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Friday, December 2, 2016

फिल्‍म समीक्षा : कहानी 2 : दुर्गा रानी सिंह



फिल्‍म रिव्‍यू
फिसला है रोमांच
कहानी 2 : दुर्गा रानी सिंह
-अजय ब्रह्मात्‍मज
सुजॉय घोष
चार सालों से ज्‍यादा समय बीत गया। मार्च 2012 में सीमित बजट में सुजॉय घोष ने कहानी निर्देशित की थी। पति की तलाश में कोलकाता में भटकती गर्भवती महिला की रोमांचक कहानी ने दर्शकों को रोमांचित किया था। अभी दिसंबर में सुजॉय घोष की कहानी 2 आई है। इस फिल्‍म का पूरा शीर्षक कहानी 2 : दुर्गा रानी सिंह है। पिछली फिल्‍म की कहानी से इस फिल्‍म को कोई संबंध नहीं है। निर्माता और निर्देशक ने पिछली कहानी की कामयाबी का वर्क कहानी 2 पर डाल दिया है। यह वर्क कोलकाता,सुजॉय घोष और विद्या बालन के रूप में नई फिल्‍म से चिपका है। अगर आप पुरानी फिल्‍म के रोमांच की उम्‍मीद के साथ कहानी 2 देखने की योजना बना रहे हैं तो यह जान लें कि यह अलहदा फिल्‍म है। इसमें भी रोमांच,रहस्‍य और विद्या हैं,लेकिन इस फिल्‍म की कहानी बिल्‍कुल अलग है। यह दुर्गा रानी सिंह की कहानी है।
दुर्गा रानी सिंह का व्‍याकुल अतीत है। बचपन में किसी रिश्‍तेदार ने उसे यहां-वहां छुआ था। उस दर्दनाक अनुभव से वह अभी तक नहीं उबर सकी है,इसलिए उसका रोमांटिक जीवन परेशान हाल है। अचानक छूने भर से वह चौंक जाती है। उसे अपने स्‍कूल में मिनी दिखती है। मिनी के असामान्‍य व्‍यवहार से दुर्गा रानी सिंह को शक-ओ-सुबहा होता है। वह मिनी के करीब आती है। घृणीत भयावह सच जानने के बाद वह मिनी को उसके चाचा और दादी के चुगल से आजाद करना चाहती है। मिनी और दुर्गा की बातचीत और बैठकों से घर की चहारदीवारी में परिवार के अंदर चल रहे बाल यौन शोषण(चाइल्‍ड सेक्‍सुअल अब्‍यूज) की जानकारी मिलती है।
सुजॉय घोष ने अपने लेखकों के साथ मिल कर समाज के एक बड़े मुद्दे को रोमांचक कहानी का हिस्‍सा बना कर चुस्‍त तरीके से पेश किया है। फिल्‍म तेज गति से आगे बढ़ती है। मिनी और दुर्गा के साथ हमारा जुड़ाव हो जाता है। दोनों का समान दर्द सहानुभूति पैदा करता है। भोले चाचा और शालीन दादी से हमें घृणा होती है। लेखक-निर्देशक ने कलिम्‍पोंग की पूष्‍ठभूमि में यहां तक की कहानी से बांधे रखा है। इंटरवल के बाद कहानी फिसलती है और फिर अनुमानित प्रसंगों और नतीजों की ओर मुड़ जाती है। रोमांच कम होता है,क्‍योंकि यह अंदाजा लग जाता है कि फिल्‍म हिंदी फिल्‍मों के प्रचलित राजमार्ग पर ही आएगी। इंटरवल के
एक ही औरत की दोहरी भूमिका में विद्या बालन फिर से साबित करती हैं कि वे ऐसी कहानियों और फिल्‍मों के लिए उचित अभिनेत्री हैं। दुर्गा रानी सिंह और विद्या सिन्‍हा के रूप में एक ही औरत के दो व्‍यक्तित्‍वों को उन्‍होने बखूबी समझा और प्रभावशाली तरीके से जीवंत किया है। दोनों की चिंता के केंद्र में मिनी है,लेकिन समय के साथ बदलते दायित्‍व का विद्या बालन अच्‍छी तरह निभाया है। विद्या बालन समर्थ अभिनेत्री हैं। वह चालू किस्‍म की भूमिकाओं में बेअसर रहती हैं,लेकिन लीक से अलग स्‍वतंत्र किरदार निभाने में वह माहिर हैं। कहानी 2 ताजा सबूत है। कामकाजी महिला के मोंटाज में विद्या बालन जंचती हैं। इस बार अर्जुन रामपाल भी किरदार में दिखे। उन्‍होंने इंद्रजीत के रूप में आ‍कर्षित किया। अन्‍य सहयोगी किरदारों में आए स्‍थानीय कलाकारों का योगदान उल्‍लेखनीय है। जुगल हंसराज की स्‍वाभाविकता फिल्‍मी खलनायक बनते ही खत्‍म हो जाती है। लेखक-निर्देशक उनके चरित्र के निर्वाह में चूक गए हैं।   
सुजॉय घोष की फिल्‍मों में कोलकाता सशक्‍त किरदार के रूप में रहता है। इस फिल्‍म में वे कोलकाता की कुछ नई गलियों और स्‍थानों में ले जाते हैं। कहानी 2 में कोलकाता,चंदनपुर और कलिम्‍पोंग का परिवेश कहानी को ठोस आधार देता है। हालांकि मुख्‍य किरदार हिंदी ही बोलते हैं,लेकिन माहौल पूरी तरह से बंगाली रहता है। सहयोगी किरदारों और कानों में आती आवाजों और कोलाहल में स्‍थानीय पुट रहता है। किरदारों के बात-वयवहार में भी बंगाल की छटा रहती है।
फिल्‍म की थीम के मुताबिक सुजॉय घोष ने फिल्‍म का रंग उदास और सलेटी रखा है।
अवधि 130 मिनट
तीन स्‍टार 

Thursday, December 1, 2016

दरअसल : वर्चुअल रियलिटी



दरअसल...
वर्चुअल रियलिटी
-अजय ब्रह्मात्‍मज
पिछलें दिनों गोवा में आयोजित फिल्‍म बाजार में वर्चुअल रियलिटी के प्रत्‍यक्ष एहसास के लिए एक कक्ष रखा गया था। फिल्‍म बाजार में आए प्रतिनिधि इस कक्ष में जाकर वर्चुअल रियलिटी का अनुभव ले सकते थे। कुछ सालों से ऑडियो विजुअल मीडियम की यह नई खोज सभी को आकर्षित कर रही है। अभी प्रयोग चल रहे हैं। इसे अधिकाधिक उपयोगी और किफायती बनाने का प्रयास जारी है। यह तकनीक तो कुछ महीनों या सालों में अासानी से उपलब्‍ध हो जाएगी। अब जरूरत है ऐसे कल्‍पनाशील लेखकों की जो इस तकनीक के हिसाब से स्क्रिप्‍ट लिख सकें। अभी तक मुख्‍य रूप से इवेंट या समारोहों के वीआर(वर्चुअल रियलिटी) फुटेज तैयार किए जा रहे हैं। मांग और मौजूदगी बढ़ने पर हमें कंटेंट की जरूरत पड़ेगी।
वर्चुअल रियलिटी 360 डिग्री और 3डी से भी आगे का ऑडियो विजुअल अनुभव है। वर्चुअल रियलिटी का गॉगल्‍स या चश्‍मे की तरह का खास उपकरण आंखों पर चड़ा लेने और ईयर फोन कान पर लगा लेने के बाद हम अपने परिवेश से कट जाते हैं। हमारी आंखों के सामने केवल दृश्‍य होते हैं और कानों में आवाजें...किसी भी स्‍थान पर बैठे रहने के बावजूद हम यकायक निर्दिष्‍ट स्‍थान में पहुंच जाते हैं। कुछ ही देर में हम उस इवेंट या दृश्‍यलोक के भागीदार हो जाते हैं। दसों दिशाओं चल रही गतिविधियों को हम देख सकते हैं। यों लगता है कि हम कांच के फर्श पर बैठे हैं। हमारे पांवों के तले की दुनिया भी हमारे चाक्षुष अनुभव का हिस्‍सा हो जाती है। इस अनुभव को महसूस करने पर ही इसके प्रभाव का अंदाजा हो सकता है। युनाइटेड नेशन में एआर रहमान के वंदे मातरम की प्रस्‍तुति को वर्चुअल रियलिटी में देखते समय यों लग रहा था कि हम कहीं बीच में बैठ गए हैं और सारी गतिविधियां हमारे इर्द-गिर्द हो रही हैं।
जानकार बताते हैं कि वर्चुअल रियलिटी का उपयोग श्सिक्षण,मेडिकल,विज्ञान,फिल्‍मों के साथ जीवन के तमाम क्षेत्रों में हो सकता है। मेडिकल साइंस में इसका उपयोग अशक्‍त और पक्षाघात से ग्रस्‍त रोगियों को स्‍टीमुलेट करने में किया जा सकता है। बाहरी दुनिया से पृथक कर रोगियों का बेहतर इलाज किया जा सकता है। उनके दिमाग के स्‍नायु ही उनके शिथिल स्‍नायुओं को झंकृत कर सकेंगे। मेडिकल साइंस में इसे एक क्रांति के रूप में देखा जा रहा है।
वर्चुअल रियलिटी मनोरंजन के अनुभव को गहरा और विस्‍तृत कर देगा। हम सीधे किरदारों के बीच पहुंच जाएंगे और उनकी दुनिया का हिस्‍सा बन जाएंगे। फिल्‍मों में इसके उपयोग पर फिल्‍मकार और तकनीशियन काम कर रहे हैं। माना जा रहा है कि कुछ महीनों में ही यानी 2017 में वीआर फिल्‍में और शोज तैयार कर लिए जाएंगे। फिलहाल यह थोड़ा महंगा और जटिल कार्य है। बताते हैं कि वीआर शूट के लिए मिलने वाले कैमरों की कीमत ही 60 लाख से 1 करोड़ के बीच है। इसकी शूटिंग में कई कैमरे एक साथ इस्‍तेमाल किए जाते हैं। फिर सभी गतिचित्रों(फुटेज) की बारीक सिलाई की जाती है। कहीं भी कोई झटका न लगे। स्‍मार्ट फोन के कैमरे से कभी आप ने पैनोरोमिक तस्‍वीरे ली होंगी। यह उसी का वृहद विस्‍तार है। किसी भी खास पल में दसों दिशाओं में चल रही घटनाओं को हम एक साथ कैद कर सकते हैं और उन्‍हें दिखा सकते हैं।
वर्चुअल रियलिटी के पहले अनुभव में इसकी कुछ सीमाएं और अड़चनें भी जाहिर हुईं। फिल्‍में देखते समय हम सामने चल रहे क्रिया-कलापों पर गौर करते हैं। उन किरदारों के साथ जुड़ जाते हैं। पूरी फिल्‍म में हम उनके साथ रहते हैं। हम नहीं पता रहता कि नायक-नायिका के आसपास और क्‍या हो रहा है? वीआर देखते समय यह एहसास बना रहता है कि हमारे पीछे भी कुछ हो रहा है। हमारे पांवों के नीचे और सिर के ऊपर भी ्रिया-कलाप जारी हैं। इसकी वजह से दृश्‍यों में हमारी संलग्‍नता और एकाग्रता टूटती है। जानकारों ने बताया कि आरंभ में यह अनुभव खंडित लग सकता है,लेकिन धीरे-धीरे आदत होने पर हम आनंदित होना सीख लेंगे। हमारी रस ग्राह्यता वर्चुअल रियलिटी के अनुरूप हो जाएगी।
वर्चुअल रियजलटी को हिंदी में आभासी यथार्थ या वास्‍तविकता कह सकते हैं। इसका गॉगल्‍स बाजार में 500 से 5000 रुपए के बीच उपलब्‍ध है। क्‍या आप मनोरंजन के इस आभासी यथार्थ के लिए तैयार हैं। अभी भले ही ना-नुकूर करें,लेकिन यह तय है कि य‍ह बड़े पैमाने पर हमारे जीवन का प्रभावित करेगा।

Saturday, November 26, 2016

दरअसल : सितारों के बच्‍चे



दरअसल...
सितारों के बच्‍चे
-अजय ब्रह्मात्‍मज
हम यह मान कर चलते हैं कि फिल्‍म इंडस्‍ट्री में सितारों और अन्‍य सेलिब्रिटी के बच्‍चे बड़ चैन व आराम से रहते होंगे। सुख-सुविधाओं के बीच पल रहे उनके बच्‍चों को किसी प्रकार की तकलीफ नहीं होगी। जरूरत की सारी चीजें उन्‍हें मिल जाती होंगी और उनकी ख्‍वाहिशें हमेशा पूरी होती होंगी। ऐसा है भी और नहीं भी है। मां-बाप की लोकप्रियता की वजह से इन बच्‍चों की परवरिश समान आर्थिक समूह के बच्‍चों से अलग हो जाती है। बचपन से ही उन्‍हें यह एहसास हो जाता है कि उनके मां-बाप कुछ खास हैं। सोशल मीडिया और मीडिया के कारण छोटी उम्र में ही उन्‍हें पता चल जाता है कि वे अपने सहपाठियों और स्‍कूल के दोस्‍तों से अलग हैं। ऐसे बचपन के अनुभव के बाद स्‍टार बने कलाकारों ने निजी बातचीत में स्‍वीकार किया है कि हाई स्‍कूल तक आते-आते उनके दोस्‍तों का व्‍यवहार बदल जाता है। वे या तो दूरी बना लेते हैं या उनकी अपेक्षाएं बढ़ जाती हैं। दोनों ही स्थितियों में सितारों के बच्‍चे समाज से कट जाते हैं। उनका बचपन नार्मल नहीं रह जाता। वे दूसरे सितारों के बच्‍चों के साथ नकली और दिखावटी दुनिया में बड़े होते हैं।
आयुष्‍मान खुराना और शुजीत सरकार का परिवार मुंबई में नहीं रहता। दोनों ने अपने परिवार अपने जन्‍म स्‍थान में रखे हैं। आयुष्‍मान खुराना का परिवार चंडीगढ़ में रहता है और शुजीत सरकार को कोलकाता में। इस तरह वे अपने बच्‍चों को फिल्‍म इंडस्‍ट्री की रोजमर्रा चमक-दमक से दूर रखते हैं। संचार माध्यमों और यातायात की सहूलियतें बढ़ने से इस स्‍तर के कलाकारों के लिए फर्क नहीं पड़ता कि वे कहां से ऑपरेट करते हैं। इन दिनों फिल्‍म इंडस्‍ट्री की सेलिब्रिटी के साथ दूसरे संपन्‍न लोग भी अपने परिवारों और बच्‍चों को महानगरीय शोरगुल से अलग रखते हैं। बच्‍चे थोड़े बड़े होते ही देश-विदेश के बोर्डिंग स्‍कूलों में चले जाते हैं। यह अलग बात है कि इस प्रक्रिया में उन्‍हें दुनिया का सामान्‍य ज्ञान भी नहीं मिल पाता। बार में फिल्‍मों में आने पर वे अपनी पिछली पीढि़यों की तरह समाज से परिचित नहीं होते। यह उनकी फिल्‍मों और किरदारों में साफ दिखता है।
अपने बच्‍चों की सेहत,सुरक्षा और करिअर के लिए स्‍टार मां-बाप देश के किसी दूसरे नागरिक के समान ही चिंतित रहते हैं। किशोर उम्र में उनकी जिद और भटकन से वे भी व्‍यथ्ति होते हैं। कहेश भट्ट ने अपने कॉलम में कभी लिखा था कि वे अपनी बेटियों की सुरक्षा के लिए परेशान हो जाते हैं। एक बार उनकी बेटी शाहीन या आलिया किसी डिस्‍को पार्टी में चली गई थीं और देर रात हो गई थी। उन्‍होंने किसी सामान्‍य पिता की तरह अपनी चिंता जाहिर की थीं। हाल-फिलहाल में एक बार शाह रूख खान के इंटरव्‍यू के लिए हम उनके वैनिटी वैन में आए तो उन्‍हें फोन पर देखा। वे मेाबाइल पर किसी से बात कर रहे थे। उनके स्‍वर में चिंता थी। पता चला कि सुहाना परीक्षा के बाद अपनी दोस्‍तों के साथ पार्टी पर जा रही हैं। पिता शाह रूख खान चिंतित थे कि उसने सिक्‍युरिटी गार्ड साथ में लिए हैं कि नहीं। और चलते-चलते यह भी पूछ लिया कि पैसे हैं न? ठीक वैसे ही जैसे हम अपनी बेटियों से आश्‍वस्‍त होते हैं कि उनके पास पैसे हैं न?
कुछ समय पहले किरण राव से मुलाकात हुई। औपचारिक इंटरव्‍यू के बाद उनके बेटे आजाद के बारे में बात होने लगी। आजाद की अच्‍छी परवरिश की योजनाओं के बीच उन्‍हें यह खयाल रखना पड़ता है कि वह सुरक्षित रहे। उसे खेलने और बचपन की अन्‍य गतिविधियों के लिए भेजा जाता है,लेकिन आसपास गार्ड मौजूद रहते हैं। यही स्थिति सभी पॉपुलर सेलिब्रिटी के बच्‍चों के साथ रहती है। उन बच्‍चों पर क्‍या गुजरती होगी? क्‍या वे सामान्‍य तरीके से बड़े होते हैं? छोटी उम्र में ही अतिरिक्‍त ध्‍यान मिलने से उनकी सोच-समझ तो प्रभावित होगी। देश के सामान्‍य नागरिकों के प्रति उनकी क्‍या धारणा बनती है? अनेक सवाल हैं।
 

Friday, November 25, 2016

फिल्‍म समीक्षा : डियर जिंदगी



फिल्‍म समीक्षा
डियर जिंदगी
-अजय ब्रह्मात्‍मज

हम सभी की जिंदगी जितनी आसान दिखती है,उतनी होती नहीं है। हम सभी की उलझनें हैं,ग्रंथियां हैं,दिक्कतें हैं...हम सभी पूरी जिंदगी उन्‍हें सुलझाते रहते हैं। खुश रहने की कोशिश करते हैं। अनसुलझी गुत्थियों से एडजस्‍ट कर लेते हैं। बाहर से सब कुछ शांत,सुचारू और स्थिर लगता है,लेकिन अंदर ही अंदर खदबदाहट जारी रहती है। किसी नाजुक क्षण में सच का एहसास होता है तो बची जिंदगी खुशगवार हो जाती है। गौरी शिंदे की डियर जिंदगी क्‍यारा उर्फ कोको की जिंदगी में झांकती है। क्‍यारा अकेली ऐसी लड़की नहीं है। अगर हम अपने आसपास देखें तो अनेक लड़कियां मिलेंगी। वे सभी जूझ रही हैं। अगर समय पर उनकी भी जिंदगी में जहांगीर खान जैसा दिमाग का डाक्‍टर आ जाए तो शेष जिंदगी सुधर जाए।
हिंदी फिल्‍मों की नायिकाएं अब काम करने लगी हैं। उनका एक प्रोफेशन होता है। क्‍यारा उभरती सिनेमैटोग्राफर है। वह स्‍वतंत्र रूप से फीचर फिल्‍म शूट करना चाहती है। उसे रघुवेंद्र से आश्‍वासन मिलता है। संयोग कुछ ऐसा बनता है कि वह स्‍वयं ही मुकर जाती है। मानसिक दुविधा में वह अनिच्‍छा के साथ अपने मां-बाप के पास गोवा लौटती है। गोवा में उसकी मुलाकात दिमाग के डाक्‍टर जहांगीर खान से होती है। अपनी अनिद्रा के इलाज के लिए वह मिलती है तो बातचीत और सेशन के क्रम में उसके जीवन की गुत्थियों की जानकारी मिलती है। जहांगीर खान गुत्थियों की गांठों को ढीली कर देता है। उन्‍हें वह खुद ही खोलती है।
गुत्थियों को खोलने के क्रम में वह जब मां-बाप और उनके करीबी दोस्‍तों के बीच गांठ पर उंगली रखती है तो सभी चौंक पड़ते हैं। हमें क्‍यारा की जिंदगी के कंफ्यूजन और जटिलताओं की वजह मालूम होती है और गौरी शिंदे धीरे से पैरेंटिंग के मुद्दे को ले आती हैं। करिअर और कामयाबी के दबाव में मां-बाप अपने बच्‍चों के साथ ज्‍यादतियां करते रहते हैं। उन्‍हें पता ही नहीं चलता और वे उन्‍हें किसी और दिशा में मोड़ देते हैं। उनके कंधों पर हमेशा अपनी अपेक्षाओं का बोझ डाल देते हैं। बच्‍चे निखर नहीं पाते। वे घुटते रहते हैं। अपनी जिंदगी में अधूरे रहते हैं। कई बार वे खुद भी नहीं समझ पाते कि कहां चूक हो गई और उनके हाथों से क्‍या-क्‍या फिसल गया? डियर जिंदगी पैरेंटिंग की भूलों के प्रति सावधान करती है।
क्‍यारा की निजी(इस पीढ़ी की प्रतिनिधि) समस्‍या तक पहुंचने के लिए गौरी शिंदे लंबा रास्‍ता चुनती हैं। फिल्‍म यहां थोड़ी बिखरी और धीमी लगती है। हम क्‍यारा के साथ ही उसके बदलते दोस्‍तों सिड,रघुवेंद्र और रुमी से भी परिचित होते हैं। उसकी दो सहेलियां भी मिलती हैं। क्‍यारा को जिस परफेक्‍ट की तलाश है,वह उसे नहीं मिल पा रहा है। इसके पहले कि उसके दोस्‍त उसे छोड़ें,वह खुद को समेट लेती है,काट लेती है। भावनात्‍मक संबल और प्रेम की तलाश में भटकती क्‍यारा को जानकारी नहीं है कि अधूरापन उसके अंदर है। दिमाग के डाक्‍टर से मिलने के बाद यह स्‍पष्‍ट होता है। जिंदगी की छोटी तकलीफों,ग्रंथियों और भूलों को पाले रखने के बजाए उन्‍हें छोड़ देने में ही सुख है।
गोवा की पृष्‍ठभूमि में डियर जिंदगी के किरदार विश्‍वसनीय और असली लगते हैं। चमक-दमक और सजावटी जिंदगी और परिवेश में लिप्‍त फिल्‍मकारों को इस फिल्‍म सीख लेनी चाहिए। बहरहाल, गौरी शिंदे ने अपने तकनीकी सहयोगियों की मदद से फिल्‍म का कैनवास सरल और वास्‍तविक रखा है। उन्‍होंने कलाकारों के चुनाव में किरदारों के मिजाज का खयाल रखा है। क्‍यारा के परिवार के सभी सदस्‍य किसी आम मध्‍यवर्गीय परिवार के सदस्‍य लगते हैं। उनकी बातें और चिंताएं भी मध्‍यवर्गीय सीमाओं में हैं। गौरी बारीकी से घर-परिवार और समाज की धारणाओं और मान्‍यताओं को रेखांकित करती जराती है। वह रुकती नहीं हैं। वह मूल कथा तक पहुंचती हैं।
शाह रुख खान अपनी प्रचलित छवि से अलग साधारण किरदार में सहज हैं। उनका चार्म बरकरार है। वह अपने अंदाज और किरदार के मिजाज से आकर्षक लगते हैं। ऐसे किरदार लोकप्रिय अभिनेताओं को अभिनय का अवसर देते हैं। शाह रुख खान इस अवसर का लाभ उठाते हैं। आलिया भट्ट अपनी पीढ़ी की समर्थ अभिनेत्री के तौर पर उभर रही हैं। उन्‍हें एक और मौका मिला है। क्‍यारा के अवसाद,द्वंद्व और महात्‍वाकांक्षा को उन्‍होंने दृश्‍यों के मुताबिक असरदार तरीके से पेश किया है। लंबे संवाद बोलते समय उच्‍चारण की अस्‍पष्‍टता से वह एक-दो संवादों में लटपटा गई हैं। नाटकीय और इमोशनल दृश्‍यों में बदसूरत दिखने से उन्‍हें डर नहीं लगता। सहयोगी भूमिकाओं में इरा दूबे,यशस्विनी दायमा,कुणाल कपूप,अंगद बेदी और क्‍यारा के मां-पिता और भाई बने कलाकारों ने बढि़या योगदान किया है।
अवधि- 149 मिनट
साढ़े तीन स्‍टार

फिल्‍म समीक्षा : मोह माया मनी



फिल्‍म समीक्षा
महानगरीय माया
मोह माया मनी
-अजय ब्रह्मात्‍मज
मुनीष भारद्वाज ने महानगरीय समाज के एक युवा दंपति अमन और दिव्‍या को केंद्र में रख कर पारिवारिक और सामाजिक विसंगतियों को जाहिर किया है। अमन और दिव्‍या दिल्‍ली में रहते हैं। दिव्‍या के पास चैनल की अच्‍छी नौकरी है। वह जिम्‍मेदार पद पर है। अमन रियल एस्‍टेट एजेंट है। वह कमीशन और उलटफेर के धंधे में लिप्‍त है। उसे जल्‍दी से जल्‍दी अमीर होना है। दोनों अपनी जिंदगियों में व्‍यस्‍त है। शादी के बाद उनके पास एक-दूसरे के लिए समय नहीं है। समय के साथ मुश्किलें और जटिलताएं बढ़ती हैं। अमन दुष्‍चक्र में फंसता है और अपने अपराध में दिव्‍या को भी शामिल कर लेता है। देखें तो दोनों साथ रहने के बावजूद एक-दूसरे से अनभिज्ञ होते जा रहे हैं। महानगरीय परिवारों में ऐसे संबंध दिखाई पड़ने लगे हैं। कई बार वे शादी के कुछ सालों में ही तलाक में बदल जाते हैं या फिर विद्रूप तरीके से किसी कारण या स्‍वार्थ की वजह से चलते रहते हैं।
मुनीष भारद्वाज ने वर्तमान उपभोक्‍ता समाज के दो महात्‍वाकांक्षी व्‍य‍क्तियों की एक सामान्‍य कहानी ली है। उन्‍होंने नए प्रसंग और परिस्थिति में इस कहानी को रचा है। अतिरिक्‍म और अधिक की लालसा में अनेक व्‍यक्ति और परिवार बिखर रहे हैं। अगर समृद्धि और विकास के प्रयास में ईमानदारी नहीं है तो उसके दुष्‍प्रभाव जाहिर होते हैं। मोह माया मनी संबंधों की जटिलता में उलझे,रिश्‍तों में बढ़ रही अनैतिकता के शिकार और कामयाबी की फिक्र में कमजोर हो रहे किरदारों की कहानी है।
लेखक नर्देशक मुनीष भारद्वाज और लेखन में उनकी सहयोगी मानषी निर्मजा जैन ने पटकथा में पेंच रखे हैं। उन्‍होंने उसके के हिसाब से शिल्‍प चुना है। शुरू में वह अखरता है,लेकिन बाद में वह कहानी का प्रभाव बढ़ाता है। मुनीष किसी भी दृश्‍य के बेवजह विस्‍तार में नहीं गए हैं। फिल्‍म का एक किरदार दिल्‍ली भी है। मुनीष ने दिल्‍ली शहर का प्रतीकात्‍मक इस्‍तेमाल किया है। मशहूर ठिकानों पर गए बगैर वे दिल्‍ली का माहौल ले आते हैं। सहयोगी कलाकारों के चुनाव और उनके बोलने के लहजे से दिल्‍ली की खासियत मुखर होती है।
सहयोगी कलाकारों में विदुषी मेहरा,अश्‍वत्‍थ भट्ट,देवेन्‍दर चौहान और अनंत राणा का अभिनय उल्‍लेखनीय है। रणवीर शौरी इस मिजाज के किरदार पहले भी निभा चुके हैं। इस बार थोड़ा अलग आयाम और विस्‍तार है। उन्‍होंने किरदार की निराशा और ललक को अच्‍छी तरह व्‍यक्‍त किया है। कुछ नाटकीय दृश्‍यों में उनकी सहजता प्रभावित करती है। नेहा धूपिया ने दिव्‍या के किरदार को समझा और आत्‍मसात किया है। फिल्‍म के क्‍लाइमेक्‍स में पश्‍चाताप में आधुनिक और औरत की टूटन और विवशता को अच्‍छी तरह जाहिर करती हैं।
मोह माया मनी चुस्‍त फिल्‍म है। घटनाक्रम तेजी से घटते हैं और गति बनी रहती है।
अवधि- 108 मिनट
तीन स्‍टार 

Tuesday, November 22, 2016

इम्तियाज अली से विस्‍तृत बातचीत




-अजय ब्रह्मात्‍मज
जमशेदपुर में हमारे घर में फिल्म देखने का रिवाज था, पर बच्चों का फिल्म देखना अच्छा नहीं समझा जाता था। थोड़ा सा ढक छिपकर लोग फिल्म देखा करते थे। मेरे माता-पिता को फिल्मों का शौक था। वह लोग अपने माता-पिता से छिपकर फिल्म देखने जाया करते थे। मेरी पैदाइश के बाद भी वह दोनों स्कूटर पर बैठकर फिल्म देखने जाया करते थे। मेरे ख्याल से वह एक सम्मोहन था, जैसा की हर बच्चे को होता है। मैं भी फिल्मों के प्रति बचपन में सम्मोहित था। मैं बड़ा होने पर पटना गया, तब भी फिल्मों को लेकर वही माहौल रहा। आज भी मेरे निजी घर में फिल्म मैगजीन नहीं आती है। लेकिन देखा गया है कि जिस चीज के लिए मना किया जाएं, उसके प्रति सम्मोहन बढ़ता ही जाता है। हमारे परिवार में एक रिश्तेदार थे। उनके जमशेदपुर में सिनेमा हॅाल थे, जहां के लाइनमैन और दरबान हम लोगों को जानते थे। हम लोग बिना घर में किसी को बताए, सिनेमा हॉल में चले जाते थे। मुझे याद नहीं कि कौन सी फिल्में हुआ करती थी, जो मैं देखा करता था। जो एक बात तब की याद है वो है अंधेरा हॅाल, वहां पर भीड़ है, लोग बैठे हुए हैं, पान की पीक की सुगंध है, हॅाल में पंखा चल रहा है। यहां लोग बकायदा सिनेमा पर रिएक्ट कर रहे हैं। स्क्रीन से इंटरेक्ट कर रहे हैं।


जो स्क्रीन पर चल रहा है, वह बेहतरीन होता था। सुंदर महिलाएं, जवान हीरो। वे आपस में मोहब्बत और लड़ाई कर रहे हैं। मुझे वह सम्मोहित करनेवाला लगा। मेरे लिए वह 'लार्जर देन लाइफ' वाला विजन था। उस समय मुझे फिल्म से फर्क नहीं पड़ता था। मैं केवल सिनेमा हॅाल में जाना चाहता था। उस माहौल में शामिल होना चाहता था। मैं उस दुनिया का होना चाहता था। तब मैं  ये तो जानता था कि हीरो क्या होता है, लेकिन मुझे तब डायरेक्टर के बारे में इतनी जानकारी नहीं थी। सुभाष घई जैसे लोग होते थे तो इनके बारे में हम थोड़ा बहुत जानते थे। ये मेरी शुरुआत थी। फिर नौंवी क्लास में मैंने थिएटर करना शुरू किया। स्कूल में खुद से शिक्षक दिवस पर स्क्रिप्ट तैयार किया करता था। मैं धीरे-धीरे इसके प्रति गंभीर होने लगा। मैं खुद अपने स्कूल के प्ले डायरेक्टर करने लगा था। कॅालेज गया। वहां पर एक प्रोग्रेसिव हिंदी थिएटर ग्रुप में शामिल हुआ। साथ में कॅालेज में भी प्ले करता रहा। पर थिएटर में मुझे लगता था कि मैं यहां से जुड़ा हुआ नहीं हूं। मैं जो कहना चाह रहा था, मेरी सोच उसमें नहीं रही थी।

जब हम सिनेमा में आए थे तो हमारा कोई उद्देश्य नहीं था। हमने कभी ऐसा सोचा भी नहीं था कि हम कुछ तोड़ देंगे या बदल देंगे, या कुछ नया कर देंगे। हम में से किसी को भी नया करने की इच्छा नहीं थी। हम सबको या जिन लोगों को मैं उस समय से जानता हूं , हम सभी को यही चाहिए था कि हमें यहां पर काम मिल जाए। हम पैसे कमा लें। यहां पर गुजर बसर कर लें। हम इस दुनिया में रहें, जहां हमें रहने में मजा आता है। कितना अच्छा हो कि हम काम भी अपने मन मुताबिक करें और हमें पैसा भी मिल जाए। इससे बेहतर हमारे लिए कुछ नहीं हो सकता है। हम सब केवल इसी अरमान के साथ आए थे मुम्बई। अौर हम अब भी वही कर रहे हैं। सच कहूं तो हमें कुछ भी बदलना नहीं है। बात यह है कि हम लोग जाहिल थे। हम सिनेमा की विधा में शिक्षित लोग नहीं थे। हां, यह जरूर था कि हमने गलियों में लड़ाईयां की थीं, रास्तों पर क्रिकेट खेला था, डूबकर मोहब्बतें की थीं।

हम लोग ज़िन्दगी का तजुर्बा लेकर आए थे, क्योंकि हमारे पास वही था देने को। जब हम आए तो ऐसा लगा कि यहां पर किसी को पक्का पता नहीं है कि क्या चलता है। मुझे लग रहा है कि वह दौर ही ऐसा था। क्योंकि मुझे याद है कि भट्ट साहब और बाकी लोगों के साथ बात यही होती थी कि आखिर चल क्या रहा है, ये समझ में नहीं रहा है। बातें होती थीं कि लोग पैसे नहीं लगा रहे हैं। मतलब इस तरह का कुछ असुरक्षा वाला समय था। एक आदमी दूसरे की तरफ देख रहा था कि जैसे उसको पता है क्या चलेगा, अौर मुझे संदेह है। यह जो संदेह वाला मामला था इसमें कश्यप ने बोला कि नहीं सर, यही चलेगा। आप यह बनाइए। उन्होंने सोचा कि बना कर देख लेते हैं कि क्या बला है। शायद यही चल जाए। आपके पास एक करोड़ हैं। साठ लाख में फिल्म बनाई जाती थी। वह फिल्म बन गई। पर रिलीज नहीं हुई। पर उसके लिए और बाकी के लिए वह नई पौध थी। मेरे साथ भी ऐसा हुआ कि एक स्क्रिप्ट मैंने लिखी थी। यहां पर आपको जिंदा रहने के लिए कुछ ना कुछ बोलकर सामने वाले को मनाना पड़ता है। उनका जो डर है वह आपकी स्क्रिप्ट में है तो उसको बदलना भी पड़ेगा। इस तरह से हम सारे लोगों ने शुरुआत की।

हम लोगों को अपनी दुनिया का पता है। हमारे पास प्राथमिक अनुभव हैं उस दुनिया के। अब हमको कहानी लिखनी है तो यही सारी चीजें शामिल कर सकते हैं अौर इन्हीं पर फिल्म बना सकते हैं। मुंबई में कैसे रहते हैं अौर यहां पर कैसे फिल्म बनाई जानी चाहिए, इस बारे में हमें नहीं पता है। फिर हमने वैसे ही फिल्में लिखनी शुरु कर दीं। रेणु अग्रवाल मेरी हिंदी की शिक्षक रही हैं। मैं हिंदी में बड़ी मुश्किल से पास होता था। दसवीं में आकर मैंने हिंदी एकदम छोड़ दी। जब रेणु अग्रवाल को पता चला कि मैं हिंदी में डायलॅाग लिख रहा हूं, तो उन्हें सदमा लग गया। वह सोचने लगीं कि यह कैसे हो गया। वह कहने लगीं कि चलो तुम फिल्म डायरेक्ट कर रहे हो यह मैं समझ सकती हूं, क्योंकि तुम प्ले डायरेक्ट कर रहे थे। पर तुम लिख रहे हो, वो भी हिंदी में! यह कैसे हो सकता है? तुम्हारी तो बहुत ही घटिया हिंदी है। मैं तो अनुराग कश्यप को कह रहा था 'सोचा ना था' के डायलॅाग लिखने के लिए। वही लिखने वाला था। पर उसके पास समय नहीं था उस वक्त। मैंने इशान त्रिवेदी को कहा। लेकिन बात नहीं बनी। करते-कराते कुछ ऐसा हुआ कि अंत में मुझे ही डायलॅाग लिखने पड़े अपनी फिल्म के। जिस तरह से मेरे आस-पास लोग बात करते हैं, मुझे वही तरीका आता था। मैंने वही लिख दिया। दूसरी फिल्म में फिर से वही किया तो अवार्ड मिल गया। मुझे खुद लगा कि यह कैसे हो गया। हमें फिल्म बनाने के बारे में कुछ पता नहीं होने की वजह से हमारे पास कोई विकल्प नहीं था सिवाय इसके कि जो हमने खुद अपनी जिंदगी में देखा है या महसूस किया है, या सोचा है, उन चीजों को अपनी फिल्म में लिखें। अनुराग कश्यप भी वही करते हैं। अनुराग बसु भी वही करते हैं। राजकुमार हीरानी भी वही करते हैं।

आदित्य चोपड़ा से मैं कभी वैसे मिला नहीं हूं। वैसी सीधी पहचान नहीं है। पर कई बार फिल्म के बाद उनका मैसेज आता है। वह कहते हैं कि तुम्हारी फिल्मों हिंदुस्तान दिखता है। यह चीज देखने को मिलती है कि हमारा देश क्या है। मुझे यह बहुत अच्छा लगता है। सच ये है कि इसके अलावा हमें कुछ पता ही नहीं है। इससे ये भी पता चलता है कि पहले की फिल्मों से हमारी फिल्मों में अंतर है। अब यह अज्ञानता की वजह से है या कुछ और, पता नहीं। लेकिन लोगों को फिल्मों में नया स्वाद मिलने लगा है। हमारी फिल्मों में इस तरह के डायलॅाग होते हैं, जिस तरह से लोग असल में बात करते हैं हमारे यहां। हमारी फिल्मों के अलग होने में अौर चलने में भी डायलॅाग का बहुत बड़ा हाथ रहा है। इससे हमारी फिल्में औरों की फिल्मों से अलग पहचान में आई हैं। अब जैसे 'खोसला का घोंसला' दिबाकर बनर्जी की फिल्म है। उसकी जो भाषा है वो देखिए। दिबाकर डायलॅाग में लिखता है कि हम यहां पैशाब करने आए हैं। माने हद है। मगर सच ये है कि लोग वैसे ही बात करते हैं। या 'ज्यादा फैंटम मत बनों' जैसे संवाद। इस तरह की चीजें हमारी फिल्मों को अलग तेवर, अलग स्वाद देती हैं।
अब हमारे देश के नौजवान लोग केवल हमारी फिल्म नहीं देखते हैं। वह चाहते हैं कि हमारी फिल्म में कोई बात हो। अगर फिल्म में कोई बात नहीं होती है, फिल्म नापसंद की जाती है। फिर चाहे उसमें सारी चलनेवाली सामग्री क्यों ना हो। जैसे अनुराग बसु की फिल्म है 'बर्फी' इस फिल्म में इंटरटेनमेंट है। पर वह साथ ही कुछ कहना भी चाह रहा है। एक खास बात है। आप समझ लीजिए कि 'बर्फी' बनाना आज से दस या बीस साल पहले कितना जोखिम भरा काम था। एक आदमी जो सुन नहीं सकता, बोल नहीं सकता, वह फिल्म का हीरो है। लेकिन फिल्म रोमांटिक है। फिल्म दर्द से भरी हुई नहीं है। वह दो ऐसी लड़कियों के साथ रोमांस कर रहा है, जिसमें एक लड़की खुद नार्मल नहीं है। अनुराग ने जिस तरह से इस फिल्म को प्रस्तुत किया है वो खास है। फिल्म मंनोरजक तो है ही, साथ ही उसने कई सारी चीजें इंटरटेनमेंट को बढ़ाने के लिए की हैं फिल्म में, जैसा चार्ली चैप्लिन की फिल्मों में होता है। लेकिन मुझे लगता है कि इन सारी चीजों की वजह से वो फिल्म हिट नहीं हुई है। उस फिल्म की जो गंभीर भावनाएं हैं, वो लगातार शाइन करती हैं। यहां अनुराग बसु के पास कोई बात थी जो उन्होंने कही और लोगों ने उसे समझा अौर उसे अपनाया। अंत में इस फिल्म ने बहुत बड़ी कमर्शियल सफलता हासिल की।

उसके अलावा जो सबसे बड़ा उदाहरण है वह राजू हीरानी का है। मैं समझता हूं कि हमारे साथ-साथ ये फिल्म इंडस्ट्री भी बहुत खुशकिस्मत है, कि हमारे पास एक उदाहरण है देने को राजू हीरानी का। उनकी हर फिल्म सुपरहिट है। आप बॉक्स अॉफिस रिपोर्ट निकाल के देख लो कि सबसे ज्यादा पैसे किसने कमाए, वो राजू की फिल्मों ने कमाए। मुझे बड़ी खुशी होती है जब इस तरह की फिल्में कमर्शियल सफलता हासिल करती हैं। यह पता नहीं कि आज से बीस पच्चीस साल पहले होता तो क्या होता। मुझे लगता है कि फिल्म रूखी नहीं होनी चाहिए। ऐसा होता तो शायद पहले भी उसे अपनाया नहीं जाता, और वैसा शायद अब भी नहीं अपनाया जा रहा है। मगर फिल्म को भिगाने के लिए हम जो सिनेमाई मसाले इस्तेमाल करते हैं, जरूरी नहीं है कि वह बाहर के मसाले हों। ये तो हो सकता है ना कि उस कहानी के अंदर के स्वाद को ही हम बाहर निकालें। तब लोग भी उसको अपनायेंगे। फिल्ममेकर के तौर पर मेरी भी कोशिश हमेशा से यही रहती है। मुझे मजा भी इसी चीज में आता है कि बारीक बात हो या बड़ी, उसके अंदर का स्वाद क्या है। अौर इसी को फिल्म में कहानी के माध्यम से खोजने की कोशिश हो।

आज हमारे दर्शकों के लिए एक्सपोजर अधिक हो गया है। हमें पता चल रहा है कि दुनिया में और क्या चल रहा है। इसीलिए अब ये मुद्दा और ज्यादा मजबूत हो गया है कि आपकी अपनी बात क्या है। आप खुद क्या कहना चाहते हैं। आप में क्या खूबी है जो दूसरों में नहीं है। किसी भी दिन मुझे कोई फिल्म आंख बंद करके  देखनी होगी तो वह मुंबई की फिल्म होगी, हॅालीवुड की फिल्म नहीं देखूंगा। हमारी फिल्मों में एक व्यक्तित्व की आवाज सुनाई देती है। वह आवाज डायरेक्टर की हो आवश्यक नहीं है। वह एक मिलीजुली आवाज होती है जो आपको सुनाई देगी। हां, कभी उसमें गलती होगी। आपको पता चलेगा कि यह स्क्रीनप्ले गलत है। यह सीन यहां नहीं होना चाहिए था। जैसे मैंने 'सैराट' देखी। फिल्म की बुनियादी जरुरत है कि अगर कोई सीन कहानी को आगे नहीं बढ़ा रहा है तो वह सीन निकाल दो। लेकिन उन्होंने ऐसा बिल्कुल नहीं किया। ऐसे कई सीन हैं फिल्म में जो देखने में मजा ला रहे हैं। इसीलिए 'सैराट' तीन घंटे की फिल्म है। पर देखने में मजा आता है। यहां कोई डॅाक्टर या एनालिटिकल किस्म का फिल्म का अप्रोच नहीं है। यह एक दिल का अप्रोच है। हम फिल्में भी इसलिए ही बनाते हैं। हम सर्जरी के पाइंट से कोई फिल्म नहीं बनाते हैं। हमारे इस नॉन-सर्जिकल पाइंट के कारण कई बार गलतियां भी होती हैं। लेकिन इसीलिए हमारी फिल्म में निजी स्वाद होता है। उसी वजह से हमारी फिल्म अलग है। हम उस मामले में बेहतर हैं।
हमारी फिल्मों में संगीत और डांस है। मुझे बड़ा मजा आता है इसमें। मैं जब कोई फिल्म देखने जाता हूं तो सोचता हूं कि ढेर सारे गाने हों। हो सके तो लिप सिंक वाले गाने हों। अपनी फिल्मों में मेरी हालत थोड़ी सी खराब होती है। अब चलती फिल्म में हीरो कैसे गाना गाए। लेकिन मैं वो करना भी चाहता हूं। मुझे गाना शूट करने में इतना मजा आता है। संगीत जब मेरी फिल्म में आता है तो मुझे अधिक मजा आता है। मुझे पता है कि मैं खुश हूं गाने से तो दर्शक खुश होंगे। मैं कई बार कहानी में वजह दे देता हूं कि किरदार ऐसा था। मैंने कभी ऐसा भी किया है कि 'चोर बजारी' में पहली चार लाइन ना गाएं, अौर फिर गाने लगें। फिर 'तमाशा' में ऐसा माहौल दिखाऊं कि चार लोग गा रहे हैं फिर हीरो भी उसमें गाने लगता है। हर बार मैं गानों को फिल्म में शामिल करने के लिए तिकड़में लगाने लगता हूं।
जब हम किसी दूसरी भाषा की फिल्म देखते हैं तो उसमें टिपिकलपना होता है, जो उनके फिल्म की सभ्यता होती है। जब मैंने 'क्राउचिंग टाइगर हिडन ड्रेगनदेखी, उसका डायरेक्टर उस वक्त मुझे मिलता तो उसे शर्मिंदा होने की जरुरत नहीं है। फिल्म का असल होना आवश्यक नहीं है। उस पर विश्वास करना क्यों जरुरी है, क्या तभी मजा आएगा? हमें पता है कि फिल्म में दिखाई गई चीजें असल जीवन में हो सकती हैं, पर ये है तो एक फिल्म ही। अौर इसलिए भी क्योंकि यह हमारी सभ्यता है। हम अपने नाटक में भी गाना गाते थे। हमारी शुरुआत ही शायद गाने से ही हुई है। तो फिर उसका फिल्मों में रहना अच्छी बात है। हां, मुझे ऐसा लगता था कि 'जय हो' स्लमडॉग फिल्म में आया वह थोड़ा बेहतर तरीके से हो सकता था। पर मुझे शर्मिंदगी महसूस नहीं होती कि हमारी फिल्मों में गाना और डांस है। यह हमारी फिल्मों की खासियत है। उसको खोने के चक्कर में मैं खुद भी खो जाउंगा। मैं हमेशा कोशिश करता हूं कि किसी ना किसी तरीके से मेरी फिल्म में गाना जाए।
एक अौर बात। फिल्म में जितनी भी व्यक्तिगत आवाज फिल्मेकर की होती है, वह उतनी ही नॅान व्यक्तिगत भी होती है, क्योंकि उस प्रोसेस में दूसरे लोग शामिल होते हैं। जिनके नाम होते हैं, पद होते हैं। जैसे म्यूजिक डायरेक्टर, गीतकार, गायक। और जिनके नाम नहीं होते हैं वो भी। जैसे दरबान या आटो रिक्शा वाला। इन सबकी आवाज का इको आपके काम में दिखता है। वह कोई दूसरा एडिटर या कैमरामैन हो सकता है। उन लोगों की महक आप के काम में शामिल होती है। यह चीज मैंने समझी है। कोई भी चीज फिल्ममेंकिग के प्रोसेस में एक्सक्लूसिव नहीं होती है। सबकी आवाज मिलकर एक आवाज बनती है। जो दुर्भाग्य से अकेले फिल्ममेकर की आवाज कहलाती है। बहुत सारे ऐसे लोग हैं, जैसे कि आर रहमान, जिसका नाम फिल्ममेकर से बड़ा है। मैं उनके साथ काम कर चुका हूं। मुझे पता है कि वह किस तरह से मेरी फिल्म को बना रहे हैं। वो भी फिल्ममेकर हैं. इरशाद कामिल और प्रीतम किस तरह से मेरी फिल्म को बना रहे हैं मैं जानता हूं। अनु मेहता या आरती बजाज जैसे नाम। यह सारे फिल्ममेकर हैं। जरूरी नहीं है कि हर फिल्ममेकर डायरेक्टर हो। ऐसा मुमकिन है कि कोई आदमी साउंड मिक्सिंग इंजीनियर है या वह तकनीकीकार है। ऐसे अलग-अलग स्तर पर लोग काम करते हैं, जिनके फिल्म से जुड़ने की वजह से फिल्म बनती है।