Search This Blog

Wednesday, September 20, 2017

रोजाना : मुश्किलें बढ़ेंगी कंगना की

रोजाना
मुश्किलें बढ़ेंगी कंगना की
-अजय ब्रह्मात्मज

पिछले हफ्ते रिलीज हुई कंगना रनोट की फिल्म सिमरन दर्शकों को बहुत पसंद नहीं आई है। कंगना के प्रशंसक भी इस फिल्म से नाखुश हैं। उन्हें कुछ ज्यादा बेहतर की उम्मीद थी। इस फिल्म में कंगना रनोट का निजी व्यक्तित्व और सिमरन का किरदार आपस में गड्ड-मड्ड हुए हैं। फिल्म देखते समय दोनों एक दूसरे को ग्रहण लगाते हैं या ओवरलैप करते हैं। नतीजा यह होता है कि हम वास्तविक कंगना और फिल्मी सिमरन के झोल में फंस जाते हैं। सिमरन में हमेशा की तरह कंगना रनोट का काम का काम बढ़िया है,लेकिन फिल्म कहीं पहुंच नहीं पाती है और निराश करती है। ज्यादातर समीक्षकों ने कंगना के काम की तारीफ की है ,जबकि फिल्म उन्हें पसंद नहीं आई है।
ऐसा माना जा रहा है कि 'सिमरन' को अपेक्षित प्रशंसा और कामयाबी नहीं मिलने से कंगना रनोट की मुश्किलें बढ़ेंगी। सभी मानते हैं कि फिल्में नहीं चलती हैं तो फिल्में मिलनी भी कम होती हैं। जो लोग  यह मान रहे हैं कि पहले 'रंगून' और अभी 'सिमरन' के नहीं चलने से कंगना को फिल्में नहीं मिल पाएंगी, वह सरलीकरण के धारणा से ग्रस्त हैं । सच्चाई यह है कि दो-चार फिल्मों के फ्लॉप होने से कंगना के स्तर के स्टार के कैरियर में ज्यादा फर्क नहीं पड़ता। उन्हें फिल्में में मिलती रहती हैं और कंगना रनोट ने तो घोषणा कर रखी है कि 'मणिकर्णिका' के बाद वह अपनी फिल्में खुद ही डायरेक्ट करेंगी। वह लेखन और निर्देशन के प्रति गंभीर हैं। समर्थ अभिनेत्री के तौर पर उन्होंने खुद को स्थापित किया है। उन्होंने तीन बार राष्ट्रीय पुरस्कार भी हासिल किया है।
दरअसल कंगना की मुश्किलें दूसरे किस्म की होंगी सिमरन की रिलीज के पहले उन्होंने अपने टीवी इंटरव्यू में जिस ढंग से खुलकर बातें की और ढेर सारे राज और रहस्य उद्घाटित किए कौन से फिल्मी हस्तियां सहम गई है। पिछले दिनों एक पॉपुलर फिल्म स्टार ने स्वीकार किया कि अगर भविष्य में उन्हें कंगना रनोट के साथ कोई फिल्म मिलेगी तो  वे ना कर देंगे। वह ऐसी अभिनेत्री के साथ काम नहीं करना चाहेंगे जिसकी मौजूदगी में बात-व्यवहार को लेकर अधिक सावधानी बरतनी पड़े।हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में भी समाज के विभिन्न क्षेत्रों की तरह बहुत कुछ दवा छुपा और रहस्य में रहता है उनके बारे में सभी जानते हैं लेकिन इंडस्ट्री के बाहर कोई उनकी चर्चा नहीं करता। यहां तक कि मीडिया के लोग भी ऐसे रहस्यों के मामले में अपनी आंखें और मुंह बंद रखते हैं। हिंदी फिल्मों के सभी पॉपुलर स्टार से संबंधित कुछ स्याह किस्से हैं, जो सभी कहते सुनते हो शेयर करते हैं। लेकिन उनके बारे में लेखों और संस्मरणों में कोई नहीं लिखता। एक समझदारी के तहत सब कुछ रोशनी के पीछे ढका रहता है। कंगना रनोट ने अपने वक्तव्यों से ऐसे रहस्यों को प्रकाशित कर दिया है। यही उनकी मुश्किलों का सबब बन गया है। फिल्म इंडस्ट्री का कुनबा उन्हें शक की निगाह से देखता है और आपसी मेलजोल से उन्हें दूर रखता है। अनजाने ही कंगना रनोट को अलग-थलग करने की कोशिशें आरंभ हो गई हैं। अब देखना है की कंगना रनोट इन मुश्किलों से कैसे निबटती हैं?

रोज़ाना : जितनी बची है,बचा लो विरासत



रोज़ाना
जितनी बची है,बचा लो विरासत
-अजय ब्रह्मात्‍मज
पिछले दिनों राज कपूर निर्मित आरके स्‍टूडियो में भीषण आग लगी। अभी तक कोई ठोस और आधिकारिक विवरण नहीं आया है कि इस आग में क्‍या-क्‍या स्‍वाहा हो गया? स्‍वयं ऋषि कपूर ने जो ट्वीट किया,उससे यही लगता है कि राज कपूर की फिल्‍मों से जुड़ी यादें आग की चपेट में आ गईं। उन्‍होंने ट्वीट किया था कि स्‍टूडियो तो फिर से बन जाएगा,लेकिन आरके फिल्‍म्‍स की फिल्‍मों से जुड़ी स्‍मृतियों और कॉस्‍ट्यूम की क्षति पूरी नहीं की जा सकती। ऋषि कपूर बिल्‍कुल ने सही लिखा। कमी यही है कि कपूर परिवार के वारिसों ने स्‍मृतियों के रख-रखाव का पुख्‍ता इंतजाम नहीं किया था। एक कमरे में सारे कॉस्‍ट्यूम आलमारियों में यों ठूंस कर रखे गए थे,ज्‍यों किसभ्‍ कस्‍बे के ड्राय क्लिनर्स की दुकान हो। हैंगर पर लदे हैंगर और उनसे लटकते कॉस्‍ट्यूम। पूछने पर तब के ज्म्म्ेिदार व्‍यक्ति ने कहा था कि कहां रखें? जगह भी तो होनी चाहिए।
हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री अपनी विरासत के प्रति शुरू से लापरवाह रही है। निर्माता और अभिनेता भी अपनी फिल्‍मों के दस्‍तावेज सहेजने में रुचि नहीं रखते। फिल्‍म निर्माता सक्रिय हो या निष्क्रिय...उनके प्रोडक्‍शन हाउस में कोई ऐसा विभाग और जिम्‍मेदार व्‍यक्ति नहीं होता जो अपनी ही फिल्‍में और उनसे संबंधित सामग्रियां को संभाल कर रखे। अधिकांश निर्माताओं को यह भी पता नहीं है कि देश में राष्‍ट्रीय फिल्‍म अभिलेखागार(एनएफएआई) जैसी एक सरकारी संस्‍था है,जो फिल्‍म दस्‍तावेजों के संरक्षण और रख-रखाव का कार्य करती है। अब तो कुछ निजी संग्रहकर्ता भी आ गए हैं। ऐसे व्‍यक्ति और संगठन फिल्‍मी सामग्रियों की खरीद-बिक्री नहीं करतीं। उनका संरक्षण करती हैं।
आरके स्‍टूडियो में लगी आग को खतरे की घंटी के रूप में लेना चाहिए। राष्‍ट्रीय फिल्‍म अभिलेखागार के अधिकारी और संबंधित मंत्रालय इस संबंध में अभियान चलाए। सभी को बताने-समणने की जरूरत है कि फिल्‍मी सामग्रिया और यादें हमारी बहुमूल्‍य थाती हैं,जिन पर केवल उस प्रोडक्‍शन हाउस या परिवार का अधिकार नहीं है। उन्‍हें सामूहिक विरासत और राष्‍ट्रीय धरोहर का दर्जा मिलना चाहिए। अभी सब कुछ नष्‍ट नहीं हुआ है। अभी कुछ पुराने स्‍टूडियो हैं और कुछ पुराने प्रोडक्‍शन हाउस के जर्जर दफ्तर...हमें वहां बची विरासत को बचाने के प्रयास में लग जाना चाहिए। हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री में सक्रिय व्‍यक्तियों के बीच जागरूकता लाने की भी जरूरत है। वे सचेत रहेंगे तो किसी दुर्घटना और आपदा की स्थिति में भी बहुमूल्‍य सामग्रियों का संरक्षण किया जा सकेगा।
फिलहाल आरके स्‍टूडियो में लगी आग में नष्‍ट हुई साग्रियों का ब्‍योरा आए तो नुकसान की वास्‍तविकता पता चले। फिल्‍म इंडस्‍ट्री को लगे जागें और विरासत के प्रति लापरवाही खत्‍म करें।  

Saturday, September 16, 2017

फिल्‍म समीक्षा : लखनऊ सेंट्रल

फिल्‍म रिव्‍यू

लखनऊ सेंट्रल

-अजय ब्रह्मात्‍मज



इस फिल्‍म के निर्माता निखिल आडवाणी हैं। लेखक(असीमअरोड़ा के साथ) और निर्देशक रंजीत तिवारी हैं। कभी दोनों साथ बैठ कर यह शेयर करें कि इस फिल्‍म को लिखते और बनाते समय किस ने किस को कैसे प्रभावित किया तो वह ऐसे क्रिएटिव मेलजोल का पाठ हो सकता है। यह एक असंभव फिल्‍म रही होगी,जिसे निखिल और रंजीत ने मिल कर संभव किया है। फिल्‍म की बुनावट में कुछ ढीले तार हैं,लेकिन उनकी वजह से फिल्‍म पकड़ नहीं छोड़ती। मुंबई में हिंदी फिल्‍म बिरादरी के वरिष्‍ठों के साथ इसे देखते हुए महसूस हुआ कि वे उत्‍तर भारत की ऐसी सच्‍चाइयों से वाकिफ नहीं हैं। देश के दूसरे नावाकिफ दर्शकों की भी समान प्रतिक्रिया हो सकती है। कैसे कोई मान ले कि मुरादाबाद का उभरता महात्‍वाकांक्षी गायक भेजपुरी के मशहूर गायक मनोज तिवारी को अपनी पहली सीडी भेंट करने के लिए जान की बाजी तक लगा सकता है?

केशव गिरहोत्रा(हिंदी फिल्‍मों में नहली बार आया है यह उपनाम) मुराबाद के लायब्रेरियन का बेटा है। उसे गायकी का शौक है। उसका ख्‍वाब है कि उसका भी एक बैंड हो। तालियां बाते दर्शकों के बीच वह आए तो सभी उसका नाम पुकार रहे हों। उसके आदर्श हैं मनोज तिवारी। इसी मनोज तिवारी से मिलने की बेताबी में वह एक आईएएस अधिकारी की हत्‍या के संगीन अपराध में फंस जाता है। आईएएस अधिकारी के परिजन चाहते हैं कि उसे फांसी की सजा मिले। वे हाईकोर्ट में अपील करते हैं। केशव को मुरादाबाद से लखनऊ भेजा जाता है। मुरादाबाद से लखनऊ स्‍थानांतरण की प्रक्रिया में केशव की संयोगवश एनजीओ एक्टिविस्‍ट गायत्री कश्‍यप से मुलाकात हो जाती है। केशव को भान हो गया है कि गायत्री पर जिम्‍मेदारी है कि वह लखनऊ जेल के कैदियों को लेकर एक बैंड बनाए,जो इंटर जेल बैंड प्रतियोगिता में हिस्‍सा ले सके। केशव खुद को वालंटियर करता है और गायत्री से वादा करता है कि वह बैंड के लिए जरूरी बाकी तीन कैदी खोज लेगा। हम साथ-साथ जेल के अंदर कैदियों के बीच समूह और दादागिरी की लड़ाई भी देखते हैं। जेलर श्रीवास्‍तव के पूर्वाग्रह से परिचित होते हैं। अंदाजा लग जाता है कि श्रीवास्‍तव पूरी ताकत और साजिश से केशव के सपने को साकार नहीं होने देगा।

रंजीत तिवारी ने जेल के अंदर बैंड की टीम बनने का ड्रामा रोमांचक दृश्‍यों के साथ रचा है। कैदियों की नोंक-झोंक और उनकी आदतें हमें उनके अलग-अलग व्‍यक्त्त्वि की जानकारी दे देती हैं। निर्देशक की पसंद और कास्टिंग डायरेक्‍टर के सुझावों की दाद देनी होगी कि सहयोगी भूमिकाओं में सक्षम कलाकारों का चुनाव किया गया है। विक्‍टर चट्टोपाध्‍याय(दीपक डोबरियाल),पुरुषोत्‍तम मदन पंडित(राजेश शर्मा),परमिंदर सिंह गिल(जिप्‍पी ग्रेवाल) और दिक्‍क्‍त अंसारी(इनामुलहक) ने अपने किरदारों से बैंड और फिल्‍म को बहुरंगी बनाया है। सभी किरदारों की एक बैक स्‍टोरी है। गंभीर अपराधों की सजा भुगत रहे ये कैदी बीच में एक बार पैरोल मिलने पर परिवारों के बीच लौटने पर महसूस करते हैं कि वे अब उनके काबिल नहीं रह गए हैं। यहां से उन चारों का प्‍लान बदल जाता है। इन चारों के साथ रवि किशन,रोनित राय और वीरेन्‍द्र सक्‍सेना अपनी भूमिकाओं में जंचे हैं। फरहान अख्‍तर की अतिरिक्‍त तारीफ की जा सकती है। उन्‍होंने छोटे शहर के युवक को आत्‍मसात किया है।

फिल्‍म के क्‍लाइमेक्‍स के टिवस्‍ट को निर्देशक ने अच्‍छी तरह बचा कर रखा है,लेकिन वहां तक पहुंचने की बोझिल राह चुन ली है। फिल्‍म क्‍लाइमेक्‍स के पहले ढीली हो जाती है। हिंदी फिल्‍मों की यह सामान्‍य समस्‍या है। फिल्‍म अपनी अन्विति में बिखर जाती है और अंत दुरूह हो जाता है। यह दिक्‍कत लखनऊ सेंट्रल में भी है। फिर भी रंजीत तिवारी उत्‍तर भारत की एक खुरदुरी कहानी कीने में सफल रहे हैं। फिल्‍म में समाज में मौजूद राजनीति और अप्रत्‍यक्ष रूप से जातीय दुराग्रह की छाया भी है। चूंकि लेखक-निर्देशक का जोर कहीं और है,इसलिए वे वहां रके नहीं हैं और न गहरे संवादों से उन्‍हें रेखांकित किया है।

फिल्‍म का गीत-संगीत थोड़ा कमजोर है। इस संगीत प्रधान फिल्‍म में उत्‍तर भारतीय संगीत का सुर और स्‍वर रहता तो थीम और प्रभावशाली हो जाता। क्‍लाइमेक्‍स में पंजाबी धुन का गीत बेअसर रहता है। 

अवधि 135 मिनट

*** ½ साढ़े तीन स्‍टार 

फिल्‍म समीक्षा : सिमरन



फिल्‍म रिव्‍यू
अभिनेत्री की आत्‍मलिप्‍तता
सिमरन
-अजय ब्रह्मात्‍मज

हंसल मेहता निर्देशित सिमरन देखते समय शीर्षक भूमिका निभा रही कंगना रनोट की वर्तमान छवि स्‍वाभाविक रूप से ध्‍यान में आ जाती है। ज्‍यादातर पॉपुलर स्‍टार की फिल्‍मों में उनकी छवि का यह प्रभाव काम करता रहता है। कंगना रनोट अपने टीवी इंटरव्‍यू में निजी जिंदगी और सामाजिक मामलों पर अपना पक्ष स्‍पष्‍ट शब्‍दों में रख रही थीं। इन विवादास्‍पद इंटरव्‍यू से उनकी एक अलग इमेज बनी है। सिमरन के शीर्षक किरदार की भूमिका में उनकी छवि गड्डमड्ड हुई है। फिल्‍म के अनेक दृश्‍यों में ऐसा लगता है कि अभी तो कंगना को इंटरव्‍यू में यही सब बोलते सुना था।
बहरहाल,सिमरन प्रफुल्‍ल पटेल की कहानी है। प्रफ़ुल्‍ल पटेल अमेरिका के अटलांट शहर में अपने मां-बाप के साथ रहती है। उसका तलाक हो चुका है। विधवा विलाप के बजाए व‍ह जिंदगी को अपने अंदाज में जीना चाह रही है। मध्‍यवर्गीय गुजराती मां-बाप की एक ही ख्‍वाहिश है कि वह फिर सेशादी कर ले और सेटल हो जाए। रोज की खिच-खिच से परेशान प्रफुल्‍ल एक अलग घर लेना चाहती है। उसने कुछ पैसे जमा कर रखे हैं। संयोग ऐसा बनता है कि इसी बीव वह अपनी सहेली के साथ लास वेगास पहुंच जाती है। वहां के एक कैसिनो में पहली रात कुछ जीतने के बाद अगले दिन वह सब कुछ हार जाती है। फिर से बाजी आजमाने के लिए व‍ह कर्ज में मोटी रकम लेती है। मोटी रकम भी हारने के बाद उसकी जिंदगी मुश्किल मोड़ पर आ जाती है। इस फिल्‍म में संयोगों की भरमार है। इस बार वह रिटेल शॉप के गलले से कुछ नगद लेकर भागने में कामयाब हो जाती है। अनजाने में की गई चोरी ही उसकी आदत बन जाती है। व‍ह लिपस्टिक बैंडिट के नाम से कुख्‍यात हो जाती है। और फिर आगे की घटनाएं अविश्‍वसनीय तरीके से बढ़ती हैं।
सिमरन देखने से पता चलता है कि अमरिका के बैंकों की सिक्‍युरिटी इतनी लचर है कि महज एक हुडी पहन कर जेब में हाथ हिला कर ही कैशियर और बैंक कर्मचारियों को डराया जा सकता है। कहीं यह फिल्‍म देख कर भारत में कोई ऐसा दुस्‍साहस न करे। नाहक पकड़ा जाएगा। वहां की पुलिस भी हर बार कार से भाग रही प्रफुल्‍ल को नहीं पहचान और पकड़ पाते। अंत में वह घिरती भी है तो पीछा कर रही पुलिस की आंखों में धूल झोंक कर भाग जाती है। बाद में आत्‍मसमर्पण करते समय वह जो कारण बताती है,उससे हंसी आ सकती है,लेकिन वह भारतीय सोच की विडंबना भी है।
सिमरन विदेश में पली-बढ़ी और भारतीय दकियानूसी संस्‍कारों से निकलने की छटपटाहट में भटकी प्रफुल्‍ल पटेल की कहानी है। अपनी जड़ों से कटी ऐसी लड़कियों और लड़कों की की स्‍वतंत्रता की चाहत उन्‍हें भ्रष्‍ट और आसान रास्‍तों पर ले जाती है। प्रफुल्‍ल उन लाखों युवाओं की प्रतिनिधि चरित्र है। लेखक-निर्देशक ने एक इंडेपेंडेट लड़की के मिसएडवेंचर को बहुत अच्‍छी तरह चरित्र में उकेरा है। इस चरित्र को गढ़ने में स्‍वयं कंगना का भी योगदान है। इस चरित्र को निभाने में बतौर अभिनेत्री कंगना की आत्‍मलिप्‍तता उन्‍हें निर्देशक के नियंत्रण से बाहर कर देती है। यह फिल्‍म की सबसे बड़ी कमजोरी है। सहायक किरदार गौण भूमिकाओं में रह जाते हैं। मां-बाप और मंगेतर की भूमिका निभा रहे किरदार अपनी ईमानदारी के बावजूद बहुत कुछ जोड़ नहीं पाते। हमें उनसे सहानुभूति मात्र होती है। विदेशों की पृष्‍ठभूमि पर बनी सभी फिल्‍मों की आम समस्‍या है कि उनमें वहां का समाज अनुपस्थित रहता है। सिमरन उसी कड़ी में शामिल हो गई है,जबकि हंसल मेहता के निर्देशन से उम्‍मीद थी कि यह फिल्‍म प्रफुल्‍ल की दुविधाओं और विसंगतियों को उचित संदर्भ देगी। व्‍यक्ति चरित्रों के चित्रण में माहिर हंसल मेहता इस फिल्‍म में निराश करते हैं।
फिल्‍म में कंगना ही कंगना हैं। चरित्र की एकांगिता के बावजूद वह प्रभावित करती हैं। कुछ दृश्‍यों में असंयमित भाव प्रदर्शन से वह कंफ्यूज दिखती हैं। इस फिल्‍म में गुजराती संवादों का प्रचुर इस्‍तेमाल हुआ है। पश्चिम भारत के दर्शक तो गुजराती समझ लेंगे,लेकिन दूसरे इलाकों के दर्शकों को दिक्‍क्‍त होंगी। ध्‍येय तो समझ में आ जाता है,लेकिन शब्‍द पल्‍ले नहीं पड़ते।
अवधि 125 मिनट
*** तीन स्‍टार

Thursday, September 14, 2017

रोज़ाना - एक दूसरे के पूरक,फिर भी मायानगरी में 'पांच' हो गया 'पान्‍च'

रोजाना

पांच हो गया पान्‍च

- अजय ब्रह्मात्मज

हिंदी दिवस के अवसर पर हिंदी सिनेमा में हिंदी की बात करना उचित है। देश में कहीं न कहीं दस पर परिचर्चा या बहस चल रही होगी। हिंदी सिनेमा में हिंदी के उपयोग,प्रयोग और दुरुपयोग पर लोगों की राय भिन्न हो सकती है,लेकिन इस बात से कोई इंकार नहीं करेगा कि हिंदी सिनेमा के विकास में हिंदी की बड़ी भूमिका रही है। कभी इसे हिंदुस्‍तानी कहा गया,कभी उर्दू मिश्रित हिंदी तो कभी कुछ और। इसके साथ यह कहना भी अनुचित नहीं होगा कि हिंदी के प्रचार-प्रसार में हिंदी फिल्मों का उल्लेखनीय योगदान है। देश के अंदर और विदेशों में हिंदी फिल्मों के माध्यम से दर्शकों ने बोलचाल की व्‍यावहारिक हिंदी सीखी है। हालांकि कोई भी हिंदी फिल्म यह सोचकर नहीं नहीं बनाई गई कि उससे हिंदी भाषा का प्रचार किया जाएगा, फिर भी ऐसे अनेक उदाहरण मिल जाएंगे जहां अहिंदीभाषी दर्शकों ने हिंदी फिल्मों से अपनी हिंदी परिमार्जित की। विदेशी विश्वविद्यालयों में नई पीढ़ी के शिक्षक विद्यार्थियों को हिंदी सिखाने के लिए हिंदी फिल्मों का टूल के रूप में इस्तेमाल करते हैं। कहते हैं इससे विद्यार्थी तेजी से हिंदी सीखते हैं।

इधर हिंदी फिल्‍मों में हिदी का यह सहज रूप भ्रष्‍ट हो रहा है। संवाद के तौर पर बोली जा रही हिंदी मुख्‍य रूप से रोमन में लिखी जा रही है। इससे नई पीढ़ी के अंग्रेजीदां निर्देशकों और कलाकारों को सुविधा तो हो जाती है,लेकिन हिंदी बोलने के लहजे और उच्‍चारण में खोट बढ़ता जा रहा है। पिछले दिनों मशहूर लेखक अतुल तिवारी ने मजेदार किस्‍सा सुनाया। स्‍टार टीवी के अधिकारियों ने उन्‍हें कहा कि आप रोमन में ही हिंदी लिख कर दें। उन्‍होंने पूछा कि मैं स्‍टार का स्‍त्‍र बढ़ गया है कैसे लिखूं। स्‍टार और स्‍तर दोनों को रोमन में लिखने के लिए एसटीएआर लिखना पड़ेगा। नए कलाकार जब आनुनासिक शब्‍दों का उच्‍चारण करते हैं तो वे बिंदी के लिए रोमन में प्रयुक्‍त एन का अलग से उच्‍चारण करते हैं। वे पांच को पान्‍च और आंखें को आन्‍खेंन् बोलते सुनाई पड़ते हैं। ,,,, और से बने शब्‍दों के उच्‍चारण में उन्‍हें दिक्‍कत होती है। बचपन से या बाद में भी हिंदी का नियमित अभ्‍यास नहीं होने की वजह से उन्‍हें अपना गलत उच्‍चारण भी गलत नहीं लगता। चूंकि निर्देशक खुद हिंदी में दक्ष नहीं होता,इसलिए वह आपत्ति भी नहीं करता। कहा और दावा किया जाता है कि डॉयलॉग इंस्‍ट्रक्‍टर भाषा सिखाने के लिए रहते हैं,लेकिन उनका योगदान सिर्फ पर्दे पर नाम के रूप में लक्षित होता है। वास्‍तव में भाषा वैसी ही भ्रष्‍ट रहती है।  

आजकल हिंदी फिल्‍मों के नाम तक हिंदी में नहीं लिखे जा रहे हैं। पर्दे पर सिर्फ अंग्रेजी में फिल्‍म का नाम आता है। पोस्‍टर और फर्स्‍ट लुक में हिंदी फिल्‍मों के नाम बेशर्मी के साथ अंग्रेजी में छापे जाते हैं। दर्शक भी मांग नहीं करते कि उन्‍हें हिंदी में पोस्‍टर मिलें। ताजा फैशन अंग्रेजी-हिंदी मिक्‍स टाइटल हैं,जैसे मुक्‍काBaaz


Wednesday, September 13, 2017

रोजाना : विश्वास जगाती लड़कियां

रोजाना
 विश्वास जगाती लड़कियां
- अजय ब्रह्मात्मज 
आठवें जागरण फिल्म फेस्टिवल के तहत पिछले दिनों रांची और जमशेदपुर में अविनाश दास की फिल्म अनारकली ऑफ आरा दिखाई गई। रांची और जमशेदपुर दोनों ही जगह के शो में भीड़ उमड़ी। हॉल की क्षमता से अधिक दर्शकों के आने से ऐसी स्थिति बन गई कि कुछ दर्शकों को को अंदर नहीं आने दिया गया। रांची और जमशेदपुर के शो हाउसफुल रहे। दोनों शहरों में शो के बाद फिल्म के निर्देशक अविनाश दास और हीरामन की भूमिका निभा रहे इश्‍तेयाक खान से दर्शकों ने सीधी बातचीत की। उन्‍होंने अपनी जिज्ञासाएं रखीं। कुछ सवाल भी किए। अच्‍छी बात रही कि दोनों शहरों में लड़कियों ने सवाल-जवाब के सत्र में आगे बढ़ कर हिस्‍सेदारी की।
अनारकली ऑफ आरा के निर्देशक अविनाश दास के लिए दोनों शहरों के शोखास मायने रख्‍ते थे। मीडिया के उनके दोस्‍त तो वाकिफ हैं। अविनाश दास ने रांची शहर से अपने करिअर की शुरूआत की थी। उन्‍होंने प्रभात खबर में तत्‍कालीन संपादक हरिवंश के मार्गदर्शन में पत्रकारिता और दुनियावी चेतना का ककहरा सीखा। इसी शहर में उनकी पढ़ाई-लिखाई भी हुई। उत्‍तर भारत खास कर बिहार में सातवें-आठवें दशक तक यह चलन था कि अपनी संतान ढंग से पढ़-लिख नहीं रही हो तो उसे किसी कड़क और सख्‍त किस्‍म के रिश्‍तेदार के पास पढ़ने के लिए भेज दिया जाता था। रिश्‍तेदारों पर इतना यकीन रहता था कि वे अपने अभिभावकत्‍व में बच्‍चे का भविष्‍य संवार देंगे। अविनाश्‍दास को दरभंगा से उनके माता-पिता ने उन्‍हें रांची में मामा के पास भेज दिया था। अविनाश के लिए वह भावुक शो था,क्‍योंकि उनकी बहनें और मामी उस शो में मौजूद थीं। भावनाओं का उद्रेकदूसरी तरफ भी दिख रहा था। अविनाश के स्‍कूल और पत्रकारिता के समय के दोस्‍त भी आए थे।
किसी भी उत्‍तर भारतीय के लिए यह गर्व का विषय हो सकता है। एक फील्‍ड में करिअर के उत्‍कर्ष पर पहुंच कर वह फिल्‍म निर्देशन का सपना पाले और उसे निश्चित समय में पूरा भी कर ले। अनिाश दास को अपनी यात्रा के बारे में खुद लिखना चाहिए। वे लिख सकते हैं। बहरहाल,हम बाते कर रहे थे लड़कियों के सवालों और प्रतिक्रियाओं की। उन सभी को अनारकली की लड़ाई और जीत में अपनी जीत दिख रही थी। वे खुश थीं कि अनारकली ने वीसी चौहान को ललकारा और किसी हिरणी की तरह कुलांचे भरती हुई चलीं। कई लड़कियों केसवाल थे कि परिवार और प्रशासन से समर्थन न मिले तो वे क्‍या करें ? कैसे अपनी प्रतिष्‍ठा बनाए रखें?
रांची और जमशेदपुर जैसे शहरों की लड़कियां अपने सवालों से यह विश्‍वास जगाने में सफल रहीं कि वे बदल चुकी हैं। वे बेहतरीन और हीरोइन ओरिएंटेड सिनेमा के लिए लालायित हैं।


Saturday, September 9, 2017

फिल्‍म समीक्षा : समीर



फिल्‍म समीक्षा
समीर
-अजय ब्रह्मात्‍मज
दक्षिण छारा ने आतंकवाद और अहमदाबाद की पृष्‍ठभूमि पर समीर का लेखन और निर्देशन किया है। यह फिल्‍म एक प्रासंगिक विषय को अलग नजरिए से उठाती है। सत्‍ता,राजनीति और आतंकवाद के तार कहां मिले होत हैं? आम नागरिक इनसे अनजान रहता है। वह अपनी गली और मोहल्‍लों में चल रही हवा से तय करता है कि बाहर का तापमान क्‍या हो सकता है? उसे नहीं मालूम रहता कि यह हवा और तापमान भी कोई या कुछ लोग नियंत्रित करते हैं। हम कभी उन्‍हें पुलिस तो कभी राजनेता और कभी भटके नौजवानों के रूप में देखते हैं।
दक्षिण छारा ने पुलिस,प्रशासन,नेता और आतंकवाद की इसी मिलीभगत को नए पहलुओं से उकेरने की कोशिश की है। हमें निर्दोष दिख रहे किरदार साजिश में शामिल दिखते हैं। हक के लिए लिख रही रिपोर्टर अचानक सौदा कर लेती है। ईमानदारी से अपनी ड्यूटी निभा रहा पुलिस अधिकारी खुद को मोहरे के रूप में देखता है। बिल्‍कुल आज के समाज की तरह फिल्‍म में सब कुड गड्डमड्ड है। फिल्‍म संकेत देती है कि सत्‍ताधारी राजनीतिक पार्टी अपना वर्चस्‍व और गद्दी बचाए रखने के लिए प्रशासन और पुलिस के साथ मिलकर कोई भी चाल चल सकती है।
मोहम्‍मद जीशान अयूब शीर्ष भूमिका में हैं। उनके साथ सुब्रत दत्‍ता,सीमा विश्‍वास,अंजलि पाटिल और चिन्‍मय मांडलेकर महत्‍वपूर्ण भूमिकाओं में हैं। सभी कुशल और दक्ष कलाकार हैं,इसलिए फिल्‍म में दमदार अभिनय दिखता है। खास कर मोहम्‍मद जीशान अयूब और सुब्रत दत्‍ता अपनी अदाकारी से बांधे रहते हैं। फिल्‍म की दिक्‍कत स्क्रिप्‍ट और निष्‍कर्ष की है। वहां स्‍पष्‍टता का अभाव है। अप्रोच की ईमानदारी के बावजूद फिल्‍म बेअसर रहती है।
अवधि- 129 मिनट
**1/2 ढाई स्‍टार

Friday, September 8, 2017

दरअसल : चाहिए नई कहानियां



दरअसल..
चाहिए नई कहानियां
-अजय ब्रह्मात्‍मज
हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री में नई कहानियों की कमी है। गौर करें तो पायेंगे कि जब भी किसी नए विषय पर ठीक-ठाक फिल्‍म आती है तो दर्शक उसे पसंद करते हैं। वे ऐसी फिल्‍मों को समर्थन देते हैं। हम ने धारणा बना ली है कि दर्शक तो एक ही प्रकार की फिल्‍में पसंद करते हैं। उन्‍हें केवल मसाला फिल्‍में चाहिए। यह प्रयोग से बचने का आसान तरीका है। इसकी आड़ में निर्माता-निर्देशक अपनी मीडियोक्रिटी छिपाते हैं। देखते ही देखते कल के अनेक मशहूर निर्देशक अप्रासंगिक हो गए है। उन्‍होंने खुद को नही बदला। कुछ नया करना चाहा तो भी अपनी सहज शैली से बाहर नहीं निकल सके। उनके लिए सबसे मुश्किल है कि नए विषय के महत्‍व और प्रभाव को समझ पाना। उन्‍हें लगता रहता है कि अगर दृश्‍य संरचना और चरित्र चित्रण में अपनी शैली छोड़ दी तो हस्‍ताक्षर मिट जाएगा।
फिल्‍म इंडस्‍ट्री के स्‍थापित और मशहूर लेखक भी एक-दो फिल्‍मों के बाद अपने लेखन के फार्मूले में फंस जाते हैं। उनसे यही उम्‍मीद की जाती है कि वे पिछली सफलता दोहराते रहें। अगर उनके बीच से कोई नया प्रयोग करना चाहे या नई कथाभूमि की तलाश करे तो उसे हताश किया जाता है। इस प्रवृति के शिकार वैसे लेखक भी होते हैं,जो अपनी पहली फिल्‍म लिख रहे हों। वे प्रचलन और फैशन को फॉलो करते हैं। उन्‍हें लगता है कि वे नकल से ही अपनी जगह बना सकेगे। क्रिएटिव फील्‍ड में मशहूर और लोकप्रिय प्रतिभाओं की नकल नई बात नहीं है। कला के सभी क्षेत्रों में यह आम चलन है। सीखने का यही मूल है कि हम नकल करें। इसकी शुरूआत तो अक्षर ज्ञान और लेखन से ही हो जाती है।अक्षर ज्ञान के बाद निरंतर अभ्‍यास से हम लिखावट हासिल करते हैं। वही हमारी भिन्‍नता है। अभी स्‍माट फोन और कीबोर्ड के चलन ने लिखावट की भिन्‍न्‍ता का एहसास खत्‍म कर दिया है। हम लिखने के बजाए टाइप करने लगे हैं। यकीन करें इससे लेखन प्रभावित हुआ है। कल्‍पना और विचारों की सरणि टाइपिंग की नहर में नहीं समा पाती।
अभी नई कहानियां की डिमांड सबसे ज्‍यादा है। हिंदी फिल्‍मों के स्‍थापित घराने और कारपोरेट हाउस लेखन की इस जरूरत को खूब समझ रहे हैं। वे अने तई काशिश भी करते हैं। आए दिन विभिन्‍न शहरों में स्क्रिप्‍ट राइटिंग के वर्कशॉप चल रहे हैं। मुंबई के अनेक फिल्‍म लेखक इस शैक और शगल में शामिल हैं। वे स्क्रिप्‍ट लेखन की तकनीक बांट और सीखा रहे हैं। और इन दिनों तो फिल्‍म लेखन सीखने के लिए ऑन लाइन सुविधाएं आ गई हैं। ऐसे अनेक फिल्‍म साइट हैं,जहां से आप बेहतरीन फिल्‍मों की स्क्रिप्‍ट पढ़ सकते हैं। उन्‍हें डाउनलोड कर सकते हैं। अफसोस यही है कि यह सब कुछ अंग्रेजी में है। भाष एक बड़ी दिक्‍कत है। हिंदी फिल्‍मों में अंगेजी की अनिवार्यता ने भी नई प्रतिभाओं को फिल्‍मों में आने से रोका है। सरकार के समर्थन से चल रही संस्‍थाओं और कारपोरेट हाउस में अंग्रेजी में ही स्क्रिप्‍ट ली जाती है। इस बड़ी बाधा को दूर किए बिना हिंदी फिल्‍मों के लिए नई स्क्रिप्‍ट की मांग बेमानी हो जाती है। बड़ी संस्‍‍थाओं को अपने यहां ऐसे जानकारों की नियुक्ति करनी होगी,जो भारतीय भाषाओं को समझते हो।
इसके साथ नए लेखकों को भी अपनी जिद छोड़नी होगी। वे अंग्रेजी सीखने और उसकी कामचलाऊ जानकारी रखने से भी परहेज करते हैं। लिखने के लिए नहीं,लेकिन फिल्‍म इंडस्‍ट्री के व्‍यक्तियों से संपर्क और व्‍यवहार के लिए तो अंग्रेजी सीख लेनी चाहिए। जैसे हम दूसरे देशों और क्षेत्रों में जाने पर वहां की स्‍थानीय भाषा और शब्‍दावली सीखते हैं,वैसे ही फिल्‍मों की दुनिया में आने और काम पाने के लिए अंग्रेजी सीखनी होगी। ऐसा है तो है। इस अड़चन को ख्‍त्‍म करते ही आप पाएंगे कि आप की नई कहानियों के गा्रहक दोड़े चले आ रहे हैं।

फिल्‍म समीक्षा : पोस्‍टर ब्‍वॉयज



फिल्‍म रिव्‍यू
पोस्‍टर ब्‍वॉयज
-अजय ब्रह्मात्‍मज
देओल बंधु में सनी देओल की फिल्‍में लगातार आ रही हैं। बॉबी देओल लंबे विश्राम के बाद लौटे हैं। श्रेयस तलपड़े स्‍वयं भी इस फिल्‍म के एक किरदार में हैं। स्‍वयंभी इसलिए कि वे ही फिल्‍म के लेखक और निर्देशक हैं। उन्‍होंने लेखन में बंटी राठौड़ और परितोष पेंटर की मदद ली है। 2014 में इसी नाम से इसी भीम पर एक फिल्‍म मराठी में आई थी। थोड़ी फेरबदल और नऐ लतीफों के साथ अब यह हिंदी में आई है।
कहते हैं यह फिल्‍म एक सच्‍ची घटना पर आधारित है। परिवार नियोजन के अंतर्गत नसबंदी अभियान में एक बार पोस्‍टर पर तीन ऐसे व्‍यक्तियों की तस्‍वीरें छप गई थीं,जिन्‍होंने वास्‍तव में नसबंदी नहीं करवाई थी। उस सरकारी भूल से उन व्‍यक्तियों की बदनामी के साथ मुसीबतें बढ़ गई थीं। इस फिल्‍म में जगावर चौधरी(सनी देओल),विनय शर्मा(बॉबी देओल) और अर्जुन सिंह(श्रेयस तलपड़े) एक ही गांव में रहते हैं। गांव के मेले में वे अपनी तस्‍वीरें खिंचवाते हैं। उन्‍हें नहीं मालूम कि उन तस्‍वीरों को परिवार नियोजन विभाग के अधिकारी नसबंदी अभियान के एक पोस्‍टर में इस्‍तेमाल कर लेते हैं। इस पोस्‍अर के छपते ही तीनों के निजी जीवन और परिवारों में भारी हलचल हो जाती है। इसी हलचल को संभालने की कहानी है यह फिल्‍म।
श्रेयस तलपड़े ने फिल्‍म को कॉमिकल ढांचे में रखा है। देओल बंधु अपनी छवियों से निकल कर साधारण किरदारों को निभाते हैं। श्रेयस ने उन्‍हें सहज रखा है। सनी देओल की फिल्‍मों और मशहूर संवादों के रेफरेंस आते हैं। एक संवाद में उन्‍हें धर्मेन्‍द्र का बेटा भी बताया जाता है। तात्‍कालिक लाभ और मजाक के लिए लेखक-निर्देशक फिल्‍मों के लोकप्रिय रेफरेंस इस्‍तेमाल करते हैं। ऐसी फिल्‍में एक समय के बाद मजेदार नहीं लगतीं,क्‍योंकि नए दर्शक उन फिल्‍मों और संवादों से वाकिफ नहीं होते। यों आजकल फिल्‍म के दूरगामी र्शकों से अधिक सप्‍ताहांत के तीन दिनों की चिंता रहती है। उन्‍हें भी कहां परवाह,चिंता और उम्‍मीद रहती है कि उनकी फिल्‍म क्‍लासिक हो सकती है।
पोस्‍टर ब्‍वॉयज में देओल बंधुओं ने हंसोड़ किरदार को निभाने का पूरा यत्‍न किया है। वे इस यत्‍न में सफल भी होते हैं। बस,उन्‍हें दृश्‍यों और प्रसंगों से पूरा साथ नहीं मिलता। श्रेयस तलपड़े की इमेज पहले से हंसोड़ कलाकार की है। तीनों मिल कर एक छोटी सी घटना को फिलम की समयावधि में खींचते हैं। यही कारण है कि कुछ दृश्‍य ऊबाऊ और नीरस हो गए हैं। लतीफों को संवादों में बदलने की कोशिश कई बार कारगर नहीं रहती। फिल्‍म के महिला चरित्रों के लिए फिल्‍म में कुछ खास नहीं है। बॉबी देओल की बीवी की भूमिका निभा रही अभिनेत्री को अभिनय बाकी कलाकारों के सुर से अलग और बेमेल है। लंबे समय के बाद रवि झांकल देसी अंदाज में मौजूद हैं।
फिल्‍म में संवादों की प्रचुरता है। हर किरदार हमेशा कुछ न कुछ बता ही रहा होता है। मुमकिन है थिएटर के मशहूर लेखकों के सहयोग से गैरइरादतन यह हो गया हो। दृश्‍य संरचना में भी रंगमंचीय असर जाहिर है। फिल्‍म में गांव का नाम जंगेठी बताया गया है। राजस्‍थानी और हरियाणवी प्रभाव की मित्रित भाषा बोलते किरदार अपनी रुचि और आदत के मुताबिक लहजा बदलते रहते हैं।
अवधि- 128 मिनट
*** तीन स्‍टार

फिल्‍म समीक्षा : डैडी



फिल्‍म रिव्‍यू
अरुण गवली की जीवनी
डैडी
-अजय ब्रह्मात्‍मज

विवादों और उनकी वजह से प्रदर्शन के डर से हिंदी में समकालीन घटनाओं और व्‍यक्तियों पर फिल्‍में नहीं बनतीं। इस लिहाज से असीम आहलूवालिया की डैडी साहसिक प्रयास है। असीम ने आजीवन कारावास की सजा भुगत रहे अरुण गवली के जीवन पर यह फिल्‍म बनाई है। इसे बॉयोपिक विधा की श्रेणी में रखा जा सकता है।
मिल मजदूर के बेटे अरुण गवली का जीवन मुंबई के निम्‍न तबके के नौजवानों की प्रतिनिधि कहानी कही जा सकती है। मिलों के बंद होने के बाद ये बेरोजगार नौजवान अपराध की दुनिया में आए। उनमें से हर कोई अरुण गवली की तरह कुख्‍यात अपराधी और बाद में सामाजिक कार्यकर्ता व राजनीतिज्ञ नहीं बना,लेकिन कमोबेश सभी की जिंदगी ऐसे ही तबाह रही। असीम आहलूवालिया और अर्जुन रामपाल ने मौजूद तथ्‍यों और साक्ष्‍यों के आधार पर अरुण गवली की जीवनी लिखी है। फिल्‍म अरुण गवली को ग्‍लैमराइज नहीं करती। अपराध की दुनिया में विचरने के बावजूए यह हिंदी की अंडरवर्ल्‍ड फिल्‍मों से अलग है। डैडी के रूप में अरुण गवली हैं। बाकी वास्‍तविक किरदारों के नाम बदल दिए गए हैं। फिर भी मुंबई के अंडरवर्ल्‍ड से वाकिफ दर्शक उन्‍हें पहचान सकते हैं। यह फिल्‍म एक प्रकार से मुंबई के अंडरवर्ल्‍ड की दास्‍तान भी है,जिसके केंद्र में अरुण गवली हैं।
असीम आहलूवालिया ने क्‍लोज फ्रेम में सभी किरदारों और उनकी गतिविधियों को रखा है। फिल्‍म की थीम के अनुसार गहरी और मद्धिम रोशनी रखी गई है। शूटिंग की शैली रियलिस्टिक और सामान्‍य जीवन के करीब है। फिल्‍म विवरणात्‍मक है। घटनाओं के उल्‍लेख और फोकस से कई बार यह डाक्‍यूमेंट्री के करीब पहुंच जाती है। क्‍या इसे डाक्‍यूमेंट्री फार्मेट में रखा जाता तो फिल्‍म का प्रभाव कम होता? किरदार इतने घीमे स्‍वर में तेजी से मराठी मिश्रित संवाद बोलते हें। मुंबई के बाहर के आम दर्शकों को उनकी बातें समझने में दिक्‍कत हो सकती है। मुंबई के दगड़ी चाल को क्रिएट करने में तकनीकी टीम सफल रही है। क्‍लोज फ्रेम का फार्मेट फिल्‍म के लिए कारगर साबित हुआ है। अधिकांश किरदारों को अपरिचित अभिनेताओं ने निभाया है,इसलिए वास्‍तविकता और बढ़ गई है।
अर्जुन रामपाल ने अरुण गवली के रूप में ढलने की जीतोड़ सफल कोशिश की है। उन्‍होंने उनके लुक के साथ चाल-ढाल भी अपनायी है। जवान और फिर प्रौढ़ होने पर वे अनुकूल बॉडी लैंग्‍वेज अपनाते हैं। निशिकांत कामथ पुलिस अधिकारी विजयकर की उल्‍लेखनीय भूमिका में जंचे हैं। डैडी की बीवी की भूमिका में ऐश्‍वर्या राजेश ने बराबर साथ निभाया है। अन्‍य कलाकारों का चयन उपयुक्‍त है। वे सभी अपने किरदारों में दिखते हैं।
अरुण गवली की इस जीवनी में दो-तीन चीजें उल्‍लेखनीय हैं। अंडरवर्ल्‍ड के वर्चस्‍व की लड़ाई के दिनों में कभी अरूण गवली को हिंदू डॉन के रूप में प्रचारित किया गया था। उन्‍हें मुस्लिम डॉन दाऊद इब्राहिम के मुकाबले में खड़ा किया गया था। यह राज्‍य व्‍यवस्‍था की हार थी। दूसरे इस फिल्‍म में डैडी एक ऊंची बिल्डिंग से नीचे झांकते हुए बताता है कि हम ने चॉल हटवाए। वहां ये ऊंची बिल्डिंगें आई और उनमें अब नेता और बिजनेसमैन रहते हैं। मुंबई शहर के विकास और स्‍वरूप पर संकेत करते डैडी के इस कथन का मर्म सारगर्भित है। विधान सभा में चुनाव जीत कर आने के बाद भी अन्‍य विधायकों के रवैए से दुखी डैडी कहता है कि जनता ने तो मुझे माफ कर दिया,लेकिन आप सभी मुझे गैंगस्‍टर ही मानते हैं। मैं बदल गया,लेकिन तुम लोग बदलने नहीं देते, डैडी के इस संवाद की गहराई में जाएं तो डैछी का मानवीय दर्द का एहसास होता है।
अवधि-135 मिनट
*** तीन स्‍टार