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Thursday, August 17, 2017

रोज़ाना : हमदर्द शाह रूख खान



रोज़ाना
हमदर्द शाह रूख खान
-अजय ब्रह्मात्‍मज
कल सायरा बानो ने दिलीप कुमार के ट्वीटर हैंडल पर कुछ तस्‍वीरें शेयर कीं। उनमें शाह रूख खान कृशकाय हो चुके महान अभिनेता को सोफे पर आराम से बिठाने की कोशिश कर रहे हैं। ये तस्‍वीरें आंखें नम कर गईं। पहले तो लगा कि सायरा जी को इन अंतरंग क्षणों की तस्‍वीरें नहीं शेयर करनी चाहिए थी। फिर मर्माहत मन ने कहा कि ऐसी तस्‍वीरें धर-परिवार और देश-समाज के बुजुर्गों के प्रति हमारी हमदर्दी की मिसाल बन सकती हैं। फिल्‍मों के फालोअर और शाह रूख खान के प्रशंसक गाहे-बगाहे अपने जीवन में इसे अपना सकते हैं। दिलीप कुमार के प्रति शाह रूख खान के आदर और प्‍यार से फिल्‍म इंडस्‍ट्री वाकिफ है। सायरा जी कई मौकों पर कह चुके हैं कि दिलीप साहेब उन्‍हें अपनी औलाद की तरह मानते हैं। यह किसी भी बीमार पिता और तीमारदार बेटे की तस्‍वीर हो सकती है।
शाह रूख खान के बारे में अनेक गलतफहमियां हैं। अपनी बेरुखी और साफगोई से वे ऐसी इमेज बना चुके हैं कि उन्‍हें किसी की भी नहीं पड़ी है। वे केल खुद और खुद की परवाह करते हैं। हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री के गलाकाट माहौल में ऐसे मिजाज के सुबूत और उाहरण भी मिल जाते हैं। शाह रूख को करीब से जानने वाले बताते हैं कि वे सभी परिचितों,दोस्‍तों और रिश्‍तेदारों का पूरा खयाल रखते हैं। मशहूर व्‍यक्ति जब खयाल करता है तो उसमें पैसे भी खर्च होते हैं। शाह रूख खान इस मामले में दिलदार माने जाते हैं। उन्‍होंने पिछले दिनों एक सीनियर जर्नलिस्‍ट के इलाज का पूरा खर्च उठाया और उसकी कहीं चर्चा नहीं की।
मुमकिन है कुछ लोगों ने आमिर खान के पानी फाउंडेशन के कार्यक्रम में उन्‍हें बोलते सुना हो। पुणे के इस कार्यक्रम में अ‍ामिर खान का जाना था। अचानक स्‍वाइन फ्लू की चपेट में आने से वे नहीं जा सके थे। उन्‍होंने शाह रूख खान से कार्यक्रम संभालने का दोसतना आग्रह किया। खुद खेटिल होने के बावजूद शाह रूख खान ने प्रोग्राम में हिस्‍सा लिया। निमंत्रित श्रोताओं को आमिर खान की कमी नहीं महसूस होने दी। पुरानी कहावत है कि जो वक्‍त्‍-जरूरत पर काम आए,वही दोस्‍त है। शाह रूख खान ने दोस्‍ती की मिसाल पेश की है। आम धारणा है कि खानत्रयी के तीनों खान एक-दूसरे को नापसंद करते हैं। सच्‍चाई यह है कि वे एक-दूसरे की मदद के लिए हमेशा तैयार रहते हैं।
हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री में मतलबी रिश्‍तों की अनेक दास्‍ताने हैं। हर नया व्‍यक्ति सुनाते समय उनमें कुछ नया जोड़ देता है। मजे लेता है। हमें ऐसी पॉजीटिव तस्‍वीरों और हरकतों पर गौर करना चाहिए। इनसे भी सीखना चाहिए।

Wednesday, August 16, 2017

रोज़ाना : ’टॉयलेट...’ से मिली राहत



रोज़ाना
टॉयलेट... से मिली राहत
-अजय ब्रह्मात्‍मज

अक्षय कुमार और भूमि पेडणेकर की फिल्‍म टॉयलेट एक प्रेम कथा के कलेक्‍शन से हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री को राहत मिली है। पिछलें कई महीनों से हर हफ्ते रिलीज हो रही फिल्‍में बाक्‍स आफिस पर खनक नहीं रही थीं। सलमान खान और शाह रूख खान की फिल्‍में बिजनेश की बड़ी उम्‍मीद पर खरी नहीं उतरीं। खबर है कि सलमान खान ने वितरकों के नुकसान की भरपाई की है। इस व्‍यवहार के लिए सलमान खान खान की तारीफ की जा सकती है। इक्षिण भारत में रजनी कांत की फिल्‍में अपेक्षित कमाई नहीं करतीं तो वे भी वितरकों का नुकसान शेयर करते हैं। हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री में महेश भट्ट भी ऐसा करते रहे हैं। इससे लाभ यह होता है कि उम्‍त स्‍टारों या प्रोडक्‍शन हाउस की अगली फिल्‍में उठाने में वितरक आनाकानी नहीं करते। बहरहाल,टॉयलेट एक प्रेम कथा के वीकएंड कलेक्‍शन ने उत्‍साह का संचार किया।
रिलीज के पहले टॉयलेट एक प्रेम कथा के बारे में ट्रेड पंडित असमंजस में थे। फिल्‍म की कहानी की विचित्रता की वजह से वे अक्षय कुमार के होने के बावजूद आशंकित थे। कुछ तो कह रहे थे कि वीकएंड कलेक्‍शन 25 करोड़ भी हो जाए तो गनीमत है। उनकी आशंका के विपरीत फिल्‍म ने 51 करोड़ का कलेक्‍शन किया। पहले दिन शुक्रवार को 13.10 करोड़ का कलेक्‍शन सामान्‍य ही रहा। आप गौर करेंगे कि दर्शकों को पसंद आने पर फिल्‍म का कलेक्‍शन शनिचार और रविवार को बढ़ता है। अगर यह बढ़ोत्‍री 20 प्रतिशत से अधिक हो तो फिल्‍म की सफलता की संभावना बढ़ जाती है। ऐसी फिल्‍मों का कलेक्‍शन भी सोमवार को गिरता है और आधं से कम हो जाता है। टॉयलेट एक प्रेम कथा ने सोमवार को 12 करोड़ का कलेक्‍शन किया। चार दिनों में इस फिल्‍म ने 63 करोड़ का आंकड़ा पार कर लिया है।
हम देख रहे हैं कि अक्षय कुमार फिल्‍म बिजनेश के लिहाज से भरोसेमंद एक्‍टर के तौर पर उभरे हैं। पिछले साल इसी समय के आसपास उनकी रुस्‍तम आई थी और फिल्‍म इंडस्‍ट्री को राहत मिली थी। यह भी कहा जा सकता है कि दूसरे लोकप्रिय स्‍टारों की तरह अक्षय कुमार ने भी अपनी फिल्‍मों की रिलीज के लिए एक त्‍योहार चुन लिया है स्‍वतंत्रता दिवस। 15 अगस्‍त के आसपास रिलीज हुईं उनकी फिल्‍में सफल रही हैं।
कामयाब होने के साथ टॉयलेट एक प्रेम कथा खुले में शौच के खिलाफ जागरूकता बढ़ाने में भी सफल रही। मनोरंजन के साथ मैसेज देने की निर्देशक श्री नारायण सिंह की युक्ति काम आई। मुमकिन है और भी निर्देशक देश के लिए जरूरी मुद्दों पर मनोरंजक फिल्‍में लेकर आएं।

Tuesday, August 15, 2017

रोज़ाना : राष्‍ट्रीय भावना के गीत



रोज़ाना
राष्‍ट्रीय भावना के गीत
-अजय ब्रह्मात्‍मज
इन पंक्तियों को पढ़ने केपहले ही आप के कानों में राष्‍ट्रीय भावना से ओत-प्रोत देशभक्ति के गानों की आवाज आ रही होगी। महानगर,शहर,कस्‍बा और गांव-देहात तक में गली,नुक्‍कड़ और चौराहों पर गूंज रहे गीत स्‍फूर्ति का संचार कर रहे होंगे। अभी प्रभात फेरी का चलन कम हो गया है। स्‍वतंत्रता आंदोलन के समय हर सुबह गली-मोहल्‍लों में प्रभातफेरी की मंडलियां निकला करती थीं। सातवें दशक तक इसका चलन रहा। खास कर 15 अगस्‍त और 26 जनवरी को स्‍कूलों और शिक्षा संस्‍थाओं में इसका आयोजन होता था। तब तक देशभक्त्‍िा और आजादी का सुरूर कायम था। देश जोश के साथ उम्‍मीद में जी रहा था। बाद में बढ़ती गरीबी,असमानता और बदहाली से आजादी से मिले सपने चकनाचूर हुए और मोहभंग हुआ। धीरे-धीरे स्‍वतंत्रता दिवस औपचारिकता हो गई। अवकाश का एक दिन हो गया।

याद करें तो हमारे बचपन में स्‍वतंत्रता दिवस के दिन स्‍कूल जाने का उत्‍साह रहता था। यह उत्‍साह आज भी है,लेकिन शिक्षकों और अभिभावकों की सहभागिता की कमी से पहले सा उमंग नहीं दिखता। केंद्र में राष्‍ट्रवादी सरकार के आने के बाद देशभक्ति की भावना पर जोर देने से नए जोश का संचार हुआ है। नागरिक होने का नाते हमारा फर्ज है कि हम भारतीय होने पर गर्व महसूस करें। आजादी के लिए बलिदान और कुर्बान हुए सेनानियों को याद करते हुए राष्‍ट्र निर्माण के कार्यों में संलग्‍न हो। अपनी भूमिका चुनें और जी-जान से देश की तरक्‍की के लिए काम करें। हमें विकसित देशों के साथ अगली कतार में शामिल होना है। पिछले 70 सालों में रह गई कमियों को दूर करना है और विकास के पथ पर आगे बढ़ना है।

हिंदी फिल्‍मों ने हमेशा राष्‍ट्रीय भावना का प्रचार-प्रसार किया है। आजादी के बाद के सालों की फिल्‍में देखें या गीत सुनें तो आज भी देशभक्ति का जज्‍बा हिलारें मारने लगता है। हिंदी फिल्‍मों के नए-पुराने गीतों की लोकप्रियता का यह आलम है कि उनके बगैर आजादी से संबंधित कोई भी आयोजन अधूरा रहता है। हमवतनों को संबोधित करते ये गीत जोश के साथ उम्‍मीद भी जगाते हैं। साथ रहने और चलने का संदेश देते हैं। उन सेनानियों की कुर्बानियों की याद दिलाते हैं,जिनकी वजह से हमारा देश सदियों की गुलामी से आजाद हुआ। सीमाओं पर तैनात हमारी सेना की जागती चौकस निगाहें ही हमारी नींद,चैन और सुरक्षा का खयाल रखती हैं। फिल्‍मी गीतकारों ने ऐसे वीरों का यथोचित गुणगान किया है। हमें गुनगुनाने के लिए ऐसे गीत दिए हैं कि उनके जरिए हम अपनी श्रद्धा जाहिर कर सकें।

देशथक्ति के इन फिल्‍मी गीतों को गाने-गुनगुनाने के बीच ठहर कर देख लें कि क्‍या हमारे परिवार के सभी सदस्‍यों को राष्‍ट्र गान(जन गण मन) और राष्‍ट्र गीत(वंदे मातरम) याद हैं?

Monday, August 14, 2017

दरअसल : यंग एडल्‍ट के लिए फिल्‍में



दरअसल...
यंग एडल्‍ट के लिए फिल्‍में
-अजय ब्रह्मात्‍मज
बृजमोहन अमर रहे,अभी और अनु,आश्‍चर्यचकित,अज्‍जी,नोबलमैन,द म्‍यूजिक टीचर,कुछ भीगे अल्‍फाज,हामिद... उन कुछ फिल्‍मों के नाम हैं,जो अगले महीने से हर महीने रिलीज होंगी। योजना है कि दर्शकों तक ऐसी फिल्‍में आएं,जो कथ्‍य के स्‍तर पर गंभीर हैं। कुछ कहना चाहती हैं। अच्‍छी बात है कि इन सारी फिल्‍मों की योजना 18 से 30 साल के दर्शकों को धन में रख कर बनाई गई है। एक सर्वे के मुताबिक पहले दिन फिल्‍म देखने आए दर्शकों में से 64 प्रतिशत की उम्र 24 साल से कू होती है। सिनेमाघरों में युवा दर्शक जाते हैं। इस समूह के दर्शक विश्‍व सिनेमा से परिचित हैं। अगर उन्‍हें फिल्‍म पसंद नहीं आती है तो बड़े से बड़े लोकप्रिय सितारों की भी फिल्‍में बाक्‍स आफिस पर औंधे मुंह गिरती हैं।
ऊपर उल्लिखित सभी फिल्‍मों का निर्माण यूडली फिल्‍म्‍स कर रही है। यूडली फिल्‍म्‍स मूल रूप से सारेगाम म्‍यूजिक कंपनी की नई फिल्‍म निर्माण कंपनी है। एक अर्से की खामोशी के बाद फिल्‍म निर्माण में सारेगामा का उतरना अच्‍छी खबर है। हिंदी फिल्‍में हमेश एण्‍क संक्राति से दूसरी संक्राति के बीच रहती है। उसी के दरम्‍यान कुछ नया करने के उद्देश्‍य से कोई आता है। विषय,प्रस्‍तुति और मनोरंजन की नई बयार दर्शकों को भी राहत देती है। उन्‍हें कुछ नया मिलता है। बाहुबली और दंगल जैसी फिलमें रोजाना नहीं बन सकतीं। जरूरत है कि सीमित बजट और मझोले स्‍टारडम के एक्‍टरों को लकर फिल्‍में आएं। दर्शकों को मनोरंजन मिले तो वे ऐसी फिल्‍मों को सपोर्ट करते हैं। जैसे कि तमाम लोकप्रिय सितारों के बीच अभी शुभ मंगल सावधान और बरेली की बर्फी उम्‍मीद की हिलारें दे रही हैं।
मनोरंजन के क्षेत्र में माना जा रहा है कि यंग एडल्‍ट(युवा वयस्‍क) को धन में रख कर फिल्‍में नहीं बन रही हैं। मेनस्‍ट्रीम हिंदी सिनेमा की खुराक से बड़े हुए दर्शकों को पारंपरिक शैली में आ रही फार्मूला फिल्‍में अच्‍छी लगती हैं। वे उनसे खुश हैं। बच्‍चों को टीवी से किड्स शो मिल जाते हैं। समस्‍या यंग एडल्‍ट की है। हिंदी फिल्‍मों की प्‍लानिंग में यह समूह नदारद है,जबकि आज वही हिंदी फिल्‍मों का पहला दर्शक है। यूडली फिल्‍म्‍स की कोशिश है कि इन दर्शकों की संवेदनाओं और अपेक्षाओं की कहानी दिखाई जाए। तात्‍पर्य यह है कि उनकी सोच और जरूरतों को प्रमुखता दी जाए। हिंदी सिनेमा के अभाव में वे तेजी से से ओटीटी कंटेंट(ओवर द टॉप कंटेंट) की ओर भाग रहे हैं। ओटीटी कंटेंट में इंटरनेट के लिए निर्मित और जारी शोज आते हैं। एमेजॉन और नेटफिल्‍क्‍स इस श्रेणी के बड़ प्‍लेयर के रूप में उभरे हैं।
कोशिश है कि युवा दर्शकों को यूथ रियलिज्‍म की फिल्‍में दी जाएं। यूडली फिल्‍म्‍स फिलहाल हर साल 12 से पंद्रह फिल्‍में बनाने की सोच रही है। सिनेमाघरों में इन फिल्‍मों के आते ही अन्‍य प्रोडक्‍शन हाउस भी ऐसी फिल्‍मों की तैयारी करेंगे। यों लग रहा है कि 2018 का नया ट्रेड युवा दर्शकों की फिल्‍में होंगी। ये फिल्‍में अधिकतम दो घंटे की अवधि की होगी। भाषा की हदें तोड़ कर यह भी कोशिश की जा रही है कि फिल्‍म के विरूाय और परिवेश के अनुरूप भाषा रखी जा और उसे सभी भाषाओं के दर्शकों के बीच ले जाया जाए। हिंदी के दर्शकों के बीच तो लाया ही जाएं। वैसे भी बाहुबली ने जता दिया है कि कंटेंट दमदार हो तो भाषा दीवार नहीं बन सकती। संगीतप्रेमियों को इन फिल्‍मों के जरिए सारेगामा के बैंक से पुरानी फिल्‍मों के गाने मूल या कवर के रूप में देखने-सुनने को मिल सकते हैं।
युवा दर्शकों के लिए फिल्‍में बदलने को तैयार हैं। उनकी रुचि और क्रय श्‍क्ति की वजह से ही यह बदलाव हो रहा है।

Saturday, August 12, 2017

रोज़ाना : शिकार हैं तो प्रतिकार करें



रोज़ाना
शिकार हैं तो प्रतिकार करें
-अजय ब्रह्मात्‍मज

समाज में सामाजिक और आर्थिक असमानता हो तो शोषण और शिकार आम बात हो जाती है। समाज के विभिन्न क्षेत्रों के प्रभावशाली समूह अपना वर्चस्व बनाये रखने के लिए हर तरह के उपाय करते हैं। वे दमन और दबाव की नीति-रणनीति अपनाते हैं। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में भी यह आम है। खास कर बाहर से आये कलाकारों के प्रति फ़िल्म इंडस्ट्री के इनसाइडर का यह रवैया दिखता है। कुछ महीनों से कंगना रनोट के खिलाफ चल रहे बयानों पर गौर करें तो स्पष्ट हो जाएगा। ज्यादातर तिलमिलाये हुए हैं। फ़िल्म इंडस्ट्री में जारी वंशवाद को वे दबी जबान से स्वीकार करते हैं। मझोले स्टार तो कंगना के समर्थन करने के बाद कह देते हैं कि क्यों हमें घसीट रहे हैं। हम तो उसके कैम्प के हैं,जो हमें काम दे।
कंगना रनोट की बातों में दम है। पिछले दिनों उन्होंने दोहराया कि वह आगे भी कुछ लोगों के अहम पर चोट करती रहेंगी।होता यूं है कि किसी ताकतवर की बात न मानो,प्रतिकार करो या सवाल करो तो उनका अहम घायल हो जाता है।फ़िल्म इंडस्ट्री में भी जी हुजूरी चलती है। हैं में हैं मिलते रहो और आगे बढ़ते रहो। कंगना ने तो सीधे आरोप लगा दिए थे और वह भी मुंह पर। कारण जोहर को यह बात कैसे गवारा होती। अवसर मिलते ही करण ने पलटवार किया और कंगना को सलाह दी कि फ़िल्म इंडस्ट्री छोड़ दें। बात पुरानी हो गयी,लेकिन अभी तक सुलग रही है। हर बार कोई हवा दे देता है।
इससे अलग एक स्थिति दिखाई देती है,जहां कुछ लोग हमेशा शिकार हो चुके व्यक्ति की मुद्रा में रहते हैं।उन्हें शिकायत रहती है। जबकि उनकी शिकायतों का ठोस आधार नहीं रहता। मज़ेदार तथ्य यह है कि ऐसे शिकायती व्यक्तियों के समर्थन में कुछ लोग मिल जाते हैं। दरअसल सफल और कामयाब व्यक्तियों की छवि खराब करने में अतिरिक्त आनंद मिलता है। ऊपरी तौर पर लगता है कि शोषित व्यक्ति का साथ दिया जा रहा है,जबकि सच्चाई कुछ और होती है। शिकार व्यक्तियों को जोरदार प्रतिकार करना चाहिए। विक्टिम मुद्रा में आ जाने से व्यक्तिगत सुकून मिल जाता है,लेकिन उससे कोई लाभ नहीं होता। देखा गया है कि विक्टिम मुद्रा में जी रहा व्यक्ति अपने ज़ख्मों को भरने नहीं देता। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में ऐसे अनेक फिल्मकार मिलते हैं जो अपनी अप्रदर्शित फ़िल्म का रोना रोते रहते हैं। किसी और को दोषी ठहराते हैं। वे उस फिल्म के भंवर से नहीं निकल पाते।

फिल्‍म समीक्षा : टॉयलेट- एक प्रेम कथा



फिल्‍म रिव्‍यू
शौच पर लगे पर्दा
टॉयलेट एक प्रेम कथा
-अजय ब्रह्मात्‍मज
जया को कहां पता था कि जिस केशव से वह प्‍यार करती है और अब शादी भी कर चुकी है...उसके घर में टॉयलेट नहीं है। पहली रात के बाद की सुबह ही उसे इसकी जानकारी मिलती है। वह गांव की लोटा पार्टी के साथ खेत में भी जाती है,लेकिन पूरी प्रक्रिया से उबकाई और शर्म आती है। बचपन से टॉयलेट में जाने की आदत के कारण खुले में शौच करना उसे मंजूर नहीं। बिन औरतों के घर में बड़े हुआ केशव के लिए शौच कभी समस्‍या नहीं रही। उसने कभी जरूरत ही नहीं महसूस की। जया के बिफरने और दुखी होने को वह शुरू में समझ ही नहीं पाता। उसे लगता है कि वह एक छोटी सी बात का बतंगड़ बना रही है। दूसरी औरतों की तरह अपने माहौल से एडजस्‍ट नहीं कर रही है। यह फिल्‍म जया की है। जया ही पूरी कहानी की प्रेरक और उत्‍प्रेरक है। हालांकि लगता है कि सब कुछ केशव ने किया,लेकिन गौर करें तो उससे सब कुछ जया ने ही करवाया।
टॉयलेट एक प्रेम कथा रोचक लव स्‍टोरी है। जया और केशव की इस प्रेम कहानी में सोच और शौच की खल भूमिकाएं हैं। उन पर विजय पाने की कोशिश और कामयाबी में ही जया और केशव का प्रेम परवान चढ़ता है। लेखक सिद्धार्थ-गरिमा ने जया और केशव की प्रेम कहानी का मुश्किल आधार और विस्‍तार चुना है। उन्‍होंने आगरा और मथुरा के इलाके की कथाभूमि चुनी है और अपने किरदारों का स्‍थानीय रंग-ढंग और लहजा दिया है। भाषा ऐसी रखी है कि स्‍थानीयता की छटा मिल जाए और उसे समझना भी दुरूह नहीं हो। उच्‍चारण की शुद्धता के बारे में ब्रजभूमि के लोग सही राय दे सकते हैं। फिल्‍म देखते हुए भाषा कहीं आड़े नहीं आती। उसकी वजह से खास निखार आया है।
जया बेहिचक प्रधान मंत्री के स्‍वच्‍छ भारत अभियान की थीम से जुड़ी यह फिल्‍म सदियों पुरानी सभ्‍यता और संस्‍कृति के साच पर सवाल करती है। लेखकद्वय ने व्‍यंग्‍य का सहारा लिया है। उन्‍होंने जया और केशव के रूप में दो ऐसे किरदारों को गढ़ा है,जो एक-दूसरे से बेइंतहा प्रेम करते हैं। सिर्फ शौच के बारे में उनकी सोच अलग-अलग है। केशव की सोच में कभी शौच का सवाल आया ही नहीं,क्‍योंकि बचपन से उसने खुले में शौच की ही नित्‍य ्रिया माना और समझा। जया के बिदकने पर भी शौच की जरूरत उसके पल्‍ले नहीं पड़ती। उसे जया की मांग का एहसास बाद में होता है। फिर तो वह एड़ी-चोटी का जोड़ लगा देता है। गांव और आसपास की महिलाएं जागृत होती हैं और शौच एक अभियान बन जाता है।
ऐसी फिल्‍मों के साथ खतरा रहता है कि वे डाक्‍यूमेंट्री न बन जाएं। या ऐसी उपदेशात्‍मक न हो जाएं कि दर्शक दुखी हो जाएं। निर्देशक श्रीनारायण सिंह संतुलन बना कर चलते हैं। उन्‍हें अपने कलाकारों और लेखकों का पूरा सहयोग मिला है।
फिल्‍म के संवाद चुटीले और मारक हैं। परंपरा और रीति-रिवाजों के नाम पर चल रह कुप्रथा पर अटैक करती यह फिल्‍म नारे लगाने से बची रहती है। एक छोर पर केशव के पिता पंडिज्‍जी हैं तो दूसरे छोर पर जया है। इनके बीच उलझा केशव आखिरकार जया के साथ बढ़ता है और बड़े परिवर्तन का कारक बन जाता है। पढ़ी-लिखी जया एक तरह से गांव-कस्‍बों में नई सोच के साथ उभरी लड़कियों का प्रतिनिधित्‍व करती है। वह केशव से प्रेम तो करती है,लेकिन अपने मूल्‍यों और सोच के लिए समझाौते नहीं कर सकती। और चूंकि उसकी सोच तार्किक और आधुनिक है,इसलिए हम उसके साथ हो लेते हैं। हमें केशव से दिक्‍कत होने लगती है। लेखकों ने केशव के क्रमिक बदलाव से कहानी स्‍वाभाविक रखी है। हां,सरकारी अभियान और मंत्रियों की सक्रियता का हिस्‍सा जबरन डाला हुआ लगता है। उनके बगैर या उनके सूक्ष्‍म इस्‍तेमाल से फिल्‍म ज्‍यादा असरदार लगती।
अक्षय कुमार ने केशव के रिदार को समझा है। उन्‍होंने उस किरदार के लिए जरूरी भाव-भंगिमा और पहनावे पर काम किया है। लहजे और संवाद अदायगी में भी उनकी मेहनत झलकती है। जया की भूमिका में भूमि पेडणेकर जंचती हैं। उन्‍होंने पूरी सादगी और वास्‍तविकता के साथ इस किरदार को निभाया है। उनके सहज अभिनय में जया भादुड़ी की झलग है। ग्‍लैमर की गलियों में वह नहीं मुड़ीं तो हिंदी फिल्‍मों को एक समर्थ अभिनेत्री मिल जाएगी। इस फिल्‍म की जान हैं पंडिज्‍जी यानी सुधीर पांडे। उन्‍होंने अपने किरदार को उसकी विसंगतियों को ठोस विश्‍वास के साथ निभाया है। छोटे भाई के रूप में दिव्‍येन्‍दु समर्थ परक और सहयोगी हैं। जया के मां-पिता के रूप में आए कलाकार भी स्‍वाभाविक लगे हैं। अनुपम खेर अपने अंदाज के साथ यहां भी हैं।
पर्दा सोच से हटा कर शौच पर लगाने का टाइम आ गयो।
अवधि- 161 मिनट
**** चार स्‍टार    

Thursday, August 10, 2017

रोज़ाना : ’चक दे! इंडिया’ के दस साल



रोज़ाना
चक दे! इंडिया के दस साल
-अजय ब्रह्मात्‍मज

यह 2007 की बात है। यशराज फिल्‍म्‍स ने एक साल पहले कबीर खान निर्देशित काबुल एक्‍सप्रेस का निर्माण किया था। फिल्‍म तो अधिक नहीं चली थी,लेकिन उसे अच्‍छी तारीफ मिली थी। उन्‍हें लगा था कि प्रेकानियों से इतर फिल्‍में भी बनायी जा सकती हैं। तब तक जयदीप साहनी यशराज की टीम में शामिल हो चुके थे। वे कुछ दिनों से भारत की महिला हाकी टीम पर रिसर्च कर रहे थे। उन्‍होंने बातों-बातों में आदित्‍य चोपड़ा को अपने विषय के बारे में बताया था। तब तक जयदीप साहनी ने तय नहीं किया था कि वे किताब लिखंगे या फिल्‍म। आदित्‍य चोपड़ा के प्रोत्‍साहन ने जयदीप साहनी को हौसला दिया। उन्‍होंने एक मुश्किल फिल्‍म लिखी। हालांकि फिल्‍म में शाह रूख खान थे,लेकिन उनके साथ कोई एक हीरोइन नहीं बल्कि लड़कियों की जमात थी। उन लड़कियों को लेकर उन्‍हें भारत की महिला हाकी टीम के कोच के रूप में ऐसी टीम तैयार करनी थी,जो जीत कर लौटे।
यह आदित्‍य चोपड़ा की हिम्‍मत और शाह रूख खान का विश्‍वास ही था कि लेखक जयदीप साहनी और निर्देशक शिमित अमीन भारत की एक यादगार फिल्‍म पूरी की। यह फिल्‍म पसंद की गई और समय बीतने के साथ पिछले दस सालों में खेल पर बनी सबसे रोचक फिल्‍म हो गई है। चक दे! इंडिया राष्‍ट्रीय गर्व है। इस फिल्‍म का शीर्षक गीत आज भी स्‍टेडियम और मैदानों में गूंजता है। खिलाडि़यों में जोश भरता है और टीम इंडिया के रूप में खेल में विजयी होने की प्रेरणा देता है। चक दे! इंडिया प्रमाण है कि कुछ फिल्‍में रिलीज के बाद दर्शकों के बीच बड़ी होती हैं। दर्शक ही उन्‍हे पालते और बड़ी बना देते हैं।
चक दे! इंडिया कबीर खान के साथ उन लड़कियों की भी कहानी है,जो टीम इंडिया के रूप में संगठित होती हैं। लक्ष्‍य हासिल करती हैं। कबीर खान कभी भारतीय हाकी टीम के कप्‍तान हुआ करते थे। पाकिस्‍तान से मैच हारने के बाद उन्‍हें बेइज्‍ज्‍त होना पड़ता है। सात सालों के बाद महिला हाकी टीम के कोच के रूप में चुने जाने के बाद वे अपनी बेइज्‍जती को तारीफ में बदलने के मकसद से जुट जाते हैं। पहली चुनौती सभी लड़कियों में टीम भावना पैदा करना और उन्‍हें देश के लिए खेलने की प्रेरणा देना है। लड़कियां हाकी के अलावा सारे खेल खेलती हैं और पर्सनल एजेंडा के तहत स्‍कोर बनाती हैं। उनमें टीम एनर्जी नहीं है। कबीर खान उन्‍हें टीम के तौर पर तैयार करने के बाद मैदान में उतरते हैं। जीत हासिल होती है।
लेखक जयदीप साहनी और निर्देशक शिमित अमीन 10 अगस्‍त,2007 को रिलीज हुई चक दे! इंडिया की कामयाबी का श्रेय दर्शकों को देते हैं। यह फिल्‍म दर्शकों में आशा का संचार करती है। खेल भावना के साथ राष्‍ट्रीय भावना जगाती है। फिल्‍म का शीर्षक गीत चक दे किसी उद्बोधन गीत की तरह झंकृत करता है।

Wednesday, August 9, 2017

रोजाना : खारिज करने का दौर



रोजाना
खारिज करने का दौर
-अजय ब्रह्मात्‍मज
बकवास...बहुत बुरी फिल्‍म है...क्‍या हो गया है शाह रूख को...इम्तियाज चूक गए। जब हैरी मेट सेजल के बारे में सोशल मीडिया की टिप्‍पणियों पर सरसरी निगाह डालें तो यही पढ़ने-सुनने को मिलेगा। हर व्‍यक्ति इसे खारिज कर रहा है। ज्‍यादातर के पास ठोस कारण नहीं हैं। पूछने पर वे दाएं-बाएं झांकने लगते हैं। यह हमारे दौर की खास प्रवृति है। किसी स्‍थापित को खारिज करो। पहले मूर्ति बनाओ। फिर पूजो और आखिरकार विसर्जन कर दो। हम अपने देवी-देवताओं के साथ यही करते हैं। फिल्‍म स्‍टारों के प्रति भी हमारा यही रवैया रहता है। थिति इतनी नकारत्‍मक हो चुकी है कि अगर आप ने फिल्‍म के बारे में कुछ पाम्‍जीटिव बातें कीं तो ये स्‍वयंभू आलोचक(दर्शक) आप से ही नाराज हो जाएंगे और ट्रोलिंग होने लगेगी1 जब हैरी मेट सेजल सामान्‍य मनोरंजक फिल्‍म है।
सच्‍चाई क्‍या है? हिंदी फिल्‍मों के ढांचे में जकड़ी यह फिल्‍म किसी सा‍हसिक प्रयोग से बचती है। इम्तियाज अली ने खुद की रोचक शैली विकसित कर ली है। यह उसी शैली की फिल्‍म है। उनके किरदारों(प्रेमियों) का बाहरी विरोध नहीं होता। कोई दीवार नहीं बनता। कोई खलनायक भी नहीं होता। वे खुद के झंझावातों से जूझ रहे होते हैं। संगत और सोहबत में वे खुद को पा लेते हैं। और फिर एक-दूसरे को चाहने लगते हैं। समस्‍या यह है कि हिंदी फिल्‍मों के अधिकांश दर्शकद पॉपुलर फिल्‍मों में कथ्‍य की पुरानी धुरी पर टिके रह कर ही नया आस्‍वादन चाहते हैं। इम्तियाज अली हैरी और सेजल को मिलवाने में उन किरदारों के मिजाज के खिलाफ जाते हैं। हम जिन किरदारों के साथ चल रहे होते हैं। वे ही हमारा हाथ झटक देते हैं।
बहरहाल,किसी भी फिल्‍म का बिजनेस इन दिनों खास महत्‍व रखता है। उस लिहाज से देखें तो जब हैरी मेट सेजल ने वीकएंड में 45.75 करोड़ का लेक्‍शन किया है। बाहुबली,टयूबलाइट और जॉली एलएलबी इससे ऊपर हैं। पहले तीन दिनों में जब हैरी मेट सेजल का कलेक्‍शन 15 करोड़ के आसपास ही रहा। हां,कलेक्‍शन में आवश्‍यक बढ़ोत्‍तरी होती तो परिणाम उत्‍साजनक रहता। फिर भी कह सकते हैं कि दर्शकों की निष्‍ठा विपरीत नहीं हुई है। यह जरूर हुआ है कि शाह रूख खान और इम्तियाज के साथ होने से अपेक्षाएं ज्‍यादा बड़ी और ऊंची थी। माना जा रहा कि इससे शाह रूख खान को जरूरी छलांग मिलेगी। छलांग नहीं लगी,फिर भी जब हैरी मेट सेजल को खारिज करना उचित नहीं होगा। हां,निर्देशक और कलाकारों ने इस फिल्‍म के बारे में दर्शकों को ढंग से नहीं बताया। 

Tuesday, August 8, 2017

रोज़ाना : फिल्‍म प्रचार की नित नई युक्तियां



रोज़ाना
फिल्‍म प्रचार की नित नई युक्तियां
-अजय ब्रह्मात्‍मज
हाल ही में अनुपम खेर ने अपनी नई फिल्‍म रांची डायरीज के पोस्‍टर जारी किए। इस इवेंट के लिए उन्‍होंने मुंबई के उपनगर में स्थित खेरवाड़ी को चुना। 25-30 साल पहले यह फिल्‍मों में संघर्षरत कलाकारों की प्रिय निम्‍न मध्‍यवर्गीय बस्‍ती हुआ करती थी। कमरे और मकान सस्‍ते में मिल जाया करते थे। मुंबई में अनुपम खेर का पहला ठिकाना यहीं था। यहीं 8x10 के एक कमरे में वे चार दोस्‍तों के साथ रहते थे। उनकी नई फिल्‍म रांची डायरीज में छोटे शहर के कुछ लड़के बड़े ख्‍वाबों के साथ जिंदगी की जंग में उतरते हैं। फिल्‍म की थीम अनुपम खेर को अपने अतीत से मिलती-जुलती लगी तो उन्‍होंने पहले ठिकाने को ही इवेंट के लिए चुना लिया। इस मौके पर उन्‍होंने उन दिनों के बारे में भी बताया और अपने संघर्ष का जिक्र किया।
प्रचार के लिए अतीत के लमहों को याद करना और सभी के साथ उसे शेयर करना अनुपम खेर को विनम्र बनाता है। प्रचारकों को अवसर मिल जाता है। इसी बहाने चैनलों और समाचार पत्रों में अतिरिक्‍त जगह मिल जाती है। इन दिनों प्रचारको को हर नई फिल्‍म के साथ प्रचार की नई युक्तियों के बारे में सोचना पड़ता है। फिल्‍म अगर जब हैरी मेट सेजल जैसी बड़ी हो तो युक्तियां भी नायाब और बड़ी होती हैं। मसलन,‍ि‍पछले दिनों बनारस में शाह रूख खान अपनी हीरोइन अनुष्‍का शर्मा को रिझाने के लिए गायक,अभिनेता और भाजपा के सांसद मनोज तिवारी की मदद ले रहे थे। हांलांकि इस प्रचार से फिल्‍म को कोई ताल्‍लुक नहीं था,लेकिन बनारस के लोगों को खुश करने के लिए भोजपुरी के एक लोकप्रिय गीत सहारा लिया गया। लगावेलु जे लिपिस्टिक... इस गीत की पंक्तियों को फेरबदल के मनोज तिवारी ने शाह रूख खान को सिखाया और उसे अनुष्‍का शर्मा के लिए उन्‍होंने गाया। मनोज तिवारी की मदद से किए गए इस प्रचार से सोशल मीडिया पर नाराजगी वायरल हुई। कुछ महीनों पहले किसी स्‍कूल के इवेंट में एक शिक्षिका के गीत गाने के आगह पर मनोज तिवारी ने उन्‍हें फटकार लगाई थी। सभी उसी प्रसंग को याद कर इस इवेंट की भर्त्‍सना करने लगे। प्रचार का उल्‍टा असर हुआ।
एक रोचक कोशिश अनुचित संदर्भ से बेअसर हो गई। प्रचारकों या या फिल्‍म से संबंधि निर्माता,निर्देशक और सितारों को भी मालूम नहीं रहता कि किस इवेंट का क्‍या असर होगा? बस वे दांव खेल रहे होते हैं। फिल्‍मअ चल जाती है तो मान लिया जाता है कि सारी युक्तियां सही थीं। फिल्‍म असफल रहे तो होंठ सिल जाते हैं।

Sunday, August 6, 2017

गूगल बता रहा है गंभीर है समस्‍या - अक्षय कुमार



स्‍वच्‍छता अभियान की पृष्‍ठभूमि में एक प्रेहम कथा
-अजय ब्रह्मात्‍मज
अक्षय कुमार की टॉयलेट एक प्रेम कथा रिलीज हो रही है। हाल ही में इस फिल्‍म के पांच टीजर रिलीज किए गए,जिनसे फिल्‍म का फील मिल रहा है। यह एहसास बढ़ रही है कि अक्ष्‍य कुमार की यह फिल्‍म मनोरंजक लव स्‍टोरी होने के साथ ही एक जरूरी संदेश भी देगी। संदेश है स्‍वच्‍छता का,संडास का...हम सभी की दैनिक नित्‍य क्रियाओं में सबसे महत्‍वपूर्ण और आवश्‍यक शौचालय की उचित चर्चा नहीं होती। अक्षय कुमार की इस फिल्‍म ने शौचालय की जरूरत और अभियान की तरफ सभी का ध्‍यान खींचा है। रिलीज से पहले अक्षय कुमार इस फिल्‍म के प्रचार के लिए सभी प्‍लेटफार्म का इस्‍तेमाल कर रहे हैं। उनसे यह बातचीत फिल्‍मसिटी से जुहू स्थित उनके आवास की यात्रा के दौरान हुई।
-देश में अभी स्‍वच्‍छता अभियान चल रहा है। आप की फिल्‍म टॉयलेट एक प्रेम कथा का विषय भी स्‍वच्‍छता से जुड़ा है। क्‍या उस अभियान और इस फिल्‍म में कोई संबंध है?
0 स्‍वच्‍छता,क्लीनलीनेस,टॉयलेट...या संडास कह लें। कुछ भी कहें और करें...मकसद एक ही है कि भारत को स्‍वच्‍छ करना है। अभी वह सबसे महत्‍वपूर्ण मुहिम है। आम धारणा है कि यह गांवों की समस्‍या है। वहां शौचालय नहीं हैं। यह शहरों की भी उतनी ही बड़ी समस्‍या है। महानगरों में भी खुले में शौच होता है। रेल की पटरियों,पाईप के ऊपर-नीचे,समुद्र के किनारे आप का लोग मिल जाएंगे। हां,कुछ लोगों की शौचालय बनाने की हैसियत नहीं होती। हमारी सरकार इस दिशा में बहुत कुछ कर रही है। हमारी फिल्‍म का विषय उन लोगों से संबंधित है,जिनकी नियत नहीं है। वे शौचालय नहीं बनाना चाहते। वे खुले में शौच की वकालत भी करते हैं।खुले में शौच की गंदगी और बीमारी के चपेट में सभी आते हैं1 शहरों में तो बीमारी और भी तेजी से फैलती है।
-ऐसे गंभीर विषय पर फिल्‍म बनाना सचमुच चुनौती रही होगी और आप का इससे जुड़ना भी रोचक है...
0मैंने इस विषय के बारे में सुन रखा था। फिल्‍म की कहानी के बारे में जानने के बाद मुद्ददे के विस्‍तार में गया तो और भी जानकारियां मिलीं। देश की 54 प्रतिशत आबादी के पास शौचालय नहीं है। हर पांच मिनट के बाद एक बच्‍चे की मौत इसी वजह से होती है। खतरनाक स्थिति है। गूगल सर्च में कई अच्‍छी बातों में हम दुलनया में आगे और ऊपर हैं,लेकिन शर्म की बात है कि खुले शौच में भी हम बहुत ऊपर है। हमें जितनी जल्‍दी हो खुले में शौच की आदत और मजबूरी को खत्‍म करना चाहिए। इस फिल्‍म से जुड़ने की वजह यही मंशा है।
-कहीं न कहीं यह लगता है कि शौचालय सिर्फ गरीबी से जुड़ा मसला नहीं है। इसके प्रति हमारी लापरवाही खास मानसिकता की वजह से है....
0बिल्‍कुल। वे गलतफहमी और पुरानी सोच में जकड़े हुए हैं। मैं पूछता हूं,जो यह तर्क देते हैं कि खाना बनाने और खाने की जगह पर टॉयलेट नहीं बनवाएंगे। वे फिर खाना उगाने की जगह पर शौच के लिए कैसे राजी हो जाते हैं?
- इस मुद्दे को अपनी फिल्‍म में कैसे पिरोया है?
0 शौचालय फिल्‍म के बैकग्राउंड में है। फोर ग्राउंड में लवस्‍टोरी है। एक सीधी सी बात कहता हूं कि शाहजहां ने अपनी बेगम मुमताज के लिए ताजमहल बनवा दिया। क्‍या हम अपनी बीवियों के लिए संडास नहीं बनवा सकते। अगर अपने प्‍यार के लिए यह भी नहीं कर सकते तो लानत है। शौचालय न होने से घर की औरतें कितनी मुसीबतें झेलती हैं। उन्‍हें सूरज उगने से पहले और सूरज डूबने के बाद खेतों की तरफ जाना पड़ता है। दिन भर वे खुद को रोक कर पेट में बीमारियों को जन्‍म दे रही होती हैं। परिवार की औरतों की समस्‍या पर ध्‍यान दें। एक ओर घूघट की बात करते हैं और दूसरी ओर उन्‍हें साड़ी उठा कर खुले में बैठने को मजबूर करते हैं। मर्द तो कहीं भी खड़े हो जाते हैं। फिल्‍म की कहानी हकीकत है। मैं खुद ऐसे 8-10 व्‍यक्तियों और परिवारों को जानता हूं।
-मैंने सुना है कि पहले यह छोटी फिल्‍म थी। आप के जुड़ने के बाद यह बड़ी और चर्चित हो गई है?
0 आप को पता है साढ़ चार साल यह स्क्रिप्‍ट फिल्‍म इंडस्‍ट्री में घूती रही। किसी स्‍टार ने हां नहीं कहा। मुझे पता चला तो नीरज पांडेय से रिक्‍वेस्‍ट कर मैंने यह फिल्‍म ली। इसे श्रीनारायण सिंह डायरेक्‍ट कर रहे हैं। मैंने अभी तक 20-21 नए डायरेक्‍टरों के साथ काम किया है।
-नए डायरेक्‍टर के साथ केमेस्‍ट्री कैसे बनती है? आप की कोई मांग रहती है?
0फिल्‍म के लिए हां कहते ही रिश्‍ता बनने लगता है। कहानी सुनाने के लिए उन्‍हें सुबह चार बजे बुला लेता हूं तो वे सिर पीट कर आते हैं। फिर हम दोनों ब्‍लेंड करना शुरू करते हैं। एक-दूसरे के हिसाब से ढलते हैं। नए डायरेक्‍टर कुछ कर दिखाना चाहते है। उनकी इस कोशिश में मुझे अच्‍छी फिल्‍म मिल जाती है। मैं डायरेक्‍टर के विजन को ही फॉलो करता हूं।
-फिल्‍म के प्रमोशन में कितनी रुचि लेते हैं? क्‍या प्रमोशनल इवेंट से दर्शक बनते हैं?
0हां,अवेयरनेस बढ़ती है। दर्शकों को पता चलता है।फिल्‍म के प्रमोशन के लिए सभी जरूरी इवेंट में जाता हूं। अगर मैं शो या इवेंट में जाता हूं तो पूरी तरह से इंवॉल्‍व रहता हूं।
-अभी किसी ने आप की तुलना धर्मेन्‍द्र से की। उनकी नजर में आप उनकी तरह ही अलग होकर भी कामयाब हैं और हर तरह की फिल्‍में कर रहे है...
0 वे मेरे आदर्श रहे हैं और हैं। आप ने किस का नाम ले लिया और किस ने मेरी उनसे तुलना कर दी। मैं तो उनकी फिल्‍में देख कर बड़ा हुआ हूं। डैडी से कहता था कि धर्मेन्‍द्र की फिल्‍म देखनी है। हमें एक्‍शन का बहुत शौक था। डैडी उनकी फिल्‍में दिखाते थे। उनके साथ मेरी तुलना करना बड़ी बात है। अमैं उनका फैन ही नहीं,फॉलोअर भी हूं।
-क्रैक क्‍यों बंद हो गई। कहते हैं नीरज पांडेय के साथ अब आप नहीं हैं?
0 अभी लनंदन में हम दोनों साथ ही बैठे। बातें की। वे हमारे प्रेस कांफ्रेंस के लिए भी आए थे। मीडिया कुछ क्रैक नहीं कर पाती तो ऐसी स्‍टासेरी चला देती है।  सच इतना ही है कि अभी क्रैक की कहानी क्रैक नहीं हो पाई है।
-अपनी नायिका भूमि पेडणेकर के बारे में बताएं?
0सबसे पहले तो यह कहूंगा कि कि ऐसा रोल लेना ही बड़ी बात है। उन्‍हें ,खुले शौच का एक सीन करना था। आप बताएं कि कौन सा एक्‍टर ऐसे सीन के लिए तैयार होगी। उन्‍होंने क्राउड के बीच साड़ी उठाई और उंकड़ू बैठने का सीन किया। एेसा करने में आत्‍मा ठेस पहुंचती है। उन्‍होंने बताया कि मैं तो एक्टिंग कर रही थी तो इतनी शर्म आई। जो औरतें वास्‍त में खुले में शौच करती हैं,उन पर रोजाना क्‍या गुजरती होगी? उन्‍हें कितनी ठेस लगती होगी। वह पावरफुल एक्‍टर हैं।
-आप की फिल्‍म पर कोर्ट केस हुआ है कि कंटेंट में समानता है...
0 मामला अभी कोर्ट में है। देखिए,कोर्ट क्‍या फैसला सुनाती है। सही निर्णय आएगा। मुझे नहीं लगता कि ऐसा कुछ होगा।
-राकेश ओमप्रकाश भी इसी विषय पर मेरे प्‍यारे प्रधानमंत्री लेकर आ रहे हैं...
0 अच्‍छा है। और भी लोग आएं। हमारी तो लव स्‍टोरी है,इसीलिए इसका टाइटिल टॉयलेट एक प्रेम कथा है।


Saturday, August 5, 2017

फिल्‍म समीक्षा : जब हैरी मेट सेजल



फिल्‍म रिव्‍यू
मुकम्‍मल सफर
जब हैरी मेट सेजल
-अजय ब्रह्मात्‍मज
इम्तियाज अली की फिल्‍मों का कथ्‍य इरशाद कामिल के शब्‍दों में व्‍यक्‍त होता है। उनकी हर फिल्‍म में जो अव्‍यक्‍त और अस्‍पष्‍ट है,उसे इरशाद कामिल के गीतों में अभिव्‍यक्ति और स्‍पष्‍टता मिलती है। फिल्‍मों में सगीत और दृश्‍यों के बीच पॉपुलर स्टारों की मौजूदगी से गीत के बालों पर ध्‍यान नहीं जाता। हम दृश्‍यों और प्रसंगों में तालमेल बिठा कर किरदारों को समझने की कोशिश करते रहते हैं,जबकि इरशाद इम्तियाज के अपेक्षित भाव को शब्‍दों में रख चुके होते हैं। जब हैरी मेट सेजल के पहले गीत में ही हरिन्‍दर सिंह नेहरा उर्फ हैरी अपने बारे में कहता है ...
मैं तो लमहों में जीता
चला जा रहा हूं
मैं कहां पे जा रहा हूं
कहां हूं?
..............
...............
जब से गांव से मैं शहर हुआ
इतना कड़वा हो गया कि जहर हुआ
इधर का ही हूं ना उधर का रहा

सालों पहले पंजाब के गांवों से यूरोप पहुंचा हैरी निहायत अकेला और यादों में जीता व्‍यक्ति है। कुछ है जो उसे लौटने नहीं दे रहा और उसे लगातार खाली करता जा रहा है। उसका कोई स्‍थायी ठिकाना नहीं है। लमहों में जी रहे हैरी को वास्‍तव में खुद की और उस हमसफर की तलाश है,जो उसकी कमियों को खत्‍म कर दे। उसे मुकम्‍मल करे और उसके साथ रहे। इम्तियाल अली की अन्‍य फिल्‍मों की तरह पूर्णता की तलाश में आधे-अधूरे किरदारों का सफर जब हैरी मेट सेजल में भी जारी है। विपरीत सोच और जीवन शैली के दो व्‍यक्तियों का परस्‍पर विकर्षण ही सोहबत से आकर्षण में बदलता है। वे एक-दूसरे के पूरक बनते हैं। इम्तियाज अली ने इस बार उन्‍हें पंजाब का हैरी और मुंबई की सेजल का नाम दिया है। उनके सफर के लिए यूरोप के छह देश चुने हैं। सुंदर वादियों में वादों-विवादों के साथ वे निकट आते हैं। एक-दूसरे को महसूस करते हैं। और फिर साथ होने का यत्‍न करते हैं।
भाव और कथ्‍य के स्‍तर पर किरदारों का यह सफर हमें विचलित करता है। अपनी हरकतों और रवैयों से वे रोचक भी लगते हैं। दोनों का झुकाव अनायास नहीं है। परिस्थितियों ऐसी बनती हैं कि वे करीब आते हैं। यों सेजल की पहल और आक्रामकता बनावटी लगती है। वह अपनी कोशिशों से हैरी को जताना चाहती है कि वह उसकी दूसरी चहेती लड़कियों की तरह हॉट और आकर्षक है। वह सफल भी होती है। इसके बावजूद हैरी की नजर में वह कुछ अलग और गैरमामूली है,क्‍योंकि वह उसे समझने लगी है। उसके छिपाए जख्‍मों को उसने देख लिया है। जब हैरी मेट सेजल संयेग से हमसफर बने दो किरदारों की सेल्‍फ डिस्‍कवरी है। इस डिस्‍कवरी में वे खुद बदलते हैं और दूसरे के बदलाव का कारण बनते हैं।
इम्तियाल अली की खूबी है कि वे अपनी कथा और किरदारों के लिए नयनाभिरामी लोकेशन चुनते हैं। इस फिल्‍म में तो हम हैरी और सेजल के साथ छह देशों की यात्रा करते हैं। वहां की गलियों ,कैफे और पब से परिचित होते हैं। उन देशों और शहरों के बारे में हमें कुछ और जानकारियां भी मिलती है। इम्तियाज अली गयाशुद्दीन उर्फ गैस के बहाने थोड़ी देर के लिए अपनी कहानी से अलग होते हैं। फिल्‍म का यह गैरजरूरी हिस्‍सा लगता है। बहरहाल,कहानी फिर से हैरी और सेजल को लकर आगे बढ़ती है।
शाह रूख खान पंजाब के हैरी और अनुष्‍का शर्मा मुंबई की सेजल हैं। पंजाब की पृष्‍ठभूमि के हैरी जैसे अनेक किरदार हम ने हिंदी फिल्‍मों में देखे हैं। की है। मुंबई की गुजराती लड़की सेजल बनाने के लिए अनुष्‍का शर्मा को गुजराती लहजा दिया गया है। कुछ शब्‍दों के उच्‍चारण और लहजे में वह सचेत रहती हैं। और कभी भूल भी जाती हैं। अगर सेजल सहज हिंदी बोलती तो क्‍या उसमें कोई कमी रह जाती? नहीं,बल्कि अनुष्‍का शर्मा अपने किरदार के प्रति अतिरिक्‍त सावधान नहीं रहतीं। अधिक स्‍वाभाविक लगतीं। शाह रूख खान और अनुष्‍का शर्मा के बीच की केमिस्‍ट्री वर्क करती है। दोनों अच्‍छे लगे हैं। उन्‍हें कुछ दृश्‍य भी मिले हैं,जहां नाच-गाने और रेगुलर एक्टिविटी से ऊपर उठ कर अभिनय कौशल दिखाने का मौका मिला है। उन दृश्‍यों में दोनों ने कमाल की दक्षता जाहिर की है। दिक्‍कत यही है कि वे दृश्‍य टांके हुए लगते हैं। अगर पूरी फिल्‍म में उनके लिए ऐसे अवसर होते तो यह फिल्‍म ज्‍यादा प्रभावित करती। और हां,हैरी अगर सफर में ही रहता तो अधिक वास्‍तविक लगता।
फिल्‍म में गीत-संगीत की पर जोर है। इरशाद कामिल और प्रीतम ने निर्देशक की मांग पूरी की है। इरशाद कामिल और इम्तियाज अली की जोड़ी बेहतर गीतों पर ध्‍यान देती है। कुछ गीत अनावश्‍यक लगे हैं।
अवधि 144 मिनट
*** तीन स्‍टार    

रोज़ाना : दर्शकों तक नहीं पहुंचती छोटी फिल्‍में



रोज़ाना
दर्शकों तक नहीं पहुंचती छोटी फिल्‍में
-अजय ब्रह्मात्‍मज
बड़े बिजनेश के लोभ में बड़ी फिल्‍मों को बड़ी रिलीज मिलती है। यह दस्‍तूर पुराना है। सिंगल स्‍क्रीन के जमाने में एक ही शहर के अनेक सिनेमाघरों में पॉपुलर फिल्‍में लगाने का चलन था। फिर स्‍टेशन,बस स्‍टेशन और बाजार के पास के सिनेमाघरों में वे फिल्‍म हफ्तों चलती थीं। दूसरे सिनेमा घरों में दूसरी फिल्‍मों को मौका मिल जाता थो। सिंगल स्‍क्रीन में भी सुबह के शो पैरेलल,अंग्रेजी या साउथ की डब फिल्‍मों के लिए सुरक्षित रहते थे। कम में ही गुजारा करने के भारतीय समाज के दर्शन से फिल्‍मों का प्रदर्शन भी प्रेरित था। हर तरह की नई और कभी-कभी पुरानी फिल्‍मों को भी सिनेमाघर मिल जाते थे। तब फर्स्‍ट डे फर्स्‍ट शो या पहले वीकएंड में ही फिल्‍में देखने की हड़बड़ी नहीं रहती थी। छोटी फिल्‍में हफ्तों क्‍या महीनों बाद भी आती थीं तो दर्शक मिल जाते थे।
मल्‍टीप्‍लेक्‍स आने के बाद ऐसा लगा था कि छोटी फिल्‍मों को प्रदर्शन का स्‍पेस मिल जाएगा। शुरू में ऐसा हुआ भी,लेकिन धीरे-धीरे ज्‍यादा कमाई के लिए मल्‍टीप्‍लेक्‍स मैनेजर बड़ी फिल्‍मों को ज्‍यादा शो देने लगे और छोटी फिल्‍मों के शो को टरकाने लगे। शो लगाना पड़ा तो समय ऐसा रखा कि दर्शकों को अलग से समय निकालना पड़े। उन्‍हें प्राइम टाइम नहीं दिया। मल्‍टीप्‍लेक्‍स के इस रवैए की वजह से ही महाराष्‍ट्र में अध्‍यादेश जारी करना पड़ा कि मराठी फिल्‍मों को मल्‍टीप्‍लेक्‍स में प्राइम टाइम के शो मिलें। सभी जानते हैं कि इस कदम से मराठी फिल्‍मों के दर्शक बढ़ हैं और आखिरकार आमदनी बढ़ी है।
हिंदी की छोटी फिल्‍मों के लिए प्रदर्शन की सहूलियतें नहीं बढ़ रही हैं। उन्‍हें वितरक और प्रदर्शक नहीं मिल पाते। ऐसी अनेक फिल्‍में होती हैं,जिन्‍हें देखने से दर्शक वंचित रह जाते हैं। इसी हफ्ते की गुड़गांव को देख लें। शंकर रमन की यह उच्‍च्‍ क्‍वालिटी की फिल्‍म को पर्याप्‍त शो और थिएटर नहीं मिले हैं। यह फिल्‍म पटना जैसे कथित छोटे शहर में नहीं पहुंची है। संचार माध्‍यमों के प्रसार और इंटरनेट के इस दौर में पूरे देश को क्‍वालिटी फिल्‍म की जानकारी दर्शकों को मिल जाती है। वे भी अपने शहर में ऐसी फिल्‍मों का इंतजार करते हैं,लेकिन प्रदर्शक सालों पुरानी धारणा के मुताबिक तय करता है कि किस तरह के दर्शक कैसी फिल्‍म में रुचि लेते हैं? उन्‍होंने ऐसा कोई सर्वे या अध्‍ययन नहीं किया है। बस,मान लिया गया है कि गुड़गांव तो मैट्रो के खास दर्शक ही देखेंगे। नतीजा यह हो रहा है कि छोटी फिल्‍में छोटे शहरों में नहीं पहुंच पा रही हैं।  

Friday, August 4, 2017

दरअसल : खानत्रयी का आखिरी रोमांटिक हीरो



दरअसल....
खानत्रयी का आखिरी रोमांटिक हीरो
-अजय ब्रह्मात्‍मज
दोनों पैरों के बीच खास दूरी बना कर ऐंठते हुए वे जब अपनी बांहों को फैला कर ऊपर की ओर उठाते हैं तो यों लगता है कि वे पूरी दुनिया को उसमें समोने के लिए आतुर है। उनका यह रोमांटिक अंदाज ै।इतना पॉपुलर है कि कोई भी निर्देशक इसे दोहराने से नहीं बचता। शाह रूख खान भी सहर्ष तैयार हो जाते हैं। अब तो इवेंट और शो में भी उनसे फरमाईश होती है कि इस क्‍लासिक रोमांटिक अंदाज में वे अपनी तस्‍वीर उतारने दें। गौर करेंगे इस पोज में वे दायीं तरफ देख रहे होते हैं और कैमरा भी दायीं तरफ ही रहता हैं। उनके होंठो पर आकर्षक टेढ़ी मुस्‍कान रहती है। वे खुली बांहों से सभी को निमंत्रण दे रहे होते हैं। अब तो उनकी मिमिक्री कर रहे कलाकार भी उनके इस अंदाज से वाहवाही बटोर लेते हैं।
आज रिलीज हो रही जब हैरी मेट सेजल में इम्तियाज अली ने अगर उनके इस अंदाज को दोहराया होगा तो कोई जुर्म नहीं किया होगा। दर्शक तो मुग्‍ध ही होंगे। जब हैरी मेट सेजल रोमांटिक फिल्‍म होने का अहसास दे रही है। वैसे भी शाह रुख खान कह ही चुके हैं कि इम्तियाज अली नए जमाने के यश चोपड़ा हैं। स्‍टार ने डायरेक्‍टर को सर्टिफिकेट दिया। और डायरेक्‍टर ने फिर से स्‍टार को रोमांटिक किरदार दिया। अब देखना है कि इस किरदार को देख कर दर्शक कितने खुश होंगे और प्रशंसक पागल... खानत्रयी(आमिर,शाह रुख और सलमान) में अब अकेले शाह रुख खान ही रोमांटिक लीड कर रहे हैं। अपनी हीरोइनों के लिए रोमांटिक गाने गा रहे हैं। रईस जैसी फिल्‍म में भी जालिमा का सीक्‍वेंस फिट कर दिया। हालांकि उसकी वजह से फिल्‍म फिसल गई। बहरहाल,जब हैरी मेट सेजल में ऐसी फिसलन की संभावना नहीं है। इम्तियाज और शाह रूख दोनों ही पूरे कंफीडेंट दिख रहे हैं।
आमिर खान ने सन् 2000 के बाद से ही अपनी राह बदल ली। बीच की कुछ फिल्‍मों में वे रोमांस करते दिखे,लेकिन उन्‍हें प्‍योर रोमांटिक फिल्‍में नहीं कहा जा सकता। आमिर खान ने अपनी सीमाओं को वक्‍त से पहचान नलया और समय रहते दिशा बदल दी। अपनी अपारंपरिक फिल्‍मों से उन्‍होंने साबित किया कि दर्शकों की नब्‍ज पर उनका हाथ है। उनकी पिछली फिल्‍में निरंतर कीर्तिमान स्‍थपित कर रही हैं। पिछली फिल्‍म दंगल की कामयाबी ने तो नया मानदंड तय कर दिया। सलमान खान भी पहले की तरह रोमांटिक और कॉमेडी फिल्‍में नहीं कर रहे हैं। कबीर खान के निदेशन में आई उनकी बजरंबी भाईजान और ट्यूबलाइट वे भी बदलने को तैयार हैं। उनकी पारंपरिक फिल्‍मों में भी रोमांस का प्रतिशत लगातार कम होता जा रहा है। निकट भविष्‍य में आ रही उनकी फिल्‍मों में रोमांस की उम्‍मीद नहीं दिखती। यों अप्रत्‍याशित व्‍यवहार और पहल के लिए मशहूर सलमान खान के बारे में स्‍पष्‍ट रा नहीं बनाई जा सकती। फिर भी सलमान खान अपने एक प्रतिद्वंद्वी शाह रूख खान की राह पर लौटते नहीं दिखाई दे रहे।
सचमुच,शाह रूख खान खानत्रयी के आखिरी रोमांटिक हीरो रह गए हैं। कहा तो जा रहा है कि वे अपनी रोमांटिक इमेज में कैद हो गए हैं। कुंदन शाह की राय में शाह रूख खान दुखी और उदास किरदारों में अधिक जंचते,लेकिन कभी हां,कभी ना की हद से वे निकल गए। रोमांटिक हीरो बने। अब उन्‍हें जल्‍दी ही खुद को रीइन्‍वेंट करना चाहिए। वर्ना उनकी गति पिछली सदी के अंतिम दशक के अमिताभ बच्‍चन जैसी हो सकती है। दर्शक उन्‍हें रिजेक्‍ट कर सकते हैं। उनकी पिछली फिल्‍मों की कम कामयाबी संकेत दे रही है। फिलहाल आमिर और सलमान से वे फिल्‍मों के बिजनेश के मामले में पिछड़ गए हैं। यह भी जाहिर है कि इस से उनके स्‍टारडम में अधिक फर्क नहीं पड़ा है। फिर भी जब हैरी मेट सेजल जरूरी चमत्‍कार उसे उन्‍हें आमिर खान और सलमान खान के समकक्ष ला सकती है।

जिंदगी और साहित्‍य के अनुभव हैं मेरी फिल्‍मों में –इम्तियाज अली



जिंदगी और साहित्‍य के अनुभव हैं मेरी फिल्‍मों में इम्तियाज अली
-अजय ब्रह्मात्‍मज
इम्तियाज़ अली अपनी नई फिल्म के साथ प्रस्तुत हैं।इस बार वे शाहरुख खान और अनुष्का शर्मा के साथ 'जब हैरी मेट सेजल' लेकर आ रहे हैं। रोमांस और प्रेम की फिल्मों से 21वीं सदी में खास पहचान बना चुके इम्तियाज़ इस बार कुछ अलग अंदाज़ में अपनी खोज के साथ मौजूद हैं। हमारी सीधी बातचीत फ़िल्म के बारे में...
- बताएं 'जब हैरी मेट सेजल' क्या है?
0 यह सफर की कहानी है।कहानी बहुत सिंपल है। बहुत सीधी और थीं लाइन है। हैरी (शाह रुख खान) यूरोप में ट्रेवल गाइड है। वह पंजाब का मूल निवासी है,लेकिन पिछले कई सालों से यूरोप में है। वह टूर गाइड है। पिछले टूर की एक लड़की उनके पास वापस आती है। उसकी अंगूठी खे गई है। अंगूठी ढूंढने में वह हैरी की मदद चाहती है। हैरी हैरान भी होता है कि मैं कैसे मदद कर सकता हूं। वह कहती है कि आप ही ले गए थे। आप को मालूम है कि हम कहां-कहां गए थे। अंगूठी की खोज में दोनों की बाहरी और अंदरूनी जर्नी पर है यह फिल्‍म। वे खुद के बारे में क्‍या डिस्‍कवर करते हैं और इनका रिश्‍ता कहां से कहां तक पहुंचता है। यही कहानी है।
- आप की हर फिल्‍म में जर्नी होती है। वह अभी तक पूरी नहीं हो पाई है। क्‍या खोज रहे हैं आप? कहां पहुंचना है?
0 हां,मुझे लगता है कि खोज तो है। मेरी फिल्‍मों में किरदार बहुत ट्रैवल करते हैं। ट्रैवल में उन्‍हें कुछ नई चीजें पता चलती हैं। कोई नई संभावना अपने अंदर नजर आती है। मेरी निजी जिंदगी में ऐसा ही होता है। मैं किसी एक खास चीज की तलाश में नही हूं1 कोई जवाब खोज रहा हूं। हां,ऐसा लगता है कि मैं भी कुछ खोज रहा हूं। किसी चीज के नजदीक पहुंचने की कोशिश कर रहा हूं। वह सफर और डिस्‍कवरी जारी है किरदारों के माध्‍यम से।
- रणबीर कपूर को छोड़ दें तो आप के एक्‍टर की उम्र बढ़ती जा रही है और उनका स्‍टारडम भी बढ़ता जा रहा है। क्‍या कारण हैं?
0 यह सवाल महत्‍वपूर्ण है। इस दौरान मेरी उम्र बढ़ी है और तर्जुबा बढ़ा है1 जिन कहानियों से उम्र की वजह से अपरिचित था,उनसे अभी वकफियत हुई। जब हैरी मेट सेजल में शाह रूख खान टीनएजर का रोल नहीं कर रहे हैं1 वे उस उम्र के हैं,जिसे मैं नजदीक से देख पा रहा हूं1 पहले मैं ऐसी कहानियां नहीं लिख सकता था।
- कुछ फिल्‍मकारों की प्रेमकहानियां में जिंदगी से अनुभूत प्रेम के साथ सिनेमा में विकसित प्रेम का भी प्रभाव रहता है। आप पर यह प्रभाव है क्‍या?
0 मैं ढेर सारी फिल्‍में देखता हूं और बहुत कम फिल्‍में बनाता हूं। मैं प्रेम की अलग-अलग फिल्‍में देखता हूं। फिल्‍मों से मिले प्रेम के अनुभव मेरी फिल्‍मों में साथ नहीं आते। फिल्‍मों के अनुभव कभी नहीं लाता। जिंदगी और साहित्‍य के अनुभव जरूर फिल्‍मों में रिफ्लेक्‍ट हुए हैं1 अर्नेस्‍ट हेमिंग्‍वे के व्‍यक्तित्‍व का कोई हिस्‍सा कभी मेरे किसी पात्र में दिख जाए। शेक्‍सपरयर की स्‍टोरीटेलिंग स्‍टाइल की झलक मिले1 ल्‍लव आज कल में यह असर है। हां,फिल्‍मों की ढेर सारी चीजें अपनी जिंदगी में करता पाता हूं1 फिल्‍मों में कभी नहीं लाता।
- एक फिल्‍मकार ने कहा कि आजकल के एक्‍टर इमोशन होल्‍ड नहीं कर पाते,इसलिए हम लंबे और गहरे सान नहीं लिखते। आप का अनुभव...
0 मैं असहमत हूं। मैं नहीं मानता कि आज के एक्‍टर उतने रोमांटिक या गहरे नहीं हैं। वे इमोश होल्‍ड कर सकते हैं। रोमांस का नकाब अभी हट चुका है। पहले बाहर की एक ताकत के बरक्‍स मोहब्‍बत आंकी जाती थी। अब दो प्रमियों के बीच कोई और दीवार नहीं होता। प्रेमी-प्रेमिका अपने अंदर की चीजों से ही जूझ रहे होते हैं। फिल्‍टर हट चुका है। आज के युवा ज्‍यादा महसूस करते हैं। नेचर ऑफ डिजायर नहीं बदला है। रोमांस में मिलावट कम हो गई है। आज इंतजार और अकेलापन ज्‍यादा है,इसलिए रोमांस गाढ़ा और जोशीला है। साथ रहने की इच्‍छा ज्‍यादा है।
-कलाकारों के बीच की समझदारी रोमांस के चित्रण में कितनी मदद करती है। और किन कलाकारों में यह जल्‍दी और सधन रूप में दिखा?
0 कलाकारों या किरदारों के बीच की केमिस्‍ट्री राइटिंग से उभरती है। एक्‍टर से नहीं आती है। रणबीर कपूर और दीपिका पादुकोण का उदाहरण लें। शाह रूख और अनुष्‍का की केमिस्‍ट्री का डिफरेंस उनके किरदारों की वजह से आएगा1 शाह रूख और अनुष्‍का की पर्सनैलिटी अलग है। उस वजह से उनकी केमिस्‍ट्री अच्‍छी लगती है। दीपिका और रणबीर की परस्‍पर समझ बहुत अच्‍छी है।
- उत्‍तर भारत के दर्शकों के लिए कोई संदेश ?
0 ओपन माइंड से यह फिल्‍म न देखें1 किसी पूर्वाग्रह के साथ नहीं आएंगे तो ज्‍यादा एंज्‍वॉय करेंगे। यह सिंपल फिल्‍म है।