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Monday, May 29, 2017

रोज़ाना : ऑनलाइन प्‍लेटफॉर्म



रोज़ाना
ऑनलाइन प्‍लेटफॉर्म
-अजय ब्रह्मात्‍मज
कुछ दिनों पहले हालीवुड के स्‍टार ब्रैड पिट कुछ घंटों के लिए भारत आए थे। मौका उनकी नई फिल्‍म के भारत में इवेंट का था। ब्रैड पिट की यह फिल्‍म नेटफिल्‍क्‍स के सहयोग से बनी है। नेटफिल्‍क्‍स ऑनलाइन प्‍लेटफॉर्म है। आप एक निश्चित रकम देकर नेटफिल्‍क्‍स पर फिल्‍में,टीवी शो और अन्‍य ऑडिये-विजुअल कार्यक्रम देख सकते हैं। भारत में नेटफिल्‍क्‍स के साथ अमैजॉन भी भविष्‍य की तैयारियों में है। ये दोनों प्‍लेटफॉर्म बड़ पैमाने पर भारतीय कंटेंट खरीद रहे हैं और भारतीय निर्माताओं व कलाकारों के सहयोग से नए कंटेंट तैयार कर रहे हैं। इन दिनों हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री का हर सक्रिय सदस्‍य किसी न किसी प्रकार इन दोनों ऑन लाइन फल्‍ेटफॉर्म में से किसी एक से जुड़ना चाह रहा है।
ब्रैड पिट ने त्रवार मशीन का निर्माण नेटफिल्‍क्‍स के लिए किया। यह फिल्‍म ऑनलाइन ही देखी जा सकेगी। माना जा रहा है कि सिनेमा का यही भविष्‍य है या फिर एक कमाईदार विकल्‍प है। वार मशीन जैसी फिल्‍में थिएटर रिलीज को ध्‍यान में रख कर नहीं बनाई जा सकती थी। हालीवुड के स्‍टूडियो भी ऐसी फिल्‍मों में निवेश करने से घबराते हैं। ब्रैड पिट ने हिम्‍मत से कामलिय और वार मशीन के ऑनलाइन दर्शकों पर भरोसा किया। मंबई प्रवास में ब्रैड पिट ने शाह रुख खान के साथ एक इंटरव्‍यू भी दिया। वहीं उन्‍होंने नेटफिल्‍क्‍स जैसे प्‍लेटफॉर्म की जरूरत और संभावना पर विचार रखे। भारतीय स्‍टार शाह रूख खान नेभी स्‍वीकार किया कि हमें भी सोचना चाहिए। हमें बाक्‍स आफिस कलेक्‍शन की निर्भरता खत्‍म करनी चाहिए।
भारत में नेटफिल्‍क्‍स और अमैजॉन जैसे ऑनलाइन प्‍लेटफॉर्म की सही भूमिका कुछ सालों में पता चलेगी। संक्षेप में समझने के निए उदाहरण दें तो यह शहरी यायतायात में पॉपुलर हो रहे उबर और ओला के समान है। ऑनलाइन प्‍लेटफॉर्म पारंपरिक एवेन्‍यू के साथ चलेंगे और सिनेमा के लोकतंत्रीकरण में सहायक होंगे। और यह जूरूरी भी है। अभी हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री कुछ घरानों और कारपोरेट हाउस की मुट्टी में है। फिल्‍म के वितरण और प्रदर्शन की लगाम सिनेमा के नए व्‍यापारियोंं ने थाम रखी है। वे अपने छिदले ज्ञान से तय करते हैं कि दर्शकों को किस तरह की फिल्‍में पसंद आएंगी। हाफ गर्लम्‍्रेंड और हिंदी मीडियम ने बाजार को बताया कि दर्शकों को क्‍या पसंद है? इसके बावजूद बेहतरीन फिल्‍मों के प्रति व्‍यापारियों का विश्‍वास नहीं बढ़ रहा है। ऑनलाइन प्‍लेटफॉर्म कंटेंट के सहारे दर्शकों के बीच जगह बनाएगा।
गौर करें तो भारत जैसे विशाल देश में जरूरत है कि सिनेमा का विकेंद्रीकरण हो। स्‍थानीय प्रतिभाओं को स्‍थानीय स्‍तर पर काम मिले। सभी को मुंबई ,चेन्‍नई या हैदराबाद जाने की जरूरत न पड़े। वे अपने माहौल में अपनी कहानियां लेकर आएं तो अपने दायरे में सफलता का इतिहास रच सकते हैं। ब्रैड पिट ने राह दिखाई है। उम्‍मीद है भारतीय स्‍टासर भी अनुकरण करेंगे।

फिल्‍म समीक्षा : सचिन



फिल्‍म रिव्‍यू
सचिन सचिन
सचिन : अ बिलियन ड्रीम्‍स
-अजय ब्रह्मात्‍मज
सचिन सचिन की आवाज और गूंज के साथ यह फिल्‍म सभी दर्शकों दिल-ओ-दिमाग में प्रतिध्‍वनित होती है। सचिन भी बताते हैं ये दो शब्‍द सचिन सचिन वे नहीं भूल पाए हैं। इन दो शब्‍दों में ही प्रशंसकों और देशवासियों का प्रेम समा जाता है।
न तो यह फीचर फिल्‍म है और न डाक्‍यूमेंट्री। भारतीय क्रिकेट के के श्रेष्‍ठ खिलाड़ी सचिन तेंदुलकर के खेल जीवन के प्रसंगों और लाइव फुटेज को जोड़ कर बनायी गयी यह फिल्‍म एक खिलाड़ी के समर्पण,लगन और जीवन का परिचय देती है। फिल्‍म में एक जगह आमिर खान बिल्‍कुल सही कहते हैं कि सचिन हमारे सामूहिक गर्व के प्रतीक हैं। फिल्‍म में अमिताभ बच्‍चन भी बताते हैं कि सचिन के मैदान में मौजूद रहने पर सारी संभावनाएं कायम रहती हैं। यह फिल्‍म स्‍कूलों में अनिवार्य कर देनी चाहिए। बच्‍चे किसी भी क्षेत्र में अपनी रुचि से बड़ें,लेकिन उनमें लगन और समर्पण तो होना ही चाहिए।
खेलप्रेमी खास कर क्रिकेटप्रेमी सचिन के बारे में सब कुछ जानते हैं। यह फिल्‍म सचिन के मैचों के फुटेज से वैसा ही रोमांच पैदा करती है। फिल्‍म देखते हुए वे पल याद आ जाते हैं,जब सचिन मैदान में थे और हम-आप स्‍टेडियम या अपने घर में बैठे मैच का आनंद ले रहे थे। लाइव में तो हार-जीत की अग्रिम जानकारी नहीं रहती। ऐसी फिल्‍मों में पूर्व जानकारी के बावजूद रोमांच कम नहीं होता। फिर से तालियां बज जाती हैं। सिनेमाघर में हर्ष से चिल्‍लाने का मन करेगा।
इस फिल्‍म पर थोड़ी और मेहनत की गई होती और सचिन तेंदुलकर के व्‍यक्त्त्वि को खंगाला गया होता तो यह फिल्‍म दूरगामी प्रभाव की हो जाती। यों लगता है कि सचिन की तरफ से निर्माता-निर्देशक को भरपूर सहयोग नहीं मिला। सचिन ने अपना नैरेशन एक ही दिन में पूरा कर दिया है। शिवाजी पार्क,बच्‍चों के साथ चुहल,अंजलि से मुलाकात और फायनली वर्ल्‍ड कप की जीत के प्रसंगों में सचिन सहज और सरल हैं। अन्‍यथा यों लगता है कि मैच समाप्‍त होने के बाद फौरी इंटरव्‍यू दे रहे हों और जल्‍दी से लौटना चाहते हों।
मध्‍यवर्गीय परिवार के सचिन तेंदुलकर की जीवन शैली समृद्ध हो चुकी है,लेकिन उनके मूल्‍य अभी तक मध्‍यवर्गीय हैं। एक दृश्‍य में जब वे अपने बेटे को लकर प्रैक्टिस के लिए उतरते हैं तो वहां अचीवर और प्राउड पापा की फीलिंग देते हैं। अपने पिता को याद करते समय वे हमेशा भावुक हुए हैं। भाई अजीत और कोच आचरेकर को वे कभी नहीं भूलते। किसी न किसी बहाने उनका जिक्र करते समय अपनी कृतज्ञता जाहिर करते रहते हैं।
भारत रत्‍न से सम्‍मनित कद्ददावर व्‍यक्तित्‍व के इस खिलाड़ी के प्रति फिल्‍म न्‍याय नहीं करती। सचिन के जीवन पर एक बड़ी फिल्‍म तो बननी ही चाहिए। यह फिल्‍म उनकी कामयाबी में परिवार की भूमिका की झलक भर देती है। सचिन बनने की प्रक्रिया पर ज्‍यादा जोर नहीं है। यह सचिन बन जाने की कहानी है।
अवधि 138 मिनट
***1/2 साढ़े तीन स्‍टार

Friday, May 26, 2017

दरअसल : नंदिता दास के मंटो



दरअसल...
नंदिता दास के मंटो
-अजय ब्रह्मात्‍मज

नंदिता दास पिछले कुछ सालों से मंटो के जीवन पर फिल्‍म बनाने में जुटी हैं। भारतीय उपमाद्वीप के सबसे ज्‍यादा चर्चित लेखक सआदत हसन मंटो के जीवन में पाठकों और दर्शकों की रुचि है। वे अपने लखन और लेखन में की गई टिप्‍पणियों से चौंकाते और हैरत में डाल देते हैं। आज उनकी जितनी ज्‍यादा चर्चा हो रही है,अगर इसका आंशिक हिस्‍सा भी उन्‍हें अपने जीवनकाल में मिल गया होता। उन्‍हें समुचित पहचान के साथ सम्‍मान मिला होता तो वे 42 की उम्र में जिंदगी से कूच नहीं करते। मजबूरियां और तकलीफें उन्‍हें सालती और छीलती रहीं। कौम की परेशानियों से उनका दिल पिघलता रहा। वे पार्टीशन के बाद पाकिस्‍तान के लाहौर गए,लेकिन लाहौर में मुंबई तलाशते रहे। मुंबई ने उन्‍हें लौटने का इशारा नहीं दिया। वे न उधर के रहे और न इधर के। अधर में टंगी जिंदगी धीरे-धीरे घुलती गई और एक दिन खत्‍म हो गई।
नंदिता दास अपनी फिल्‍म में उनके जीवन के 1946 से 1952 के सालों को घटनाओं और सहयोगी किरदारों के माध्‍यम रख रही हैं। यह बॉयोपिक नहीं है। यह पीरियड उनकी जिंदगी का सबसे अधिक तकलीफदेह और खतरनाक हैं। कुछ पाठकों को याद होगा कि इन छह सालों के दौरान उन पर छह मुकदम हुए। तीन भारत में और तीन पाकिस्‍तान में...आज जरा सी निंदा,आलोचाना या सवाल पर लेखक बौखला जाते हैं। और सोशल मीडिया पर अनाप-शनाप बकने लगते हैं। आप उस दौर को याद करें जब लेखकों के पास और कोई माध्‍यम नहीं था। समाज उन्‍हें खुले दिल से स्‍वीकार नहीं रहा था और सरकार वा सत्‍ता लगातार तिरस्‍कार कर रही थी। मंटो ने अपने दौर के मजलूमों और मजबूरों पर लिखा। समय और सोच की विसंगतियों को वे उजागर करते रहे। सत्‍ता और समाज के लांछन सहते रहे।ऐसे में भला कोई कब तक हिम्‍मत बनाए रखे?
नंदिता दास उनकी जिंदगी के उथल-पुथल के सालों पर ही ध्‍यान दे रही हैं। उन्‍होंने उनकी रचनाओं और व्‍यक्त्गित साक्षात्‍कारों के आधार पर उस दौर में मंटों को गढ़ा है। उन्‍होंने मीर अली के साथ इस फिल्‍म का लेखन किया है। फिल्‍म में मंटो का शीर्षक किरदार नवाजुद्दीन सिद्दीकी निभा रहे हैं। इस फिल्‍म में उनके साथ रसिका दुग्‍गल,ताहिर राज भसीन,शबाना आमी,जावेद अख्‍तर और अनेक मशहूर कलाकार छोटी-बड़ी भूमिकाएं निभा रहे हैं। फिल्‍म की शूटिंग जून के मध्‍य तक पूरी हो जाएगी। इस फिल्‍म का एक हिस्‍सा पिछले दिनों एक मीडिया कॉनक्‍लेव में दिखाया गया था। उसे देख कर यही लगा कि नवाजुद्दी सिद्दीकी की सही कास्टिंग हुई है। वे मंटों की संजीदगी और ठहराव के साथ बेचैनी को भी आत्‍मसात कर सके हैं। इस फिल्‍म की शुरूआत के समय नंदिता दास मंटो की भूमिका के लिए इरफान से बात कर रही थीं। वे राजी भी थे,फिर पता नहीं दोनों के बीच क्‍या गुजरी कि नचाज आ गए।
मंटो पर नाटक होते रहे हैं। उनकी कहानियों पर शॉर्ट और फीचर फिल्‍में बनती रही हैं। दो साल पहले उनकी बेटियों की मदद से बनी पास्तिानी फिल्‍म मंटो आई थी,जिसका निर्देशन समाद खूसट ने किया था। मंटो की भूमिका भी उन्‍होंने निभाई थी। पाकिस्‍तान में उनके ऊपर डाक्‍यूमेंट्री भी बन चुकी है। नंदिता दस के टेक को देखना रोचक होगा। देखना होगा कि मंटो की सोच और साफगोई को वह पर्दे पर कैसे ले बाती हैं? मंटो अपने समय की जलती मशाल हैं। नंदिता के लिए इस मशाल को 2017 में थामना आसान नहीं होगा। अपन पिछली फिल्‍म फिराक में उन्‍होंने अपना स्‍पष्‍ट पक्ष रखा था। इस फिल्‍म के जरिए मंटो की पा्रसंगिकता स्‍थापित करने में उनका पक्ष जाहिर होगा। मंटो प्रासंगिक हैं। उनका उल्‍लेख सभी करते हैं,लेकिन उन्‍हें पढ़ते और समझने वालों की संख्‍या कम है। उन्‍हें ढंग से पढ़ा गया होता तो भारत और पाकिस्‍तान के हालात आज जैसे नहीं होते। अभी तो दोनों तरफ से तोपें तनी हैं।

Thursday, May 25, 2017

रोज़ाना : प्रियंका चोपड़ा की 51वीं फिल्‍म



रोज़ाना
प्रियंका चोपड़ा की 51वीं फिल्‍म
-अजय ब्रह्मात्‍मज
भारत छोड़ कर पूरी दुनिया में आज रिलीज हो रही बेवाचप्रियंका चोपड़ा की पहली हॉलीवुड फिल्‍म है। अगर उनकी हिंदी फिल्‍मों को शामिल कर लें तो यह उनकी 51वीं फिल्‍म होगी। 50 फिल्‍मों के बाद हॉलीवुड में इस दस्‍तक से प्रियंकाचोपड़ा समेत उनके प्रशंसक खुश हैं। किसी भारतीयअभिनेत्री की बड़ी उपलब्धि की तरह इसे पेश किया जारहा है। लोकप्रिय टीवी शो पर आधारित इस फिल्‍म के प्रति दर्श्‍कों केनजरिए में भिन्‍नता हो सकती है,फिर भी यह स्‍वीकार करने में दिक्‍कत नहीं होनी चाहिए कि प्रियंका चोपड़ा ने कुछ उल्‍लेखनीय हासिल किया है। देसी गर्लके नाम से विख्‍यात प्रियंका चोपड़ा की जमशेदपुर से हॉलीवुडतक की यह यात्रा देसी व छोटे शहर की लड़कियों के लिए मिसाल व प्रेरणा है।
प्रियंका चोपड़ा ने मिस इंडिया के बाद फिल्‍मों में कदम रखा। अपनी गलतियों से सीखती हुई वह आगे बढ़ती रही। माता-पिता के संरक्षण और दिशानिर्देश में प्रियंका चोपड़ा ने छोटी-छोटी कामयाबियों से हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री में अपनी जगह बनायी। एक्टिंग करिअर में वह अपने साथ आई लारा दत्‍ता से काफी आगे बढ़ गईं। उन्‍होंने हिंदी फिल्‍मों के सभी मुख्‍य कलाकारों के साथ काम किया। सधी और गंभीर अभिनेत्री की भी छवि बनाई और फैशनके लिए राष्‍ट्रीय पुरस्‍कार हासिल किया। प्रियंका चोपड़ा ने उसके बाद फिल्‍मों में अपनी भूमिकाओं की वैरायटी पर ध्‍यान दिया। उन्‍होंने विशाल भारद्वाज,आशुतोष गोवारिकर और संजय लीला भंसाली के साथ सराहनीय प्रयोग किए। हालांकि प्रियंका चोपड़ा ने कहीं कहा नहीं,लेकिन हिंदी फिल्‍मों में वह एक सैचुरेशन पाइंट पर पहुंच चुकी थीं। नई भूमिकाओं में भी नवीनता नहीं रह गई थी।
ऐसे ठहराव के दौर में उन्‍हें अपनी गायकी का खयाल आया। उन्‍होंने उसे साधा और अथ्‍यास किया। वह अंग्रेजी में अपने सिंगल्‍स लेकर आईं। विदेशों में पहचान हासिल की। उनका समय अमेरिका में बीतने लगा। तब ऐसा लगा था कि वह तात्‍कालिक चर्च से भटकाव की ओर बढ़ रही हैं। अब ऐसा ल्रता है कि वह उनकी दूरस्‍थ योजनाओं का पड़ाव था। उन्‍होंने अमेहिरकी टीवी शो क्‍वांटिको की भूमिका के लिए हां कहा और अमेरिकी दर्शकों की चहेती बन गईं। क्‍वांटिको के तीसरे सीजन की तैयारी चल रही है। इस टीवी शो के दौरान ही उन्‍हें बेवाच मिली। बेवाच में वह निगेटिव भूमिका में हैं। पहले इस निगेटिव किरदार का नाम विक्‍टर था। उसके लिए किसी पुरुष कलाकार से बात चल रही थी,लेकिन प्रियंका चोपड़ा से मिलने के बाद डायरेक्‍टर सेठ गॉर्डन ने किरदार का नाम विक्‍टोरिया कर दिया। प्रियंका चोपड़ा विक्‍टोरिया के रूप में दिखेंगी।
किसी भारतीय अभिनेत्री के लिए यह छोटी पउलब्धि नहीं है। यहां से नए द्वार खुलेंगे और दूसरी अभिनेत्रियों को भी प्रवेश मिलेगा। भारतीय प्रतिभाएं इंटरनेशनल सिनेमा में चमकने को तैयार हैं। प्रियंका चोपड़ा पहली चकम हैं। पिछले हफ्ते वह बेवाच के प्रमोशन में व्‍यस्‍त रहीं। मौका मिले तो कभी यूट्यूब पर उनके इंटरव्‍यू सुनें और खुश्‍ हों कि बरेली की लड़की अमेरिका के शहरों में आत्‍मविश्‍वास के साथ विचर रही है।

Wednesday, May 24, 2017

रोजाना : रंगोली सजाएंगी नीतू चंद्रा



रोजाना
रंगोली सजाएंगी नीतू चंद्रा
-अजय ब्रह्मात्‍मज

अगले रविवार से दूरदर्शन से प्रसारित रंगोली की होस्‍ट बदल रही हैं। अभी तक इसे स्‍वरा भास्‍कर प्रस्‍तुत कर रही थीं। 28 मई से नीतू चंद्रा आ जाएंगी। 12 साल पहले हिंदी फिल्‍म गरम मसाला से एक्टिंग करिअर आरंभ कर चुकी हैं। नीतू चंद्रा ने कम फिल्‍में ही की हैं। बहुप्रतिभा की धनी नीतू एक्टिंग के साथ खेल में भी एक्टिव हैं। वह थिएटर भी कर रही हैं। अब वह टीवी के पर्दे को शोभायमान करेंगी। नई भूमिका में वह जंचेंगी। इस बीच उन्‍होंने भोजपुरी और मैथिली में फिल्‍मों का निर्माण किया,जिनका निर्देशन उनके भाई नितिन नीरा चंद्रा ने किया। बिहार की भाषाओं में ऑडियो-विजुअल कंटेंट के लिए कटिबद्ध भाई-बहन का समर्पण सराहनीय है।
रंगोली दूरदर्शन का कल्‍ट प्रोगांम है। कभी हेमा मालिनी इसे प्रस्‍तुत करती थीं। बाद में शर्मिला टैगोर,सारा खान,श्‍वेता तिवारी,प्राची शाह और स्‍वरा भास्‍कर भी होस्‍ट रहीं। सैटेलाइट चैनलों के पहले दूरदर्शन से प्रसारित रंगोली और चित्रहार दर्शकों के प्रिय कार्यक्रम थे। सभी को उनका इंतजार रहता था। दोनों कार्यक्रमों ने कई पीढि़यों का स्‍वस्‍थ मनोरंजन किया है। अभी जरूरत है कि रंगोली की प्रसतुति का कायाकल्‍प हो। होस्‍अ तो सभी ठीक हैं। वे दी गई स्क्रिप्‍ट को अच्‍छी तरह पेश करते हैं। इसके सेट को बदलना चाहिए। कंप्‍यूटरजनित छवियों से आकर्षण और भव्‍यता बढ़ाने पर जोर देना चाहिए। सुना है कि कुछ म्‍यूजिक कंपनियां रंगोली को अपने गीत नहीं देतीं। रंगोली के बजट में उनकी रॉयल्‍टी नहीं बन पाती। मुझे लगता है कि म्‍यूजिक कंपनियों को रंगोली के लिए थोड़ी राहत देनी चाहिए। उन्‍हें ऐसे क्रम का समर्थन करना चाहिए जो शुद्ध मुनाफे के लिए नहीं तैयार की जातीं।
रंगोली का शैक्षणिक महत्‍व भी है। 1996 में बृज कोठारी ने महसूस किया था कि अगर ऑडियो-विजुअल कंटेंट के साथ सेम लैंग्‍वेज सबटाइटल्‍स दिए जाएं तो वह साक्षरता बढ़ाने के काम आ सकता है। रंगोली में इसे आजमाया गया। रंगोली के गीतों के साथ हिंदी में आ रहे सबटाटल्‍स से नवसाक्षरों में लिखने-पढ़ने की क्षमता बढ़ती है। भारत ही नहीं दूसरे देशों में भी साक्षरता बढ़ाने में सेम लैंग्‍वेज सबटाइटल्‍स उपयोगी रहा है। बीच में कुछ समय के लिए रंगोली के सबटाइटल्‍स बंद हो गए थे। अधिकारियों ने इसकी जरूरत समझ कर फिर से चालू किया है। रंगोली आज भी देश का मनोरंजन करता है। इसके साथ दी गई फिल्‍मी इतिहस के पन्‍नों से दी गई जानकारियां रोचक होती हैं। गॉसिप के बजाए ठोस जानकारियों से दर्शकों की रुचि समृद्ध होती है। हालांकि इन दिनों एफएम चैनल और गानों के ऐप्‍प की भरमार है,लेकिन रंगोली अपनी सादगी और परंपरा में आज भी दर्शकों का चहेता और नियमित कार्यक्रम है। इसे चलते रहना चाहिए।
नीतू चंद्रा अपनी प्रतिभा से इसे और दर्शनीय व आकर्षक बना सकती हैं। उन्‍हें अच्‍छी टीम मिली है। रंगोली का लेखन रीना पारीख करती हैं। उनके जुड़ने के बाद रंगोली निखरी और चटखदार हुई है।

Tuesday, May 23, 2017

रोज़ाना : दर्शकों के समर्थन से कामयाब ‘हिंदी मीडियम’

रोज़ाना
दर्शकों के समर्थन से कामयाब हिंदी मीडियम
-अजय ब्रह्मात्‍मज

पिछले हफ्ते रिलीज हुई हिंदी मीडियम और हाफ गर्लफ्रेंड की कहानियां एक-दूसरे की पूरक की तरह दर्शकों के बीच आईं। साकेत चौधरी के निर्देशन में बनी हिंदी मीडियम में इरफान और सबा कमर मुख्‍य भूमिकाओं में थे। इस फिल्‍म दीपक डोबरियाल ने भी एक अहम किरदार निभाया है। दिल्‍ली के परिवेश में रची इस कहानी में नायक बने इरफान अपनी बीवी सबा कमर के दबाव में आकर बेटी का एडमिशन हाई-फाई अंग्रेजी स्‍कूल में करवाना चाहता है। इसके लिए उसे झूठ और प्रपंच का भी सहारा लेना पड़ता है। दूसरी फिल्‍म तो चूतन भगत के उपन्‍यास हाफ गर्लफ्रेंड पर आधारित है। इसका नायक अर्जुन कपूर अंगेजी न बोल पाने की वजह से थोड़ी दिक्‍कत में है। वह अंग्रेजी से आतंकित नहीं है,लेकिन अंग्रेजी नहीं जानने की वजह से उसकी जिंदगी में अड़चनें आती हैं।
एक ही दिन रिलीज हुई दोनों फिल्‍मों का वितान और परिवेश अलग है। उनके किरदार अलग हैं। हिंदी मीडियम ठेठ दिल्‍ली से आज की दिल्‍ली के बीच पसरी है। आज की दिल्‍ली में समा चुकी अंग्रेजी मानसिकता की विसंगतियों को लेकर चलती यह फिल्‍म सामाजिक अंतर्विरोधों और सोच के भेछ खोलती है। भाषा और बच्‍चों के स्‍कूल जब सोशल स्‍टेटस तय कर रहे हों। अंग्रेजी नहीं जानने पर बच्‍चों के तनाव में आने की संभावना पर गौर करती यह फिल्‍म मैट्रो शहरों की शिक्षा व्‍यवस्‍था  करती है। दूसरी तरफ हाफ गर्लफ्रेंड में नायक के अंग्रेजी नहीं जानने की मनोदशा है। चेतन भगत ने किताब और फिल्‍म में माधव झा को रेफरेंस और प्रतीक के रूप में ही इस्‍तेमाल किया है। खेल के कोटे से एडमिशन पा चुके अर्जुन कपूर के लिए अंग्रेजी कोई चुनौती नहीं है। वह अंग्रेजीदां श्रद्धा कपूर से कम्‍युनिकेट भी कर लेता है। बाद में उसे अधिक परेशानी नहीं होती। फिल्‍म की समस्‍या अंगेजी से शिफ्ट होकर श्रद्धा और अर्जुन के रिश्‍तों उलझ जाती है।
दोनों में से हिंदी मीडियम बजट,स्‍टार और प्रस्‍तुति के हिसाब से छोटी फिल्‍म है,जबकि हाफ गर्लफ्रेंड की प्रस्‍तुति और माउंटिंग मंहगी है। पहले दिन हिंदी मीडियम को केवल 2.80 करोड़ की ओपनिंग मिली। हाफ गर्लफ्रेंड ने पहले ही दिन 10 करोड़ से अधिक का कलेक्‍शन किया। ऊपरी तौर पर हाफ गर्लफ्रेंड कामयाब फिल्‍म कही जा सकती है,लेकिन असल कामयाबी तो हिंदी मीडियम ने हासिल की। शुक्रवार से रविवार के बीच फिल्‍म का कलेक्‍शन बढ़कर दोगुना हो गया। हाफ गर्लफ्रेंड के तीन दिनों के कलेक्‍शन में मामूली इजाफा हुआ। दर्शक अच्‍छी फिल्‍मों का भरपूर समर्थन करते हैं। वे अच्‍छी फिल्‍में सूंघ लेते हैं और सिनेमाघरों से निकलने पर दूसरों को भी देखने के लिए प्रेरित करते हैं। सामान्‍य और औसत फिल्‍मों के दर्शक वीकएंड में नहीं बढ़ते।
हिंदी मीडियम की बेहतरीन कामयाबी से बार फिर साबित हुआ कि छोटी और अच्‍छी फिल्‍मों के भी दर्शक हैं। ऐसी फिल्‍मों का वे समर्थन करते हैं। दर्शकों के ऐसे भरोसे से ही नए फिल्‍मकार आते हैं और नए विषयों पर फिल्‍में बनती हैं।

फर्क है बस नजरिए का - कृति सैनन



कृति सैनन
-अजय ब्रह्मात्‍मज
- कृति सैनन के लिए राब्‍ता क्‍या है? फिल्‍म और शब्‍द...
0 शब्‍द की बात करूं तो कभी-कभी किसी से पहली बार मिलने पर भी पहली बार की भेंट नहीं लगती। लगता है कि पहले भी मिल चुके हैं। कोई संबंध हे,जो समझ में नहीं आता... मेरे लिए यही राब्‍ता है। मेरा मेरी पेट(पालतू) के साथ कोई राब्‍ता है। फिल्‍म मेरे लिए बहुत खास है। अभी यह तीसरी फिल्‍म है। पहली फिल्‍म में तो सब समझ ही रही थी। मार्क,कैमरा आदि। दिलवाले में बहुत कुछ सीखा,लेकिन इतने कलाकारों के बीच में परफार्म करने का ज्‍यादा स्‍पेस नहीं मिला। इसकी स्‍टोरी सुनते ही मेरे साथ रह गई थी। एक कनेक्‍शन महसूस हुआ। मुझे दो कैरेक्‍टर निभाने को मिले-सायरा और सायबा। दोनों की दुनिया बहुत अलग है।
-दोनों किरदारों के बारे में बताएं?
0 दोनों किरदार मुझ से बहुत अलग हैं। इस फिल्‍म में गर्ल नेक्‍स्‍ट डोर के रोल में नहीं हूं। सायरा को बुरे सपने आते हें। उसके मां-बाप बचपन में एक एक्‍सीडेंट में मर गए थे। वह बुदापेस्‍ट में अकेली रहती है। चॉकलेट शॉप चलाती है। उसे पानी से डर लगता है। वह बोलती कुछ है,लेकिन सोचती कुछ और है। फिर भी आप उससे प्‍यार करेंगे। सायबा के लिए कोई रेफरेंस नहीं था। मैं वैसी किसी लड़की को नहीं जानती थी। उसका कोई स्‍पष्‍ट समय नहीं है। वह बहादुर राजकुमारी है। झट से कुछ भी कर बैठती है। घुड़सवारी और शिकार करती है।
- बुदापेस्‍ट की सायरा और दिल्‍ली-मुंबई की कृति में कितना फर्क है?
0 उसकी तरह मैं भी जल्‍दी से फैसले नहीं ले पाती। मैं आउटस्‍पोकेन और फ्रेंडली हूं। मेरे कई दोस्‍त हैं। सायरा  बंद-बंद रहती है। वह लोगों को अपने पास आने देती है,लेकिन एक दूरी रखती है। शिव से मिलने के बाद उसमें परिवर्तन आता है। मेरा निजी जीवन बहुत सुरक्षित रहा है। मैंने सायरा की तरह स्‍ट्रगल नहीं किया है।
- क्‍या हर शहर की लड़कियां अलग होती हैं?
0 दिल्‍ली और मुंबई की लड़कियों में ज्‍यादा फर्क नहीं है। दूसरे देशों की लड़कियों की जीवन शैली और स्‍टायल अलग होती है। उनका सही-गलत का नजरिया भी अलग होता है। हमें कई बातें असहज लगती हैं। उन्‍हें इनसे फर्क नहीं पड़ता। संबंधों के मामले में हमारी सोच में अंतर रहता है। संस्‍कृति के भेद से ही यह भसेद आता होगा शायद।
-सुशांत सिंह राजपूत के साथ कैसा अनुभव रहा?
0 इस फिल्‍म से पहले मैं सुशांत को बिल्‍कुल नहीं जानती थी। मैंने उन्‍हें कभी हाय भी नहीं बोला था। पहली बार दिनेश के ऑफिस में मिला था तो यही इंप्रेशन था कि अच्‍छा एक्‍टर है। एक्‍टर के तौर पर मेरा अनुभव कम है तो डर था कि कोई दिक्‍कत न हो। यह भी लगा कि मेहनत के साथ अच्‍छी एक्टिंग करनी पड़ेगी। उस मीटिंग में एक सीन करते समय हमारी फ्रिक्‍वेंसी मिल गई थी। उसके बाद फिल्‍म की तैयारी में हमारी नजदीकी बढ़ी। हमारा कंफर्ट बढ़ा। एक्टिंग का हमारा प्रोसेस अलग है। सुशांत इंस्‍पायरिंग हैं। बुदापेस्‍ट पहुंचने तक हम एक-दूसरे को अच्‍छी तरह समझ गए थे। काम करने में बहुत मजा आया।
-खुश हो आप?
0 मैं बहुत खुश हूं। पिछले साल मेरी कोई फिल्‍म रिलीज नहीं हुई। फिर भी लगातार तैयारी की वजह से ऐसा नहीं लगा कि खाली हूं। इस फिल्‍म को लेकर एक संतोष है। फिल्‍म के दूसरे युग में हमलोगों ने जो प्रयास किया है,वह सभी को अच्‍छा लगेगा।
-किस की तरह याद किया जाना पसंद करेंगी?
0 माधुरी दीक्षित की तरह। वह मेरी फेवरिट हैं। बचपन में मैं उनके गानों पर ही डांस किया करती थी। अंखियां मिलाऊं,कभी अंखियां चुराऊं मेरा सबसे प्रिय गाना था। वह इतनी खूबसूरत और एक्‍सप्रसिव हैं। वह गाने की पंक्तियों में एक्‍सप्रेशन दे देती हैं। वह फेस से डांस करती थीं। वह स्‍क्रीन पर आती हैं तो स्‍क्रीन अलाइव हो जाता है। मैं जैसे उन्‍हें याद कर रही हूं,चाहूंगी कि वैसे ही कोई मुझे याद करे।

Saturday, May 20, 2017

रोज़ाना : नमक हलाल की री-रिलीज



रोज़ाना
नमक हलाल की री-रिलीज
-अजय ब्रह्मात्‍मज
इस कॉलम की शुरूआत हम ने सुभाष घई की फिल्‍म ताल की खास स्‍क्रीनिंग से की थी। मुंबई में आयोजित उस शो में फिल्‍म के संगीतकार और कैमरामैन आए थे। उन्‍होंने अपनी यादें शेयर की थीं। पुरानी फिल्‍मों को फिर से देखना या पहली बार देखना अनोखा अनुभव होता है। पुरानी पीढ़ी फिल्‍म देखते हुए डायरी के पन्‍ने पलटती है और उस शो में साथ आए दोस्‍तों-परिजनों के साथ उन लमहों को याद करती है। नई पीढ़ी ऐसी फिल्‍मों के जरिए अपने इतिहास से वाकिफ होती है। मोबाइल फोन पर फिल्‍म देखने की सुविधा आ जाने के बावजूद फिल्‍म देखने का पूरा आनंद तो बड़े पर्दे पर ही आता है।
पहले रीरिलीज का चलन था। पुरानी फिल्‍में विभिन्‍न अवसरों और ईद-होली जैसे त्‍योहारों पर रिलीज की जाती थीं। उन्‍हें देखने दर्शक उमड़ते थे। देखना है कि इस रविवार को मुंबई के जुहू पीवीआर और दिल्‍ली के नारायणा पीवीआर में 21 मई रविवार के दिन नमक हलाल देखने कितने दर्शक आते हैं? 30 अप्रैल 1982 को पहली बार रिलीज हुई यह फिल्‍म 35 सालों के बाद 21 मई को फिर से रिलीज हो रही है। प्रकाश मेहरा निर्देशित इस फिल्‍म ने रिलीज के समय तहलका मचाया था। आर्ट और पैरेलल फिल्‍मों की अभिनेत्री स्मिता पाटिल को अमिताभ बच्‍चन के साथ आज रपट जाएं गीत में देख कर सभी चौंके थे।
अमिताभ बच्‍चन ने अपने ब्‍लॉग में कभी लिखा था कि स्मिता पाटिल इस फिल्‍म और खास कर गाने के समय सहज नहीं थीं। दन्‍होंने अमिताभ बच्‍चन से इसका जिक्र भी किया था,लेकिन किसी पेशेवर कलाकार की तरह उन्‍होंने निर्देशक और गाने की जरूरत के मुताबिक अपनी झेंप खत्‍म की। उन्‍होंने गीत के मर्म को समझा और अमिताभ बच्‍चन का बेधड़क साथ दिया। बाद में शक्ति की शूटिंग के समय चेन्‍नई जाते समय उन्‍होंने पाया कि विमान के सहयात्री इसी गाने की वजह से उन्‍हें पहचान रहे हैं।
रविवार के नमक हलाल के शो से अंदाजा लगेगा कि आज के युवा दर्शक पुरानी फिल्‍मों में कितनी रुचि ले रहे हैं? नई बेकार फिल्‍मों की रिलीज में सिनेमाघर आधे से अघिक खाली रहते हैं। बेहतर होगा कि पुरानी चर्चित और कामयाब फिल्‍मों की रिलीज का सिलसिला बने। उन्‍हें दर्शकों का समर्थन मिले।

Friday, May 19, 2017

फिल्‍म समीक्षा : हाफ गर्लफ्रेंड



फिल्‍म रिव्‍यू
हाफ गर्लफ्रेंड

शब्‍दों में लिखना और दृश्‍यों में दिखाना दो अलग अभ्‍यास हैं। पन्‍ने से पर्दे पर आ रही कहानियों के साथ संकट या समस्‍या रहती है कि शब्‍दों के दृश्‍यों में बदलते ही कल्‍पना को मूर्त रूप देना होता है। अगर कथा परिवेश और भाषा की जानकारी व पकड़ नहीं हो तो फिल्‍म हाफ-हाफ यानी अधकचरी हो जाती है। मोहित सूरी निर्देशित हाफ गर्लफ्रेंड के साथ यही हुआ है। फिल्‍म का एक अच्‍छा हिस्‍सा बिहार में है और यकीनन मुंबई की हाफ गर्लफ्रेंड टीम को बिहार की सही जानकारी नहीं है। बिहार की कुछ वास्‍तविक छवियां भी धूमिल और गंदिल रूप में पेश की गई हैं। भाषा,परिवेश और माहौल में हाफ गर्लफ्रेंड में कसर रह जाता है और उसके कारण अंतिम असर कमजोर होता है।
उपन्‍यास के डुमरांव को फिल्‍म में सिमराव कर दिया गया है। चेतन भगत ने उपन्‍यास में उड़ान ली थी। चूंकि बिल गेट्स डुमरांव गए थे,इसलिए उनका नायक डुमरांव का हो गया। इस जोड़-तोड़ में वे नायक माधव को झा सरनेम देने की चूक कर गए। इस छोटी सी चूक की भरपाई में उनकी कहानी बिगड़ गई। मोहित सूरी के सहयोगियों ने भाषा,परिवेश और माहौल गढ़ने में कोताही की है। पटना शहर के चित्रण में दृश्‍यात्‍मक भूलें हैं। सेट या किसी और शहर में फिल्‍माए गए सीन पटना या डुमरांव से मैच ही नहीं करते। पटना में गंगा में जाकर कौन सा ब्रोकर अपार्टमेंट दिखाता है? स्‍टॉल पर लिट्टी लिख कर बिहार बताने और दिखाने की कोशिश में लापरवाही दिखती है। यहां तक कि रिक्‍शा भी किसी और शहर का है... प्रोडक्‍शन टीम इन छोटी बारीकियों पर ध्‍यान दे सकती थी। इस फिल्‍म के भाषा और लहजा पर अर्जुन कपूर के बयान आए थे। बताया गया था कि उन्‍होंने ट्रेनिंग ली थी। अब या तो ट्रेनर ही अयोग्‍य था या अर्जुन कपूर ने सही ट्रेनिंग नहीं ली थी। उनकी भाषा और दाढ़ी बदलती रहती है।
सिमराव से न्‍यूयार्क तक फैली हाफ गर्लफ्रेंड मूल रूप से एक प्रेमकहानी है। मोहित सूरी ने उसे वैसे ही ट्रीट किया है। बिहार दिखाने-बताने में वे असफल रहे हैं,लेकिन प्रेमकहानी के निर्वाह में वे सफल रहते हैं। माधव और रीया की प्रेमकहानी भाषा और इलाके की दीवार लांघ कर पूरी होती है। भौगोलिक दूरियां भी ज्‍यादा मायने नहीं रखती हैं। हिंदी फिल्‍में संयोगों का खेल होती हैं। हाफ गर्लफ्रेंड में तर्क दरकिनार है और संयोगों की भरमार है। बिल गेट्स की बिहार यात्रा और बेटी बचाओ,बेटी पढ़ाओ नारे को जोड़ने में लेखक व निर्देशक को क्‍यों दिक्‍कत नहीं हुई? ऐसे अनेक अतार्किक संयोगों का उल्‍लेख किया जा सकता है।
हाफ गर्लफ्रेंड में वास्‍तविकता की तलाश न करें तो यह आम हिंदी फिल्‍म की प्रेमकहानी के रूप में अच्‍छी लग सकती है। मोहित सूरी रोमांस के पलों का अच्‍छी तरह उभारते हैं। इस फिल्‍म में भी उनकी प्रतिभा दिखती है। वे श्रद्धा कपूर और अर्जुन कपूर को मौके भी देते हैं। दोनों प्रेमी-प्रेमिका के रूप में आकर्षक और एक-दूसरे के प्रति आसक्‍त लगते हैं। प्रेम के उद्दीपन के लिए जब-तब बारिश भी होती रहती है। और फिर गीत-संगीत तो है ही। अर्जुन कपूर और श्रद्धा कपूर ने अपने किरदारों के साथ न्‍याय करने की पूरी कोशिश की है,लेकिन वे स्क्रिप्‍ट की सीमाओं में उलझ जाते हैं। फिल्‍म में माधव झा के दोस्‍तों को व्‍यक्तित्‍व नहीं मिल पाया है। एक शैलेष दिल्‍ली के हॉस्‍टल से न्‍यूयार्क तक है,लेकिन उसकी मौजूदगी और माधव के प्रति उसका रवैया अस्‍पष्‍ट ही रहता है। मां की भूमिका में सीमा विश्‍वास फिल्‍मी पांरिवारिक मां ही रहती हैं।
अवधि- 135 मिनट
** दो स्‍टार

दरअसल : फिल्‍म स्‍टार्स के फैशन ब्रांड



दरअसल...
फिल्‍म स्‍टारों के फैशन ब्रांड
-अजय ब्रह्मात्‍मज

दो दिन पहले सोनम कपूर ने अपनी बहन रिया कपूर के साथ मिल कर खुद का नया फैशन ब्रांड रिसोन आरंभ किया। सारे मशहूर ब्रांड सोनम कपूर के साथ मिल कर फैशन का नया ब्रांड शुरू करना चाह रहे थे। सोनम ने मौके की जरूरत को समझा और बहन रिया के साथ इस वंचर की शुरूआत कर दी। सोनम की स्‍टायलिंग रिया कपूर ही करती हैं। दोनों बहनों की कोशिश है कि शहरी मिडिल क्‍लास की लड़कियों को किफायती कीमत में फैशनेबल कपड़े मिल जाएं। रिया और सोनम के पहले कई फिल्‍म स्‍टार अपने फैशन ब्रांड ला चुके हैं। वे सफल भी हैं और निश्चित कमाई कर रहे हैं। इनमें से सबसे अधिक कामयाबी सलमान खान को मिली है। उनका बीइंग ह्यूमन ब्रांड अब प्रदेशों की राजधानियों से आगे जिला शहरों तक में खुल रहा है।
भारतीय समाज में फिल्‍म स्‍टार ही फैशन आइकॉन माने जाते हैं। समाज के अप्न्‍य क्षेत्रों की तरह फैशन जगत में भी उनकी तूती बोलती है,क्‍योंकि उनके नाम के साथ उनकी लोकप्रियता जुड़ी होती है। फिल्‍मों और फिल्‍म स्‍टारों से ही हमारे देश के युवा फैशन सीखते हैं। किसी फिल्‍म के पॉपुलर होते ही उसके नायक और नायिका के कपड़ों की नकल होन लगती है। अभी कपड़ों के ब्रांड आ गए हैं और फिल्‍म स्‍टारों के फैशन बांड चलने लगे हैं। पहले तो शहर के दर्जी ही फैशन की जरूरत को अंजाम देते थे। राजेश खन्‍ना का खास कुर्ता,शत्रुघ्‍न सिन्‍हा के जैकेट और अमिताभ बच्‍चन की बड़े कॉलर की कमीजें हमारे फैमिली दर्जी ही सिल देते थे। लड़कियों के कपड़े हीरोइनों के परिधानों से नकल किए जाते थे। और कुंबई की फैशन स्‍ट्रीट से कस्‍बों तक पहुंचने में उनहें अधिक देर नहीं लगती थी। याद करें तो हम आप के हैं कौन ने तो साडि़यों के रंग और डिजायन तक तय कर दिए थे। करीना कपूर के ब्राइडल लहंगे की मांग अभी तक बनी हुई है। उस पर तो फिल्‍म भी बन चुकी है।
फैशन पर फिल्‍मों और फिल्‍म हीरोइनों का प्रभाव हमेशा रहा है। इधर उसमें बाजार और व्‍यापार घुस गया है। फिल्‍म स्‍टारों को भी समझ में आ गया है कि ब्रांड एंडोर्स करने से बेहतर है कि हम अपना फैशन ब्रांड आरंभ करें। अपना स्‍टार्ट अप खड़ा करें और सारा मुनाफा सीधे लें। नरगिस,नूतन,मधुबाला और मीनाकुमरी या दिलीप कुमार,देव आनंद और राज कपूर के जमाने में अपनी भागीदारी से पैसे कमाने की यह सुधि सितारों में नहीं थी। तब अभिनय और फिल्‍मों से जुड़ी अघोषित नैतिकताएं थीं। कलाकार अपने पेशे और पैशन से बाहर की एक्टिविटी के बारे में सोच ही नहीं पाते थे। 21 वीं सदी के पहले आर्थिक सुरक्षा के लिए वे जेवर और रियल एस्‍टेट में ही निवेश किया करते थे। भला हो मनमोहन सिंह की आर्थिक उदार नीति और बाजार के बड़ते प्रभाव का... सितारों को लगा कि एक्टिंग तो चल ही रही है। उसके साथ और भी धंध्‍े किए जा सकते हैं। फिल्‍मों से मिली लोकप्रियता को धंधे में भुनाया जा सकता है। पहल करने वालों में सुनील शेट्टी उल्‍लेखनीय हैं।
21 वीं सदी में तो सारे कलाकार और स्‍टार फिल्‍मों के साथ अन्‍य व्‍यापारिक प्रस्‍तावों पर गौर करने लगे हैं। मशहूर फैशन बांड के एंडोर्समेंट और मॉडलिंग में भी अनेक सितारे व्‍यस्‍त हैं। फैशन ब्रांड में ही देखें तो अग्रणी सलमान खान से लेकर सोनम कपूर तक बाजार में उतर चुके हैं। अभी दीपिका पादुकोण,रितिक रोशन,करण जौहर,आलिया भट्ट,शिल्‍पा शेट्टी,श्रद्धा कपूर,करीना कपूर खान,लारा दत्‍ता,बिपाशा बसु,अनुष्‍का शर्मा,जॉन अब्राहम,लीजा हेडन,लीजा रे,मलाइका अरोड़ा खान आदि अपने छोटे-बड़े ब्रांड के साथ बाजार में मौजूद हैं। इनके ब्रांड की मांग फिल्‍मों की कामयाबी के साथ घटती-बढ़ती रहती है। अभी सलमान खान अकेले ऐसे सितारे हैं,जिन्‍होंने फैशन ब्रांड में ठोस प्रगति हासिल की है। सबूत यह है कि उनके बीइंग ह्यूमन के नकली उत्‍पाद धड़ल्‍ले से कस्‍बों में बिक रहे हैं।
@brahmatmajay