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Friday, May 19, 2017

फिल्‍म समीक्षा : हाफ गर्लफ्रेंड



फिल्‍म रिव्‍यू
हाफ गर्लफ्रेंड

शब्‍दों में लिखना और दृश्‍यों में दिखाना दो अलग अभ्‍यास हैं। पन्‍ने से पर्दे पर आ रही कहानियों के साथ संकट या समस्‍या रहती है कि शब्‍दों के दृश्‍यों में बदलते ही कल्‍पना को मूर्त रूप देना होता है। अगर कथा परिवेश और भाषा की जानकारी व पकड़ नहीं हो तो फिल्‍म हाफ-हाफ यानी अधकचरी हो जाती है। मोहित सूरी निर्देशित हाफ गर्लफ्रेंड के साथ यही हुआ है। फिल्‍म का एक अच्‍छा हिस्‍सा बिहार में है और यकीनन मुंबई की हाफ गर्लफ्रेंड टीम को बिहार की सही जानकारी नहीं है। बिहार की कुछ वास्‍तविक छवियां भी धूमिल और गंदिल रूप में पेश की गई हैं। भाषा,परिवेश और माहौल में हाफ गर्लफ्रेंड में कसर रह जाता है और उसके कारण अंतिम असर कमजोर होता है।
उपन्‍यास के डुमरांव को फिल्‍म में सिमराव कर दिया गया है। चेतन भगत ने उपन्‍यास में उड़ान ली थी। चूंकि बिल गेट्स डुमरांव गए थे,इसलिए उनका नायक डुमरांव का हो गया। इस जोड़-तोड़ में वे नायक माधव को झा सरनेम देने की चूक कर गए। इस छोटी सी चूक की भरपाई में उनकी कहानी बिगड़ गई। मोहित सूरी के सहयोगियों ने भाषा,परिवेश और माहौल गढ़ने में कोताही की है। पटना शहर के चित्रण में दृश्‍यात्‍मक भूलें हैं। सेट या किसी और शहर में फिल्‍माए गए सीन पटना या डुमरांव से मैच ही नहीं करते। पटना में गंगा में जाकर कौन सा ब्रोकर अपार्टमेंट दिखाता है? स्‍टॉल पर लिट्टी लिख कर बिहार बताने और दिखाने की कोशिश में लापरवाही दिखती है। यहां तक कि रिक्‍शा भी किसी और शहर का है... प्रोडक्‍शन टीम इन छोटी बारीकियों पर ध्‍यान दे सकती थी। इस फिल्‍म के भाषा और लहजा पर अर्जुन कपूर के बयान आए थे। बताया गया था कि उन्‍होंने ट्रेनिंग ली थी। अब या तो ट्रेनर ही अयोग्‍य था या अर्जुन कपूर ने सही ट्रेनिंग नहीं ली थी। उनकी भाषा और दाढ़ी बदलती रहती है।
सिमराव से न्‍यूयार्क तक फैली हाफ गर्लफ्रेंड मूल रूप से एक प्रेमकहानी है। मोहित सूरी ने उसे वैसे ही ट्रीट किया है। बिहार दिखाने-बताने में वे असफल रहे हैं,लेकिन प्रेमकहानी के निर्वाह में वे सफल रहते हैं। माधव और रीया की प्रेमकहानी भाषा और इलाके की दीवार लांघ कर पूरी होती है। भौगोलिक दूरियां भी ज्‍यादा मायने नहीं रखती हैं। हिंदी फिल्‍में संयोगों का खेल होती हैं। हाफ गर्लफ्रेंड में तर्क दरकिनार है और संयोगों की भरमार है। बिल गेट्स की बिहार यात्रा और बेटी बचाओ,बेटी पढ़ाओ नारे को जोड़ने में लेखक व निर्देशक को क्‍यों दिक्‍कत नहीं हुई? ऐसे अनेक अतार्किक संयोगों का उल्‍लेख किया जा सकता है।
हाफ गर्लफ्रेंड में वास्‍तविकता की तलाश न करें तो यह आम हिंदी फिल्‍म की प्रेमकहानी के रूप में अच्‍छी लग सकती है। मोहित सूरी रोमांस के पलों का अच्‍छी तरह उभारते हैं। इस फिल्‍म में भी उनकी प्रतिभा दिखती है। वे श्रद्धा कपूर और अर्जुन कपूर को मौके भी देते हैं। दोनों प्रेमी-प्रेमिका के रूप में आकर्षक और एक-दूसरे के प्रति आसक्‍त लगते हैं। प्रेम के उद्दीपन के लिए जब-तब बारिश भी होती रहती है। और फिर गीत-संगीत तो है ही। अर्जुन कपूर और श्रद्धा कपूर ने अपने किरदारों के साथ न्‍याय करने की पूरी कोशिश की है,लेकिन वे स्क्रिप्‍ट की सीमाओं में उलझ जाते हैं। फिल्‍म में माधव झा के दोस्‍तों को व्‍यक्तित्‍व नहीं मिल पाया है। एक शैलेष दिल्‍ली के हॉस्‍टल से न्‍यूयार्क तक है,लेकिन उसकी मौजूदगी और माधव के प्रति उसका रवैया अस्‍पष्‍ट ही रहता है। मां की भूमिका में सीमा विश्‍वास फिल्‍मी पांरिवारिक मां ही रहती हैं।
अवधि- 135 मिनट
** दो स्‍टार

Friday, February 22, 2013

फिल्‍म समीक्षा : काय पो छे

KPC_New POSTER_30x40_hindi.jpg-अजय ब्रह्मात्मज
गुजराती भाषा का 'काय पो छे' एक्सप्रेशन हिंदी इलाकों में प्रचलित 'वो काटा' का मानी रखता है। पतंगबाजी में दूसरे की पतंग काटने पर जोश में निकला यह एक्सप्रेशन जीत की खुशी जाहिर करता है।
'काय पो चे' तीन दोस्तों की कहानी है। तीनों की दोस्ती का यह आलम है कि वे सोई तकदीरों को जगाने और अंबर को झुकाने का जोश रखते हैं। उनकी दोस्ती के जज्बे को स्वानंद किरकिरे के शब्दों ने मुखर कर दिया है। रूठे ख्वाबों को मना लेने का उनका आत्मविश्वास फिल्म के दृश्यों में बार-बार झलकता है। हारी सी बाजी को भी वे अपनी हिम्मत से पलट देते हैं।
तीन दोस्तों की कहानी हिंदी फिल्मों में खूब पसंद की जा रही है। सभी इसका क्रेडिट फरहान अख्तर की फिल्म 'दिल चाहता है' को देते हैं। थोड़ा पीछे चलें तो 1981 की 'चश्मेबद्दूर' में भी तीन दोस्त मिलते हैं। सिद्धार्थ, ओमी और जय। 'काय पो चे' में भी एक ओमी है। हिंदी फिल्मों में रेफरेंस पाइंट खोजने निकलें तो आज की हर फिल्म के सूत्र किसी पुरानी फिल्म में मिल जाएंगे। बहरहाल, 'काय पो छे' चेतन भगत के बेस्ट सेलर 'द 3 मिस्टेक्स ऑफ माई लाइफ' पर आधारित है। साहित्यप्रेमी जानते हैं कि तमाम लोकप्रियता के बावजूद चेतन भगत के उपन्यासों को साहित्यिक महत्व का नहीं माना जाता। यह भी अध्ययन का विषय हो सकता है कि साधारण साहित्यिक और लोकप्रिय कृतियों पर रोचक, मनोरंजक और सार्थक फिल्में बनती रही हैं। गुलशन नंदा से लेकर चेतन भगत तक के उदाहरण साक्षात हैं। खोजने पर और भी मिल जाएंगे। ऐसी बेहतर फिल्मों पर लिखते समय यह खतरा रहता है कि कहीं साहित्य के फिल्म रुपांतरण का तिलिस्म न टूट जाए।
ईशान (सुशांत सिंह राजपूत), ओमी (अमित साध) और गोविंद (राज कुमार यादव) गहरे दोस्त हैं। एक-दूसरे के साथ समय बिताने और सपने देखते तीनों युवकों का समाज पारंपरिक और गैरउद्यमी है। इस समाज में पढ़ाई के बाद कुछ कर लेने का मतलब सिर्फ आजीविका के बेसिक साधन जुटा लेना होता है। तीनों देश में आए आर्थिक उदारीकरण के बाद के युवक हैं। उनके पास उद्यमी बनने के सपने हैं और वे खुद भी मेहनती और समझदार हैं। तीनों के साझा सपनों की पतंग का मांझा परिस्थितियों के कारण उलझता है। विवश और लाचार होने के बाद भी उनके जज्बे और जोश में कमी नहीं आती। उनके मतभेद और मनमुटाव क्षणिक हैं। प्रतिकूल परिस्थितियों में भी उनकी दोस्ती का धागा नहीं टूटता। तीनों मिलकर बिट्टू मामा की मदद से खेल के सामानों की दुकान खोलते हैं। ईशान क्रिकेटर है। वह क्रिकेट की कोचिंग भी देता है। उसकी नजर (दिग्विजय देशमुख) गोटीबाज अली हाशमी पर पड़ती है। अली को निखारने की कोशिश में वह उसके परिवार के करीब आता है। साथ काम करते हुए तीनों दोस्तों की प्राथमिकताएं बदलती हैं। राजनीति का भगवा उभार रेंगता हुआ उनकी दोस्ती में घुसता है। यहां हम देखते हैं कि गुजरात के गोधरा कांड की सतह के नीचे कैसी सच्चाइयां तैर रही थीं। भूकंप से कैसे सपनों में दरार पड़े और गोधरा कांड ने कैसे मानवता पर धर्माधों को हावी होने दिया।
इस फिल्म का अघोषित नायक अली हाशमी है। वह इन युवकों की संगत में पल्लवित होता है। वह खुद के लिए उनकी संजीदगी देखता है। लगन और प्रतिभा से वह देश की नेशनल क्रिकेट टीम में शामिल होता है। उसकी उपलब्धियों के सफर में तीनों दोस्तों का जोश भी है। अली हाशमी के बहाने हम सेक्युलर हिंदुस्तान को करीब से देखते हैं, जहां बंटवारे की भगवा कोशिशों के बावजूद कैसे एकजुटता से समान सपने साकार होते हैं। लेखक-निर्देशक ने अली हाशमी पर अधिक जोर नहीं दिया है। उन्हें तो तीनों युवकों की कहानी पेश करनी थी।
निस्संदेह अनय गोस्वामी के फिल्मांकन, हितेश सोनिक के पा‌र्श्व संगीत, दीपा भाटिया के संपादन के सहयोग से अभिषेक कपूर ने 'काय पो चे' जैसी उत्कृष्ट और मनोरंजक फिल्म पेश की है। स्वानंद किरकिरे के गीत और अमित त्रिवेदी का संगीत फिल्म की अंतर्धारा है। 'काय पो चे' गुजरात की पृष्ठभूमि में एक खास समय की ईमानदार कथा है, जब प्राकृतिक और राजनीतिक रूप से सब कुछ तहस-नहस हो रहा था। फिल्म का परिवेश और उसका फिल्मांकन स्वाभाविक है। कुछ भी लार्जर दैन लाइफ दिखाने या रचने की कोशिश नहीं की गई है।
मुकेश छाबड़ा की कास्टिंग और अभिषेक कपूर का निर्देशन उल्लेखनीय है। सभी किरदारों में उपयुक्त कलाकार चुने गए हैं। मुख्य कलाकारों के रूप में सुशांत सिंह राजपूत, अमित साध, राज कुमार यादव, अमृता पुरी और मानव कौल अपनी भूमिकाओं में रचे-बसे नजर आते हैं। सभी कलाकारों की अपनी विशेषताएं हैं, जो उनके चरित्र को प्रभावशाली और विश्वसनीय बनाती हैं। पहली फिल्म होने के बावजूद सुशांत सिंह राजपूत की सहजता आकर्षित करती है। अमित साध में एक ठहराव है। वे दृश्यों में रमते हैं और टिके रहते हैं। राज कुमार यादव ज्यादा सधे अभिनेता हैं। वे किरदार के सभी भावों को दृश्यों की मांग के मुताबिक व्यक्त करते हैं। प्रेम दृश्यों और गरबा डांस में उनकी घबराहट की भिन्नता देखते ही बनती है। दोस्तों से उनकी झल्लाहट और इरादों के प्रति उत्कट अभिलाषा का मूक प्रदर्शन भी उल्लेखनीय है। मानव कौल ने अभिनय कौशल से दिखाया है कि दुष्ट और खल चरित्र के लिए किसी प्रकार के मैनरिज्म या दिखावे की आवश्यकता नहीं है।
'काय पो छे' 2013 में आई उत्कृष्ट फिल्म है। यह मनोरंजक होने के साथ प्रेरक है। देश में करवट ले रही सदी के समय की प्रादेशिक सच्चाई होकर भी यह देश की युवाकांक्षा जाहिर करती है।
-चार स्टार

Friday, October 10, 2008

फ़िल्म समीक्षा: हैलो

दर्शकों को बांधने में विफल
-अजय ब्रह्मात्मज
दावा है कि वन नाइट एट काल सेंटर को एक करोड़ से अधिक पाठकों ने पढ़ा होगा। निश्चित ही यह हाल-फिलहाल में प्रकाशित सर्वाधिक लोकप्रिय उपन्यास रहा है। इसी उपन्यास पर अतुल अग्निहोत्री ने हैलो बनाई है। इस फिल्म के लेखन में मूल उपन्यास के लेखक चेतन भगत शामिल रहे हैं, इसलिए वे शिकायत भी नहीं कर सकते कि निर्देशक ने उनकी कहानी का सत्यानाश कर दिया। फिल्म लगभग उपन्यास की घटनाओं तक ही सीमित है, फिर भी यह दर्शकों को उपन्यास की तरह बांधे नहीं रखती।
अतुल अग्निहोत्री किरदारों के उपयुक्त कलाकार नहीं चुन पाए। सोहेल खान की चुहलबाजी उनके हर किरदार की गंभीरता को खत्म कर देती है। हैलो में भी यही हुआ। शरमन जोशी पिछले दिनों फार्म में दिख रहे थे। इस फिल्म में या तो उनका दिल नहीं लगा या वे किरदार को समझ नहीं पाए। अभिनेत्रियों के चुनाव और उनकी स्टाइलिंग में समस्या रही। गुल पनाग, ईशा कोप्पिकर और अमृता अरोड़ा तीनों से ही कुछ दृश्यों के बाद ऊब लगने लगती है। उनकेलिबास पर ध्यान नहीं दिया गया। ले-देकर दिलीप ताहिल और शरत सक्सेना ही थोड़ी रुचि बनाए रखते हैं। जाहिर सी बात है कि दो प्रौढ़ कलाकार किसी फिल्म से दर्शकों को जोड़े नहीं रख सकते। इस फिल्म की समस्या यह है कि एक ही आफिस में सारे किरदारों को दिखाना है। लोकेशन की सीमाबद्धता के कारण निश्चित ही निर्देशक फिल्म को दृश्यात्मक तरीके से बहुत आकर्षक नहीं बना पाता। यहां उसकी कल्पनाशीलता की परीक्षा होती है। पढ़ते समय हम शब्दों में उलझे रहते हैं लेकिन देखते समय नाटकीयता और विविधता आवश्यक हो जाती है। बार-बार वही दीवारें, मेज, पैसेज और एक ही वेशभूषा में किरदार दिखते हैं। ऐसे में फ्लैशबैक और दृश्यांतरण बहुत जरूरी हो जाता है। निर्देशक अतुल अग्निहोत्री इस लिहाज से चूक गए हैं। उपन्यास का क्लाइमेक्स बेहद रोमांचक है। फिल्म में इसे और भी रोमांचक बनाया जा सकता था लेकिन निर्देशक ने किसी हड़बड़ी या मजबूरी में उस दृश्य को जल्दी समेट दिया। सलमान खान और कैटरीना कैफ की मौजूदगी भी फिल्म को रोचक नहीं बना पाती।