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Wednesday, December 10, 2014

दोनों हाथों में लड्डू : सुशांत सिंह राजपूत


-अजय ब्रह्मात्मज
सुशांत सिंह राजपूत की ‘पीके’ इस महीने रिलीज होगी। ‘पीके’ में उनकी छोटी भूमिका है। दिबाकर बनर्जी की ‘ब्योमकेश बख्शी’ में हम उन्हें शीर्षक भूमिका में देखेंगे। झंकार के लिए हुई इस बातचीत में सुशांत सिंह राजपूत ने अपने अनुभवों, धारणाओं और परिवर्तनों की बातें की हैं।
    फिल्मों में अक्सर किरदारों के चित्रण में कार्य-कारण संबंध दिखाया जाता है। लेखक और निर्देशक यह बताने की कोशिश करते हैं कि ऐसा हुआ, इसलिए वैसा हुआ। मुझे लगता है जिंदगी उससे अलग होती है। यहां सीधी वजह खोज पाना मुश्किल है। अभी मैं जैसी जिंदगी जी रहा हूं और जिन द्वंद्वों से गुजर रहा हूं, उनका मेरे बचपन की परवरिश से सीधा संबंध नहीं है। रियल इमोशन अलग होते हैं। पर्दे पर हम उन्हें बहुत ही नाटकीय बना देते हैं। पिछली दो फिल्मों के निर्देशकों की संगत से मेरी सोच में गुणात्मक बदलाव आ गया है। पहले राजकुमार हिरानी और फिर दिबाकर बनर्जी के निर्देशन में समझ में आया कि पिछले आठ सालों से जो मैं कर रहा था, वह एक्टिंग नहीं कुछ और थी। मैं आप को प्वॉइंट देकर नहीं बता सकता कि मैंने क्या सीखा, लेकिन बतौर अभिनेता मेरा विकास हुआ। अगली फिल्मों में अपने किरदारों को निभाते समय रिसर्च के अलावा और बहुत सारी चीजें ध्यान में रखूंगा। किसी भी दृश्य में एक इमोशन के चार-पांच डायमेंशन आते हैं। हम उनमें से एक चुनते हैं। कई बार तो कर देने के बाद उसकी वजह खोजते हैं और खुद को सही ठहराते हैं।
    दिबाकर के साथ काम करते समय हमलोग रियल इमोशन पर खेल रहे थे। एक दृश्य बताता हूं, मैं अपनी तहकीकात कर रहा हूं। एक व्यक्ति से कुछ सवाल पूछ रहा हूं। वह व्यक्ति जवाब देते-देते मेरे सामने मर जाता है। मेरे अपने रिसर्च से उस दृश्य में मुझे गुस्सा, निराशा और कोफ्त जाहिर करनी थी। दो टेक में वह सीन हो गया। अभी मेरे पास बीस मिनट बाकी थे। दिबाकर ने आकर बताया कि इस दृश्य में एक अलग इमोशन ले आओ। तुमने अभी तक किसी को अपने सामने मरते हुए नहीं देखा है। पहली बार कोई बात करते-करते मर गया। तुम्हारी रिएक्शन में उसकी मौत के प्रति  विस्मय और आकर्षण भी होना चाहिए। इस इमोशन के साथ सीन को शूट करने पर सीन का इम्पैक्ट ही बदल जाएगा। ‘ब्योमकेश बख्शी’ से ऐसे अनेक उदाहरण दे सकता हूं।
    ‘ब्योमकेश बख्शी’ शूट करते समय मैंने एक बार भी मॉनिटर नहीं देखा। पोस्ट प्रोडक्शन और डबिंग के दौरान मैंने अपना परफॉरमेंस देखा। मैंने पाया कि मैं बिल्कुल अलग एक्टर के तौर पर सभी के सामने आया हूं। लोग तारीफ करेंगे तो थैंक्यू कहूंगा। नापसंद करेंगे तो माफी मांग लूंगा। सच यही है कि कुछ अलग काम हो गया है। दिबाकर बनर्जी की फिल्मों में प्रचलित हिंदी फिल्मों के प्रचलित ग्रामर का अनुकरण नहीं होता। ग्रामर का पालन न करने से एक ही डर लग रहा है कि कहीं कुछ ज्यादा रियल तो नहीं हो गया। बाकी फिल्म की गति इतनी तेज है। दो घंटे दस मिनट में पूरा ड्रामा खुलता है। आप यकीन करें फिल्म देखते समय पलकें भी नहीं झपकेंगी।
    हिंदी फिल्मों में पांचवें दशक के कोलकाता को दिखाना एक बहुत बड़ी चुनौती थी। तीन महीनों की तैयारी में किरदार मेरी आदत बन चुका था। यह तो तय था कि कुछ गलत नहीं होगा। मुझे और दिबाकर को यह देखना था कि हम कितने सही हैं। दिबाकर की सबसे अच्छी बात है कि वे किसी भी टेक को एनजी यानी नॉट गुड नहीं कहते। हर शॉट को अच्छा कहने के बाद वे एक और शॉट जरूर लेते हैं। इस फिल्म के दौरान हम दोनों ‘ब्योमकेश बख्शी’ के किरदार को एक्सप्लोर करते रहे। इस फिल्म के पहले मैंने ऐसी ईमानदारी के साथ एक्टिंग नहीं की। शूटिंग के दूसरे दिन ही चालीस सेकेंड के एक लंबे सीक्वेंस में दिबाकर ने मुझे 1936 का एक वीडियो दिखाया और समझाया कि रियल लाइफ और रील लाइफ में क्या फर्क हो जाता है? मुझे उस सीक्वेंस में एक केस सुलझाने के लिए पैदल, रिक्शा, बस, ट्राम से जाना था। अपने परफॉरमेंस में मैं दिखा रहा था कि आज मैं बहुत परेशान हूं। मुझे जल्दी से जल्दी केस सुलझाना है। दिबाकर के उस वीडियो को देखने के बाद मेरी समझ में आया कि रियल लाइफ में ऐसी परेशानी चेहरे और बॉडी लैंग्वेज में नहीं होती। हम ऐक्टर छोटे दृश्य में भी परफॉर्म करने से बाज नहीं आते। मेरे लिए यह बहुत बड़ी सीख थी। पर्दे पर हम ज्यादातर फेक होते हैं। या एक्टिंग के अपने टूल से दर्शकों को अपनी फीलिंग्स का एहसास दिलाते हैं। दिबाकर कहते थे, फिलहाल अपने टूल्स रख दो। मैंने इस  दृश्य को तीस मिनट दिया है। 29 मिनट तक अगर मेरे हिसाब से नहीं हुआ तो 30 वें मिनट में अपने टूल्स का इस्तेमाल कर लेना। शुरू में तो मैं डर गया कि बगैर टूल्स के मैं एक्टिंग कैसे करूंगा, लेकिन धीरे-धीरे मजा आने लगा?
    ‘पीके’ बहुप्रतीक्षित फिल्म है। आमिर खान और राजकुमार हिरानी जैसे दिग्गज के संग काम करना बड़े गर्व की बात है। उसमें मेरा कैमियो रोल है, मगर वह बड़ा प्रभावी है। उसमें मेरा चयन फिल्म के कास्टिंग डायरेक्टर मुकेश छाबड़ा के जरिए हुआ। हिरानी सर को दरअसल उस भूमिका के लिए फ्रेश चेहरा चाहिए था। उस वक्त तक मेरी ‘काय पो छे’ नहीं आई थी। मेरा ऑडिशन हुआ। वह सब को बेहद पसंद पड़ा। बाद में ‘पीके’ की शूट में देर होती गई, तब तलक ‘काय पो छे’ और ‘शुद्ध देसी रोमांस’ आ गई। मैं थोड़ा-बहुत पॉपुलर भी हो गया। हिरानी सर ने एक दिन मुझे बुला मजाक में कहा, यार हमारी तो दोनों हाथों में लड्डू आ गए। एक तो तुम्हारा चेहरा फ्रेश है। ज्यादा लोग तुम्हें जानते-पहचानते नहीं थे। अब मगर तुम स्टार भी हो गए।


2 comments:

harekrishna ji said...

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