जकड़न खत्‍म नहीं हो रही है। पुरुषों के कथित पौरुष ने परंपरा और नैतिकता का ऐसा जाल बिछा रखा है कि औरते लहूलुहान हो रही हैं। लीना यादव की पार्च्‍ड इसी पृष्‍ठभूमि में रानी,लज्‍जो और बिजली की मुश्किलों के बीच जानकी के माध्‍यम से उम्‍मीद जगाती है। पार्च्‍ड अपनी तकलीफों में उलझी औरतों की उदास कहानी नहीं है। हम देखते हैं कि औरतें उनके बीच ही उत्‍सव के मौके निकाल लेती हैं। जी लेती हैं।
रानी की शादी 15 की उम्र में हो गई। वह कम उम्र में विधवा हो गई। उसने अपने बेटे गुलाब को पाला और उसकी शादी की। गांव-समाज के लिए वह आदर्श औरत है। उसे अपने शरीर और उसकी जरूरतों का खयाल ही नहीं रहा। मोबाइल के जरिए उसे एक अदृश्‍य जांनिसार प्रेमी मिलता है तो वह स्‍फुरण महसूस करती है। उसके मन में प्रेम का संचार होता है। उसे अपने शरीर का एहसास होता है। किशोरावस्‍था से गृहस्‍थी के चक्‍कर में फंसी रानी खुद के लिए सोच पाती है। फिल्‍म में यह फीलिंग बनी रहती है कि उसकी जिंदगी का शाह रुख खान उसे मिल जाएगा। उसका अदृश्‍य प्रेमी खुद को शाह रुख खान ही कहता है। रानी अपनी कमसिन बहू को उसके प्रेमी के साथ भेज कर खुद की अतृप्‍त आकांक्षाएं पूरी करती है।
लज्‍जो बच्‍चा नहीं जन पा रही है। पति और समाज उसे बांझ मानता है। वह भी मानती है कि कमी उसके अंदर है। बाहर की हवा खा चुकी बिजली के संपर्क में आने के बाद उसे पता चलता है कि मर्दो में भी कमी हो सकती है। वे नपुंसक हो सकते हैं। इस जानकारी के बाद उठाया गया उसका कदम साहसिक है। वह मां बनती है। वह अपने शरीर को महसूस करती है। फिल्‍म में लज्‍जो बनी राधिका आप्‍टे ने हिंदी सिनेमा के लिहाज से बोल्‍ड सीन दिए हैं,जिन्‍हें लीना ने पूरी संवेदना और खूबसूरती से शूट किया है।
बिजली पार्च्‍ड की वह औरत है,जो दुनिया से बाखबर है। वह अपने शरीर का इस्‍तेमाल करती है। डांसर और सेक्‍स वर्कर के रूप में वह पुरुषों की यौन पिपासा शांत करती है। उसे तलाश है ऐसे पुरुष की,जो उसे लाड़-प्‍यार दे सके। वह रानी और लज्‍जों के जीवन की खिड़की भी बनती है। उन्‍हें उनके सपनों से मिलवाती है।
जानकी इस फिल्‍म में औरतों की उम्‍मीद है। शरीर और समाज का दंश भुगत रही सास रानी की मदद से ही वह उड़ान लेती है। अपने प्रेमी के साथ नए जीवन के लिए निकलती है।
लीना यादव ने इन चार औरतों के जरिए ग्रामीण इलाके की औरतों की सेक्‍सुअल आकांक्षाओं और भावनाओं को स्‍वर दिया है। स‍भ्‍यता के विकास में पिछड़ी दिख रही ये औरतें वास्‍तव में शहरी मध्‍यवर्गीय औरतों से अधिक आजाद और खुली है। वे खुद के लिए फैसले ले सकती हैं। फिल्‍म के ट्रीटमेंट में लीना यादव ने उनकी यातना और व्‍यथा को उत्‍साह और उत्‍सव में समाहित कर दिया है। तनिष्‍ठा चटर्जी,राधिका आप्‍टे,सुरवीन चावला और लहर खान ने अपने किरदारों को संजीदगी और ईमानदारी से पेश किया है।  
पिछले हफ्ते रिलीज हुई पिंक की तरह ही यह फिल्‍म भारतीय समाज में महिलाओं के एक अलग आयाम से परिचित कराती है। पिंक में बाहरी समाज था तो पार्च्‍ड में महिलाओं का स्‍व है। यह उनकी आंतरिक कथा है।
अवधि- 118 मिनट
***1/2 साढ़े तीन स्‍टार

दरअसल : टीवी पर आ रहे फिल्‍म कलाकार



-अजय ब्रह्मात्‍मज
देश-विदेश फिल्‍म कलाकार टीवी पर आ रहे हैं। वे टीवी के रिएलिटी,फिक्‍शन,टॉक और गेम शोज का हिस्‍सा बनते हैं। यह उनकी कमाई और क्रिएटिविटी का कारगर जरिया है। इससे उनकी दृश्‍यता(विजीबिलिटी) बनी रहती है। काम करने के पैसे मिलते हैं सो अलग। भारत में टीवी के पॉपुलर होने और सैटेलाइट चैनलों के आने के बाद टीवी शोज में फिल्‍म कलाकारों को लाने का चलन बढ़ा। कौन बनेगा करोड़पति के साथ अमिताभ बच्‍चन का टीवी पर आना सबसे उल्‍लेखनीय रहा। उसके बाद से तो तांता लग गया। सभी टीवी शोज करने लगे। फिर भी फिक्‍शन शोज में उनकी मौजूदगी कम रही। गौर करें तो भारत में फिल्‍म कलाकार अपनी पॉपुलैरिटी के दौरान टीवी का रुख नहीं करते हैं।
भारत में हाशिए पर आ चुके फिल्‍म कलाकार ही टीवी के फिक्‍शन शोज में आते हैं। पिछले दशकों में किरण कुमार हों या अभी शबाना आजमी। इन सभी को टीवी पर देखना अच्‍छा लगता है। बात तब गले से नीचे नहीं उतरती,जब वे टीवी पर अपनी मौजूदगी के लिए बेतुके तर्क देने लगते हैं। उन्‍हें अचानक टीवी सशक्‍त माध्‍यम लगने लगता है। उन्‍हें क्रिएटिविटी के लिए यह मीडियम जरूरी जान पड़ता है। सभी के अपने पक्ष और तर्क होते होते हैं। कोई भी यह नहीं कहता कि वे खाली थे,इसलिए टीवी पर काम कर रहे हैं। शबाना आजमी आजकल कुछ ऐसी ही बातें कर रही हैं। उनसे पूछा जाना चाहिए कि अपने उत्‍कर्ष के दिनों में क्रिएटिविटी के इस सशक्‍त माध्‍यम को क्‍यों नहीं अपनाया? तब भी तो टीवी शोज बन रहे थे। कंटेंट के लिहाज से वे आज से बेहतर ही थे। अनिल कपूर का 24 भी ऐसा ही एक उदाहरण है।
हां,न्रियंका चोपड़ा,निमरत कौर और इरफान खान अपने प्राइम और पॉपुलैरिटी के दाक्‍रान ही टीवी में भी काम कर रहे हैं,लेकिन ये सभी विदेशी टीवी शो को समय दे रहे हें। प्रियंका चोपड़ा क्‍वांटिको की वजह से देश-विदेश में मशहूर हो गई हैं। अगर इस कद और श्रेणी के कलाकार टीवी के चुनिंदा फिक्‍शन शोज में आएं तो भारतीय टीवी का स्‍वरूप बदले। भारतीय टीवी को अगले चरण में ले जाने के लिए ऐसी पहलकदमी की सख्‍त जरूरत है। अभी भारतीय टीवी सांप,नागिन,राक्षस आदि के जादू-टोटकों में उलझ कर रह गया है। हां,इसके साथ ही 24 जैसे स्‍लीक और बेहतरीन शो भी आ रहे हैं। जल्‍दी ही निखिल आडवाणी युद्ध के बंदी जेसा टीवी शो लेकर आएंगे। ऐसा नहीं है कि भारत में टैलेंट की कमी है। कमी है तो सोच की...हम संभावनाओं की तलाश में नहीं रहते। हर चैनल यथास्थिति बनाए रखना चाहता है।
भारतीय टीवी और फिल्‍म कलाकारों का एक नया रिश्‍ता कायम हुआ है। पिछले कुछ सालों में यह मजबूत और पॉपुलर हो गया है। आप देखते होंगे कि इन दिनों फिल्‍मों की रिलीज के समय उसके कलाकार टीवी शोज में दिखाई पड़ने लगते हैं। इसकी शुरूआत एकता कपूर ने की थी। धीरे-धीरे अब इसकी आदत बन गई है। फिल्‍म के निर्माता और उनके कलाकार परेशान रहते हैं कि रिलीज के समय सभी पाॅपुलर शोज में वे दिख जाएं। मालूम नहीं इससे उनके दर्शक बढ़ते हैं या नहीं? टीवी शोज को अवश्‍य फायदा होता है। उन्‍हें दर्शक मिलते हैं। विशेषज्ञ माने हैं कि परस्‍पर लाभ की वजह से यह रिश्‍ता दोनों पक्षों से निभाया जा रहा है। लेकिन कपिल शर्मा के शो में नामचीन कलाकारों को हास्‍यास्‍पद हरकतें करते देख कर दुख होता है कि फिल्‍मों के प्रमोशन के लिए उन्‍हें किस हद तक नीचे उतरना पड़ता है।
भारतीय संदर्भ में फिल्‍म स्‍टारों की लोकप्रियता का इस्‍तेमाल टीवी को करना चाहिए। उस पर चिंतन-मनन हो और कुछ नए फार्मेट पर विचार हो। अपने देश में फिल्‍मस्‍टारों की लोकप्रियता यूनिक है। उस यूनिकनेस को बचाते हुए शोज और प्रोग्राम सोचे जा सकते हैं।

उम्‍मीद अभी बाकी है - लीना यादव




-अजय ब्रह्मात्‍मज
2012 में लीना यादव आस्‍ट्रेलिया के एशिया पैसिफिक स्‍क्रीन अवार्ड की ज्‍यूरी के लिए चुनी गई थीं। वहां जाने के दो हफ्ते पहले उन्‍हें जानकारी मिली कि अवार्ड की संस्‍था ज्‍यूरी मेंबर रह चुके फिल्‍मकारों को नए प्रोजेक्‍ट के लिए फंड करती है। संयोग ऐसा रहा कि लीना यादव उन्‍हीं दिनों तनिष्‍ठा के साथ किसी फिल्‍म के बारे में सोच रही थीं। तनिष्‍ठा ने उन्‍हें जल की शूटिंग के दौरान के कुछ किस्‍से सुनाए। लीना ने महसूस केया कि उन किस्‍सों को लकर फिल्‍म बनाई जा सकती है। खास कर ग्रामीण इलाकों की महिलाओं ने जिस साफगोई और ईमानदारी से सेक्‍स की बातें की थीं,वह शहरी महिलाओं के बीच दुर्लभ है। लीना यादव की फिल्‍म पार्च्‍ड की शुरूआत यहीं से हुई।
फिल्‍म के पहले ही ड्राफ्ट के समय ही रिसर्च से लीना को लगा कि वह गांव की कहानियों में शहरों की बातें ही लिख रही हैं। उन्‍होंने द्वंद्व महसूस किया,आखिर क्‍या बात है कि सूचना और शिक्षा के बावजूद शहरी औरतें कुछ बोल नहीं पा रही हैं,जबकि ग्रामीण औरतें निस्‍संकोच बोल रही हैं?’ लीना ने अपनी स्क्रिप्‍ट देश-विदेश के दोस्‍तों को पढ़ने के लिए भेजी तो उन्‍हें कई ने मिलते-जुलते किस्‍से बताए और भेजे। लीना की समझ में आया कि यह यूनिवर्सल विषय है। फिल्‍म बनाने के बाद जब भिन्‍न देशों के फेस्टिवल और थिएटर में पार्च्‍ड दिखाई गई तो सभी ने सराहा।
लीना यादव की पार्च्‍ड हिंदी में बनी फिल्‍म है। पिछले साल सितंबर महीने में ही यह टोरंटो फिल्‍म फेस्टिवल में पहली बार दिखाई गई थी। यह भी एक विडंबना है कि पहले प्रदर्शन के साल भर के बाद यह फिल्‍म भारत में रिलीज हो रही है। लीना ने इसे वेस्‍टर्न  सहयोग से तैयार किया है। भारत के इस विषय की अनुगूंज इंटरनेशनल है1 शुरू में फंड और प्रोड्यूसर नहीं मिल रहे थे। उनके कैमरामैन पति असीम बजाज आगे आए। उन्‍होंने आश्‍वासन दिया कि तुम अपने मन की फिल्‍म बनाओ। मैं धन का इंतजाम करूंगा। उन्‍होंने अपनी जिंदगी का सबसे मुश्किल प्रोमिस किया मुझ से। असीम के दोस्‍त अजय देवगन साथ आए। उन्‍होंने ही प्रोजेक्‍ट का बीज धन दिया। उसके बाद बाकी प्रोड्यसर आए।
इस फिल्‍म में हालीवुड के मशहूर टेक्‍नीशिन जुड़े। कैमरा रसेल कारपेंटर ने संभाला। टायटेनिक जैसी फिल्‍में शूट कर चुके रसेल कारपेंटर की वजह से फिल्‍म का लुक बदल गया। फिल्‍म के एडीटर केविन टेंट हैं। साउंड डिजाइन के लिए पॉल एन जे आॅटोसन आए। इन तीनों की पहली फॉरेन और इंडियन फिल्‍म है पार्च्‍ड। विदेश में इस फिल्‍म की इतनी चर्चा रही कि टोरंटो फिल्‍म फस्टिवल ने प्रीमियर के लिए आमंत्रित किया। उसके बाद यह फिल्‍म फ्रांस,मेक्सिको,स्‍पेन आदि देशों में रिलीज होंकर सराही जा चुकी हैं। लीना को पार्च्‍ड बनाने के बाद लगता है कि अब सिग्‍नेचर मिल गया है। वह मानती हैं कि हिंदी सिनेमा के टिपिकल दर्शक उनकी फिल्‍मों के दर्शक नहीं हैं। उन्‍होंने पार्च्‍ड को कला फिल्‍मों की तरह नहीं पेश किया,लेकिन यह हिंदी की मसाला फिल्‍म नहीं है। इस फिल्‍म में उन्‍हें खुद को एक्‍सप्‍लोर करने का मौका मिला। यहां से उनकी नई जर्नी शुरू होगी।
पार्च्‍ड तीन औरतों की कहानी है। तनिष्‍ठा विधवा के किरदार में हैं। 15 साल की उम्र में विधवा हो चुकी उस औरत ने अपनी जिंदगी बेटे की परवरिश में समर्पित कर दी है। उसने अपनी जरूरतों को नजरअंदाज किया है। समाज उसे आदर्श औरत और मां मानता है। वह झूठी प्रतिष्‍ठा में अपना स्‍व खो चुकी है। राधिका आप्‍टे का बच्‍चा नहीं है। सभी को लगता है कि वह बांझ है। उसे अचानक पता चलता है कि मर्द भी नपुसक हो सकते हैं। सुरवीन चावला डांसर के रोल में हैं। वह टेंट में अश्‍लील गीतों पर अश्‍लील मुद्राओं के साथ नाचती है। सुरवीन के किरदार के जरिए हम ने देखा है कि जवानी और खूबसूरती बाहरी आकर्षण है। साथ ही समाज में वेश्‍या की भूमिका पर भी बात की है। समाज ने उसे क्रिएट किया और फिर गाली बना दी।
यह फिल्‍म औरत और सेक्‍स के सामाजिक और राजनीतिक कारणों काे भी छूती है। लीना के शब्‍दों में,इस फिल्‍म को दर्शक अपनी रुचि और परवरिश के अनुसार अलग-अलग तरीके से देखेंगे। मैंने औरतों को दया का पात्र नहीं बनाया है। मैंने औरतों के लिए उम्‍मीद रखी है। 

Wednesday, September 21, 2016

सीक्‍वेल हों गई जिंदगी - रितेश देशमुख




-अजय ब्रह्मात्‍मज
रितेश अभी कोई शूटिंग नहीं कर रहे हैं। उनकी दाढ़ी बढ़ रही है। खास आकार में बढ़ रही है। पूछने पर वह बताते हैं,छोड़ दी है। हां,एक शेप दे रहा हूं। मराठी में छत्रपति शिवाजी महाराज फिल्‍म करने वाला हूं1 उसका लुक टेस्‍ट चलता रहता है। अभी वह फिल्‍म लिखी जा रही है। उस फिल्‍म की स्क्रिप्‍ट पूरी होगी,तभी शूट पर जा सकते हैं। उसमें वीएफएक्‍स वगैरह भी रहेगा। यह मेरी पहली पीरियड फिल्‍म होगी।
रितेश देशमुख की बैंजो आ रही है। मराठी फिल्‍मों के निर्देशक रवि जाधव ने इसे निर्देशित किया है। फिल्‍म में लाल रंग मुखर है। रितेश वजह बताते हैं, फिल्‍म में पहले पानी का इस्‍तेमाल होना था। महाराष्‍ट्र में सूखे की वजह से उसे हम ने गुलाल में बदल दिया। पोस्‍टर और प्रोमो में गुलाल का वही लाल रंग दिख रहा है। बैंजो एक ऐसा इंस्‍ट्रुमेंट है कि उसकी धुन पर लोग थिरकने लगते हैं। उल्‍लास छा जाता है। त्‍योहारों और खुशी के मौकों पर यह बजाया जाता है। बैंजो बजाने वाले भी रंगीन और खुश मिजाज के होते हैं।
निर्देशक रवि जाधव के साथ रितेश देशमुख का पुराना संपर्क रहा है। दोनों मराठी हैं। इसके अलावा रवि जाधव ने रितेश देशुमख के निर्माण में बनी मराठी फिल्‍म बालक पालक का निर्देशन किया था। लंबे समय से दोनों साथ में काम करने के इच्‍छुक थे। बैंजो का संयोग बना तो रितेश राजी हो गए। रितेश कहते हैं, यह यूनिक स्‍टोरी है। हिंदी फिल्‍मों में मुझे ऐसा किरदार नहीं मिला है। और फिर रवि पर भरोसा है। वह मुझे समझते हैं। एक अंतराल के बाद आप मुझे कुछ अलग करते देखेंगे।
रितेश को अपनी कामेडी या सेक्‍स कामेडी फिल्‍मों का अफसोस नहीं है। वे स्‍वीकार करते हैं कि उनमें से कुछ अच्‍छी बनीं और कुछ दर्शकों को अधिक पसंद नहीं आईं। वे समझाते हैं, हमारी इंडस्‍ट्री में यह चलन है कि अगर कोई एक्‍टर किसी एक रोल में जंच जाता है तो उसे वैसे ही रोल मिलने लगते हैं। एक अजीब चक्र बन जाता है। सीक्‍वल आने लगते हैं। एक्‍टर उसी में बिजी हो जाता है। मेरी अनेक फिल्‍मों के दो-तीन सीक्‍वल बन चुके हैं। मेरा चालीस प्रतिशत करिआ तो सीक्‍वल में ही निकल गया है। कभी एक विलेन जैसी फिल्‍मों से राहत मिलती है। कभी लेई भारी आ जाती है। मैं बैंजो को भी वैसी ही अलग फिल्‍म के तौर पर देख रहा हूं।
बैंजो को लकर रितेश काफी उत्‍साहित हैं। वे अपने किरदार और फिल्‍म के बारे में बताते हैं, मेरे किरदार का नाम तराट है। तराट मतलब बेवड़ा...शराबी। वह एंग्री है। एटीट्यूड में रहता है। रंगीनमिजाज और म्‍यूजिकल है। मुझे पूरा भरोसा है कि यह पसंद आएगी,क्‍योंकि यह यूनिक है। ज्‍यादातर लोअर मिडिल क्‍लास से आए युवक ही बैंजो बजाते हैं। अभी तो बड़े स्‍केल पर बैंड ग्रुप बन गए हैं,जिमें बैंजो के साथ और भी इंस्‍ट्रुमेंट रहते हैं1 अभी फ्यूजन हो चुका है। पहले ज्‍यादातर गरीब तबके लोग ही बैंजो अपनाते और बजाते थे। इस फिलम की बात करें तो नरगिस फाखरी का किरदार बैंजो का एक म्‍यूजिकल पीस सुन कर ल्‍यूयार्क से मुंबई आती है। वह उसके बारे में पता करना चाहती है। यहां आने पर वह तराट से मिलती है। तराट उसे बता नहीं रहा कि वह म्‍यूजिकल पीस उसी का बजाया हुआ है। उसे लगता है कि बैंजो से इज्‍जत कम होती है1 पता चलना पर वह उसे छोड़ देगी। और फिर ड्रामा,दिक्‍कतें,मुंबई की जिंदगी आदि बहुत कुछ है। बैंजो स्‍ट्रीट म्‍यूजिसियन को आवाज देता है। उन्‍हें प्‍लेटफार्म देता है।
रवि जाधव मराठी संस्‍कृति और भाषा के जानकार है। क्‍या उनकी यह फिल्‍म हिंदी में मराठी फ्लेवर लेकर आएगी? रितेश स्‍पष्‍ट करते हैं, फिल्‍म की पृष्‍ठभूमि मुंबई की है। यहां का कास्‍मोपोलिटन मिजाज है। फिल्‍म में एक इमोशन है,जो चार लड़कों और एक लड़की के बीच की कहानी है। फ्लेवर तो रहेगा,लेकिन वह मराठी नहीं होकर मुंबइया होगा। मैं जल्‍दी ही निशिकांत कामथ के साथ मराठी फिल्‍म मावली आरंभ करूंगा। रितेश जोर देकर कहते हैं,मैं जिस इलाके से आता हूं,वहां की भाषा से खास लगाव है। मैं मराठी हूं। हिंदी के बाद मराठी में काम करने की इच्‍छा थी। वह भी किया। आगे भी करता रहूंगा। जहां की मेरी पैदाइश है,वहां का तो हक बनता है। मैं मराठी स्‍पेस को अच्‍छी तरह समझता हूं। मेरी पत्‍नी जेनिलिया ने मुझे इंस्‍पायर किया। उसने इतनी सारी भाषाओं में फिल्‍में की हैं।

सेंसर और फिल्‍म सर्टिफिकेशन




-अजय ब्रह्मात्‍मज

आजादी के पहले सभी फिल्‍मों को ब्रिटिश हुकूमत सेसर करती थी। मकसद यह रहता था कि अंगेजी राज के खिलाफ दर्शकों को भड़काने या लामबंद करने वाली फिल्‍मों और फिल्‍मों के हिस्‍सों को काट दिया जाए। सेंसर सुनते ही हमारे दिमाग में कैंची की छवि उभरती है। कैंची का काम काटना और कतरना है। आजादी के बाद भी सेंसर का यही मतलब बना रहा है। 1952 के सिनेमैटोग्राफ एक्‍ट के लागू होने के बाद उसे सीबीएफसी(सेंसर बोर्ड ऑफ फिल्‍म सर्टिफिकेशन) नाम दिया गया,जिसे हिंदी में केंद्रीय फिल्‍म प्रमाण बोर्ड लिख जाता है। इस बदलाव के बावजूद व्‍यवहार में सेंसर और सेंसर बोर्ड शब्‍द ही प्रचलित रहे। यहां तक फिल्‍म बिरादरी भी फिल्‍म प्रमाणन के लिए भेजे जा रहे प्रिंट और कॉपी पर सेंसर कॉपी ही लिखती है। हाल ही में उड़ता प्रजाब को लकर हुए विवाद में ज्‍यादातर खबरों में सेंसर ही सुनाई और दिखाई देता रहा। आम दर्शक और फिल्‍म बिरादरी के सदस्‍य भी यही मानते हैं कि सेंसर का मतलब फिल्‍मों में कांट-छांट होना है। ठीक जैसे कि फिल्‍म क्रिटिसिज्‍म का मतलब लोग फिल्‍म की कमियां खोजना मानते हैं।
सीबीएफसी का काम फिल्‍मों का सटिफिकेशन करना है। रिलीज से पहले निर्माता अपनी फिल्‍में सेंसर स्क्रिप्‍ट के साथ सीबीएफसी में जमा करते हैं। सीबीएफसी की कमिटी उसे देखती है और फिल्‍म के कटेंट के लिहाज से उसे यू,यूए या ए सर्टिफिकेट देती है। अगर फिल्‍में में एडल्‍ट कटेंट है तो उसे एक सफिकेट दिया जाता है। यूए सर्टिफिकेट उन फिल्‍मों को दिया जाता है,जिनमें एडल्‍ट कटेंट या हिंसा की मात्रा ज्‍यादा नहीं रहती। यूए का तात्‍पर्य है कि अभिभावकों के साथ बच्‍चे ऐसी फिल्‍में देख सकते हैं। कंटेंट की वजह से कभी-कभर कोईलि फिल्‍म प्रतिबंधित की जाती है। यू और यूए सटिर्फिकेट मिलने पर किसी निर्माता को दिक्‍कत नहीं होती। ए स‍र्टिफिकेट मिलने पर माना जाता है कि ऐसी फिल्‍मों के थिएटर दर्शक कम हो जाते हैं। ऐसी फिल्‍मों के सैटेलाइट प्राइस भी कम हाते हैं,क्‍योंकि उन्‍हें प्राइम टाइम पर टेलीकास्‍ट नहीं किया जा सकता। निर्माता चाहते हैं कि उनकी फिल्‍मों को ए सर्टिफिकेट न मिले। एउल्‍ट कंटेंट हाने पर भी उनकी कोशिश यूए सर्टिफिकेट लेने की रहती है। इस कोशिश में कदाचार की गुजाइश बनती है। सीबीएफसी के सदस्‍य सुझाव देते हैं कि अगर फलां दृश्‍य या संवाद हटा या बदल दिए जाएं तो उन्‍हें यूए सर्टिफिकेट दिया जा सकता है। ऐसी खबरें आती रही हैं कि सीबीएफसी के सदस्‍यों में से किसी ने निर्माता का फेवर किया और उसके एवज में कुछ पैसे बना लिए। पिछले एक सीबीएफसी अधिकारी का मामला कोर्ट में है।
केंद्रीय फिल्‍म प्रमाणन बोर्ड के अनुसार....
केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड सूचना और प्रसारण मंत्रालय के अंतर्गत एक संस्था है। यह संस्था चलचित्र अधिनियम 1952 के तहत जारी किये गए प्रावधानों के अनुसरण करते हुए फिल्मों के सार्वजनिक प्रदर्शन का नियंत्रण करता है।
केन्द्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड द्वारा फिल्मों को प्रमाणित करने के बाद ही भारत में उसका सार्वजनिक प्रदर्शन   कर सकते है।
बोर्ड में केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त अध्यक्ष एवं गैर-सरकारी सदस्यों को शामिल किया गया है। बोर्ड का मुख्यालय मुंबई में स्थित है और इसके नौ क्षेत्रीय कार्यालय है जो मुंबई, कोलकाता, चेन्नई, बैंगलूरतिरुवनंतपुरम, हैदराबादनई दिल्लीकटक और गुवहाटी में स्तिथ है।
 
क्षेत्रीय कार्यालयों में सलाहकार पैनलों की सहायता से फिल्मों का परीक्षण करते है। केंद्र सरकार द्वारा समाज के विविध स्तर के व्यक्तियों को समावेश करते हुए दो वर्ष की कालावधि के लिए इन पैनल सदस्यों का नामांकन करते है।

चलचित्र अधिनियम, 1952, चलचित्र (प्रमाणन) नियम,1983 तथा 5(ख) के तहत केन्द्र सरकार द्वारा जारी किए गए मार्गदर्शिका के  अनुसरण करते हुए प्रमाणन की कार्यवाही की जाती है।

फिल्मों को चार वर्गों के अन्तर्गत प्रमाणित करते है

यूअनिर्बन्धित सार्वजनिक प्रदर्शन
वयस्क दर्शकों के लिए निर्बन्धित
यूएअनिर्बन्धित सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए किन्तु  12 वर्ष से       
       
कम आयु के बालक/बालिका को माता-पिता के मार्गदर्शन के साथ फिल्म देखने की चेतावनी के साथ 
सीबीएफसी की कार्यप्रणाली जो भी हो,व्‍यावहारिक स्‍तर पर सीबीएफसी अपने वर्तमान अध्‍यक्ष पहलाज निहलानी के नेतृत्‍व में निरंतर बचकाने निर्देशों से अपनी अयोग्‍यता जाहिर कर रहा है। पिछले कुछ महीनों में सीबीएफसी के सुझाव और फैसले हास्‍यास्‍पद रहे हैं।अभिषेक चौबे की उड़ता पंजाब में टायटल और संवादों से पंजाब शब्‍द हटाने का निर्देश दिया गया। फिल्‍म के निर्माताओं में से एक अनुराग कश्‍यप ने सीबीएफसी के खिलाफ मुहिम छेड़ी। फिल्‍म इंडस्‍ट्री और आम दर्शकों से सपार्ट लिया। आखिरकार उन्‍हें कोर्ट ने राहत दी। वर्तमान अध्‍यक्ष अतिरिक्‍त सक्रियता दिखा रहे हैं। भारतीय संवेदना और संस्‍कारों के स्‍वघोषित पैरोकार बन गए हैं। अचानक वे शु‍द्धिकरण अभियान में लग गए हैं। उन्‍होंने स्‍वयं अश्‍लील और फूहड़ फिल्‍में बनायीं,लेकिन अभी वे भारतीय संस्‍कृति की संरक्षा के नाम पर ऊलजलूल फैसले सुना रहे हैं। तभी तो वार्नर ब्रदर्स ने विल फेरेल और केविन हार्ट की फिल्‍म गेट हार्ड को भारत में रिलीज नहीं करने का फैसला किया। लीना यादव की फिल्‍म पार्च्‍ड फांस समेत अनेक देशों में सराहना बटोर रही है। भारत में अभी तक उसका सर्टिफिकेशन नहीं हो सका है। आखिर हम किस दिशा में बढ़ रहे हैं ? जंगल बुक को इसलिए यूए दिया गया कि 3डी इफेक्‍ट के कारण यह फिल्‍म बच्‍चों को डरावनी लग सकती है। सच तो यह है कि बचपन से ही 3डी जैसी नई तकनीकों से वाकिफ दुनिया भर के बच्‍चे ऐसी फिल्‍मों का लुत्‍फ उठा रहे हैं। तमाशा और स्‍पेक्‍टर जैसी देशी-विदेशी फिल्‍मों के चुंबन और अंतरंग दृश्‍य काट दिए जाते हैं,जबकि ग्रेट ग्रैंड मस्‍ती जैसी फूहड़ और अश्‍लील फिल्‍में आसानी से प्रदर्शित हो जाती हैं।
सीबीएफसी का गठन स्‍वायत्‍त संस्‍था के तौर पर किया गया था,जो भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के अधीन कार्य करेगा। सरकार ने इसे अधीनस्‍थ संस्‍था मान लिया और हमेशा अध्‍यक्ष से लेकर सदस्‍यों तक की नियुक्ति में पसंद के व्‍यक्तियों को जिम्‍मेदार पदों पर बिठाती रही। नतीजा यह हुआ कि जिस स्‍वायत्‍त संथा को स्‍वतंत्र रूप से कार्य करना था,वह निरंतर सत्‍ता के प्रभाव में रही। पहले अध्‍यक्ष के पद पर योग्‍य व्‍यक्तियों का चुनाव होता रहा,जो कम से कम स्‍वविवेक से सिनेमैटोग्राफ एक्‍ट 1952 का पालन करते हुए भी फिल्‍मकारों के प्रयोग को प्रदर्शन के योग्‍य मानते थे। पहलाज निहलानी की नियुक्ति के पहले सीबीएफसी ने अनेक साहसी फैसले लिए और फिल्‍मकारों की अभिव्‍यक्ति के लिए अड़चन नहीं बने। अभी स्थिति यह है फिल्‍मकार स्क्रिप्‍ट के स्‍तर पर ही कटाई-छंटाई करने लगते हैं।
सीबीएफसी में पारदर्शिता कम हो गई है। आए दिन फिल्‍मकारों और सीबीएफसी के बीच विवाद चल रहा है। वर्तमान अध्‍यक्ष की मनमानी से फिल्‍मकारों की परेशानी बढ़ गई है। इसके लिए फिल्‍मकार और फिल्‍म बिरादरी भी जिम्‍मेदार है। उन्‍होंने कभी सरकार पर दबाव नहीं डाला कि सीबीएफसी में पारदर्शी व्‍यवस्‍था लागू हो।
पिछले दिनों श्‍याम बेनेगल के नेतृत्‍व में सीबीएफसी की कार्यप्रणाली में आवश्‍यक सुधारों के लिए एक समिति गठित की गई थी। इस समिति ने अपनी रिपोर्ट पेश कर दी है। ऐसा माना जा रहा है कि सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय शीघ्र ही इसे लागू करेगा। इसके बाद फिल्‍मकारों की फिल्‍म प्रमाणन संबंधी परेशानियां कम हो सकती हैं। असल सवाल निमों-अधिनियमों से अधिक उस सोच का है,जिसके अंतर्गत क्रिएटिव क्षेत्र में संभावनाओं की ऊंची उड़ान संभव होती है। अगर पंख कतरने की मंशा रहेगी तो किसी उदात्‍त और उदार नियम में भी छेद किए जा सकते हैं। फिल्‍मकारों और सामाजिक चिंतकों का एक तबका मानता है कि किसी प्रकार की सेंसरशिप होनी ही नहीं चाहिए। भारत जैसे अर्द्धशिक्षित देश में अभी ऐसी आजादी देने पर अराजकता फैल सकती है। बेहतर है कि श्‍याम बेनेगल की समिति के सुझावों को जल्‍दी से जल्‍दी अमल में लाया जाए। उन्‍होंने फिल्‍म प्रमाणन की अतिरिक्‍त श्रेणियों के भी सुझाव दिए हैं।