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Friday, March 23, 2018

फिल्‍म समीक्षा : हिचकी


फिल्‍म समीक्षा
रानी की मुनासिब कोशिश
हिचकी
-अजय ब्रह्मात्‍मज
शुक्रिया रानी मुखर्जी। आप अभी जिस ओहदे और शौकत में हैं,वहां आप के लिए किसी भी विषय पर फिल्‍म बनाई जा सकती है। देश के धुरंधर फिल्‍मकार आप के लिए भूमिकाएं लिख सकते हैं। फिर भी आप ने हिचकीचुनी। पूरी तल्‍लीनता के साथ उसमें काम किया और एक मुश्किल विषय को दर्शकों के लिए पेश किया। कहा जा सकता है कि आप की वजह से यह हिचकीबन सकी। मुनीष शर्मा और सिद्धार्थ पी मल्‍होत्रा की यह कोशिश देखने लायक है।

हिचकीकी कहानी दो स्‍तर पर चलती है। एक स्‍तर पर तो यह नैना माथुर(रानी मुखर्जी) की कहानी है। दूसरे स्‍तर पर यह उन उदंड किशोरों की भी कहानी है,जो सभ्‍य समाज में अनके वंचनाओं के कारण अवांछित हैं।  नैना माथुर टॉरेट सिनड्राम से ग्रस्‍त हैं। इसमें खूब हिचकियां आती हैं और बार-बार आती हैं। इस सिंड्रोम की वजह से उन्‍हें 12 स्‍कूल बदलने पड़े हैं। स्‍नातक होने के बाद पिछले पांच सालों मेंउन्‍हें 18 बार नौक‍रियों से रिजेक्‍ट किया गया है। उन्‍होंने ठान लिया है कि उन्‍हें टीचर ही बनना है। स्क्रिप्‍ट का विधान ऐसा बनता है कि उन्‍हें अपने ही आखिरी स्‍कूल में नौकरी मिलती है। यहीं के शिक्षक खान ने कभी उनकी झिझक और हीनभावना से उन्‍हें आजाद किया था। उन्‍हें सामान्‍य और नियमित छात्र होने का सम्‍मान दिया था। उन्‍हें एक मजबूरी की वजह से स्‍कूल में नौकरी मिल जाती है। दरअसन,उस स्‍कूल के 9एफ के बच्‍चे किसी टीचर को टिकने ही नहीं देते। उन बच्‍चों को उस स्‍कूल में शिक्षा के अधिकार के तहत एडमिशन तो मिल गया है,लेकिन स्‍कूल के दूसरे शिक्षक उन्‍हें हेय दृष्टि से देखते हैं। उन्‍हें खाज की तरह लेते हैं। नैना का संघर्ष दोहरा है। उन्‍हें खुद को योग्‍य और समर्थ साबित करने के साथ उन किशोरों के पक्ष में भी खड़ा होना है। उन्‍हें योग्‍य बनाना है। उन्‍हें मुख्‍यधारा में लाना है।

नैना के सख्‍त विरोधी आभिजात्‍य वाडिया हैं। वे नैना को खुली चुनौती देते हैं कि 9एफ के छात्रों का कुछ नहीं हो सकता। नैना माथुर को अपनी नौकरी और विश्‍वास के लिए हर युक्ति का सहारा लेना है। फिल्‍मी परिपाटी के मुताबिक पहले वह हारती हैं। ऐसा लगता है कि उनके किशोर छात्र ही उनकी राह के कांटे हैं। सहकर्मी वाडिया और स्वयं नैना के पिता को लगता है की वह व्यर्थ कोशिशों में अपना समय बर्बाद कर रही है। पिता तो नैना के टॉरेंट सिंड्रोम की वजह से शर्मिंदगी महसूस करते हैं। अपनी रूचि और इच्छाएं लादते रहते हैं। भाई और माँ नैना के सपोर्ट में हैं। स्कूल के प्रिंसिपल भी चाहते हैं कि नैना अपने करियर और मिशन में सफल हो। फिल्म अनेक अतार्किक और घिसे-पिटे प्रसंगो से होकर अपेक्षित निष्कर्ष तक पहुँचती है। 

इस फिल्म को देखते हुए प्रकाश झा की 'हिप हिप हुर्रे' और सुमित्रा भावे व सुनील सुखान्तकर की 'दसवीं फ ' की याद आती रही। नेक इरादे के साथ बनी यह फिल्म अपने विषय के निरूपण में पतली और कमज़ोर हो गयी है। लेखकों के पास घटनाएं नहीं हैं। तनाव और द्वंद्व की सम्भावना बनती है,लेकिन शोध और समझ के अभाव में 'हिचकीः समस्याओं को सहला कर निकल जाती है। फिल्म की थीम को दो गीतों में ज़्यादा दमदार तरीके से पिरोया गया है। इस फिल्म को मुंबई से दूर किसी और शहर या कस्बे में रोपा जाता तो विषय का निर्वाह बेहतर होता।

हाँ, रानी मुखर्जी ने रोचक चरित्र को जरूरी अंदाज से निभाया है। नीरज कबि तो इस पीढ़ी के बहुरुपिया हैं।  हर किरदार के साथ उनका अलग रंग और आयाम दिखता है। किशोर कलाकारों ने प्रभावकारी काम किया है।  हर्ष मयार परिचित चेहरा हैं। उन्होंने अपने किरदार को तेवर दिया है। बाकी किशोर कलाकारों भी योगदान उल्लेखनीय है।

अवधि 118 मिनट
तीन स्टार

Friday, February 23, 2018

फिल्‍म समीक्षा : सोनू के टीटू की स्‍वीटी



फिल्‍म समीक्षा : सोनू के टीटू की स्‍वीटी
-अजय ब्रह्मात्‍मज
हिंदी फिल्‍मों में निर्देशक और अभिनेता की जोड़ी ने कमाल किए हैं। परस्‍पर भरोसे से कुछ बेहतरीन फिल्‍में आई हैं। लव रंजन और कार्तिक आर्यन की जोड़ी ने ‘प्‍यार का पंचनामा’(1-2),आकाशवाणी और अब ‘सोनू के टीटू की स्‍वीटी’ जैसी फिल्‍में दी हैं। इन फिल्‍मों को क्‍लासिक के दर्जे में नहीं डाल सकते,लेकिन ये कल्‍ट ब्रांड की फिल्‍में हैं। अकेले लव रंजन ही ऐसी फिल्‍में बना रहे हैं। दरअसल,इस तरह की फिल्‍मों के लिए बात और स्‍वभाव में देसी होना जरूरी है। अगर आप अपने समय और समाज में पगे होंगे,तभी ऐसी फिल्‍में लेकर आ सकते हैं। इन फिल्‍मों में कोई बड़ी बात नही कही गई है। रोजमर्रा की बातों का ही ऐसे नजरिए और एटीट्यूड के साथ पेश किया गया है कि किरदारों में आज के युवक दिखते हैं। लव रंजन की फिल्‍में मुख्‍य रूप से लड़कों के नजरिए से पेश की जाती हैं। उनकी लड़कियां कतई कमजोर नहीं होतीं,लेकिन लड़कों के ज्‍यादा दृश्‍यों और प्रसंगों की वजह से दरकिनार होती नजर आती हैं। गौर करें तो लव रंजन के किरदार शहरी और महानगरीय दिखते हैं,लेकिन उनकी मानसिकता उत्‍तर भारत के कस्‍बाई किरदारों की होती है। अपनी फिल्‍मों को रोचक और मनोरंज‍क बनाने के लिए लव रंजन  कॉस्‍मोपोलिटन युक्तियां जुटान में आगे रहते हैं। ‘सोनू के टीटू की स्‍वीटी’ ही देखें तो पाएंगे कि इसमें करण जौहर के रसीले कारनामे भी मौजूद हैं। फिर भी यह देसी पेशकश है। छोटे शहरों के युवा समूह के संबंधों की कशमकश है।
शहरों में ऐसी दोस्‍ती नहीं होती। सेनू और टीटू नर्सरी के दोस्‍त हैं। 13 की उम्र में मां के निधन के बाद सोनू टीअू के परिवार का हिस्‍सा हो गया है। कह सकते हैं कि दोनों जुड़वां भाइयों की ही तरह हैं। टीटू का परिवार और उसके परिजन ही सोनू के सगे हैं। सोनू थोड़ा व्‍यवहारिक है। वह टीटू की उलझनें कम करता है। खास कर प्रेम संबंधों में टीटू को चोट और ठोकरों से बचता है। प्रेम में असफल रहने के बाद टीटू अरेंज मैरिज करने के नलए तैयार हो जाता है। उसे स्‍वीटी पसंद आ जाती है। स्‍वीटी परफेक्‍ट,उदार और हंसमुख लड़की है। चंद मुलाकातों में ही वह टीटू समेत उसके परिजनों का दिल जीत लेती है। स्‍वीटी की यह जल्‍दीबाजी ही सोनू को अखर जाती है। उसे संदेह होता है। वह टीटू और शेष परिवार के सामने यह सवाल रखता है कि भला कोई लड़की ऐसी हो सकती है? कुछ दृश्‍यों के बाद सेनू और स्‍वीटी परस्‍पर नापसंदगी जाहिर हो जाती है। इन दोनों के बीच फंसा टीटू दोस्‍ती और लड़की के बीच पेंड़ुलम सा डोलता रहता है।
किरदारों के बीच के रिश्‍तों में कुछ व्‍यवहार सहज लगते हैं,लेकिन दादा घसीटा से टीटू और सोनू के रिश्‍ते का खुलापन स्‍वाभाविक नहीं लगता। क्‍या मेरठ जैसे शहर में दाद और पोते के बीच लड़की,शराब और अन्‍य मर्दाना हंसी-मजाक चलते हैं? लेखक-निर्देशक ने यह अतिछूट ली है। शादी के पहले टीटू के झार में स्‍वीटी का रातें बिताना भी सामान्‍य नहीं है। दृश्‍यों की जरूरत के किसाब से कभी यह परिवार संयुक्‍त हो जाता है। कभी सोनू और टीटू का हो जाता है। तो कभी दादा और उनके दोस्‍त सरीखे साले का...बहरहाल,सोनू,टीटू और स्‍वीटी के बीच एक त्रिकोण बनता है। यह समद्विबाहु त्रिकोण है,जिसका आधार टीटू है। सोनू और स्‍वीटी के बीच की लड़ाई वास्‍तव में स्‍पेस की लड़ाई है। कस्‍बाई दोस्तियों में किसी एक की शादी होने पर दोस्‍त को इस संकट से गुजरना पड़ता है। पत्‍नी के घर में आते ही दोस्‍त की जगह पहले जैसी नहीं रह जाती। इस फिल्‍म में तो संकेतों में बताया गया है कि स्‍वीटी का मकसद भी है। वह सोनू को चैलेंज भी करती है कि टीटू को उससे छीन लेगी और उसे लात पड़ेगी।
लव रंजन की फिल्‍म में मजेदार और अप्रत्‍याशित ट्वीस्‍ट एंड टर्न हैं। लव रंजन और राहुल मोदी ने कहानी को रोचक बनाए रखा है। उन्‍होंने छूट और उड़ान भी ली है,जिन्‍हें नजरअंदाज किया जा सकता है। इस फिल्‍म को निर्देशक के मन के मुताबिक पेश करने में कार्तिक अार्यन,सनी सिंह ऑर नुसरत भरूचा ने पूरा योगदान किया है। सहयोगी किरदारों के रूप में आए सभी कलाकार अपनी भूमिकाओं से कुछ न कुछ जोड़ते हैं। नुसरत भरूचा और कार्तिक आर्यन की भिड़ंत उनके किरदारों को अतिरिक्‍त आयाम और परफारमेंस के मौके देती है। कर्तिक इस फिल्‍म में पारंपरिक नायक नहीं हैं। कई बार वे खल चरित्र के रूप में उभते हैं। उन्‍हें खल और नेक की पतली रस्‍सी पर चलना है। उन्‍होंने अपने किरदार का बेसिक संतुलन बनाए रखा है। उनकी खीझ और मुस्‍कराहट दोनों प्‍यारी लगती है।
इस फिल्‍म में सात गीतकार और संगीतकार हैं। मेरठ और दिल्‍ली के बीच चल रही इस फिल्‍म में पंजाबी तड़के का संगीत है। इन दिनों ज्‍यादातर हिंदी फिल्‍मों में पंजाबी बोलों का संगीत लोकप्रिय हो रहा है। निर्माता-निर्देशक उन्‍हें जरूरी मानते हैा,लेकिन वह फिल्‍म के मूल मिजाज को खंडित करता है।
अवधि – 140 मिनट
साढ़े तीन स्‍टार ***1/2
     
                                          

Saturday, August 5, 2017

फिल्‍म समीक्षा : जब हैरी मेट सेजल



फिल्‍म रिव्‍यू
मुकम्‍मल सफर
जब हैरी मेट सेजल
-अजय ब्रह्मात्‍मज
इम्तियाज अली की फिल्‍मों का कथ्‍य इरशाद कामिल के शब्‍दों में व्‍यक्‍त होता है। उनकी हर फिल्‍म में जो अव्‍यक्‍त और अस्‍पष्‍ट है,उसे इरशाद कामिल के गीतों में अभिव्‍यक्ति और स्‍पष्‍टता मिलती है। फिल्‍मों में सगीत और दृश्‍यों के बीच पॉपुलर स्टारों की मौजूदगी से गीत के बालों पर ध्‍यान नहीं जाता। हम दृश्‍यों और प्रसंगों में तालमेल बिठा कर किरदारों को समझने की कोशिश करते रहते हैं,जबकि इरशाद इम्तियाज के अपेक्षित भाव को शब्‍दों में रख चुके होते हैं। जब हैरी मेट सेजल के पहले गीत में ही हरिन्‍दर सिंह नेहरा उर्फ हैरी अपने बारे में कहता है ...
मैं तो लमहों में जीता
चला जा रहा हूं
मैं कहां पे जा रहा हूं
कहां हूं?
..............
...............
जब से गांव से मैं शहर हुआ
इतना कड़वा हो गया कि जहर हुआ
इधर का ही हूं ना उधर का रहा

सालों पहले पंजाब के गांवों से यूरोप पहुंचा हैरी निहायत अकेला और यादों में जीता व्‍यक्ति है। कुछ है जो उसे लौटने नहीं दे रहा और उसे लगातार खाली करता जा रहा है। उसका कोई स्‍थायी ठिकाना नहीं है। लमहों में जी रहे हैरी को वास्‍तव में खुद की और उस हमसफर की तलाश है,जो उसकी कमियों को खत्‍म कर दे। उसे मुकम्‍मल करे और उसके साथ रहे। इम्तियाल अली की अन्‍य फिल्‍मों की तरह पूर्णता की तलाश में आधे-अधूरे किरदारों का सफर जब हैरी मेट सेजल में भी जारी है। विपरीत सोच और जीवन शैली के दो व्‍यक्तियों का परस्‍पर विकर्षण ही सोहबत से आकर्षण में बदलता है। वे एक-दूसरे के पूरक बनते हैं। इम्तियाज अली ने इस बार उन्‍हें पंजाब का हैरी और मुंबई की सेजल का नाम दिया है। उनके सफर के लिए यूरोप के छह देश चुने हैं। सुंदर वादियों में वादों-विवादों के साथ वे निकट आते हैं। एक-दूसरे को महसूस करते हैं। और फिर साथ होने का यत्‍न करते हैं।
भाव और कथ्‍य के स्‍तर पर किरदारों का यह सफर हमें विचलित करता है। अपनी हरकतों और रवैयों से वे रोचक भी लगते हैं। दोनों का झुकाव अनायास नहीं है। परिस्थितियों ऐसी बनती हैं कि वे करीब आते हैं। यों सेजल की पहल और आक्रामकता बनावटी लगती है। वह अपनी कोशिशों से हैरी को जताना चाहती है कि वह उसकी दूसरी चहेती लड़कियों की तरह हॉट और आकर्षक है। वह सफल भी होती है। इसके बावजूद हैरी की नजर में वह कुछ अलग और गैरमामूली है,क्‍योंकि वह उसे समझने लगी है। उसके छिपाए जख्‍मों को उसने देख लिया है। जब हैरी मेट सेजल संयेग से हमसफर बने दो किरदारों की सेल्‍फ डिस्‍कवरी है। इस डिस्‍कवरी में वे खुद बदलते हैं और दूसरे के बदलाव का कारण बनते हैं।
इम्तियाल अली की खूबी है कि वे अपनी कथा और किरदारों के लिए नयनाभिरामी लोकेशन चुनते हैं। इस फिल्‍म में तो हम हैरी और सेजल के साथ छह देशों की यात्रा करते हैं। वहां की गलियों ,कैफे और पब से परिचित होते हैं। उन देशों और शहरों के बारे में हमें कुछ और जानकारियां भी मिलती है। इम्तियाज अली गयाशुद्दीन उर्फ गैस के बहाने थोड़ी देर के लिए अपनी कहानी से अलग होते हैं। फिल्‍म का यह गैरजरूरी हिस्‍सा लगता है। बहरहाल,कहानी फिर से हैरी और सेजल को लकर आगे बढ़ती है।
शाह रूख खान पंजाब के हैरी और अनुष्‍का शर्मा मुंबई की सेजल हैं। पंजाब की पृष्‍ठभूमि के हैरी जैसे अनेक किरदार हम ने हिंदी फिल्‍मों में देखे हैं। की है। मुंबई की गुजराती लड़की सेजल बनाने के लिए अनुष्‍का शर्मा को गुजराती लहजा दिया गया है। कुछ शब्‍दों के उच्‍चारण और लहजे में वह सचेत रहती हैं। और कभी भूल भी जाती हैं। अगर सेजल सहज हिंदी बोलती तो क्‍या उसमें कोई कमी रह जाती? नहीं,बल्कि अनुष्‍का शर्मा अपने किरदार के प्रति अतिरिक्‍त सावधान नहीं रहतीं। अधिक स्‍वाभाविक लगतीं। शाह रूख खान और अनुष्‍का शर्मा के बीच की केमिस्‍ट्री वर्क करती है। दोनों अच्‍छे लगे हैं। उन्‍हें कुछ दृश्‍य भी मिले हैं,जहां नाच-गाने और रेगुलर एक्टिविटी से ऊपर उठ कर अभिनय कौशल दिखाने का मौका मिला है। उन दृश्‍यों में दोनों ने कमाल की दक्षता जाहिर की है। दिक्‍कत यही है कि वे दृश्‍य टांके हुए लगते हैं। अगर पूरी फिल्‍म में उनके लिए ऐसे अवसर होते तो यह फिल्‍म ज्‍यादा प्रभावित करती। और हां,हैरी अगर सफर में ही रहता तो अधिक वास्‍तविक लगता।
फिल्‍म में गीत-संगीत की पर जोर है। इरशाद कामिल और प्रीतम ने निर्देशक की मांग पूरी की है। इरशाद कामिल और इम्तियाज अली की जोड़ी बेहतर गीतों पर ध्‍यान देती है। कुछ गीत अनावश्‍यक लगे हैं।
अवधि 144 मिनट
*** तीन स्‍टार    

Thursday, August 3, 2017

फिल्‍म समीक्षा : गुड़गांव



फिल्‍म रिव्‍यू
सटीक परिवेश और परफारमेंस
गुड़गांव
-अजय ब्रह्मात्‍मज

हिंदी फिल्‍में संवादों पर इतनी ज्‍यादा निर्भर हो चुकी हैं और उनकी दर्शकों को ऐसी आदत पड़ गई है कि किसी फिल्‍म में निर्देशक भाव,संकेत और मुद्राओं से काम ले रहा हो तो उनकी बेचैनी बढ़ने लगती है। दर्श्‍क के तौर पर हमें चता नहीं चलता कि फिल्‍म हमें क्‍यो अच्‍छी नहीं लग रही है। दरअसल,हर फिल्‍म ध्‍यान खींचती है। एकाग्रता चाहिए। दर्शक्‍ और समीक्षक इस एकाग्रता के लिए तैयार नहीं हैं। उन्‍हें अपने मोबाइल पर नजर रखनी है या साथ आए दर्शक के साथ बातें भी करनी हैं। आम हिंदी फिल्‍मों में संवाद आप की अनावश्‍यक जरूरतों की भरपाई कर देते हैं। संवादों से समझ में आ रहा होता है कि फिल्‍म में क्‍या ड्रामा चल रहा है ? माफ करें, गुड़गांव देखते समय आप को फोन बंद रखना होगा और पर्देपर चल रही गतिविधियों पर ध्‍यान देना होगा। नीम रोशनी में इस फिल्‍म के किरदारों की भाव-भंगिमाओं पर गौर नहीं किया तो यकीनन फिल्‍म पल्‍ले नहीं पड़ेगी।
शंकर रमन की गुड़गांव उत्‍कृष्‍ट फिल्‍म है। दिल्‍ली महानगर की कछार पर बसा गांव गुड़गांव जब शहर में तब्‍दील हो रहा था तो वहां के बाशिंदों के जीवन में भारी उथल-पुथल चल रही थीं। उनमें से कुछ बाशिंदों को शंकर रमन ने अपनी फिल्‍म में किरदार के रूप में लिया। पूरे परिवेश के बजाए यह फिल्‍म एक परिवार में सिमटी रहती है। उस परिवार के सदस्‍यों के आपसी संबंधों को लेकर बुनी यह फिल्‍म तत्‍कालीन परिवेश का कच्‍चा चिट्ठा बेरहमी से पेश करती है। सारे पुरुष किरदार ग्रे और निगेटिव हैं। वे किसी न किसी छल-प्रपंच में लिप्‍त हैं। ऐसा लगता है कि फिल्‍म की महिला किरदार उन्‍हें मूक भाव से देख रही हैं। फिर भी वे गवाह हैं। हम पाते हैं कि मौका मिलने पर वे निर्णायक कदम उठाती हैं। यह फिल्‍म केहरी सिंह के परिवार के माध्‍यम से ऐसे परिवेश की सामाजिक संरचना और मूल्‍यों को पेश करती है। जर्जर मूल्‍यों के बीच सूख रही मानवीय संवेदनाओं के बीच उम्‍मीद हैं प्रीत और केहरी सिंह की बीवी।
केहरी सिंह परिवेश की करवट में पिस गया है। वह पश्‍चाताप में जी रहा है। स्‍पष्‍ट है कि उसे अपनी भूलों का एहसास है। वह उसकी भरपाई भी करना चाह रहा है,लेकिन पुरानी ऐंठन उसे सहज नहीं होन दे रही है। नशे में रहना उसकी आदत नहीं,पलायन है। वह बदल रही स्थितियों के सामने विवश है। कहीं न कहीं वह नालायक बेटे के आगे लाचार भी हो चुका है। केहरी सिंह की इस चुनौतीपूर्ण भूमिका में पंकज त्रिपाठी को देखना सिनेमाई अनुभव है। उन्‍होंने किरदार की लैंग्‍वेज के साथ उसकी बॉडी लैंग्‍वेज को भी आत्‍मसात किया है। उन्‍हें बाकी किरदारों से भी कम संवाद मिले हैं। फिर भी वे केहरी सिंह की मनोदशा को असरदार तरीके से पेश करते हें। उनके बेटे निकी सिंह के रोल में अक्षय ओबेराय ने सबूत दिया है कि सधे निर्देशक के साथ वे किरदार में ढल सकते हैं। उन्‍होंने पूरी फिल्‍म निकी सिंह के अंदाज को बनाए रखा है। छोटी सी भूमिका में रागिनी खन्‍ना याद रह जाती हैं। यों लगता है कि इस किरदार को और भी दृश्‍य मिलने चाहिए थे। मां की खास भूमिका में शालिनी वत्‍स प्रभावशाली हैं।
शंकर रमन की गुड़गांव तकनीक और क्राफ्ट के स्‍तर पर प्रभावित करती है। फिल्‍म का छायांकन उल्‍लेखनीय है।  कह सकते हैं फिल्‍म की थीम को डिफाइन और एक्‍सप्‍लेन करने में छायांकन की बड़ी भूमिका है।
अवधि 107 मिनट
साढ़े तीन स्‍टार

Friday, April 14, 2017

फिल्‍म समीक्षा : बेगम जान



फिल्‍म रिव्‍यू
बेगम जान
अहम मुद्दे पर बहकी फिल्‍म
-अजय ब्रह्मात्‍मज

फिल्‍म की शुरूआत 2016 की दिलली से होती है और फिल्‍म की समाप्ति भी उसी दृश्‍य से होती है। लगभग 70 सालों में बहुत कुछ बदलने के बाद भी कुछ-कुछ जस का तस है। खास कर और तों की स्थिति...फिल्‍म में बार-बार बेगम जान औरतों की बात ले आती है। आजादी के बाद भी उनके लिए कुछ नहीं बदलेगा। यही होता भी है।
बाल विधवा हुई बेगम जान पहले रंडी बनती है और फिर तवायफ और अंत में पंजाब के एक राजा साहब की शह और सहाता से कोठा खड़ी करती है,जहां देश भर से आई लड़कियों को शरण मिलती है। दो बस्तियों के बीच बसा यह कोठा हमेशा गुलजार रहता है। इस कोठे में बेगम जान की हुकूमत चलती है। दुनिया से बिफरी बेगम जान हमेशा नाराज सी दिखती हैं। उनकी बातचीत में हमेशा सीख और सलाह रहती है। जीवन के कड़े व कड़वे अनुभवों का सार शब्‍दों और संवादों में जाहिर होता रहता है। कोइे की लड़कियों की भलाई और सुरक्षा के लिए परेशान बेगम जान सख्‍त और अनुशासित मुखिया है।
आजादी मिलने के साथ सर सिरिल रेडक्लिफ की जल्‍दबाजी में खींची लकीर से पूर्व और पश्चिम में देश की विभाजन रेखा खिंच जाती है। नक्‍शे पर रेखा खींचते समय रेडक्लिफ का एहसास भी नहीं रहता कि वे अहम मुद्ददे पर कैसी अहमक भूल कर रहे हैं। उन्‍होंने तो रेखा खींच दी और चुपके से ब्रिटेन लौट गए,लेकिन पंाब और बंगाल में विभाजन की विभीषिका में लाखें बेघर हुए और लाखों को जान-माल की हानि हुई। इसी में बेगम जान का कोठा भी तबाह हुआ और कोठे की लड़कियों को आधुनिक पद्मसवती बनी बेगम जान के साथ जौहर करना पड़ा।
लेखक-निर्देशक श्रीजित मुखर्जी ने फिल्‍म के मुद्दे को सही संदर्भ और परिवेश में उठाया,लेकिन बेगम जान की कहते-कहते वे कहीं भटक गए। उन्‍हें नाहक जौहर का रास्‍ता अपनाना पड़ा और पृष्‍ठभूमि में त्रवो सुबह कभी तो आएगी गीत बजाना पड़ा। अपने उपसंहार में यह फिल्‍म दुविधा की शिकार होती है। अहम मुद्दे पर अहमकाना तो नहीं,लेकिन बहकी हुई फिल्‍म हमें मिलती है।
बेगम जान का किरदार एकआयामी और बड़बोला है। वह निजी आवेश में स्थितियों से टकरा जाती है। उसे राज साहब से भी मदद नहीं मिल पाती। लोकतंत्र आने के बाद राजा साहब की रियासत और सियासत में दखल पहले जैसी नहीं रह गई है। रेडक्लिफ लाइन को बेगम जान के इलाके में लागू करवाने के लिए तैनात श्रीवास्‍तव और इलियास कंफ्यूज और भवुक इंसान हैं,लेकिन वे बेरहमी से काम लेते हैं। बाद में उनका पछतावा पलले नहीं पड़ता। इतने ही संवेदनशील थे तो उन्‍हें कबीर की मदद लेने की जरूरत क्‍यों पड़ी? और कबीर का किरदार...माफ करें भट्ट साहब और श्रीजित कबीर समन्‍य और समरसता के प्रतीक हैं। उनके नाम के किरदार से ऐसी अश्‍लील और जलील हरकत क्‍यों? इसे सिनैमैटिक लिबर्टी नहीं कहा जा सकता।
बहरहाल, विद्या बालन ने बेगम जान के किरदार को तन-मन दिया है। उन्‍होंने उसके रुआब और शबाब को संजीदगी से पर्दे पर उतारा है। उनकी संवाद अदायगी और गुस्‍सैल अदाकारी बेहतरी है। उनका किरदार दमदार है,लेकिन अंतिम फैसले में वह आदर्श के बावजूद कमजोर पड़ जाती है। यह विद्या की नहीं,लेखक-निर्देशक की कमजोरी है। सहयोगी किरदारों की छोटी भूमिकाओं में अभिनेत्रियों(दर्जन भर)े ने बेहतर काम किया है। मास्‍टरजी और सुजीत बने अभिनेताओं विवेक मुश्रान और पितोबोस का काम यादगार है।
फिल्‍म में चित्रित होली रंगीन और आह्लादपूर्ण हैं। रंगों की ऐसी छटा इन दिनों विरले ही दिखती है। फिल्‍म भावुकता और संवादों से ओतप्रोत है,जो संयुक्‍त रूप आलोडि़त तो करती है,लेकिन कहीं पहुंचाती नहीं है।
अवधि- 134 मिनट
*** तीन स्‍टार

Saturday, January 14, 2017

फिल्‍म समीक्षा : ओके जानू

फिल्‍म रिव्‍यू
ओके जानू
-अजय ब्रह्मात्‍मज
शाद अली तमिल के मशहूर निर्देशक मणि रत्‍नम के सहायक और शागिर्द हैं। इन दिनों उस्‍ताद और शाग्रिर्द की ऐसी जोड़ी कमू दिखाई देती है। शाइ अली अपने उस्‍ताद की फिल्‍मों और शैली से अभिभूत रहते हैं। उन्‍होंने निर्देशन की शुरूआत मणि रत्‍नम की ही तमिल फिल्‍म के रीमेक साथिया से की थी। साथिया में गुलजार का भी यागदान था। इस बार फिर से शाद अली ने अपने उस्‍ताद की फिल्‍म ओके कनमणि को हिंदी में ओके जानू शीर्षक से पेश किया है। इस बार भी गुलजार साथ हैं।
मूल फिल्‍म देख चुके समीक्षकों की राय में शाद अली ने कुछ भी अपनी तरफ से नहीं जोड़ा है। उन्‍होंने मणि रत्‍नम की दृश्‍य संरचना का अनुपालन किया है। हिंदी रीमेक में कलाकार अलग हैं,लोकेशन में थोड़ी भिन्‍नता है,लेकिन सिचुएशन और इमोशन वही हैं। यों समझें कि एक ही नाटक का मंचन अलग स्‍टेज और सुविधाओं के साथ अलग कलाकारों ने किया है। कलाकरों की अपनी क्षमता से दृश्‍य कमजोर और प्रभावशाली हुए हैं। कई बार सधे निर्देशक साधारण कलाकारों से भी बेहतर अभिनय निकाल लेते हैं। उनकी स्क्रिप्‍ट कलाकारों को गा्रे करने का मौका देती है। ओके जानू में ऐसा ही हुआ है। समान एक्‍सप्रेशन से ग्रस्‍त आदित्‍य राय कपूर पहली बार कुछ खुलते और निखरते नजर आए हैं। हां,श्रद्धा कपूर में उल्‍लेखनीय ग्रोथ है। वह तारा की गुत्थियों और दुविधाओं को अच्‍छी तरह व्‍यक्‍त करती है। चेहरा फोकस में हो तो उतरते,बदलते और चढ़ते हर भाव को कैमरा कैद करता है। कलाकार की तीव्रता और प्रवीणता पकड़ में आ जाती है। श्रद्धा कपूर ऐसे क्‍लोज अप दृश्‍यों में संवाद और भावों को अच्‍दी तरह व्‍यक्‍त करती हैं। युवा कलाकारों को संवाद अदायगी पर काम करने की जरूरत है। इसी फिल्‍म में गोपी का किरदार निभा रहे नसीरूद्दीन शाह मामूली और रुटीन दृश्‍यों में भी बगैर मेलोड्रामा के दर्द पैदा करने में सफल रहे हैं। यह उनकी आवाज और संवाद अदायगी का असर है। यहां तक कि लीला सैमसन अपने किरदार को भी ऐसे ही गुणों से प्रभावशाली बनाती हैं।
फिलम की कहानी आज के युवा किरदारों के आग्रह और भ्रम पर केंद्रित है। तारा और आदि आज के युवा ब्रिगेड के प्रतिनिधि हैं। दोनों महात्‍वाकांक्षी हैं और जीवन में समृद्धि चाहते हैं। तारा आर्किटेक्‍अ की आगे की पढ़ाई के लिए पेरिस जाना चाहती है। आदि का ध्‍येय वीडियो गेम रचने में लगता है। वह अमेरिका को आजमाना चाहता है। आदि उसी क्रम में मुंबई आता है। वह ट्रेन से आया है। दोनों उत्‍तर भारतीय हैं। तारा समृद्ध परिवार की लड़की है। आदि मिडिल क्‍लस का है। फिल्‍म में यह गौरतलब है कि आदि को वहडयो गेम का सपना आता है तो निर्देश और सड़कों के दोनों किनारों की दुकानों के साइन बोर्ड हिंदी में लिखे हैं,लेकिन जब वह वीडियो गेम बनाता है तो सब कुछ अंग्रेजी में हो जाता है। शाद अली ने बारीकी से उत्‍तर भारतीय के भाषायी अवरोध और प्रगति को दिखाया है। बहरहाल, इस फिल्‍म में भी दूसरी हिंदी फिल्‍मों की तरह पहली नजर में ही लड़की लड़के को आकर्षित करती है और फिर प्रेम हो जाता है।
ओके जानू प्रेम और करिअर के दोराहे पर खड़ी युवा पीढ़ी के असमंजस बयान करती है। साहचर्य और प्‍यार के बावजूद शादी करने के बजाय लिव इन रिलेशन में रहने के फैसले में कहीं न कहीं कमिटमेंट और शादी की झंझटों की दिक्‍कत के साथ ही कानूनी दांवपेंच से बचने की कामना रहती है। हम लिव इन रिलेशन में रहने और अलग हो गए विख्यात प्रेमियों को देख रहे हैं। उनकी जिंदगी में तलाक की तकलीफ और देनदारी नहीं है। खास कर लड़के ऐसे दबाव से मुक्‍त रहते हैं। आदि और तारा दोनों ही स्‍पष्‍ट हैं कि वे अपने ध्‍येय में संबंध को आड़े नहीं आने देंगे। ऐसा हो नहीं पाता। साथ रहते-रहते उन्‍हें एहसास ही नहीं रहता कि वे कब एक-दूसरे के प्रति कमिटेड हो जाते हैं। उनके सामने गोपी और चारू का साक्ष्‍य भी है। उन दोनों की परस्‍पर निर्भरता और प्रेम आदि और तारा के लिए प्रेरक का काम करते हैं।
अपनी प्रगतिशीलता के बावजूद हम अपनी रूढि़यों से बच नहीं पाते। इसी फिल्‍म में गोपी तारा से पूछते हैं कि वह करिअर और प्‍यार में किसे चुनेगी? यही सवाल आदि से भी तो पूछा जा सकता है। दरअसल, हम लड्कियों के लिए प्‍यार और करिअर की दुविधा खड़ी करते हैं। ओके जानू ऐसे कई प्रसंगों की वजह से सोच और अप्रोच में आधुनिक होने के बावजूद रूढि़यों का पालन करती है।
अवधि- 135 मिनट
तीन स्‍टार 

Friday, November 25, 2016

फिल्‍म समीक्षा : डियर जिंदगी



फिल्‍म समीक्षा
डियर जिंदगी
-अजय ब्रह्मात्‍मज

हम सभी की जिंदगी जितनी आसान दिखती है,उतनी होती नहीं है। हम सभी की उलझनें हैं,ग्रंथियां हैं,दिक्कतें हैं...हम सभी पूरी जिंदगी उन्‍हें सुलझाते रहते हैं। खुश रहने की कोशिश करते हैं। अनसुलझी गुत्थियों से एडजस्‍ट कर लेते हैं। बाहर से सब कुछ शांत,सुचारू और स्थिर लगता है,लेकिन अंदर ही अंदर खदबदाहट जारी रहती है। किसी नाजुक क्षण में सच का एहसास होता है तो बची जिंदगी खुशगवार हो जाती है। गौरी शिंदे की डियर जिंदगी क्‍यारा उर्फ कोको की जिंदगी में झांकती है। क्‍यारा अकेली ऐसी लड़की नहीं है। अगर हम अपने आसपास देखें तो अनेक लड़कियां मिलेंगी। वे सभी जूझ रही हैं। अगर समय पर उनकी भी जिंदगी में जहांगीर खान जैसा दिमाग का डाक्‍टर आ जाए तो शेष जिंदगी सुधर जाए।
हिंदी फिल्‍मों की नायिकाएं अब काम करने लगी हैं। उनका एक प्रोफेशन होता है। क्‍यारा उभरती सिनेमैटोग्राफर है। वह स्‍वतंत्र रूप से फीचर फिल्‍म शूट करना चाहती है। उसे रघुवेंद्र से आश्‍वासन मिलता है। संयोग कुछ ऐसा बनता है कि वह स्‍वयं ही मुकर जाती है। मानसिक दुविधा में वह अनिच्‍छा के साथ अपने मां-बाप के पास गोवा लौटती है। गोवा में उसकी मुलाकात दिमाग के डाक्‍टर जहांगीर खान से होती है। अपनी अनिद्रा के इलाज के लिए वह मिलती है तो बातचीत और सेशन के क्रम में उसके जीवन की गुत्थियों की जानकारी मिलती है। जहांगीर खान गुत्थियों की गांठों को ढीली कर देता है। उन्‍हें वह खुद ही खोलती है।
गुत्थियों को खोलने के क्रम में वह जब मां-बाप और उनके करीबी दोस्‍तों के बीच गांठ पर उंगली रखती है तो सभी चौंक पड़ते हैं। हमें क्‍यारा की जिंदगी के कंफ्यूजन और जटिलताओं की वजह मालूम होती है और गौरी शिंदे धीरे से पैरेंटिंग के मुद्दे को ले आती हैं। करिअर और कामयाबी के दबाव में मां-बाप अपने बच्‍चों के साथ ज्‍यादतियां करते रहते हैं। उन्‍हें पता ही नहीं चलता और वे उन्‍हें किसी और दिशा में मोड़ देते हैं। उनके कंधों पर हमेशा अपनी अपेक्षाओं का बोझ डाल देते हैं। बच्‍चे निखर नहीं पाते। वे घुटते रहते हैं। अपनी जिंदगी में अधूरे रहते हैं। कई बार वे खुद भी नहीं समझ पाते कि कहां चूक हो गई और उनके हाथों से क्‍या-क्‍या फिसल गया? डियर जिंदगी पैरेंटिंग की भूलों के प्रति सावधान करती है।
क्‍यारा की निजी(इस पीढ़ी की प्रतिनिधि) समस्‍या तक पहुंचने के लिए गौरी शिंदे लंबा रास्‍ता चुनती हैं। फिल्‍म यहां थोड़ी बिखरी और धीमी लगती है। हम क्‍यारा के साथ ही उसके बदलते दोस्‍तों सिड,रघुवेंद्र और रुमी से भी परिचित होते हैं। उसकी दो सहेलियां भी मिलती हैं। क्‍यारा को जिस परफेक्‍ट की तलाश है,वह उसे नहीं मिल पा रहा है। इसके पहले कि उसके दोस्‍त उसे छोड़ें,वह खुद को समेट लेती है,काट लेती है। भावनात्‍मक संबल और प्रेम की तलाश में भटकती क्‍यारा को जानकारी नहीं है कि अधूरापन उसके अंदर है। दिमाग के डाक्‍टर से मिलने के बाद यह स्‍पष्‍ट होता है। जिंदगी की छोटी तकलीफों,ग्रंथियों और भूलों को पाले रखने के बजाए उन्‍हें छोड़ देने में ही सुख है।
गोवा की पृष्‍ठभूमि में डियर जिंदगी के किरदार विश्‍वसनीय और असली लगते हैं। चमक-दमक और सजावटी जिंदगी और परिवेश में लिप्‍त फिल्‍मकारों को इस फिल्‍म सीख लेनी चाहिए। बहरहाल, गौरी शिंदे ने अपने तकनीकी सहयोगियों की मदद से फिल्‍म का कैनवास सरल और वास्‍तविक रखा है। उन्‍होंने कलाकारों के चुनाव में किरदारों के मिजाज का खयाल रखा है। क्‍यारा के परिवार के सभी सदस्‍य किसी आम मध्‍यवर्गीय परिवार के सदस्‍य लगते हैं। उनकी बातें और चिंताएं भी मध्‍यवर्गीय सीमाओं में हैं। गौरी बारीकी से घर-परिवार और समाज की धारणाओं और मान्‍यताओं को रेखांकित करती जराती है। वह रुकती नहीं हैं। वह मूल कथा तक पहुंचती हैं।
शाह रुख खान अपनी प्रचलित छवि से अलग साधारण किरदार में सहज हैं। उनका चार्म बरकरार है। वह अपने अंदाज और किरदार के मिजाज से आकर्षक लगते हैं। ऐसे किरदार लोकप्रिय अभिनेताओं को अभिनय का अवसर देते हैं। शाह रुख खान इस अवसर का लाभ उठाते हैं। आलिया भट्ट अपनी पीढ़ी की समर्थ अभिनेत्री के तौर पर उभर रही हैं। उन्‍हें एक और मौका मिला है। क्‍यारा के अवसाद,द्वंद्व और महात्‍वाकांक्षा को उन्‍होंने दृश्‍यों के मुताबिक असरदार तरीके से पेश किया है। लंबे संवाद बोलते समय उच्‍चारण की अस्‍पष्‍टता से वह एक-दो संवादों में लटपटा गई हैं। नाटकीय और इमोशनल दृश्‍यों में बदसूरत दिखने से उन्‍हें डर नहीं लगता। सहयोगी भूमिकाओं में इरा दूबे,यशस्विनी दायमा,कुणाल कपूप,अंगद बेदी और क्‍यारा के मां-पिता और भाई बने कलाकारों ने बढि़या योगदान किया है।
अवधि- 149 मिनट
साढ़े तीन स्‍टार

फिल्‍म समीक्षा : मोह माया मनी



फिल्‍म समीक्षा
महानगरीय माया
मोह माया मनी
-अजय ब्रह्मात्‍मज
मुनीष भारद्वाज ने महानगरीय समाज के एक युवा दंपति अमन और दिव्‍या को केंद्र में रख कर पारिवारिक और सामाजिक विसंगतियों को जाहिर किया है। अमन और दिव्‍या दिल्‍ली में रहते हैं। दिव्‍या के पास चैनल की अच्‍छी नौकरी है। वह जिम्‍मेदार पद पर है। अमन रियल एस्‍टेट एजेंट है। वह कमीशन और उलटफेर के धंधे में लिप्‍त है। उसे जल्‍दी से जल्‍दी अमीर होना है। दोनों अपनी जिंदगियों में व्‍यस्‍त है। शादी के बाद उनके पास एक-दूसरे के लिए समय नहीं है। समय के साथ मुश्किलें और जटिलताएं बढ़ती हैं। अमन दुष्‍चक्र में फंसता है और अपने अपराध में दिव्‍या को भी शामिल कर लेता है। देखें तो दोनों साथ रहने के बावजूद एक-दूसरे से अनभिज्ञ होते जा रहे हैं। महानगरीय परिवारों में ऐसे संबंध दिखाई पड़ने लगे हैं। कई बार वे शादी के कुछ सालों में ही तलाक में बदल जाते हैं या फिर विद्रूप तरीके से किसी कारण या स्‍वार्थ की वजह से चलते रहते हैं।
मुनीष भारद्वाज ने वर्तमान उपभोक्‍ता समाज के दो महात्‍वाकांक्षी व्‍य‍क्तियों की एक सामान्‍य कहानी ली है। उन्‍होंने नए प्रसंग और परिस्थिति में इस कहानी को रचा है। अतिरिक्‍म और अधिक की लालसा में अनेक व्‍यक्ति और परिवार बिखर रहे हैं। अगर समृद्धि और विकास के प्रयास में ईमानदारी नहीं है तो उसके दुष्‍प्रभाव जाहिर होते हैं। मोह माया मनी संबंधों की जटिलता में उलझे,रिश्‍तों में बढ़ रही अनैतिकता के शिकार और कामयाबी की फिक्र में कमजोर हो रहे किरदारों की कहानी है।
लेखक नर्देशक मुनीष भारद्वाज और लेखन में उनकी सहयोगी मानषी निर्मजा जैन ने पटकथा में पेंच रखे हैं। उन्‍होंने उसके के हिसाब से शिल्‍प चुना है। शुरू में वह अखरता है,लेकिन बाद में वह कहानी का प्रभाव बढ़ाता है। मुनीष किसी भी दृश्‍य के बेवजह विस्‍तार में नहीं गए हैं। फिल्‍म का एक किरदार दिल्‍ली भी है। मुनीष ने दिल्‍ली शहर का प्रतीकात्‍मक इस्‍तेमाल किया है। मशहूर ठिकानों पर गए बगैर वे दिल्‍ली का माहौल ले आते हैं। सहयोगी कलाकारों के चुनाव और उनके बोलने के लहजे से दिल्‍ली की खासियत मुखर होती है।
सहयोगी कलाकारों में विदुषी मेहरा,अश्‍वत्‍थ भट्ट,देवेन्‍दर चौहान और अनंत राणा का अभिनय उल्‍लेखनीय है। रणवीर शौरी इस मिजाज के किरदार पहले भी निभा चुके हैं। इस बार थोड़ा अलग आयाम और विस्‍तार है। उन्‍होंने किरदार की निराशा और ललक को अच्‍छी तरह व्‍यक्‍त किया है। कुछ नाटकीय दृश्‍यों में उनकी सहजता प्रभावित करती है। नेहा धूपिया ने दिव्‍या के किरदार को समझा और आत्‍मसात किया है। फिल्‍म के क्‍लाइमेक्‍स में पश्‍चाताप में आधुनिक और औरत की टूटन और विवशता को अच्‍छी तरह जाहिर करती हैं।
मोह माया मनी चुस्‍त फिल्‍म है। घटनाक्रम तेजी से घटते हैं और गति बनी रहती है।
अवधि- 108 मिनट
तीन स्‍टार 

Friday, November 18, 2016

फिल्‍म समीक्षा : फोर्स 2

चुस्‍त और फास्‍ट
फोर्स 2
-अजय ब्रह्मात्‍मज
अभिनय देव की फोर्स 2 की कहानी पिछली फिल्‍म से बिल्‍कुल अलग दिशा में आगे बढ़ती है। पिछली फिल्‍म में पुलिस अधिकारी यशवर्द्धन की बीवी का देहांत हो गया था। फिल्‍म का अंत जहां हुआ था,उससे लगा था कि अगर भविष्‍य में सीक्‍वल आया तो फिर से मुंबई और पुलिस महकमे की कहानी होगी। हालांकि यशवर्द्धन अभी तक पुलिस महकमे में ही है,लेकिन अपने दोस्‍त हरीश की हत्‍या का सुराग मिलने के बाद वह देश के रॉ डिपाटमेंट के लिए काम करना चाहता है। चूंकि वह सुराग लेकर आया है और उसका इरादा दुष्‍चक्र की जड़ तक पहुंचना है,इसलिए उसे अनुमति मिल जाती है।
रॉ की अधिकारी केके(सोनाक्षी सिन्‍हा) के नेतृत्‍व में सुराग के मुताबिक वह बुदापेस्‍ट के लिए रवाना होता है। फिल्‍म की कहानी चीन के शांगहाए शहर से शुरू होती है। फिर क्‍वांगचओ शहर भी दिखता है। पेइचिंग का जिक्र आता है। हाल-फिलहाल में किसी फिल्‍म में पहली बार इतने विस्‍तार से चीन का रेफरेंस आया है। बदलाव के लिए चीन की झलकी अच्‍छी लगती है। फिल्‍म में बताया जाता है कि चीन में भारत के 20 रॉ ऑफिसर काम में लगे हुए हैं। उनमें से तीन की हत्‍या हो चुकी है। तीसरी हत्‍या हरीश की होती है,जो संयोग से हषवर्द्धन का दोस्‍त है। यहां से फोर्स 2 की कहानी आरंभ होती है।
यशवर्द्धन और केके सुराग के मुताबिक इंफार्मर की तलाश में बुदापेस्‍ट पहुंचते हैं। उन्‍हें पता चल चुका है कि भारतीय दूतावास का कोई भारतीय अधिकारी ही रॉ ऑफिसर के नाम चीनी एजेंटों को बता रहा है। रॉ डिपार्टमेंट और पुलिस डिपार्टमेंट में कौन चुस्‍त और स्‍मार्ट होने की चुहल यशवर्द्धन और केके के बीच होती है। हम देखते हैं कि सूझबूझ और पहल में यशवर्द्धन आगे है,लेकिन केके भी कम नहीं है। चुस्‍ती-फुर्ती में में वह यश के बराबर ही है। दोनों पहले एक-दूसरे से खिंचे रहते हैं। काम करने के दौरान उनकी दोस्‍ती बढ़ती है। वे एक-दूसरे का सम्‍मान करने लगते हैं। अच्‍छा है कि लेखक-निर्देशक ने उनके बीच प्रेम नहीं कराया है। प्रेम नहीं हुआ तो उनके रोमांटिक गाने भी नहीं हैं। फिल्‍म बहुत ही सलीके से मुख्‍य कहानी पर टिकी रहती है। फिर भी एक बेतुका आयटम सौंग आ ही गया है। उसकी कोई जरूरत नहीं थी। हंगरी में हिंदी गाने गाती लड़की फिल्‍म में फिट नहीं बैठती।
लेखक-निर्देशक की तारीफ करनी होगी कि उन्‍होंने फोर्स 2 को विषय से भटकने नहीं दिया है। फिल्‍म में गति है। पर्याप्‍त एक्‍शन है। जॉन अब्राहम एक्‍शन दृश्‍यों में यों भी अच्‍छे और विश्‍वसनीय लगते हैं। फिल्‍म में उनके किरदार को इस तरह गढ़ा गया है वे अपनी खूबियों के साथ फिल्‍म में दिखें। उनकी कमियों को उभरने का मौका नहीं मिला। एक-दो नाटकीय दृश्‍यों में जॉन अब्राहम संघर्ष करते दिखते हैं। उनके चेहरे पर नाटकीय भाव नहीं आ पाते। इस फिल्‍म में उन्‍होंने आम दर्शकों का लुभाने के लिए कुछ प्रसंगों में मुंबइया अंदाज पकड़ा है। उन्‍हें खेलने के लिए दो-तीन दृश्‍य भी मिले हैं। इन दृश्‍यों में वे भाएंगे। सोनाक्षी सिन्‍हा ने जॉन का गतिपूर्ण साथ निभाया है। वह भी रॉ अधिकारी की भूमिका में सक्षम दिखती हैं। एक्‍शन दृश्‍यों में कूद-फांद और दौड़ लगाने में उनकी सांस नहीं फूली है। इस फिल्‍म में कहीं भी केके के किरदार को अबला नहीं दिखाया गया है। यह एक चेंज है।
फिल्‍म में खलनायक शिव शर्मा की भूमिका निभा रहे ताहिर राज भसीन उम्‍दा अभिनेता हैं। वे अपने किरदार को ओवर द ऑप नहीं ले जाते,फिर भी किरदार के खल स्‍वभाव को अच्‍छी तरह व्‍यक्‍त करते हैं। हम ने उन्‍हें मर्दानी में देखा था। इस फिल्‍म में वे और भी सधे अंदाज में हैं। छोटी भूमिका में नरेन्‍द्र झा और आदिल हुसैन अपनी जिम्‍मेदारियां अच्‍छी तरह निभते हैं।
फोर्स 2 रॉ ऑफिसर की जिंदगी के अहम मुद्दे पर बनी फिल्‍म है। किसी भी देश के जासूस जब पकड़े जाते हैं तो उनकी सरकारें  उनकी पहचान से साफ इंकार कर देती हैं। मृत्‍यु के बाद उन्‍हें सम्‍मान तो दूर कई बार उनके परिवारों का अपमान और लांछनों के बीच जीना पड़ता है। इस फिल्‍म का कथित खलनायक ऐसे ही एक रॉ ऑफिसर का बेटा है। कैबिनेट सेक्रेटरी ने उसके पिता की पहचान से इंकार किया था। 23 सालों की उनकी सेवा कहीं रजिस्‍टर नहीं हो सकी थी। वही कैबिनेट सेक्रेटरी अब एचआरडी मिनिस्‍टर है। उसकी हत्‍या करने की मंशा से ही शिव शर्मा यह सब कर रहा है। कुछ वैसा ही दुख यशवर्द्धन का भी है। उसके दोस्‍त हरीश की भी यही गति होती है। फिल्‍म के अंत में यशवर्द्धन के प्रयास और मांग से सभी रॉ ऑफिसर को बाइज्‍जत याद किया जाता है। यह एक बड़ा मुद्दा है। इसमें किसी अधिकारी या व्‍यक्ति से अधिक सिस्‍टम का दोष है,जो अपने ही अधिकारियों और जासूसों को पहचानने से इंकार कर देता है।
भाषा की अशुद्धियां खटकती हैं। भारतीय टीवी एचआरडी मिनिस्‍टर का नाम गलत हिज्‍जे के साथ ब्रीजेश वर्मा लिखता है। हंगरी के अधिकारी सही नाम ब्रजेश वर्मा बोलते हैं। यही मिनिस्‍टर अपने भाषण में हंगेरियन-इंडो बोलते हैं,जबकि यह इंडो-हंगेरियन होना चाहिए था। चीनी शहरों और व्‍यक्तियों के नामों के उच्‍चारण और शब्‍दांकन में भी गलतियां हैं।
अवधि- 126 मिनट
साढ़े तीन स्‍टार