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Friday, November 10, 2017

फिल्‍म समीक्षा : करीब करीब सिंगल




फिल्‍म समीक्षा
करीब करीब सिंगल
-अजय ब्रह्मात्‍मज
अवधि- 125 मिनट
***1/2  साढ़े तीन स्‍टार
हिंदी में लिखते-बोलते समय क़रीब के क़ के नीचे का नुक्‍ता गायब हो जाता है। आगे हम इसे करीब ही लिखेंगे।
करीब करीब सिंगल कामना चंद्रा की लिखी कहानी पर उनकी बेटी तनुजा चंद्रा निर्देशित फिल्‍म है। नए पाठक जान लें कि कामना चंद्रा ने राज कपूर की प्रेमरोग लिखी थी। यश चोपड़ा की चांदनी और विधु विनोद चोपड़ा की 1942 ए लव स्‍टोरी के लेखन में उनका मुख्‍य योगदान रहा है। इस फिल्‍म की निर्माताओं में इरफान की पत्‍नी सुतपा सिकदर भी हैं। एनएसडी की ग्रेजुएट सुतपा ने फिल्‍में लिखी हैं। इरफान की लीक से हटी फिल्‍मों में उनका अप्रत्‍यक्ष कंट्रीब्‍यूशन रहता है। इस फिल्‍म की शूटिंग में इरफान के बेटे ने भी कैमरे के पीछे हिस्‍सा लिया था। तात्‍पर्य यह कि करीब करीब सिंगल कई कारणों से इसके अभिनेता और निर्देशक की खास फिल्‍म है। यह खासियत फिल्‍म के प्रति तनुजा चंद्रा और इरफान के समर्पण में भी दिखता है। फिल्‍म के प्रमोशन में इरफान की खास रुचि और हिस्‍सेदारी सबूत है।
इस फिल्‍म की पहली खूबी इरफान हैं। इरफान अपनी पीढ़ी के अलहदा अभिनेता हैं। रुटीन से जल्‍दी ही तंग आ जाने वाले इरफान लगातार ऐसी फिल्‍म और स्क्रिप्‍ट की तलाश में है,जो उनकी शख्सियत और मिजाज के करीब हो। दूसरे इसे उनकी सामा कह सकते हैं। मैं इसे उनकी खसियत मानता हूं कि वे हिंदी फिल्‍मों के पारंपरिक अभिनेता हैं। जब भी उन्‍हें हिंदी फिल्‍मों के प्रचलित किरदारों के खांचे में डालने की कोशिश की गई है,तब उनके साथ फिल्‍म का भी नुकसान हुआ है। विदेशी फिल्‍मों में मिली सफलता और हिंदी फिल्‍मों की कामयाब चपलता से उन्‍हें खास कद और स्‍पेस मिला है। वे अब इसका इस्‍तेमाल कर रहे हैं। -मदारी,हिंदी मीडियम और करीब करीब सिंगल उनके इसी प्रयास के नतीजे हैं।
इस फिल्‍म की दूसरी खूबी पार्वती हैं। मलयाली फिल्‍मों की सफल अभिनेत्री पार्वती को हिंदी फिल्‍मों के दर्शकों ने नहीं देखा है। अपने अंदाज,हाव-भाव और अभिनय से वह हिंदी फिल्‍मों में अनदेखे किरदार जया में जंचती हैं। हिंदी फिल्‍मों की परिचित और नॉपुलर अभिनेत्रियों में कोई भी जया के किरदार में नहीं जंचती। अगर थोड़ी कम पॉपुलर अभिनेत्री को इरफान के साथ में रखते तो फिल्‍म की माउंटिंग ही कमजोर हो जाती। हिंदी फिल्‍मों में कास्टिंग बहुत मायने रखती है। खास कर करीब करीब सिंगल जैसी फिल्‍मों की नवीनता के लिए ऐसी कास्टिंग जरूरी होती है। जया के रूप में पार्वती को देखते हुए ऐसा नहीं लगता कि हम रंदा मार कर सुडौल की गई अभिनेत्री को पर्दे पर देख रहे हैं। ऐसी अभिनेत्रियां किरदारों में नहीं दिख पातीं। पार्वती ने अपनी जिम्‍मेदारी सहजता से निभाई है। फिल्‍म के खास दृश्‍यों में उनका ठहराव तो हिंदी फिल्‍मों की पॉपुलर अभिनेत्रियों में कतई नहीं दिखता। फिल्‍म के एक खास दृश्‍य में पार्वती के चेहरे पर अनेक भाव एक-एक कर आते और जाते हैं और हर भाव के साथ उनकी अभिव्‍यक्ति बदलती जाती है। कैमरा उनके चेहरे पर टिका रहता है। कोई कट या इंटरकट नहीं है।
करीब करीब सिंगल मैच्‍योर लव स्‍टोरी है। मैच्‍युरिटी के साथ ही यह कमिंग ऑफ एज स्‍टोरी भी है। फिल्‍म की शुरूआत में हम जिन किरदारों(योगी और जया) से मिलते हैं,वे फिल्‍म के अंत तक नई शख्सियतों में तब्‍दील हो चुके होते हैं। बदलते तो हम हर उम्र में हैं। इस फिल्‍म में योगी पहले फ्रेम से ही खिलंदड़े व्‍यक्ति के रूप में पेश आते हैं। लाते,जातें और लातों का प्रसंग मजेदार है। कोई वाक्पटु अभिनेता ही इसे व्‍यक्‍त कर सकता था। बहरहाल,योगी चालू,स्‍मार्ट,बड़बोला अज्ञैर हावी हाने वाला व्‍यक्ति है। वह जया पर भी हावी होता है और उसे बरगलाने की कोशिश करता है। अने मिजाज से वह जया का खिझाता है,लेकिन अनजाने में उसे रिझाता भी जाता है। उसकी संगत में जया की ख्‍वाहिशें हरी होती हैं। वह अपनी इच्‍छाओं को पनपते देखती है और फिर ऐसे फैसले लेती है,जो अमूमन भारतीय औरतें नहीं ले पाती हैं। स्‍वतंत्र व्‍यक्त्त्वि के रूप में उसका परिवर्तन फिल्‍म का बेहद खूबसूरत पक्ष है।
करीब करीब सिंगल हिंदी की रेगुलर फिल्‍मों से अलग हैं। इसे दर्शकों की तवज्‍जो चाहिए है। यह फिल्‍म आपकी नई दोस्‍त की तरह है। ध्‍यान देने पर ही आप उसकी खूबसूरती देख-समझ पाएंगे। फिल्‍म इतनी सरल है कि साधारण लगती है,लेकिन अंतिम प्रभाव में यह फिल्‍म सुकून देती है। एक नई स्‍टोरी से अभिभूत करती है। इर फान और पार्वती के साथ तनुजा चंद्रा भी बधाई की पात्र हैं।
(माफ करें इस फिल्‍म का हिंदी पोस्‍टर नहीं मिल पाया,इसलिए...)

Thursday, May 18, 2017

मैंने सुनी दिल की आवाज़ : इरफान



मैंने सुनी दिल की आवाज़ : इरफान
‘हिंदी मीडियम’ ऊपरी तौर पर भाषाई विभेद की चीज लगे, पर यह अन्य पहलुओं की भी बातें करता है। इसमें नायक की भूमिका निभा रहे इरफान इसकी अहमियत से वाकिफ कराते हैं।
    -अजय ब्रह्मात्‍मज
-अभी मैं जिस इरफान से बात कर रहा हूं, वो एक्टर इरफान है, स्टार इरफान या वो इरफान जिसे हम सालों से जानते हैं।
0 अक्सर जब हम में बदलाव आते हैं तो लोगों को लगने लगता है कि बंदा बदल सा गया है। इससे मुझे दिक्कत होती है। तब्‍दीली अपरिहार्य है। हरेक का सफर यही होता है कि आप कल वैसा न रहें, जो कल थे। मैं अब क्या हूं, वह मुझे नहीं मालूम। अदाकारी मेरा शौक था। तभी मैंने इसमें कदम रखा। यह मुझे मेरे पागलपन से बचा कर रखता है। बाकी मीडिया ने मुझे किस उपाधि से नवाजा है, यह उनका प्यार है। यह उपाधि आज तो मुझ पर लागू हो रही है, चार साल बाद ऐसा नहीं होगा। मुझे इन उपाधियों व परिभाषाओं से दिक्कत है। असल में यह हमारी असुरक्षा की उपज है। इससे हम खुद को तसल्ली दे लेते हैं कि हम विषय विशेष या खुद के बारे में सब कुछ जान चुके हैं। मुझे असुरक्षाओं से कोई प्रॉब्लम नहीं है। इंसान की इससे बड़ी असुक्षा क्या होगी कि आखिरकार क्या होगा। इन चीजों के बजाय मुझे खुद और कायनात को गढ़ने वाले में रूचि है।
-आप में पहले जो बेताबी, अस्थिरता व बिखराव थे, वे इस लंबे सफर में कम हुए हैं।
0 जी हां। मैं खुद को सौभाग्यशाली मानता हूं, जो अंदर की आवाज सुन उसके दिखाए रस्ते पर चला और यहां तक पहुंच गया। मेरे ख्‍याल से अंत:करण की आवाज सुन जो काम किया जाता है, वे बड़े अच्छे नतीजे देते हैं। भीतर जो बिखराव है, उससे समझदारी से डील करने की जरूरत होती है। उसे  देखने की कला डेवलप करें। तब वह काबू में रहेगा। हां, अगर वह आप ही को ड्राइव करने लगे तो मामला गड़बड़ है।
-एक थ्‍योरी तो यह भी है कि भीतर केयॉस यानी कोलाहल है तो रचनात्‍मकता पुष्पित-पल्‍लवित होती रहती है।
0 हम जिसे कोलाहल मानते हैं, वह ढेर सारी शक्तियों का कॉलिजन है। हम जिस कायनात में रह रहे हैं, उसकी फिजिक्स यही है। बुनियादी नियम यही है कि विपरीत शक्तियां टकराती हैं तो विनाश होता है। उसके बाद ही अगला पड़ाव सृजन का है। हम मूरख व अज्ञानी उस टक्कर को अंत का नाम दे देते हैं। टकराहट, कोलाहल अवश्‍यंभावी है।
-‘हिंदी मीडियम’ का संयोग क्यों और कैसे बना।
मैं दरअसल एक तरह का रिमार्क यानी तबसरा ढूंढ रहा था। ऐसी फिल्‍म, जिससे हर कोई कनेक्ट करे। वे एंटरटेन हों। फिल्म देखते हुए खिलखिलाएं और जब हॉल से बाहर निकलें तो साथ कुछ लेकर जाएं। बहरहाल, इसका सब्जेक्‍ट अंग्रेजी कल्चर की बातें करता है, कि कैसे यह हमारी जरूरत बन जाता है। साथ ही भाषाई विभेद का असर भी। हिंदीभाषी प्रतिभावान होकर भी पिछड़ते हैं। फिल्‍म में भी मैं एक ऐसे शख्‍स की भूमिका में हूं, जिसकी अंग्रेजीदां पत्नी अंग्रेजी के सिंड्रोम से ग्रस्त है। वह बंदा अपनी बीवी के लिए हर कुछ कर चुका है। चांदनी चौक पर बड़ा सा एंपोरियम भी खोल चुका है। बेपनाह मुहब्बत करता है, पर बेगम के भीतर खालीपन है। दरअसल उसकी वाइफ उससे अंग्रेजी बेहतर करने पर जोर देती है, इससे वो बंदा सहमत नहीं है। उसे नहीं लगता कि अंग्रेजी उसकी जरूरत है। मैं उस किरदार के इस ढीठपने से प्रभावित हुआ।
- आज पूरा मिडिल क्लास कौन्वेंट स्कूल में अपने बच्चे को भेज रहा है। अंग्रेजी के इस आतंक पर आप क्या कहना चाहेंगे।
0 असल में अंग्रेजी को हमारी जरूरत बना दी गई है। यह अकस्मात नहीं हुआ है। अब कोलोनाइजेशन दूसरी तरह से होता है कंट्री का। इसकी शुरूआत लैंग्‍वेज से होती है। आप अपने यहां दूसरे देश की भाषा को अपना कर उसे पॉपुलर करते हैं। उसके बाद का पड़ाव कल्चर की ओर ले जाता है। वहां का कल्चर यहां लोकप्रिय हुआ तो विदेशी माल यहां पॉपुलर हो जाते हैं। मनोवैज्ञानिक तौर पर आप दूसरी भाषा को अपनी जिंदगी बेहतर करने की गरज से अपनाते हैं। आप अपने आप उसकी गिरफ्त में आ जाते हो। अंग्रेजी भी इस वजह से फैली है। इसके परिणाम हम देख रहे हैं। अपनी सोसायटी में पहनावे से लेकर व्‍यापारिक व प्रशासनिक मॉड्यूल तक हम उन्हीं का अख्तियार कर चुके हैं। जब तक हम किसी अच्छी सोच का मॉडल नहीं बनेंगे, तब तलक मुकाबला नहीं कर सकते। हम अनुसरण करने वाले ही बनकर रह जाते हैं।
-संपर्क भाषा तो अलग चीज है। इन दिनों कौशल की बजाय भाषा को तरजीह दी जाने लगी है। आप भी हिंदीभाषी हैं। क्या आप को भी अंग्रेजी न आने के चलते फजीहत झेलनी पड़ी कभी।
0 जी ऐसा कई बार हुआ है। मुझे नसीहत दी गई। एहसास कराया गया कि आप को वह भाषा भी आती है, तो आप की देहभाषा में क्यों नहीं झलकती। असल वजह यह थी कि मुझे जो चीज पसंद नहीं आती तो मैं उससे जुड़े कनविक्‍शन को ओढ नहीं सकता। हां, यह जरूर है कि अगर आप अंग्रेजी व चाइनीज फिल्में करना चाहते हैं तो आप को वह भाषा आनी चाहिए। मसला यह है कि अपने यहां व अंतरराष्‍ट्रीय स्तर पर भी अंग्रेजी को मानक बना दिया गया है। बाकी उसे सपोर्ट करने के लिए अंग्रेजी तो है ही।
-अपनी हीरोइन सबा कमर के बारे में बताएं?
0 सबा कमर के चुनाव की खास वजह रही। यहां की कई हीरोइनें मां बनने को तैयार नहीं थीं। हमें ऐसी अभिनेत्री चाहिए थी,जो ग्‍लैमरस दिखे और इस किरदार को ढंग से कैरी कर ले। सबा कमर में ये खूबियां मिलीं। मैं उनके अलावा दीपक डोबरियाल का नाम लेना चाहूंगा। वे कमाल के एक्‍टर हैं। उनके साथ मेरी खूब संगत बैठी।

फिल्‍म समीक्षा : हिंदी medium

फिल्‍म रिव्‍यू
zaruri फिल्‍म
हिंदी medium
-अजय ब्रह्मात्‍मज

साकेत चौधरी निर्देशित हिंदी मीडियम एक अनिवार्य फिल्‍म है। मध्‍यवर्ग की विसंगतियों को छूती इस फिल्‍म के विषय से सभी वाकिफ हैं,लेकिन कोई इस पर बातें नहीं करता। आजादी के बाद भी देश की भाषा समस्‍या समाप्‍त नहीं हुई है। दो की लड़ाई में तीसरे का फायदा का साक्षात उदाहरण है भारतीय समाज में अंग्रेजी का बढ़ता वर्चस्‍व। अंग्रेजी की हिमायत करने वालों के पास अनेक बेबुनियादी तर्क हैं। हिंदी के खिलाफ अन्‍य भाषाओं की असुरक्षा अंग्रेजी का मारक अस्‍त्र है। अंग्रेजी चलती रहे। हिंदी लागू न हो। अब तो उत्‍तर भारत के हिंदी प्रदेशों में भी अंग्रेजी फन काढ़े खड़ी है। दुकानों के साइन बोर्ड और गलियों के नाम अंग्रेजी में होने लगे हैं। इंग्लिश पब्लिक स्‍कूलों के अहाते बड़ होते जा रहे हैं और हिंदी मीडियम सरकारी स्‍कूल सिमटते जा रहे हैं। हर कोई अपने बच्‍चे को इंग्लिश मीडियम में डालना चाहता है। सर‍कार और समाज के पास स्‍पष्‍ट और कारगर शिक्षा व भाषा नीति नहीं है। खुद हिंदी फिल्‍मों का सारा कार्य व्‍यापपार मुख्‍य रूप से अंग्रेजी में होने लगा है। हिंदी तो मजबूरी है देश के दर्शकों के बीच पहुचने के लिए...वश चले तो अंग्रेजीदां फिल्‍मकार फिल्‍मों के संवाद अंग्रेजी में ही बोलें(अभी वे अंगेजी में लिखे जाते हैं और बोलने के लिए उन्‍हें रोमनागरी में एक्‍टर को दिया जाता है)।
बहरहाल, चांदनी चौक का राज बत्रा स्‍मार्ट दुकानदार है। उसने अपने खानदानी बिजनेस को आगे बढ़ाया है और अपनी पसंद की हाई-फाई लड़की से शादी भी कर ली है। दोनों मोहब्‍बत में चूर हैं। उन्‍हें बेटी होती है। बेटी जब स्‍कूल जाने की की उम्र में आती है तो मां चाहती है कि उसकी बेटी दिल्‍ली के टॉप स्‍कूल सं अंग्रेजी मीडियम में पढ़ाई करे। ऐसे स्‍कूलों में दाखिले के कुछ घोषित और अघोषित नियम होते हैं। राज बत्रा अघोषित नियमों के दायरे में आ जाता है। राज अंग्रेजी नहीं जानता। उसे इस बात की शर्म भी नहीं है।ख्‍लेकिन मीता को लगता है कि अंग्रेजी नहीं जानने से उनकी बेटी डिप्रेशन में आकर ड्रग्‍स लेने लगेगी। हर बार राज के सामने वह यही बात दोहराती है। दोनों जी-जान से कोशिश करते हैं कि उनकी बेटी किसी तरह टॉप अंग्रेजी स्‍कूल में दाखिला पा जाए। हर काेशिश में असफल होने के बाद उन्‍हें एक ही युक्ति सूझती है कि वे आरटीई(राइब्‍ टू एडुकेशन) के तहत गरीब कोटे से बच्‍ची का एडमिशन करवा दें। फिर गरीबी का तमाशा शुरू होता है और फिल्‍म के विषय की सांद्रता व गंभीरत ढीली और हल्‍‍की शुरू होन लगती है। उच्‍च मध्‍य वर्ग के लेखक,पत्रकार और फिल्‍मकार गरीबी की बातें और चित्रण करते समय फिल्‍मी समाज रचने लगते हैं। इस फिल्‍म में भी यही होता है। हिंदी मीडियम जैसी बेहतरीन फिल्‍म का यह कमजोर अंश है।
गरीबी के अंश के दृश्‍यों में राज बत्रा,मीता और श्‍याम प्रकाश मिथ्‍या रचते हैं। चूंकि तीनों ही शानदार एक्‍टर हैं,इसलिए वे पटकथा की सीमाओं के शिकार नहीं होते। वे निजी प्रयास और दखल से घिसे-पिटे और स्‍टॉक दृश्‍यों को अर्थपूर्ण और प्रभावशाली बना देते हैं। फिल्‍म के इस हिस्‍से में कलाकारों का इम्‍प्रूवाइजेशन गौरतलब है। इरफान और दीपक डोबरियाल की जुगलबंदी फिल्‍म को ऊंचे स्‍तर पर ले जाती है। किरदार श्‍यामप्रकाश के साथ कलाकार दीपक डोबरियाल भी बड़ा हो जाता है। किरदार और कलाकार दोनों ही दर्शकों की हमदर्दी हासिल कर लेते हैं। सबा कमर भी उनसे पीछे नहीं रहतीं। भारतीय परिवेश के बहुस्‍तरीय किरदार को पाकिस्‍तानी अभिनेत्री सबा कमर ने बहुत अच्‍छी तरह निभाया है। यह फिल्‍म इरफान की अदाकारी,कॉमिक टाइमिंग और संवाद आयगी के लिए बार-बार देखी जाएगी। सामान्‍य सी पंक्तियों में वे अपने अंदाज से हास्‍य और व्‍यंग्‍य पैदा करते हैं। वे हंसाने के साथ भेदते हैं। दर्शकों को भी मजाक का पात्र बना देते हैं। पर्दे पर दिख रही बेबसी और लाचारगी हर उस पिता की बानगी बन जाती है जो अंग्रेजी मीडियम का दबाव झेल रहा है।
हिंदी मीडियम हमारे समय की जरूरी फिल्‍म है...राज बत्रा कहता ही है...इंग्लिश इज इंडिया एंड इंडिया इज इंग्लिश। ह्वेन फ्रांस बंदा,जर्मन बंदा स्‍पीक रौंग इंग्लिश...वी नो प्राब्‍लम। एक इंडियन बंदा से रौंग इंग्लिश बंदा ही बेकार हो जाता है जी।
हालांकि यह फिल्‍म अंग्रेजी प्रभाव और दबाव के भेद नहीं खाल पाती,लेकिन उस मुद्दे को उठा कर सामाजिक विसंगति जरहि तो कर देती है। आप संवेदनशील हैं तो सोचें। अपने जीवन और बच्‍चों के लिए फैसले बदलें।

अवधि- 133 मिनट
***1/2 साढ़े तीन स्‍टार

Sunday, July 24, 2016

फिल्‍म समीक्षा : मदारी


किस की जवाबदेही

-अजय ब्रह्मात्‍मज

देश में आए दिन हादसे होते रहते हैं। उन हादसों के शिकार देश के आम नागरिकों का ऐसा अनुकूलन कर दिया गया है कि वे इसे नसीब,किस्‍मत और भग्‍य समझ कर चुप बैठ जाते हैं। जिंदगी जीने का दबाव इतना भारी है कि हम हादसों की तह तक नहीं जाते। किसे फुर्सत है? कौन सवाल करें और जवाब मांगे। आखिर किस की जवाबदेही है? निशिकांत कामत की मदारी कुछ ऐसे ही साधारण और सहज सवालों को पूछने की जिद्द करती है। फिल्‍म का नायक एक आम नागरिक है। वह जानना चाहता है कि आखिर क्‍यों उसका बेटा उस दिन हादसे का शिकार हुआ और उसकी जवाबदेही किस पर है? दिन-रात अखबारों और चैनलों की सुर्खियां बन रहे हादसे भुला दिए जाते हैं। मदारी में ऐसे ही कुछ सवालों से सिस्‍टम को कुरेदा गया है। जो सच सामने आया है,वह बहुत ही भयावह है। और उसके लिए कहीं ना कहीं हम सभी जिम्‍मेदार हैं। हम जो वोटर हैं।चुपचाप दबा रहके अपनी दुनिया में खोए रहनेनेवाला... हम जो नेताओं और पार्टियों को चुनते हैं और उन्‍हें सरकार बनाने के अवसर देते हैं। मदारी में यही वोटर अपनी दुनिया से निकल कर सिस्‍टम के नुमांइदों की दुनिया में घुस जाता है तो पूरा सिस्‍टम बौखला जाता है। हड़कंप मच जाता है।
हिंदी में सिस्‍टम पर सवाल करने वाली फिल्‍में बनती रही हैं। कई बार अपने निदान और समाधान में वे अराजक हो जाती हैं। मदारी इस मायने में अलग है कि वह सिस्‍टम के भविष्‍य और उत्‍तराधिकारी को आगाह करती है। उसे साथ लेकर चलती है। एक उम्‍मीद जगाती है। अभी नहीं तो पांच,दस या पंद्रह सालों में स्थितियां बदलेंगी। मदारी राजनीतिक सोच की फिल्‍म है। य‍ह फिल्‍म किसी एक राजनीतिक पार्टी या विचार के विरोध या पक्ष में नहीं है। यह पूरे सिस्‍टम पर कटाक्ष करती है,जिसमें सरकार डेवलपर और ऑपोजिशन ठेकेदार की भूमिका में आ गए हैं। निशिकांत कामत ने फिल्‍म में किसी युक्ति से काम नहीं लिया है। रितेश शाह की स्क्रिप्‍ट उन्‍हें इजाजत भी नहीं देती। फिल्‍म सरत तरीके से धीमी चाल में अपने अंत तक पहुंचती है। लेखक-निर्देशक ने सिनेमाई छूट भी ली है। कुछ दृश्‍यों में कोर्य-कारण संबंध नहीं दिखाई देते। इस सिनेमाई समर में निशिकांत कामत के पास सबसे कारगर अस्‍त्र इरफान हैं। इरफान की अदाकरी इस परतदार फिल्‍म को ऊंचाइयों पर ले जाती है,प्रभावित करती है और अपने उद्देश्‍य में सफल रहती है। मदारी सोशल और पॉलिटिकल थ्रिलर है।
बाज चूजे पर झपटा...उठा ले गया-कहानी सच्‍ची लगती है लेकिन अच्‍छी नहीं लगती। बाज पे पलटवार हुआ कहानी सच्‍ची नहीं लगती लेकिन खुदा कसम बहुत अच्‍छी लगती है।... फिल्‍म के आरंभ में व्‍यक्‍त निर्मल का यह कथन ही फिल्‍म का सार है। यह चूजे का पलटवार है। सच्‍ची नहीं लगने पर भी रोचक और रोमांचक है। मध्‍यवर्गीय निर्मल कुमार जिंदगी की लड़ाई में जीने के रास्‍ते और बहाने खोज कर अपने बेटे के साथ खुश और संतुष्‍ट है। एक हादसे में बेटे को खाने क बाद वह कुछ सवाल करता है। उन सवालों की जवाबदारी के लिए वह सिस्‍टम के तुमाइंदों को अपने कमरे में आने के लिए मजबूर करता है और फिर उनके जवाबों से पूरे देश को वाकिफ कराता है। गृह मंत्री एक बार बोल ही जाते हैं,सच,सच डरावना है-दिल दहल जाएगा-सरकार भ्रष्‍ट है,सच नहीं है-भ्रष्‍टाचार के लिए ही सरकार,यह सच है। एक दूसरा नेता जवाबदेही के सवाल पर सिस्‍टम के रवैए को स्‍पष्‍ट करता है। जवाबदेही का मतलब उधर पार्लियामेंट में-चुनाव के मैदान में-गली-गली जाकर एक-एक आदमी को जवाब देना नहीं है।निर्मल कुमार 120 करोड़ लोगों के प्रति जवाबदेही की बात करता है तो जवाब मिलता है...एक सौ बीस करोड़- मैथ्‍स ही गड़बड़ है तुम्‍हारा-हां,बंटे हुए हो तुम सब-जाति,धर्म,प्रांत...एक सौ बीस करोड़ नहीं,टुकड़े,टुकड़े,टुकड़े में बंटे हुए हो....तभी तो हम रौंद रहे हैं तुम को जूतियों के नीचे....नहीं डरते 120 करोड़ से हम। फिल्‍म में ऐसे संवादों से हमरे समय का सच और सिस्‍टम का डरावना चेहरा फाश होता है। मदारी अपने सवालों से झकझोरती है। इरफान की रुलाई आम नागरिक की विवशता जाहिर करती है। बतौर दर्शक हम द्रवित होते हैं और निर्मल की मांग से जुड़ जाते हैं। निर्मल अपने अप्रोच में हिंसक नहीं है। निदान और समाधान से अधिक उसकी रुचि जवाब में है। वह जवाब चाहता है।
फिल्‍म के एक गीत दम दमा दम में इरशाद कामिल ने हमारे समय के यथार्थ को संक्षिप्‍त और सटीक अभिव्‍यक्ति दी है।
अवधि- 133 मिनट
स्‍टार- साढ़े तीन स्‍टार
  

 


Wednesday, June 15, 2016

सवाल पूछना मेरे सिस्‍टम में है - निशिकांत कामत




-अजय ब्रह्मात्‍मज
यकीन करते हैं इरफान
इरफान और मैंने १९९४ में एक साथ काम किया था। तब मैं नया-नया डायरेक्टर बना था। इरफान भी नए-नए एक्टर थे। वह तब टीवी में काम करते थे। उसके चौदह साल बाद  हम ने मुंबई मेरी जान में काम किया। अभी तकरीबन सात साल बाद मदारी में फिर से साथ हुए। हमारी दोस्ती हमेशा से रही है। एक दूसरे के प्रति परस्पर आदर का भाव रहा है। इत्तफाक की बात है कि मदारी की स्क्रिप्ट मेरी नहीं थी। इरफान ने यह स्क्रिप्ट रितेश शाह के साथ तैयार की थी। एक दिन इरफान ने मुझे फोन किया कि एक स्क्रिप्ट पर बात करनी है। वह स्क्रिप्ट मदारी की थी। इरफान साहब को लगा कि मदारी मुझे डायरेक्ट करनी चाहिए। इस तरह मदारी की प्रक्रिया शुरू हुई। इस बातचीत के छह महीने बाद फिल्म की शूटिंग शुरू हो गई। मेरे लिए यह अब तक की सबसे जटिल स्क्रिप्ट यह मल्टीलेयर फिल्‍म है। मैं कई बार स्क्रिप्ट पढ़ चुका था। मैं स्क्रिप्ट हर सिरे और लेयर को पकड़ने की कोशिश कर रहा था। डर था कि कहीं कुछ मिस तो नहीं हो रहा है।

मदारी की कहानी
एक स्‍तर पर यह बाप और बेटे की कहानी है। उनका मजबूत रिश्ता होता है। जब नया बच्चा अपने माता-पिता की जिंदगी में आता है,वही उनकी दुनिया बन जाता है। फिर वे बच्‍चे की परवरिश करते हैं। इरफान ने बहुत ज्यादा इनपुट दिए। इरफान के दो बेटे हैं। अगर बच्चा पांच मिनट देरी से भी घर आए तो माता –पिता की हालत खराब हो जाती है। सारे बुरे खयाल आते हैं। फिर आठ साल के बच्चे का नजरिया क्या होता है ? आप उसे कैसे मैनेज करते हैं। मदारी में एक हादसा होता है। उस हादसे का एक आदमी पर क्या असर होता है? कैसे उसकी जिंदगी बदलती है? हर हादसे को इंसान दो या तीन तरीके से देख सकता है। पहला,वह मान सकता है कि जो हुआ उसमे भगवान की मर्जी थी। दूसरा,वह खुद गिल्ट में चला जाता है। मेरी वजह से हुआ। तीसरा,कोई होता है जो सवाल उठाता है। ऐसा क्यों हुआ? और मेरे साथ ही क्यों हुआ?
समकालीन फिल्‍म है मदारी
यह फिल्म एक कॉमन आदमी की कहानी है। वह सिस्टम पर सवाल उठाता है। यह मेरी गलती है। यह भगवान की मर्जी है। यह किसी और की गलती है। आखिर यह है क्या? कोई तो मुझे जवाब दें। मैं उदाहरण के तौर पर हमेशा कहता हूं कि मैं जिस रास्ते से घर से दफ्तर आता हूं। वहीं पर हमेशा गड्ढे कैसे होते हैं। उन गड़्ढों को कैसे बंद किया जाता है। वह फिर से गड्ढा कैसे बन जाता है। लेकिन मैं सवाल पूछ सकता हूं। वहां पर मेरी ताकत खत्म हो जाती है। मुझे पता है कि मेरे ही दिए हुए टैक्स से गड्ढों को भरने का काम किया जा रहा है। यह हर साल हो रहा है। एक ही बार क्यों नहीं हो जाता। यह मेरा एक सवाल है। मैं इसे अगले स्तर पर नहीं ले जा सकता । पर एक आदमी तह तक जाने का तय कर लें। तो वह आवाज बन  जाता है। इसी के आस पास की कहानी मदारी है।
यह समकालीन फिल्म है। मैंने डोंबिवली फास्ट बनाई थी। उसकी कहानी एक आदमी की थी। वह आदमी सवाल पूछता है और सिस्टम उसे निगल जाता है। यह फिल्म मैंने २००४ में बनाई थी। आज चल रहा है २०१६। बारह साल के बाद भी मैं यह मानता हूं कि यह दोनों कहानी प्रासंगिक है। शायद फिर जहन में सवाल उठता है कि जीवन भर ऐसा ही रहेगा।या आगे चलकर कुछ बदलेगा।
रोजमर्रा की आसपास की कहानियां
मैं रोजमर्रा जिंदगी से कहानियां उठाता हूं। शायद यह मेरे व्यक्तित्व की प्रवृत्ति है। मैं मिडिल क्लास आदमी हूं। बचपन से ऐसे ही माहौल में रहा हूं। मेरा माता-पिता शिक्षक थे। उनकी शिक्षा ईमानदारी और अनुशासन की थी। मेरे पास सिनेमा का मीडियम है,उसके जरिए मैं अपनी बातें व्यक्त कर सकता हूं। हालांकि अभी मैं समाज में कोई बदलाव नहीं ला सकता। मैं कुछ साबित नहीं करना चाहता हूं। मुझे निजी तौर पर जो लगता है,मैं वहीं कहता हूं। मुझे लगता है कि सवाल पूछना चाहिए। मां और पिता के शिक्षक होने की वजह से सवाल पूछना मेरे सिस्टम में आ गया है।
मेरी मुंबई मेरी जान में  मुंबई की कहानी थी। डोंबिवली फास्ट भी मुंबई की कहानी थी। फोर्स मुंबई में थी। मराठी फिल्‍म लय भारी में महाराष्ट्र के गांव की कहानी थी। दृश्यम गोवा में सेट थी। रॉकी हैडसम गोवा में थी। मदारी आठ शहरों में सेट है। इस फिल्म में हम अलग-अलग शहर घूम कर आए हैं। शुक्र है कि इस बार मुझे नार्थ की ही कहानी मिली है। मैंने कोशिश की है। मैं खांटी नार्थ की कहानी पर फिल्‍में नहीं बना सकता। मैं वहां की मिट्टी का नहीं हूं। मेरी दिल-ओ- जान से तमन्ना है कि मैं यूपी और बनारस पर कोई फिल्म बनाऊं। लेकिन उसके लिए मुझे छह महीने वहां जाकर रहना होगा। स्क्रिप्ट और डायलॉग के अलावा फिल्‍म में फील रहता है। मैंने डोंबिवली फास्ट की रीमेक तमिल में बनाई। तमिल भाषा और समाज को जानने के लिए मैं पांच महीने चैन्नई में रहा।
हुनरमंद हैं इरफान साहब
इरफान में कुछ खास बातें हैं। बिना बोले भी उनके सीन परफेक्ट लग सकते हैं। वे अपनी बात बगैर संवादों के कह सकते हैं। इरफान इसमें माहिर हैं। वे पूरे किरदार पर विचार करते हैं। उसे समझते हें। किरदार क्या पहनेगा? कैसे चलेगा ? उसका बैकग्राउंड क्या है? इन सारी चीजों पर उनका बहुत अभ्‍यास है। हम दोनों की आपसी समझ भी मजबूत है। कई बार एक - दो वाक्य में ही हम एक दूसरे की बात समझ जाते थे। झट से सीन हो जाता था। इरफान साहब मेरी क्राफ्ट पर विश्वास करते है। स्क्रिप्ट तो रहती ही है,पर उन्हें मेरे सिनेमैटिक सोच पर पूरा यकीन है। इरफान हमेशा डायरेक्‍टर की सोच को विस्‍तार देते हैं। इरफान हमेशा भूखे , अनिश्चित और फोकस रहते हैं। उनमें और मुझ मे एक समानता है। हम शॉट लेने तक खोजते रहते हैं। स्क्रिप्ट में सब लिखा हुआ है। सेट भी तैयार है। पर हम कुछ ना कुछ तलाश करते रहते हैं। कुछ मैजिक है,जो दिख नहीं रहा है। उसे खोजते रहते हैं। इरफान देश के ही नहीं विश्व के बेहतरीन एक्टरों में से हैं। सिनेमा और मानवीय भावनाओं को समझने में उनकी सोच बहुत साफ है।
 मुंबई का अंडरवर्ल्‍ड
रामगोपाल वर्मा ने बेहतरीन तरीके से मुंबई के अंडरवर्ल्ड  को पर्दे पर दिखाया है। सत्या मुझे याद है। तब तक मेरी पहली फिल्म नहीं आई थी। सत्या देखने के बाद मैंने महसूस किया कि रामू ने जिस तरह मुंबई देखी है, मैंने उस तरह नहीं देखी है। इसलिए मैं आज ऑन रिकॉर्ड कहता हूं कि जब तक मुझे सत्या से बेहतर स्क्रिप्ट नहीं मिलेगी। मैँ मुंबई के गैंगस्टर पर फिल्म नहीं बनाऊंगा।  

खास सीन
इस फिल्म में एक सीन है। अस्पताल के कॉरिडोर में इरफ़ान साहब बैठे हैं।  रात के दो बज रहे हैं। मैंने इरफान साहब को सीन बताया। इरफान साहब ने कहा कि मैं नहीं कर पाऊंगा। उन्होंने इस तरह से नहीं कहा कि मैं नहीं कर पाऊंगा।उनका मतलब था कि मैं यह सीन करूंगा तो निचुड़ जाऊंगा। मैंने कहा कि सर करना तो पड़ेगा। आपको जितना समय चाहिए आप ले लें। पूरे सेट पर आधे घंटे तक पिन ड्राप साइलेंस रहा। इरफान साहब से किसी ने बात तक नहीं की। फिर उन्होंने साढ़े तीन मिनट का सीन किया। मैंने कट कहा। उसके बाद भी पूरी यूनिट सन्न बैठी रही। इरफान साहब सीन करके कमरे में चले गए। एक घंटे के बाद बाहर निकले। यह फिल्म का सबसे कठिन सीन है। माहौल ऐसा हो गया था कि एक आदमी भी आवाज नहीं कर रहा था। लाइटमैन भी एकदम शांत रहे। इरफान ने अपनी अदायगी से सबको शांत कर दिया।

Sunday, May 22, 2016

इरफान के साथ बातचीत




इरफान से हुई बात-मुलाकात में हर बार मुलाकात का समय खत्‍म हो जाता है,लेकिन बातें पूरी नहीं हो पातीं।एक अधूरापन बना रहता है। उनकी फिल्‍म 'मदारी' आ रही है। इस मौके पर हुई बातचीत में संभव है कि कोई तारतम्‍य न दिखे। यह इंटरव्‍यू अलग मायने में रोचक है। पढ़ कर देख लें..., 

-अजय ब्रह्मात्‍मज

-मदारी का बेसिक आइडिया क्या है?
0 यह एक थ्रिलर फिल्म है, जो कि सच्ची घटना से प्रेरित है। इस फिल्म में हमने कई सच्ची घटनाओं का इस्तेमाल किया है। ये घटनाएं बहुत सारी चीजों पर हमें बांध कर रखती है। हर आदमी में एक नायक छुपा होता है। वह अपनी पसंद से किस तरह चीजों को चुनता है। उससे कैसे चीजें आकार लेती हैं। उस व्यक्ति के व्यक्तित्व में बदलाव होता है।मेरी सोच यही है कि कहीं ना कहीं आदमी वह काम करने को मजबूर हो,जिससे उसे अपने अंदर के नायक के बारे में पता चले। हमें कई बार किसी को फॅालो करने की आदत हो जाती है। हमें लगता है कि कोई आएगा और हमारी जिंदगी सुधार देगा। हमारी यह सोच पहले से है। हम कहीं ना कहीं उस सोच को चैलेंज कर रहे हैं। हम उस सोच को बदलने का प्रयास कर रहे हैं। हमें खुद के  हीरो की तलाश करनी है।

-इस फिल्म में आपका किरदार क्या है। और कौन –कौन हैं?

0 तलवार में जिस तरह कई एक्टर थे। पर वह अनजाने चेहरे थे। यहां पर भी ठीक वैसा ही है। जिमी भी हैं इस फिल्म के अंदर। बाकी सब थिएटर एक्टर हैं।कोई बड़ा नाम नहीं है। बहुत ही साधारण आदमी ,जो सबकुछ अपना कर चलता है।उस तरह का एक इंसान है।उसके जीवन में क्राइसेस आता है। फिर बड़ा बदलाव होता है।

-मैं सीधे पूछता हूं कि आपका किरदार क्या है। उसका नाम क्या है? वह क्या करता है?कहां से आता है?
0 मेरा किरदार निर्बल है।वह छोटे-मोटे काम करता है। जैसे कम्प्यूटर वगैरह ठीक करना। साफ्टवेयर का काम करता है। वह इसी तरह का काम करता है। वह अपने बच्चे के साथ रहता है। पत्नी के साथ उसका तलाक हो गया है। पत्नी अमेरिका चली गई है। वह अपने बेटे के साथ अकेले रहता है। वह अपनी दुनिया में खुश है। वह हमेशा खुश रहता है। बेटा उसकी जिंदगी है। वह बेटे की अच्छी परवरिश करना चाहता है। पर क्राइसिस आने पर सारी चीजें बदल जाती हैं।

-इंडस्ट्री में अपनाएं जाने के बावजूद आपके अंदर एक छटपटाहट सी रही है।अपनी फिल्म में आप क्या कर पाएं। अपनी फिल्म से मतलब हिंदी फिल्म के दायरे में रहकर आप क्या  कुछ नया कर सकते हैं? क्या यह फिल्म उसको पूरी कर पाएगी। या एक कोशिश होगी।
0 यह फिल्म किसी हद तक छुने की कोशिश करती है। निशिकांत कामत इसके निर्देशक हैं। इस वजह से इसकी भाषा आम दर्शकों के लिए है। यह फिल्म आपको सोचने पर मजबूर कर देगी। कुछ फिल्में बुध्दिजीवी होती हैं। यह फिल्म सीधे इमोशनल कहानी है। निशिकांत का जैसा अपना स्टाइल है। यह फिल्म उसी फेज में है। उसका नरेटिव का तरीका होता है। यह फिल्म सीधे लोगों से बातचीत करेगी। इमोशनल कहानी है पूरी। इमोशन पॅावर फुल है।यह देखा हुआ नहीं है। मैं पहले सोच भी रहा था कि इस किरदार में जाऊं या ना जाऊं। कुछ सीन ऐसे हैं जो आपके लिए तकलीफदेह हो सकते हैं।
 
-फिल्म के अंदर है वो सीन? 
0 जी। पहले थोड़ा लगा। पर कहानी सुनने के बाद लगा कि करना चाहिए। जवाबदेही होनी चाहिए। किसी भी अच्छी कहानी के पनपने के लिए. लोगों का विश्वास जीतने के लिए सिस्टम में दायित्व होना चाहिए।
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   -किस हद तक यह फिल्म नजारा दिखाती है और नजरिया पेश करती है? फिल्म की बात नजारे तक जाती है या नजरिए तक?

0यह फिल्म नजरिया पेश करती है। कुछ लोग भले ही इसके लिए राजी हो या ना हो।जैसा कि आप देखें । कोई आम आदमी क्राइसेस से गुजरता है, सिस्टम से उसका वास्ता पड़ता है।इसमें उसकी बेबसी की जांच होती है कि वह कहां जाएं। वह क्या करें। उसने एक बार लोगों को चुन लिया। उसने मान लिया कि यह लोग मेरी जिंदगी को ठीक करेंगे। फिर क्या उसकी जिम्मेदारी वहां खत्म हो जाती है। क्या उसकी जिम्मेदारी बनी रहती है कि वह खुद से सवाल पूछता रहे। सिस्टम लोगों के लिए है या लोगों को इस्तेमाल करने के लिए है।
-इसकी पेशगी में क्या नई चीजें की हैं। फार्म के लेवल पर?इसका स्ट्रक्चर क्या हैं  इसका स्ट्रक्चर लीनियर नहीं है । फिल्म आज और बीते हुए कल में चलती रहती है। आगे पीछे होती रहती है। निशिकांत के लिए भी यह चैलेंज था। वह कहता था कि जब भी मैं सेट पर आता . तो सोचता कि यह होगा कैसे। जब हम इसका गाना सूट कर रहे थे,तब भी चितिंत थे। हम दोनों सोच रहे थे कि दो बजे यह गाना शुरू कर रहे हैं। शाम तक कैसे पूरा होगा। कई बार इस तरह का प्रोसेस समृध्द हो जाता है। क्योंकि हमें आगे की जानकारी नहीं होती है। फिर चीजें अपने आप सेप लेना शुरू कर देती है। हमें फिल्म की एनर्जी दिखने लगती है। फिल्म की एनर्जी आपसे क्या करवा रही है। वो हमें गाइड करने लगती है। इस तरह के प्रोसेस में बहुत आनंद आता है। क्योंकि आप डिक्टेक्ट नहीं कर रहे हैं।आप सिर्फ उस प्रोसेस का हिस्सा बन रहे हो। फिल्म की एनर्जी गाइड कर रही है। आप उसी हिसाब से अपना काम किए जा रहे हो। आप खुद को समर्पित कर देते हो। वह सेप करती है।ऐसे ही गाने के साथ हुआ। मैं दो बजे दोपहर में पहुंचा। मैं डरा हुआ था। थो़ड़ी देर निशिकांत सेबातचीत हुई।उन्होंने कहां कि मैं आपको शॅाट लगाकर बुलाता हूं। वह भी देख रहा था कि क्या होगा क्या नहीं होगा। मैंने पहुंचते ही कहा कि रिहर्सल देखना है। जैसे ही मैंने रिहर्सल देखते ही पहले फ्रेम में कहा कि यह सुर है।

-गाना लिप सिंक   है?
जी।

-क्या बात है।
इसी वजह से मैं डरा हुआ था। मैंने बहुत तैयारी की थी। मैं दो रोज से यह गाना सुन रहा था। उसने एक लाइन की तो मैंने चार लाइन वैसे कर दी। इस तरह करते हुए पूरा गाना आराम से हो गया।

-इरफान को जब हम दर्शक के तौर पर देखने जाते हैं तो इरफान ने अपनी एक जगह बनाई है। जब इरफान पैरलल लीड या दूसरे लीड में आते हैं तो अलग किस्म किरदार में चले जाते हैं। जब वह अपनी फिल्मों में थोड़ा सा इंटेस, मैं डार्क नहीं कहूंगा। थोड़ा ग्रे में चले जाते हैं। पान सिंह तोमर देख लें। लंच बाक्स और किस्सा देख लें। यह क्या आपने खुद चुना है या फिर ऐसा रोल ही मिलता है?
0जी नहीं। मेरे पास चॅाइसेस की कमी है। मैं अब थोड़ी बेहतर हालात में हूं।मैं अब अपने किरदार चुन रहा हूं।मेरी आगे की जो फिल्में हैं, वह लाइटर किरदार में है। यह  फिल्में बात तो कर रही हैं। ऐसा नहीं है कि उनमें मुद्दा नहीं है। वह किसी चीज को रिफलेक्ट जरूर कर रही हैं। पर उनका सुर लाइटर है। मैं बहुत कोशिश करता हूं कि हल्की फुल्की कहानियां मिलें। जिस तरह मैंने तिग्मांशु और अनुराग के साथ काम किया है। वैसा मिलें। थोड़ा सा यह भी है कि हमारे यहां राइटर पनप रहे हैं। दर्शकों की मांग को कोप अप नहीं कर पा रहे हैं। उतना टैलेंट नहीं है। इस वजह से हम पीछे हैं। जो खाचा बच रहा है, उसमे हॅालीवुड फिट हो रहा है। हॅालीवुड जोर शोर से धका देकर बीच में आ रहा है।उसकी वजह यही है कि हमारे पास राइटर नहीं हैं। हमारे यहां राइटर को इतना महत्तव नहीं दिया जाता है। और राइटर बनते भी नहीं हैं। नई पीढ़ी से बहुत उम्मीद है। नई पीढ़ी तैयार हो रही है।

-लेकिन हम क्या ऐसी छोटी फिल्मों के जरिए मुकाबला कर पायेंगे?
मुझे मुकाबला ही नहीं करना है। मुझे अपनी फिल्म को वाइबल...

-मैं मुकाबले की बात केवल आपके लिए नहीं कर रहा हूं।मुकाबला हिंदी फिल्म इंडस्ट्री से पूछरहा हूं।
अच्छा।हिंदी फिल्म इंडस्ट्री का हॅालीवुड से मुकाबला।

-जी...
हिंदी फिल्म इंडस्ट्री को टैलेंट चाहिए। वह आवाज बहुत जरूरी है,जो कि विश्व के दर्शकों तक पहुंच सके। जिस दिन वह आवाज खनेगी, उस दिन मुकाबला हो जाएगा।

-नहीं जैसे,लंच बाक्स आई। कहने को यह छोटीफिल्म थी। पर इसने सब जगह अपील की।उसने क्रास कर दिया।क्रास ओवर सिनेमा जिसे कहते हैं। वह कर दिया। हां, उसने किया।उसको तीन साल हो गए।
जी हां। यही तो गेप  है।

-तीन साल मैं कोई दूसरा सामने नहीं आया।
जी अभी वह पीढ़ी तैयार हो रही है। हालांकि कनवेक्शन इंडस्ट्री के लिए यह थोडा चैलेंजिंग होती है। उसका कोई सपोर्ट नहीं है। पर आनेवाली नई पीढ़ी इसे बदलेगी।

-एक्टर के तौर पर इरफान को कई स्तरों पर जीना पड़ रहा है।विदेशों की फिल्में अलग हैं। यहां की फिल्में अलग हैं। आप कैसे शिफ्ट करते हैं और कैसे रिस्क तय करते हैं?
हॅालीवुड में काम चुनकर करता हूं। वहां पर निर्वाह करने के लिए मैं काम नहीं कर रहा हूं। यहां की फिल्में सरवाइवल के तौर पर करनी पड़ती है। पांच महीने यहां पर काम  नहीं किया तो हम चल नहीं पायेंगे। इस वजह से हमें कुछ फिल्में निर्वाह करने के लिए करनी पड़ती हैं। वहां पर मैं..

-लेकिन अहमत तो होती होगी?
0अहमत बहुत है। हर महीने एक दो स्क्रिप्ट पढ़ता रहता हूं। मुझे लगा कि सब चीजें नहीं करनी चाहिए। मैं पूरी तरह से विश्वस्त नहीं था। मैंने अभी बीच में किसी की स्क्रिप्ट पढ़ी। हॅालीवुड में दिलचल्पी बहुत है।

-अहमत के साथ आमदनी भी होगी?
आमदनी कम है। वहां की फिल्मों में जितना समय देता हूं., यहां में जितना कमाता हूं उसका एक चौथाई वहां कमाता हूं। वहां डबल टैक्स रहता है। फिर यहां से अप्लाई करना पड़ता है।तब जाकर टैक्स मिलता है। फिर दस प्रतिशत इसका दस प्रतिशत उसका। कई सारी चीजें होती हैं।

-केवल शोहरत ले पा रहे हैं आप?
शोहरत के साथ अनुभव भी है।साथ ही मैं अपने दर्शकों का दायरा भी बढ़ा रहा हूं। उसका भी असर आपको पीकू मे दिखता है।कहीं ना कहीं आपके मार्केट पर उसका असर होता है। यूरोप में लंच बाक्स के बाद फ्रेंच निर्माता मेरे नाम पर पैसा लगाने के लिए तैयार हो जाएगा। उस तरह का ग्रांउड वर्क करना पड़ता है। मैं कहीं भी जाकर फिल्म करने के लिए तैयार हूं। जैसे मैं बांग्लादेश की फिल्म की।  क्योंकि मुझे वहां के बंदों पर भरोसा हो गया है। मुझे उनके कहानी कहने का तरीका बेहद पसंद है। कहानी ने मुझे अपनी तरफ खींचा। मेरे लिए पार्ट बोरिंग था। पार्ट मेरे लिए दिलचस्प नहीं था। मैं उसे एक्सपलोर भी नहीं करना चाहता था।

-क्या नाम था उस फिल्म का?
 नो बेटर प्रोजेस। फिल्म ने मुझे अपनी तरफ खीचा। मेरे लिए नया अनुभव रहा। मेरे लिए वह मुल्क  नया था। वहां के लोग कैसे जी रहे हैं। बाकी की सारी चीजे। अच्छा अनुभव रहा। मेरे लिए यह बहुत मायने रखता है। मैं कहां जाकर शूट कर रहा हूं। किन लोगों के साथकाम कर रहा हूं। मैँ जैसलमेर में किश ऑफ़ थे स्पाइडर'  था।  मेरे लिए वह नायाब अनुभव था । हजार साल पहले आदमी कैसे रह रहे होंगे। उसके भी अवशेष अभी बाकी हैं।

-हां बिल्कुल
आदमी, प्रकृति  और जानवर की परस्पर निर्भरता जो है,वह हैं वहां। यह बदलता रहा है। आज धीरे-धीरे चीजे बदल रही हैं। मुझे आपको एक बड़ाही दिलचस्प किस्सा बताना है। पहली बार ऐसा देखा जा रहा है, जो लोकल कुत्ते हैं।वो ग्रुप में मिलकर बकरे को मार रहे हैं।यह पहले कभी नहीं देखा गया। पहली बार ऐसा हो रहा है कि कुत्तों का ग्रुप मिलकर बकरा मार रहा है। अब ये क्या है वह पता नहीं। यह नया कुछ है। मुझे वहां के लोगों ने बोला कि यह नई बात है।ऐसा पहले कभी होता देखा नहीं गया है। पहली बार ऐसा हो रहाहै। इसकी वजह पता नहीं। बहुत सी ऐसी दिलचस्प चीजें हैं,जिन्हें हमने कभी देखा नहीं है।ऊंट जैसे जानवर को मैंने कभी पास से देखा नहीं है। ऊंट का अलगाव पना कमाल का है। इतना बिंदाश है वह। वह आपको सुविधा दिए जा रहा हैं।बाकी की चीजों से उसका कोई लेना-देना नहीं है। 

- ऊंट पालतू होते हैं?
जी हां। लेकिन वह अलग है। उसमें अजीब सा बेलगाव है।

-कुत्ते हो या घोड़े वह आपसे प्यार चाहते हैं।
जी। वैसा ही।ऊंट अपना खाने में मस्त है। वह आपको अपने ऊपर बिठाएगा और चल पडेंगा। मैं बहुत रहा हूं। उसके पैर में कभी कांटा चुभ जाता है। वह एक दम अंदर घुस जाताहै।उसको निकालने का कोई तरीका नहीं है। ऑपरेशन करना पड़ा तो ऊंट बेकार हो जाएगा। आप देखिए प्रकृति का जानवर से कैसा ताल्लुक है। इतने बड़े शरीर के अंदर केवल एक लौंग उसे खिलाया जाता है। इसे खाने के बाद कांटा आपो आप बाहर आ जाता है। यह बात सुनने में अजीब लगती है। वहां रेगिस्तान में एक फल पैदा होता है। वह गोल आकार का खरबूज जैसा होता है। आप उस पर खड़े हो जाइए, उसका टेस्ट आपके मुंह में आ जाएगा।

-हां ऐसा कुछ लोग बताते हैं।
0 हमारे शरीर का और प्रकृति का जो जुड़ाव है, वह आज भी जैसलमेर में जिंदा है। ट्रेवल के समय आप आवाज का अहसास कर सकते हैं। वहां पर लैंडस्केप है। कुल मिलाकर फिल्म के साथ के यह अनुभव नायाब होते हैं। यह अनुभव ना हो तो मैकेनिकल हो जाता है।इसलिए शहरों में शूटिंग का अनुभव नहीं मिलता है।दूसरी जगह पर अनुभव मिलता है। खैर, नई पीढ़ी सिनेमा क्रिएट करेगी।ऐसा कभी नहीं हुआ है कि दर्शक बाहें फैला कर खड़े हैं औऱ आपके पास देने के लिए कुछ नहीं है। इस वजह हॅालीवुड अपनी जगह तेजी से बना रहा है। ऐसा कभी नहीं हुआ है कि हॅालीवुड की फिल्म के कारण हमारे सुपरस्टार की फिल्म पर प्रभाव पड़ा हो। पर इस बार जगंल बुक ने यह कर दिया। लोकल फिल्में बुध्दिमान तरीके से बनाई जाएगी। जो विश्व को प्रभावित करेगी।तब हम हॅालीवुड की फिल्मों से मुकाबला कर सकते हैं। वरना नहीं कर पायेंगे। हॅालीवुड ने अलग-अलग देशों के सिनेमा की दुकानें बंद कर दी हैं।

-बतौर निर्माता कैसा अनुभव रहा आपका?
0 निर्माता के तौर पर मैं बताना चाहता हूं कि मेरा क्या रोल है। मुझे जो कहानी वाइबल लगती है। मुझे लगे कि यह स्टोरी लोगों को इंटरटेन कर सकती है। फिर एक विषयका अपना दायरा होता है। इस विषय को आप इतने ही पैसे में बना सकते हो। वह एक समझ होना जरूरी है। मैं उदाहरण देता हूं गुजारिश का। गुजारिश जैसी फिल्म बीसकरोड़ में होगी तो वह वाइबल होगी।लंच बाक्स को आप चालीस करोड़ में नहीं बना सकते हैं।विषयकी अपनी एक अपील है।उसका अपना एक दायरा है। मैं वह देखता हूं। साथ ही टीम देखता हूं। इस फिल्म के लिए अच्छा डायरेक्टर कौन होगा। वहां तक मैं जाता हूं। उसके आगे मुझे कुछनहीं आता है। मैं यह चाह रहा हूं कि ऐसा कंटेंटे मुझे मिलें।

-बैलेंस सीटपर आपका ध्यान नहीं होता।
0जी नहीं। इस पर मेरा अनुभव हो चुका है। मैं कान पकड़ चुका हूं। मैं उस वे से कट आऊट हो चुका हूं।मैं यह कभी नहीं कर पाऊंगा।

-कब अनुभव हुआ था?
0वारियर के पहले मैं अपने आपको व्यस्त रखना चाहता था। मैं टीवी सीरिज का निर्माता बन गया था। मैंने अपनी सारी कमाई लगा दी थी।पांच एपिसोड में पैसा लगा दिया। तभी वारियर आ गया। मैंने सोचा कि निर्माता बनना सही नहीं है। इसके आगे अंधेरा है। शिल्पा को बहुत चिंता हुई थी। पर मुझे नहीं करना था। यह मैंने तयकर लियाथा। वह पूरे प्रोसेस का अनुभव अच्छा नहीं था। इसमें कितना बचाएं।उसमे क्याकरें। यह करना जरूरी था। पर मैं इस काम के लिए पैदा नहीं हुआ हूं। निर्माता के तौर पर पैसा बचाना ही पडे़गा।नहीं को एक हाथ से पैसा आया दूसरे हाथ से चला गया। हर जगह से कांटना पड़ता था। प्रोसेस मेरे मिजाज का नहीं था। मैंने तभी यह सोचलिया था। मैं चाहता हूं कि कोई ऐसा आदमी मिलें।जो मेरा पैसा रेज करें।मुझे कहीं जाना ना पड़े। यह मेरी कोशिश है।

-इरफान किन चीजों से नाखुश हैं?
0मैं उनके बारे में बात नहीं करना चाहता।

-अच्छा तो किन चीजों से खुश हैं?
0इस तरह इंडस्ट्री का माहौल है।नई पीढ़ी आ रही है। रिजनल सिनेमा पिकअप कर रहा है। यह बहुत अच्छा है। दर्शकों से रिश्ता बन रहा है। दर्शक उम्मीद लगा कर बैठे हैं। दर्शक चाहत भरी नजरों से देखने लगे हैं। यह मुझे खुशी देता है।

- आप इंडस्ट्री का कितना हिस्सा बन चुके हैं?
0इंडस्ट्री को अभी तक समझ में नहीं आ पा रहा है कि मुझे कैसे इस्तेमाल किया जाएं। मैं खुद अपनी चीजों को ब्रेक कर रहा हूं। मैं अपनी फितरत की वजह से फिट नहीं हो पा रहा हूं। इसमें इंडस्ट्री का दोष नहीं है। मुझे यहां का हिस्सा बनने की जरूरत नहीं है। मैं अपनी तरह की कहानियां लेकर आ रहा हूं।एक माहौल क्रिएट कर रहा हूं। कुछ माइलस्टोन दे रहा हूं। चाहे वह तलवार,पान सिंह तोमर या लंचबाक्स हो। कहानी के फॉर्मेट  को मैं चैंलेंज कर रहा हूं। हीरो हीरोईन को फिर से खोज रहे हैं। यह मैं कर रहा हूं।मैं अपने आप से यही उम्मीद करता हूं। नया नया प्रयोग ही हमें उत्साहित रखता है। हमारे काम को सही दिशा में लेकर जाता है।

-लेकिन दुख नहीं होता है।आपको पीकू जैसी फिल्म के लिए सराहया जाता है।पर जो मिलना चाहिए वह नहीं मिलता है। अभी भी कसर बाकी है?
 0सर,मैं इस तरह  से सोचने लगूं तो बहुत कुछ सोचने के लिए है। मैं लगातार उस तरफ सोचता नहीं हूं। ऊपर वाला जो मेरे लिए चाह रहा है , मैं करताजा रहा हूं।मैंने तो कभी नहीं सोचा था कि बड़े डायरेक्टर की कहानियों का हिस्सा बन पाऊंगा। उसको मैं कहां रखूंगा।बिना किसी कोशिश के मुझे काम मिलता रहा है। मेरी गोद में  काम आ जाता है।मुझे काम पाने केलिए मेहनत नहीं करनी पड़ी। लोग मुझे घर से बुलाते हैं।

-लेकिन आपने इंतजार किया।बहुत सारे लोग गुस्से में चले जाते हैं। परेशान हो जाते हैं।पर आपने ऐसा नहीं किया।
0मेरे ख्याल से जीवन सिखाता है। मेरे जीवन का रिश्ता अहम है। जीवन हमेशा मुझे घेरे रखता है। मैं चौंकना रहता हूं।

-मुझे ऐसा लगता है कि आप किसी एक दिशा में नहीं जा रहे हैं। हमेशा खुद का रास्ता बदलते रहते हैं।
0मेरी दिशा खुदका रास्ता बनाने में हैं। मैं अपने लिए रास्ता बना रहा हूं। उसके लिए मैं भिन्न तरह की चीजें करने की कोशिश करता हूं। मुझे दर्शकों से एक ऐसा विश्वास कायम करना हैकि मेरी फिल्मों में उन्हें कुछ ना कुछ वश्य मिलेगा। मेरा कहानी चुनने का उद्देश्य भी यही रहता है। मैं जब फिल्म देखकर बचपन में बाहर निकलता था ऊबासी आती थी।फिल्म देखतेसमय अच्छा लगता था। उसके बाद खाली सा लगता था। मुझे यह समझ नहीं आता थाक्या है। ड्रामा स्कूल में जाने के बाद मैंने सही फिल्में देखना शुरू की।उन फिल्मों को देखने के बाद एक ऐसी दुनिया क्रिेएट होती थी, जिसमें से आपको निकलने का मन ही नहीं करताथा। वह नशे की तरह होता है। हम एक जोन में चले जाते हैं। मेरी मंशा है कि ऐसी कहानी लोगों को दूं,जो उनके साथरहें।घर जाकर कहानियां उनसे बात करें। मैं वन नाइट स्टैंड नहीं चाहताहूं। अभी भी ऐसे दस साल पहले की फिल्में देखते हैं, उससेकनेक्ट करतेहैं तो अच्छालगता है। आज सेचालीस साल पहले की फिल्म की आज की बड़ी सी बड़ी फिल्म का मुकाबला नहीं कर सकती है। यह कहानी हमारा धर्म है। इसे अच्छे से निभाना चाहिए। मेरा विश्वास है कि काम आपका निडर होना चाहिए।

-लेकिन कहीं ना कहीं फिल्में देखने के बाद मुझे लगता है कि हम नई चीजें का विस्तार करते हैं। हम उसको बड़ा नहीं कर पाते हैं।सब लाइन तक नहीं ले जा पाते हैं।कई बार हम विस्तार करते हैं। पर बड़ासिनेमा नहीं कर पाते हैं। जैसे पीकू भी एक स्तर पर जाकर रूक जाती है। आपको जो दिया आपने किया। देखा जाएंतोराइटर और डायरेक्टर का विजन है। आप जिस फिल्म का नाम लिए हैं, वह भी किरदार की कहानी है। पर वह थोड़ा सा छिटक कर ऊपर चली जाती है। जैसे कोई कविता पढ़ते हैं।कविता केवल शब्दों का जोड़ नहीं है। सिनेमा में केवल सीन नहीं है।
0आप बिजनेस की बात कर रहे हैं क्या 
--जी नहीं,यह सवाल बिजनेस के लिए नहीं है। उससे अलग है। एक अहसास होता है। जैसे कि आपने आज जी भर के खाना खाया नहीं। स्वाद से खाना खाया।

0उसका अब क्या कियाजा सकता है। उस तरह का अनुभव मुझे.नहीं है।.

-आप हाल फिलहाल की किसी हिंदी फिल्म का नाम लीजिए। जो आपको अनुभव देकर गई हो।
पीकू और तलवार थी। हॅालीवुड में लाइफ ऑफ  पाई थी। पान सिंह तोमर का  नाम  भी शामिल है।इन फिल्मों ने मुझे अलग तरह के अनुभव दिए।लोगों पर इनका नशा सा हो गया। इन फिल्मों को नहीं पब्लिकसिटी मिली।हफ्ते भर का समय दिया।फिल्म रिलीज हुई।इस बारे में किसी को पता भी नहीं है। अस्सी लाख का बिजनेस पहले दिन हुआ। उस फिल्म का ऐसा नशा हुआ। वह फिर ट्रेंड बन गया। उसी हद तक है। आपके आस पास जो है वैसा ही है। लेकिन हॅालीवुड में दूसरा सबसे ज्यादा बिजनेस जुरासिक पार्क  का हुआ है। उन्होंने मुझे बहुत इज्जत दी। उन्होंने मेरा नाम टाइटल में दिया। मुझे बस यह करतेरहना है। कब ऐसा हो जाएगा पता नहीं।

-यह जब होता है तो ईगो संतुष्ट हो जाता है।
जी बिल्कुल।

-अचानक आप  इंडिविजुअल परफॉर्म  कर रहे हैं। अचानक आप पूरे देश को रिप्रेजेंट  कर रहे हैं।

0यह अहसास अच्छा लगता है। सामने वाले से लड़ना पड़ता है।

-सुशील कुमार पूरे देश को रिप्रेजेंट कर रहा है। क्रिकेट वालों को छोड़ दीजिए। कलाकार भी देश को रिप्रेजेंट करते हैं। कभी आपके मन में आया कि मैं देश के लिए कर रहा हूं। यह तो ख्याल नहीं रहता है पर देश रोशन रहता है।
0देश के लिए कुछ करना है यह तो दिमाग में आता है। हम लोगों को रिफलेक्ट कर रहे हैं। उन्हीं के बारे में बता रहे हैं।मैं अपनी ईमेज को लेकर बनाना नहीं चाहता हूं। मैं क्या कर सकता हूं, यह मुझे नहीं बताना है। मैं उनके महसूसकरवाना चाह रहा हूं कि आपके अंदर क्या है। यही मेरा उद्देश्य है। और क्या चीज मुझे गुस्सा दिलाती है, उसके लिए मैं एक ही बातकहूंगा। हमारे मीडिया के जरिए जो एस्परेशन वाले लोग क्रिकेटर और फिल्म स्टार हैं। इसका मुझे बड़ा दुख है। एक बिंदी लगाए हुए मोटी सी महिला पर्स लेकर खड़ी है। साड़ी पहनती है। वह वैज्ञानिक है।बड़ा काम कर रही है। वो हीरो क्यों नहीं है। हीरोईजम को क्रिकेट और फिल्मों पर क्रेंदित किया गया है। इस वजह से स्टार शब्द से मुझे समस्या होती है। मैं आपसे कहानी शेयरकरना आया हूं। मैं समाज, लोगों के बारे में आपके बारे में इंसानों के बारे में हम विस्तार करेंगे। तभी मैं अपना एक्टर धर्म निभा पाऊंगा।

-मदारी को कैसे कैटगरी में डालेंगे?
यह थ्रिलर है। इमोशनल है।

-इस मदारी का बंदर कौन है?
इसमें खेल है।खेल का उलट-पलट है। कोई जमूरा है तो कोई मदारी है। आपका यह जानना जरूरी है कि आप क्या हो।जमूरे को जमूरे होने का अहसास होना चाहिए। और मदारी को मदारी होने का। तभी शुरुआत होगी। इस फिल्म में कोई उठा-पटक नहीं है। यह फिल्म आपको भावुक करेगी।

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