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Sunday, September 17, 2017

अच्‍छाई से बड़ी कोई चीज नहीं - भूमि पेडणेकर



अच्‍छाई से बड़ी कोई चीज नहीं-भूमि पेडणेकर
-अजय ब्रह्मात्‍मज
टॉयलेट एक प्रेम कथा में भूमि पेडणेकर की बहुत तारीफ हो रही है। इस तारीफ से उनकी मां खुश हैं। भूमि के फिल्‍मों में आने के बाद से मां की ख्‍वाहिश रही कि बेटी को जया भदुड़ी,शबाना आजमी और स्मिता पाटिल की कड़ी की अभिनेत्री माना जाए। ऐसा प्‍यार मिले।
- कैसे एंज्‍वॉय कर रहे हो आप टॉयलेट एक प्रेम कथा की कामयाबी और उसमें अपने काम की तारीफ से?
0 मैं तो एकदम से सन्‍न रह गई थी। मेरी पहली फिल्‍म छोटी थी। मैंने पहली बार प्रमोशन में ऐसे हिस्‍सा लिया। बड़े पैमाने पर सब कुछ चल रहा था। समझने की कोशिश कर रही थी कि मेरे साथ क्‍या हो रहा है? अब संतोष का एहसास है। फिल्‍म और मेरा काम लोगों को पसंद आया। दूसरे हफ्ते से मैं थिएटरों में जाकर दर्शकों की प्रतिक्रियाएं देख-सुन रही हूं।
- किन दृश्‍यों में दर्शक ज्‍यादा तालियां बजा रहे हैं?
0 सेकेड हाफ में मेरा एक मोनोलॉग है। जहों दादी मो के सामने गांव की औरतों को कुछ बता रही हूं। इंटरवल सीन है। जब केशव को डेटॉल लगा रही हूं। फिल्‍म के संदेश के साथ हमारी प्रेम कहानी के दृश्‍यों को दर्शक समझ रहे हैं1 पहली बार जब खेले में शौच के लिए जाती हूं। वह दृश्‍य भी खास है। सब मिला कर खुश हूं।
-क्‍या आप के अनुभव के दायरे में जया जैसी लड़कियां रही हैं?
0 मेरे संपर्क में कोई नहीं है। मेरी मां सातवें दशक की जया थीं। उस समय लड़कियां ज्‍यादा दबाव में रहती थीं। फिर भी मां और मौसी में जबरदस्‍त जोश था। मैंने उन दोनों से प्रेरणा ली। मेरी मां अपने समय में यूथ मूवमेंट में शामिल रही थीं। अपने हकों के लिए उन्‍होंने लड़ाई की। मेरी मां और पापा के परिवारों में प्रगतिशील सोच रही है।
-लेखक और निर्देशक से क्‍या सहायता मिली?
0 मेरी अभी तक की फिल्‍में पूरे रिसर्च के बाद लिखी गई हैं। टॉयलेट एक प्रेम कथा के लेखकों के पास सारी जानकारियां थीं। सब कुछ स्क्रिप्‍ट में था। भी नारायण सिंह गोरखपुर के हें। वे इस फिल्‍म की भाषा और मिट्टी जानते हैं। मेरे लिए आसान रहा।
-क्‍या कभी खूले में शौच की मजबूरी रही?
0 बचपन में कई बार...पूना या गोवा जाते समय रोडट्रिप में ऐसा होता था। तब हाईवे पर टॉयलेट नहीं थे। एक बार चिपलूण में एक घर का दरवाजा खटखटाया था कि हमें टॉयलेट का इस्‍तेमाल करने दें। घर की महिलाएं चौंक गई थीं।
-क्‍या स्क्रिप्‍ट पढ़ते समय अंदाजा हो गया था कि जया स्‍ट्रांग किरदार है?
0बिल्‍कुल... तब मुझे पता नहीं था कि इसमें अक्षय कुमार होंगे। मरे लिए लव स्‍टोरी बहुत खूबसूरत थी।  यह तो लग गया था कि जया औरतों को प्रेरित करेगी। मेरे मन में अक्षय सर के लिए इतना आदर है। उन्‍होंने मुझे पूरा महत्‍व दिया। जया के किरदार को चमकने दिया। मुझे मौका कदया।
-तो आप को इंतजार का फल मिला...दम लगा के हईसा के बाद आप ने अच्‍छी स्क्रिप्‍ट का इंतजार किया...धैर्य बनाए रखीं?
0 अब कह सकती हूं कि हां। तब तो सभी को लग रहा था कि मैं कोई फिल्‍म क्‍यों नहीं साइन कर रही हूं। लोग कह रहे थे कि फिल्‍म कर लो। मेरा मानना है कि सही फिल्‍में होनी चाहिए। संख्‍या बढ़ाने से क्‍या फायदा? में अपने परिवार को श्रेय दूंगी। उन्‍होंने पूरा सपोर्ट किया। मेरी मां का सहयोग रहा। उन्‍होंने मुझे कहा कि मैं शुभ मंगल सावधान करूं। यशराज फिल्‍म्‍स से होने का फायदा रहा।
-अपनी उपलब्धियों से घर में भाव बढ़ता है। कई बार दफ्तर में भी बढ़ता है। आप यशराज फिल्‍म्‍स में एक कर्मचारी थीं। अभी आप अभिनेत्री हैं। आप के और दूसरे कर्मचारियां के व्‍यवहार में कोई फर्क आया है क्‍या?
0 सभी मेरे परिचित है। मेरे प्रति उनका प्रेम रहा है। उनके साथ मेरे संबंधों में बदलाव नहीं आया है। शुरू में कुछ ने हाय-हेलो करना बंद कर दिया।फिर मैंने पहल की।मैंने कभी किसी को अनदेखा नहीं किया। मैं सभी से मिलती हूं। नया रिलेशन इवॉल्‍व हो गया है। अक्षय सर के साथ काम करने के बाद समझ गई हूं कि अच्‍छाई से बड़ी कोई चीज नहीं है।आयुष्‍मान से कितना सीखा है मैंने।
-शुभ मंगल सावधान के बारे में बताएं?
0 बहुत ही अलग किरदार है सुगंधा का। दिल्‍ली में पली-बढ़ी लड़की है। उसने सुरक्षित जिंदगी जी है। अपने पति को लेकर उसके अनेक अरमान हैं। वह कंपलीट रिलेशशिप में यकीन करती है।मुझे डायरेक्‍टर प्रसन्‍ना ने समझाया कि उन्‍हें क्‍या नहीं चाहिए और क्‍या चाहिए? उन्‍होंने तमिल की अपनी फिल्‍म को ही हिंदी दर्शकों के लिए बनाया है। इस फिल्‍म के किरदार हमें अपने घरों में मिल जाएंगे। इसमें एक समस्‍या है,लेकिन वह केवल लड़के की समस्‍या नहीं है। कई बार रिश्‍ते समस्‍याओं से बड़े होते हैं। फिल्‍म में लड़ी अपने पार्टनर के साथ खड़ी मिलती है,जब उसका कंफीडेंस लो है।वह उसके साथलड़ती है। इस फिल्‍म में किरदार की अपूर्णता को सेलिब्रेट किया गया है। बहुत ही प्रोग्रेसिव फिल्‍म है।
-फिल्‍म के निर्माता आनंद राय के साथ कैसा अनुभव रहा?
0 उनके साथ बहुत मजा आया। उन्‍होंने साफ-सुथरी फिल्‍म बनाने में गाइड किया। उनके साथ काम करने का मन था। उम्‍मीद है कि जल्‍दी ही उनके निर्देशन में काम करने का मौका मिले। वे मेरे विशलिस्‍ट में थे।
-और कौन है?
0शिमित अमीन,विशाल भारद्वाज,जोया अख्‍तर,नितेश तिवारी,शकुन बत्रा,शुजीत सरकार...इतने सारे हैं। जोया के साथ एक शॅर्ट फिल्‍म कर ली है।
-अभिषेक चौबे की अगली फिल्‍म के बारे में क्‍या कहेंगी?
0उसके बारे में अभी कुछ बताना जल्‍दबाजी होगी।
-क्‍या केवल डिग्‍लैम रोल ही करने हैं?
0 नहीं,मैं टिप टिप बरसर पानी भी गाना चाहती हूं। मैं ठोस किस्‍म की भूमिकाएं करती रहूंगी। हर तरीके के किरदार चाहिए। रियल लाइफ में मैं ग्‍लैमरस लड़की हूं। आम लड़कियों की सारी खासियतें हैं मुझ में...

Sunday, August 6, 2017

गूगल बता रहा है गंभीर है समस्‍या - अक्षय कुमार



स्‍वच्‍छता अभियान की पृष्‍ठभूमि में एक प्रेहम कथा
-अजय ब्रह्मात्‍मज
अक्षय कुमार की टॉयलेट एक प्रेम कथा रिलीज हो रही है। हाल ही में इस फिल्‍म के पांच टीजर रिलीज किए गए,जिनसे फिल्‍म का फील मिल रहा है। यह एहसास बढ़ रही है कि अक्ष्‍य कुमार की यह फिल्‍म मनोरंजक लव स्‍टोरी होने के साथ ही एक जरूरी संदेश भी देगी। संदेश है स्‍वच्‍छता का,संडास का...हम सभी की दैनिक नित्‍य क्रियाओं में सबसे महत्‍वपूर्ण और आवश्‍यक शौचालय की उचित चर्चा नहीं होती। अक्षय कुमार की इस फिल्‍म ने शौचालय की जरूरत और अभियान की तरफ सभी का ध्‍यान खींचा है। रिलीज से पहले अक्षय कुमार इस फिल्‍म के प्रचार के लिए सभी प्‍लेटफार्म का इस्‍तेमाल कर रहे हैं। उनसे यह बातचीत फिल्‍मसिटी से जुहू स्थित उनके आवास की यात्रा के दौरान हुई।
-देश में अभी स्‍वच्‍छता अभियान चल रहा है। आप की फिल्‍म टॉयलेट एक प्रेम कथा का विषय भी स्‍वच्‍छता से जुड़ा है। क्‍या उस अभियान और इस फिल्‍म में कोई संबंध है?
0 स्‍वच्‍छता,क्लीनलीनेस,टॉयलेट...या संडास कह लें। कुछ भी कहें और करें...मकसद एक ही है कि भारत को स्‍वच्‍छ करना है। अभी वह सबसे महत्‍वपूर्ण मुहिम है। आम धारणा है कि यह गांवों की समस्‍या है। वहां शौचालय नहीं हैं। यह शहरों की भी उतनी ही बड़ी समस्‍या है। महानगरों में भी खुले में शौच होता है। रेल की पटरियों,पाईप के ऊपर-नीचे,समुद्र के किनारे आप का लोग मिल जाएंगे। हां,कुछ लोगों की शौचालय बनाने की हैसियत नहीं होती। हमारी सरकार इस दिशा में बहुत कुछ कर रही है। हमारी फिल्‍म का विषय उन लोगों से संबंधित है,जिनकी नियत नहीं है। वे शौचालय नहीं बनाना चाहते। वे खुले में शौच की वकालत भी करते हैं।खुले में शौच की गंदगी और बीमारी के चपेट में सभी आते हैं1 शहरों में तो बीमारी और भी तेजी से फैलती है।
-ऐसे गंभीर विषय पर फिल्‍म बनाना सचमुच चुनौती रही होगी और आप का इससे जुड़ना भी रोचक है...
0मैंने इस विषय के बारे में सुन रखा था। फिल्‍म की कहानी के बारे में जानने के बाद मुद्ददे के विस्‍तार में गया तो और भी जानकारियां मिलीं। देश की 54 प्रतिशत आबादी के पास शौचालय नहीं है। हर पांच मिनट के बाद एक बच्‍चे की मौत इसी वजह से होती है। खतरनाक स्थिति है। गूगल सर्च में कई अच्‍छी बातों में हम दुलनया में आगे और ऊपर हैं,लेकिन शर्म की बात है कि खुले शौच में भी हम बहुत ऊपर है। हमें जितनी जल्‍दी हो खुले में शौच की आदत और मजबूरी को खत्‍म करना चाहिए। इस फिल्‍म से जुड़ने की वजह यही मंशा है।
-कहीं न कहीं यह लगता है कि शौचालय सिर्फ गरीबी से जुड़ा मसला नहीं है। इसके प्रति हमारी लापरवाही खास मानसिकता की वजह से है....
0बिल्‍कुल। वे गलतफहमी और पुरानी सोच में जकड़े हुए हैं। मैं पूछता हूं,जो यह तर्क देते हैं कि खाना बनाने और खाने की जगह पर टॉयलेट नहीं बनवाएंगे। वे फिर खाना उगाने की जगह पर शौच के लिए कैसे राजी हो जाते हैं?
- इस मुद्दे को अपनी फिल्‍म में कैसे पिरोया है?
0 शौचालय फिल्‍म के बैकग्राउंड में है। फोर ग्राउंड में लवस्‍टोरी है। एक सीधी सी बात कहता हूं कि शाहजहां ने अपनी बेगम मुमताज के लिए ताजमहल बनवा दिया। क्‍या हम अपनी बीवियों के लिए संडास नहीं बनवा सकते। अगर अपने प्‍यार के लिए यह भी नहीं कर सकते तो लानत है। शौचालय न होने से घर की औरतें कितनी मुसीबतें झेलती हैं। उन्‍हें सूरज उगने से पहले और सूरज डूबने के बाद खेतों की तरफ जाना पड़ता है। दिन भर वे खुद को रोक कर पेट में बीमारियों को जन्‍म दे रही होती हैं। परिवार की औरतों की समस्‍या पर ध्‍यान दें। एक ओर घूघट की बात करते हैं और दूसरी ओर उन्‍हें साड़ी उठा कर खुले में बैठने को मजबूर करते हैं। मर्द तो कहीं भी खड़े हो जाते हैं। फिल्‍म की कहानी हकीकत है। मैं खुद ऐसे 8-10 व्‍यक्तियों और परिवारों को जानता हूं।
-मैंने सुना है कि पहले यह छोटी फिल्‍म थी। आप के जुड़ने के बाद यह बड़ी और चर्चित हो गई है?
0 आप को पता है साढ़ चार साल यह स्क्रिप्‍ट फिल्‍म इंडस्‍ट्री में घूती रही। किसी स्‍टार ने हां नहीं कहा। मुझे पता चला तो नीरज पांडेय से रिक्‍वेस्‍ट कर मैंने यह फिल्‍म ली। इसे श्रीनारायण सिंह डायरेक्‍ट कर रहे हैं। मैंने अभी तक 20-21 नए डायरेक्‍टरों के साथ काम किया है।
-नए डायरेक्‍टर के साथ केमेस्‍ट्री कैसे बनती है? आप की कोई मांग रहती है?
0फिल्‍म के लिए हां कहते ही रिश्‍ता बनने लगता है। कहानी सुनाने के लिए उन्‍हें सुबह चार बजे बुला लेता हूं तो वे सिर पीट कर आते हैं। फिर हम दोनों ब्‍लेंड करना शुरू करते हैं। एक-दूसरे के हिसाब से ढलते हैं। नए डायरेक्‍टर कुछ कर दिखाना चाहते है। उनकी इस कोशिश में मुझे अच्‍छी फिल्‍म मिल जाती है। मैं डायरेक्‍टर के विजन को ही फॉलो करता हूं।
-फिल्‍म के प्रमोशन में कितनी रुचि लेते हैं? क्‍या प्रमोशनल इवेंट से दर्शक बनते हैं?
0हां,अवेयरनेस बढ़ती है। दर्शकों को पता चलता है।फिल्‍म के प्रमोशन के लिए सभी जरूरी इवेंट में जाता हूं। अगर मैं शो या इवेंट में जाता हूं तो पूरी तरह से इंवॉल्‍व रहता हूं।
-अभी किसी ने आप की तुलना धर्मेन्‍द्र से की। उनकी नजर में आप उनकी तरह ही अलग होकर भी कामयाब हैं और हर तरह की फिल्‍में कर रहे है...
0 वे मेरे आदर्श रहे हैं और हैं। आप ने किस का नाम ले लिया और किस ने मेरी उनसे तुलना कर दी। मैं तो उनकी फिल्‍में देख कर बड़ा हुआ हूं। डैडी से कहता था कि धर्मेन्‍द्र की फिल्‍म देखनी है। हमें एक्‍शन का बहुत शौक था। डैडी उनकी फिल्‍में दिखाते थे। उनके साथ मेरी तुलना करना बड़ी बात है। अमैं उनका फैन ही नहीं,फॉलोअर भी हूं।
-क्रैक क्‍यों बंद हो गई। कहते हैं नीरज पांडेय के साथ अब आप नहीं हैं?
0 अभी लनंदन में हम दोनों साथ ही बैठे। बातें की। वे हमारे प्रेस कांफ्रेंस के लिए भी आए थे। मीडिया कुछ क्रैक नहीं कर पाती तो ऐसी स्‍टासेरी चला देती है।  सच इतना ही है कि अभी क्रैक की कहानी क्रैक नहीं हो पाई है।
-अपनी नायिका भूमि पेडणेकर के बारे में बताएं?
0सबसे पहले तो यह कहूंगा कि कि ऐसा रोल लेना ही बड़ी बात है। उन्‍हें ,खुले शौच का एक सीन करना था। आप बताएं कि कौन सा एक्‍टर ऐसे सीन के लिए तैयार होगी। उन्‍होंने क्राउड के बीच साड़ी उठाई और उंकड़ू बैठने का सीन किया। एेसा करने में आत्‍मा ठेस पहुंचती है। उन्‍होंने बताया कि मैं तो एक्टिंग कर रही थी तो इतनी शर्म आई। जो औरतें वास्‍त में खुले में शौच करती हैं,उन पर रोजाना क्‍या गुजरती होगी? उन्‍हें कितनी ठेस लगती होगी। वह पावरफुल एक्‍टर हैं।
-आप की फिल्‍म पर कोर्ट केस हुआ है कि कंटेंट में समानता है...
0 मामला अभी कोर्ट में है। देखिए,कोर्ट क्‍या फैसला सुनाती है। सही निर्णय आएगा। मुझे नहीं लगता कि ऐसा कुछ होगा।
-राकेश ओमप्रकाश भी इसी विषय पर मेरे प्‍यारे प्रधानमंत्री लेकर आ रहे हैं...
0 अच्‍छा है। और भी लोग आएं। हमारी तो लव स्‍टोरी है,इसीलिए इसका टाइटिल टॉयलेट एक प्रेम कथा है।


Friday, June 9, 2017

सामाजिक मुद्दे लुभाते हैं मुझे : अक्षय कुमार



अक्षय कुमार

-अजय ब्रह्मात्‍मज
अक्षय कुमार इन दिनों परिवार के साथ वार्षिक छुट्टी पर हैं। उनकी फिल्‍म टॉयलेट : एक प्रेम कथा का ट्रेलर 11 जून को दर्शकों के बीच आएगा। इस फिल्‍म को लेकर वह अतिउत्‍साहित हैं। उन्‍होंने छुटिटयों पर जाने के पहले अपने दफ्तर में इस फिल्‍म का ट्रेलर दिखाया और फिल्‍म के बारे में बातें कीं। तब तक ट्रेलर पूरी तरह तैयार नहीं हुआ था तो उन्‍होंने अपने संवाद बोल कर सुना दिए। टॉयलेट : एक प्रेम कथा के बारे में उनका मत स्‍पष्‍ट है। वे कहते हैं कि मैाने मुद्दों को सींग से पकड़ा है। आम तौर पर फिल्‍मों में सीधे सामाजिक मुद्दों की बाते नहीं की जातीं,लेकि टॉयलेट : एक प्रेम कथा में शौच की सोच का ऐसा असर है कि टायटल में टॉयलेट के प्रयोग से भी निर्माता,निर्देशक और एक्‍टर नहीं हिचके।
-शौच के मुद्दे पर फिल्‍म बनाने और उसका हिस्‍सा होने का खयाल कैसे आया?
0जब मुझे पता चला कि देश की 54 प्रतिशत आबादी के पास अपना टॉयलेट नहीं है तो बड़ा झटका लगा। मुझे लगा कि इस मुद्दे पर फिल्‍म बननी चाहिए। ऐसा नहीं है कि किसी दिक्‍कत या गरीबी की वजह से टॉयलेट की कमी है। कुछ संपन्‍न परिवारों में इसके बारे में सोचा ही नहीं जाता। शौच को लेकर उनकी सोच गलत है। उन्‍हें लगता है कि घर के हिस्‍से के रूप में शौच केलिएएक कमरा कैसे बनाया जा सकता है? कई परिवारों में तर्क दिया जाता है कि मंदिर,तुलसी और रसोई के आसपास शौच कैसे बनाया जा सकता है?
-इस फिल्‍म की कहानी कैसे मिली या लिखी गई?
0यह एक सच्‍ची कहानी है। हमें कहानी अच्‍छी लगी। तय हुआ कि इस जरूरी मुद्दे की बात पर गंभी फिल्‍म नहीं बनाई जाए। वैसा करने पर दर्शकों को फिल्‍म पसंद नहीं आती। फिल्‍म में कहानी का कॉमिकल ट्रीटमेंट है। नीरज पांडेय केपास ही यह कहानी आई थी। पिछली फिल्‍म की शूटिंग के समय उन्‍होंने इसकी चर्चा की थी। मुझे इस फिल्‍म का विचार ही पसंद आ गया।
-इस फिल्‍म की शूटिंग के समय विरोध और विवाद हुआ था?
0हां,कुछ लोग हमें समझाने आए थे कि आप गलत फिल्‍म बना रहे हैं। लहां खाना बनाया और खाया जाता है,वहां शौच की जगह बनाने के बारे में कोई सोच भी कैसे सकता है? मैं तो उनकी सोचसे हैरान हो गया। मुझे लगा कि उनसे बात नहीं की गई है। उन्‍हें समझाया नहीं गया। वे अपनी सोच से हिलना ही नहीं चाहते। ये बातें परिवार के मर्द कर रहे थे। उन्‍हें कोई दिक्‍कत ही नहीं होती। कहीं भी बैठ गए या खड़े हो गए। वहीं जब औरतों से बातें हुईं तो उन्‍होंने अपनी दिक्‍कतें बताईं। एक वृद्धा तो खास आग्रह करती रही कि किसी तरह मेरे अंगने में शौच बनवा दो।
-गरीबी भी तो एक वजह है?
0बिल्‍कुल है। उसके बारे में भी सोचा जाना चाहिए। यह तो वन टाइम इंवेस्‍टमंट है। पंचायत और प्रखंड के सतर पर यह अभियान चलाया जा सकता है। इन दिनों एक शौच बनवाने में 40 हजार रुपए का खर्च आता है। टूपिट टॉयलेट बनाया जाना चाहिए। मैंने स्‍वयं मध्‍यप्रदेश में इस अभियान में साथ दिया। खुद गड्ढा खोदा। मैंने तो एक पिट की सफाई भी की। अपने हाथों से पिट का ढेर उठाया। मल एक समय के बाद खाद बना जाता है। आर्गेनिक खाद के रूप में यह फसल और पेड़-पौधों के लिए बहुत उपयोगी है। अतिरिक्‍त खाद बेच कर पैसे भी बनाएजा सकते हैं। हमलोग फिल्‍म में इतनी बातें नहीं कर रहे हैं। दो घंटों में एक रोचक प्रेम कथा दिखाएंगे।-आप इन दिनों ऐसी फिल्‍मों में रुचि ले रहे हैं, इसके बाद आप की पैडमैन भी आएगी...0 क्‍या कहूं? मेरे पास ऐसे सब्‍जेक्‍ट आ जाते हैं। मुझे स्‍वयं ऐसी फिल्‍में करने में मजा आता है। मैं अपनी बात कहूं तो मुझेऐसे विषयों के साथ कुछ महीने बिताना अच्‍छा लगता है।-रजनीकांत के साथ आप की फिल्‍म 2.0 आएगी। उसका सभी को इंतजार है...0 मैं खुद इंतजार कर रहा हूं।उनके साक मुझे बहुत अच्‍छा लगा। रजनी सर के साथ पहले दिन का अनुभव रोचक था। मैं उनसे ज्‍यादा उन लोगों को देख रहा था जो उनकी हर अदा पर अहो-अहो कर रहे थे। उनकी आंखों में रजनी सर के लिए अथाह आदर था। पता चल रहा था कि वे उन्‍हें देख कर आनंदित हो रहे थे।-हिंदी फिल्‍मों के स्‍टार वैसा आदर क्‍यों नहीं पाते?0हम दिन-रात दिखते रहते हैं। इन दिनों कहें तो 665 चैनल आ गए हैं। हर जगह फोटोग्राफर हैं। हम सभी के सामने नंगे होते जा रहे हैं। हमें इतना खर्च कर दिया जाता है कि हमारा मूल्‍य घट जाता है। दक्षिण के स्‍टार हमारी तरह दिन-रात नहीं दिखते।
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