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Sunday, August 20, 2017

फिल्‍म समीक्षा : वीआईपी 2



फिल्‍म रिव्‍यू
प्रतिभाओं का दुरुपयोग
वीआईपी2
-अजय ब्रह्मात्‍म्‍ज
सौंदर्या रजनीकांत निर्देशित वीआईपी2 शायद रजनीकांत के वारिस की खोज है। परिवार के ही एक सदस्‍य धनुष को रजनीकांत की तरह की फिल्‍म में लाकर यही कोशिश की गई है। अफसोस धनुष में रजनीकांत की अदा और करिश्‍मा नहीं है। फिल्‍म में जब वे मुस्‍टंडे गुंडों को धराशायी करते हैं तो वह हंसी आती है। इसी प्रकार कैरेक्‍अर के लिए खास मैनरिज्‍म दिखाने में भी वे संघर्ष करते नजर आते हैं।
कह सकते हैं कि तमिल की मेनस्‍ट्रीम पॉपुलर शैली में बनी यह फिल्‍म हिंदी दर्शकों को वहां की फिल्‍मों की गलत छवि देगी। रजनीकांत की फिल्‍में इतनी लचर और स्‍तरहीन नहीं होतीं। उनकी खास शैली होती है,जिसे उन्‍होंने सालों की मेहनत और दर्शकों के प्रेम से हासिल किया है। धनुष अलग श्रेणी के अभिनेता हैं। उन्‍हें इस सांचे में ढालने में सौंदर्या रजनीकांत पूरी तरह से असफल रही हैं।
रघुवरण ईमानदार इंजीनियर है। कर्मठ और जमीर का पक्‍का रघुवरण कभी कोई गलत काम नहीं कर सकता। अपनी प्रतिभा से वह किसी को भी ललकार सकता है। संयोग से इस बार उसे वसुंधरा का सामना करना पड़ता है। वसुंधरा ने भी अपनी मेहनत,लगन और जिद से कंपनी खंड़ी की है। कामयाबी ने उसे अकड़ दी है। उसे बर्दाश्‍त नहीं होता कि एक साधारण इंजीनियर उसके ऑफर को ठुकरा दे। उसके लिए यह अहं की लड़ाई है तो रघुवरण अपने सिद्धांतो से डिगने के लिए तैयार नहीं है। इस मुठभेड़ में दोनों का नुकसान होता है। फिल्‍म का क्‍लाइमेक्‍स नाटकीय है। दोनों जब व्‍यक्ति के तौर पर मिलते हैं तो उन्‍हें लगता है कि वे मिजाज और सोच में एक से हैं।
ऐसी फिल्‍में हिंदी में भी बनती रही हैं,जिसमें किसी जिद्दी और अहंकार में नकचढ़ी नायिका को सीधा-सादा और ईमानदार नायक सही रोस्‍ते पर ले आता है। सही रास्‍ते का निर्णय नायक का होता है। इस फिलम की निर्देशक महिला हैं। उन्‍हें ऐसे घिसे-पिटे विषय से गेचैनी नहीं हुई। इतना ही नहीं फिल्‍म में औरतों और बीवियों के बारे में भद्दी टिप्‍पणियां की गई हैं। हंसाने के लिए महिलाविरोधी ऐसी टिप्‍पणियों का इस्‍तेमाल हिंदी फिल्‍मों में आम था।
धनुष और काजोल की प्रतिभा का दुरूपयोग करती वीआईपी2 अत्‍यंत साधारण फिल्‍म है।
अवधि- 129 मिनट
डेढ़ स्‍टार *1/2

फिल्‍म समीक्षा : बरेली की बर्फी



फिल्‍म समीक्षा
बदली है रिश्‍तों की मिठास
बरेली की बर्फी
-अजय ब्रह्मात्‍मज
शहर बरेली,मोहल्‍ला- एकता नगर, मिश्रा सदन,पिता नरोत्‍तम मिश्रा,माता- सुशीला मिश्रा।
नरोत्‍तम मिश्रा का बेटा और सुशीला मिश्रा की बेटी बिट्टी मिश्रा। पिता ने बेटे की तरह पाला और माता ने बेटी की सीमाओं में रखना चाहा। बिट्टी खुले मिजाज की बरेली की लड़की है। अपने शहर में मिसफिट है। यही वजह है कि उसे लड़के रिजेक्‍ट कर के चले जाते हैं। मसलनृएक लड़के ने पूछ लिया कि आप वर्जिन हैं ना? तो उसने पलट कर उनसे यही सवाल कर दिया। लड़का बिदक गया। दो बार सगाई टूट चुकी है। माता-पिता की नजरों और परेशानी से बचने का उसे आसान रास्‍ता दिखता है कि वह घर छोड़ दे। भागती है,लेकिन ट्रेन के इंतजार में करेली की बर्फी उपन्‍यास पढ़ते हुए लगता कि उपन्‍यास की नायिका बबली तो हूबहू वही है। आखिर उपन्‍यासकार प्रीतम विद्रोही उसके बारे में कैसे इतना जानते हैं? वह प्रीतम विद्रोही से मिलने की गरज से घर लौट आती है।
बरेली की बर्फी उपन्‍यास का भी एक किससा है। उसके बारे में बताना उचित नहीं होगा। संक्षेप में चिराग पांडे(आयुष्‍मान खुराना) ने अपनी प्रमिका की याद में वह उपन्‍यास लिख है। पहचान और पकड़े जाने के डर से किताब पर उन्‍होंने अपने दब्‍बू दोस्‍त प्रीतम विद्रोही का नाम छाप दिया...तस्‍वीर भी। बेचारे प्रीतम की ऐसी धुनाई हुई कि उन्‍हें अपना शहर छोड़ना पड़ा। उधर बिट्टी प्रीतम को खोजते-खोजत चिराग से टकरा गई। दिलजले आशिक का दिल बिट्टी पर आ गया,लेकिन बिट्टी तो प्रीतम प्‍यारे की तलाश में थी।
बरेली जैसे शहर के ये किरदार भारत के किसी और शहर में कमोबेश इसी रंग में मिल सकते हैं। फिल्‍म के लेखक नितेश तिवारी ने किरदारों को सही सीन और प्रसंग दिए हैं। उन्‍हें विश्‍वसनीय बनाया है और उन्‍हें उपयुक्‍त संवाद दिए हैं। चरित्रों को गढ़ने में वे पारंगत हैं। उन्‍होंने किरदारों की छोटी-छोटी हरकतों और बातों से इसे सिद्ध किया है। नितेश मिवारी की स्क्रिप्‍ट का समुचित फिल्‍मांकन किया है अश्विनी अरूयर तिवारी ने। और उन्‍हें कलाकारों का भरपूर सहयोग मिला है। परिचित कलाकारों के साथ कुछ अनजान कलाकार भी दिखे हैं। अनजान कलाकार प्रतिभाशाली हो और किरदार के अनुरूप उनकी कास्टिंग हुई हो तो फिल्‍म निखर जाती है। चिराग पांडे के दोस्‍त और प्रीतम विद्रोही की मां सबूत हैं। दोनों कलाकार जंचे हैं। वे याद रह जाते हैं।
इस फिल्‍म की खूबसूरती इसका परिवेश है। वह खूबसूरती गाड़ी हो जाती अगर किसी भी रेफरेंस से फिल्‍म के समय की जानकारी मिल जाती। मुमकिन है नितेश तिवारी ऐसे रेफरेंस से बचे हों। बहरहाल,फिल्‍म के संवाद देशज और कस्‍बाई हैं। किरदारों की चिंताएं,मुश्किलें और उम्‍मीदें देसी दर्शकों की परिचत हैं। बिट्टी जैसी लड़कियां छोटे शहरों में बड़ी तादाद में उभरी हैं। शहर और मध्‍यवर्ग की मर्यादाओं को तोड़ती ये लड़कियां महानगरीय दर्शकों को चिचित्र लग सकती हैं। उनके व्‍यवहार और रिश्‍तों की जटिलताओं के साथ उनकी आकांक्षाओं को हमें शहर के परिवेश के दायरे में ही देखना होगा। नितेश तिवारी और अश्विनी अरूयर तिवारी ने कुछ छूटें ली हैं। उन्‍हें किरदारों को मजबूत बनाने के लिए ऐसा करना पड़ है।
पंकज त्रिपाठी और सीमा पाहवा फिल्‍म के आधार किरदार हैं। दोनों ने बिट्टी को वर्तमान व्‍यक्तित्‍व दिया है। उनसे मिली आजादी और हद में ही बिट्टी खिली है। छोटे शहर के बाप-बेटी के बीच का ऐसा रिश्‍ता हिंदी फिल्‍मों में नहीं दिखा है। कृति सैनन ने बिट्टी के जज्‍बात को आत्‍मसात किया है। अभिनय के स्‍तर पर निर्देशक और कोएक्‍टर के सान्निध्‍य में उन्‍होंने कुछ नया किया है। अगर उनके लुक पर थोड़ा काम किया जाता तो और बेहतर होता। आयुष्‍मान खुराना अपने किरदार में हैं। चिराग पांडे को उन्‍होंने उसके संकोच,सोच और दुविधाओं के साथ पर्दे पर उतारा है। वहीं राजकुमार राव दब्‍बू प्रीतम विद्रोही की भूमिका में सही लगे हैं। उन्‍हें इस फिल्‍म में रंग बदलने के मौके मिले हैं। उन्‍होंने हर रंग की छटा बिखेरी है।
अवधि-122 मिनट
साढ़े तीन स्‍टार ***1/2

रोज़ाना : आयटम नंबर की लोकप्रियता


रोज़ाना
आयटम नंबर की लोकप्रियता
-अजय ब्रह्मात्‍मज

फिल्‍म इंडस्‍ट्री में माना जाता है कि गुरु दत्‍त निर्देशित आर पार में शकीला पर फिल्‍मांकित बाबूजी धीरे चलना हिंदी सिनेमा का पहला आयटम नंबर है। यह फिल्‍म 1954 में आई थी। गीत मजरूह सुल्‍तानपुरी ने लिखे थे,जिसे आपी नरूयर ने संगीत से संवारा था। उसके बाद वैजयंती माला ने अपन ही फिल्‍मों में कुछ ऐसे डांस नंबर किए,जिन्‍हें आयटम नंबर कहा जा सकता है। हम अभी आयटम नंबर को जिस रूप और अर्थ में जानते हैं,उसकी शुरुआत हावड़ा ब्रिज के गीत मेरा नाम चिन चिन चू से होती है। हेलन ने अपनी नृत्‍य प्रतिभा और चपल बंग संचालन से अयटम नंबर को एक कल्‍ट बना दिया। मदमस्‍त संगीत के बीट पर उन्‍हें पर्दे पर लहराते देखना अनोख व रोमांचक अनुभव होता था। कस्‍बों के सिनेमाघरों में उनकी फिल्‍में लगती थीं तो रिक्‍शे पर प्रचार के लिए निकले उद्घोषक यह बताना नहीं भूलते थे कि इसमें हेलन का डांस है। तब सिनेमा के शौकीनों की मांग पर डांस नंबर दो बार भी दिखा दिए जाते थे।
डांस नंबर कहें या आयटम नंबर...दर्शकों की ललक हमेशा ऐसे गीत-नृत्‍य की ओर रही है। नौटंकी के दिनों में भी यह परंपरा थी। नाटक के बीच में राहत के लिए नर्तकियां के डांस नंबर और विदूषकों के हंसी-मजाक रखे जाते थे। उन्‍हें ही हिंदी फिल्‍मों ने अपनाया। हंसी-मजाक यानी कामेडी के पैरेलल ट्रैक तो अभी बंद हो गए हैं,लेकिन बाजार की जरूरत और खपत के कारण आयटम नंबर की मांग बड़ गई है।
पहले साल में बमुश्किल दो-तीन फिल्‍मों में ही आयटम नंबर होते थे। अभी उनकी मांग बढ़ गई है। ऐसा नहीं है कि केवल बी या सी ग्रेड की फिल्‍मों में आयटम नंबर होते हैं। अभी तो ए ग्रेड की फिल्‍मों में भी आयटम नंबर रखे जाते हैं। मेनस्‍ट्रीम की पॉपुलर हीरोइनें भी आयटम नंबर करने में नहीं हिचकतीं। हां,मशहूर और अनुभवी निर्देशक की फिल्‍मों में आयटम नंबर के इस्‍तेमाल में सौंदर्यबोध और सुरुचि का खयाल रखा जाता है। बाकी फिल्‍मों में ज्‍यादातर आयटम नंबर दर्शकों की उत्‍तेजना के लिए होते हें। इन फिल्‍मों के निर्माता-निर्देशक मानते हैं कि आयटम नंबर की वजह से उनके दर्शक बढ़ जाते हैं।
इन दिनों दस में से एक फिल्‍म में आयटम नंबर तो रहता ही है। 2016 में लगभीग डेढ़ दर्जन फिल्‍मों में आयटम नंबर थे।आयटम नंबर के लिए सनी लियोनी सबसे उपयुक्‍त मानी जाती हैं। उसकी खास वजहें हें। शाह रुख खान की फिल्‍म रईस में लैला ओ लैला की धुनों पर नाचती सनी लियोनी को देखने दर्शक आए। आजकल फिल्‍म के प्रमोशन में भी आयटम नंबर का इस्‍तेमाल किया जाता है।



Friday, August 18, 2017

फिल्‍म समीक्षा : पार्टीशन 1947



फिल्‍म रिव्‍यू
पार्टीशन 1947
-अजय ब्रह्मात्‍मज
देश के बंटवारे का जख्‍म अभी तक भरा नहीं है। 70 सालों के बाद भी वह रिस रहा है। भारत,पाकिस्‍तान और बांग्‍लादेश बंटवारे के प्रभाव से निकल ही नहीं पाए हैं। पश्चिम में द्वितीय विश्‍वयुद्ध और अन्‍य ऐतिहासिक और राजनीतिक घटनाओं पर फिल्‍में बनती रही हैं। अपने देश में कम फिल्‍मकारों ने इस पर ध्‍यान दिया। गर्म हवा और पिंजर जैसी कुछ फिल्‍मों में बंटवारे और विस्‍थापन से प्रभावित आम किरदारों की कहानियां ही देखने को मिलती हैं। गुरिंदर चड्ढा की फिल्‍म का नाम ही पार्टीशन 1947 है। भारत में नियुक्‍त ब्रिटेन के अंतिम वायसराय लार्ड माउंटबेटेन के दृष्टिकोण से चित्रित इस फिल्‍म में ऐतिहासिक दस्‍तावेजों का भी सहारा लिया गया है। कुछ दस्‍तावेज तो हाल के सालों में सामने आए हैं। उनकी पृष्‍ठभूमि में बंटवारे का परिदृश्‍य ही बदल जाता है।
गुरिंदर चड्ढा ने लार्ड माउंटबेटेन और उनके परिवार के सदस्‍यों के साथ आलिया और जीत की प्रेमकहानी भी रखी है। यह फिल्‍म दो स्‍तरों पर साथ-साथ चलती है। 1947 में आजादी के ठीक पहले चल रही राजनीतिक गतिविधियों के बीच दो सामान्‍य किरदारों(हिंदू लड़का,मुस्लिम लड़की) की मौजूदगी फिल्‍म को आवश्‍यक विस्‍तार देती है। दिक्‍कत यह है कि गुरिंदर दोनों कहानियों के बीच अपेक्षित तालमेल नहीं बिठा पातीं। दूसरे,उन्‍होंने ऐतिहासिक किरदारों के अनुरूप कलाकार नहीं चुने हैं। चुने गए कलाकार अधिक मेहनत करते भी नहीं दिखते। केवल जिन्‍ना के रूप में डेंजिल स्मिथ अपने किरदार में दिखते हैं। नीरज कबी जैसे समर्थ अभिनेता भी बापू की भूमिका में चूक गए हैं। नेहरू,पटेल और अन्‍य नेताओं के चरित्रांकन पर ध्‍यान नहीं दिया गया है। माउंटबेटेन और उनके परिवार के सदस्‍यों के रूप में दिख रहे कलाकार फिर भी संतुष्‍ट करते हैं। जीत(मनीष दयाल) और आलिया(हुमा कुरेशी) अपने किरदारों का निभा ले जाते हैं। उन्‍हें ढंग के सीन नहीं मिल पाए हैं। वायसराय हाउस में उनकी चहलकदमी के बीच की गिले-शिकवे और प्रेम की बातें होती हैं। अरूणोदय सिंह यहां भी किरदार से बाहिर दिखते हैं। ओम पुरी की उपस्थिति भर है।
गुरिंदर चड्ढा की यह कोशिश पार्टीशन के बारे में एक नई जानकारी देती है कि जिन्‍ना और चर्चिल के बीच पहले ही डील हो गई थी। लॉर्ड माउंटबेटेन को केवल लीपापोती के लिए भेजा गया था। यह तथ्‍य फिल्‍म में उभर कर नहीं आ पाता। फिल्‍म में 1947 के परिवेश और वेशभूषा के साथ प्रोपर्टी पर अधिक ध्‍यान नहीं दिया गया है। चलताऊ किस्‍म से पार्टीशन के सीन पुराने फुटेज के साथ जोड़ कर दिखा दिए गए हैं। कोशिश है कि 1947 दिखे,लेकिन पीरियड क्रिएट नहीं हो पाया है।
हिंदी में रिलीज की गई इस फिल्‍म में लिपसिंक और डबिंग की भी समस्‍या है। उसकी वजह से फिल्‍म अपने असर में कमजोर होती है।
ऐसी कमजोर फिल्‍मों की वजह से भी गंभीर और जरूरी विषयों पर फिल्‍में बनाने से निर्माता हिचकते हैं।
अवधि- 106 मिनट
ढाई स्‍टार **1/2

दरअसल : पिछले 70 सालों की प्रतिनिधि 50 फिल्‍में



दरअसल...
पिछले 70 सालों की प्रतिनिधि 50 फिल्‍में
-अजय ब्रह्मात्‍मज
आजादी के 70 सालों में हिंदी सिनेमा ने प्रगति के साथ विस्‍तार किया है। हर विधा में फिल्‍में बनी हैं। उन्‍हें दर्शकों ने पसंद किया। कुछ फिल्‍में रिलीज के समय अधिक नहीं सराही गईं,लेकिन समय बीतने के साथ उनका महत्‍व और प्रभाव बढ़ता गया। सात दशकों में हिंदी सिनेमा की अनेक उपलब्धियां हासिल कीं। हालीवुड के बढ़ते प्रभाव के बावजूद हिंदी और अन्‍य भाषाओं की भारतीय फिल्‍में टिकी हुई हैं। इसे बालीवुड नाम से भी संबोधित किया जाता है। हालांकि यह नाम हिंदी सिनेमा के व्‍यापक परिप्रेक्ष्‍य को नहीं समेट पाता,फिर भी यह प्रचलित हो चुका है तो अधिक गुरेज करने की जरूररत नहीं है। नाम कोई भी लें हिंदी सिनेमा की खास पहचान है। उसकी विविधता अचंभित करती है। दर्शकों ने अपनी पसंद से हमेशा चौंकाया है।
आजीदी के 70 साल पूरे होने के मौके पर मैंने फेसबुक के जरिए अपने पाठकों और परिचितों से उनकी पसंद की किसी एक फिल्‍म के बारे में पूछा था। 500 से अधिक व्‍यक्तियों ने अपनी पसंद जाहिर की। 50 फिल्‍मों की यह सूची सिर्फ उनकी पसंद के आधर पर तैयार की गई है। इस सूची में शामिल सभी फिल्‍मों को कम से कम दो मत मिले हैं। कुछ फिल्‍मों की संस्‍तुति ज्‍यादा दर्शकों ने की। मदर इंडिया,रंग दे बसंती,शोले,दो बीघा जमीन,प्‍यासा,गाइड, और जागते रहो को 10 या उससे अधिक व्‍यक्तियों ने पसंद किया। प्‍यासा सर्वाधिक प्रिय फिल्‍म रही। उसे 24 व्‍यक्तियों का समर्थन मिला। पूरी सूची पर नजर डालें तो पाएंगे कि पसंद में विविधता रही है। एक तर फ उन्‍होंने शोले और दबंग जैसी फिल्‍में पसंद कीं तो दूसरी तर फ गर्म हवा और पिंजर को भी सूचीबद्ध करने में पीछे नहीं रहे।
दर्शकों की पसंद की सूची यहां पढ़ सकते हैं। देखें कि इस सूची में से आ पे कितनी फिल्‍में देखी हैं। यह कोई मानक सूची नहीं है,लेकिन इतना तो पता चलता है कि अभी के दर्शक क्‍या पसंद कर रहे हैं? 3 इडियट,अं‍कुर,बैंडिट क्‍वीन,बोर्डर,चक दे इंडिया,दो बीघा जमीन,दो आंखें बारह हाथ,गैंग्‍स ऑफ वासेपुर,गर्म हवा,गाइड जागते रहो,क्रांति,लगान,मदर इंडिया,मुगलेआजम,प्‍यासा,पिंजर,पूरब और पश्चिम,रंग दे बसंती,शोले,टॉयलेट एक प्रेम कथा,स्‍वदेस,तारे जमीं पर,तीसरी कसम,श्री 420,शहीद,सारांश,पीके,पान सिंह तोमर,निशांत,नदिया के पार,मृत्‍युदंड,कागज के फूल,मेरा नाम जोकर,मैं आजाद हूं,इंडियन,गुलामी,एक डाक्‍टर की मौत,ब्‍लैक फ्रायडे,बावर्ची,बंदिनी,बाहुबली,अलीगढ़,अमर प्रेम,भाग मिल्‍खा भाग,उपकार,दबंग,दंगल, और सत्‍यकाम
इस सर्वे में सभी उम्र के दर्शकों ने हिस्‍सा लिया। सोयाल मीडिया पर पुरुष ज्‍यादा है,इसलिए उनका अनुपात ज्‍यादा रहा। मुझे लगता है कि ऐसे सर्वे में लड़कियां हिस्‍सा लें तो फिल्‍मों की सूची बदल सकती है। मुझे आश्‍चर्य हुआ कि पीकू और पिंक किसी की पसंद नहीं रही। दूसरा आश्‍चर्य यह भी रहा कि टॉयलेट एक प्रेम कथा को पांच ने पसंद किया। दिलवाले दुल्हिनया ले जाएंगे और हम आप के है कौन भी दर्शकों की पसंद में शामिल नहीं हैं। करण जौहर की भी उन्‍होंने उपेक्षा की,जबकि नीरज घेवन की मसान को दर्शकों ने पसंद किया। मनोरंजन के लोकतंत्र में पसंद-नापसंद की कसौटी अलग होती है। यह सूची यह भी संकेत देती है कि लंबे समय में किस तरह की फिल्‍में दर्शकों की पसंद बनती हैं।

अगर आप ने इस सूची की कोई फिल्‍म नहीं देखी हो तो अवश्‍य देखें। इसके साथ ही आप अपनी पसंद की फिल्‍म के बारे में हमें लिख भेजें। फिल्‍में हमारे दैनंदिन जीवन का हिस्‍सा हैं। हम उनसे आनंदित होते हैं। कुछ सीखते-समझते हैं। कई बार जाने-अनजाने हम नायक-नायिका को अपने जीवन में उतारना चाहते हैं। सिर्फ फैशन और स्‍टायल में ही नहीं। यह प्रभाव दर्शन और जीवन शैली पर भी पड़ता है।

Thursday, August 17, 2017

रोज़ाना : हमदर्द शाह रूख खान



रोज़ाना
हमदर्द शाह रूख खान
-अजय ब्रह्मात्‍मज
कल सायरा बानो ने दिलीप कुमार के ट्वीटर हैंडल पर कुछ तस्‍वीरें शेयर कीं। उनमें शाह रूख खान कृशकाय हो चुके महान अभिनेता को सोफे पर आराम से बिठाने की कोशिश कर रहे हैं। ये तस्‍वीरें आंखें नम कर गईं। पहले तो लगा कि सायरा जी को इन अंतरंग क्षणों की तस्‍वीरें नहीं शेयर करनी चाहिए थी। फिर मर्माहत मन ने कहा कि ऐसी तस्‍वीरें धर-परिवार और देश-समाज के बुजुर्गों के प्रति हमारी हमदर्दी की मिसाल बन सकती हैं। फिल्‍मों के फालोअर और शाह रूख खान के प्रशंसक गाहे-बगाहे अपने जीवन में इसे अपना सकते हैं। दिलीप कुमार के प्रति शाह रूख खान के आदर और प्‍यार से फिल्‍म इंडस्‍ट्री वाकिफ है। सायरा जी कई मौकों पर कह चुके हैं कि दिलीप साहेब उन्‍हें अपनी औलाद की तरह मानते हैं। यह किसी भी बीमार पिता और तीमारदार बेटे की तस्‍वीर हो सकती है।
शाह रूख खान के बारे में अनेक गलतफहमियां हैं। अपनी बेरुखी और साफगोई से वे ऐसी इमेज बना चुके हैं कि उन्‍हें किसी की भी नहीं पड़ी है। वे केल खुद और खुद की परवाह करते हैं। हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री के गलाकाट माहौल में ऐसे मिजाज के सुबूत और उाहरण भी मिल जाते हैं। शाह रूख को करीब से जानने वाले बताते हैं कि वे सभी परिचितों,दोस्‍तों और रिश्‍तेदारों का पूरा खयाल रखते हैं। मशहूर व्‍यक्ति जब खयाल करता है तो उसमें पैसे भी खर्च होते हैं। शाह रूख खान इस मामले में दिलदार माने जाते हैं। उन्‍होंने पिछले दिनों एक सीनियर जर्नलिस्‍ट के इलाज का पूरा खर्च उठाया और उसकी कहीं चर्चा नहीं की।
मुमकिन है कुछ लोगों ने आमिर खान के पानी फाउंडेशन के कार्यक्रम में उन्‍हें बोलते सुना हो। पुणे के इस कार्यक्रम में अ‍ामिर खान का जाना था। अचानक स्‍वाइन फ्लू की चपेट में आने से वे नहीं जा सके थे। उन्‍होंने शाह रूख खान से कार्यक्रम संभालने का दोसतना आग्रह किया। खुद खेटिल होने के बावजूद शाह रूख खान ने प्रोग्राम में हिस्‍सा लिया। निमंत्रित श्रोताओं को आमिर खान की कमी नहीं महसूस होने दी। पुरानी कहावत है कि जो वक्‍त्‍-जरूरत पर काम आए,वही दोस्‍त है। शाह रूख खान ने दोस्‍ती की मिसाल पेश की है। आम धारणा है कि खानत्रयी के तीनों खान एक-दूसरे को नापसंद करते हैं। सच्‍चाई यह है कि वे एक-दूसरे की मदद के लिए हमेशा तैयार रहते हैं।
हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री में मतलबी रिश्‍तों की अनेक दास्‍ताने हैं। हर नया व्‍यक्ति सुनाते समय उनमें कुछ नया जोड़ देता है। मजे लेता है। हमें ऐसी पॉजीटिव तस्‍वीरों और हरकतों पर गौर करना चाहिए। इनसे भी सीखना चाहिए।

Wednesday, August 16, 2017

रोज़ाना : ’टॉयलेट...’ से मिली राहत



रोज़ाना
टॉयलेट... से मिली राहत
-अजय ब्रह्मात्‍मज

अक्षय कुमार और भूमि पेडणेकर की फिल्‍म टॉयलेट एक प्रेम कथा के कलेक्‍शन से हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री को राहत मिली है। पिछलें कई महीनों से हर हफ्ते रिलीज हो रही फिल्‍में बाक्‍स आफिस पर खनक नहीं रही थीं। सलमान खान और शाह रूख खान की फिल्‍में बिजनेश की बड़ी उम्‍मीद पर खरी नहीं उतरीं। खबर है कि सलमान खान ने वितरकों के नुकसान की भरपाई की है। इस व्‍यवहार के लिए सलमान खान खान की तारीफ की जा सकती है। इक्षिण भारत में रजनी कांत की फिल्‍में अपेक्षित कमाई नहीं करतीं तो वे भी वितरकों का नुकसान शेयर करते हैं। हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री में महेश भट्ट भी ऐसा करते रहे हैं। इससे लाभ यह होता है कि उम्‍त स्‍टारों या प्रोडक्‍शन हाउस की अगली फिल्‍में उठाने में वितरक आनाकानी नहीं करते। बहरहाल,टॉयलेट एक प्रेम कथा के वीकएंड कलेक्‍शन ने उत्‍साह का संचार किया।
रिलीज के पहले टॉयलेट एक प्रेम कथा के बारे में ट्रेड पंडित असमंजस में थे। फिल्‍म की कहानी की विचित्रता की वजह से वे अक्षय कुमार के होने के बावजूद आशंकित थे। कुछ तो कह रहे थे कि वीकएंड कलेक्‍शन 25 करोड़ भी हो जाए तो गनीमत है। उनकी आशंका के विपरीत फिल्‍म ने 51 करोड़ का कलेक्‍शन किया। पहले दिन शुक्रवार को 13.10 करोड़ का कलेक्‍शन सामान्‍य ही रहा। आप गौर करेंगे कि दर्शकों को पसंद आने पर फिल्‍म का कलेक्‍शन शनिचार और रविवार को बढ़ता है। अगर यह बढ़ोत्‍री 20 प्रतिशत से अधिक हो तो फिल्‍म की सफलता की संभावना बढ़ जाती है। ऐसी फिल्‍मों का कलेक्‍शन भी सोमवार को गिरता है और आधं से कम हो जाता है। टॉयलेट एक प्रेम कथा ने सोमवार को 12 करोड़ का कलेक्‍शन किया। चार दिनों में इस फिल्‍म ने 63 करोड़ का आंकड़ा पार कर लिया है।
हम देख रहे हैं कि अक्षय कुमार फिल्‍म बिजनेश के लिहाज से भरोसेमंद एक्‍टर के तौर पर उभरे हैं। पिछले साल इसी समय के आसपास उनकी रुस्‍तम आई थी और फिल्‍म इंडस्‍ट्री को राहत मिली थी। यह भी कहा जा सकता है कि दूसरे लोकप्रिय स्‍टारों की तरह अक्षय कुमार ने भी अपनी फिल्‍मों की रिलीज के लिए एक त्‍योहार चुन लिया है स्‍वतंत्रता दिवस। 15 अगस्‍त के आसपास रिलीज हुईं उनकी फिल्‍में सफल रही हैं।
कामयाब होने के साथ टॉयलेट एक प्रेम कथा खुले में शौच के खिलाफ जागरूकता बढ़ाने में भी सफल रही। मनोरंजन के साथ मैसेज देने की निर्देशक श्री नारायण सिंह की युक्ति काम आई। मुमकिन है और भी निर्देशक देश के लिए जरूरी मुद्दों पर मनोरंजक फिल्‍में लेकर आएं।

Tuesday, August 15, 2017

रोज़ाना : राष्‍ट्रीय भावना के गीत



रोज़ाना
राष्‍ट्रीय भावना के गीत
-अजय ब्रह्मात्‍मज
इन पंक्तियों को पढ़ने केपहले ही आप के कानों में राष्‍ट्रीय भावना से ओत-प्रोत देशभक्ति के गानों की आवाज आ रही होगी। महानगर,शहर,कस्‍बा और गांव-देहात तक में गली,नुक्‍कड़ और चौराहों पर गूंज रहे गीत स्‍फूर्ति का संचार कर रहे होंगे। अभी प्रभात फेरी का चलन कम हो गया है। स्‍वतंत्रता आंदोलन के समय हर सुबह गली-मोहल्‍लों में प्रभातफेरी की मंडलियां निकला करती थीं। सातवें दशक तक इसका चलन रहा। खास कर 15 अगस्‍त और 26 जनवरी को स्‍कूलों और शिक्षा संस्‍थाओं में इसका आयोजन होता था। तब तक देशभक्त्‍िा और आजादी का सुरूर कायम था। देश जोश के साथ उम्‍मीद में जी रहा था। बाद में बढ़ती गरीबी,असमानता और बदहाली से आजादी से मिले सपने चकनाचूर हुए और मोहभंग हुआ। धीरे-धीरे स्‍वतंत्रता दिवस औपचारिकता हो गई। अवकाश का एक दिन हो गया।

याद करें तो हमारे बचपन में स्‍वतंत्रता दिवस के दिन स्‍कूल जाने का उत्‍साह रहता था। यह उत्‍साह आज भी है,लेकिन शिक्षकों और अभिभावकों की सहभागिता की कमी से पहले सा उमंग नहीं दिखता। केंद्र में राष्‍ट्रवादी सरकार के आने के बाद देशभक्ति की भावना पर जोर देने से नए जोश का संचार हुआ है। नागरिक होने का नाते हमारा फर्ज है कि हम भारतीय होने पर गर्व महसूस करें। आजादी के लिए बलिदान और कुर्बान हुए सेनानियों को याद करते हुए राष्‍ट्र निर्माण के कार्यों में संलग्‍न हो। अपनी भूमिका चुनें और जी-जान से देश की तरक्‍की के लिए काम करें। हमें विकसित देशों के साथ अगली कतार में शामिल होना है। पिछले 70 सालों में रह गई कमियों को दूर करना है और विकास के पथ पर आगे बढ़ना है।

हिंदी फिल्‍मों ने हमेशा राष्‍ट्रीय भावना का प्रचार-प्रसार किया है। आजादी के बाद के सालों की फिल्‍में देखें या गीत सुनें तो आज भी देशभक्ति का जज्‍बा हिलारें मारने लगता है। हिंदी फिल्‍मों के नए-पुराने गीतों की लोकप्रियता का यह आलम है कि उनके बगैर आजादी से संबंधित कोई भी आयोजन अधूरा रहता है। हमवतनों को संबोधित करते ये गीत जोश के साथ उम्‍मीद भी जगाते हैं। साथ रहने और चलने का संदेश देते हैं। उन सेनानियों की कुर्बानियों की याद दिलाते हैं,जिनकी वजह से हमारा देश सदियों की गुलामी से आजाद हुआ। सीमाओं पर तैनात हमारी सेना की जागती चौकस निगाहें ही हमारी नींद,चैन और सुरक्षा का खयाल रखती हैं। फिल्‍मी गीतकारों ने ऐसे वीरों का यथोचित गुणगान किया है। हमें गुनगुनाने के लिए ऐसे गीत दिए हैं कि उनके जरिए हम अपनी श्रद्धा जाहिर कर सकें।

देशथक्ति के इन फिल्‍मी गीतों को गाने-गुनगुनाने के बीच ठहर कर देख लें कि क्‍या हमारे परिवार के सभी सदस्‍यों को राष्‍ट्र गान(जन गण मन) और राष्‍ट्र गीत(वंदे मातरम) याद हैं?

Monday, August 14, 2017

दरअसल : यंग एडल्‍ट के लिए फिल्‍में



दरअसल...
यंग एडल्‍ट के लिए फिल्‍में
-अजय ब्रह्मात्‍मज
बृजमोहन अमर रहे,अभी और अनु,आश्‍चर्यचकित,अज्‍जी,नोबलमैन,द म्‍यूजिक टीचर,कुछ भीगे अल्‍फाज,हामिद... उन कुछ फिल्‍मों के नाम हैं,जो अगले महीने से हर महीने रिलीज होंगी। योजना है कि दर्शकों तक ऐसी फिल्‍में आएं,जो कथ्‍य के स्‍तर पर गंभीर हैं। कुछ कहना चाहती हैं। अच्‍छी बात है कि इन सारी फिल्‍मों की योजना 18 से 30 साल के दर्शकों को धन में रख कर बनाई गई है। एक सर्वे के मुताबिक पहले दिन फिल्‍म देखने आए दर्शकों में से 64 प्रतिशत की उम्र 24 साल से कू होती है। सिनेमाघरों में युवा दर्शक जाते हैं। इस समूह के दर्शक विश्‍व सिनेमा से परिचित हैं। अगर उन्‍हें फिल्‍म पसंद नहीं आती है तो बड़े से बड़े लोकप्रिय सितारों की भी फिल्‍में बाक्‍स आफिस पर औंधे मुंह गिरती हैं।
ऊपर उल्लिखित सभी फिल्‍मों का निर्माण यूडली फिल्‍म्‍स कर रही है। यूडली फिल्‍म्‍स मूल रूप से सारेगाम म्‍यूजिक कंपनी की नई फिल्‍म निर्माण कंपनी है। एक अर्से की खामोशी के बाद फिल्‍म निर्माण में सारेगामा का उतरना अच्‍छी खबर है। हिंदी फिल्‍में हमेश एण्‍क संक्राति से दूसरी संक्राति के बीच रहती है। उसी के दरम्‍यान कुछ नया करने के उद्देश्‍य से कोई आता है। विषय,प्रस्‍तुति और मनोरंजन की नई बयार दर्शकों को भी राहत देती है। उन्‍हें कुछ नया मिलता है। बाहुबली और दंगल जैसी फिलमें रोजाना नहीं बन सकतीं। जरूरत है कि सीमित बजट और मझोले स्‍टारडम के एक्‍टरों को लकर फिल्‍में आएं। दर्शकों को मनोरंजन मिले तो वे ऐसी फिल्‍मों को सपोर्ट करते हैं। जैसे कि तमाम लोकप्रिय सितारों के बीच अभी शुभ मंगल सावधान और बरेली की बर्फी उम्‍मीद की हिलारें दे रही हैं।
मनोरंजन के क्षेत्र में माना जा रहा है कि यंग एडल्‍ट(युवा वयस्‍क) को धन में रख कर फिल्‍में नहीं बन रही हैं। मेनस्‍ट्रीम हिंदी सिनेमा की खुराक से बड़े हुए दर्शकों को पारंपरिक शैली में आ रही फार्मूला फिल्‍में अच्‍छी लगती हैं। वे उनसे खुश हैं। बच्‍चों को टीवी से किड्स शो मिल जाते हैं। समस्‍या यंग एडल्‍ट की है। हिंदी फिल्‍मों की प्‍लानिंग में यह समूह नदारद है,जबकि आज वही हिंदी फिल्‍मों का पहला दर्शक है। यूडली फिल्‍म्‍स की कोशिश है कि इन दर्शकों की संवेदनाओं और अपेक्षाओं की कहानी दिखाई जाए। तात्‍पर्य यह है कि उनकी सोच और जरूरतों को प्रमुखता दी जाए। हिंदी सिनेमा के अभाव में वे तेजी से से ओटीटी कंटेंट(ओवर द टॉप कंटेंट) की ओर भाग रहे हैं। ओटीटी कंटेंट में इंटरनेट के लिए निर्मित और जारी शोज आते हैं। एमेजॉन और नेटफिल्‍क्‍स इस श्रेणी के बड़ प्‍लेयर के रूप में उभरे हैं।
कोशिश है कि युवा दर्शकों को यूथ रियलिज्‍म की फिल्‍में दी जाएं। यूडली फिल्‍म्‍स फिलहाल हर साल 12 से पंद्रह फिल्‍में बनाने की सोच रही है। सिनेमाघरों में इन फिल्‍मों के आते ही अन्‍य प्रोडक्‍शन हाउस भी ऐसी फिल्‍मों की तैयारी करेंगे। यों लग रहा है कि 2018 का नया ट्रेड युवा दर्शकों की फिल्‍में होंगी। ये फिल्‍में अधिकतम दो घंटे की अवधि की होगी। भाषा की हदें तोड़ कर यह भी कोशिश की जा रही है कि फिल्‍म के विरूाय और परिवेश के अनुरूप भाषा रखी जा और उसे सभी भाषाओं के दर्शकों के बीच ले जाया जाए। हिंदी के दर्शकों के बीच तो लाया ही जाएं। वैसे भी बाहुबली ने जता दिया है कि कंटेंट दमदार हो तो भाषा दीवार नहीं बन सकती। संगीतप्रेमियों को इन फिल्‍मों के जरिए सारेगामा के बैंक से पुरानी फिल्‍मों के गाने मूल या कवर के रूप में देखने-सुनने को मिल सकते हैं।
युवा दर्शकों के लिए फिल्‍में बदलने को तैयार हैं। उनकी रुचि और क्रय श्‍क्ति की वजह से ही यह बदलाव हो रहा है।

Saturday, August 12, 2017

रोज़ाना : शिकार हैं तो प्रतिकार करें



रोज़ाना
शिकार हैं तो प्रतिकार करें
-अजय ब्रह्मात्‍मज

समाज में सामाजिक और आर्थिक असमानता हो तो शोषण और शिकार आम बात हो जाती है। समाज के विभिन्न क्षेत्रों के प्रभावशाली समूह अपना वर्चस्व बनाये रखने के लिए हर तरह के उपाय करते हैं। वे दमन और दबाव की नीति-रणनीति अपनाते हैं। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में भी यह आम है। खास कर बाहर से आये कलाकारों के प्रति फ़िल्म इंडस्ट्री के इनसाइडर का यह रवैया दिखता है। कुछ महीनों से कंगना रनोट के खिलाफ चल रहे बयानों पर गौर करें तो स्पष्ट हो जाएगा। ज्यादातर तिलमिलाये हुए हैं। फ़िल्म इंडस्ट्री में जारी वंशवाद को वे दबी जबान से स्वीकार करते हैं। मझोले स्टार तो कंगना के समर्थन करने के बाद कह देते हैं कि क्यों हमें घसीट रहे हैं। हम तो उसके कैम्प के हैं,जो हमें काम दे।
कंगना रनोट की बातों में दम है। पिछले दिनों उन्होंने दोहराया कि वह आगे भी कुछ लोगों के अहम पर चोट करती रहेंगी।होता यूं है कि किसी ताकतवर की बात न मानो,प्रतिकार करो या सवाल करो तो उनका अहम घायल हो जाता है।फ़िल्म इंडस्ट्री में भी जी हुजूरी चलती है। हैं में हैं मिलते रहो और आगे बढ़ते रहो। कंगना ने तो सीधे आरोप लगा दिए थे और वह भी मुंह पर। कारण जोहर को यह बात कैसे गवारा होती। अवसर मिलते ही करण ने पलटवार किया और कंगना को सलाह दी कि फ़िल्म इंडस्ट्री छोड़ दें। बात पुरानी हो गयी,लेकिन अभी तक सुलग रही है। हर बार कोई हवा दे देता है।
इससे अलग एक स्थिति दिखाई देती है,जहां कुछ लोग हमेशा शिकार हो चुके व्यक्ति की मुद्रा में रहते हैं।उन्हें शिकायत रहती है। जबकि उनकी शिकायतों का ठोस आधार नहीं रहता। मज़ेदार तथ्य यह है कि ऐसे शिकायती व्यक्तियों के समर्थन में कुछ लोग मिल जाते हैं। दरअसल सफल और कामयाब व्यक्तियों की छवि खराब करने में अतिरिक्त आनंद मिलता है। ऊपरी तौर पर लगता है कि शोषित व्यक्ति का साथ दिया जा रहा है,जबकि सच्चाई कुछ और होती है। शिकार व्यक्तियों को जोरदार प्रतिकार करना चाहिए। विक्टिम मुद्रा में आ जाने से व्यक्तिगत सुकून मिल जाता है,लेकिन उससे कोई लाभ नहीं होता। देखा गया है कि विक्टिम मुद्रा में जी रहा व्यक्ति अपने ज़ख्मों को भरने नहीं देता। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में ऐसे अनेक फिल्मकार मिलते हैं जो अपनी अप्रदर्शित फ़िल्म का रोना रोते रहते हैं। किसी और को दोषी ठहराते हैं। वे उस फिल्म के भंवर से नहीं निकल पाते।

फिल्‍म समीक्षा : टॉयलेट- एक प्रेम कथा



फिल्‍म रिव्‍यू
शौच पर लगे पर्दा
टॉयलेट एक प्रेम कथा
-अजय ब्रह्मात्‍मज
जया को कहां पता था कि जिस केशव से वह प्‍यार करती है और अब शादी भी कर चुकी है...उसके घर में टॉयलेट नहीं है। पहली रात के बाद की सुबह ही उसे इसकी जानकारी मिलती है। वह गांव की लोटा पार्टी के साथ खेत में भी जाती है,लेकिन पूरी प्रक्रिया से उबकाई और शर्म आती है। बचपन से टॉयलेट में जाने की आदत के कारण खुले में शौच करना उसे मंजूर नहीं। बिन औरतों के घर में बड़े हुआ केशव के लिए शौच कभी समस्‍या नहीं रही। उसने कभी जरूरत ही नहीं महसूस की। जया के बिफरने और दुखी होने को वह शुरू में समझ ही नहीं पाता। उसे लगता है कि वह एक छोटी सी बात का बतंगड़ बना रही है। दूसरी औरतों की तरह अपने माहौल से एडजस्‍ट नहीं कर रही है। यह फिल्‍म जया की है। जया ही पूरी कहानी की प्रेरक और उत्‍प्रेरक है। हालांकि लगता है कि सब कुछ केशव ने किया,लेकिन गौर करें तो उससे सब कुछ जया ने ही करवाया।
टॉयलेट एक प्रेम कथा रोचक लव स्‍टोरी है। जया और केशव की इस प्रेम कहानी में सोच और शौच की खल भूमिकाएं हैं। उन पर विजय पाने की कोशिश और कामयाबी में ही जया और केशव का प्रेम परवान चढ़ता है। लेखक सिद्धार्थ-गरिमा ने जया और केशव की प्रेम कहानी का मुश्किल आधार और विस्‍तार चुना है। उन्‍होंने आगरा और मथुरा के इलाके की कथाभूमि चुनी है और अपने किरदारों का स्‍थानीय रंग-ढंग और लहजा दिया है। भाषा ऐसी रखी है कि स्‍थानीयता की छटा मिल जाए और उसे समझना भी दुरूह नहीं हो। उच्‍चारण की शुद्धता के बारे में ब्रजभूमि के लोग सही राय दे सकते हैं। फिल्‍म देखते हुए भाषा कहीं आड़े नहीं आती। उसकी वजह से खास निखार आया है।
जया बेहिचक प्रधान मंत्री के स्‍वच्‍छ भारत अभियान की थीम से जुड़ी यह फिल्‍म सदियों पुरानी सभ्‍यता और संस्‍कृति के साच पर सवाल करती है। लेखकद्वय ने व्‍यंग्‍य का सहारा लिया है। उन्‍होंने जया और केशव के रूप में दो ऐसे किरदारों को गढ़ा है,जो एक-दूसरे से बेइंतहा प्रेम करते हैं। सिर्फ शौच के बारे में उनकी सोच अलग-अलग है। केशव की सोच में कभी शौच का सवाल आया ही नहीं,क्‍योंकि बचपन से उसने खुले में शौच की ही नित्‍य ्रिया माना और समझा। जया के बिदकने पर भी शौच की जरूरत उसके पल्‍ले नहीं पड़ती। उसे जया की मांग का एहसास बाद में होता है। फिर तो वह एड़ी-चोटी का जोड़ लगा देता है। गांव और आसपास की महिलाएं जागृत होती हैं और शौच एक अभियान बन जाता है।
ऐसी फिल्‍मों के साथ खतरा रहता है कि वे डाक्‍यूमेंट्री न बन जाएं। या ऐसी उपदेशात्‍मक न हो जाएं कि दर्शक दुखी हो जाएं। निर्देशक श्रीनारायण सिंह संतुलन बना कर चलते हैं। उन्‍हें अपने कलाकारों और लेखकों का पूरा सहयोग मिला है।
फिल्‍म के संवाद चुटीले और मारक हैं। परंपरा और रीति-रिवाजों के नाम पर चल रह कुप्रथा पर अटैक करती यह फिल्‍म नारे लगाने से बची रहती है। एक छोर पर केशव के पिता पंडिज्‍जी हैं तो दूसरे छोर पर जया है। इनके बीच उलझा केशव आखिरकार जया के साथ बढ़ता है और बड़े परिवर्तन का कारक बन जाता है। पढ़ी-लिखी जया एक तरह से गांव-कस्‍बों में नई सोच के साथ उभरी लड़कियों का प्रतिनिधित्‍व करती है। वह केशव से प्रेम तो करती है,लेकिन अपने मूल्‍यों और सोच के लिए समझाौते नहीं कर सकती। और चूंकि उसकी सोच तार्किक और आधुनिक है,इसलिए हम उसके साथ हो लेते हैं। हमें केशव से दिक्‍कत होने लगती है। लेखकों ने केशव के क्रमिक बदलाव से कहानी स्‍वाभाविक रखी है। हां,सरकारी अभियान और मंत्रियों की सक्रियता का हिस्‍सा जबरन डाला हुआ लगता है। उनके बगैर या उनके सूक्ष्‍म इस्‍तेमाल से फिल्‍म ज्‍यादा असरदार लगती।
अक्षय कुमार ने केशव के रिदार को समझा है। उन्‍होंने उस किरदार के लिए जरूरी भाव-भंगिमा और पहनावे पर काम किया है। लहजे और संवाद अदायगी में भी उनकी मेहनत झलकती है। जया की भूमिका में भूमि पेडणेकर जंचती हैं। उन्‍होंने पूरी सादगी और वास्‍तविकता के साथ इस किरदार को निभाया है। उनके सहज अभिनय में जया भादुड़ी की झलग है। ग्‍लैमर की गलियों में वह नहीं मुड़ीं तो हिंदी फिल्‍मों को एक समर्थ अभिनेत्री मिल जाएगी। इस फिल्‍म की जान हैं पंडिज्‍जी यानी सुधीर पांडे। उन्‍होंने अपने किरदार को उसकी विसंगतियों को ठोस विश्‍वास के साथ निभाया है। छोटे भाई के रूप में दिव्‍येन्‍दु समर्थ परक और सहयोगी हैं। जया के मां-पिता के रूप में आए कलाकार भी स्‍वाभाविक लगे हैं। अनुपम खेर अपने अंदाज के साथ यहां भी हैं।
पर्दा सोच से हटा कर शौच पर लगाने का टाइम आ गयो।
अवधि- 161 मिनट
**** चार स्‍टार    

Thursday, August 10, 2017

रोज़ाना : ’चक दे! इंडिया’ के दस साल



रोज़ाना
चक दे! इंडिया के दस साल
-अजय ब्रह्मात्‍मज

यह 2007 की बात है। यशराज फिल्‍म्‍स ने एक साल पहले कबीर खान निर्देशित काबुल एक्‍सप्रेस का निर्माण किया था। फिल्‍म तो अधिक नहीं चली थी,लेकिन उसे अच्‍छी तारीफ मिली थी। उन्‍हें लगा था कि प्रेकानियों से इतर फिल्‍में भी बनायी जा सकती हैं। तब तक जयदीप साहनी यशराज की टीम में शामिल हो चुके थे। वे कुछ दिनों से भारत की महिला हाकी टीम पर रिसर्च कर रहे थे। उन्‍होंने बातों-बातों में आदित्‍य चोपड़ा को अपने विषय के बारे में बताया था। तब तक जयदीप साहनी ने तय नहीं किया था कि वे किताब लिखंगे या फिल्‍म। आदित्‍य चोपड़ा के प्रोत्‍साहन ने जयदीप साहनी को हौसला दिया। उन्‍होंने एक मुश्किल फिल्‍म लिखी। हालांकि फिल्‍म में शाह रूख खान थे,लेकिन उनके साथ कोई एक हीरोइन नहीं बल्कि लड़कियों की जमात थी। उन लड़कियों को लेकर उन्‍हें भारत की महिला हाकी टीम के कोच के रूप में ऐसी टीम तैयार करनी थी,जो जीत कर लौटे।
यह आदित्‍य चोपड़ा की हिम्‍मत और शाह रूख खान का विश्‍वास ही था कि लेखक जयदीप साहनी और निर्देशक शिमित अमीन भारत की एक यादगार फिल्‍म पूरी की। यह फिल्‍म पसंद की गई और समय बीतने के साथ पिछले दस सालों में खेल पर बनी सबसे रोचक फिल्‍म हो गई है। चक दे! इंडिया राष्‍ट्रीय गर्व है। इस फिल्‍म का शीर्षक गीत आज भी स्‍टेडियम और मैदानों में गूंजता है। खिलाडि़यों में जोश भरता है और टीम इंडिया के रूप में खेल में विजयी होने की प्रेरणा देता है। चक दे! इंडिया प्रमाण है कि कुछ फिल्‍में रिलीज के बाद दर्शकों के बीच बड़ी होती हैं। दर्शक ही उन्‍हे पालते और बड़ी बना देते हैं।
चक दे! इंडिया कबीर खान के साथ उन लड़कियों की भी कहानी है,जो टीम इंडिया के रूप में संगठित होती हैं। लक्ष्‍य हासिल करती हैं। कबीर खान कभी भारतीय हाकी टीम के कप्‍तान हुआ करते थे। पाकिस्‍तान से मैच हारने के बाद उन्‍हें बेइज्‍ज्‍त होना पड़ता है। सात सालों के बाद महिला हाकी टीम के कोच के रूप में चुने जाने के बाद वे अपनी बेइज्‍जती को तारीफ में बदलने के मकसद से जुट जाते हैं। पहली चुनौती सभी लड़कियों में टीम भावना पैदा करना और उन्‍हें देश के लिए खेलने की प्रेरणा देना है। लड़कियां हाकी के अलावा सारे खेल खेलती हैं और पर्सनल एजेंडा के तहत स्‍कोर बनाती हैं। उनमें टीम एनर्जी नहीं है। कबीर खान उन्‍हें टीम के तौर पर तैयार करने के बाद मैदान में उतरते हैं। जीत हासिल होती है।
लेखक जयदीप साहनी और निर्देशक शिमित अमीन 10 अगस्‍त,2007 को रिलीज हुई चक दे! इंडिया की कामयाबी का श्रेय दर्शकों को देते हैं। यह फिल्‍म दर्शकों में आशा का संचार करती है। खेल भावना के साथ राष्‍ट्रीय भावना जगाती है। फिल्‍म का शीर्षक गीत चक दे किसी उद्बोधन गीत की तरह झंकृत करता है।

Wednesday, August 9, 2017

रोजाना : खारिज करने का दौर



रोजाना
खारिज करने का दौर
-अजय ब्रह्मात्‍मज
बकवास...बहुत बुरी फिल्‍म है...क्‍या हो गया है शाह रूख को...इम्तियाज चूक गए। जब हैरी मेट सेजल के बारे में सोशल मीडिया की टिप्‍पणियों पर सरसरी निगाह डालें तो यही पढ़ने-सुनने को मिलेगा। हर व्‍यक्ति इसे खारिज कर रहा है। ज्‍यादातर के पास ठोस कारण नहीं हैं। पूछने पर वे दाएं-बाएं झांकने लगते हैं। यह हमारे दौर की खास प्रवृति है। किसी स्‍थापित को खारिज करो। पहले मूर्ति बनाओ। फिर पूजो और आखिरकार विसर्जन कर दो। हम अपने देवी-देवताओं के साथ यही करते हैं। फिल्‍म स्‍टारों के प्रति भी हमारा यही रवैया रहता है। थिति इतनी नकारत्‍मक हो चुकी है कि अगर आप ने फिल्‍म के बारे में कुछ पाम्‍जीटिव बातें कीं तो ये स्‍वयंभू आलोचक(दर्शक) आप से ही नाराज हो जाएंगे और ट्रोलिंग होने लगेगी1 जब हैरी मेट सेजल सामान्‍य मनोरंजक फिल्‍म है।
सच्‍चाई क्‍या है? हिंदी फिल्‍मों के ढांचे में जकड़ी यह फिल्‍म किसी सा‍हसिक प्रयोग से बचती है। इम्तियाज अली ने खुद की रोचक शैली विकसित कर ली है। यह उसी शैली की फिल्‍म है। उनके किरदारों(प्रेमियों) का बाहरी विरोध नहीं होता। कोई दीवार नहीं बनता। कोई खलनायक भी नहीं होता। वे खुद के झंझावातों से जूझ रहे होते हैं। संगत और सोहबत में वे खुद को पा लेते हैं। और फिर एक-दूसरे को चाहने लगते हैं। समस्‍या यह है कि हिंदी फिल्‍मों के अधिकांश दर्शकद पॉपुलर फिल्‍मों में कथ्‍य की पुरानी धुरी पर टिके रह कर ही नया आस्‍वादन चाहते हैं। इम्तियाज अली हैरी और सेजल को मिलवाने में उन किरदारों के मिजाज के खिलाफ जाते हैं। हम जिन किरदारों के साथ चल रहे होते हैं। वे ही हमारा हाथ झटक देते हैं।
बहरहाल,किसी भी फिल्‍म का बिजनेस इन दिनों खास महत्‍व रखता है। उस लिहाज से देखें तो जब हैरी मेट सेजल ने वीकएंड में 45.75 करोड़ का लेक्‍शन किया है। बाहुबली,टयूबलाइट और जॉली एलएलबी इससे ऊपर हैं। पहले तीन दिनों में जब हैरी मेट सेजल का कलेक्‍शन 15 करोड़ के आसपास ही रहा। हां,कलेक्‍शन में आवश्‍यक बढ़ोत्‍तरी होती तो परिणाम उत्‍साजनक रहता। फिर भी कह सकते हैं कि दर्शकों की निष्‍ठा विपरीत नहीं हुई है। यह जरूर हुआ है कि शाह रूख खान और इम्तियाज के साथ होने से अपेक्षाएं ज्‍यादा बड़ी और ऊंची थी। माना जा रहा कि इससे शाह रूख खान को जरूरी छलांग मिलेगी। छलांग नहीं लगी,फिर भी जब हैरी मेट सेजल को खारिज करना उचित नहीं होगा। हां,निर्देशक और कलाकारों ने इस फिल्‍म के बारे में दर्शकों को ढंग से नहीं बताया। 

Tuesday, August 8, 2017

रोज़ाना : फिल्‍म प्रचार की नित नई युक्तियां



रोज़ाना
फिल्‍म प्रचार की नित नई युक्तियां
-अजय ब्रह्मात्‍मज
हाल ही में अनुपम खेर ने अपनी नई फिल्‍म रांची डायरीज के पोस्‍टर जारी किए। इस इवेंट के लिए उन्‍होंने मुंबई के उपनगर में स्थित खेरवाड़ी को चुना। 25-30 साल पहले यह फिल्‍मों में संघर्षरत कलाकारों की प्रिय निम्‍न मध्‍यवर्गीय बस्‍ती हुआ करती थी। कमरे और मकान सस्‍ते में मिल जाया करते थे। मुंबई में अनुपम खेर का पहला ठिकाना यहीं था। यहीं 8x10 के एक कमरे में वे चार दोस्‍तों के साथ रहते थे। उनकी नई फिल्‍म रांची डायरीज में छोटे शहर के कुछ लड़के बड़े ख्‍वाबों के साथ जिंदगी की जंग में उतरते हैं। फिल्‍म की थीम अनुपम खेर को अपने अतीत से मिलती-जुलती लगी तो उन्‍होंने पहले ठिकाने को ही इवेंट के लिए चुना लिया। इस मौके पर उन्‍होंने उन दिनों के बारे में भी बताया और अपने संघर्ष का जिक्र किया।
प्रचार के लिए अतीत के लमहों को याद करना और सभी के साथ उसे शेयर करना अनुपम खेर को विनम्र बनाता है। प्रचारकों को अवसर मिल जाता है। इसी बहाने चैनलों और समाचार पत्रों में अतिरिक्‍त जगह मिल जाती है। इन दिनों प्रचारको को हर नई फिल्‍म के साथ प्रचार की नई युक्तियों के बारे में सोचना पड़ता है। फिल्‍म अगर जब हैरी मेट सेजल जैसी बड़ी हो तो युक्तियां भी नायाब और बड़ी होती हैं। मसलन,‍ि‍पछले दिनों बनारस में शाह रूख खान अपनी हीरोइन अनुष्‍का शर्मा को रिझाने के लिए गायक,अभिनेता और भाजपा के सांसद मनोज तिवारी की मदद ले रहे थे। हांलांकि इस प्रचार से फिल्‍म को कोई ताल्‍लुक नहीं था,लेकिन बनारस के लोगों को खुश करने के लिए भोजपुरी के एक लोकप्रिय गीत सहारा लिया गया। लगावेलु जे लिपिस्टिक... इस गीत की पंक्तियों को फेरबदल के मनोज तिवारी ने शाह रूख खान को सिखाया और उसे अनुष्‍का शर्मा के लिए उन्‍होंने गाया। मनोज तिवारी की मदद से किए गए इस प्रचार से सोशल मीडिया पर नाराजगी वायरल हुई। कुछ महीनों पहले किसी स्‍कूल के इवेंट में एक शिक्षिका के गीत गाने के आगह पर मनोज तिवारी ने उन्‍हें फटकार लगाई थी। सभी उसी प्रसंग को याद कर इस इवेंट की भर्त्‍सना करने लगे। प्रचार का उल्‍टा असर हुआ।
एक रोचक कोशिश अनुचित संदर्भ से बेअसर हो गई। प्रचारकों या या फिल्‍म से संबंधि निर्माता,निर्देशक और सितारों को भी मालूम नहीं रहता कि किस इवेंट का क्‍या असर होगा? बस वे दांव खेल रहे होते हैं। फिल्‍मअ चल जाती है तो मान लिया जाता है कि सारी युक्तियां सही थीं। फिल्‍म असफल रहे तो होंठ सिल जाते हैं।