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Saturday, September 2, 2017

फिल्‍म समीक्षा : शुभ मंगल सावधान



फिल्‍म रिव्‍यू
जेंट्स प्राब्‍लम पर आसान फिल्‍म
शुभ मंगल सावधान
-अजय ब्रह्मात्‍मज
आर एस प्रसन्‍ना ने चार साल पहले तमिल में कल्‍याण समायल साधम नाम की फिल्‍म बनाई थी। बताते हैं कि यह फिल्‍म तमिलभाषी दर्शकों को पसंद आई थी। फिल्‍म उस पुरुष समस्‍या पर केंद्रित थी,जिसे पुरुषवादी समाज में मर्दानगी से जोड़ दिया जाता है। यानी आप इस क्रिया को संपन्‍न नहीं कर सके तो नामर्द हुए। उत्‍तर भारत में रेलवे स्‍टेशन,बस टर्मिनस और बाजार से लेकर मुंबई की लोकल ट्रेन और दिल्‍ली की मैट्रो तक में में नामर्दी का शर्तिया इलाज के विज्ञापन देख कर अंदाजा लगाया जा सकता है कि यह समस्‍या कितनी आम है,लेकिन पूरा समाज इस पर खुली चर्चा नहीं करता। सिर्फ फुसफुसाता है। आर एस प्रसन्‍ना अपनी तमिल फिल्‍म की रीमेक शुभ मंगल सावधान में इस फुसफसाहट को दो रोचक किरदारों और उनके परिजनों के जरिए सार्वजनिक कर देते हैं। बधाई...इस विषय पर बोल्‍ड फिल्‍म बनाने के लिए।
दिल्‍ली की मध्‍यवर्गीय बस्‍ती के मुदित(आयुष्‍मान खुराना) और सुगंधा(भूमि पेडणेकर) एक-दूसरे के प्रति आकर्षित होते हैं। झेंप और झिझक के कारण मुदित ऑन लाइन प्रोपोजल भेज देता है। सुगंध के मा-बाप इस अवसर को लपक लेते हैं। सुगंधा भी राजी है। दोनों का रोका होने वाला है। इसी बीच एक दिन भूमि के घर का एकांत मिलने पर मुदित को एहसास होता है कि वह परफार्म नहीं कर सकता। सुगंधा को लगता है कि बालतोड़ हो गया है और मुदित उसे जेंट्स प्राब्‍लम कहता है। सुगंधा चाहती है कि शादी के पहले मुदित इस समस्‍या का समाधान कर ले। मुदित भी कोशिश में है। बात बन नहीं पाती। शादी का दिन नजदीक आता जा रहा है। सारी तैयारियां हो चुकी हैं। दिल्‍ली से से वर-वधू का परिवार हरिद्वार पहुंच गया है। शादी के पहले सराती-बाराती दोनों पक्षों को मुदित की जेंट्स प्राब्‍लम की जानकारी मिल जाती है। होगा कि नहीं होगा पर बाजियां लग जाती हैं। और फिर...
आर एस प्रसन्‍ना ने लेखक की मदद से तमिल कथाभूमि की फिल्‍म बहुत खूबसूरती और भाव के साथ उत्‍तर भारत की हिंदी पृष्‍ठभूमि में रोपा है। निर्देशक प्रसन्‍ना के साथ निर्माता आनंद एल राय की भी तारीफ करनी होगी कि उन्‍होंने ऐसे जरूरी विषय पर मनोरंजक और आसान फिल्‍म बनाई। विषय का सरलीकरण करने में कुछ दृश्‍य ढीले हुए हैं,लेकिन उनके इस महत्‍वपूर्ण प्रयास की सराहना बनती है। इस विषय पर फिल्‍म बनाने में दृश्‍यों और संवादों में फिसलने का भारी खतरा था। यहां तक कि कलाकारों के परफार्मेंस में फूहड़ता आ सकती थी,लेकिन सभी ने सधे प्रयत्‍न से संतुलन बनाए रखा है। खास कर जेंट्स प्राब्‍लम को जाहिर करने में बगैर सही शब्‍द का इस्‍तेमाल किए ही भूमि,आयुष्‍मान और सीमा वाहवा की भाव-भंगिमा सारे अर्थ खोल देती है। बाद में परिवार के अन्‍य सदस्‍य भी शब्‍द संकेतों और व्‍यंजना में जेंट्स प्राब्‍लम पर खुलेआम विमर्श कर लेते हैं। होगा कि नहीं होगा प्रसंग अतिरेकी हो गया है,फिर भी लेखक,निर्देशक और कलाकार बहकने से बचे हैं।
दिल्‍ली और हरिद्वार के परिवेश और भाषा में रंग और लहजे का पूरा खयाल रखा गया है। फिल्‍म की तकनीकी टीम ने थीम के मुताबिक सब रख है। सहयोगी कलाकारों की चर्चा करें तो निस्‍संदेह सबसे पहले सीमा पाहवा का उल्‍लेख करना होगा। वह किरदारों में आसानी से ढलती हैं। हिंदी फिल्‍मों की नई मां को वह अच्‍छी तरह पेश कर रही हैं। सुगंधा के पिता और काका तथा मुदित के माता-पिता की भूमिकाओं में आए कलाकार फिल्‍म के माहौल और मजे को गाढ़ा करते हैं। आयुष्‍मान खुराना और भूमि पेडणेकर के अभिनय की खासियत है कि वे मुदित और सुगंधा ही लगते हैं। दोनों ने चैलेंजिंग किरदार को पूरी सहजता से निभाया है।
इस फिल्‍म की यह खासियत है कि फिल्‍मों के उल्‍लेख के बावजूद यह फिल्‍मी होने से बची है। किरदारों को उनके परिवेश में ही रखा गया है और रियलिस्‍ट होने की अतिरिक्‍त कोशिश नहीं की गई है।
अवधि- 108 मिनट
*** ½ साढ़े तीन स्‍टार  

Friday, May 12, 2017

संगीत के जरिए हुई दोस्‍ती : आयुष्‍मान परिणीति



संगीत के जरिए हुई दोस्‍ती
-अजय ब्रह्मात्‍मज
आयुष्‍मान खुराना और परिणीति चोपड़ा दोनों ही यशराज फिल्‍म्‍स के बैनर तले आ रही मेरी प्‍यारी बिंदु में पहली बार साथ नजर आएंगे। यह फिल्‍म कोलकाता की पृष्‍ठभूमि पर बनी है। रोमांस की नई जमीन तलाशती इस फिल्‍म में आयुष्‍मान और परिणीति बिल्‍कुल नए मिजाज के किरदारों में दिखेंगे। सप्‍तरंग के लिए उन दोनों से बातचीत करते समय हम ने औपचारिक सवालों को दरकिनार कर दिया। दोनों कलाकारों को खुद के साथ अपने किरदारों के बारे में बताने की आजादी दी।
आयुष्‍मान- तीन साल पहले सौमिक सेन ने मुझे इस फिल्‍म की कहानी सुनाई थी। उसी समय वे परिणीति से भी बात कर रहे थे। तब यह फिल्‍म यशराज के पास नहीं थी। बाद में पता चला कि यशराज के लिए इसे अक्षय राय डायरेक्‍ट कर रहे हैं। मेरी खुशी गहरा गई इस जानकारी से।
परिणीति- मुझे लगता है कि हर स्क्रिप्‍ट की अपनी डेस्टिनी होती है। मेरी इश्‍कजादे के साथ भी यही हुआ था। मेरी प्‍यारी बिंदु मैंने भी पहले सौमिक दा से सुनी थी। तब किसी और फिल्‍म में व्‍यस्‍त होने की वजह से मैंने मना कर दिया था। बाद में यह फिल्‍म लौट कर मेरे पास आ गई।
आयुष्‍मान- परिणीति अंबाला की हैं। मैं चंडीगढ़ का हूं। हमारी पहले मुलाकात तक नहीं हुई। परिणीति मुझ से पांच साल जूनियर थी। मेरी एक ख्‍वाहिश थी कि कभी ऐसी हीरोइन के साथ काम करने का मौका कमले जिसे म्‍यूजिक पसंद हो और जो गाती भी हो। उसके साथ संगीत पर बातें की जा सके।
परिणीति- कभी सोचती हूं कि आयुष्‍मान से मेरी दोस्‍ती इतनी गहरी क्‍यों है? मुझे यही जवाब मिलता है कि हमलोग काफी कनेक्‍टेड हैं। हमारी लाइफ सिमिलर है। हम एक जैसे फमिली बैकग्राउंड से हैं। मुंबई आने के बाद बहुत सारी चीजें ट्राय करने के बाद हमें फिल्‍मों में मौका मिला। हम एक्‍टर बने। म्‍यूजिक का हमारा प्‍यार बहुत ज्‍यादा है। आयुष्‍मान को संगीत की ज्‍यादा जानकारी है।
आयुष्‍मान- संगीत की एकेडमिक जानकारी है परिणीति को। इसने पढ़ाई की है। डिग्री ली है।
परिणीति- लेकिन म्‍यूजिक के प्रति आयुष्‍मान का पैशन बहुत ज्‍यादा है। हमारी दोस्‍ती का जरिया संगीत ही बना। इस दोस्‍ती की वजह से पता ही नहीं चला कि कब फिल्‍म बन गई और हमलोग प्रमोशन करने लगे। एक साल की जान-पहचान में ही लग रहा है कि मैं इसे सालों से जानती हूं।
आयुष्‍मान- पांच साल पहले हम आईफा में मिले थे तो परिणीति ने ईर्ष्‍या से कहा था कि यार तूने तो गा भी लिया। परिणीति चाहती थी कि उसे पहले गाने का मौका मिल जाए। मैं भी चाहता था कि परिणीति गाने गाए। इतनी सीधी और सुर में है इसकी आवाज।
परिणीति- आयुष्‍मान ने ही मुझे गाने के लिए इंस्‍पायर किया। मैं आयुष्‍मान की तरह एक्टिव एक्‍टर और सिंगर बनना चाहती हूं। मेरी कुछ तमन्‍नाएं मेरी प्‍यारी बिंदु में पूरी हुई हैं। आयुष्‍मान मेरे लिए मनीष और अक्षय की तरह स्‍पेशल है और रहेंगे।
आयुष्‍मान- कोलकाता के शेड्यूल में हमारी अंतरंगता नहीं थी। हमारा पहला कनेक्‍शन कोलकाता के प्रेस कांफ्रेंस के लिए जाते समय गाड़ी में हुआ। एक घंटे की ड्रायविंग में हम गाइड के गाने सुनते जा रहे थे। मैंने अचानक डिस्‍कवर किया कि यह तो पिया तोसे नेहा लागी रे जैसा डिफिकल्‍ट गाना गा ले रही है। उसने लता जी की तरह पूरी हरकत ली। तभी मैंने कहा था यू शूड सिंग
परिणीति- मैं कहूंगी कि कीड़ा मेरे अंदर था। एक अच्‍दे दोस्‍त की तरह आयुष्‍मान ने मुझे इंस्‍पायर किया। पुश किया। हम कलाकार आत्‍मकेंद्रित होते हैं। दूसरों के भले और हुनर की बात कहां साचते हैं। आयुष्‍मान ही वजह बना।
आयुष्‍मान- परिणीति ने मेरी मदद की। कई दृश्‍यों में कहा कि कैरेक्‍टर की तरह मासूम और सीधा हो जा। मैं अपनी लाइफ में इस कैरेक्‍अर की तरह सीधा नहीं हूं। अगर मेरे काम की तारीफ होगी तो इसका श्रेय परिणीति को दूंगा।
परिणीमत- आयुष्‍मान को कुछ बताते समय डर या संकोच नहीं हुआ। मैं सीधा कह देती थी कि बकवास है। एक और कर.. आयुष्‍मान भी ईमानदारी से सुझाव देते थे। ईमानदारी ही हमारे संबंध का आधार है।

बाक्‍स के लिए
अभिमन्‍यु के बारे में परिणीति : अभिमन्‍यु वह इंसान है,जो हर लड़की का ड्रीम है। वह सहज और प्रेम में आकंठ डूबा हुआ है। वह सिर्फ बिंदु के बारे में सोचता है। हर तरह से सपोर्ट करता है। वह बिंदु की पहचान और आजादी का हिमायती है। गौर करें तो आयुष्‍मान की आंखों से मासूमियत झलकती है,जो अभिमन्‍यु कि किरदार से मैच करती है।
बिंदु के बारे में आयुष्‍मान- बिंदु किसी चिडि़या की तरह आजाद है। वह अपने समय से आगे जी रही है। उसे जिंदगी जीना आता है। बिंदु के आते ही पर्दा रोशन हो जाता है। वह अपनी एनर्जी और साचे से सबको मुग्‍ध कर देती है।

Tuesday, January 31, 2017

देसी किरदार होते हैं मजेदार : भूमि पेडणेकर




    -अजय ब्रह्मात्‍मज
भूमि पेडणेकर अभी मुंबई में टॉयलेट-एक प्रेम कथा की शूटिंग कर रही हैं। इसी फिल्म की शूटिंग के सिलसिले में वे कुछ महीनों पहले मथुरा और आगरा में थीं। दम लगा के हईसा की रिलीज के बाद से उनकी कोई फिल्म अभी तक नहीं आई है। इस बीच उन्होंने अपनी पहली फिल्म के हीरो आयुष्‍मान खुराना के साथ ही शभ मंगल सावधान की शूटिंग पूरी कर ली है। आयुष्‍मान और भूमि दोनों ही आनंद एल रॉय प्रस्तुत इस फिल्म में नए रूप-रंग और अंदाज में दिखेंगे। शुभ मंगल सावधान के निर्देशक प्रसन्ना हैं।
    हमारी बात पहले टॉयलेट एक प्रेम कथा से ही शुरू होती है। इस फिल्म की घोषणा के समय से ही टायटल की विचित्रता के कारण जिज्ञासा बनी थी। टॉयलेट एक प्रेम कथा नीरज पांडे के प्रॉडक्‍शन की फिल्म है। इसे श्री नारायण सिंह निर्देशित कर रहे हैं। भूमि बताती हैं, आगरा और मथुरा में इस फिल्म की शूटिंग में बेहद मजा आया। साथ में अक्षय कुमार जैसे अभिनेता हों तो हर तरह की सुविधा हो जाती है। टॉयलेट एक प्रेम कथा रोमांटिक सटायर है। दर्शकों को यह यूनीक लव स्टोरी बहुत मजेदार लगेगी। फिल्म की कहानी गोवर्द्धन की पृष्‍ठभूमि में है। गोवर्द्धन आगरा और मथुरा के बीच स्थित है। खास बात है कि टॉयलेट एक प्रेम कथा फनी के होने के साथ ही सामाजिक रूप से प्रासंगिक फिल्म है। इस फिल्म की अभी जरूरत है। देश के स्वच्छता अभियान का समर्थन करती है यह फिल्म।
    भूमि पेडणेकर के नाम से उनका मराठी होने का अहसास होता है। दम लगा के हईसा और टॉयलेट एक प्रेम कथा की शूटिंग के दौरान उत्‍तर भारत में रहने के अनुभवों के बारे में पूछने वह कहती हैं, कम लोगों को मेरा नॉर्थ इंडियन कनेक्शन मालूम है। उत्‍तर भारत मेरे लिए कभी नया नहीं रहा। मैं साल के कुछ महीनों के लिए वहां जाती रही हूं। हरियाणा में मेरा ननिहाल है। मेरी मां वहां की हैं। मैं तो एक तरह से नॉर्थ इंडिया में भी पली-बढी हूं। वहां का कल्चर मेरे लिए अनजान नहीं है। मेरे अंदर जो गुस्सा और प्यार है, वह हरियाणा का ही है। हिम्मत भी वहीं से मिली है। मैं हरियाणवी नहीं बोल पाती हूं, लेकिन समझ लेती हूं। हरियाणा के संपर्क की वजह से मेरी हिंदी साफ है।
    बहरहाल, शुभ मंगल सावधान इसी साल अगस्त में रिलीज होगी। यह रोमांटिक स्टोरी है। मैं दावा कर सकती हूं कि ऐसी रोमांटिक स्टोरी हिंदी फिल्मों में तो नहीं बनी है। मेरा किरदार देश की हर लड़की से कनेक्ट कर पाएगा। बहत ही सरस फिल्म है। फैमिली एंटरटेनमेंट के रूप में आ रही इस फिल्म पर पूरा भरोसा है, क्योंकि इसके साथ आनंद एल राय और इरॉस की  बैकिंग में यह केमिस्ट्री पर्दे पर दिखाई पड़ती है। सेट पर हमारा कंफर्ट जोन देख कर यूनिट के लोग दंग रह जाते हैं। हमारे डायरेक्टर प्रसन्ना का अप्रोच नया और अलग है।
    भूमि की दूसरी फिल्म के भी हीरो आयुष्‍मान खुराना हैं। क्या पहली फिल्म की सराहना का लाभ शुभ मंगल सावधान को मिलेगा। भूमि अपनी खुशी छिपा नहीं पातीं। वे कहती हैं, दूसरी फिल्म में आयुष्‍मान के साथ आकर मैं बहुत खुश हूं। वह मेरे पहले को-स्टार हैं। उनके साथ मेरा संबंध स्पेशल है और हमेशा रहेगा। हम अच्छे दोस्त हैं। अच्छी बात है कि वे बहुत ही उम्दा एक्टर हैं। उम्दा एक्टर होने के साथ-साथ वे अपना काम भी बेहतर होता है। हम दोनों अपनी एक्टिंग को लेकर बहुत सुरक्षित हैं। आयष्‍मान खुराना भी भूमि को पूरा सम्मान देते हैं। वे भूमि को लेडी आमिर खान कहते हैं। वह इसलिए कि उन्होंने भी उनकी ही तरह अपना वजन बढाया था। फर्क इतना ही है कि उन्होंने किसी एक फिल्म के लिए ऐसा नहीं किया। भूमि अपने को-स्टार की इस तारीफ पर हंसती हैं। वे कहती हैं, इसकी वजह से मेरी आइडेंटिटी क्राइसिस बढ़ जाती है। परिवार के लोग पहचान नहीं पाते। मां भी नहीं पहचानती। मुझे लगता है कि टॉयलेट एक प्रेम कथा में ही दर्शक असली भूमि पेडणेकर को देख पाएंगे।
    शुभ मंगल सावधान की कहानी दिल्ली की है। इस फिल्म के नैरेशन के समय ही हम हंस-हंस कर लोटपोट हो रहे थे। बहत मजा आया था। यही उम्मीद है कि वही मजा दर्शकों को भी आएगा। मैं कह सकती हूं कि शुभ मंगल सावधान लीक से हटकर लव स्टोरी है। फिल्म में मेरे किरदार का नाम सुगंधा है। आनंद एल रॉय और इरॉस साथ आते हैं तो एसोसिएशन बहुत अच्छा हो जाता है। वे सिंपल देसी कहानी उठाते हैं। उनकी फिल्में स्वीट और सिंपल रहती हैं। शुभ मंगल सावधान भी उसी जोन की फिल्म है।
    भूमि की उक्त तीनों फिल्मों को देख ऐसा लग रहा है कि वे खास किस्म की भूमिका में बंधती जा रही हैं। भूमि बताती हैं कि वह तीनों फिल्मों के मेरे किरदार बहुत अलग है। हां, तीनों हिंदुस्तानी लड़कियां हैं। उनका संबंध खास किस्म के परिवेश से है। अभी तो इतना ही कह सकती हूं कि टाइपकास्ट होने के डर से फिल्में नहीं छोडूंगी। अभी लेखक-निर्देशक समझ गए हैं कि हमारे दर्शक स्मार्ट हो गए हैं। जरा भी दोहराव होगा तो वे रिजेक्ट कर देंगे। आप उन्हें एक ही फिल्म नहीं दे सकते। तो क्या भूमि की ख्‍वाहिश नहीं है कि वह भी पहाड़ी वादियों में शिफॉन की साड़ी पहने कोई रॉकस्टार गीत गाएं? भूमि जवाब देती हैं, अभी तो मुझे एक साल हुआ है। दर्शकों का प्रेम मिलता रहा तो वह भी मिलेगा। असल हिंदुस्तानी की भूमिका निभाने में मुझे मजा आता है। गर्व होता है।  

Saturday, February 28, 2015

फिल्‍म समीक्षा : दम लगा के हईसा


चुटीली और प्रासंगिक
-अजय ब्रह्मात्मज
    यशराज फिल्म्स की फिल्मों ने दशकों से हिंदी फिल्मों में हीरोइन की परिभाषा गढ़ी है। यश चोपड़ा और उनकी विरासत संभाल रहे आदित्य चोपड़ा ने हमेशा अपनी हीरोइनों को सौंदर्य और चाहत की प्रतिमूर्ति बना कर पेश किया है। इस बैनर से आई दूसरे निर्देशकों की फिल्मों में भी इसका खयाल रख जाता है। यशराज फिल्म्स की ‘दम लगा के हईसा’ में पहली बार हीरोइन के प्रचलित मानदंड को तोड़ा गया है। फिल्म की कहानी ऐसी है कि सामान्य लुक की एक मोटी और वजनदार हीरोइन की जरूरत थी। भूमि पेंडणेकर ने इस जिम्मेदारी को बखूबी निभाया है। इस फिल्म में उनके साथ सहायक कलाकारों का दमदार सहयोग फिल्म को विश्वसनीय और रियल बनाता है। खास कर सीमा पाहवा,संजय मिश्रा और शीबा चड्ढा ने अपने किरदारों को जीवंत कर दिया है। हम उनकी वजह से ही फिल्म के प्रभाव में आ जाते हैं।
    1995 का हरिद्वार ¸ ¸ ¸देश में प्रधानमंत्री नरसिंहा राव की सरकार है। हरिद्वार में शाखा लग रही है। प्रेम एक शाखा में हर सुबह जाता है। शाखा बाबू के विचारों से प्रभावित प्रेम जीवन और कर्म में खास सोच रखता है। निर्देशक ने शाखा के प्रतिगामी असर का इशारा भर किया है। तिवारी परिवार का यह लड़का ऑडियो कैसेट की दुकान चलाता है। कुमारा शानू उसकी कमजोरी हैं। उनके अलावा वह पिता की चप्पल और परीक्षा में अंग्रेजी भी उसकी कमजोरी है। तिवारी परिवार अपने लाडले की शादी पढ़ी-लिखी सर्विसवाली बहू से कर देना चाहते हैं। वे उसके मोटापे को नजरअंदाज करते हैं। प्रेम न चाहते हुए भी पिता और परिवार के दबाव में शादी कर लेता है। वह अपनी पत्नी संध्या को कतई पसंद नहीं करता। एक बार गुस्से में वह कुछ ऐसा कह जाता है कि आहत संध्या उसे छोड़ कर चली जाती है। बात तलाक तक पहुंचती है। फैमिली कोर्ट उन्हें छह महीने तक साथ रहने का आदेश देता है ताकि वे एक-दूसरे को समझ सकें। इसी दौर में प्रेम और संध्या करीब आते हैं। और आखिरकार ¸ ¸ ¸
    निर्देशक शरद कटारिया ने उत्तर भारत के निम्न मध्यवर्गीय परिवारों की रोजमर्रा जिंदगी से यह कहानी चुन ली है। बेमेल शादी के बहाने वे कई जरूरी मुद्दों को भी छूते चलते हें। फिल्म में प्रसंगवश सामाजिक विसंगतियों पर करारा व्यंग्य भी है। लेखक-निर्देशक ने संयमित तरीके से हरिद्वार के माहौल को रचा है। उन्होंने अपने चरित्रों को लार्जर दैन लाइफ नहीं होने दिया है। फिल्म में मध्यवर्गीय परिवारों के दैनंदिन प्रसंग और रिश्तों के ढंग हैं। प्रेम और संध्या के परिवारों के सदस्यों को भी निर्देशक ने स्वाभाविक रखा है। उनके व्यवहार, प्रतिक्रिया और संवादों से फिल्म के प्रभाव का घनत्व बढ़ता है।
    कलाकारों में संजय मिश्रा और सीमा पाहवा की तारीफ करनी होगी। उनकी जोड़ी को हम रजत कपूर की ‘आंखों देखी’ में देख चुके हैं। इन दोनों कलाकारों ने आयुष्मान खुरााना और भूमि पेंडणेकर का काम आसान कर दिया है। भूमि पेंडणेकर की यह पहली फिल्म है। बगैर आयटम सौंग और अंग प्रदर्शन के भी वह अपील करती हैं। यह अलग बात है कि भविष्य की फिल्मों के लिए उन्हें अलग से मेहनत करनी होगी। संध्या के किरदार के लिए वह उपयुक्त हैं। उन्होंने अपने किरदार को नार्मल और नैचुरल रखा है। सालों बाद हिंदी फिल्मों में बुआ दिखी है। बुआ के रूप में शीबा चड्ढा अच्छी और चुटीली हैं।
    वरुण ग्रोवर और अनु मलिक के गीत-संगीत में पीरियड का पूरा ध्यान रखा गया है। वे उस पीरियड के संगीत की नकल में भोंडे नहीं हुए हैं। वरुण ग्रोवर के गीतों में आमफहम भाषा और अभिव्यक्ति रहती है। वह यहां भी है। इस फिल्म की भाषा मल्टीप्लेक्स के दर्शकों को वैसी ही लग सकती है, जैसे सिंगल स्क्रीन के दर्शकों को अंग्रेजी अंग्रेजी मिश्रित भाषा लगती है। उत्तर भारत के दर्शक मल्टीप्लेक्स और सिंगल स्क्रीन में इस फिल्म का आनंद उठाएंगे।
अवधि- 111 मिनट
 *** १/२ साढ़े तीन स्टार

Monday, February 2, 2015

फिक्शनल बॉयोपिक है विभु पुरी की ‘हवाईजादा’


-अजय ब्रह्मात्मज
    ‘हवाईजादा’ के निर्देशक विभु पुरी एफटीआईआई के ग्रेजुएट हैं। उनकी शॉर्ट फिल्म ‘चाभीचाली पाकेट वाच’ 2006 में स्टूडेंट ऑस्कर के लिए नामांकित हुई थी। एफटीआआई के दिनों में ही संजय लीला भंसाली उनके काम से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने साथ काम करने का ऑफर दिया। पुणे से निकलने के बाद विभु पुरी उनके सहयोगी लेखक और सहनिर्देशक रहे। ‘सांवरिया’ और ‘गुजारिश’ में दोनों का क्लोज एसोसिएशन रहा। उम्मीद थी कि संजय लीला भंसाली के प्रोडक्शन से ही विभु की पहली फिल्म आएगी,मगर ऐसा हो नहीं सका। बहरहाल,इस महीने 30 जनवरी को उनकी फिल्म ‘हवाईजादा’ आ रही है। इसमें आयुष्मान खुराना और पल्लवी शारदा के साथ मिथुन चक्रवर्ती भी हैं।
    विभु पुरी के शब्दों में कहें तो वे दिल्ली में पले,बढ़े और बिगड़े। बचपन दिल्ली के पहाडग़ंज की रिफ्यूजी कॉलोनी में बीता। उनके दादा-दादी पार्टीशन के समय पाकिस्तान से भारत माइग्रेट किए थे। रात में सोने सेे पहले परिकथाओं की जगह विभु ने पार्टीशन की कहानियां सुनीं। बंटवारे की उन कहानियों में दादाजी हमेशा आजादी की बातें करते थे। सब कुछ छोड़ कर शरणार्थी की तरह भारत आए दादाजी को कोई मलाल नहीं था। अपने वजूद की लड़ाई लड़ते हुए भी उनके पास खूबसूरत कहानियां थीं। अफसोस इस बात का था कि दोस्त छूट गए। मध्यवर्गीय संस्कारों और आर्थिक सीमाओं में ही विभु बड़े हुए। परिवार का मंत्र ‘थोड़ा है,थोड़े की जरूरत है’ रहा। दोस्तों की अमीरी का कोई रंज नहीं रहा। विभु अपने दादाजी की शिक्षाओं और कहानियों के एहसानमंद हैं। उन्हें अपनी शिक्षिका मधुबाला श्रीवस्जव भी याद हैं,जिन्होंने इतिहास के अध्यायों को कहानियों में तब्दील कर दिया था।
    दिल्ली यूनिवर्सिटी के एक कॉलेज से मैनेजमेंट की पढ़ाई पूरी करने के बाद विभु ने जामिया से मीडिया का कोर्स किया। इस कोर्स के दौरान ही उन्हें लगा कि अपनी जमीन पाने के लिए उन्हें कहीं और निकलना पड़ेगा। वे एफटीआईआई पुणे आ गए। इंस्टीट्यूट में 2002 से 2006 की पढ़ाई के दरम्यान विश्व सिनेमा से परिचय हुआ। विभु इन चार सालों का अपने बचपन की तरह खास मानते हैं कि क्योंकि ढलने की प्रक्रिया यहीं आरंभ हुई। पुणे में ही विभु ने स्वयं को पाया। पसंद-नापसंद और अच्छे-बुरे की समझ के साथ यह भी समझदारी आई कि वे किन चीजों से जुड़े और किन चीजों से अलग हैं। संजय लीला भंसाली से पुणे में ही मुलाकात हुई। भंसाली ने प्रोत्साहित करने के साथ ऑफर दिया कि पढ़ाई के बाद तुम मेरे साथ काम करोगे। वे शिक्षक बने। उन्होंने सिनेमा की दुनिया का दर्शन करवाया और दिशा दी। संजय के साथ काम करते-करते विभु को एहसास हुआ कि अगर मुझे भी बरगद बनना है तो सबसे पहले बरगद की छांव से निकलना होगा। नई और अपनी जमीन की तलाश में वे संजय को छोड़ कर निकले। एहसान और सृजनात्मक ऋण के साथ विभु अपने आसमान की खोज में निकले। उसी तलाश में विभु की मुलाकात शिवकर बापूजी तलपडे से हो गई। उन्होंने मानव सभ्यता के इतिहास में पहला विमान उड़ाया था।
    विभु को लगा यह बात सच नहीं हो सकती,क्योंकि हम सभी को यही बताया और पढ़ाया गया है कि राईट बंधुओं ने पहला विमान उड़ाया था। अनियोजित पड़ाई के क्रम में विभु पुरी ने शिवकर के बारे में कहीं पढ़ा था। रुचि बढ़ी तो और भी सामग्रियां मिलीं। दरअसल,विभु जेआरडी टाटा के बारे में शोध कर रहे थे। उसी शोध में एक संकेत शिवकर बापूजी तलपडे का मिला। 2011 की  जनवरी में विभु के जहन में शिवकर आए और अब चार सालों के बाद उनकी जीवन और मिशन पर्दे पर आ रहा है। चार सालों तक विभु और शिवकर का साथ रहा। शिवकर के बारे में विभु को विरोधी साक्ष्य मिले। कोई उन्हें जीनियस बता रहा था तो कोई उनकी उपलब्धि को मनगढ़ंत किस्सा कह रहा था। इससे विभु की जिज्ञासा और बढ़ी। उन्हें लगा कि शिवकर की स्टोरी सभी को बताई जानी चाहिए। कहानी में कल्पना से काम लिया गया और किरदार को रोचक बनाने के साथ साकार किया गया। कोशिश की गई है कि हर तबके के दर्शक इसे देख सकें। विभु पुरी ‘हवाईजादा’ को फिक्शनल बॉयोपिक कहना चाहते हैं। हॉलीवुड में इस जोनर में अनेक फिल्में बनी हैं।
    इस कहानी का मूल है कि इंसानी रिश्ते ही काम करते हैं। उपलब्धि से अधिक रोचक संघर्ष होता है। यह शिवकर के सपनों की कहानी है। इस सपने को पूरी करने की कोशिश है। ‘हवाईजादा’ में राष्ट्रीय भावना भी है। यह बताने और दिखाने की कोशिश की गई है कि उस समय का कैसा माहौल था। जाहिर सी बात है कि फिल्में में कहानी का समाज और तत्कालीन राजनीति तो आ ही जाएगी। हिंदी फिल्मों ने विषयों की सीमा तय कर दी है। एक नया समाज गढ़ दिया है। निर्देशक और दर्शकों की आंखों पर ब्लाइंडर लगा हुआ है। विभु ने खोजबीन करने पर पाया कि तलपडे का वंशवृक्ष 1950 के आसपास समाप्त हो गया। अपने दूर-दराज के रिश्तेदारों के लिए वह एक किंवदंती बन गए। उनकी जिंदगी की घटनाओं में किस्से -कहानी जुड़ते गए। ऐसा लगता है कि शिवकर जैसा समझदार व्यक्ति अपने समय की राजनीति से परिचित होगा। तभी विभु ने उनके संवाद में वंदे मातरम का इस्तेमाल किया। विभु तैयार हैं कि इस पर बहस होगी तो वे तर्क देंगे।
   

Friday, January 30, 2015

फिल्‍म समीक्षा हवाईजादा

अजय ब्रह्मात्मज
निर्देशक: विभु पुरी
स्टार: 2.5
विभु पुरी निर्देशित 'हवाईजादा' पीरियड फिल्म है। संक्षिप्त साक्ष्यों के आधार पर विभु पुरी ने शिवकर तलपड़े की कथा बुनी है। ऐसा कहा जाता है कि शिवकर तलपड़े ने राइट बंधुओं से आठ साल पहले मुंबई की चौपाटी में विश्व का पहला विमान उड़ाया था। अंग्रेजों के शासन में देश की इस प्रतिभा को ख्याति और पहचान नहीं मिल पाई थी। 119 सालों के बाद विभु पुरी की फिल्म में इस 'हवाईजादा' की कथा कही गई है।
पीरियड फिल्मों के लिए आवश्यक तत्वों को जुटाने-दिखाने में घालमेल है। कलाकारों के चाल-चलन और बात-व्यवहार को 19 वीं सदी के अनुरूप नहीं रखा गया है। बोलचाल, पहनावे और उपयोगी वस्तुओं के उपयोग में सावधानी नहीं बरती गई है। हां, सेट आकर्षक हैं, पर सब कुछ बहुत ही घना और भव्य है। ऐसे समय में जब स्पेस की अधिक दिक्कत नहीं थी, इस फिल्म को देखते हुए व्यक्ति और वस्तु में रगड़ सी प्रतीत होती है।
शिवकर तलपड़े सामान्य शिक्षा में सफल नहीं हो पाता, पर वह दिमाग का तेज और होशियार है। पिता और भाई को उसके फितूर पसंद नहीं आते। वे उसे घर से निकाल देते हैं। उस रात वह दो व्यक्तियों से टकराता है। एक है सितारा, जो पहली मुलाकात के बाद ही उसके दिल में बिंध जाती है और दूसरे सनकी शास्त्री...जिन्हें लगता है कि शिवकर उनके प्रयोगों को आगे ले जा सकता है। प्रेम और प्रयोग के दो छोरों के बीच झूलते शिवकर तलपड़े की प्राथमिकता बदलती रहती है। नतीजतन कहानी रोचक होने के बावजूद प्रभावित नहीं कर पाती। इसकी वजह शिवकर तलपड़े के चरित्र निर्वाह में रह गई कमियां और थोपी गई खूबियां हैं।
ऐसे समय में जब सार्वजनिक जीवन में एक खास राजनीति और राष्ट्रीय भावना से प्रेरित विचार ने सभी को विस्मित कर रखा है, ऐसी फिल्म का आना भ्रम को बढ़ाता ही है। शिवकर तलपड़े के प्रयोग और उपलब्धि के पर्याप्त ऐतिहासिक साक्ष्य नहीं हैं। चूंकि 'हवाईजादा' काल्पनिक कथा नहीं है, इसलिए भ्रम और गहरा होता है। लेखक-निर्देशक ने सिनेमाई छूट लेते हुए राष्ट्रवाद, देशभक्ति और वंदे मातरम भी फिल्म में शामिल कर दिया है। कहना मुश्किल है कि 1895 में मुंबई में वंदे मातरम के नारे लगते होंगे।
अतीत की ऐसी कथाएं किसी भी देश के इतिहास के संरक्षण और वर्तमान के लिए बहुत जरूरी होती हैं, लेकिन उन्हें गहरे शोध और साक्ष्यों के आधार पर फिल्म की कहानी लिखी है। शिवकर तलपड़े और उनके सहयोगी चरित्र थोड़े नाटकीय और कृत्रिम लगते हैं। सनकी वैज्ञानिक शास्त्री का किरदार ऐसा ही लगता है। फिल्म में ही दिखाया गया है कि वेदों और ऐतिहासिक ग्रंथों के आधार पर शास्त्री ने वैमानिकी की पुस्तक तैयार की थी, फिर उस पुस्तक के आधार पर विमान बनाने और उड़ाने का श्रेय अकेले शिवकर तलपड़े को देना उचित नहीं लगता।
विभु पुरी अपनी सोच और ईमानदारी से उन्नीसवीं सदी के अंतिम वर्षों का माहौल रचते हैं। इसमें उनके आर्ट डायरेक्टर अमित रे ने भरपूर सहयोग दिया है। उन्होंने पीरियड को वर्तमान संदर्भ दिया है, लेकिन उसकी वजह से तत्कालीन परिस्थितियों के चित्रण में फांक रह गई है। उन्नीसवीं सदी की मुंबई की बोली और माहौल रचने में भी फिल्म की टीम की मेहनत सराहनीय है।
कलाकारों में आयुष्मान खुराना ने शिवकर तलपड़े की चंचलता और सनकी मिजाज को पकडऩे की अच्छी कोशिश की है। कहीं-कहीं वे किरदार से बाहर निकल जाते हैं। शास्त्री के रूप में मिथुन चक्रवर्ती कृत्रिम और बनावटी लगते हैं। पीरियड फिल्म में उनका उच्चारण और लहजा आड़े आ जाता है। पल्लवी शारदा कुशल नृत्यांगना हैं। उनके अभिनय के बारे में यही बात नहीं कही जा सकती। बाल कलाकार नमन जैन प्रभावित करते हैं। उनकी मासूमियत और संलग्नता प्रशंसनीय है।
'हवाईजादा' में गीतों के अत्यधिक उपयोग से कथा की गति बाधित होती है। नायक के समाज प्रेम और प्रयोग का द्वंद्व चलता रहता है।
अवधि: 147 मिनट

Thursday, January 29, 2015

ऊंचाइयों का डर खत्‍म हो गया - आयुष्‍मान खुराना

-अजय ब्रह्मात्‍मज 
    ‘विकी डोनर’ से हिंदी फिल्मों में आए आयुष्मान खुराना की अगली फिल्म ‘हवाईजादा’ है। विभु पुरी निर्देशित ‘हवाईजादा’ पीरियड फिल्म है। यह फिल्म दुनिया के पहले विमानक के जीवन से प्रेरित है,जो गुमनाम रह गए।  विभु पुरी ने विमानक शिवकर तलपडे के जीवन को ही ‘हवाईजादा’ का विषय बनाया।
-पीरियड और अपारंपरिक फिल्म ‘हवाईजादा’ के लिए हां करते समय मन में कोई संशय नहीं रहा?
0 मेरी पहली फिल्म ‘विकी डोनर’ अपारंपरिक फिल्म थी। कांसेप्ट पर आधारित उस फिल्म को दर्शकों और समीक्षकों की सराहना मिली थी। बीच में मैंने दो कंवेशनल फिल्में कीं। फिर मुझे एहसास हुआ कि मुझे ऐसी ही फिल्म करनी चाहिए,जिसमें स्क्रिप्ट ही हीरो हो। इसी कारण मैं लगातार दो ऐसी फिल्में कर रहा हूं। पहली बार मैं कुछ ज्यादा अलग करने की कोशिश कर रहा हूं। एक मराठी किरदार निभा रहा हूं।
- शिवकर तलपडे के किरदार के बारे में क्या बताना चाहेंगे? और उन्हें पर्दे पर कैसे निभाया?
0 शिवकर तलपडे ने राइट बंधुओं से पहले विमान उड़ाया था। यह सुनते ही मेरे पैरों तले की जमीन खिसक गई थी। पहले मैंने विभु पुरी के बारे में पता किया। पता चला कि वे बड़े होनहार डायरेक्टर हैं। उनकी स्टूडेंट फिल्म ऑस्कर के लिए नॉमिनेट हुई थी। हिंदी भाषा पर उनकी गजब की पकड़ है। मैंने विभु से उनकी सनक ली और सौरभ भावे से उनकी मराठी। अपना चार्म भी डाल दिया। इस तरह शिवकर तलपडे तैयार हो गए। हर बॉयोपिक का रेफरेंस होता है। तलपडे की कोई जानकारी नहीं मिलती। इसका फायदा मिला कि डायरेक्टर के साथ मिल कर मैंने खूबसूरत दुनिया तैयार की। मेरे स्टाफ मराठी हैं। उन्हें हिदायत दे रखी थी कि वे मुझ से मराठी में ही बातें करें। मराठी सुनने से भाषा की पकड़ बढ़ी।
-विभु पुरी के अप्रोच को कैसे देखते हैं?
0 विभु बिल्कुल अलग डायरेक्टर हैं। श्ुाजीत सरकार की फिल्में रियल स्पेस में होती हैं। विभु उनके विपरीत हैं। विभु फैंटेसी में यकीन रखते हैं। वे मेरे यंगेस्ट डायरेक्टर हैं। परफेक्शनिस्ट हैं। सही चीज नहीं मिलती तो लगे रहते हैं। बारीकियों पर ध्यान देते हैं। ‘हवाईजादा’ के ट्रेलर से झलक तो मिल ही गई है।
-जोरदार एंट्री मारी थी आप ने। उस सफलता से क्या सीखा आप ने?
0 सफलता बहुत ही खराब शिक्षक है। असफलता सिखाती है। मैंने अपनी जिंदगी में रिजेक्शन ही रिजेक्शन झेले हैं। इसलिए बीच की दो फिल्मों के न चलने से ज्यादा निराशा नहीं हुई है। मेरे दोस्त पुराने ही हैं। नए दोस्त नहीं के बराबर हैं। वे मुझे जमीन पर रखते हैं। शुजीत सरकार और आदित्य चोपड़ा मेरे मेंटोर हैं। जॉ अब्राहम को दोस्त कह सकता हूं। विभु शांत स्वभाव के दोस्त हैं।
-पीरियड फिल्म में नेशनल फीलिंग भी डाली गई है। इस रुझान से आप कितने सहमत हैं?
0 इस विषय पर विभु से मेरी बातें हुई हैं। विभु प्रो-नेशनिलिज्म हैं। मैं चाहता था कि शिवकर के विमान उड़ाने की सनक तक हम सीमित रहें। विभु की सोच व्यापक थी। उन्होंने कहा कि अगर विमान उड़ाते हुए शिवकर अगर कहे कि मैं पहला आजाद हिंदुस्तानी हूं तो क्या दिक्कत है। अंग्रेजों का राज जमीन पर था। वह उड़ गया तो खुद को आजाद मान बैठा। ट्रेलर देख कर राय न निकालें। फिल्म में विमान की बातें ज्यादा हैं। वैसे राष्ट्रवाद उस दौर के अनुकूल है और आज भी प्रासंगिक है।
-आप बाहर से आए हैं। क्या आप को समान अवसर मिल रहे हैं?
0 हां,मिले और मिल रहे हैं। मेरी खुशनसीबी है कि मैं आउटसाइडर हूं। मेरे जैसा मजा इनसाइडर को नहीं मिल सकता। तमाम रिजेक्शन के बाद आप को बेस्ट डेब्यू पुरस्कार मिल रहे हैं। खाली हाथ आकर मैंने इतना पा लिया है। हां,मालूम है कि हर फिल्म में साबित करना होगा। यही तो चुनौती है। सही जगह पर सही समय में पहुंचा। और अब अवसर मिल रहे हैं। मेरे चुनाव सही या गलत होते रहेंगे। 2007 में एक पागलपन के साथ मुंबई आया था। वह आज भी बरकरार है।
-‘हवाईजादा’ का कोई खास अनुभव जो साथ रह गया हो?
0 ऊंचाइयों का डर खत्म हो गए। 40 फीट की ऊंचाई पर 15 टेक दिए। हर बार लगता था कि सुरक्षा के बावजूद कुछ भी हो सकता है। फिल्म में काफी समय जमीन से ऊपर रहा।
-स्टार होने के बाद क्या आनंद आ रहा है?
0 फिल्ममेकिंग का ट्रैवलिंग पार्ट बहुत एंज्वॉय करता हूं। शूट के दौरान हमारा इतना खयाल रखा जाता है। सच्ची हमार आदतें खराब हो जाती हैं।

Sunday, April 14, 2013

फिल्‍म समीक्षा : नौटंकी साला

Movie review: Nautanki saala-अजय ब्रह्मात्‍मज 
फूहड़ और फार्मूला कामेडी की हमें आदत पड़ चुकी है। फिल्मों में हंसने की स्थितियां बनाने के बजाए लतीफेबाजी और मसखरी पर जोर रहता है। सुने-सुनाए लतीफों को लेकर सीन लिखे जाते हैं और उन्हें ही संवादों में बोल दिया जाता है। ऐसी फिल्में हम देखते हैं और हंसते हैं। इनसे अलग कोई कोशिश होती है तो वह हमें नीरस और फीकी लगने लगती है। 'नौटंकी साला' प्रचलित कामेडी फिल्मों से अलग है। नए स्वाद की तरह भाने में देरी हो सकती है या फिर रोचक न लगे। थोड़ा धैर्य रखें तो थिएटर से निकलते समय एहसास होगा कि स्वस्थ कामेडी देख कर निकल रहे हैं, लेकिन 'जंकफूड' के इस दौर में 'हेल्दी फूड' की मांग और स्वीकृति थोड़ी कम होती है।
रोहन सिप्पी ने एक फ्रांसीसी फिल्म की कहानी का भारतीयकरण किया है। अधिकांश हिंदी दर्शकों ने वह फिल्म नहीं देखी है, इसलिए उसका उल्लेख भी बेमानी है। यहां राम परमार (आयुष्मान खुराना) है। वह थिएटर में एक्टर और डायरेक्टर है। एक रात शो समाप्त होने के बाद अपनी प्रेमिका के साथ डिनर पर जाने की जल्दबाजी में उसके सामने आत्महत्या करता मंदार लेले (कुणाल राय कपूर)आ जाता है। वह उसकी जान बचाता है। एक चीनी कहावत है कि आप जिसकी जान बचाते हैं, उसकी जिंदगी आप की जिम्मेदारी हो जाती है। यह मुहावरा राम के जीवन में चरितार्थ होने लगता है। हताश मंदार की जिदगी को ढर्रे पर लाने के लिए राम को वास्तविक जिंदगी में नौटंकी करनी पड़ती है। इस नौटंकी के दरम्यान वह खुद इमोशनल जाल में फंसता है। मजेदार स्थिति बनती है। भावनात्मक आवेश में स्थितियां अनियंत्रित होती हैं और अनचाहे परिणाम दे जाती हैं।
रोहन सिप्पी ने किरदारों के अनुरूप कलाकारों को चुना है। हिंदी फिल्मों में कलाकारों के साथ दर्शकों का अनोखा रिश्ता होता है। यह रिश्ता उनकी इमेज, बातचीत और निभाए किरदारों से बनता है। नई फिल्म देखते समय हम कलाकारों की उस पहचान और रिश्ते का इस्तेमाल करते हैं और अधिक आनंदित होते हैं। 'नौटंकी साला' में अगर सुपरिचित कलाकार होते तो रोहन सिप्पी हंसाने में अधिक कामयाब होते, लेकिन ऐसी कोशिश कई बार प्रहसन भी बन जाती है। आयुष्मान खुराना ने राम की नौटंकी को अच्छी तरह पर्दे पर जीवंत किया है। स्थूल और हताश मंदार लेले की भूमिका में कुणाल रॉय कपूर जंचे हैं, फिर भी उन्हें संवाद अदायगी पर थोड़ा ध्यान देना था। थिएटर के प्रोड्यूसर की भूमिका निभा रहे कलाकार ने प्रभावित किया है। लड़कियों की भूमिका सीमित थी। उन्होंने अपनी सीमाओं में निराश नहीं किया है। नयी होने से उनमें एक ताजगी है। पूजा साल्वी, गेलिन मेंडोसा और एवलिन शर्मा उम्मीद जगाती हैं।
रोहन सिप्पी की फिल्मों में गीन-संगीत थोड़ा अलग रहता है। इस बार उन्होनें पुराने गीतों का सुंदर उपयोग किया है।
पुन:श्च - फिल्म में चल रहे नाटक रावणलीला की प्रस्तुति एकदम नयी है। रंगकर्मी यहां से रामलीला को नए ढंग से प्रस्तुत करने की प्रेरणा ले सकते हैं।

Friday, April 20, 2012

फिल्‍म समीक्षा : विक्‍की डोनर

दर्शनीय है विक्की डोनर

-अजय ब्रह्मात्‍मज 

अपनी शोहरत और दौलत का इस्तेमाल कर अनेक स्टार खुद की प्रोडक्शन कंपनी की फिल्मों में स्वयं को ही अलग-अलग अंदाज में पेश कर रहे हैं। इस दौर और माहौल में जॉन अब्राहम की प्रोडक्शन कंपनी जेए एंटरटेनमेंट की पहली फिल्म विक्की डोनर खूबसूरत साहस और प्रयास है।
निर्देशक शूजित सरकार ने रोचक और रसीले तरीके से पंजाबी मुंडा और बंगाली लड़की के प्रेमकहानी के बैकड्रॉप में स्वमे डोनेशन (वीर्यदान) का परिप्रेक्ष्य रखा है। फिल्म की लेखिका जूही चतुर्वेदी ने नए विषय और विचार की फिल्म को सरस रखा है। फिल्म के मुख्य कलाकारों अन्नू कपूर, आयुष्मान खुराना, डोली आहलूवालिया, कमलेश गिल, जयंत दास ने लेखक-निर्देशक की संकल्पना को पर्दे पर बखूबी उतारा है।
दिल्ली के परिवेश में ताजपत नगर का मध्यवर्गीय पंजाबी परिवार के बेरोजगार विक्की और चित्तरंजन पार्क में रह रही बैंकस्टाफ आसिमा के बीच प्यार दिखाने के लिए लेखक-निर्देशक ने हीरो-हीरोइन से न तो गाने गवाए हैं और न जबरदस्ती के रोमांटिक सीन गढ़े हैं। विक्की और आवसिमा का प्रेम महानगरीय भागदौड़ में बैंक, बस स्टॉप, सड़क और सूने मैदान के सामने गाड़ी से टिक कर बतियाते हुए होती है।
बधाई जूही और शूजित। चढ्डा की भूमिका में आए अन्नू कपूर इस फिल्म की जान हैं। उन्होंने इस किरदार को हमेशा की तरह गहराई से समझा है। अपनी भाव-भंगिमाओं में बगैर कोई ऊजजुलूल हरकत किए वे अपनी सादगी से हंसाते हैं। लाउड कामेडी के अभिनेताओं और उनका दुरुपयोग कर रहे निर्देशकों को अन्नू कपूर की विक्की डोनर अवश्य देखनी चाहिए। अन्नू कपूर इस फिल्म के नायक हैं।
अन्नू कपूर और आयुष्मान खुरान की जुगलबंदी से विक्की डोनर शुरू से आखिर तक बांधे रखती है। उस्ताद अन्नू कपूर के शागिर्द के तौर पर आए आयुष्मान ने बराबर कोशिश की है। वे सफल रहे हैं। लेखक-निर्देशक ने फिल्म की साइड स्टोरी के रूप में विक्की की दादी और मां के बीच के अनोखे रिश्ते और आसिमा के पिता के माडर्न दृष्टिकोण को बहुत अच्छे तरीके से चित्रित किया है। बिना मर्द के परिवारों को भी औरतें कितनी अच्छी तरह संभाल सकती हैं।
विक्की की दादी और मां की शराबनोशी और उस दरम्यान चल रही बातों पर हंसी आती है, लेकिन उनके संघर्ष और अकेलेपन का दर्द भी महसूस होता है। विक्की से नाराज होकर जब आसिमा कोलकाता चली जाती है तो विक्की का पक्ष लेते हुए अपनी बेटी के द्वंद्व और डर को उसके पिता सहज ढंग से समझा देते हैं।
विक्की डोनर दर्शनीय फिल्म है। यह वीर्यदान संबंधी भ्रांतियों और पूर्वाग्रह को अप्रत्यक्ष तरीके से खत्म करती है। साथ ही देश की दो संस्कृतियों के दुराग्रहों को दूर कर प्रेम और समन्वय स्थापित करती है।
*** 1/2 साढ़े तीन स्टार