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Friday, May 25, 2018

दरअसल : संजू की ज़िंदगी का नया ‘प्रस्थान’


दरअसल

संजू की ज़िंदगी का नयाप्रस्थान
-अजय ब्रह्मात्मज

खबर आई है कि संजय दत्त माँ नरगिस दत्त के जन्मदिन 1 जून से अपने होम प्रोडक्शन की नई फिल्म की शूटिंग आरम्भ करेंगे। सात सालों  के बाद उनके करियर का यह नयाप्रस्थानहोगा।  उनकी इस फिल्म का निर्देशन मूल तेलुगूप्रस्थानमके निर्देशक देवा कट्टा ही करेंगे। इस नई शुरुआत के लिए संजय दत्त को बधाई और यह ख़ुशी की बात है कि उन्होंने इसके लिए माँ का जन्मदिन ही चुना। इसी महीने माँ नरगिस के पुण्य दिवस के मौके पर उन्होंने एक ट्वीट किया था किमैं जो भी हूँ,तुम्हारी वजह से हूँ।  मैं तुम्हारी कमी महसूस करता हूँ।माँ के प्रति उमड़े उनके प्यार की क़द्र होनी चाहिए।
सचमुच संजय आज जो भी हैं,उसमें नरगिस दत्त की परवरिश और लाड-प्यार का बड़ा योगदान है। राजकुमार हिरानी की फिल्मसंजूमें माँ-बेटे के सम्बन्ध को देखना रोचक होगा। उनके निर्देशन में मनीषा कोइराला ने अवश्य नरगिस के लाड,चिंता और तकलीफ को परदे पर उतारा होगा। संजय दत्त पर छिटपुट रूप से इतना कुछ लिखा जा चुका है कि माँ-बेटे के बीच की भावनात्मक उथल-पुथल और घटनाओं के बारे में सभी कुछ ना कुछ जानते हैं। उनके आधार पर संजय के प्रति उनकी धारणाएं भी बनी हुई हैं,जिसमें उनकी बाद की गतिविधियों ने दृश्टिकोण तय किया है। उन्हें बिगड़ैल बाबा के नाम से सम्बोधित किया जाता रहा है। बहुत मुमकिन है कि हिरानी कीसंजूसे संजय दत्त के बारे में बनी निगेटिव धारणाएं टूटें। हम उस संजय को देख पाएं,जो माँ की मौत के तीन सालों के बाद उनका सन्देश सुन कर चार दिनों तक फूट-फूट कर रोते रहे। उस सन्देश में नरगिस ने उन्हेंविनम्रऔरनेक इंसानहोने की सलाह दी थी।
अनुशासन प्रिय सख्त पिता और लाड-दुलार में डूबी माँ के बीच संजय को लेकर झगडे होते थे। नरगिस के जीवनीकारों ने विस्तार से इन झगड़ों और मतभेदों के बारे में लिखा है। शुरू में नरगिस संजय दत्त को पिता की डाट-फटकार से बचाती रहीं। संजय के पक्ष में खड़ी रहीं। ऐसे भी मौके आये जा सुनील दत्त ने दो टूक शब्दों में कहा कि हम दोनों में से एक को चुन लो तो नरगिस ने बेटे को चुना। एक बार ऐसी ही एक घटना के बाद नाराज़ सुनील दत्त दो दिनों तक घर नहीं लौटे। बुरी संगत और बुरी आदतों ने संजय दत्त को बिगाड़ दिया था। माँ से मिली शह संजय दत्त को सुधारने की सुनील दत्त की कोशिशें नाकाम रहीं। बाद में नरगिस को एहसास हुआ कि उनसे चूक हो गई। संजय दत्त की चिंता में वह घुलती गईं। जीवन के आखिरी दिनों कैंसर ने उनकी तकलीफ और बढ़ा दी। पीड़ा के इसी दौर में उन्होंने बेटे संजय समेत परिवार के सभी सदस्यों के लिए सन्देश छोडे थे।   
आज की पीढ़ी के पाठकों को नरगिस की फ़िल्में देखनी चाहिए। उनकी जीवनियां पढ़नी चाहिए। नरगिस ने बतौर अभिनेत्री लम्बी सफल पारी पूरी करने के बाद सुनील दत्त के साथ गृहस्थी में कदम रखा। सम्परित पत्नी और माँ की भूमिका तक हो वह सीमित नहीं रहीं। उन्हें राज्य सभा की सदस्यता मिली थी और पद्मा श्री से भी उन्हें सम्मानित किया गया था। देश के पहले प्रधान मंत्री नेहरू से उनके पारिवारिक सम्बन्ध थे। देशसेवा और राष्ट्रभक्ति के मिसाल रही दत्त दंपति। उनकी मृत्यु पर तत्कालीन प्रधानमंती इंदिरा गाँधी ने कहा था,’नरगिस की मृत्यु की खबर से उन्हें गहरा दुःख हुआ है। जी करोड़ों दर्शकों ने उन्हें परदे पर देखा,उनके लिए नरगिस प्रतिभा और समर्पण की प्रतीक हैं। वह गर्मजोशी और सहानुभूति की साक्षात देवी थीं। उन्होंने अनगिनत सामाजिक मुद्दों का समर्थन किया।
उम्र के इस पड़ाव पर बीवी-बच्चों,फिल्म इंडस्ट्री और प्रशंसकों से घिरे होने बावजूद संजय दत्त की तन्हाई का अंदाजा लगाना मुश्किल है। जीवन के इस मोड़ पर उन्हें माँ की याद आ रही है। वे उनकी कमी महसूस कर रहे हैं। यह एक प्रकार से उनका पश्चाताप है।  हम यही उम्मीद करते हैं कि वे ज़िन्दगी की भूलों के अफ़सोस पर काबू कर साढ़े क़दमों से आगे बढ़ें। सफल रहें।
नरगिस की जीवनियां:
Darlingji,The true story of Nargis & Sunil Dutt,KIswar desai
THe LIfe and Times of Nargis,T J S George

फिल्‍म समीक्षा : परमाणु


फिल्‍म समीक्षा
फ़िल्मी राष्‍ट्रवाद का नवाचार
परमाणु
-अजंय ब्रह्मात्‍मज
हिंदी फिल्‍मों में राष्‍ट्रवाद का नवाचार चल रहा है। इन दिनों ऐसी फिल्‍मों में किसी घटना,ऐतिहासिक व्‍यक्ति,खिलाड़ी या प्रसंग पर फिल्‍में बनती है। तिरंगा झंडा,वतन या देश शब्‍द पिरोए गाने,राष्‍ट्र गर्व के कुछ संवाद और भाजपाई नेता के पुराने फुटेज दिखा कर नवाचार पूरा किया जाता है। अभिषेक शर्मा की नई फिल्‍म ‘परमाणु’ यह विधान विपन्‍नता में पूरी करती है। कल्‍पना और निर्माण की विपन्‍नता साफ झलकती है। राष्‍ट्र गौरव की इस घटना को कॉमिक बुक की तरह प्रस्‍तुत किया गया है। फिल्‍म देखते समय लेखक और निर्देशक के बचकानेपन पर हंसी आती है। कहीं फिल्‍म यूनिट यह नहीं समझ रही हो कि दर्शकों की ‘लाफ्टर’ उनकी सोच को एंडोर्स कर रही है। राष्‍ट्रवाद की ऐसी फिल्‍मों की गहरी आलोचना करने पर राष्‍ट्रद्रोही हो जाने का खतरा है।
हो सकता है कि यह फिल्‍म वर्तमान सरकार और भगवा भक्‍तों को बेहद पसंद आए। इसे करमुक्‍त करने और हर स्‍कूल में दिखाए जाने के निर्देश जारी किए जाएं। इे राष्‍ट्रीय पुरस्‍कार से सम्‍मनित किया जाए और फिर जॉन अब्राहम को श्रेष्‍ठ अभिनेता का पुरस्‍कार सूचना एवं प्रसारण मंत्री के हाथें दे दिया जाए। इन सारी संभावनाओं के बावजूद ‘परमाणु’ महत्‍वपूर्ण विषय पर बनी कमजोर फिल्‍म है। इस विषय का वितान कुछ किरदारों और घरेलू शक-ओ-शुबहा में समेट कर लेखक-निर्देशक गंभीर विषय के प्रति अपनी अपरिपक्‍वता जाहिर की है। आवश्‍यक तैयारी और निर्माण के संसाधनों की कमी प्रोडक्‍शन में नजर आती है। न्‍यूक्लियर टेस्‍ट के लिए बना लैब किसी टेलीफोन एक्‍सचेंज की तरह लगता है। ‘चेज’ का सीक्‍वेंस किसी पाकेटमार को पकड़ने के लिए गली के मुहाने पर रगेदते पड़ोसी की याद दिलाता है। सीआईए और आईएसआई के एजेंट कार्टून चरित्रों सरीखे ही हरकतें करते हैं। उनके लिए भारतीय सीमा में मुखबिरी करना कितना आसान है? दर्शक जान चुके हैं,फिर भी वह फिल्‍म के हीरो को बताता है कि मैं ‘वेटर’ नहीं हूं। मियां-बीवी के झगड़े का लॉजिक नहीं है। और 1998 में ‘महाभारत’ का प्रसारण...शायद रिपीट टेलीकास्‍ट रहा होगा।
लेखक-निर्देषक ने सच्‍ची घटनाओं के साथ काल्‍पनिक किरदारों को जोड़ा है। बाजपेयी,नवाज शरीफ और क्लिंटन वास्‍तविक हैं। उनके पुराने फटेज से फिल्‍म को विश्‍वसनीयता दी गई है। यह अलग बात है कि स्क्रिप्‍ट में उनके फुटेज गूंथने में सफाई नहीं रही है। यों जॉन अब्राहम ने पहले ही बता दिया है कि ‘इस फिल्‍म में दिखाई गई वास्‍तविक फुटेज का लक्ष्‍य सिर्फ कहानी को अभिलाषित प्रभाव देना  है’।
प्रधान मंत्री बाजपेयी के सचिव(ब्रजेश मिश्रा) की भूमिका में बोमन ईरानी प्रभावित नहीं करते। फिल्‍म के नायक जॉन अब्राहम के सहयोगी कलाकारों के चुनाव में उनकी अभिनय क्षमता का खयाल नहीं रखा गया है। सिर्फ बुजुर्ग किरदार को निभा रहे अभिनेता ही याद रह जाते हैं। डायना पेटी जैसी बेढब सैन्‍य अधिकारी टीम की कमजोर कड़ी हैं। उनकी बीवी की भूमिका निभा रही अभिनेत्री को कुछ नाटकीय दृश्‍य मिले हैं,जिनमें वह निराश नहीं करतीं। रहे जॉन अब्राहम तो उन्‍होंने अपनी सीमाओं में बेहतरीन प्रदर्शन किया है। भावभिव्‍यक्ति के संकट से वे निकल नहीं सके हैं।
इन कमियों के बावजूद जॉन अब्राहम और अभिषक शर्मा की तारीफ की जानी चाहिए कि उन्‍होंने घिसी-पिटी कहानी के दायरे से निकल कर कुछ अलग करने की कोशिश की है। उनके पास पर्याप्‍त साधन-संसाधन होते और स्क्रिप्‍ट पर थोड़ी और मेहनत की गई होती तो यह उल्‍ल्‍ेखनीय फिल्‍म बन जाती। उनका ध्‍येय प्रश्‍ंसनीय है।
अवधि – 129 मिनट
** दो स्‍टार  ाष्‍ट्र िक व्‍यक्तित्‍व क्त्त्व

Wednesday, May 23, 2018

सिनेजीवन : पाकिस्तान की काबिल और कामयाब अभिनेत्री हैं माहिरा खान


 सिनेजीवन
पाकिस्तान की काबिल और कामयाब अभिनेत्री हैं माहिरा खान
-अजय ब्रह्मात्मज

पिछले हफ्ते पाकिस्तान की जर्नलिस्ट मेहर तरार के एक ट्वीट ने ध्यान खींचा। इस ट्वीट में उन्होंने पाकिस्तान की अभिनेत्री माहिरा खान की तारीफ की थी।  मेहर ने उस ट्वीट के साथ माहिरा खान का एक वीडियो लिंक भी डाला था। वह लिंक उनके किसी टीवी शो या फिल्म का टुकड़ा नहीं था। 2017 में माहिरा ने ग्लोबल एजुकेशन एंड स्किल्स फोरम को इंटरनेशनल डेलीगेट्स के साथ सम्बोधित किया था। मैंने माहिरा का सम्बोधन सुना और तारीफ के मुताबिक उन्हें काबिल पाया। भारत हो या पाकिस्तान..... फिल्म अभिनेत्रियों के बारे में हमारी स्वाभाविक धारणा है कि वे सिर्फ नाच-गाना और मुस्कुराना जानती हैं। यह सही है कि फिल्मों के कलाकार (अभिनेत्री व् अभिनेता दोनों) राजनितिक रूप से अधिक समझदार नहीं होते,फिर भी देखा गया है कि मौका मिलने पर प्रबुद्ध श्रोताओं को वे निराश नहीं करते।  भारत की अभिनेत्रियों में आसानी से प्रियंका चोपड़ा का नाम लिया जा सकता है। मैंने खुद विदेशों में उन्हें पूरी तल्लीनता से ऐसे विमर्शों में भागीदारी करते देखा और सुना है।
माहिरा के उस वीडियो को देखने के बाद मेरी रूचि जगी तो मैंने कुछ और वीडियो देखे। इसी क्रम में मैंने बीबीसी के हार्ड टॉक के प्रेजेंटर स्टीफेन सुकेर के साथ उनकी बातचीत भी देखी-सुनी। यह बातचीत उनकी फिल्मवर्नाके पाकिस्तान में प्रतिबंधित और फिर रिलीज होने के साथ ही पाकिस्तान की सांस्कृतिक संकीर्णता के इर्द-गिर्द थी।  माहिरा पाकिस्तान की कमियों कौर कमजोरियों को स्वीकार करते हुए बार-बार यह दोहरा रही थीं कि इन तथ्यों के बावजूद मैं पाकिस्तान की प्रतिनिधि के तौर पर आप के सामने बैठी बात कर रही हूँ। इस बातचीत में माहिरा खान का आत्म गौरव और अपने देश के प्रति सम्मान साफ़ दिख रहा था। भारत और पाकिस्तान की प्रतिभाओं से बातें करते समय पश्चिमी प्रेजेंटर उच्च भाव रखते हैं और यह एहसास दिलाते रहते हैं कि तुम सभी अभी पिछड़े हो। तुम भले ही आगे बढ़ गयी हो,लेकिन तुम्हारा देश अभी तक सदियों पहले के समाज में साँसे ले रहा है। इस बातचीत में माहिरा कहीं भी हिचकती या दबती नहीं हैं। वह साफ़ शब्दों में जवाब देती हैं।
इसी बातचीत में उनके तलाक़शुदा और अकेली माँ होने की भी बात आयी। माहिरा ने बगैर झेंपे शांत भाव से अपना पक्ष रखा। भारत के दर्शकों ने सबसे पहले उन्हें सरमद खूसट के टीवी शोहमसफ़रमें ज़िन्दगी चैनल पर देखा था। बाद में वह शाह रुख खान के साथरईसमें दिखीं। यह फिल्म भारत-पाकिस्तान के विवादों में ऐसी फँस गयी थी कि माहिरा प्रचार के लिए भारत नहीं आ सकीं। और पाकिस्तानी सेंसर कोरईसपसंद नहीं आयी,इसलिए उन्होंने पाकिस्तान में प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी। माहिरा की ख्वाहिश थी कि वह अपने दोस्तों के साथ बचपन के पसंदीदा फिल्म सत्र के साथ खुद की फिल्म देखें और इतराएं। वह समय बुरा था,इसलिए ऐसा नहीं हो सका।  भारत और पाकिस्तान में इस फिल्म से अधिक रणबीर कपूर के साथ कीहैंग आउटतस्वीरों और वीडियो के लिए वह अधिक चर्चित हुईं। पाकिस्तान में तो भयंकर आपत्तियां दर्ज हुईं। भारत में लोगों ने मज़े लिए।  सोशल मीडिया के इस दौर में पता नहीं किस सेलिब्रिटी के प्राइवेट मोमेंट्स को कौन मोबाइल के कैमरे से उतारे और पूरी दुनिया के लिए परोस दे। मुझे लगता है किरईसको नार्मल रिलीज मिली होती और भारत में माहिरा की आमद बनी रहती तो वह सलमा आगा और ज़ेबा बख्तियार से अधिक पॉपुलर हो जातीं।

माहिरा के पिता हनीफ खान विभाजन के समय दिल्ली से कराची गए थे। माहिरा ने पाकिस्तान के अलावा अमेरिका में भी शिक्षा प्राप्त की।  उन्होंने एम्टीवी  के वीजे के रूप में करियर की शुरुआत की।  फिर अपने नाम से ही एक वीकेंड शो किया। बाद में वह वाया टीवी फिल्मों में आ गयीं। आज वह पाकिस्तान की मशहूर और खास अदाकारा हैं।  मैंने उनकीबोलऔरबिन रोयेफ़िल्में देखी है। वह भारत की समकालीन अभिनेत्रियों को टक्कर देने की योग्यता रखती हैं।
पडोसी देश की यह अभिनेत्री काबिल और कामयाब है।

Tuesday, May 22, 2018

सिनेमालोक : मंटो और इस्मत साथ पहुंचे कान

सिनेमालोक

मंटो और इस्मत साथ पहुंचे कान

-अजय ब्रह्मात्मज

कैसा संयोग है? इस्मत चुगताई और सआदत हसन मंटो एक-दूसरे से इस कदर जुड़ें हैं कि दशकों बाद वे एक साथ कान फिल्म फेस्टिवल में नमूदार हुए। इस बार दोनों सशरीर वहां नहीं थे ,लेकिन उनकी रचनाएं फिल्मों की शक्ल में कान पहुंची थीं। मंटो के मुश्किल दिनों को लेकर नंदिता दास ने उनके ही नाम से फिल्म बनाई हैमंटो’. इस फिल्म में नवाज़ुद्दीन सिद्दीक़ी शीर्षक भूमिका निभा रहे हैं। यह फिल्म कान फिल्म फेस्टिवलउन सर्टेन रिगार्डश्रेणी में प्रदर्शित हुई। वहीँ इस्मत चुगताई की विवादस्पद कहानीलिहाफपर बानी फिल्म का फर्स्ट लुक जारी किया गया। इसका निर्देशन रहत काज़मी ने किया है और तनिष्ठा चटर्जी व् सोना चौहान ने इसमें मुख्य भूमिकाएं निभाई हैं। दोनों अपनी रचनाओं पर बानी फिल्मों के बहाने एक साथ याद किये गए।  
इस्मत और मंटो को पढ़ रहे पाठकों को मालूम होगा कि दोनों ही अपने समय के बोल्ड और और रियलिस्ट कथाकार थे। दोनों के अफसानों में आज़ादी के पहले और दरमियान का समाज खुले रूप में आता है। उन्होंने अपने समय की नंगी सच्चाई का वस्तुनिष्ठ चित्रण किया। पवित्रतावादी तबके ने उनकी आलोचना की और उनके खिलाफ मुक़दमे किए। यह भी एक संयोग ही है कि मंटो की कहानीबूऔर इस्मत की कहानीलिहाफके खिलाफ दायर मुक़दमे की सुनवाई एक ही दिन लाहौर कोर्ट में हुई। उस दिन दोनों ने ही लाहौर में सुनवाई के बाद खूब मौज-मस्ती की। दोनों की तरफ से हरिलाल सिबल ने जिरह की थी। हरिलाल सिबल आज के चर्चित वकील और नेता कपिल सिबल के पिता थे। वे इस मुक़दमे की यादों को दर्ज करना चाहते थे। अगर उन्होंने कुछ लिखा हो तो कपिल सिबल को उसे प्रकाशित करना चाहिए।
आज की पीढ़ी के पाठकों को इंटरनेट से खोज करबूऔरलिहाफपढ़नी चाहिए। पिछले कुछ सालों में नसीरुद्दीन साह और दूसरे रंगकर्मी इस्मत और मंटो की कहानियों और ज़िन्दगियों को मंच पर उतरने की सफल कोशिशें कर रहे हैं। पिछले दस सालों में इस्मत और मंटो अपनी पीढ़ी के सर्वाधिक पठनीय लेखक हो गए हैं। जिसने उन्हें नहीं पढ़ा है,वह भी बातों-विवादों में उनकी वकालत करता नज़र आता है। भारतीय समाज की श्रुति परमपरा पुरानी है। बगैर खुद पढ़े भी लोगबाग ज्ञाता हो जाते हैं। दोनों की फिल्मों की रिलीज के मौके पर उनके प्रकाशकों को उनकी चुनिंदा कहानियों का संकलन लाना चाहिए। वक़्त बदल चूका है,लेकिन हालात में ज़्यादा तबदीली नहीं आयी है। अभी के लेखक उनकी तरह मुखर और साहसी नहीं हैं। ज़रुरत है की इस्मत और मंटो की प्रासंगकिता रेखांकित करने के साथ इस पर भी विचार हो कि हालात बद से बदतर क्यों होते जा रहे हैं?
नादिता दास और रहत काज़मी की फ़िल्में आगे-पीछे रिलीज होंगीं। नवाज़ और नादिता की वजह सेमंटोके प्रति दर्शकों की जिज्ञाशा  अधिक है। यह फिल्म लेखक मंटो की ज़िन्दगी में भी झांकती है,जबकि राहत काज़मी कीलिहाफइस्मत चुगताई की कहानी के दायरे में रहती है। इस्मत कीलिहाफमें बेगम जान और रब्बो के लेस्बियन रिश्ते की झलक है,जिसे उनकी किशोर उम्र की बहतिजी देख लेती है। उसी की जुबानी कहानी लिखी गयी है। अच्छी बात है की दोनों ने मुक़दमे के दौरान अपना पक्ष रखा और झुकने का नाम नहीं लिया।  तब साहित्यिक खेमों का एक तबका इनके समर्थन में खड़ा हुआ तो दूसरा तबका नसीहतें देने से बाज नहीं आया। तब मंटो ने कहा था,’मैं सनसनी नहीं फैलाना चाहता। मैं समाज,सभ्यता और संस्कृति के कपडे क्यों उतारूंगा? ये सब तो पहले से नंगे हैं। हाँ, मैं उन्हें कपडे नहीं पहनाता,क्योंकि वह मेरा काम नहीं है। वह दरजी का काम है।कहते हैं जब जज ने उनसे कहा की उनकीबूकहानी से बदबू फैल गयी है तो अपने विनोदी अंदाज में मंटो ने कहा था,’जज साहबफिनायललिख कर बदबू मिटा दूंगा।
बतौर दर्शक हम इस्मत और मंटो की फिल्मों के इंतज़ार में हैं।
Lokmat Samachar