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Saturday, January 14, 2017

फिल्‍म समीक्षा : ओके जानू

फिल्‍म रिव्‍यू
ओके जानू
-अजय ब्रह्मात्‍मज
शाद अली तमिल के मशहूर निर्देशक मणि रत्‍नम के सहायक और शागिर्द हैं। इन दिनों उस्‍ताद और शाग्रिर्द की ऐसी जोड़ी कमू दिखाई देती है। शाइ अली अपने उस्‍ताद की फिल्‍मों और शैली से अभिभूत रहते हैं। उन्‍होंने निर्देशन की शुरूआत मणि रत्‍नम की ही तमिल फिल्‍म के रीमेक साथिया से की थी। साथिया में गुलजार का भी यागदान था। इस बार फिर से शाद अली ने अपने उस्‍ताद की फिल्‍म ओके कनमणि को हिंदी में ओके जानू शीर्षक से पेश किया है। इस बार भी गुलजार साथ हैं।
मूल फिल्‍म देख चुके समीक्षकों की राय में शाद अली ने कुछ भी अपनी तरफ से नहीं जोड़ा है। उन्‍होंने मणि रत्‍नम की दृश्‍य संरचना का अनुपालन किया है। हिंदी रीमेक में कलाकार अलग हैं,लोकेशन में थोड़ी भिन्‍नता है,लेकिन सिचुएशन और इमोशन वही हैं। यों समझें कि एक ही नाटक का मंचन अलग स्‍टेज और सुविधाओं के साथ अलग कलाकारों ने किया है। कलाकरों की अपनी क्षमता से दृश्‍य कमजोर और प्रभावशाली हुए हैं। कई बार सधे निर्देशक साधारण कलाकारों से भी बेहतर अभिनय निकाल लेते हैं। उनकी स्क्रिप्‍ट कलाकारों को गा्रे करने का मौका देती है। ओके जानू में ऐसा ही हुआ है। समान एक्‍सप्रेशन से ग्रस्‍त आदित्‍य राय कपूर पहली बार कुछ खुलते और निखरते नजर आए हैं। हां,श्रद्धा कपूर में उल्‍लेखनीय ग्रोथ है। वह तारा की गुत्थियों और दुविधाओं को अच्‍छी तरह व्‍यक्‍त करती है। चेहरा फोकस में हो तो उतरते,बदलते और चढ़ते हर भाव को कैमरा कैद करता है। कलाकार की तीव्रता और प्रवीणता पकड़ में आ जाती है। श्रद्धा कपूर ऐसे क्‍लोज अप दृश्‍यों में संवाद और भावों को अच्‍दी तरह व्‍यक्‍त करती हैं। युवा कलाकारों को संवाद अदायगी पर काम करने की जरूरत है। इसी फिल्‍म में गोपी का किरदार निभा रहे नसीरूद्दीन शाह मामूली और रुटीन दृश्‍यों में भी बगैर मेलोड्रामा के दर्द पैदा करने में सफल रहे हैं। यह उनकी आवाज और संवाद अदायगी का असर है। यहां तक कि लीला सैमसन अपने किरदार को भी ऐसे ही गुणों से प्रभावशाली बनाती हैं।
फिलम की कहानी आज के युवा किरदारों के आग्रह और भ्रम पर केंद्रित है। तारा और आदि आज के युवा ब्रिगेड के प्रतिनिधि हैं। दोनों महात्‍वाकांक्षी हैं और जीवन में समृद्धि चाहते हैं। तारा आर्किटेक्‍अ की आगे की पढ़ाई के लिए पेरिस जाना चाहती है। आदि का ध्‍येय वीडियो गेम रचने में लगता है। वह अमेरिका को आजमाना चाहता है। आदि उसी क्रम में मुंबई आता है। वह ट्रेन से आया है। दोनों उत्‍तर भारतीय हैं। तारा समृद्ध परिवार की लड़की है। आदि मिडिल क्‍लस का है। फिल्‍म में यह गौरतलब है कि आदि को वहडयो गेम का सपना आता है तो निर्देश और सड़कों के दोनों किनारों की दुकानों के साइन बोर्ड हिंदी में लिखे हैं,लेकिन जब वह वीडियो गेम बनाता है तो सब कुछ अंग्रेजी में हो जाता है। शाद अली ने बारीकी से उत्‍तर भारतीय के भाषायी अवरोध और प्रगति को दिखाया है। बहरहाल, इस फिल्‍म में भी दूसरी हिंदी फिल्‍मों की तरह पहली नजर में ही लड़की लड़के को आकर्षित करती है और फिर प्रेम हो जाता है।
ओके जानू प्रेम और करिअर के दोराहे पर खड़ी युवा पीढ़ी के असमंजस बयान करती है। साहचर्य और प्‍यार के बावजूद शादी करने के बजाय लिव इन रिलेशन में रहने के फैसले में कहीं न कहीं कमिटमेंट और शादी की झंझटों की दिक्‍कत के साथ ही कानूनी दांवपेंच से बचने की कामना रहती है। हम लिव इन रिलेशन में रहने और अलग हो गए विख्यात प्रेमियों को देख रहे हैं। उनकी जिंदगी में तलाक की तकलीफ और देनदारी नहीं है। खास कर लड़के ऐसे दबाव से मुक्‍त रहते हैं। आदि और तारा दोनों ही स्‍पष्‍ट हैं कि वे अपने ध्‍येय में संबंध को आड़े नहीं आने देंगे। ऐसा हो नहीं पाता। साथ रहते-रहते उन्‍हें एहसास ही नहीं रहता कि वे कब एक-दूसरे के प्रति कमिटेड हो जाते हैं। उनके सामने गोपी और चारू का साक्ष्‍य भी है। उन दोनों की परस्‍पर निर्भरता और प्रेम आदि और तारा के लिए प्रेरक का काम करते हैं।
अपनी प्रगतिशीलता के बावजूद हम अपनी रूढि़यों से बच नहीं पाते। इसी फिल्‍म में गोपी तारा से पूछते हैं कि वह करिअर और प्‍यार में किसे चुनेगी? यही सवाल आदि से भी तो पूछा जा सकता है। दरअसल, हम लड्कियों के लिए प्‍यार और करिअर की दुविधा खड़ी करते हैं। ओके जानू ऐसे कई प्रसंगों की वजह से सोच और अप्रोच में आधुनिक होने के बावजूद रूढि़यों का पालन करती है।
अवधि- 135 मिनट
तीन स्‍टार 

Friday, January 13, 2017

फिल्‍म समीक्षा : हरामखोर



फिल्‍म रिव्‍यू
हरामखोर
-अजय ब्रह्मात्‍मज

ऐसी नहीं होती हैं हिंदी फिल्‍में। श्‍लोक शर्मा की हरामखोर को किसी प्रचलित श्रेणी में डाल पाना मुश्किल है। हिंदी फिल्‍मों में हो रहे साहसी प्रयोगों का एक नमूना है हरामखोर। यही वजह है कि यह फिल्‍म फेस्टिवलों में सराहना पाने के बावजूद केंद्रीय फिल्‍म प्रमाणन बोर्ड(सीबीएफसी) में लंबे समय तक अटकी रही। हम 2014 के बाद फिल्‍मों के कंटेंट के मामले में अधिक सकुंचित और संकीर्ण हुए हैं। क्‍यों और कैसे? यह अलग चर्चा का विषय है। हरामखोर सीबीएफसी की वजह से देर से रिलीज हो सकी। इस बीच फिल्‍म के सभी कलकारों की उम्र बढ़ी और उनकी दूसरी फिल्‍में आ गईं। नवाजुद्दीन सिद्दीकी और श्‍वेता त्रिपाठी दोनों ही हरामखोर के समय अपेक्षाकृत नए कलाकार थे। यह फिल्‍म देखते हुए कुछ दर्शकों को उनके अभिनय का कच्‍चापन अजीब लग सकता है। हालांकि इस फिल्‍म कि हसाब से वही उनकी खूबसूरती और प्रभाव है,लेकिन नियमित दर्शकों को दिक्‍कत और परेशानी होगी। 20-25 सालों के बाद फिल्‍म अधेताओं को याद भी नहीं रहेगा कि यह मसान और बजरंगी भाईजानरमन राघव2.0 के पहले बन चुकी थी।
बहरहाल,हरामखोर एक कस्‍बे में पिता के साथ पल रही एकाकी किशोरी संध्‍या की कहानी है। इस फिल्‍म को उसकी नजर से देखें तो शाम के करीब आती संध्‍या स्‍वाभाविक लगेगी। टीचर शाम से मिल रही तवज्‍जो से उसे सुकून मिलता है। वह पिटने और दुत्‍कारे जाने के बावजूद टीचर शाम के प्रति आकर्षित रहती है। टीचर शाम की पृष्‍ठभूमि के मद्देनजर उसके व्‍यक्त्त्वि का श्‍याम पक्ष अस्‍वाभाविक नहीं लगता। देखें तो इस फिल्‍म के सभी किरदार किसी न किसी कमी और वंचना के शिकार हैं। वे सभी हरामखोर हैं। संध्‍या के साथ टयूशन पढ़ रहे कमल और मिंटू का संध्‍या के प्रति आकर्षण और प्रेम किशोर उम्र की उच्‍छृंखलता है। श्‍लोक शर्मा बगैर किसी आग्रह के उनके बीच पहुंच जाते हैं और उनकी गतिविधियों को कहानी में पिरोते हैं। उन्‍होंने अपने किरदारों को तराशा और छांटा नहीं है।
श्‍वेता त्रिपाठी और नावाजुद्दी सिद्दीकी के अभिनय का कच्‍चापन और अनगढ़पन ही इस फिल्‍म की विशेषता है।  कमल और मिंटू की भूमिका में मास्‍टर इरफान खान और मोहम्‍मद समद की सहजता अच्‍छी लगती है। श्‍लोक शर्मा और उनकी तकनीकी टीम ने फिल्‍म को सजाने की कोशिश भी नहीं की है। फिल्‍म का लोकेशन कहानी को विश्‍वसनीय बनाता है। सीमित बजट और संसाधनों में उन्‍होंने हरामखोर को मुमकिन किया है। निश्चित ही हमें श्‍लोक शर्मा के साहस और युक्ति की तारीफ करनी होगी। उनके निर्माताओं और निर्माण सहयोगियों को बधाई देनी होगी कि उन्‍होंने फिल्‍म में ईमानदारी बरती और उसके प्रदर्शन में विश्‍वास रखा।
अवधि- 94 मिनट
ढाई स्‍टार
   

दरअसल : इंतजार है ईमानदार जीवनियों का



दरअसल...
इंतजार है ईमानदार जीवनियों का
-अजय ब्रह्मात्‍मज
इस महीने ऋषि कपूर और करण जौहर की जीवनियां प्रकाशित होंगी। यों दोनों फिल्‍मी हस्तियों की जीवनियां आत्‍मकथा के रूप में लाई जा रही हैं। उन्‍होंने पत्रकारों की मदद से अपने जीवन की घटनाओं और प्रसंगों का इतिवृत पुस्‍तक में समेटा है। मालूम नहीं आलोचक इन्‍हें जीवनी या आत्‍मकथा मानेंगे? साहित्यिक विधाओं के मुताबिक अगर किसी के जीवन के बारे में कोई और लिखे तो उसे जीवनी कहते हैं। हां,अगर व्‍यक्ति स्‍वयं लिखता है तो उसे आत्‍मकथा कहेंगे। देव आनंद(रोमासिंग विद लाइफ) और नसीरूद्दीन शाह(एंड देन वन डे: अ मेम्‍वॉयर) ने आत्‍मकथाएं लिखी हैं। दिलीप कुमार की द सब्‍सटांस ऐंड द शैडो : ऐन ऑटोबॉयोग्राफी आत्‍मकथा के रूप में घोषित और प्रचारित होने के बावजूद आत्‍मकथा नहीं कही जा सकती। यह जीवनी ही है,जिसे उदय तारा नायर ने लिखा है। इसी लिहाज से ऋषि कपूर और करण जौहर की पुस्‍तकें मुझे जीवनी का आभास दे रही है।
हिंदी फिल्‍मों के स्‍टार और फिल्‍मकार अपने जीवन प्रसंगों के बारे में खुल कर बातें नहीं करते। नियमित इंटरव्‍यू में उनके जवाब रिलीज हो रही फिल्‍म तक सीमित रहते हैं। इन दिनों तो फिल्‍म स्‍टारों के इंटरव्‍यू में उनके पीआर और मैनेजर पहले ही हिदायत दे देते हैं कि सवाल फिल्‍म या इवेंट से ही संबंधित हो। अब तो वे खुद इंटरव्‍यू के दौरान बैठे रहते हैं। अगर कभी स्‍टार जवाब देने में बह जाए तो वे आंखें तरेरने लगते हैं। उनका दबाव और हस्‍तक्षेप इतना बढ़ गया है कि वे कई बार पत्रकार और स्‍टार तक को सवाल व जवाब से रोक देते हैं। ऐसी स्थिति में हर बातचीत यांत्रिक और लगभग एक जैसी होती है। इसमें एक और रोचक समस्‍या सन्निहित है। हम पत्रकार जब किसी नई फिल्‍म के बारे में बातचीत करने जाते हैं तो एकत्रित सूचनाओं के आधार पर सवाल करते हैं। कोशिश रहती है कि फिल्‍म और फिल्‍म बनाने की प्रक्रिया पर जानकारियां मिलें। स्‍टार और डायरेक्‍टर की पूरी कोशिश यह र‍हती है कि वे फिल्‍म के बारे में कुछ भी नहीं पता चलने दें। सवाल-जवाब की इस लुकाछिपी की वजह से इन दिनों जीवन शैली,परिधान और उनकी यात्राओं से संबंधित बातें ही हो पाती हैं। अपने यहा फिल्‍म स्‍टार कुछ भी बोलने में हिचकने के साथ डरते भी हैं। हम ने देखा कि असहिष्‍णुता के मामले में अपना पक्ष रखने के नतीजे आमिर खान और शाह रूख खान ने भुगते। हम कल्‍पना नहीं कर सकते कि हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री की कोई हस्‍ती मेरिल स्ट्रिप की तरह देश के सर्वोच्‍च पद पर बैठी हस्‍ती पर सवाल करे।
तात्‍पर्य यह कि अभिव्‍यक्ति के इस संकोच की वजह से जीवनी और आत्‍मकथाएं रोचक नहीं हो पातीं। उन्‍हें पढ़ते हुए कोई नई जानकारी नहीं मिलती। कई बार तो यह भी लगता है कि फिल्‍मी हस्‍तियों की तरफ से तथ्‍यों की लीपापोती की जा रही है। जैसे वे पर्दे पर आने के पहले मेकअप कर लेते हैं,वैसे ही पन्‍नों पर आने के पहले बातों को डिजाइन और मेकअप से पोत देते हैं। करण जौहर की फिल्‍मों और जीवनशैली में जिंदगी की सच्‍चाइयों की झलक भी डिजाइन की जाती है। उनके शो और इवेंट स्क्रिप्‍टेड होते हैं। मुझे उनकी जीवनी में उनकी जिंदगी की सच्‍चाई की कम उम्‍मीद है। वे सेक्‍सुअलिटी के मामले को दबे-ढके तरीके से ही उजागर करेंगे। हां,ऋषि कपूर की जीवनी रोचक हो सकती है। उन्‍होंने ट्वीट किया है कि यह दिल से लिखी मेरी जिंदगी और घड़ी है...जैसा मैंने जिया। अगर वे वादे और पुस्‍तक के शीर्षक के मुताबिक खुल्‍लमखुल्‍ला कुछ कह पाते हैं तो बढि़या।

बाक्‍स आफिस
कलेक्‍शन के अखाड़े में दंगल विजेता
हिंदी फिल्‍मों में 100 करोड़ क्‍लब कलेक्‍शन और कमाई का पहला क्‍वालिफाइंग कदम बन चुका है। इसके बाद ही किसी फिल्‍म को सफल माना जाता है। ज्‍यादा सफल फिल्‍में 200-300 करोड़ तक पहुंचती हैं। कुछ फिल्‍मों ने ही 300 करोड़ से अधिक का कलेक्‍शन किया है। दंगल हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री की पहली फिल्‍म है,जिसने 350 करोड़ से अधिक का कलेक्‍शन कर एक नया मानदंड स्‍थापित कर दिया है। इसने सिर्फ 19 दिनों में 353ण्‍68 करोड़ का कलेक्‍शन किया है। अब देखना है कि यह 375 से 400 करोड़ तक पहुंच पाती है कि नहीं?


Tuesday, January 10, 2017

हिंदी टाकीज 2(11) : आज नदी पार वाले गांव में पर्दा वाला सिनेमा लगेगा - जनार्दन पांडेय

परिचय
जनार्दन पांडेय एक आम सिनेमा दर्शक है। उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले में पला-बढ़ा। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में स्नातक करने के बाद हिन्दुस्तान हिन्दी दैनिक से जुड़ा। उसके बाद अमर उजाला डॉट कॉम से जुड़ा। वहां तीन साल काम करने के बाद अब अपनी वेबसाइट www.khabarbattu.com में कार्यरत।
 

सिनेमा में नशा है, जो मुझे चढ़ता है। जी होता है, एक के बाद एक तब देखता रहूं, जब तक दिमाग और आंखें जवाब न दे जाएं। लेकिन नशा तो आखिर में नशा है, बुरा ही माना जाएगा। चाहे किसी बात का हो। मम्मी ने पीट-पीट कर समझाया पर मैं समझा नहीं।

मेरा घर उत्तर प्रदेश के उस जिले में हैं जो यूपी को मध्य प्रदेश-झारखंड से जोड़ता है। मेरा गांव एक संपूर्ण गांव है। किसी एक के घर में कोई घटना-दुघर्टना होती है पूरे गांव के ‌लिए अगले 10 दिनों तक वही मुद्दा होता है।

राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम की मौत की खबर 6 दिन बाद पहुंचती है। पठानकोट में हमला हुआ तो छनते-छनते यह खबर दो-चार दिन बाद पहुंचती है। और इसके मायने यही निकाले जाते हैं कि पूछो 'राहुल के पापा ठीक हैं न वो भी बॉर्डर पर हैं'।

मुंबई में 26/11 हमले के छह साल बाद कोई मुंबई जाने के बारे में बात करे तो मां रुआसी हो जाएंगी। क्योंकि छह साल पहले वहीं हमला हुआ था। फिर से कोई बम गिरा दिया तो। हमले वहीं होते हैं।

खैर, गांव वाले बताते हैं कि गांव में पहली टीवी डैडी को दहेज में मिली थी। तब महाभारत देखने के लिए 200-300 लोग हमारे दलान में बैठते थे। लेकिन परिवार था, संयुक्त। डैडी-मम्मी की टीवी पर अधिकार बड़े पापा का।

'बुश' कंपनी की भारी-भरकम टीवी भी मेरे बड़े होने तक थमी नहीं। जिन दिनों मैं बड़ा हुआ मेरी टीवी मम्मी की एक पुरानी साड़ी में बांधकर कोठे पर रख दी गई थी।

इसलिए फिल्म देखने के लिए किसी चाचा-ताऊ, भइया के घर जाना पड़ता था। वे लोग मुझे बिल्कुल पसंद नहीं करते थे। वह कई तरह के इशारों में मुझे वहां चले जाने के लिए कहते थे। बाकी लड़कों की तरह मुझे भगा नहीं सकते थे क्योंकि पहले उन्होंने मेरी टीवी का खूब दोहन किया है।

दूसरा तरीका होता था वीडियो कास्टेड रिकॉर्डर (वीसीआर, तब तक सीडी नहीं आई थी मेरे गांव में), जो कि किसी की शादी-व्याह में ही आता। पर हमारा (गांव के 10-12 बच्चे) शादी-व्याह से कोई मतलब न होता बस मिठाई खाने के अलावा। हमारा सारा ध्यान करीब रात के 12 से शुरू हो जाने वाले वीसीआर पर टिका होता।

जिस दिन वीसीआर आने की उम्मीद होती, शाम पांच बजे से ही खबर तैर जाती। कौन-कौन सी फिल्में आनी हैं, इस पर जिक्र होने लगता- 'मिथुनवा क कउनो आई के नाही', अरे धरमेंदर की उ वाली आवती ह, जउने में अमरेश पूरिया क बीचवय में बरवा रहला ('लोहा' की बात हो रही है)। अजे देवगनवा क जिगर?
बढ़िया होंडा (छोटा जनरेटर, वहां लाइट कुछ-कुछ घंटों के लिए आती है इसलिए), बड़े-बड़े वीसीआर के कैसेट एक भारी सी टीवी और उसमें दिखने वाली फिल्में- बैरी कंगना, घर द्वार, आज का अर्जुन, दिल जले, विजय पथ और सुल्तान-चांडाल-जस्टिस चौधरी आदि में से कोई न कोई एक मिथुन चक्रवर्ती की फिल्म।

एकदम मजा आ जाता था। कितनी ही बार ऐसा हुआ कि मैं शाम को छह बजे ही अपने घर से भाग लिया। दरअसल, घर से भागना पड़ता था, जो मेरी मम्मी को नागवार था।

घर का बड़ा लड़का होने के नाते और जिस वक्त फिल्म का नशा पकड़ना शुरू हुआ, उसी वक्त घर में अलगौजी (बंटवारा) होने के चलते छोटे भाई-बहनों को संभालने घर के छोटे काम भी मेरे जिम्मे ही आ गए।

शाम को मम्मी को घर-बासन (खाना बनाना, बर्तन धुलना, रसोई घर की पोताई करना) करना होता था। छुटकवे इसमें परेशानी डालते थे। बच्चों को खिलाने में मेरी डैडी की कोई दिलचस्पी थी नहीं। इसलिए मम्मी किसी-किसी दिन, रातभर रोमांचक वीसीआर देखने के बाद सुबह-सुबह रोमांचक डंडे से स्वागत भी करती थी।

वीसीआर के अलावा दूसरा साधन डीडी 1 पर शुक्रवार रात 9:30 आने वाली फिल्म। कितनी शिद्दत से हम भगवान से मनाते थे कि लाइट न कटे भगवान। फिर क्या छोटे चच्चा के यहां मस्त 50 लोगों की भीड़ में बैठकर 10 मिनट फिल्म 15 प्रचार तब देखा जाता था जब हीरो बढ़िया से हरामी (खलनायक) का कचूमर न निकाल दे। इनमें- जिद्दी, अर्जुन पंडित, इलाका, जंग, बुलंदी, अनाड़ी, राजा हिन्दुस्तानी आदि थीं।

मुझे ऐसी फिल्में बिल्कुल नहीं पसंद थी जो ज्यादातर रविवार शाम चार बजे शुरू होती थीं। उनमें बहुत उलझी हुई फिल्में आती थीं। समझ नहीं आता था हीरो-हीरोइन चाहते क्या हैं। हरामी (खलनायक) भी दूसरे किस्म के होते थे। और हीरो कुछ नहीं कर पाता था। आखिर में मर ऊपर से जाता था, बगैर मतलब।
नहीं कि किसी को मार के मरे। खुद ही खुद को मार ले रहा है। ऐसे में हम लोग क्रिकेट खेलने चले जाते थे। वो फिल्में थीं- रोजा, दिल से, रेनकोट, एक दूजे के लिए आदि।।।

कुछ सालों बाद सीडी (प्लेयर और सतरंगी गोले कैसेट, बेहद पेचीदा रिमोर्ट- जिस बच्चे को चलाने आ जाए, पूछ‌िए मत उसकी कितनी खातिरदारी होगी) आई। तब छोटी जातियों की शादी में सिनेमा दिखने लगा। और मेरे सारे दास्तों से अलगाव हो गया। क्योंकि बभनाने (बड़ी ‌‌बिरादरी) घरों के बच्चे छोटी जाति के दरवाजे पर जाकर नीचे बैठकर फिल्म कैसे देखेगा।

लेकिन मुझे मंजूर था। इसमें मेरी खूब छीछालेदर हुई। कितने ही बार डैडी आकर मुझे खाना पहुंचा जाते थे। उन्हें डर था कि कहीं लड़कवा वहां खाना न खा ले।
‌और जिस किसी दिन यह चर्चा हो जाए कि आज फलाने जगह पर्दा वाला सिनेमा लगेगा (गांव में आकर दो बांस गाड़ के उनमें पर्दा लगाकर बड़ी स्क्रिन तैयार के सिनेमा दिखाया जाता था) तो मैं आस-पड़ोस के 6-8 किलो मीटर जाने के लिए तैयार रहता।

इसके चक्कर में कई बार नदी डाकना पड़ा। रात को 10-10 बजे। गांव कहते उसमें भूत हैं। लेकिन फिल्म के भूत के आगे मुझे कोई और भूत नजर नहीं आता। एक दो बार तो जमकर भींगते हुए मैं छह किलो मीटर दूर पर्दा वाला सिनेमा देखने पहुंच गया।

रात भर कांपते हुए फिल्म देखा सुबह 104 डिग्री फारेनहाइट बुखार चढ़ाकर आ गया। फिर मम्मी गईं बनवारी (गांव के इकलौते डॉक्टर- छोलाछाप आप कह सकते हैं, हम नहीं) को बुलाकर लाईं। सिनेमा के चक्कर में बनवारी तीन सुई ठोंक दी। दोनों हाथों और एक कमर में।

दवाई भी बनवारी एक टाइम में कम से कम 8 गोली। क्या मजाल थी बुखार के बाद आपके मुंह पर फफोले न पड़ें। बावजूद इन सब के मैंने एक ऐसा पर्दा वाला सिनेमा नहीं छोड़ा, जो मेरे गांव के 6-8 किलोमीटर की परिधि में हो हुआ।

हमारी सबसे नजदीकी बाजार करीब 10 किलोमीटर दूर है। वहां तब दो सिनेमाघर थे- राज पैलेस और पुराना टाकीज। नौंवी से पहले तक मेरी वहां तक पहुंच ही नहीं थी।

बाजार ले जाने वाला कोई था ही नहीं। विजय दशमी को रावण जलते देखने जाते भी थे तो फिल्म कौन दिखाए, छोला-समोसा, पान खिलाकर लौटा लाते थे। जब नौवीं में रॉबर्ट्सगंज नाम लिखवाया, तब शहर में यहां-वहां लगे फिल्मों के पोस्‍टर बहुत बुलाते थे।

गांव में भागकर फिल्में देखने तक तो ठीक था। अगर बाजार में किसी ने सिनेमा हॉल में फिल्म देखते देख लिया तो घर से तो मुझे निकाल ही दिया जाता। फिर किसी एक साथ 10 रुपये पॉकेट मनी भी नहीं मिलती थी कि जाकर फिल्म देखे आओ।

यही करते-करते जब मैं 10वीं में 1 नंबर से (फेल 11 नंबर से हुआ था पर 10 नंबर ग्रेस मिला करता था, इसलिए मैं मानता हूं कि 1 नंबर से फेल हुआ) फेल हो गया तो रिजल्ट देखने के बाद सीधे सिनेमाघर में गया।

जाकर एक के बाद एक 3 फिल्में देखीं। पता नहीं क्यों?
 

Friday, January 6, 2017

दरअसल : स्‍वागत 2017,अलविदा 2016



दरअसल...
स्‍वागत 2017,अलविदा 2016
-अजय ब्रह्मात्‍मज
2016 समाप्‍त होते-होते नीतेश तिवारी की दंगल ने हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री पर छाए शनि को मंगल में बदल दिया। इस फिल्‍म के अपेक्षित कारोबार से सभी खुश हैं। माना जा रहा है कि दंगल का कारोबार पिछले सारे रिकार्ड को तोड़ कर एक नया रिकार्ड स्‍थापित करेगा। दंगल की कामयाबी दरअसल उस ईमानदारी की स्‍वीकृति है,जो आमिर खान और उनकी टीम ने बरती। कभी सोच कर देखें कि कैसे एक निर्देशक,स्‍टार और फिल्‍म के निर्माता मिल कर एक ख्‍वाब सोचते हैं और सालों उसमें विश्‍वास बनाए रखते हैं। दंगल के निर्माण में दो साल से अधिक समय लगे। आमिर खान ने किरदार के मुताबिक वजन बढ़ाया और घटाया। हमेशा की तरह वे अपने किरदार के साथ फिल्‍म निर्माण के दौरान जीते रहे। उनके इस समर्पण का असर फिल्‍म यूनिट के दूसरे सदस्‍यों के लिए प्रेरक रहा। नतीजा सभी के सामने है।
दंगल साल के अंत में आई बेहतरीन फिल्‍म रही। इसके साथ 2016 की कुछ और फिल्‍मों का भी उल्‍लेख जरूरी है। हर साल रिलीज हुई 100 से अधिक फिल्‍मों में से 10-12 फिल्‍में ऐसी निकल ही आती हैं,जिन्‍हें हम उस साल का हासिल कह सकते हैं। 2016 में हिंदी फिल्‍मों की वैरायटी बढ़ी है। युवा फिल्‍मकारों ने नए प्रयोग किए। उन्‍हें सराहना मिली। निश्चित ही फिल्‍म एक ऐसा कला व्‍यापार है,जिसमें मुनाफे की उम्‍मीद बनी रहती है। फिर भी उन प्रयासों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता,जिनसे हिंदी सिनमा को गहराई के साथ विस्‍तार मिलता है। ऐसी फिल्‍में युवा फिल्‍मकारों के प्रेरणा बनती हैं। फिल्‍म निर्माता भी भविष्‍य में ऐसी फिल्‍मों के लिए तैयार रहते हैं।
2016 की अपनी प्रिय फिल्‍मों में मैं जुगनी,जुबान,निल बटे सन्‍नाटा,पिंक,की एंड का,एयरलिफ्ट,लाल रंग,नीरजा,अलीगढ़,’’धनक,वेटिंग,उड़ता पंजाब ,फैन,मदारी,बुधिया सिंह-बॉर्न टू रन,रमन राघव 2.0,पिंक,एम एस धौनी-द अनटोल्‍ड स्‍टोरी,डियर जिंदगी और दंगल को शामिल करूंगा। हो सकता है कि इनमें से कुछ फिल्‍में आप सभी के शहरों के सिनेमाघरों में नहीं पहुंच सकी हों। प्रदर्शकों और वितराकों का तंत्र कुछ फिल्‍मों का कारोबार पहले ही तय कर देता है। उनके मैनेजर आउट ऑफ बाक्‍स फिल्‍मों को तरजीह नहीं देते,जबकि उनके हिसाब से हिट समझी जा रही फिल्‍में भी बाक्‍स आफिस पर औंधे मुंह गिरती हैं। बमुश्किल वे इन फिल्‍मों की रिलीज के लिए तैयार भी होते हैं तो उन्‍हें थिएटर में ऐसी शो टाइमिंग मिलती है कि दर्शक अपनी मर्जी से फिल्‍म नहीं देख पाते।
मैं तो कहूंगा कि इनमें से कुछ फिल्‍में आप ने नहीं देखी हों तो उन्‍हें देखने का इंतजाम करें। अभी तो रिलीज के बाद फिल्‍में देखने के इतने माध्‍यम उपलब्‍ध हैं। आप गौर करेंगे कि पिछले साल की उल्‍लेखनीय फिल्‍मों में से किसी का भी निर्देशक स्‍थापित नाम नहीं है। वे सभी नए हैं। वे देश की सच्‍ची कहानियं चुन रहे हैं। मेरी पसंद की फिल्‍मों में से पांच तो बॉयोपिक हैं। उनमें से एक धौनी के अलावा बाकी सभी नामालूम व्‍यक्तियों पर हैं। निर्देशकों ने उनकी साधारण जिंदगियों की असाधारण उपलब्धियों को खास परिप्रेक्ष्‍य दिया। सभी फिल्‍मकार अपनी सोच से कुछ खास कहना चाहते हैं। और भी एक बात गौर करने की है कि इन निर्देशकों में कोई भी फिल्‍म इंडस्‍ट्री से नहीं आया है। वे सभी आउटसाइडर हैं। अपनी क्रिएटिव क्षमता के बल पर वे पहचान बना रहे हैं। मैं पिछले दस सालों से यह दोहरा रहा हूं कि हिंदी फिल्‍मों को आउटसाइटर ही विस्‍तार दे रहे हैं। उनके पास देश की माटी की कहानियां हैं। उनके पास जिंदगी के धड़कते अनुभव हैं।
उम्‍मीद है कि 2017 में भी यह सिलसिला कायम रहेगा। ऐसे फिल्‍मकारों और उनकी फिल्‍मों का दर्शकों का प्‍यार मिलेगा।
बाक्‍स आफिस
13 दिनों में दंगल के 300 करोड़

नीतेश तिवारी की दंगल नए कीर्तिमान रच रही है। यह पहली हिंदी फिल्‍म है,जिसने दूसरे हफ्ते के छह दिनों में 100 करोड़ से अधिक का कारोबार किया है। कुल 13 दिनों में 304.08 का कारोबार कर दंगल संकेत दे रही है कि यह सबसे अधिक कमाई की फिल्‍म हो जाएगी। 300 करोड़ से अधिक को कलेक्‍शन करनेवाली चौथी फिल्‍म हो गई है दंगल। अगर दर्शकों का प्रेम जारी रहा तो निश्चित ही यह अव्‍वल नंबर पर आ जाएगी। इस हफ्ते भी किसी नई फिल्‍म की रिलीज न होने से इसके शो कम नहीं हुए हैं।
 

दरअसल : प्रचार का ‘रईस’ तरीका



दरअसल,
प्रचार का रईस तरीका

- अजय बह्मात्‍मज
कुछ समय पहले शाह रुख खान ने अगले साल के आरंभ में आ रही अपनी फिल्‍म रईस का ट्रेलर एक साथ 3500 स्‍क्रीन में लांच किया। आप सोच सकते हैं कि इसमें कौन सी नई बात है। यों भी फिल्‍मों की रिलीज के महीने-डेढ़ महीने पहले फिल्‍मों के ट्रेलर सिनेमाघरों में पहुंच जाते हैं। मीडिया कवरेज पर गौर किया हो तो ट्रेलर लांच एक इवेंट होता है। बड़ी फिल्‍मों के निर्माता फिल्‍म के स्‍टारों की मौजूदगी में यह इवेंट करते हैं। प्राय: मुंबई के किसी मल्‍टीप्‍लेक्‍स में इसका आयेजन होता है। फिर यूट्यूब के जरिए या और सिनेमाघरों में दर्शक उन्‍हें देख पाते हैं। इन दिनों कई बार पहले से तारीख और समय की घोषण कर दी जाती है और ट्रेलर सोशल मीडिया पर ऑन लाइन कर दिया जाता है। इस बर लांच के समय देश के दस शहरों के सिनेमाघरों में आए दर्शकों ने उनके साथ इटरैक्‍ट किया।
आमिर खान और शाह रुख खान अपनी फिल्‍मों के प्रचार के नायाब तरीके खोजते रहते हैं। वे अपने इन तरीकों से दर्शकों और बाजार को अचंभित करते हैं। उनकी फिल्‍मों के प्रति जिज्ञासा बढ़ती है और उनकी फिल्‍में हिट होती हैं। उनकी हर नई फिल्‍म की रिलीज के समय अब दर्शकों को भी इंतजार रहता है कि इस बार कौन सी नई रणनीति अपना रहे हैं। इस बार सभीको आश्‍चर्य हो रहा है कि आमिर खान दंगल के प्रचार में आक्रामक रुख क्‍यों नहीं अपना रहे है? आप देखें कि फिल्‍म के बाकी कलाकारों के इंटरव्‍यू छप रहे हें,लेकिन आमिर खामोश हैं। वे बीच-बीच में ऐसा करते हैं। बगैर जोरदार प्रचार के ही दंगल के प्रति उत्‍सुकता बनी हुई है। कुछ सालों पहले रा.वन की रिलीज के समय तो शाह रुख खान ने अपने प्रचार से ऐसा आतंकित कर दिया था कि दर्शकों के बीच फुसफुसाहट चलने लगी थी कि यह फिल्‍म तो देखनी ही पड़ेगी। अन्‍यथा धर की टीवी से निकल कर शाह रुख बाहर आ जाएंगे।
शाह रुख खान ने रईस के प्रचार का नायब तरीका खोजा। उन्‍होंने यूएफओ की मदद से देश के दस शहरों के दर्शकों के साथ लाइव संवाद किया। मुंबई,दिल्‍ली,कोलकाता,मोगा,अहमदाबाद,सूरत,बंगलोर,हैदराबाद,इंदौर और जयपुर के मल्‍टीप्‍लेक्‍स में आए चुनिंदा दर्शकों के साथ उन्‍होंने रईस के बारे में बातें कीं। इस नए प्रयोग से यह भी जाहिर हुआ कि आने वाले समय में इवेंट कवरेज में मीडिया की भूमिका सीमित होने जा रही है। अब देश के दर्शकों से स्‍टार सीधा संवाद कर सकते हैं। उन्‍हें किसी और माध्‍यम की जरूरत नहीं रह जाएगी। शाह रुख ने कहा भी कि किसी एक शहर में ट्रेलर लांच करने से अच्‍छा है कि उसे ऐसे इवेंट के जरिए सबसे शेयर किया जाए। मुझे पूरी उम्‍मीद है कि आने वाले समय में और भी स्‍टार इस तरीके को अपनाएंगे। दर्शकों का फिल्‍म से लगाव बढ़ेगा और वे फिल्‍म देखने के लिए लालायित होंगे। निर्माताओं के लिए खर्च के हिसाब से भी यह मुफीद रहेगा। फिल्‍म स्‍टार को शहर-दर- शहर ले जाने के भारी खर्च में बचत होगी।
सोशल मीडिया के ट्वीटर,फेसबुक,यूट्यूब आदि फोरम के बाद यूण्‍फओ की मदद से देश के अनेक शहरों के दर्शकों से दोतरफा संवाद से नई संभावनाएं उजागर होंगी। पाठकों का बता दें कि यूएफओ देश की एक ऐसी कंपनी है,जिसने फिल्‍मों के डिजीटल प्रक्षेपण की शुरूआत की थी। डिजीटल प्रक्षेपण से निर्माता अपनी फिल्‍म देश के सुदूर सिनेमाघरों तक कम लागत में पहुंचा सकता है। इसमें पारंपरिक तरीके से फिल्‍म के प्रिंट पहुंचाने की जरूरत नहीं रहती। इसके अनेक फायदे दिख रहे हैं।
अपनी ख्‍याति के अनुरूप शाह रुख खान ने प्रचार की नई पहल में पूरा सहयोग किया। उन्‍होंने फिलम से इतर नोटबंदी आदि की भी बातें कीं और बताया कि फिल्‍म में पहनी ताबीज उनकी है। इसमें उनके मां-पिता की तस्‍वीर है। ऐसी निजी बातों और शेयरिंग से स्‍आर के प्रति दर्शक की वफादारी बढ़ती है। वे फिल्‍म के दर्शक बनते हैं।

Monday, December 19, 2016

बस अभी चलते रहो -तापसी पन्‍नू

बस अभी चलते रहो -तापसी पन्‍नू
-अजय ब्रह्मात्‍मज

हिंदी सिनेमा में अभिनय और एक्शन से बाकी अभिनेत्रियों के मुकाबले अलग पहचान बना रही हैं तापसी पन्नू। 'बेबी7 और 'पिंक7 के लिए तारीफ बटोर चुकीं तापसी 'नाम शबाना' में टाइटल रोल के साथ नजर आने वालीं हैं। उन्होंने अजय ब्रह्मात्मज से शेयर किए अपने अनुभव...

अभी क्या चल रहा है?
'नाम शबाना5 की शूटिंग चल रही है। साथ ही भगनानी की 'मखनाÓ की भी आधी शूटिंग हो चुकी है। 'मखना- में मैं साकिब सलीम के साथ कर रही हूं। इसकी निर्देशक अमित शर्मा की पत्नी आलिया सेन हैं। वो बहुत बड़ी एड फिल्ममेकर हैं। उन्होंने मेरी म्यूजिक वीडियो साकिब के साथ बनाई थी। हमारी केमेस्ट्री हम दोनों को पसंद आई तो सोचा कि उन्हीं के साथ फिल्म भी कर लेते हैं। दोनों फिल्मों की शूटिंग आगे-पीछे चल रही है।
'मखना7 किस तरह की फिल्म होगी?
यह पंजाबी लव स्टोरी है। दिल्ली के किरदार हैं पर वैसी दिल्ली बिल्कुल नहीं है, जैसी 'पिंकÓ में दिखाई थी। इसमें मैं अलग तरह की दिल्ली लड़की बनी हूं। मतलब उस टाइप की नहीं जैसी मैं हूं। बहुत अपोजिट किरदार है ये मेरे लिए।
और 'नाम शबाना' क्या है ?
'नाम शबानाÓ में भी मैं कंफर्ट जोन से बाहर आई हूं। इतनी बाहर कि कई बार समझ नहीं आता कि किस सिचुएशन में किरदार क्या रिएक्शन देगा। डायरेक्टर से जाकर पूछना पड़ता है। मैं कैजुअल हूं, पर मेरा किरदार बिल्कुल कैजुअल नहीं है। मैं हंसी-खेल में काम करने वाली लड़की हूं। शबाना ऐसी बिल्कुल नहीं है। वह हर चीज में ओवर अटेंटिव रहने वाली लड़की है या फिर बहुत जल्दी गुस्सा हो जाती है। उसका व्यंग्यात्मक सेंस ऑफ ह्यूमर है। इधर-उधर की बात बिल्कुल नहीं करती। उसके अपने अंदर ही बहुत गहरी कहानी चलती रहती है।
कितना सच है कि यह 'बेबी' का प्रीक्वेल है?
काफी हद तक सच है। हम इसको टैग नहीं करना चाहते कि यह प्रीक्वेल या सीक्वेल है। यह सच है ये 'बेबीÓ फ्रेंचाइजी का पार्ट है। 'बेबीÓ में मेरे निभाए किरदार के बनने की कहानी है। उस हिसाब से प्रीक्वेल मान लीजिए पर ऐसा कोई टैग देकर हम शुरुआत नहीं कर रहे हैं। हमने नाम भी अलग रखा है। 'बेबी-1Ó या 'बेबी-2Ó नहीं रखा है। यह पूरी अलग स्टोरी है। हां, 'बेबीÓ के किरदार यहां पर भी होंगे। संक्षेप में मेरे किरदार की बैकस्टोरी है।
मनोज वाजपेयी का एक नया किरदार है? वे आपके कोच हैं क्या?
जी हां। बहुत ही विशेष किरदार है उनका। वही हैं जो शबाना के बनने के लिए जिम्मेदार होंगे। वो पूरी तरह से कोच तो नहीं हैं। उनके किरदार के बारे में पूरी तरह से फिल्म देखने पर ही आपको पता चलेगा।
मनोज के साथ कैसा अनुभव रहा?
हमारे साथ में ज्यादा सीन नहीं हैं, एक-दो सीन हैं। एक्शन है इस वजह से ज्यादा मोमेंट, चेज और रन एक्शन है। अक्षय के साथ भी एक्शन सीक्वेंस हैं। अक्षय का इस फिल्म में कैमियो है। इस बार 'बेबीÓ से ज्यादा हमारी बातचीत हो पाई है। उनका सेंस ऑफ ह्यूमर कमाल का है। हर शॉट में उनका इनपुट रहता था। वे कहते थे कि चल अब इसे ऐसा कर लेते हैं। तू ऐसा कर दियो। मैं उनसे कहती कि सर यह नीरज पांडे की लिखी फिल्म है। इसमें अगर मैंने ऐसा-वैसा कुछ कर दिया... कोई गैग डाल दिया तो वो मुझे मार डालेंगे। वे कहते थे कि कोई नहीं तू कर। वे जब बोलते हैं तो पता ही नहीं चलता कि मजाक कर रहे हैं या गंभीर होकर बोल रहे हैं। बहुत मजा आया उनके साथ काम करके।
अपनी जर्नी को कैसे देखती हैं? कहां तक आप पहुंची हैं?
अभी पीछे मुडकर देखा नहीं है कि कहां तक पहुंच गई हूं। बस मजा आ रहा है।
आगे का कुछ तो सोचा होगा न, अगर एक से दस तक मान लें तो?
हम जब अपने आपको देखते हैं तो हमारे ऊपर और नीचे लोग होते हैं। आप चाहे किसी भी मुकाम पर पहुंच जाओ। आपके ऊपर भी लोग होंगे और नीचे भी। हमारी कोशिश रहती है कि अपने पोजिशन को हम किस तरह इंप्रूव करें। अगर आप यह देखना शुरू करेंगे कि मेरे ऊपर और कितने लोग रह गए हैं तो मुश्किल बढ़ जाएगी। 
'पिंक' से बेहतर करने का प्रेशर तो नहीं है?

बहुत प्रेशर है मुझ पर। अपने आपको मुश्किल में डाल दिया है मैंने। वह सोचती हूं एक सेकेंड के लिए फिर उसे स्नैप आउट करके साइड में रख देती हूं और दोबारा सोचती हूं कि जो भी है, बस अभी चलते रहो। जो होगा, सही होगा। मैंने बिल्कुल प्लान नहीं किया था। सब कुछ अपने आप होता गया। यही सोचती हूं कि हर फिल्म ऐसे करूं जैसे मेरी पहली फिल्म हो। उसी सोच से काम करती हूं। साऊथ में मैं कुछ गलतियां कर चुकी हूं। कोशिश है कि हिंदी सिनेमा में उसे रिपीट न करूं।
यह कहना गलत नहीं होगा कि तापसी मेनस्ट्रीम सिनेमा का हिस्सा हो चुकी हैं, कैसा लगता है?
जी बिल्कुल। मैंने तो अपनी शुरुआत कॉमर्शियल फिल्मों से की थी। उसके बाद सोचा कि लोगों को मैं दिख गई, चलो अब दिखाती हूं कि मैं एक्टिंग भी कर सकती हूं। अगर मैं 'पिंकÓ जैसी फिल्म से शुरुआत करती तो लोग मुझे गंभीर अदाकारा समझकर साइड लाइन कर देते।
किन डायरेक्टर्स के साथ काम करने का सोचा है?
अभी तो मैंने शुरुआत की है। तीन निर्देशकों के साथ काम किया है। अभी तो हर निर्देशक नए और टैलेंटेड हैं। ऐसा नहीं है कि गिनती के निर्देशक बचे हैं। जिन्होंने अच्छा काम किया है, अगर मैं उनकी लिस्ट बनाने बैठती हूं तो भी सबका नाम अपने दिमाग में नहीं रख सकती।
हिंदी सिनेमा में सफर में किस तरीके से आपका पूरा प्लान चल रहा है?
प्लान तो ऐसा है कि मेरा यहां पर आना ही प्लान में नहीं था। यही कोशिश करती हूं कि जहां पर भी हूं, वहां से एक लेवल ऊपर ही जाऊं। नीचे न जाऊं। उसी स्तर पर रहूं तो भी कुछ हद तक ठीक है। एक हिट फिल्म दे दी। अच्छी दिख गई। अच्छी फिल्म मिलने के लिए और क्या चाहिए? इसके बावजूद आज की तारीख में बताया जाता है कि आप कतार में हैं।
क्या ये इंडस्ट्री से बाहर का होने की वजह से होता है?
जी हां, ये तो मैं मानती हूं। मैं ये नहीं कहती कि इंडस्ट्री की लड़कियों पर मेहरबानी होती है। फिर भी उन्हें अधिक मौके मिलते हैं, जिनके माता-पिता, जान-पहचान वाला या कोई रिश्तेदार इंडस्ट्री में हों। मेरे पास इनमें से कुछ भी नहीं था। मेरे पास तो थ्री मूवी कांट्रेक्ट भी नहीं था। कई बार मुझसे पूछा जाता है कि बगैर किसी मदद के आप यहां तक कैसे पहुंच गईं? मेरे पास कोई जवाब नहीं होता। बस ये कि मुझे अपना काम पसंद है और मैं खुश होकर अपना काम करती हूं।

Saturday, December 17, 2016

सपनों को समर्पित है ‘दंगल’ : नीतेश तिवारी

सपनों को समर्पित है ‘दंगल’ : नीतेश तिवारी
राष्‍ट्रीय फिल्म पुरस्‍कार विजेता नीतेश तिवारी अब महावीर फोगाट और उनकी बेटियों की बायोपिक ‘दंगल’ लेकर आए हैं। फिल्म निर्माण और उसकी थीम के अन्‍तर्भाव क्या हैं, पढिए उनकी जुबानी:-
-अजय ब्रह्मात्‍मज/अमित कर्ण  
-यूं हतप्रभ हुए आमिर खान
आमिर खान गीता-बबीता और महावीर फोगाट की कहानी तो जानते थे। वह भी ‘सत्‍यमेव जयते’ के जमाने से। ऐसे में उन्हें कहानी से चौंकाना मुश्किल काम था। वे हम लोगों की अप्रोच से इंप्रेस हुए। हमने इरादतन एक गंभीर विषय को ह्यूमर के साथ पेश किया। वह इसलिए कि इससे हम ढाई घंटे तक दर्शकों को बांधे रख सकते हैं। वह चीज आमिर सर को पसंद आई। उन्होंने कहा कि हास-परिहास  वे प्रभावित हुए हैं। किस्सागोई के इस तरीके से एक साथ ढेर सारे लोगों तक पहुंचा जा सकता है।
-अनकहे-अनसुने किस्सों का पुलिंदा
हमने एक तो गीता-बबीता और महावीर फोगाट के ढेर सारे अनकहे व अनसुने किस्से बयान किए हैं। दूसरा यह कि लोग यह अंदाजा नहीं लगा पाएंगे कि हम उनकी गाथा को किस तरह कह रहे हैं। मेरी नजरों में ‘क्या कहना’ के साथ-साथ ‘कैसे कहना’ भी अहम है। दोनों ही चीजें दर्शकों की उत्‍सुकता बनाए रखती हैं। मैं दर्शकों को तीक्ष्ण बुद्ध‍ि वाला मानता हूं। लिहाजा मैं उन्हें औसत लेखनी से रिझाने की कोशिश नहीं करता। ‘जो जीता वही सिकंदर’ का संजय या ‘लगान’ का भुवन जीतेगा। पर वे दोनों कैसे जीत हासिल करेंगे, उससे मामला रोचक और रोमांचक बन जाता है। इससे दर्शक संजय व भुवन के साथ सफर पर चल पड़ते हैं।
- देखी गई चीजों का दुहराव नहीं
मैंने इसे तीन लोगों के साथ मिलकर डेवलप किया है। मेरा मानना है कि अगर आप ने कागज पर उम्दा कहानी उतारी है तो आपने आधी से ज्यादा जंग जीत ली समझो। इससे पहले ‘चिल्‍लर पार्टी’ के साथ भी यही हुआ था। विकास बहल के साथ मिलकर मैंने साधारण कहानी के किरदारों का सफर असाधारण कर दिया। मैं दरअसल पहले रायटर हूं, फिर डायरेक्टर। मेरे ख्‍याल से आप की कहानी में इमोशन के खूबसूरत रंग हैं तो लोग आप की खामियों को भूल जाएंगे।
-विजुअल को शब्दों का साथ है मुश्किल
फिल्म एक विजुअल मीडियम तो है। कई लेखक सीन जहन में रख पटकथा लिखते हैं। ढेर सारे कागज पर खालिस शब्दों में सीन को लिखते हैं। मैं लिखते वक्त रायटर के रोल में रहता हूं। डायरेक्टर बन कर लिखूं तो मैं पक्षपाती बन जाऊंगा। बाद में बतौर डायरेक्टर लिखी गई चीज में वैल्‍यू ऐड नहीं  कर सकेंगे। लिहाजा जो डायरेक्टर भी खुद ही हैं, उनके लिए यह काम चुनौतीपूर्ण तो होता है। सीन को शब्दों का साथ मिलना बड़ा मुश्किल होता है। मैं कई बार अनूठा, अतरंगी लिख तो लेता हूं, पर बाद मैं डायरेक्टर के तौर पर खुद को गालियां भी देता हूं। मिसाल के तौर पर ‘तीसरी कसम’ के नॉवेल में फणीश्‍वर नाथ रेणु जी ने एक जगह लिखा है ‘रीढ की हड्डी’ में गुदगुदी होना’। अब इस लिखी हुई चीज को हम भला कैसे फिल्मा सकते हैं। ऐसी चीजें मेरे साथ भी हुई हैं। लिहाजा मैं जिन फिल्मों में महज रायटर था, वहां डायरेक्टरों ने मुझे गालियां तो दीं। मुझ से कहा कि मैंने लिख तो अच्छा लिया, मगर वह अब फिल्माया कैसे जाए।
-खुद को बहुत कोसा मैंने
‘दंगल’ में भी मैंने अपनी लिखी चीज को भी खूब कोसा। मसलन, हमने लिख तो लिया कि क्वॉर्टर फाइनल मैच ऐसा होगा। गीता इस को इस तरह से जीतेगी। मगर हूबहू लिखी गई चीज को हम फिल्मा नहीं सकते थे। वह इसलिए कि लिखते वक्त हम रेसलिंग के नियमों से वाकिफ नहीं थे। तो शूटिंग से पहले हमने रेसलिंग की बा‍रीकियां सीखीं। रेसलर के कॉस्टयूम से लेकर अखाड़े, रिंग आदि तक का हमने ख्‍याल रखा। रिंग में कौन ‘एक्टिव’ और ‘पैसिव’ एरिया है, उस पर रिसर्च किया। तब जाकर हमने फिल्म शूट की।
-परिजनों का सपना गलत नहीं
फिल्म में महावीर फोगाट अपने अधूरे सपने अपनी बेटियों के हाथों सच करवाता है, जबकि आज की तारीख में बच्चे अपना करियर खुद चुनना चाहते हैं। इसकी दो व्याख्‍या है। एक तो यह कि फोगाट ने बेटियों की क्षमता उनके बचपन में ही भांप ली थी। उसके अनुरूप बेटियों को पहलवानवाजी के लिए प्रेरित किया। साथ ही यह कहानी 2016 की नहीं है। बात 1999 की है। वे हरियाणा के हैं। मुझे नहीं मालूम कि वहां लिंगानुपात क्यों बदतर रहे हैं। बेटियां पैदा होने से पहले मार दी जाती हैं। लड़कियां कितनी ही कोशिश क्यों न करें, उन्हें बढावा नहीं दिया जाता है। ऐसे माहौल में बेटियों से पहलवानबाजी करवाने की बात सोचना बहुत बड़ी बात है। यह उस समाज के लिए बहुत बड़ी घटना थी। दूसरी चीज यह कि अगर मुझे अपने बच्चों में एक खास क्षमता महसूस हो, फिर भी मैं उन्हें उस दिशा में प्रोत्साहित न करूं तो वह उनके साथ नाइंसाफी करने जैसा ही होगा।
-गीता-बबीता की मां मूक समर्थक
फोगाट के इस सपने में उसकी पत्नी यानी गीता-बबीता की मां मूक समर्थक है। वह समाज के ताने सुनती है। सबसे ज्यादा औरतों के। इसके बावजूद वह अपनी बेटियों और पति के साथ खड़ी रहती है। परिवार को बेटा न देने पर वहां की महिलाएं उसे ही गलत ठहराती हैं। वह फिर भी कुछ नहीं बोलती। बेटियों के उठने से पहले उनके लिए नाश्‍ता बना लेती है। बेटियों को इमोशनल सपोर्ट देती है। असल जिंदगी में उनकी मां का नाम दया कौर है। फिल्म में हमने उस किरदार को नाम नहीं दिया है।
- अली अब्बास जफर से बातचीत
’सुल्तान’ की जब घोषणा हुई तो खुद अली अब्बास जफर मेरे पास आए थे। हम दोनों ने एक-दूसरे से नोट्स साझा किए ताकि किसी चीज का दुहराव न हो। यह उनका बहुत अच्छा जेस्चर था। बाकि दोनों फिल्मों के तेवर और कलेवर अलग हैं। रेसलिंग शब्द के अलावा दोनों में समानता नहीं है। खुद हम दोनों अलग मिजाज के फिल्मकार हैं।
   

Thursday, December 15, 2016

दरअसल : ’कयामत से कयामत तक’ की कहानी



दरअसल....
कयामत से कयामत तक की कहानी
-अजय ब्रह्मात्‍मज
29 अप्रैल 1988 को रिलीज हुई मंसूर खान की फिल्‍म कयामत से कयामत तक का हिंदी सिनेमा में खास स्‍थान है। नौवां दशक हिंदी सिनेमा के लिए अच्‍छा नहीं माना जाता। नौवें दशक के मध्‍य तक आते-आते ऐसी स्थिति हो गई थी कि दिग्‍गजों की फिल्‍में भी बाक्‍स आफिस पर पिट रही थीं। नए फिल्‍मकार भी अपनी पहचान नहीं बना पा रहे थे। अजीब दोहराव और हल्‍केपन का दोहराव और हल्‍केपन का दौर था। फिल्‍म के कंटेट से लेकर म्‍यूजिक तक में कुछ भी नया नहीं हो रहा था। इसी दौर में मंसूर खान की कयामत से कयामत तक आई और उसने इतिहास रच दिया। इसी फिलम ने हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री को आमिर खान जैसा अभिनेता दिया,जो 29 सालों के बाद भी कामयाब है। हमें अगले हफ्ते उनकी अगनी फिल्‍म दंगल का इंतजार है।
दिल्‍ली के फिल्‍म लेखक गौतम चिंतामणि ने इस फिलम के समय,निर्माण और प्रभाव पर संतुलित पुस्‍तक लिखी है। हार्पर का‍लिंस ने इसे प्रकाशित किया है। गौतम लगातार फिल्‍मों पर छिटपुट लेखन भी किया करते हैं। उन्‍होंने राजेश खन्‍ना की जीवनी लिखी है,जिसमें उनके एकाकीपन को समझने की कोशिश है। इस बार उन्‍होंने स्‍टार के बजाए फिल्‍म पर फोकस किया है। हिंदी फिल्‍मों की मेक्रिग पर बहुत कम लिखा गया है। चर्चित और क्‍लासिक फिल्‍मों पर भी व्‍यवथित और विस्‍तृत लेखन नहीं मिलता। इस संदर्भ में गौतम की पुस्‍तक का खास महत्‍व है। उन्‍होंने केवल एक कामयाब और ट्रेंड सेंटर फिल्‍म के निर्माण तक खुद को सीमित नहीं रख है। उन्‍होंने कयात से कयामत तक के समय और संदर्भ को समझने की कोशिश की है।
गौतम चिंतामणि ने फिल्‍म के निर्देशक मंसूर खान के नजरिए के साथ उन सभी की बातों पर भी ध्‍यान दिया है,जो कलाकार या किसी और तौर पर फिल्‍म से जुड़े हुए थे। उन्‍होंने आमिर खान,जूही चावला,दिलीप ताहिल,आलोकनाथ के साथ ही संगीतकार आंनद-मिलिंद और कैमरामेन किरण देवहंस से भी संदर्भ लिया है। अच्‍छी बात यह है कि इन सभी की बातों तक ही वे सीमित नहीं रहते1 वे कयामत से कयामत तक तक की सीमाओं पर भी अपनी राय रखते हैं। आखिर क्‍यों यह फिल्‍म दिलवाले दुल्‍हनिया ले जाएंगे की तरह बाद की फिल्‍मों को प्रभावित नहीं कर सकी? गौर करें तो स्‍वयं आमिर खान अपनी पहली फिल्‍म से इतने बड़े हो गए हैं कि यह फिल्‍म छोटी हो गई है। उन्‍होंने कंटेंट और कामयाबी की बड़ी लकीर खींच दी है। कयामत से कयामत तक के सीमित प्रभाव के बारे में गौतम के पास अपने तर्क हैं। उनसे असहमति नहीं हो सकती,लेकिन वे दोनों फिल्‍मों के सामाजिक संदर्भ और राष्‍ट्रीय परिप्रेक्ष्‍य में नहीं जाते। देश में आए आर्थिक उदारीकरण और आप्रवासी भारतीयों पर बढ़ते जोर के कारण हिंदी फिल्‍मों को कंटेंट तेजी से बदला था।
हालांमि पुस्‍तक में मंसूर खान के हवाले और स्‍वयं गौतम चिंतामणि के शोध से उस समय की हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री के साक्ष्‍य पेश किए गए हैं,लेकिन फिल्‍में केवल इंडस्‍ट्री के दायरे में नहीं रहतीं। उनके निर्माण और प्रभाव के सामयिक कारण होते हैं। इस पुस्‍तक में उन पक्षों की विवेचना नहीं मिलती। गौतम इस तथ्‍य पर अधिक जोर देते हैं कि मंसूर खान हिंदी फिल्‍मों के रिदारों में आधुनिकता ले आए। उन्‍होंने फिल्‍म का अंत भी पारंपरिक नहीं रखा। वे अपने पिता के दबाव में नहीं आए और उन्‍होंने अपनी सोच से कुछ नया किया। हिंदी फिल्‍मों की नैरेटिव परिपाटी से असंतुष्‍ट मंसूर खान ने अपनी फिल्‍म में बड़ा बदलाव किया।
द फिल्‍म दैट रिवाइव्‍ड हिंदी सिनेमा: कयामत से कयामत तक
लेखक- गौतम चिंतामणि
प्रकाशक- हार्पर कालिंस पब्लिशर्स

Monday, December 12, 2016

हिंदी टाकीज 2(10) : बचपन सिनमा और सनी देओल : राजा सहेब



राजा साहेब
मैंने फिल्ममेकिंग की पढाई की है डिजिटल अकेडमी सॆ ।पिछले 3 साल सॆ मुम्बई में हूँ ।डाइरेक्शन में काम ढूंढ़ता हूँ । कुछ छोटी फिल्मों में अस्सिस्टेंट डाइरेक्टर भी रहा ।खुद की एक शॉर्ट फ़िल्म भी बनाई है encounter नाम सॆ youtube पर है ।सिनेमा में गहरी रुचि है ।लेखन अच्छा लगता है ।

बचपन ,सिनेमा और सनी देओल

 स्वेल्बेस्टर स्तेल्लोंन  और आर्नोल्ड स्च्वान्ज़ेगेर कौन है ? क्या करता है?  हमें पता  ना था | सालों बाद में , नाम सुनने को मिला | मगर पता लगाना उतना ही मुश्किल जितना की इनका नाम उच्चारण करना | हम गाँव के देशी लोग थे | गोरे चेहरे (विदेशी) तब  हमारे दिमाग में घुसते नहीं थे ,ना ही कोई  कोशिश भी करता था |  तब हमारे , हम लोग का अपना सुपर हीरो ,हीमैन इत्यादि सिर्फ़ सनी देओल था | हम इससे काफी खुश थे | सबसे ताक़तवर ,साहसी और ज़िगर वाला साथ में कभी कभी बेहद मज़ाकिया और मासूम |
वो ज़माना वीडियो होम सिस्टम (वीएच्एस) का था |कुछ संपन्न घरों में ही वीसीआर  या वीसीपी (वीडियो केसेट प्लेयर/ रेकॉर्डर ) पाया जाता  वो भी जिनका घर बाज़ार में होता ,ज़ी टी .वी देखने का सौभाग्य भी इन्ही लोगों को मिला था| हमारे गाँव की हालत पूछिये मत ,बिजली ही नहीं थी | हम बहुत सालों तक सिनेमा से महरूम थे जो की अब सोचता हूँ ठीक ही था , उत्सुकता और बेताबी बनी रही या कहूँ और गाढ़ी होती गयी |
तब सिनेमा देखना एक उत्सव के समान होता था |यह त्योहार बिल्कुल गिनी चुनी मौकों पे उत्साह से मनाया जाता था जैसे सरस्वती पुजा ,लक्ष्मी पुजा और छठ पुजा |
चार दिनों तक रात भर लोग एक के बाद एक फिल्में देखते थे | हर बार एक ओपनिंग फिल्म जय संतोषी माँ टाइप की होती थी "धार्मिक "बस रिचुअल के लिए | बाकी सारी फिल्में अलग मिजाज़ के होते थे एक्शन,सोशल,देशभक्ति,फैमिली ड्रामा इत्यादी |
मेरे यहाँ से कोई नहीं जाता था फ़िल्म देखने | ना ही मै किसी को बात करते सुनता|  मुझे यह बड़ा अटपटा लगता , कोफ़्त होती की कैसे लोग हैं ?फिल्म को कोई  नज़रंदाज़ कैसे कर सकता है |मैं तब बहुत ही छोटा था | कुछ कुछ याद है ६ बजे ही स्वेटर ,टोपी धारण कर मैं उस जगह को कूच कर जाता था जहाँ  फिल्म दिखाई जाती थी |इतना सहज और आसान नहीं था ये सब | इसके लिए पूरा दिन मुझे ठुनकना पड़ता ,घर में एकमात्र बच्चा और सबसे छोटा होने की वजह से बस एक फिल्म की इजाज़त के साथ मुझे किसी के साथ भेजा  जाता | मेरी किस्मत अच्छी होती  अगर मैं दो फ़िल्म देख लूं अमूमन होता यह था की जब भी कुछ रोमांचक ,रहस्योघाटन होने वाला होता  (गुरु जी ,राजकुमार जी और पता नहीं कौन कौन) टोर्च हाथ में लिए ,शाल लपेटे हाज़िर हो जाया करता थे | मुझे  वापस घर ले जाने के लिए |
ये लोग बस अपनी नौकरी करते थे  फरमान तो  हमेशा मेरे घर से जारी होता |मुझे मन मसोस कर जाना पड़ता |लेकिन कमबख्त रात भर  गरीबों, मजलूमों ,मजदूरों की आवाज़ उठाता और हक़ की लड़ाई करता धर्मेन्द्र ,विनोद खन्ना , अमिताभ और अमरीश पुरी के संवाद वातावरण में गूंजते रहते | फिल्में होती थी गुलामी ,हम पाँच और सूर्या-  दी अवेकनिंग | समझ नहीं आता क्यूँ ?  ऐसा नहीं था की सामंतबाद था ,ना कोई निरंकुश था,एक ही जाति के ना रहते हुए भी आज तक प्यार से रहते है पर कुछ गुलामी का बोध था अन्दर कहीं शायद उन्हें या किसी प्रकार का रोष जो इन  फिल्में से शांत होती थी |


 उनलोगों को लव स्टोरीज से लगाव  नहीं था | एक लव स्टोरी हर सीजन में देखने को या सुनने को मिलती जिसमें अनिल कपूर पियानो बजा कर(जो लगभग हर मौकों पर ,हर फ़िल्म में होता था उन दिनों ) बेहद दर्द से भरे एक नगमा छेरते-" सुना है तेरा और भी एक बलम है.........तेरी बेवफ़ाई का शिकवा करूँ तो....." फ़िल्म का नाम रामावतार | इसमें सनी देओल और श्रीदेवी पार्टी में किंकर्तव्यविमूढ़ से खड़े होते ,श्रीदेवी लरज़ते लबों , झरते असुवन को रोकती हुई पियानो बजाता हुआ अनिल से नज़रें चुरा रही होती पर अनिल हैं की उनको अपराधबोध और ग्लानी कराते ही जा रहे होते |
उन दिनों फ़िल्मों में दो तरह के आशिक़ पाये जाते एक ममा'ज बॉय  जैसे की इस फ़िल्म का अनिल सीधे बात नहीं कर पायेगा -रोयेगा ,रुलाएगा |जैसे बच्चे कभी कभी उनपे बरसते है जिनसे वो प्यार करते हैं- जैसे अपनी माएँ.
दुसरे बेहद फूहड़ और छिछोरा होते | केवल एक नोटबुक के साथ कॉलेज में पाये जाते | जिनको अक्सर मगरूर लड़की को रास्ते पे लाने के नाम पर खुलीं मनमानी करने की छुट दी जाती ,हद तब होती जब लड़की आत्मसमर्पण करती फ़िर उसको प्यार का नाम दिया जाता |
अरे भाई तब तुममे और उस गुंडे में फर्क ही क्या था ? लड़कियों तुमको ऐसे लड़के क्यूँ पसंद आते है ?
इस तरह से सिनेमा जनमानस में यह बात उतार रहा होता की ऐसा ही होता है- त्याग करना है आपको ,दूसरा बलम सोचना भी मत और आपको प्यार करना ही पड़ेगा जाओगी कहाँ ??
हाँ , बस एक -दो बार राज आता जो बाबूजी से सिमरन माँगता लेकिन थप्पड़ तो पड़ती आख़िरकार हिमाक़त की थी उसने इन  मामलों में लड़कियों के पिता बड़े ही सख्त होते |
खैर सिनेमा पे लौटते हैं -सनी देओल उन्ही दिनों असर कर रहे होते सबेरे वाली गाड़ी,सनी, विस्मात्मा ,क्षत्रिय ,डर,वीरता,त्रिदेव,बेताब ,डकैत,अर्जुन ,घायल ,जीत,जिद्दी जोर, यतीम और दामिनी से.....
लगातार शिखर पे रहते हुए कई सारे राष्ट्रीय पुरस्कार समेत  पुरस्कारों से सुसज्जित होते रहे, मनोरंजन कराते  रहे |
जनता इनको देख कर हल्का महसुस करती  | पलायन तो होता ही है सिनेमा दर्शकों के यथार्थ से,जीवन से  | ख़ास कर संनी का  किरदार प्रायः सही गलत की अंतर को टटोलता ,भटकता ,शोषित होता ,बाग़ी होते हुए अपने फ़ैसले पे अडिग होने के साथ लड़ता भी था |मुख्यत: इनके किरदार निरंतर प्रहार और अबसाद,ज़लालत के बाद फूटता था दर्शकों को यही अच्छा लगता उनको सनी अपना प्रतिनिधि लगता |

वक़्त बीतता गया साल था 1997 | मैं गुप्त,बरसात,बोम्बे,रंगीला और डीडीलजे के गाने सुनने लगा था | डीडीलजे के २-३ कैसेट थे | घर पे बूम बॉक्स के लिए एक | उन दिनों बहुत से कैसेटस, मैं बर्बाद कर चुका था क्यूंकि किसी फिल्म में, मैंने किसी को ड्रम बजाते देखा था |  उसकी नक़ल मैं डेकची ,तसले ,थाली ,कटोरी, खाली अलग -अलग साइज़ के डब्बे पर चम्म्च  की मदद से धुन बनाने की सनक पाल चुका था |धुन ना बननी थी , ना बनी | टेप रेकॉर्डर के प्ले और रेकॉर्ड बटन एक साथ दबाने से तब कैसेट के डाटा उड़ कर बर्तन की धुन अंकित हो जाया करती |एक डीडीएलजे भैया की नई एम्बेसडर कार की स्टीरियो के लिए भी था |  जिसपे मेरा अक्सर  घुमना होता | राजा हिन्दुस्तानी भी बजता कभी -कभी पर अधिकतम समय अनमोल रतन ,सुहाने पल जैसे गानों के संग्रह बजते  |एक कॉमिक्स की दुकान और लगभग रोज़ ही कार की सैर फिक्स्ड थी, गोल्डस्पॉट ,फ्रूटी और पोपिंस के साथ कभी कभार दस का नोट भी मिलता था बस यही वो समय रहा है अभी तक - जब मैं  वाकई में राजा था |
 सनी का जादु अब भी सवार था | जबकी उस दौर की कुछ फ़िल्मों को मैं नकार चुका था वजह शायद नागराज़ ,ध्रुव ,डोगा और स्टील रहे होंगे (राज कॉमिक्स के हीरोज)| हिरोईने मुझे बेहद ग़ैर ज़रूरी लगती ,गानों से सख्त नफ़रत थी |मुझे तब भी खटकता की कहानी रुक क्यूँ जाती है अचानक नाचने गाने के लिये ?कहानी दिखाओ भाई ! रोमांस घर पे या ऑफस्क्रीन करना या करो ही मत | ऐसे मौकों पर उस फ़िल्म प्रभाव जाता रहता|

साल 1997 सिनेमा के लिहाज़ से लाभदायक था |मेरी छोटी दीदी की शादी हुई थी -उनके शादी के वीडीयो के लिए अकाई का वीसीआर आया था |तब शादी के वीडियोस भी लोग फ़िल्मों की तरह देखते थे | जबकी 1988-89 में यह इतना प्रचलित नहीं रहा होगा यही वजह रही की बड़ी दीदी की शादी कैसी थी |मैं देख नहीं पाया क्युंकी  उनकी  शादी के वीडियो (वीडियो कसेट ) तब तक जाम हो गया था इसका किसी को ध्यान नहीं आया |
बॉर्डर नाम था फ़िल्म का एक तो युद्ध ,ऊपर से सनी देओल थे उसमें | रोज़ ही सुनता था किसी ना किसी से बॉर्डर का नाम |
देल्ही का उपहार सिनेमाघर की घटना घट चुकी थी जिसके बारे में गाँव के अंजान लड़के अतिउत्साहित ,गप्पी लड़के इसको बढ़ा चढ़ा कर बखान करते तब कोई भी फ़िल्म अच्छी बुरी की उसमें कितने मारपीट हुए ,कितनी गोलियाँ चली इसपे निर्भर करता था | कोई बोला इतनी मारधाड़ हुई की पर्दा जल गया |
रोज़ ही रात को तब कुछ घंटे  छोटा सा लाल हौंडा जेनसेट चलता| पायरेसी का बाज़ार तब भी गरम था ,बॉर्डर के वीडियो कसेट से साउंड गायब था | हमें बताया गया की भाई यह फ़िल्म इतनी चली की घिस गयी है , हम बॉर्डर नहीं देख पाये|

वीसीआर का एक चक्कर था | इसके ऊपर का ढक्कन हमेशा खुला ही  रहता |इसके कई कारण बताए जाते - हीट हो जाता है ,एक मेटालिक प्ले हेड होता है जिसको साफ़ करना होता था | स्पिरिट शायद ही रहता था अक्सर अपने छोटे भैया को सफ़ेद कोरे कागज़ पे पेट्रोल से साफ़ करते देखा करता वो मेटालिक हेड | कुछ सीज़न में वीडियो कसेट की मारा मारी होती दुकान वाले ग्राहकों को रिवाइंड कर स्टार्ट से फ़िल्म मांगते थे |
एक शाम मेरा भांजा हमसे ये बोल गया की बॉर्डर फ़िल्म आई थी कल रात | रिवाइंड  होते हुए फ़िल्म को उसने बस एक जगह पॉज किया पॉज करना और सनी का गोली चलाना एक साथ हुआ | मैं समझता हूँ यह झूठी बात थी |
दो फ़िल्म मुझे याद है -इम्तिहान और जीत |
दोनों फ़िल्मों में सनी ना बचते है ना ही इनको हेरोइन मिलती है |
जीत में तो सलमान खान का " दे दिया ना झटका" और गुस्सा दिलाता था पर यह सनी की मर्ज़ी है तब ठीक लगता है |
अब तक  शाहरुख़ ,सलमान ,आमिर सिंड्रोम नहीं लगा था |
रोमांस के आईडिया  से ही मैं काफी दूर था |
"पढना लिखना छोड़ो आओ मिल कर मौज़ मनाये " टी. वी . देखते हुए पहली बार मुझे कोई हिरोइन पसंद आई - पुजा भट्ट | फ़िल्म थी -अंगरक्षक सनी देओल की |
सनी के साथ वापस पुजा को ढूँढता रहा नहीं मिली | "सड़क" और "दिल है की मानता नहीं " का भी संजोग बन चुका था  |मैं  अभी के बच्चों जितना स्मार्ट नहीं था | इतना बुद्धू  की मुझे पुजा बस सनी ,संजय और आमिर के लिए पसंद थी |
मेरे क्लास में एक गोल चश्मे वाली लड़की जिसके दोनों गालों पे गड्ढे पड़ते थे मैं उसका चेहरा पूजा भट्ट से मिलाने की कोशिश करता | कमाल है, कुछ हद तक मुझे लगता है मिल भी जाता था उसका चेहरा या ये मेरा वहम था |

समय बढ़ता चला गया 2001 का साल था | वीडियो कसेट का ज़माना चला गया था||
अब वीडियो कॉम्पैक्ट डिस्क (वीसीडी ) आ चुका था | वीसीडी पर पहली फ़िल्म याद नहीं ठीक से वो थी सोल्जर| बॉबी देओल थे इसमें, वीडियो कसेट  की आख़िरी फ़िल्म प्यार तो होना ही था |
ग़दर - एक प्रेम कथा |
इस फ़िल्म का जुनून भी ग़दर था | गाँव के लौंडे इसको इठलाकर ख़ुशी के मारे गद्दर बोलते | मैं तब आवारगी में पुरा दिन गाँवों में टहलता रहता ना खाने की सुध रहती ना स्कूल के कपड़े बदलने की | रात को हर रोज़ मेरी शिकायत बाबूजी से होती |
मुझे हॉस्टल में डालने की धमकियाँ मिलने लगी थी |मुझे फ़र्क नहीं पड़ता था | मैं पहले के ही माफ़िक मस्त मगन था |
मुझे लगा ऐसा हो नहीं सकता है | क्यूँकी आज तक मुझे कभी मार नहीं पड़ी ,एक बार भी नहीं , एक थप्पड़ तक नहीं |मैं ऐसा एकमात्र लड़का था ,ऐसा सौभाग्य बस बेटियों को नसीब होता है | बाबुजी जी जब तक थे डांट भी नहीं पड़ती थी बस फर्स्ट इयर कॉलेज के टाइम उनको थोडा सख्त होना पड़ा था |
शाम होते ही घर पे रहने की कड़ी हिदायत दी गयी थी मुझे उन दिनों | हाँ ,मै कोशिस जरुर करता जब भी सिनेमा का उत्सव मनता | ऐसी ही रात थी ,मैं नहीं जा पाया था | रात भर मुझे  इसका अफ़सोस रहा | ग़दर के संवाद  तैर कर मेरे कानों तक आ रहे थे | मैं मजबूर था |
 अगले दिन स्कूल बस पे कुछ लड़के चढ़े , मेरे क्लास के | पुरे रास्ते उन्होंने ऐसा जताया की ग़दर ना देखा हो अगर समझ लो शर्म की बात हो गयी | रास्ते भर उसका बढ़ा चढ़ा हुआ हुआ भाषण चलता रहा |
आज कल में एक आर्टिकल देखा हूँ इंटरनेट पर जिसमें लिखा था सनी सर क्या ,एक हाथी भी हैंड पंप नहीं उखाड़ सकता |मानता हूँ, पर उस लड़के का अपना संस्करण था ग़दर को लेकर | उसने बताया सनी हैंडपंप के साथ उसमें लगे लोहे के पाइप तक उखाड़ चुके थे | उखारने के बाद, उसने सबकी इन्ही पाइप से धुलाई भी की |
 उन दिनों बात समझ नहीं आती  थी लेकिन अभी लगता है की निर्देशक को इस तरह के एक्शन डिज़ाइन करना पड़ा होगा ताकी तारा सिंह के फूटने का प्रभाव सिद्ध हो सके | अतिरेक से औचित्य का प्रश्न मिट गया था हैंडपंप उखारना खटकता नहीं है|
खैर ज़ी  म्यूजिक के कैसेट के कवर पे हरी कपड़ों में सकीना के साथ तारा सिंह को  "मुसाफिर जाने वाले" और "घर आजा परदेशी" गाते हुए सोचने के बाद मैंने वो फ़िल्म सिनेमा घर में देखी |
फ़िल्मों के उत्सव अब भी मनते थे पर यह आख़िरी कुछेक साल थे बस २-३ साल में कम हो कर गायब हो गए |

अभी के लौंडे जिन्होंने शायद बेताब,घातक ,अर्जुन, ग़दर ,जोर,ज़िदी ,सलाखों  नहीं देखी उनको पता ही नहीं  चलेगा सनी देओल और ग़दर क्या फेनोमेनन है |   
गोदार्द,फेलीनी ,नोलन,कोरोसवा,किस्लोवस्की,मासीदी, इनारीतू और पता नहीं कितनी विदेशी फ़िल्मों  के मास्टर्स को देखने  बाबजूद अब भी अपने को कभी कभार ग़दर, बेताब और अर्जुन माँगता है |

2002 के अप्रैल में मैं राजगीर में हॉस्टल आ गया उस दिन  मेरे  बचपन के दिन ख़तम हुए ,आज़ादी ख़तम हुई ,तब घर ऐसा छुटा अब तक खुद को हॉस्टल में पाता हूँ  | यहाँ हम बड़े और समझदार हो गए थे अगले दिन ही ,अपनी पलंग अपने बॉक्स, अपनी ज़िन्दगी को सम्भालते हुए | वो घर सपनो जैसा था अब भी घर से मोहभंग ना हुआ  ना सनी देओल ही छुटा | दिल आज भी बच्चा है वो दिन ढूँढता है ,वो हवा में तैरते संवाद ढूँढता है,वो घर ढूंढता है |








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