Search This Blog

Showing posts with label फिल्‍म समीक्षा. Show all posts
Showing posts with label फिल्‍म समीक्षा. Show all posts

Saturday, August 5, 2017

फिल्‍म समीक्षा : जब हैरी मेट सेजल



फिल्‍म रिव्‍यू
मुकम्‍मल सफर
जब हैरी मेट सेजल
-अजय ब्रह्मात्‍मज
इम्तियाज अली की फिल्‍मों का कथ्‍य इरशाद कामिल के शब्‍दों में व्‍यक्‍त होता है। उनकी हर फिल्‍म में जो अव्‍यक्‍त और अस्‍पष्‍ट है,उसे इरशाद कामिल के गीतों में अभिव्‍यक्ति और स्‍पष्‍टता मिलती है। फिल्‍मों में सगीत और दृश्‍यों के बीच पॉपुलर स्टारों की मौजूदगी से गीत के बालों पर ध्‍यान नहीं जाता। हम दृश्‍यों और प्रसंगों में तालमेल बिठा कर किरदारों को समझने की कोशिश करते रहते हैं,जबकि इरशाद इम्तियाज के अपेक्षित भाव को शब्‍दों में रख चुके होते हैं। जब हैरी मेट सेजल के पहले गीत में ही हरिन्‍दर सिंह नेहरा उर्फ हैरी अपने बारे में कहता है ...
मैं तो लमहों में जीता
चला जा रहा हूं
मैं कहां पे जा रहा हूं
कहां हूं?
..............
...............
जब से गांव से मैं शहर हुआ
इतना कड़वा हो गया कि जहर हुआ
इधर का ही हूं ना उधर का रहा

सालों पहले पंजाब के गांवों से यूरोप पहुंचा हैरी निहायत अकेला और यादों में जीता व्‍यक्ति है। कुछ है जो उसे लौटने नहीं दे रहा और उसे लगातार खाली करता जा रहा है। उसका कोई स्‍थायी ठिकाना नहीं है। लमहों में जी रहे हैरी को वास्‍तव में खुद की और उस हमसफर की तलाश है,जो उसकी कमियों को खत्‍म कर दे। उसे मुकम्‍मल करे और उसके साथ रहे। इम्तियाल अली की अन्‍य फिल्‍मों की तरह पूर्णता की तलाश में आधे-अधूरे किरदारों का सफर जब हैरी मेट सेजल में भी जारी है। विपरीत सोच और जीवन शैली के दो व्‍यक्तियों का परस्‍पर विकर्षण ही सोहबत से आकर्षण में बदलता है। वे एक-दूसरे के पूरक बनते हैं। इम्तियाज अली ने इस बार उन्‍हें पंजाब का हैरी और मुंबई की सेजल का नाम दिया है। उनके सफर के लिए यूरोप के छह देश चुने हैं। सुंदर वादियों में वादों-विवादों के साथ वे निकट आते हैं। एक-दूसरे को महसूस करते हैं। और फिर साथ होने का यत्‍न करते हैं।
भाव और कथ्‍य के स्‍तर पर किरदारों का यह सफर हमें विचलित करता है। अपनी हरकतों और रवैयों से वे रोचक भी लगते हैं। दोनों का झुकाव अनायास नहीं है। परिस्थितियों ऐसी बनती हैं कि वे करीब आते हैं। यों सेजल की पहल और आक्रामकता बनावटी लगती है। वह अपनी कोशिशों से हैरी को जताना चाहती है कि वह उसकी दूसरी चहेती लड़कियों की तरह हॉट और आकर्षक है। वह सफल भी होती है। इसके बावजूद हैरी की नजर में वह कुछ अलग और गैरमामूली है,क्‍योंकि वह उसे समझने लगी है। उसके छिपाए जख्‍मों को उसने देख लिया है। जब हैरी मेट सेजल संयेग से हमसफर बने दो किरदारों की सेल्‍फ डिस्‍कवरी है। इस डिस्‍कवरी में वे खुद बदलते हैं और दूसरे के बदलाव का कारण बनते हैं।
इम्तियाल अली की खूबी है कि वे अपनी कथा और किरदारों के लिए नयनाभिरामी लोकेशन चुनते हैं। इस फिल्‍म में तो हम हैरी और सेजल के साथ छह देशों की यात्रा करते हैं। वहां की गलियों ,कैफे और पब से परिचित होते हैं। उन देशों और शहरों के बारे में हमें कुछ और जानकारियां भी मिलती है। इम्तियाज अली गयाशुद्दीन उर्फ गैस के बहाने थोड़ी देर के लिए अपनी कहानी से अलग होते हैं। फिल्‍म का यह गैरजरूरी हिस्‍सा लगता है। बहरहाल,कहानी फिर से हैरी और सेजल को लकर आगे बढ़ती है।
शाह रूख खान पंजाब के हैरी और अनुष्‍का शर्मा मुंबई की सेजल हैं। पंजाब की पृष्‍ठभूमि के हैरी जैसे अनेक किरदार हम ने हिंदी फिल्‍मों में देखे हैं। की है। मुंबई की गुजराती लड़की सेजल बनाने के लिए अनुष्‍का शर्मा को गुजराती लहजा दिया गया है। कुछ शब्‍दों के उच्‍चारण और लहजे में वह सचेत रहती हैं। और कभी भूल भी जाती हैं। अगर सेजल सहज हिंदी बोलती तो क्‍या उसमें कोई कमी रह जाती? नहीं,बल्कि अनुष्‍का शर्मा अपने किरदार के प्रति अतिरिक्‍त सावधान नहीं रहतीं। अधिक स्‍वाभाविक लगतीं। शाह रूख खान और अनुष्‍का शर्मा के बीच की केमिस्‍ट्री वर्क करती है। दोनों अच्‍छे लगे हैं। उन्‍हें कुछ दृश्‍य भी मिले हैं,जहां नाच-गाने और रेगुलर एक्टिविटी से ऊपर उठ कर अभिनय कौशल दिखाने का मौका मिला है। उन दृश्‍यों में दोनों ने कमाल की दक्षता जाहिर की है। दिक्‍कत यही है कि वे दृश्‍य टांके हुए लगते हैं। अगर पूरी फिल्‍म में उनके लिए ऐसे अवसर होते तो यह फिल्‍म ज्‍यादा प्रभावित करती। और हां,हैरी अगर सफर में ही रहता तो अधिक वास्‍तविक लगता।
फिल्‍म में गीत-संगीत की पर जोर है। इरशाद कामिल और प्रीतम ने निर्देशक की मांग पूरी की है। इरशाद कामिल और इम्तियाज अली की जोड़ी बेहतर गीतों पर ध्‍यान देती है। कुछ गीत अनावश्‍यक लगे हैं।
अवधि 144 मिनट
*** तीन स्‍टार    

Thursday, August 3, 2017

फिल्‍म समीक्षा : गुड़गांव



फिल्‍म रिव्‍यू
सटीक परिवेश और परफारमेंस
गुड़गांव
-अजय ब्रह्मात्‍मज

हिंदी फिल्‍में संवादों पर इतनी ज्‍यादा निर्भर हो चुकी हैं और उनकी दर्शकों को ऐसी आदत पड़ गई है कि किसी फिल्‍म में निर्देशक भाव,संकेत और मुद्राओं से काम ले रहा हो तो उनकी बेचैनी बढ़ने लगती है। दर्श्‍क के तौर पर हमें चता नहीं चलता कि फिल्‍म हमें क्‍यो अच्‍छी नहीं लग रही है। दरअसल,हर फिल्‍म ध्‍यान खींचती है। एकाग्रता चाहिए। दर्शक्‍ और समीक्षक इस एकाग्रता के लिए तैयार नहीं हैं। उन्‍हें अपने मोबाइल पर नजर रखनी है या साथ आए दर्शक के साथ बातें भी करनी हैं। आम हिंदी फिल्‍मों में संवाद आप की अनावश्‍यक जरूरतों की भरपाई कर देते हैं। संवादों से समझ में आ रहा होता है कि फिल्‍म में क्‍या ड्रामा चल रहा है ? माफ करें, गुड़गांव देखते समय आप को फोन बंद रखना होगा और पर्देपर चल रही गतिविधियों पर ध्‍यान देना होगा। नीम रोशनी में इस फिल्‍म के किरदारों की भाव-भंगिमाओं पर गौर नहीं किया तो यकीनन फिल्‍म पल्‍ले नहीं पड़ेगी।
शंकर रमन की गुड़गांव उत्‍कृष्‍ट फिल्‍म है। दिल्‍ली महानगर की कछार पर बसा गांव गुड़गांव जब शहर में तब्‍दील हो रहा था तो वहां के बाशिंदों के जीवन में भारी उथल-पुथल चल रही थीं। उनमें से कुछ बाशिंदों को शंकर रमन ने अपनी फिल्‍म में किरदार के रूप में लिया। पूरे परिवेश के बजाए यह फिल्‍म एक परिवार में सिमटी रहती है। उस परिवार के सदस्‍यों के आपसी संबंधों को लेकर बुनी यह फिल्‍म तत्‍कालीन परिवेश का कच्‍चा चिट्ठा बेरहमी से पेश करती है। सारे पुरुष किरदार ग्रे और निगेटिव हैं। वे किसी न किसी छल-प्रपंच में लिप्‍त हैं। ऐसा लगता है कि फिल्‍म की महिला किरदार उन्‍हें मूक भाव से देख रही हैं। फिर भी वे गवाह हैं। हम पाते हैं कि मौका मिलने पर वे निर्णायक कदम उठाती हैं। यह फिल्‍म केहरी सिंह के परिवार के माध्‍यम से ऐसे परिवेश की सामाजिक संरचना और मूल्‍यों को पेश करती है। जर्जर मूल्‍यों के बीच सूख रही मानवीय संवेदनाओं के बीच उम्‍मीद हैं प्रीत और केहरी सिंह की बीवी।
केहरी सिंह परिवेश की करवट में पिस गया है। वह पश्‍चाताप में जी रहा है। स्‍पष्‍ट है कि उसे अपनी भूलों का एहसास है। वह उसकी भरपाई भी करना चाह रहा है,लेकिन पुरानी ऐंठन उसे सहज नहीं होन दे रही है। नशे में रहना उसकी आदत नहीं,पलायन है। वह बदल रही स्थितियों के सामने विवश है। कहीं न कहीं वह नालायक बेटे के आगे लाचार भी हो चुका है। केहरी सिंह की इस चुनौतीपूर्ण भूमिका में पंकज त्रिपाठी को देखना सिनेमाई अनुभव है। उन्‍होंने किरदार की लैंग्‍वेज के साथ उसकी बॉडी लैंग्‍वेज को भी आत्‍मसात किया है। उन्‍हें बाकी किरदारों से भी कम संवाद मिले हैं। फिर भी वे केहरी सिंह की मनोदशा को असरदार तरीके से पेश करते हें। उनके बेटे निकी सिंह के रोल में अक्षय ओबेराय ने सबूत दिया है कि सधे निर्देशक के साथ वे किरदार में ढल सकते हैं। उन्‍होंने पूरी फिल्‍म निकी सिंह के अंदाज को बनाए रखा है। छोटी सी भूमिका में रागिनी खन्‍ना याद रह जाती हैं। यों लगता है कि इस किरदार को और भी दृश्‍य मिलने चाहिए थे। मां की खास भूमिका में शालिनी वत्‍स प्रभावशाली हैं।
शंकर रमन की गुड़गांव तकनीक और क्राफ्ट के स्‍तर पर प्रभावित करती है। फिल्‍म का छायांकन उल्‍लेखनीय है।  कह सकते हैं फिल्‍म की थीम को डिफाइन और एक्‍सप्‍लेन करने में छायांकन की बड़ी भूमिका है।
अवधि 107 मिनट
साढ़े तीन स्‍टार

Friday, April 14, 2017

फिल्‍म समीक्षा : बेगम जान



फिल्‍म रिव्‍यू
बेगम जान
अहम मुद्दे पर बहकी फिल्‍म
-अजय ब्रह्मात्‍मज

फिल्‍म की शुरूआत 2016 की दिलली से होती है और फिल्‍म की समाप्ति भी उसी दृश्‍य से होती है। लगभग 70 सालों में बहुत कुछ बदलने के बाद भी कुछ-कुछ जस का तस है। खास कर और तों की स्थिति...फिल्‍म में बार-बार बेगम जान औरतों की बात ले आती है। आजादी के बाद भी उनके लिए कुछ नहीं बदलेगा। यही होता भी है।
बाल विधवा हुई बेगम जान पहले रंडी बनती है और फिर तवायफ और अंत में पंजाब के एक राजा साहब की शह और सहाता से कोठा खड़ी करती है,जहां देश भर से आई लड़कियों को शरण मिलती है। दो बस्तियों के बीच बसा यह कोठा हमेशा गुलजार रहता है। इस कोठे में बेगम जान की हुकूमत चलती है। दुनिया से बिफरी बेगम जान हमेशा नाराज सी दिखती हैं। उनकी बातचीत में हमेशा सीख और सलाह रहती है। जीवन के कड़े व कड़वे अनुभवों का सार शब्‍दों और संवादों में जाहिर होता रहता है। कोइे की लड़कियों की भलाई और सुरक्षा के लिए परेशान बेगम जान सख्‍त और अनुशासित मुखिया है।
आजादी मिलने के साथ सर सिरिल रेडक्लिफ की जल्‍दबाजी में खींची लकीर से पूर्व और पश्चिम में देश की विभाजन रेखा खिंच जाती है। नक्‍शे पर रेखा खींचते समय रेडक्लिफ का एहसास भी नहीं रहता कि वे अहम मुद्ददे पर कैसी अहमक भूल कर रहे हैं। उन्‍होंने तो रेखा खींच दी और चुपके से ब्रिटेन लौट गए,लेकिन पंाब और बंगाल में विभाजन की विभीषिका में लाखें बेघर हुए और लाखों को जान-माल की हानि हुई। इसी में बेगम जान का कोठा भी तबाह हुआ और कोठे की लड़कियों को आधुनिक पद्मसवती बनी बेगम जान के साथ जौहर करना पड़ा।
लेखक-निर्देशक श्रीजित मुखर्जी ने फिल्‍म के मुद्दे को सही संदर्भ और परिवेश में उठाया,लेकिन बेगम जान की कहते-कहते वे कहीं भटक गए। उन्‍हें नाहक जौहर का रास्‍ता अपनाना पड़ा और पृष्‍ठभूमि में त्रवो सुबह कभी तो आएगी गीत बजाना पड़ा। अपने उपसंहार में यह फिल्‍म दुविधा की शिकार होती है। अहम मुद्दे पर अहमकाना तो नहीं,लेकिन बहकी हुई फिल्‍म हमें मिलती है।
बेगम जान का किरदार एकआयामी और बड़बोला है। वह निजी आवेश में स्थितियों से टकरा जाती है। उसे राज साहब से भी मदद नहीं मिल पाती। लोकतंत्र आने के बाद राजा साहब की रियासत और सियासत में दखल पहले जैसी नहीं रह गई है। रेडक्लिफ लाइन को बेगम जान के इलाके में लागू करवाने के लिए तैनात श्रीवास्‍तव और इलियास कंफ्यूज और भवुक इंसान हैं,लेकिन वे बेरहमी से काम लेते हैं। बाद में उनका पछतावा पलले नहीं पड़ता। इतने ही संवेदनशील थे तो उन्‍हें कबीर की मदद लेने की जरूरत क्‍यों पड़ी? और कबीर का किरदार...माफ करें भट्ट साहब और श्रीजित कबीर समन्‍य और समरसता के प्रतीक हैं। उनके नाम के किरदार से ऐसी अश्‍लील और जलील हरकत क्‍यों? इसे सिनैमैटिक लिबर्टी नहीं कहा जा सकता।
बहरहाल, विद्या बालन ने बेगम जान के किरदार को तन-मन दिया है। उन्‍होंने उसके रुआब और शबाब को संजीदगी से पर्दे पर उतारा है। उनकी संवाद अदायगी और गुस्‍सैल अदाकारी बेहतरी है। उनका किरदार दमदार है,लेकिन अंतिम फैसले में वह आदर्श के बावजूद कमजोर पड़ जाती है। यह विद्या की नहीं,लेखक-निर्देशक की कमजोरी है। सहयोगी किरदारों की छोटी भूमिकाओं में अभिनेत्रियों(दर्जन भर)े ने बेहतर काम किया है। मास्‍टरजी और सुजीत बने अभिनेताओं विवेक मुश्रान और पितोबोस का काम यादगार है।
फिल्‍म में चित्रित होली रंगीन और आह्लादपूर्ण हैं। रंगों की ऐसी छटा इन दिनों विरले ही दिखती है। फिल्‍म भावुकता और संवादों से ओतप्रोत है,जो संयुक्‍त रूप आलोडि़त तो करती है,लेकिन कहीं पहुंचाती नहीं है।
अवधि- 134 मिनट
*** तीन स्‍टार

Saturday, January 14, 2017

फिल्‍म समीक्षा : ओके जानू

फिल्‍म रिव्‍यू
ओके जानू
-अजय ब्रह्मात्‍मज
शाद अली तमिल के मशहूर निर्देशक मणि रत्‍नम के सहायक और शागिर्द हैं। इन दिनों उस्‍ताद और शाग्रिर्द की ऐसी जोड़ी कमू दिखाई देती है। शाइ अली अपने उस्‍ताद की फिल्‍मों और शैली से अभिभूत रहते हैं। उन्‍होंने निर्देशन की शुरूआत मणि रत्‍नम की ही तमिल फिल्‍म के रीमेक साथिया से की थी। साथिया में गुलजार का भी यागदान था। इस बार फिर से शाद अली ने अपने उस्‍ताद की फिल्‍म ओके कनमणि को हिंदी में ओके जानू शीर्षक से पेश किया है। इस बार भी गुलजार साथ हैं।
मूल फिल्‍म देख चुके समीक्षकों की राय में शाद अली ने कुछ भी अपनी तरफ से नहीं जोड़ा है। उन्‍होंने मणि रत्‍नम की दृश्‍य संरचना का अनुपालन किया है। हिंदी रीमेक में कलाकार अलग हैं,लोकेशन में थोड़ी भिन्‍नता है,लेकिन सिचुएशन और इमोशन वही हैं। यों समझें कि एक ही नाटक का मंचन अलग स्‍टेज और सुविधाओं के साथ अलग कलाकारों ने किया है। कलाकरों की अपनी क्षमता से दृश्‍य कमजोर और प्रभावशाली हुए हैं। कई बार सधे निर्देशक साधारण कलाकारों से भी बेहतर अभिनय निकाल लेते हैं। उनकी स्क्रिप्‍ट कलाकारों को गा्रे करने का मौका देती है। ओके जानू में ऐसा ही हुआ है। समान एक्‍सप्रेशन से ग्रस्‍त आदित्‍य राय कपूर पहली बार कुछ खुलते और निखरते नजर आए हैं। हां,श्रद्धा कपूर में उल्‍लेखनीय ग्रोथ है। वह तारा की गुत्थियों और दुविधाओं को अच्‍छी तरह व्‍यक्‍त करती है। चेहरा फोकस में हो तो उतरते,बदलते और चढ़ते हर भाव को कैमरा कैद करता है। कलाकार की तीव्रता और प्रवीणता पकड़ में आ जाती है। श्रद्धा कपूर ऐसे क्‍लोज अप दृश्‍यों में संवाद और भावों को अच्‍दी तरह व्‍यक्‍त करती हैं। युवा कलाकारों को संवाद अदायगी पर काम करने की जरूरत है। इसी फिल्‍म में गोपी का किरदार निभा रहे नसीरूद्दीन शाह मामूली और रुटीन दृश्‍यों में भी बगैर मेलोड्रामा के दर्द पैदा करने में सफल रहे हैं। यह उनकी आवाज और संवाद अदायगी का असर है। यहां तक कि लीला सैमसन अपने किरदार को भी ऐसे ही गुणों से प्रभावशाली बनाती हैं।
फिलम की कहानी आज के युवा किरदारों के आग्रह और भ्रम पर केंद्रित है। तारा और आदि आज के युवा ब्रिगेड के प्रतिनिधि हैं। दोनों महात्‍वाकांक्षी हैं और जीवन में समृद्धि चाहते हैं। तारा आर्किटेक्‍अ की आगे की पढ़ाई के लिए पेरिस जाना चाहती है। आदि का ध्‍येय वीडियो गेम रचने में लगता है। वह अमेरिका को आजमाना चाहता है। आदि उसी क्रम में मुंबई आता है। वह ट्रेन से आया है। दोनों उत्‍तर भारतीय हैं। तारा समृद्ध परिवार की लड़की है। आदि मिडिल क्‍लस का है। फिल्‍म में यह गौरतलब है कि आदि को वहडयो गेम का सपना आता है तो निर्देश और सड़कों के दोनों किनारों की दुकानों के साइन बोर्ड हिंदी में लिखे हैं,लेकिन जब वह वीडियो गेम बनाता है तो सब कुछ अंग्रेजी में हो जाता है। शाद अली ने बारीकी से उत्‍तर भारतीय के भाषायी अवरोध और प्रगति को दिखाया है। बहरहाल, इस फिल्‍म में भी दूसरी हिंदी फिल्‍मों की तरह पहली नजर में ही लड़की लड़के को आकर्षित करती है और फिर प्रेम हो जाता है।
ओके जानू प्रेम और करिअर के दोराहे पर खड़ी युवा पीढ़ी के असमंजस बयान करती है। साहचर्य और प्‍यार के बावजूद शादी करने के बजाय लिव इन रिलेशन में रहने के फैसले में कहीं न कहीं कमिटमेंट और शादी की झंझटों की दिक्‍कत के साथ ही कानूनी दांवपेंच से बचने की कामना रहती है। हम लिव इन रिलेशन में रहने और अलग हो गए विख्यात प्रेमियों को देख रहे हैं। उनकी जिंदगी में तलाक की तकलीफ और देनदारी नहीं है। खास कर लड़के ऐसे दबाव से मुक्‍त रहते हैं। आदि और तारा दोनों ही स्‍पष्‍ट हैं कि वे अपने ध्‍येय में संबंध को आड़े नहीं आने देंगे। ऐसा हो नहीं पाता। साथ रहते-रहते उन्‍हें एहसास ही नहीं रहता कि वे कब एक-दूसरे के प्रति कमिटेड हो जाते हैं। उनके सामने गोपी और चारू का साक्ष्‍य भी है। उन दोनों की परस्‍पर निर्भरता और प्रेम आदि और तारा के लिए प्रेरक का काम करते हैं।
अपनी प्रगतिशीलता के बावजूद हम अपनी रूढि़यों से बच नहीं पाते। इसी फिल्‍म में गोपी तारा से पूछते हैं कि वह करिअर और प्‍यार में किसे चुनेगी? यही सवाल आदि से भी तो पूछा जा सकता है। दरअसल, हम लड्कियों के लिए प्‍यार और करिअर की दुविधा खड़ी करते हैं। ओके जानू ऐसे कई प्रसंगों की वजह से सोच और अप्रोच में आधुनिक होने के बावजूद रूढि़यों का पालन करती है।
अवधि- 135 मिनट
तीन स्‍टार 

Friday, November 25, 2016

फिल्‍म समीक्षा : डियर जिंदगी



फिल्‍म समीक्षा
डियर जिंदगी
-अजय ब्रह्मात्‍मज

हम सभी की जिंदगी जितनी आसान दिखती है,उतनी होती नहीं है। हम सभी की उलझनें हैं,ग्रंथियां हैं,दिक्कतें हैं...हम सभी पूरी जिंदगी उन्‍हें सुलझाते रहते हैं। खुश रहने की कोशिश करते हैं। अनसुलझी गुत्थियों से एडजस्‍ट कर लेते हैं। बाहर से सब कुछ शांत,सुचारू और स्थिर लगता है,लेकिन अंदर ही अंदर खदबदाहट जारी रहती है। किसी नाजुक क्षण में सच का एहसास होता है तो बची जिंदगी खुशगवार हो जाती है। गौरी शिंदे की डियर जिंदगी क्‍यारा उर्फ कोको की जिंदगी में झांकती है। क्‍यारा अकेली ऐसी लड़की नहीं है। अगर हम अपने आसपास देखें तो अनेक लड़कियां मिलेंगी। वे सभी जूझ रही हैं। अगर समय पर उनकी भी जिंदगी में जहांगीर खान जैसा दिमाग का डाक्‍टर आ जाए तो शेष जिंदगी सुधर जाए।
हिंदी फिल्‍मों की नायिकाएं अब काम करने लगी हैं। उनका एक प्रोफेशन होता है। क्‍यारा उभरती सिनेमैटोग्राफर है। वह स्‍वतंत्र रूप से फीचर फिल्‍म शूट करना चाहती है। उसे रघुवेंद्र से आश्‍वासन मिलता है। संयोग कुछ ऐसा बनता है कि वह स्‍वयं ही मुकर जाती है। मानसिक दुविधा में वह अनिच्‍छा के साथ अपने मां-बाप के पास गोवा लौटती है। गोवा में उसकी मुलाकात दिमाग के डाक्‍टर जहांगीर खान से होती है। अपनी अनिद्रा के इलाज के लिए वह मिलती है तो बातचीत और सेशन के क्रम में उसके जीवन की गुत्थियों की जानकारी मिलती है। जहांगीर खान गुत्थियों की गांठों को ढीली कर देता है। उन्‍हें वह खुद ही खोलती है।
गुत्थियों को खोलने के क्रम में वह जब मां-बाप और उनके करीबी दोस्‍तों के बीच गांठ पर उंगली रखती है तो सभी चौंक पड़ते हैं। हमें क्‍यारा की जिंदगी के कंफ्यूजन और जटिलताओं की वजह मालूम होती है और गौरी शिंदे धीरे से पैरेंटिंग के मुद्दे को ले आती हैं। करिअर और कामयाबी के दबाव में मां-बाप अपने बच्‍चों के साथ ज्‍यादतियां करते रहते हैं। उन्‍हें पता ही नहीं चलता और वे उन्‍हें किसी और दिशा में मोड़ देते हैं। उनके कंधों पर हमेशा अपनी अपेक्षाओं का बोझ डाल देते हैं। बच्‍चे निखर नहीं पाते। वे घुटते रहते हैं। अपनी जिंदगी में अधूरे रहते हैं। कई बार वे खुद भी नहीं समझ पाते कि कहां चूक हो गई और उनके हाथों से क्‍या-क्‍या फिसल गया? डियर जिंदगी पैरेंटिंग की भूलों के प्रति सावधान करती है।
क्‍यारा की निजी(इस पीढ़ी की प्रतिनिधि) समस्‍या तक पहुंचने के लिए गौरी शिंदे लंबा रास्‍ता चुनती हैं। फिल्‍म यहां थोड़ी बिखरी और धीमी लगती है। हम क्‍यारा के साथ ही उसके बदलते दोस्‍तों सिड,रघुवेंद्र और रुमी से भी परिचित होते हैं। उसकी दो सहेलियां भी मिलती हैं। क्‍यारा को जिस परफेक्‍ट की तलाश है,वह उसे नहीं मिल पा रहा है। इसके पहले कि उसके दोस्‍त उसे छोड़ें,वह खुद को समेट लेती है,काट लेती है। भावनात्‍मक संबल और प्रेम की तलाश में भटकती क्‍यारा को जानकारी नहीं है कि अधूरापन उसके अंदर है। दिमाग के डाक्‍टर से मिलने के बाद यह स्‍पष्‍ट होता है। जिंदगी की छोटी तकलीफों,ग्रंथियों और भूलों को पाले रखने के बजाए उन्‍हें छोड़ देने में ही सुख है।
गोवा की पृष्‍ठभूमि में डियर जिंदगी के किरदार विश्‍वसनीय और असली लगते हैं। चमक-दमक और सजावटी जिंदगी और परिवेश में लिप्‍त फिल्‍मकारों को इस फिल्‍म सीख लेनी चाहिए। बहरहाल, गौरी शिंदे ने अपने तकनीकी सहयोगियों की मदद से फिल्‍म का कैनवास सरल और वास्‍तविक रखा है। उन्‍होंने कलाकारों के चुनाव में किरदारों के मिजाज का खयाल रखा है। क्‍यारा के परिवार के सभी सदस्‍य किसी आम मध्‍यवर्गीय परिवार के सदस्‍य लगते हैं। उनकी बातें और चिंताएं भी मध्‍यवर्गीय सीमाओं में हैं। गौरी बारीकी से घर-परिवार और समाज की धारणाओं और मान्‍यताओं को रेखांकित करती जराती है। वह रुकती नहीं हैं। वह मूल कथा तक पहुंचती हैं।
शाह रुख खान अपनी प्रचलित छवि से अलग साधारण किरदार में सहज हैं। उनका चार्म बरकरार है। वह अपने अंदाज और किरदार के मिजाज से आकर्षक लगते हैं। ऐसे किरदार लोकप्रिय अभिनेताओं को अभिनय का अवसर देते हैं। शाह रुख खान इस अवसर का लाभ उठाते हैं। आलिया भट्ट अपनी पीढ़ी की समर्थ अभिनेत्री के तौर पर उभर रही हैं। उन्‍हें एक और मौका मिला है। क्‍यारा के अवसाद,द्वंद्व और महात्‍वाकांक्षा को उन्‍होंने दृश्‍यों के मुताबिक असरदार तरीके से पेश किया है। लंबे संवाद बोलते समय उच्‍चारण की अस्‍पष्‍टता से वह एक-दो संवादों में लटपटा गई हैं। नाटकीय और इमोशनल दृश्‍यों में बदसूरत दिखने से उन्‍हें डर नहीं लगता। सहयोगी भूमिकाओं में इरा दूबे,यशस्विनी दायमा,कुणाल कपूप,अंगद बेदी और क्‍यारा के मां-पिता और भाई बने कलाकारों ने बढि़या योगदान किया है।
अवधि- 149 मिनट
साढ़े तीन स्‍टार

फिल्‍म समीक्षा : मोह माया मनी



फिल्‍म समीक्षा
महानगरीय माया
मोह माया मनी
-अजय ब्रह्मात्‍मज
मुनीष भारद्वाज ने महानगरीय समाज के एक युवा दंपति अमन और दिव्‍या को केंद्र में रख कर पारिवारिक और सामाजिक विसंगतियों को जाहिर किया है। अमन और दिव्‍या दिल्‍ली में रहते हैं। दिव्‍या के पास चैनल की अच्‍छी नौकरी है। वह जिम्‍मेदार पद पर है। अमन रियल एस्‍टेट एजेंट है। वह कमीशन और उलटफेर के धंधे में लिप्‍त है। उसे जल्‍दी से जल्‍दी अमीर होना है। दोनों अपनी जिंदगियों में व्‍यस्‍त है। शादी के बाद उनके पास एक-दूसरे के लिए समय नहीं है। समय के साथ मुश्किलें और जटिलताएं बढ़ती हैं। अमन दुष्‍चक्र में फंसता है और अपने अपराध में दिव्‍या को भी शामिल कर लेता है। देखें तो दोनों साथ रहने के बावजूद एक-दूसरे से अनभिज्ञ होते जा रहे हैं। महानगरीय परिवारों में ऐसे संबंध दिखाई पड़ने लगे हैं। कई बार वे शादी के कुछ सालों में ही तलाक में बदल जाते हैं या फिर विद्रूप तरीके से किसी कारण या स्‍वार्थ की वजह से चलते रहते हैं।
मुनीष भारद्वाज ने वर्तमान उपभोक्‍ता समाज के दो महात्‍वाकांक्षी व्‍य‍क्तियों की एक सामान्‍य कहानी ली है। उन्‍होंने नए प्रसंग और परिस्थिति में इस कहानी को रचा है। अतिरिक्‍म और अधिक की लालसा में अनेक व्‍यक्ति और परिवार बिखर रहे हैं। अगर समृद्धि और विकास के प्रयास में ईमानदारी नहीं है तो उसके दुष्‍प्रभाव जाहिर होते हैं। मोह माया मनी संबंधों की जटिलता में उलझे,रिश्‍तों में बढ़ रही अनैतिकता के शिकार और कामयाबी की फिक्र में कमजोर हो रहे किरदारों की कहानी है।
लेखक नर्देशक मुनीष भारद्वाज और लेखन में उनकी सहयोगी मानषी निर्मजा जैन ने पटकथा में पेंच रखे हैं। उन्‍होंने उसके के हिसाब से शिल्‍प चुना है। शुरू में वह अखरता है,लेकिन बाद में वह कहानी का प्रभाव बढ़ाता है। मुनीष किसी भी दृश्‍य के बेवजह विस्‍तार में नहीं गए हैं। फिल्‍म का एक किरदार दिल्‍ली भी है। मुनीष ने दिल्‍ली शहर का प्रतीकात्‍मक इस्‍तेमाल किया है। मशहूर ठिकानों पर गए बगैर वे दिल्‍ली का माहौल ले आते हैं। सहयोगी कलाकारों के चुनाव और उनके बोलने के लहजे से दिल्‍ली की खासियत मुखर होती है।
सहयोगी कलाकारों में विदुषी मेहरा,अश्‍वत्‍थ भट्ट,देवेन्‍दर चौहान और अनंत राणा का अभिनय उल्‍लेखनीय है। रणवीर शौरी इस मिजाज के किरदार पहले भी निभा चुके हैं। इस बार थोड़ा अलग आयाम और विस्‍तार है। उन्‍होंने किरदार की निराशा और ललक को अच्‍छी तरह व्‍यक्‍त किया है। कुछ नाटकीय दृश्‍यों में उनकी सहजता प्रभावित करती है। नेहा धूपिया ने दिव्‍या के किरदार को समझा और आत्‍मसात किया है। फिल्‍म के क्‍लाइमेक्‍स में पश्‍चाताप में आधुनिक और औरत की टूटन और विवशता को अच्‍छी तरह जाहिर करती हैं।
मोह माया मनी चुस्‍त फिल्‍म है। घटनाक्रम तेजी से घटते हैं और गति बनी रहती है।
अवधि- 108 मिनट
तीन स्‍टार 

Friday, November 18, 2016

फिल्‍म समीक्षा : फोर्स 2

चुस्‍त और फास्‍ट
फोर्स 2
-अजय ब्रह्मात्‍मज
अभिनय देव की फोर्स 2 की कहानी पिछली फिल्‍म से बिल्‍कुल अलग दिशा में आगे बढ़ती है। पिछली फिल्‍म में पुलिस अधिकारी यशवर्द्धन की बीवी का देहांत हो गया था। फिल्‍म का अंत जहां हुआ था,उससे लगा था कि अगर भविष्‍य में सीक्‍वल आया तो फिर से मुंबई और पुलिस महकमे की कहानी होगी। हालांकि यशवर्द्धन अभी तक पुलिस महकमे में ही है,लेकिन अपने दोस्‍त हरीश की हत्‍या का सुराग मिलने के बाद वह देश के रॉ डिपाटमेंट के लिए काम करना चाहता है। चूंकि वह सुराग लेकर आया है और उसका इरादा दुष्‍चक्र की जड़ तक पहुंचना है,इसलिए उसे अनुमति मिल जाती है।
रॉ की अधिकारी केके(सोनाक्षी सिन्‍हा) के नेतृत्‍व में सुराग के मुताबिक वह बुदापेस्‍ट के लिए रवाना होता है। फिल्‍म की कहानी चीन के शांगहाए शहर से शुरू होती है। फिर क्‍वांगचओ शहर भी दिखता है। पेइचिंग का जिक्र आता है। हाल-फिलहाल में किसी फिल्‍म में पहली बार इतने विस्‍तार से चीन का रेफरेंस आया है। बदलाव के लिए चीन की झलकी अच्‍छी लगती है। फिल्‍म में बताया जाता है कि चीन में भारत के 20 रॉ ऑफिसर काम में लगे हुए हैं। उनमें से तीन की हत्‍या हो चुकी है। तीसरी हत्‍या हरीश की होती है,जो संयोग से हषवर्द्धन का दोस्‍त है। यहां से फोर्स 2 की कहानी आरंभ होती है।
यशवर्द्धन और केके सुराग के मुताबिक इंफार्मर की तलाश में बुदापेस्‍ट पहुंचते हैं। उन्‍हें पता चल चुका है कि भारतीय दूतावास का कोई भारतीय अधिकारी ही रॉ ऑफिसर के नाम चीनी एजेंटों को बता रहा है। रॉ डिपार्टमेंट और पुलिस डिपार्टमेंट में कौन चुस्‍त और स्‍मार्ट होने की चुहल यशवर्द्धन और केके के बीच होती है। हम देखते हैं कि सूझबूझ और पहल में यशवर्द्धन आगे है,लेकिन केके भी कम नहीं है। चुस्‍ती-फुर्ती में में वह यश के बराबर ही है। दोनों पहले एक-दूसरे से खिंचे रहते हैं। काम करने के दौरान उनकी दोस्‍ती बढ़ती है। वे एक-दूसरे का सम्‍मान करने लगते हैं। अच्‍छा है कि लेखक-निर्देशक ने उनके बीच प्रेम नहीं कराया है। प्रेम नहीं हुआ तो उनके रोमांटिक गाने भी नहीं हैं। फिल्‍म बहुत ही सलीके से मुख्‍य कहानी पर टिकी रहती है। फिर भी एक बेतुका आयटम सौंग आ ही गया है। उसकी कोई जरूरत नहीं थी। हंगरी में हिंदी गाने गाती लड़की फिल्‍म में फिट नहीं बैठती।
लेखक-निर्देशक की तारीफ करनी होगी कि उन्‍होंने फोर्स 2 को विषय से भटकने नहीं दिया है। फिल्‍म में गति है। पर्याप्‍त एक्‍शन है। जॉन अब्राहम एक्‍शन दृश्‍यों में यों भी अच्‍छे और विश्‍वसनीय लगते हैं। फिल्‍म में उनके किरदार को इस तरह गढ़ा गया है वे अपनी खूबियों के साथ फिल्‍म में दिखें। उनकी कमियों को उभरने का मौका नहीं मिला। एक-दो नाटकीय दृश्‍यों में जॉन अब्राहम संघर्ष करते दिखते हैं। उनके चेहरे पर नाटकीय भाव नहीं आ पाते। इस फिल्‍म में उन्‍होंने आम दर्शकों का लुभाने के लिए कुछ प्रसंगों में मुंबइया अंदाज पकड़ा है। उन्‍हें खेलने के लिए दो-तीन दृश्‍य भी मिले हैं। इन दृश्‍यों में वे भाएंगे। सोनाक्षी सिन्‍हा ने जॉन का गतिपूर्ण साथ निभाया है। वह भी रॉ अधिकारी की भूमिका में सक्षम दिखती हैं। एक्‍शन दृश्‍यों में कूद-फांद और दौड़ लगाने में उनकी सांस नहीं फूली है। इस फिल्‍म में कहीं भी केके के किरदार को अबला नहीं दिखाया गया है। यह एक चेंज है।
फिल्‍म में खलनायक शिव शर्मा की भूमिका निभा रहे ताहिर राज भसीन उम्‍दा अभिनेता हैं। वे अपने किरदार को ओवर द ऑप नहीं ले जाते,फिर भी किरदार के खल स्‍वभाव को अच्‍छी तरह व्‍यक्‍त करते हैं। हम ने उन्‍हें मर्दानी में देखा था। इस फिल्‍म में वे और भी सधे अंदाज में हैं। छोटी भूमिका में नरेन्‍द्र झा और आदिल हुसैन अपनी जिम्‍मेदारियां अच्‍छी तरह निभते हैं।
फोर्स 2 रॉ ऑफिसर की जिंदगी के अहम मुद्दे पर बनी फिल्‍म है। किसी भी देश के जासूस जब पकड़े जाते हैं तो उनकी सरकारें  उनकी पहचान से साफ इंकार कर देती हैं। मृत्‍यु के बाद उन्‍हें सम्‍मान तो दूर कई बार उनके परिवारों का अपमान और लांछनों के बीच जीना पड़ता है। इस फिल्‍म का कथित खलनायक ऐसे ही एक रॉ ऑफिसर का बेटा है। कैबिनेट सेक्रेटरी ने उसके पिता की पहचान से इंकार किया था। 23 सालों की उनकी सेवा कहीं रजिस्‍टर नहीं हो सकी थी। वही कैबिनेट सेक्रेटरी अब एचआरडी मिनिस्‍टर है। उसकी हत्‍या करने की मंशा से ही शिव शर्मा यह सब कर रहा है। कुछ वैसा ही दुख यशवर्द्धन का भी है। उसके दोस्‍त हरीश की भी यही गति होती है। फिल्‍म के अंत में यशवर्द्धन के प्रयास और मांग से सभी रॉ ऑफिसर को बाइज्‍जत याद किया जाता है। यह एक बड़ा मुद्दा है। इसमें किसी अधिकारी या व्‍यक्ति से अधिक सिस्‍टम का दोष है,जो अपने ही अधिकारियों और जासूसों को पहचानने से इंकार कर देता है।
भाषा की अशुद्धियां खटकती हैं। भारतीय टीवी एचआरडी मिनिस्‍टर का नाम गलत हिज्‍जे के साथ ब्रीजेश वर्मा लिखता है। हंगरी के अधिकारी सही नाम ब्रजेश वर्मा बोलते हैं। यही मिनिस्‍टर अपने भाषण में हंगेरियन-इंडो बोलते हैं,जबकि यह इंडो-हंगेरियन होना चाहिए था। चीनी शहरों और व्‍यक्तियों के नामों के उच्‍चारण और शब्‍दांकन में भी गलतियां हैं।
अवधि- 126 मिनट
साढ़े तीन स्‍टार

Friday, September 9, 2016

फिल्‍म समीक्षा : फ्रीकी अली




स्‍ट्रीट स्‍मार्ट
-अजय ब्रह्मात्‍मज
सोहेल खान की फ्रीकी अली के नायक अली और एक्‍टर नवाजुद्दीन सिद्दीकी की कहानी और चरित्र में समानता है। फिलम का नायक हुनरमंद है। वह छह गेंद पर छह छक्‍के लगा सकता है तो गोल्‍फ में भी बॉल को होल में डाल सकता है। थोड़ी सी ट्रेनिंग के बाद वह गोल्‍फ के चैंपियन के मुकाबले में खड़ा हो जाता है। एक्‍टन नवाजुद्दीन सिद्दीकी हुनरमंद हैं। वे इस फिल्‍म में बतौर हीरो अपने समकालीनों के साथ खड़े हो गए हैं। नवाज ने पहले भी फिल्‍मों में लीड रोल किए हैं,लेकिन वे फिल्‍में मेनस्‍ट्रीम मसाला फिल्‍में नहीं थीं। मेनस्‍ट्रीम की फिल्‍मों में छोटी-मोटी भूमिकाओं से उन्‍होंने पॉपुलर पहचान बना ली है। दर्शक उन्‍हें पसंद करने लगे हैं। लेखक व निर्देश सोहेल खान ने उनकी इस पॉपुलैरिटी का इस्‍तेमाल किया है। उन्‍हें लीड रोल दिया है और साथ में अपने भार्अ अरबाज खान को सपोर्टिंग रोल दिया है। फ्रीकी अली पर अलग से बात की जाए तो यह नवाजुद्दी सिद्दीकी की भी जीत की कहानी है।
स्क्रिप्‍ट की सीमाओं के बावजूद नवाज अपनी प्रतिभा से फिल्‍म को रोचक बनाते हैं। उनकी संवाद अदायगी और आकस्मिक अदा दर्शकों को भाती है। पर्दे पर उनकी आंखों की शरारत रिझाती है। संयोग से पॉपुलर फिल्‍मों में उन्‍हें स्‍ट्रीट स्‍मार्ट किरदार मिलते रहे हैं,जिनमें उनकी ये भंगिमाएं प्रभाव पैदा करती हैं। फ्रीकी अली पूरी तरह से उन पर निर्भर करती है। थोड़ी देर के लिए सीमा विश्‍वास सहयोग देती है। आरिफ बसरा किरदार की सादगी और ईमानदारी की वजह से पसंद आते हैं। बाकी कलाकार भरपाई के लिए हैं। न तो उनके किरदारों पर मेहनत की गई है और न ही उनके भाव और अंदाज पर ध्‍यान दिया गया है। अरबाज खान लंबे अनुभवों के बावजूद नवाज के साथ के दृश्‍यों में घिसटते ही नजर आते हैं। इसका असर नवाज के परफारमेंस पर भी पड़ा है। अगर उन्‍हें सहयोगी कलाकार के रूप में बराबर का जोड़ीदार मिलता तो यह फिल्‍म कुछ और ऊंचाई हासिल करती।
फ्रीकी अली गोल्‍फ की पृष्‍ठभूमि पर है। स्‍ट्रीट स्‍मार्ट लावारिस अली को हिंदू मां ने पाला है। चडढी बेचने से लकर हफ्ता चसूलने तक के छोटे-मोटे धंधों में व्‍यस्‍त अली जब संयोगवश गोल्‍फ खेलने पर आमदा होता है और अपने हुनर से सफल रहता है। ऐसी फिल्‍मों में विजनरी निर्देशक नायक के खेल में पारंगत होने और फिर अंतिम मुकाबले में उसकी कोशिशों और निश्‍चय-अनिश्‍चय के रोमांच से दर्शकों को टस से मस नहीं होने देता। सोहेल खान अली को रच नहीं पाते। सोहेल खान विजनरी डायरेक्‍टर नहीं हैं। उन्‍होंने प्रीक्‍लाइमेक्‍स भी कमजोर रखा है। चूंकि फ्रीकी अली हिंदी फिल्‍मों के स्‍ट्रक्‍चर का पालन करती है,इसलिए उसमें प्रचलित तत्‍व भी मजेदार होने चाहिए थे। क्‍लाइमेक्‍स के पहले की कव्‍वाली और अली की हिंदू मां की भगवान से गुहार शुद्ध पच्‍चीकारी है। अकेले नवाज के प्रयत्‍न और प्रतिभा से फिल्‍म संभल पाती है।
हिंदी फिल्‍मों में इन दिनों स्‍टार अौर फिल्‍मों के रेफरेंस से हंसी पैदा करने का चलन बढ़ा है। इस फिल्‍म में भी आमिर खान,सलमान खान के हवाले से कुछ संवाद रखे गए हैं। एक संवाद तो नवाज की फिल्‍म मांझी से ले ली गई है...घमंड तो हम पहाड़ का तोड़ दें। हंसी तो आती है,लेकिन किरदार फिसल जाता है। फ्रीकी अली में प्रोडक्‍शन की भी कमियां हैं। सेट और कॉस्‍टृयूम में कल्‍पना और बजट की कटौती से फिल्‍म का प्रभाव कम हुआ है।
यह फिल्‍म नवाजुद्दी सिद्दीकी के लिए देखी जा सकती है। लेखक-निर्देशक थोड़ा और यत्‍न-प्रयत्‍न करते तो यह नवाज की उल्‍लेखनीय फिल्‍म होती।
अवधि- 125 मिनट
स्‍टार- तीन स्‍टार

Friday, June 17, 2016

फिल्‍म समीक्षा : धनक

-अजय ब्रह्मात्‍मज

नागेश कुकुनूर की धनक छोटू और परी भाई-बहन की कहानी है। वे अपने चाचा-चाची के साथ रहते हैं। चाचा बीमार और निकम्‍मे हें। चाची उन्‍हें बिल्‍कुल पसंद नहीं करती। उनके जीवन में अनेक दिक्‍कतें हैं। भाई-बहन को फिल्‍मों का शौक है। उनके अपने पसंदीदा कलाकार भी है। बहन शाह रुख खान की दीवानी है तो भाई सलमान खान को पसंद करता है। अपने हिसाब से वे पसंदीदा स्‍टारों की तारीफें करते हें। और उनसे उम्‍मीदें भी पालते हैं। भाई की आंखें चली गई हैं। बहन की कोशिश है कि भाई की आंखों में रोशनी लौटे। पिता के साथ एक फिल्‍म देखने के दौरान बहन को तमाम फिल्‍मी पोस्‍टरों के बीच एक पोस्‍टर दिखता है। उस पोस्‍टर में शाह रुख खान ने नेत्रदान की अपील की है। यह पोस्‍टर ही परी का भरोसा बन जाता है।
घर की झंझटों के बीच परी और छोटू का उत्‍साह कभी कम नहीं होता। उनका आधा समय तो सलमान और शाह रुख में कौन अच्‍छा के झगड़े में ही निकल जाता है। छोटू जिंदादिल और प्रखर लड़का है। उसे किसी प्रकार की झेंप नहीं होती। हमेशा दिल की बात कह देता है। सच बता देता है।
परी और छोटू को पता चलता है कि जैसलमेर में शाह रुख खान शूटिंग के लिए आए हैं। वे अपने चाचा से शाह रुख के पास चलने के लिए कहते हैं। दब्‍बू चाचा बहाना बनाते हैं। एक दिन बगैर सोचे-समझे दोनों शाह रुख से मिलने के लिए निकल पड़ते हैं। उनके सफर में डर,एडवेंचर और रोमांच है। लेखक-निर्देशक नागेश कुकनूर ने उनके सफर के अच्‍छे-बुरे अनुभवों का ताना-बाना अच्‍छा बुना है। उनके साथ संभावित खतरें की जानकारी दर्शकों को जरूर मिलती है,लेकिन परी और छोटू अपने सफर में बेफिक्र आगे बढ़ते जाते हैं। उन्‍हें नेक व्‍यक्ति भी मिलते हैं।
फिल्‍म में आखिकर बहन परी की तमन्‍ना पूरी होती है। छोटू की आंखों की रोशनी लौट आती है। बच्‍चों को मुख्‍य किरदारों में लेकर बनी यह धनक अपने स्‍वरूप और प्रभाव में ‍चिल्‍ड्रेन फिल्‍म नहीं रह जाती। उम्‍मीद और भरोसे की भावना को मजबूत करती यह फिल्‍म दर्शकों पर जादुई असर करती है। फिल्‍म की संवेदना झकझोरती है। संवेदनशील बनाती है।
यह फिल्‍म जनमानस में बैठे फिल्‍म स्टारों के प्रभाव को पॉजीटिव तरीके से पेश करती है। हालांकि फिल्‍म में कभी भी शाह रुख या सलमान की झलक नहीं मिलती,लेकिन उनकी चर्चा उनकी मौजूदगी का अहसास कराती रहती है। दोनों की चमकदार छवि उभरती है।
धनक में दोनों बाल कलाकारों हेतल गड्डा और कृष छााबडि़या ने बेहतरीन काम किया है। उनकी बाल सुलभ प्रतिक्रियाएं फिल्‍म का प्रभाव बढ़ाती है। विपिन शर्मा लाचार चाचा के रूप में अपनी भावमुद्राओं से आकर्षित करते हैं।राजस्‍थान की पृष्‍ठभूमि का सुंर उपयोग हुआ है।
अवधि-117 मिनट
स्‍टार- साढ़े तीन स्‍टार  

फिल्‍म समीक्षा : उड़ता पंजाब

-अजय ब्रह्मात्‍मज
(हिंदी फिल्‍म के रूप में प्रमाणित हुई उड़ता पंजाब की मुख्‍य भाषा पंजाबी है। एक किरदार की भाषा भोजपुरी है। बाकी संवादों और संभाषणों में पंजाबी का असर है।)
विवादित फिल्‍मों के साथ एक समस्‍या जुड़ जाती है। आम दर्शक भी इसे देखते समय उन विवादित पहलुओं पर गौर करता है। फिल्‍म में उनके आने का इंतजार करता है। ऐसे में फिल्‍म का मर्म छूट जाता है। उड़ता पंजाब और सीबीएफसी के बीच चले विवाद में पंजाब,गालियां,ड्रग्‍स और अश्‍लीलता का इतना उल्‍लेख हुआ है कि पर्दे पर उन दृश्‍यों को देखते और सुनते समय दर्शक भी जज बन जाता है और विवादों पर अपनी राय कायम करता है। फिल्‍म के रसास्‍वादन में इससे फर्क पड़ता है। उड़ता पंजाब के साथ यह समस्‍या बनी रहेगी।
उड़ता पंजाब मुद्दों से सीधे टकराती और उन्‍हें सामयिक परिप्रेक्ष्‍य में रखती है। फिल्‍म की शुरूआत में ही पाकिस्‍तानी सीमा से किसी खिलाड़ी के हाथों से फेंका गया डिस्‍कनुमा पैकेट जब भारत में जमीन पर गिरने से पहले पर्दे पर रुकता है और उस पर फिल्‍म का टायटल उभरता है तो हम एकबारगी पंजाब पहुंच जाते हैं। फिल्‍म के टायटल में ऐसी कल्‍पनाशीलता और प्रभाव दुर्लभ है। यह फिल्‍म अभिषेक चौबे और सुदीप शर्मा के गहरे कंसर्न और लंबे रिसर्च का परिणाम है। कहना आसान है कि फिल्‍म डाक्‍यूमेंट्री का फील देती है। जब आप हिंदी फिल्‍मों की प्रचलित प्रेम कहानी से अलग जाकर सच्‍ची घटनाओं और समसामयिक तथ्‍यों को संवादों और वास्‍तविक चरित्रों को किरदारों में बदलते हैं तो इस प्रक्रिया में कई नुकीले कोने छूट जाते हें। वे चुभते हैं। और यही ऐसी फिल्‍मों की खूबसूरती होती है। हो सकता है कि पंजाब के दर्शकों का फिल्‍म देखते हुए कोई हैरानी नहीं हो,लेकिन बाकी दर्शकों के लिए यह हैरत की बात है। कैसे देश का एक इलाका नशे की गर्त में डूबता जा रहा है और हम उसे नजरअंदाज करना चाहते हैं। बेखबर रहना चाहते हैं। अगर एक फिल्‍मकार साहस करता है तो सरकारी संस्‍थाएं अड़ंगे लगाती है।
उड़ता पंजाब टॉमी सिंह(शाहिद कपूर),बिहारिन मजदूर(आलिया भट्ट,सरताज(दिलजीत दोसांझ),प्रीत सरीन(करीना कपूर खान) और अन्‍य किरदारों से गुंथी पंजाबी सरजमीन की कहानी है। उड़ता पंजाब में सरसों के लहलहाते खेत और भांगड़ा पर उछलते-कूदते और बल्‍ले-बल्‍ले करते मुंडे और कुडि़यां नहीं हैं। इस फिल्‍म में हिंदी फिल्‍मों और पॉपुलर कल्‍चर से ओझल पंजाब है। ड्रग्‍स के नशे में डूबा और जागरुक होता पंजाब है। उड़ता पंजाब पंजाब की सच्‍ची झलक पेश करती है। वह निगेटिव या पॉजीटिव से ज्‍यादा जरूरी है। फिल्‍मों का काम सिर्फ गुदगुदाना ही तो नहीं है। झिंझोरना और अहसास करना भी तो है। उड़ता पंजाब में अभिषेक चौबे कुछ सीमाओं के साथ सफल रहते हैं। निश्चित ही इसमें उन्‍हें सहयोगी लेखक सुदीप शर्मा,संगीतकार अमित त्रिवेदी,गीतकार शेली,शिवकुमार बटालवी और वरूण ग्रोवर व अन्‍य तकनीकी टीम से पूरी मदद मिली है।
शाहिद कपूर ने टॉमी सिंह की उलझनों को अच्‍छी तरह पर्दे पर उतारा है। शाहिद लगातार किरदारों का आत्‍मसात करने और उन्‍हें निभाने में अपनी हदें तोड़ रहे हैं। इस फिल्‍म में उनका किरदार परिस्थितियों में फंसा और जूझता गायक है,जो लोकप्रियता की खामखयाली में उतराने के बाद धप्‍प से खुरदुरी जमीन पर गिरता है तो उसे अपनी गलतियों का अहसास होता है। वह संभलता और अहं व अहंकार से बाहर निकल कर किसी और के लिए पसीजता है। शाहिद कपूर की मेहनत सफल रही है। किरदार की अपनी दुविधाएं हैं,जो लेखक और निर्देशक की भी हैं। बिहारिन मजदूर के रूप में आलिया भट्ट की भाषा और बॉडी लैंग्‍वेज की कमियां ईमानदार कोशिश से ढक जाती है। भोजपुरी बोलने में लहजा परफेक्‍ट नहीं है और बॉडी लैंग्‍वेज में हल्‍का सा शहरीपन है। फिर भी आलिया की इस कोशिश की तारीफ करनी होगी कि वह किरदार में ढलती हैं। दिलजीत दोसांझ पुलिस अधिकारी की भूमिका में सहज और स्‍वाभाविक हैं। उनके बॉस के रूप में आए कलाकार मानव भी ध्‍यान खींचते हैं। लंबे समय के बाद सतीश कौशिक का सदुपयोग हुआ है। इस फिल्‍म में प्रीत सरीन के किरदार पर दूसरे किरदारों की तरह ध्‍यान नहीं दिया गया है। प्रीत और सरताज की बढ़ती अनुभूतियों और नजदीकियों में भी लेखक-निर्देशक नहीं रमे हैं। यही कारण है कि जब-जब कहानी शाहिद-आलिया के ट्रैक से जब दिलजीत-करीना के ट्रैक पर शिफ्ट करती है तो थोड़ी सी फिसल जाती है।
अच्‍छी बात है कि उड़ता पंजाब में ड्रग्‍स और नशे को बढ़ावा देने वाले दृश्‍य नहीं है। डर था कि फिल्‍म में उसे रोमांटिसाइज न कर दिया गया हो। फिल्‍म के हर किरदार की व्‍यथा ड्रग्‍स के कुप्रभाव के प्रति सचेत करती है। महामारी की तरह फैल चुके नशे के कारोबार में राजनीतिज्ञों,सरकारी महकमों,पुलिस और समाज के आला नागरिकों की मिलीभगत और नासमझी को फिल्‍म बखूबी रेखांकित और उजागर करती है।
गीत-संगीत उड़ता पंजाब का खास चमकदार और उल्‍लेखनीय पहलू है। अमित त्रिवेदी ने फिल्‍म की कथाभूमि के अनुरूप संगीत संजोया है।
(फिल्‍म की मुख्‍य भाषा इसकी लोकप्रियता में अड़चन हो सकती है। मुंबई में पंजाबी के अंग्रेजी सबटायटल थे। क्‍या हिंदी प्रदेशों में हिंदी सबटायटल रहेंगे?)
अवधि- 148 मिनट
स्‍टार- चार स्‍टार

Friday, June 10, 2016

फिल्‍म समीक्षा : दो लफ्जों की कहानी




बासी और घिसी-पिटी

-अजय ब्रह्मात्‍मज
छल,प्रपंच,प्रेम,पश्‍चाताप,त्‍याग और समर्पण की दो लफ्जों की कहानी सूरज और जेनी की प्रेमकहानी है। अनाथ सूरज मलेशिया के क्‍वालालमपुर श्‍हर में बड़ा होकर स्‍टॉर्म बॉक्‍सर के तौर पर मशहूर होता है। उसके मुकाबले में कोई दूसरा अखाड़े में खड़ा नहीं हो सकता। एक मुकाबले के समय धोखे से उसे कोई हारने के लिए राजी कर लेता है। वह हार भी जाता है,लेकिन यहां से उसके करिअर और जिंदगी में तब्‍दीली आ जाती है। सच की जानकारी मिलने पर वह आक्रामक और आहत होता है। उससे कुछ गलतियां होती हैं और वह पश्‍चाताप की अग्नि में सुलगता रहता है। संयोग से उसकी जिंदगी में जेनी आती है। वह एक दुर्घटना से दृष्टि बाधित है। सूरज को वह अच्‍छी लगती है। दोनों करीब आते हैं और अपनी गृहस्‍थी शुरू करते हैं। बाद में पता चलता है कि जिस दुर्घटना में जेनी की आंखों की रोशनी गई थी,वह सूरज की वजह से हुई थी।
फिल्‍म की कहानी छह महीने पहले से शुरू होकर छह महीने बाद तक चलती है। इस एक साल की कहानी में ही इतनी घटनाएं होती हैं कि उनके बीच संबंध बिठाने-पिरोने में धागे छूटने लगते हैं। पंद्रह-बीस साल ऐसी संरचना की ढेर सारी फिल्‍में आया करती थीं। उनमें नाटकीयता और इमोशन का तड़का रहता था। प्रेम में त्‍याग करते प्रेमी होते थे,जो रहते तो इसी दु‍निया में थे लेकिन उनकी प्रतिक्रियाएं अलौकिक होती थीं। दो लफ्जों की कहानी ऐसी ही घिसी-पिटी पटकथा पर पसरी फिल्‍म है। फिल्‍म क्‍वालालमपुर की पृष्‍ठभूमि में क्‍यों रची गई है ? इसकी ठोस वजह बताने की जरूरत लेखक और निर्देशक ने नहीं समझी है। वैसे भी विदेशों की पृष्‍ठभूमि की हिंदी फिल्‍मों में ज्‍यादातर चरित्र भारतीय मूल के ही रहते हैं। स्‍थानीय किरदारों से उनका साबका शायद ही होता है। दीपक तिजोरी ने थोड़ी सी मेहनत की है। एक किरदार और कुछ संवाद स्‍थानीय परिवेश और भाषा में हैं।
रण्‍दीप हुडा इधर अपनी फिल्‍मों में अतिरिक्‍त मेहनत करते दिखाई पड़ रहे हैं। इस फिल्‍म में सूरज के रूप में उन्‍होंने खामोश और नाराज किरदार को अच्‍छी तरह से समझा और पर्दे पर उतारा है। वे अपने तई स्क्रिप्‍ट और किरदार में जान डालने की कोशिश करते हैं,लेकिन उन्‍हें लेखक और निर्देशक का समुचित सपोर्ट नहीं मिल पाता। काजल अग्रवाल के अभिनय में कोई भिन्‍नता नहीं है। उनकी आंखें की रोशनी जाने या आने से उनके एक्‍सप्रेशन में फर्क नहीं पड़ता। वह सीमित अदाओं की अभिनेत्री हैं। बाकी सहयोगी कलाकारों में हिंदी फिल्‍मों के कुछ पुराने चेहरों के दिखने से बासीपन बढ़ता है। इन दिनों ज्‍यादातर फिल्‍मों में सहयोगी किरदारों के लिए भी नए चेहरे लिए जा रहे हैं। उनसे विश्‍वसनीयता बढ़ती है।
दो लफ्जों की कहानी प्रेम और त्‍याग की बासी कहानी है,जिसे घिसे-पिटे तरीके सही कहा गया है। अकेले रणदीप हुडा की मेहनत फिल्‍म की चमक बढा़ने में कम पड़ती है।
अवधि-128 मिनट
स्‍टार-एक स्‍टार

Friday, June 3, 2016

फिल्‍म समीक्षा : हाउसफुल 3



फूहड़ और ऊलजुलूल    
-अजय ब्रह्मात्‍मज

साजिद नाडियाडवाला हाउसफुल सीरिज के निर्माता हैं। 2010 में हाउसफुल और 2012 में हाउसफुल 2 के बाद उन्‍होंने 2016 में हाउसफुल 3 का निर्माण किया है। इस बार उन्‍होंने डायरेक्‍टर बदल दिया है। साजिद खान की जगह अब साजिद-फरहाद आ गए हैं। एक से भले दो...दो दिमागों ने मिलकर हाउसफुल 3 का लेखन और निर्देशन किया है। तय कर पाना मुश्किल है कि यह पहली दोनों से किस मायने में कमतर या बेहतर है। मन में यह भी सवाल उठ सकता है कि साजिद खान कैसे साजिद-फरहाद से अच्‍छे या बुरे हैं कि साजिद नाडियाडवाला ने उन पर भरोसा किया। बता दें कि हाउसफुल 3 के क्रिएटिव डायरेक्‍टर स्‍वयं साजिद नाडियाडवाला हैं।
फिल्‍म की कहानी...माफ करें कहानी बताने के नाम पर घटनाएं लिखनी होंगी,जिनका एक-दूसरे से कोई संबंध नहीं है और उनके होने के पीछे कोई तर्क भी नहीं है। साजिद-फरहाद इस कला में माहिर हैं। उन्‍होंने इट्स एंटरटेनमेंट के बाद फिर से साबित किया है कि उन्‍हें ह्वाट्स ऐप लतीफों को सीन बनाने आता है। शुक्रिया कपिल शर्मा और उन जैसे कॉमेडी के टीवी होस्‍ट का...हम हंसी-मजाक में किसी भी स्‍तर तक फिसल सकते हैं। हम रंग,नस्‍ल और विकलांगता पर हंस सकते हैं। इतना हंस सकते हैं कि खुद और दूसरों को भी रोना आ जाए। हाउसफुल 3 देखते हुए सचमुच रोने का मन करता है। कोफ्त होती है। खुद पर और उन कलाकारों पर भी,जो निहायत संजीदगी से ऊलजुलूल हरकतें करते हें। टांग उठा कर नाचते हैं और मुंह फाड़ कर खिलखिला सकते हैं। अक्ष्‍य कुमार और रितेश देशमुख हाउसफुल सीरिज के स्‍थायी नगीने हैं। इस बार अभिषेक बच्‍चन को भी शामिल कर लिया गया है। हंसी की मात्रा बढ़ाने के लिए मौके-कुमौके अमिताभ बच्‍चन और ऐश्‍वर्या राय बच्‍चन का भी लेखक-निर्देशक ने दुरुपयोग किया है। रितेश देशमुख ने एक जगह जीनिलिया उच्‍चारण किया है। पता नहीं कैसे ट्विंकल मजाक बनने से रह गईं।
हाउसफुल 3 उस हफ्ते आई है,जब सचिन तेंदुलकर और लता मंगेशकर पर तन्‍मय भट्ट के मजाकिया वीडियो पर थू-थू,विरोध और प्रवचन चालू हैं। इस फिल्‍म में मजाक बन रहे अमिताभ बच्‍चन,ऐश्‍वर्या राय बच्‍चन,मैडम तुसाद संग्रहालय की अन्‍य हस्तियों के मखौल पर किसी को आपत्ति नहीं होगी। कॉमेडी फिल्‍म के नाम पर सब माफ है। अपाहिजों का मजाक माफ है। अंधे,गूंगे और लंगड़े की चल रही तौहीन माफ है। मजेदार तथ्‍य या विडंबना यह है कि ऐसी फिल्‍में देखते हुए दर्शक ठहाके लगा रहे हैं। हैं। सिनेमाघरों से निकलते समय टीवी चैनलों के कैमरे के आगे कलाकारों की तारीफ कर रहे हैं। उनमें ही किसी को अच्‍छा और किसी को कम अच्‍छा बता रहे हैं। यह इस दौर की विसंगति है। इस विसंगति से भी कुछ लोग पैसे बना रहे हैं।
अक्षय कुमार और रितेश देशमुख के लिए हाउसफुल 3 की हरकतें नई नहीं हैं। अभिषेक बच्‍चन उन्‍हें बराबर का साथ देते हें। गौर करने की बात है कि फिल्‍म की तीनों हीरोइनों जैक्‍लीन फर्नांडिस,नरगिस फाखरी और लिजा हेडन के विदेशी कनेक्‍शन हैं। तीनों के रंग-रूप और कद-काठी के साथ मेकअप और चाल-ढाल में भी समानता रखी गई हैं। वैसे भी उन्‍हें ज्‍यादातर दिखने-दिखाने और गानों के लिए ही रखा गया है। वे बहाना हैं,ताकि तीनों हीरो बेवकूफाना हरकतें कर सकें। बोमन ईरानी और चंकी पांडे के साथ इस बार जैकी श्राफ को जोड़ लिया गया है। तीनों ने फिल्‍म को हास्‍यास्‍पद बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है।
यह फिल्‍म फूहड़ दृश्‍यों और राइटिंग का नमूना है। लेखक संवादों में डबल मिन्रिंग से बचते हैं,लेकिन सिंगल मिनिंग भी खो देते हैं। बेमतलब और बेखुदी में ही किरदार कुछ बकते नजर आते हें।
अवधि- 135 मिनट
स्‍टार- एक स्‍टार

Friday, November 27, 2015

फिल्‍म समीक्षा : तमाशा



-अजय ब्रह्मात्‍मज
प्रेम और जिंदगी की नई तकरीर
    इम्तियाज अली ने रणबीर कपूर और दीपिका पादुकोण जैसे दो समर्थ कलाकारों के सहारे प्रेम और अस्मिता के मूर्त-अमूर्त भाव को अभिव्‍यक्ति दी है। सीधी-सपाट कहानी और फिल्‍मों के इस दौर में उन्‍होंने जोखिम भरा काम किया है। उन्‍होंने दो पॉपुलर कलाकारों के जरिए एक अपारंपरिक पटकथा और असामान्‍य चरित्रों को पेश किया है। हिंदी फिल्‍मों का आम दर्शक ऐसी फिल्‍मों में असहज हो जाता है। फिल्‍म देखने के सालों के मनोरंजक अनुभव और रसास्‍वादन की एकरसता में जब भी फेरबदल होती है तो दर्शक विचलित होते हैं। जिंदगी रुटीन पर चलती रहे और रुटीन फिल्‍मों से रुटीन मनोरंजन मिलता रहे। आम दर्शक यही चाहते हैं। इम्तियाज अली इस बार अपनी लकीर बदल दी है। उन्‍होंने चेहरे पर नकाब चढ़ाए अदृश्‍य मंजिलों की ओर भागते नौजवानों को लंघी मार दी है। उन्‍हें यह सोचने पर विवश किया है कि क्‍यों हम सभी खुद पर गिरह लगा कर स्‍वयं को भूल बैठे हैं?
    वेद और तारा वर्तमान पीढ़ी के प्रतिनिधि हैं। परिवार और समाज ने उन्‍हें एक राह दिखाई है। उस राह पर चलने में ही उनकी कामयाबी मानी जाती है1 जिंदगी का यह ढर्रा चाहता है कि सभी एक तरह से रहें और जिएं। शिमला में पैदा और बड़ा हुआ वेद का दिल किस्‍सों-कहानियों में लगता है। वह बेखुदी में बेपरवाह जीना चाहता है। इसी तलाश में भटकता हुआ वह फ्रांस के कोर्सिका पहुंच गया है। वहां उसकी मुलाकात तारा से होती है। तारा और वेद संयोग से करीब आते हैं,लेकिन वादा करते हैं कि वे एकदूसरे के बारे में न कुछ पूछेंगे और न बताएंगे। वे झूठ ही बोलेंगे और कोशिश करेंगे कि जिंदगी में फिर कभी नहीं मिलें। वेद की बेफिक्री तारा को भा जाती है। उसकी जिंदगी में बदलाव आता है। उन दोनों के बीच स्‍पार्क होता है,लेकिन दोनों ही उसे प्‍यार का नाम नहीं देते। जिंदगी के सफर में वे अपने रास्‍तों पर निकल जाते हैं। तारा मोहब्‍बत की कशिश के साथ लौटती है और वेद जिंदगी की जंग में शामिल हो जाता है। एक अंतराल के बाद फिर से दोनों की मुलाकात होती है। तारा पाती और महसूस करती है कि बेफिक्र वेद जिंदगी की बेचारगी को स्‍वीकार कर मशीन बन चुका है। वह इस वेद को स्‍वीकार नहीं पाती। वेद के प्रति अपने कोमल अहसासों को भी वह दबा जाती है। तारा की यह अस्‍वीकृति वेद को अपने प्रति जागरूक करती है। वह अंदर झांकता है। वह भी महसूस करता है कि प्रोडक्‍ट मैनेजर बन कर वह दुनिया की खरीद-फरोख्‍त की होड़ में शामिल हो चुका है,क्‍योंकि अभी कंट्री और कंपनी में फर्क करना मुश्किल हों गया है। कंट्री कंपनी बन चुकी हैं और कंपनी कंट्री।
    इम्तियाज की तमाशा बेमर्जी का काम कर जल्‍दी से कामयाब और अमीर होने की फिलासफी के खिलाफ खड़ी होती है। रोजमर्रा की रुटीन जिंदगी में बंध कर हम बहुत कुछ खो रहे हैं। तारा और वेद की जिंदगी इस बंधन और होड़ से अलग नहीं है। उन्‍हें इस तरह से ढाला जाता है कि वे खुद की ख्‍वाहिशों से ही बेखबर हो जाते हैं। इम्तियाज अली के किरदार उनकी पहले की फिल्‍मों की तरह ही सफर करते हैं और ठिकाने बदलते हैं। इस यात्रा में मिलते-बिछुड़ते और फिर से मिलते हुए उनकी कहानी पूरी होती है। उनके किरदारों में बदलाव आया है,लेकिन शैली और शिल्‍प में इम्तियाज अधिक भिन्‍नता नहीं लाते। इस बार कथ्‍य की जरूरत के अनुरास थ्रिएटर और रंगमंचीय प्रदर्शन के तत्‍व उन्‍होंने फिल्‍म में शामिल किए हैं। कलाकरों के अंतस और आत्‍मसंघर्ष को व्‍यक्‍त करने के लिए उन्‍हें इसकी जरूरत पड़ी है। संभावना थी कि वे संवादों में दार्शनिक हो जाते,लेकिन उन्‍होंने आमफहम भाषा और संवादों में गहरी और परिवर्तनकारी बातें कही हैं।
       यह फिल्‍म रणबीर कपूर और दीपिका पादुकोण के परफारमेंस पर निर्भर करती है। उन दोनों ने कतई निराश नहीं किया है। वे स्क्रिप्‍ट की मांग के मुताबिक आने दायरे से बाहर निकले हैं और पूरी मेहनत से वेद और तारा को पर्दे पर जीवंत किया है। यह नियमित फिल्‍म नहीं है,इसलिए उनके अभिनय में अनियमितता आई है। छोटी सी भूमिका में आए इश्‍तयाक खान याद रह जाते हैं। उनकी मौजूदगी वेद को खोलती और विस्‍तार देती है। तमाशा हिंदी फिल्‍मों की रेगुलर और औसत प्रेमकहानी नहीं है। इस प्रेमकहानी में चरित्रों का उद्बोधन और उद्घाटन है। वेद और तारा एक-दूसरे की मदद से खुद के करीब आते हैं।
       फिल्‍म का गीत-संगीत असरकारी है। इरशाद ने अपने गीतों के जरिए वेद और तारा के मनोभावों को सटीक अभिव्‍य‍क्ति दी है। एआर रहमान ने पार्श्‍व संगीत और संगीत में किरदारों की उथल-पुथल को सांगीतिक आधार दिया है। फिलम को बारीकी से देखें तो पता चलेगा कि कैसे पार्श्‍व संगीत कलाकारों परफारमेंस का प्रभाव बढ़ा देता है। तमाशा के गीतों में आए शब्‍द भाव और अर्थ की गहराई से संपन्‍न हैं। इरशाद की खूबी को एआर रहमान के संगीत ने खास बना दिया है।
अवधि-151 मिनट
स्‍टार-साढ़े तीन स्‍टार