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Saturday, October 21, 2017

रोज़ाना : लौटी रौनक सिनेमाघरों में



रोज़ाना
लौटी रौनक सिनेमाघरों में
-अजय ब्रह्मात्‍मज
अपेक्षा के मुताबि‍क गोलमाल अगेन देखने दर्शक सिनमाघरों में उमड़ रहे हैं। हालांकि फिल्‍म को अच्‍छा एडवासं नहीं लगा था,लेकिन पहले ही दिन सिनेमाघरों में 70 प्रतिशत दर्शकों का आना बताता है कि यह फिल्‍म चलेगी। दर्शक तो टूट पड़ते हैं। उन्‍हें मनोरंजन मिले तो वे परवाह नहीं करते कि फिल्‍म में कोई नया कलाकार है या बासी कढ़ी ही परोसी जा रही है। गोलमान अगेन की तुलना में सीक्रेट सुपरस्‍टार को अधिक दर्शक नहीं मिले हैं। 35-40 प्रतिशत दर्शकों के सहारे बड़ी उम्‍मीद नहीं की जा सकती। फिर भी ट्रेड पंडित मान रहे हैं कि सीक्रेट सुपरस्‍टार का जिस तरह से समीक्षकों की तारीफ मिली है,उससे लगता है कि दर्शक भी आएंगे। सीक्रेट सुपरस्‍टार अलग तरह की फिल्‍म है। बजट में छोटी है। 15 साल की लड़ी जायरा वसीम फिल्‍म की हीरोइन है। ट्रेड पंडित मानते हैं कि यह फिल्‍म सिनेमाघरों में टिकी रहेगी। दोनों के प्रति दर्शकों के उत्‍साह से सिनेमाघरों में रौनक और बाक्‍स आफिस पर खनक लौटी है।
पारंपरिक तरीके से दीवाली से साल के अंत तक के शुक्रवार हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री के लिए फायदेमंद होते हैं। देश के दो बड़े क्‍योहार दीवाली और क्रिसमस की वजह से उत्‍सव का माहौल रहता है। कुछ अतिरिक्‍त खर्च हो भी जाए तो मलाल नहीं होता। दीवाली और क्रिसमस में होली और ईद की तरह परिवार के सदस्‍य एकत्रित होते हैं। भारतीय समाज में सामूहिक टाइम पास के लिए सिनेमा से बेहतर विकल्‍प नहीं है। पूरा परिवार एक साथ सिनेमाघरों में जाता है। अचानक सिनेमाघरों में दर्शक बढ़ जाते हैं। और उसी अनुपात में फिल्‍मों का बिजनेस भी।
गौर करें तो दीवाली से क्रिसमस के बीच पॉपुलर स्‍आरों की फिल्‍में आती हैं। परिपाटी बन चुकी है कि खानत्रयी में से किसी एक खान की फिल्‍म तो आएगी है। इस बार दीवाली पर आमिर खान आए और क्रिसमस पर सलमान खान टागर जिंदा है लेकर आ रहे हैं। इसके अलावा 1 दिसंबर को संजय लीला भंसाली की पद्मावती आएगी। इसी बीच तुम्हारी सुलु में विद्या बालन अपनी मदमस्‍त आवाज से दर्शकों को दीवाना बनाने आ रही हैं। पिछले कुछ हफ्तों से सिनेमाघर सूने पड़े थे। अगले कुछ हफ्ते चहल-पहल के रहेंगे। माना जा रहा है कि साल बीतते-बीतते हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री का बैलेंस शीट फायदा दिखाने लगेगा। खास कर पद्मावती और टाइगर जिंदा है से फिल्‍म इंडस्‍ट्री की बड़ी उम्‍मीदें जुड़ी हैं। पद्मावती के बारे में चल रहे विवाद रिलीज के पहले खत्‍म हो जाएं तो पूरे देश का अबाधित मनोंरंजन होगा।

फिल्‍म समीक्षा : गोलमाल अगेन



फिल्‍म रिव्‍यू
गोलमान अगेन
-अजय ब्रह्मात्‍मज
इस फिल्‍म में तब्‍बू अहम भूमिका में हैं। उनके पास आत्‍माओं को देख सकती हैं। उनकी समस्‍याओं का निदान भी रहता है। जैसे कि एक पिता के बेटी के पास सारे अनभेजे पत्र भेज कर वह उसे बता देती हैं कि पिता ने उसके इंटर-रेलीजन मैरिज को स्‍वीकार कर लिया है। तब्‍बू गोलमाल अगेन की आत्‍मा को भी देख लेती हैं। चौथी बार सामने आने पर वह कहती और दोहराती हैं कि गॉड की मर्जी हो तो लॉजिक नहीं,मैजिक चलता है। बस रोहित शेट्टीी का मैजिक देखते रहिए। उनकी यह सीरीज दर्शकों के अंधविश्‍वास पर चल रही है। फिल्‍म में बिल्‍कुल सही कहा गया है कि अंधविश्‍वास से बड़ा कोई विश्‍वास नहीं होता।
फिर से गोपाल,माधव,लक्ष्‍मण 1,लक्ष्‍मण2 और लकी की भूमिकाओं में अजय देवगन,अरशद वारसी,श्रेयस तलपडे,कुणाल ख्‍येमू और तुषार कपूर आए हैं। इनके बीच इस बार परिणीति चोपड़ा हैं। साथ में तब्‍बू भी हैं। 6ठे,7वें और 8वें कलाकार के रूप संजय मिश्रा,मुकेश तिवारी और जॉनी लीवर हैं। दस कलाकारों दस-दस मिनट (हीरो अजय देवगन को 20 मिनट) देने और पांच गानों के फिल्‍मांकन में ही फिल्‍म लगभग पूरी हो जाती है। बाकी कसर नाना पाटेकर के सवाद और बाद में स्‍वयं ही आ जाने से पूरी हो जाती है। आप प्‍लीज लॉजिक न देखें। रोहित शेट्टी का मैजिक देखें कि कैसे वे बगेर ठोस कहानी के भी ढाई घंटे तक दर्शकों को उलझाए रख सकते हैं। फिल्‍म खत्‍म होने पर दर्शक नाखुश नहीं होते। पर्दे पर चल रहे जादू से संतुष्‍ट होकर निकलते हैं।
रोहित शेट्टी ने चौथी बार गोलमाल अगेन में लोकेशन और कलाकारों की ताजगी जोड़ी है। समय और उम्र के साथ उनके लतीफे और हास्‍यास्‍पद सीन भी पहले से बेहतर हुए हैं। उनमें फूहड़ता नहीं हैं। रोहित शेट्टी की फिल्‍मों में द्विअर्थी संवाद यों भी नहीं होते। गोलमाल अगेन बच्‍चों और बड़ हो चुके दर्शकों में मचल रहे बच्‍चों को पसंद आएगी। यह उनके लिए ही है। बस,कुणाल ख्‍येमू,श्रेयस तलपड़े और तुषार कपूर जवान होने की वजह से ऊलजलूल हरकतों में भी जंचते हैं। अजय देवगन,अरशद वारसी और तब्‍बू को बचकानी हरकतें करते देखना कई दृश्‍यों में पचता नहीं है। पिछली फिल्‍मों और उनमें निभाए रोल से बनी उनकी छवि आड़े आ जाती है। और फिर रोहित शेट्टी अपने कलाकारों को नई भावभंगिताएं नहीं दे पाते। अजय देवगन की हथेली जब भी माथे से टकराती है तो कानों में आता माझी सटकली गूंजने लगता है। वैसे ही अरशद वारसी सर्किट की याद दिलाते रहते हैं।
नए लोकेशन से फिल्‍म में नयापन आ गया है। तब्‍बू और परिणीति चोपड़ा के आने और कहानी में भूत का एंगल होने से नए ट्विस्‍ट और टर्न भी देखने का मिलते हैं। परिणीति चोपड़ा के हिस्‍से में अधिक सीन और कॉस्‍ट्यूम चेंज नहीं हैं। तब्‍बू अपनी अदाकारी से फिल्‍म में मिसफिट नहीं लगतीं। यह उनकी खूबी है।
इस बार गाडि़यां नहीं उड़ी हैं। गीतसंगीत में कैची बोल या संगीत नहीं है। फिल्‍म में अजय देवगन और परिणीति चोपड़ा के बताएं संबंधों की वजह से उन पर फिल्‍मूाया रोमांटिक गाना बेमानी और अनुचित लगता है। फिल्‍म खत्‍म होने के बाद दिखाए गए फुटेज में भी कॉमेडी है। उन्‍हें जरूर देखें।
अवधि- 151 मिनट
*** तीन स्‍टार

दरअसल : हेमामालिनी की आधिकारिक जीवनी



दरअसल
हेमामालिनी की आधिकारिक जीवनी
-अजय ब्रह्मात्‍मज

हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री के कलाकारों की जीवनियां और आत्‍मकथाएं धड़ाधड़ छप रही हैं। कलाकारों के साठ के आसपास पहुंचते ही अप्रोच किया जाने लगता है। उनमें से कुछ तैयार हो जाते हैं। गौर करें तो ये जीवनियां और आत्‍मकथाएं ज्‍यादातर फिल्‍म पत्रकार लिख रहे हैं। देव आनंद के बाद अमरीश पुरी और नसीरूद्दीन शाह ने अपनी आत्‍मकथाएं खुद लिखीं।
किसी दिन अमिताभ बच्‍चन ने आत्‍मकथा लिखी तो वह हर लिहाज से श्रेष्‍ठ होगी,क्‍यों कि उनके पास भाषा और अभिव्‍यक्ति है। उनके पिता ने लिखा था, अमित का जीवन अभी भी इतना रोचक, वैविध्यपूर्ण, बहुआयामी और अनुभव समृद्ध है - आगे और भी होने की पूरी संभावना लिए-कि अगर उन्होंने कभी लेखनी उठाई तो शायद मेरी भविष्यवाणी मृषा न सिद्ध हो। मैंने इसकी याद दिलाते हुए अमित जी से पूछा था कि क्‍या वे अपने बाबूजी की बात सही सिद्ध करेंगे तो उनका जवाब था, मुझमें इतनी क्षमता है नहीं कि मैं इसे सिद्ध करूं। उनका ऐसा कहना पुत्र के प्रति उनका बड़प्पन है । लेकिन एक तो मैं आत्मकथा लिखने वाला नहीं हूं। और यदि कभी लिखता तो जो बाबूजी ने लिखा है,उसके साथ कभी तुलना हो ही नहीं सकती। क्योंकि बाबूजी ने जो लिखा है, आज लोग ऐसा कहते हैं कि उनका जो गद्य है वो पद्य से ज्यादा बेहतर है। खास तौर से आत्मकथा। उनके साथ अपनी तुलना करना गलत होगा। अपनी आत्‍मकथा भेंट करते हुए हरिवंश राय बच्‍चन ने लिखा था, प्यारे बेटे अमित को, जो मुझे विश्वास है, जब अपनी आत्मकथा लिखेगा तो लोग मेरी आत्मकथा भूल जाएंगे?’अमिताभ बच्‍चन एक तरीके से किस्‍तों में अपनी आत्‍मकथा ब्‍लॉग में लिख रहे हैं। फिल्‍मी भाषा में कहें तो उक अच्‍छा एडीटर उनके ब्‍लॉग के फुटेज से एक पठनीय और पूर्ण आत्‍कथा संपादित कर सकता है।
हाल ही में हेमा मालिनी की आधिकारिक जीवनी प्रकाशित हुई है। इसे उनके परिचित फिल्‍म पत्रकार रामकमल मुखर्जी ने लिखा है। रामकमल मुखर्जी कोलकाता में पत्रकारिता के आरंभिक दिनों से हेमा मालिनी के फैन रहे हैं। उन्‍होंने मुंबई आने के कुछ सालों के अंदर ही हेमा मालिनी दीवा अनवेल्‍ड काफी बुक तैयार किया था। हेमा मालिनी की परिचित और करीबी भावना सोमैया भी उनकी जीवनी लिख चुकी हैं। इन दो किताबों के बाद आधिकारिक आत्‍मकथा के लिए हेमा मालिनी को तैयार करने से ही रामकमल मुखर्जी के उत्‍साह और लगन की कल्‍पना की जा सकती है। यह दीगर तथ्‍य है कि फिल्‍म कलाकार अंग्रेजी में जीवनी और आत्‍मकथा के लिए जल्‍दी तैयार हो जाते हैं। हिंदी फिल्‍मों के कलाकार हिंदी में आत्‍म्‍कथा नहीं लिखते। बलराज साहनी अकेले अपवाद बने हुए हैं।
रामकमल मुखर्जी लिखित हेमा मालिनी की जीवनी का टायटल बियांड ड्रीम गर्ल है। टायटल से ही स्‍पष्‍ट है कि यह केवल अभिनेत्री हेमा मालिनी की जीवनी नहीं है। हेमा मालिनी 15 सालों तक नंबर वन अभिनेत्री रहीं। अपने समय की इस व्‍यस्‍त अभिनेत्री ने धर्मेन्‍द्र से शादी की। वह धर्मेन्‍द्र की दूसरी पत्‍नी हैं। वह अपनी बेटियों के साथ अलग बंगले में रहती हैं। वह एक स्‍वतंत्र जिंदगी जी रही है। अभी तो वह भाजपा की नेता और एक्टिव कार्यकर्ता हैं। इसके साथ उनकी नृत्‍य नाटिकाओं का निरंतर प्रदर्शन होता रहता है। 14 साल की उम्र से फिल्‍मों में सक्रिय हेमा मालिनी की जिंदगी अभिनेत्री और औरत के रूप में निश्चित ही दिलचस्‍प होगी। इस जीवनी को पढ़ने के बाद हम औरत हेमा मालिनी से परिचित होंगे,जिन्‍होंने आज का मुकाम हासिल किया है।
जीवनी के विमोचन के अवसर पर हेमा मालिनी ने बताया कि उन्‍होंने रामकल मुखर्जी के कहने पर खुद से संबंधित सभी मुद्दों पर बात की है। उन्‍होंने पहली बार अपने सौतेले बेटों सी और बॉबी देओल के साथ अपने संबंधों पर भी प्रकाश डाला है। एक और बाम इस जीवनी को दूसरे कलाकारों से अलग करती है कि इसकी भूमिका माननीय प्रधान मंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी ने लिखी है।

Friday, October 20, 2017

रोज़ाना : सपना ही हैं शाह रुख



रोज़ाना
सपना शाह रुख ही हैं
-अजय ब्रह्मात्‍मज
देश भर से जागती आंखों में फिल्‍म स्‍टार बनने के सपने लिए मुंबई धमके सभी युवा कलाकारों का एक ही लक्ष्‍य होता है...देर-सबेर फिल्‍म इंडस्‍ट्री में अपनी पहचान के साथ जगह हासिल करना। उनके लक्ष्‍य को फिल्‍म स्‍टार का रूप दिया जाए तो वह शाह रुख खान ही होता है। पिछले कुछ सालों में शाह रुख खान की फिल्‍में नहीं चल रही हैं। फिर भी उनके स्‍टारडम में गिरावट नहीं आई है। वे आज भी बाकी दोनों खानों(आमिर और सलमान) के समकक्ष बने हुए हैं। फिल्‍म ट्रेड में भी उनके फ्यूचर के प्रति कोई आशंका नहीं है। उन्‍होंने खुद ही फिल्‍में कम कर दी हैं। उनकी चुनिंदा फिल्‍में दर्शकों को रास नहीं आ रही हैं। इन सभी लक्षणों के बावजूद मुंबई आया हर नया कलाकार शाह रुख ही बनना चाहता है। शाह रुख खान में ऐसा क्‍या है,जो फिलवक्‍त उनसे अधिक कामयाब सलमान खान और आमिर खान में नहीं है।
कई कारण हो सकते हैं। सबसे पहले तो सलमान खान सलीम खान के बेटे हैं। आमिर खान ताहिर हुसैन के बेटे हैं। ताहिर हुसैन के भाई नासिर हुसैन कामयाब निर्माता-निर्देशक थे। दोनों फिल्‍मी परिवारों से हैं। इनके विपरीत शाह रुख खान का फिल्‍म इंडस्‍ट्री से कोई सीधा ताल्‍लुक नहीं है। उन्‍होंने टीवी शो से शुरूआत की। चंद सालों के अंदर वे फिल्‍मों में आए और अपने साहसी फैसलों और फिल्‍मों के चुनाव से वे आमिर और सलमान के बराबर हो गए। उन्‍हें ‍िकंग खान् और बादशाह की उपाधियां दी गईं। वे आउटसाइडर हैं,जो अपने उत्‍कर्ष के दिनों में समकालीनों से अधिक देदीप्‍यमान थे और लंबे समय तक प्रतिद्वंद्वयों की ईर्ष्‍या का कारण बने रहे।
बाहर से आई प्रतिभाएं शाह रुख खान से खुद को कनेक्‍ट कर लेती हैं। उन्‍हें लगता है कि अगर शाह रुख खान सफलता के शिखर पर पहुंच सकते हैं तो वे भी वहां तक पहुंचने की कोशिश कर स‍कते हैं। शाह रुख का मुखर और ऊर्जावान व्‍यक्त्त्वि उन्‍हें आकर्षित करता है। हिंदी फिल्‍मों के पारंपरिक स्‍आरों की खूबियां उनमें नहीं हैं,लेकिन अपने चुंबकीय व्‍यक्त्त्वि से वे सभी उम्र के दर्शकों का मन मोह लेते हैं। आमिर और सलमान की तुलना में वे अधिक प्रगल्‍भ और बातूनी हैं। दर्शकों और प्रशंसकों का प्रोफाइल समझ कर वे अंदाज-ए-बयां बदल देते हैं। आप उन्‍हें किसी यूनिवर्सिटी में छात्रों के साथ सुनें और किसी फिल्‍मी इवेंट में चुटकी लेते देखें। उनकी परतदार हाजिरजवाबी से उनके विस्‍तार और आम जीवन से रिश्‍ते का पता चलता है। हिंदी और अंग्रेजी पर उनका समान अधिकार है। वे वाक् पटु हैं। और भी कारण हैं। उन पर फिर कभी....

फिल्‍म समीक्षा : सीक्रेट सुपरस्‍टार



फिल्‍म रिव्‍यू
सीक्रेट सुपरस्‍टार
जरूरी फिल्‍म
-अजय ब्रह्मात्‍मज

खूबसूरत,विचारोत्‍तेजक और भावपूर्ण फिल्‍म सीक्रेट सुपरस्‍टार के लिए लेखक-निर्देशक अद्वैत चंदन को बधाई। अगर फिल्‍म से आमिर खान जुड़े हो तो उनकी त्रुटिहीन कोशिशों के कारण फिल्‍म का सारा क्रेडिट उन्‍हें दे दिया जाता है। निश्चित ही आमिर खान के साथ काम करने का फायदा होता है। वे किसी अच्‍छे मेंटर की तरह निर्देशक की सोच को अधिकतम संभावनाओं के साथ फलीभूत करते हैं। उनकी यह खूबी सीक्रेट सुपरस्‍टार में भी छलकती है। उन्‍होंने फिल्‍म को बहुत रोचक और मजेदार तरीके से पेश किया है। पर्दे पर उन्‍होंने अपनी पॉपुलर छवि और धारणाओं का मजाक उड़ाया है। उनकी मौजूदगी फिल्‍म को रोशन करती है,लेकिन वे जायरा वसीम की चमक फीकी नहीं पड़ने देते। सीक्रेट सुपरस्‍आर एक पारिवारिक फिल्‍म है। रुढि़यों में जी रहे देश के अधिकांश परिवारों की यह कहानी धीरे से मां-बेटी के डटे रहने की कहानी बन जाती है। हमें द्रवित करती है। आंखें नम होती हैं और बार-बार गला रुंध जाता है।
वडोदरा के निम्‍नमध्‍यवर्गीय मुस्लिम परिवार की इंसिया को गिटार बजाने का शौक है। वह लिखती,गुनगुनाती और गाती है। उसका सपना है कि वह सिंग्रिग स्‍टार बने। मां उसके साथ हैं1 दिक्‍क्‍त पिता की है। खास तरह की सोच के साथ पले-बढ़े पिता को अहसास ही नहीं है कि व‍ह रुढि़वादी और कठोर है। वह पारंपरिक पति और पिता की तरह बीवी-बेटी को नियंत्रण में रखना चाहता है। बेटे से उसे अलबत्‍ता प्‍यार है। उसका लाढ़-दुलार बेटे तक ही सीमित रहता है। बीवी पर हाथ उठाना वह अपना अधिकार समझता है। फिल्‍म की शुरूआत में वह गैरमौजूद है,लेकिन मां-बेटी की बातचीत से हमें जानकारी मिल जाती है कि हम कैसे पति और पिता से मिलने वाले हैं?
मां-बेटी की मिली-जुली इस कहानी में तय करना मुश्किल है कि कौन सुपरस्‍टार है? मां एक दायरे में पली है। वह चाहती तो है,लेकिन हिम्‍मत नहीं कर पाती। बेटी हिम्‍मती है,लेकिन दायरे में बंधी है। दोनों आपनी सोच,शौक और सुकून के पल निकाल ही लेते हैं। बेटी की संबल है मां और मां की प्रेरणा है बेटी। दोनों अपनी परिस्थिति के शिकार हैं,लेकिन उनमें रत्‍ती भी भी नकारात्‍मकता नहीं है। वे खुशी के रास्‍ते निकालती रहती हैं। लेखक को बधाई देनी चाहिए कि अवसाद से घिरे इन किरदारों को उन्‍होंने उदास और व्‍यथित नहीं रख है। वक्‍त पड़ने पर आने फैसलों से वे चौंकाती हैं। उम्‍मीद देती हैं।
इंसिया की भूमिका में जायरा वसीम की अदाकारी नैसर्गिक है। जायरा ने इंसिया को उसकी मासूमिसत और जिद के साथ निभाया है। निर्देशक की सोच में ढली जायरा इंसिया को साक्षात कर देती है। इंसिया के भाई और दोस्‍त के रूप में आए कलाकार जीवंत हैं। दोस्‍त चिन्‍मय उम्‍दा किरदार है। उसे ऐसा ही कोई कलाकार निभा पाता। मां की भूमिका में केहर विज उल्‍लेखनीय हैं। उनका किरदार एक दायरे में ही रहता है,जिसे उन्‍होंने बखूबी निभाया है। आमिर खान के क्‍या कहने? पृष्‍ठभूमि में रहते हुए भी वे शक्ति कुमार को जिस अंदाज में पेश करते हैं...वह दर्शनीय है। इस फिल्‍म की खोज हैं राज अर्जुन। उन्‍होंने पिता फारुख की भूमिका में खौफ पैदा किया है। उन्‍हें लेख-निर्देशक का भरपूर सपोर्ट मिला है। पर्दे पर हो तो या नहीं हो तो भी उनसे खौफजदा बीवी-बेटी की वेदना सब कुछ कह देती है। उम्‍मीद है फिल्‍म इंडस्‍ट्री उनकी प्रतिभा पर गौर करेगी।
अवधि- 150 मिनट
**** चार स्‍टार

Tuesday, October 17, 2017

रोज़ाना : कुंदन शाह की याद



रोज़ाना
कुंदन शाह की याद
-अजय ब्रह्मात्‍मज
मुंबई में चल रहे मामी फिल्‍म फेस्टिवल में कुंदन शाह निर्देशित जाने भी दो यारो का खास शो तय था। यह भी सोचा गया था कि इसे ओम पुरी की श्रद्धांजलि के तौर दिखाया जाएगा। फिल्‍म के बाद निर्देशक कुंदन शाह और फिल्‍म से जुड़े सुधीर मिश्रा,विधु विनोद चापेड़ा और सतीश कौशिक आदि ओम पुरी से जुड़ी यादें शेयर करेंगे। वे जाने भी दो यारो के बारे में भी बातें करेंगे। इस बीच 7 अक्‍टूबर को कुंदन शाह का आकस्मिक निधन हो गया। तय कार्यक्रम के अनुसार शो हुआ। भीड़ उमड़ी। फिल्‍म के बाद का सेशन ओम पुरी के साथ कुंदन शाह को भी समर्पित किया गया। ज्‍यादातर बातचीत कुंदन शाह को ही लेकर हुई। एक ही रय थी कि कुंदन शाह मुंबई की फिल्‍म इंडस्‍ट्री की कार्यप्रणाली में मिसफिट थे। वे जैसी फिल्‍में करना चाहते थे,उसके लिए उपयुक्‍त निर्माता खोज पाना असंभव हो गया है।
कुछ बात तो है कि उनकी जाने भी दो यारो 34 सालों के बाद आज भी प्रासंगिक लगती है। आज भी कहीं पुल टूटता है तो तरनेजा-आहूजा जैसे बिजनेसमैन और श्रीवास्‍तव जैसे अधिकारियों का नाम सामने आता है। और आज भी कोई सुधीर व विनोद बहल का बकरा बनता है। साहित्‍य से तुलना करें तो कुंदन शाह की जाने भी दो यारो देखना कहीं न कहीं हरिशंकर पारसाई और शरद जोशी को पढ़ने जैसा है। गुदगुदी होती है,हंसी आती है,लेकिन साथ ही मन छलनी होता है। कुंदन शाह ने अपने समय के यथार्थ को चुटीले और नुकीले अंदाज में पेश किया। यह फिल्‍म क्रिएटिव सनकीपन और धुन की मिसाल है।
हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री में कैमरे के आगे-पीछे विख्‍यात हो चुकी तमाम हस्तियां इस फिल्‍म से जुड़ती चली गई थीं। सभी पर धुन सवार थी। कभी 72 झांटे लगातार शूटिंग चल रही है। नसीरूद्दीन शाह सेट पर ही सो रहे हैं और शॉट आने पर हाथ-मुह धोकर तैयार हो जाते हैं। कैमरामैन विलोद प्रधान क्रेन पर ही झपकी लेते हैं। सुबह आलू-गोभी की सब्‍जी बनती है तो शाम में गोभी-आलू की सब्‍जी परोसी जाती है। एक्‍टर को देने के लिए पर्याप्‍त पैसे नहीं हैं तो प्रोडक्‍शन इंचार्ज विधु विनोद पोपड़ा मेकअप कर के सेट पर खड़े हो जाते हैं। निर्देशक चौंकते हैं कि ऐसा क्‍यों? उन्‍हें बताया जाता है कि 2000 रुपए बचा लिए गए हैं। कम दर्शकों को मालूम होगा कि इस फिल्‍म में अनुपम खेर का एक पूरा सीक्‍वेंस था। एडीटिंग में उसे काट दिया गया,जबकि वह अनुपम खेर की पहली फिल्‍म थी...सारांश्‍ के भी पहले। यह अलग बात है कि जाने भी दो यारो में नहीं दिखने की वजह से भी उन्‍हें सारांश मिली महेश्‍ा भट्ट उस रोल में किसी नए कलाकार को लेना चाहते थे। जाने भी दो यारो के अनेक किस्‍से हैं। उन्‍हें समेटते हुए एक और किताब आनी चाहिए।

Saturday, October 14, 2017

रोजाना : एक उम्मीद है अनुपम खेर की नियुक्ति

रोजाना
उम्मीद है अनुपम खेर की नियुक्ति
-अजय ब्रह्मात्मज
पिछले दिनों एफटीआईआई में अनुपम खेर की नियुक्ति हुई। उनकी इस  नियुक्ति को लेकर सोशल मीडिया पर लगातार प्रतिक्रियाएं और फब्तियां चल रही हैं। सीधे तौर पर अधिकांश इसे भाजपा से उनकी नज़दीकी का परिणाम मान रहे हैं। यह स्वाभाविक है। वर्तमान सरकार के आने के पहले से अनुपम खेर की राजनीतिक रुझान स्पष्ट है। खासकर कश्मीरी पंडितों के मामले में उनके आक्रामक तेवर से हम परिचित हैं। उन्होंने समय-समय पर इस मुद्दे को भिन्न फोरम में उठाया है। कश्मीरी पंडितों के साथ ही उन्होंने दूसरे मुद्दों पर भी सरकार और भाजपा का समर्थन किया है। उन्होंने सहिष्णुता विवाद के समय अवार्ड वापसी के विरोध में फिल्मी हस्तियों का एक मोर्चा दिल्ली में निकाला था। उसके बाद से कहा जाने लगा कि अनुपम खेर की इच्छा राज्य सभा की सदस्यता है।
इस नियुक्ति को उनकी नज़दीकी माना जा सकता है। यह कहीं से गलत भी नहीं है। कांग्रेस और दूसरी सरकारें भी अपने समर्थकों को मानद पदों पर नियुक्त करती रही हैं। कांग्रेस राज में समाजवादी और वामपंथी सोच के कलाकार और बुद्धिजीवी सत्ता का लाभ उठाते रहे हैं। तख्ता पलटा है तो तख्तियां बदल रही हैं। अब उन पर नए नाम लिखे जा रहे हैं। सरकार की सोच के मुताबिक नीतियां बदली जा रही हैं। नए फैसले लिए जा रहे हैं। कुछ सालों के बाद पता चलेगा कि परिणाम क्या हुआ? तब तक विरोधियों और आलोचकों को सब्र से काम लेना चाहिए। दूसरी सोच से प्रेरित सारे कामों को नकारना उचित नहीं है।
एफटीआईआई में अनुपम खेर की नियुक्ति स्वागतयोग्य कदम है। सारांश से रांची डायरीज तक कि सैकड़ों फिल्मों के लंबे सफर में हम अनुपम खेर की प्रतिभा के साक्षी रहे हैं। उनके अभिनय क्षमता के बारे इन दो राय नहीं हो सकती। याद करें तो गजेंद्र चौहान की नियुक्ति को अनुपम खेर ने गलत कहा था और स्पष्ट शब्दों में ताकीद की थी के गजेंद्र चौहान किसी भी तरह इस पद के योग्य नहीं है। इस लिहाज से उनकी नियुक्ति सर्वथा उचित है।अपने अनुभव और संपर्क से वे एफटीआईआई में नई रवानी ला सकते हैं।सरकारी सहयोग से चल रहे इस संस्थान में देश के सुदूर कोने से प्रतिभाएं आती हैं। उन्हें अपनी प्रतिभा निखारने के मौके मिलता है। अनुपम खेस से गुजारिश रहेगी कि वे एफटीआईआई  की सैटेलाइट गतिविधियां आरम्भ करें। फिल्मी हस्तियों के सहयोग से देश भर में फिल्मों से संबंधित स्क्रिप्ट और तकनीकी वर्कशॉप हों। अनुपम खेर एक बड़ी उम्मीद हैं। ऐसी संस्थाओं में अनुपम जैसे व्यक्तियों और महानुभावों की दरकार है।

Friday, October 13, 2017

दरअसल : सारागढ़ी का युद्ध



दरअसल...
सारागढ़ी का युद्ध
-अजय ब्रह्मात्‍मज

तीन दिन पहले करण जौहर और अक्षय कुमार ने ट्वीट कर बताया कि वे दोनों केसरी नामक फिल्‍म लेकर आ रहे हैं। फिल्‍म के निर्देशक अनुराग सिंह रहेंगे। यह फिल्‍म बैटल ऑफ सारागढ़ी पर आधारित होगी। चूंकि सारागढ़ी मीडिया में प्रचलित शब्‍द नहीं है,इसलिए हिंदी अखबारों में ‘saragarhi’ को सारागरही लिखा जाने लगा। फिल्‍म इंडस्‍ट्री में भी अधिकांश इसे सारागरही ही बोलते हैं। मैं लगातार लिख रहा हूं कि हिंदी की संज्ञाओं को अंग्रेजी के साथ हिंदी में भी लिखा जाना चाहिए। अन्‍यथा कुछ पीढि़यों के बाद इन शब्‍दों के अप्रचलित होने पर सही उच्‍चारण नहीं किया जाएगा। देवनागरी में लिखते समय लोग सारागरही जैसी गलतियां करेंगे। दोष हिंदी के पत्रकारों का भी है कि वे हिंदी का आग्रह नहीं करते। अंग्रेजी में आई विस्‍प्तियों का गलत अनुवाह या प्यिंतरण कर रहे होते हैं।
बहरहाल,अक्षय कुमार और करण जौहर के आने के साथ सारागढ़ी का युद्ध पर फिल्‍म बनाने की तीसरी टीम मैदान में आ गई है। करण जौहर की अनुराग सिंह निर्देशित फिल्‍म का नाम केसरी रखा गया है। इसके पहले अजय देवगन ने भी इसी पृष्‍ठभूमि पर एक फिल्‍म की घोषणा की थी। कहते हैं अगस्‍त महीने में करण जौहर और काजोल के बीच पुन: दोस्‍ती हो जाने के बाद अपनी फिल्‍म विलंबित कर दी। वे करण जौहर की फिल्‍म से टकराना नहीं चाहते। पिछली फिल्‍म के समय दोनों के बीच बदमजगी हो चुकी है। सारागढ़ी का युद्ध की पृष्‍ठभूमि पर ही राजकुमार संतोषी की फिल्‍म निर्माणाधीन है। इस फिल्‍म में रणदीप हुडा केंद्रीय भूमिका निभा रहे हैं। अक्षय कुमार,अजय देगन और रणदीप हुडा के स्‍टारडम,अभिनय दक्षता और करिअर को ध्‍यान में रखें तो अजय देवगन ईशर सिंह की भूमिका के लिए उपयुक्‍त लगते हैं। यह ठीक है कि रणदीप हुडा अपने किरदारों पर मेहनत करते हैं। वे ईशर सिंह को भी जीवंत कर सकते हैं। अक्षय कुमार का तो जादुई समय चल रहा है। वे हर प्रकार की भूमिका में जंच रहे हैं।
सारागढ़ी का युद्ध है क्‍या?‍ पिछली सदियों के युद्धों में से एक सारागढ़ी का युद्ध वीरता और साहस के लिए विख्‍यात है।

अविभाजित भारत में अंग्रेजों ने अपन स्थिति मजबूत करने के साथ सीमाओं की चौकसी आरंभ कर दी थी। हमेशा की तरह उत्‍र पश्चिमी सीमांत प्रांत की तरफ से आक्रमणकारियों का खतरा जारी था। उनसे बचाव के लिए लॉकफोर्ट और गुलिस्‍ता फोट्र बनाए गए थे। दुर्गम इलाका होने और दोनों फरेर्ट के गीच संपर्क स्‍‍थापित करने के उद्देश्‍य से दोनों फोर्ट के बीच में सारागढ़ी पोस्‍ट बनार्ब गई थी। पोस्‍ट पर तैनात सैनिक मुस्‍तैदी से आततायी लश्‍करों पर नजर रखते थे।
12 सितंबर 1897 की घटना है। सारागढ़ी पोस्‍ट पर तैनात सैनिकों ने देखा की अफगानों का लश्‍कर पोस्‍अ की तरफ बड़ा चला आ रहा है। वहां से सैनिकों ने गुलिस्‍तान फोर्ट पर हेलिकॉग्राफ से मदद के लिए संदेश भेजा,लेकिन वहां मौजूद अंग्रेज फौजी अधिकारी मदद करने में असमर्थ रहा। आक्रमणकारी लश्‍कर में 10,000 से अधिक सैनिक थे। ऐसी स्थिति में सारागढ़ी पोस्‍ट पर मौजूद 21 जवानों की अुकड़ी ने हवलदार ईशर सिंह के नेतृत्‍व में पोस्‍ट की रक्षा के लिए लढ़ने का फैसला किया। दिन भर युद्ध चला। यह अलग बात है कि इस युद्ध में वे खेत आए,लेकिन उन्‍होंने अपने शौर्य और साहस से अफगान सैनिकों के दांत खट्टे कर दिए थे। उन्‍होंने उन्‍हें दिन भी उलझाए रख। इन जांबाज सैनिकों की बहादुरी की तारीफ ब्रिटिश संसद में हुई और क्‍चीन विक्‍टोरिया ने सभी सैनिकों को वीरता पुरस्‍कार से सम्‍मनित किया। उन्‍हें जमीनों के साथ ईनाम भी दिए गए। सारागढ़ी के युद्ध और स्‍मारक पर मीडिया में लिखा जाना चाहिए।
सारागढ़ी का युद्ध पर फिल्‍म बनना गौरव की बात है,लेकिन एक साथ तीन फिल्‍मों का बनना कुछ सालों पहले भगत सिंह के जीवन पर बनी छह फिल्‍मों की याद दिला रहा है।


सात सवाल : विनीत कुमार सिंह



विनीत कुमार सिंह

अजय ब्रह्मात्‍मज
सात सवाल

विनीत कुमार सिंह की फिल्म ‘मुक्काबाज’ का गुरुवार को मुंबई में आयोजित मुंबई फिल्‍म फेस्टिवल में एशिया प्रीमियर हुआ। इससे पहले फिल्‍म को टोरंटो इंटरनेशनल फिल्‍म फेस्टिवल में प्रदर्शित किया जा चुका है। वर्ष 1999 से हिंदी सिनेमा में सक्रिय विनीत उसमें श्रवण की केंद्रीय भूमिका में दिखेंगे। फिल्‍म के निर्देशक अनुराग कश्‍यप हैं। विनीत से हुई बातचीत के अंश :  
1-यहां तक के सफर में आपने काफी धैर्य और उम्मीद कायम रखी। इन्हें कैसे कायम रख पाए?
मैं वह काम करना चाहता था, जिसमें सहज रहूं। साथ ही उसे करने में मुझे आनंद की प्राप्ति हो। डॉक्टर बनने के लिए मैंने काफी मेहनत की थी। तब जाकर फल मिला था। अभिनय करने पर खुशी की अनुभूति स्‍वत: हुई। मैं उससे थकता नहीं हूं। शूटिंग के दौरान घर जाने के लिए घड़ी नहीं देखता। यकीन था कि यहां पर मेहनत करुंगा तो बेहतर पाऊंगा। पापा ने भी हमेशा कहा कि हारियो न हिम्मत बिसारियो न हरिनाम। यानी जो हिम्मत नहीं हारता है उसे रास्ते मिल जाते हैं। इन्‍ही सब वजहों से धैर्य कायम रहा।

2-आपके अभिनय के सफर की शुरुआत कैसे हुई?
मैंने वर्ष 1999-2000 के आस-पास अभिनय में कदम रखा था। मैंने एक टैलेंट हंट शो जीता था। वहां से अभिनय के सफर का आगाज हुआ। मेरी पहली फिल्म ‘पिता’ थी। वह वर्ष 2002 में रिलीज हुई थी। 

3-कहा जा रहा है कि आपको ‘मुक्‍काबाज’ में पूरा स्पेस मिला है ठीक वैसे ही जैसे नवाजुद्दीन सिद्दिकी को ‘गैंग्‍स ऑफ वासेपुर’ में मिला था?
बहुत सारे लोग अच्छा काम कर रहे हैं। मैं उन्हें देखता रहता हूं।  उनके लिए खुश भी होता हूं। खुद वैसा काम करने की कोशिश में था। मैं काम मांग सकता हूं, पर निर्णय मेरे हाथ में नहीं है। ‘मुक्‍काबाज’ में मुझे काम करने की स्वतंत्रता मिली। मैं अलग-अलग तरह की स्क्रिप्ट चाहता हूं। ताकि मेरे काम की वैरायटी से लोग वाकिफ हो सकें।

4-अनुराग कश्यप के बारे में क्या कहना चाहेंगे जो आप जैसे कलाकारों साथ भरोसे पर काम करते हैं?
अनुराग नहीं होते तो शायद हम छोटे-मोटे रोल में सिमटे होते। लोग हमारी प्रतिभा से कभी वाकिफ नहीं हो पाते। उनमें भरोसा करने की क्षमता कहां से आती है उसकी मुझे कोई जानकारी नहीं है। मैं उनके साथ काम करता हूं। मुझे पता है कि वह अपने संघर्ष के दिनों को भूले नहीं हैं। वह हमारी तकलीफों न सिर्फ समझते हैं बल्कि महसूस करते हैं। वह यथासंभव मदद भी करते भी हैं। मैंने देखा है कि नवोदित कलाकार हो या तकनीशियन सभी से प्यार से पेश आते हैं। मेल-मुलाकात के बाद उसे भूलते नहीं हैं। उनकी यही खासियत हम जैसे कलाकारों के लिए उम्मीद की अलख जगाए रखती है।

5-दर्शकों तक अभी ‘मुक्‍काबाज’ नहीं पहुंची है। इंडस्ट्री के जानकारों को इसकी जानकारी है। कहा जा रहा है कि आपको बेहतरीन मौका मिला है। क्या यह आपके करियर की टर्निंग प्वाइंट फिल्म होगी?
फेस्टिवल या एडीटिंग में जिस किसी ने फिल्म देखी है उनकी प्रतिक्रियाएं मुझे लगातार मिल रही हैं। ऐसा रिस्पांस मुझे पहले कभी नहीं मिला। 

6-फिल्म ‘मुक्‍काबाज’ के बारे में बताएं।
यह बॉक्सिंग करने वाले लड़के की कहानी है। उसके अपने सपने हैं। वह उसी समाज का हिस्सा है जिसमें हम रहते हैं। खिलाडिय़ों को ढेरों सुविधाएं देने के दावे होते है, लेकिन सच दिखता है। उसका उस पर कैसा असर होता है? दरअसल, सफल खिलाड़ी की कहानी स्वर्ण अक्षरों में लिखी जाती है। हालांकि एक सफल खिलाड़ी के पीछे बहुत ऐसे लोग होते हैं जो बेहतर होते हुए भी असफल हैं। उनकी कहानी कहने-सुनने में किसी की रूचि नहीं होती। उनका दर्द लोगों को पता नहीं चलता। क्योंकि उसमें ग्लैमर नहीं होता। सफल लोग कुछ ही हैं मगर उसकी दौड़ में शामिल लोगों की संख्‍या बहुत ज्‍यादा है। ‘मुक्‍काबाज’ वैसे ही लोगों की कहानी है। उसमें लवस्टोरी भी है। 

-आप भी खिलाड़ी रहे हैं...
0 मैं खुद बॉस्केटबॉल का खिलाड़ी रहा हूं। मेरा जूनियर बॉस्केटबॉल टीम का कप्तान था। कुछ और खिलाड़ी उससे बेहतर रहे हैं। वह बचपन से अच्छे खिलाड़ी थे। उनका ध्यान कभी किसी की गुडबुक में आना नहीं रहा। खेल में ही उनकी दुनिया रची-बसी रही। उनकी वह जीवनशैली कुछ अधिकारियों को खटकती थी। खेलने की उस उम्र में वे जोश में होते थे मगर  दुनियादारी से दूर। तब उन लोगों को खुश करने में चूक जाते थे जिनके हाथ में निर्णय होता है। वे उनकी आंखों में गढ़ने लगते हैं। ऐसे खिलाड़ी कई बार बेबाकी से कुछ बोल जाते हैं। यही बात उनके लिए नासूर बन जाती है। उसकी कीमत चुकानी पड़ती है। 27-28 साल की उम्र में होश आने पर उनका करियर खत्म हो जाता है। ज्‍यादातर खिलाडि़यों से यह गलती होती है। यह सब चीजें भी फिल्‍म का हिस्‍सा होंगी।  

Thursday, October 12, 2017

रोज़ाना : मामी हो चुका है नामी



रोज़ाना
मामी हुआ चुका है नामी
-अजय ब्रह्मात्‍मज
आज से दस साल पहले इफ्फी (इंटरनेशनल फिल्‍म फेस्टिवल ऑफ इंडिया) के वार्षिक आयोजन के लिए देश भर के सिनेप्रेमी टूट पड़ते थे। उन दिनों केंद्रीय फिल्‍म निदेशालय का यह यह आयोजन एक साल दिल्‍ली और अगले साल दूसरे शहरों में हुआ करता था। गोवा में इफ्फी का स्‍थायी ठिकाना बना और उसके बाद यह लगामार अपना प्रभाव खोता जा रहा है। अभी देश में अनेक फिल्‍म फेस्टिवल आयोजित हो रहे हैं। उनमें से एक मामी(मुंर्अ एकेडमी आॅफ मूविंग इमेजेज) है। इस साल 19 वां फिल्‍म फेस्टिवल आयोजित हो रहा है। इस आयोजन के लिए देश भर के सिनेप्रेमी मुंबई धमक रहे हैं।
दोदशक पहले मुंबई के फिल्‍म इंडस्‍ट्री की हस्तियों और सिनेप्रेमियों को फिल्‍म फस्टिवल का खयाल आया। इफ्फी में नौकरशाही की दखल और गैरपेशवर अधिकारियों की भागीदारी से नाखुश सिनेप्रेमियों और फिल्‍मकारों का इसे पूर्ण समर्थन मिला। उन्‍हें यह एहसास भी दिलाया गया कि यह फेस्टिवल सिनेमा के जानकारों की देखरेख में संचालित होता है। उसका असर दिखा। फिल्‍मों के चयन से लेकर विदेशी फिल्‍मकारों और कलाकारों की शिरकत में दुनिया के नामी व्‍यक्तियों को निमंत्रित किया गया। देश के स्‍वतंत्र निर्माताओं की फिल्‍मों को तरजीह दी गई। 21 वीं सदी में उभर रही नए तेवर की फिल्‍मों को इस फेस्टिवल में सम्‍मान मिला। नतीजा यह हुआ कि प्रतिष्‍ठा और लोकप्रियता में मामी ने इफ्फी का स्‍थान हासिल कर लिया। अब यह फेस्टिवल देश भर के सिनेप्रेमियों के सालाना कैलेंडर में शामिल है।
जरूरी है कि मामी की तरह के फिल्‍म फस्टिवल देश की प्रमुख शहरों में आयोजित हों। उनमें कलाकार और फिल्‍मकार भी शामिल हों। सिनेमाई चेतना के बाद ही फिल्‍मों का संस्‍कार हो सकता है। हम रोना राते रहते हैं कि हिंदी और अन्‍य भारतीय भाषाओं में अच्‍छी फिल्‍में नहीं बन रही हैं। गौर करें तो भारतीय समाज और मीडिया में सिनेमा को कभी आदर से देखा ही नहीं गया। सिनेमा का मतलब गॉसिप और रसदार खट्टी-मीठी कहानिसां हो गई हैं। इन दिनों तो कलाकारों के अभिनय और श्ल्पि से अधिक उनकी जीवनशैली पर बातें होती हैं। ऐसे माहौल में बेहतर सिनेमा का विकास असंभव है। दर्शक तो कम होंगे ही।
अभी तकनीकी सुविधाओं की वजह से हर कोई विश्‍व भर का सिनेमा घर बैठे देख सकता है। सवाल होता है कि फिर फिल्‍म फेस्टिवल के आयोजन में क्‍या तुक है? तुक है। फिल्‍म फस्टिवल में दर्शकों की साूहिकता और फिल्‍मों के बारे में चल रही चर्चाएं और गोष्ठियां हमारे रसास्‍वादन को समृद्ध करती हैं। हमें बेहतर फिल्‍में देखना और उन्‍हें सराहना सिखाती हैं। जागरण फिल्‍म फेस्टिवल के तहत 16 शहरों में दर्शकों से मेलजोल में मैंने पाया है कि वे लाभान्वित होने के साथ मुखर भी होते हैं। वे सिनेमा के प्रति सीरियस होते हैं। और कुछ तो फिल्‍में बनाने के लिए निकल पड़ते हैं।