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Saturday, August 12, 2017

फिल्‍म समीक्षा : टॉयलेट- एक प्रेम कथा



फिल्‍म रिव्‍यू
शौच पर लगे पर्दा
टॉयलेट एक प्रेम कथा
-अजय ब्रह्मात्‍मज
जया को कहां पता था कि जिस केशव से वह प्‍यार करती है और अब शादी भी कर चुकी है...उसके घर में टॉयलेट नहीं है। पहली रात के बाद की सुबह ही उसे इसकी जानकारी मिलती है। वह गांव की लोटा पार्टी के साथ खेत में भी जाती है,लेकिन पूरी प्रक्रिया से उबकाई और शर्म आती है। बचपन से टॉयलेट में जाने की आदत के कारण खुले में शौच करना उसे मंजूर नहीं। बिन औरतों के घर में बड़े हुआ केशव के लिए शौच कभी समस्‍या नहीं रही। उसने कभी जरूरत ही नहीं महसूस की। जया के बिफरने और दुखी होने को वह शुरू में समझ ही नहीं पाता। उसे लगता है कि वह एक छोटी सी बात का बतंगड़ बना रही है। दूसरी औरतों की तरह अपने माहौल से एडजस्‍ट नहीं कर रही है। यह फिल्‍म जया की है। जया ही पूरी कहानी की प्रेरक और उत्‍प्रेरक है। हालांकि लगता है कि सब कुछ केशव ने किया,लेकिन गौर करें तो उससे सब कुछ जया ने ही करवाया।
टॉयलेट एक प्रेम कथा रोचक लव स्‍टोरी है। जया और केशव की इस प्रेम कहानी में सोच और शौच की खल भूमिकाएं हैं। उन पर विजय पाने की कोशिश और कामयाबी में ही जया और केशव का प्रेम परवान चढ़ता है। लेखक सिद्धार्थ-गरिमा ने जया और केशव की प्रेम कहानी का मुश्किल आधार और विस्‍तार चुना है। उन्‍होंने आगरा और मथुरा के इलाके की कथाभूमि चुनी है और अपने किरदारों का स्‍थानीय रंग-ढंग और लहजा दिया है। भाषा ऐसी रखी है कि स्‍थानीयता की छटा मिल जाए और उसे समझना भी दुरूह नहीं हो। उच्‍चारण की शुद्धता के बारे में ब्रजभूमि के लोग सही राय दे सकते हैं। फिल्‍म देखते हुए भाषा कहीं आड़े नहीं आती। उसकी वजह से खास निखार आया है।
जया बेहिचक प्रधान मंत्री के स्‍वच्‍छ भारत अभियान की थीम से जुड़ी यह फिल्‍म सदियों पुरानी सभ्‍यता और संस्‍कृति के साच पर सवाल करती है। लेखकद्वय ने व्‍यंग्‍य का सहारा लिया है। उन्‍होंने जया और केशव के रूप में दो ऐसे किरदारों को गढ़ा है,जो एक-दूसरे से बेइंतहा प्रेम करते हैं। सिर्फ शौच के बारे में उनकी सोच अलग-अलग है। केशव की सोच में कभी शौच का सवाल आया ही नहीं,क्‍योंकि बचपन से उसने खुले में शौच की ही नित्‍य ्रिया माना और समझा। जया के बिदकने पर भी शौच की जरूरत उसके पल्‍ले नहीं पड़ती। उसे जया की मांग का एहसास बाद में होता है। फिर तो वह एड़ी-चोटी का जोड़ लगा देता है। गांव और आसपास की महिलाएं जागृत होती हैं और शौच एक अभियान बन जाता है।
ऐसी फिल्‍मों के साथ खतरा रहता है कि वे डाक्‍यूमेंट्री न बन जाएं। या ऐसी उपदेशात्‍मक न हो जाएं कि दर्शक दुखी हो जाएं। निर्देशक श्रीनारायण सिंह संतुलन बना कर चलते हैं। उन्‍हें अपने कलाकारों और लेखकों का पूरा सहयोग मिला है।
फिल्‍म के संवाद चुटीले और मारक हैं। परंपरा और रीति-रिवाजों के नाम पर चल रह कुप्रथा पर अटैक करती यह फिल्‍म नारे लगाने से बची रहती है। एक छोर पर केशव के पिता पंडिज्‍जी हैं तो दूसरे छोर पर जया है। इनके बीच उलझा केशव आखिरकार जया के साथ बढ़ता है और बड़े परिवर्तन का कारक बन जाता है। पढ़ी-लिखी जया एक तरह से गांव-कस्‍बों में नई सोच के साथ उभरी लड़कियों का प्रतिनिधित्‍व करती है। वह केशव से प्रेम तो करती है,लेकिन अपने मूल्‍यों और सोच के लिए समझाौते नहीं कर सकती। और चूंकि उसकी सोच तार्किक और आधुनिक है,इसलिए हम उसके साथ हो लेते हैं। हमें केशव से दिक्‍कत होने लगती है। लेखकों ने केशव के क्रमिक बदलाव से कहानी स्‍वाभाविक रखी है। हां,सरकारी अभियान और मंत्रियों की सक्रियता का हिस्‍सा जबरन डाला हुआ लगता है। उनके बगैर या उनके सूक्ष्‍म इस्‍तेमाल से फिल्‍म ज्‍यादा असरदार लगती।
अक्षय कुमार ने केशव के रिदार को समझा है। उन्‍होंने उस किरदार के लिए जरूरी भाव-भंगिमा और पहनावे पर काम किया है। लहजे और संवाद अदायगी में भी उनकी मेहनत झलकती है। जया की भूमिका में भूमि पेडणेकर जंचती हैं। उन्‍होंने पूरी सादगी और वास्‍तविकता के साथ इस किरदार को निभाया है। उनके सहज अभिनय में जया भादुड़ी की झलग है। ग्‍लैमर की गलियों में वह नहीं मुड़ीं तो हिंदी फिल्‍मों को एक समर्थ अभिनेत्री मिल जाएगी। इस फिल्‍म की जान हैं पंडिज्‍जी यानी सुधीर पांडे। उन्‍होंने अपने किरदार को उसकी विसंगतियों को ठोस विश्‍वास के साथ निभाया है। छोटे भाई के रूप में दिव्‍येन्‍दु समर्थ परक और सहयोगी हैं। जया के मां-पिता के रूप में आए कलाकार भी स्‍वाभाविक लगे हैं। अनुपम खेर अपने अंदाज के साथ यहां भी हैं।
पर्दा सोच से हटा कर शौच पर लगाने का टाइम आ गयो।
अवधि- 161 मिनट
**** चार स्‍टार    

Saturday, February 28, 2015

फिल्‍म समीक्षा : दम लगा के हईसा


चुटीली और प्रासंगिक
-अजय ब्रह्मात्मज
    यशराज फिल्म्स की फिल्मों ने दशकों से हिंदी फिल्मों में हीरोइन की परिभाषा गढ़ी है। यश चोपड़ा और उनकी विरासत संभाल रहे आदित्य चोपड़ा ने हमेशा अपनी हीरोइनों को सौंदर्य और चाहत की प्रतिमूर्ति बना कर पेश किया है। इस बैनर से आई दूसरे निर्देशकों की फिल्मों में भी इसका खयाल रख जाता है। यशराज फिल्म्स की ‘दम लगा के हईसा’ में पहली बार हीरोइन के प्रचलित मानदंड को तोड़ा गया है। फिल्म की कहानी ऐसी है कि सामान्य लुक की एक मोटी और वजनदार हीरोइन की जरूरत थी। भूमि पेंडणेकर ने इस जिम्मेदारी को बखूबी निभाया है। इस फिल्म में उनके साथ सहायक कलाकारों का दमदार सहयोग फिल्म को विश्वसनीय और रियल बनाता है। खास कर सीमा पाहवा,संजय मिश्रा और शीबा चड्ढा ने अपने किरदारों को जीवंत कर दिया है। हम उनकी वजह से ही फिल्म के प्रभाव में आ जाते हैं।
    1995 का हरिद्वार ¸ ¸ ¸देश में प्रधानमंत्री नरसिंहा राव की सरकार है। हरिद्वार में शाखा लग रही है। प्रेम एक शाखा में हर सुबह जाता है। शाखा बाबू के विचारों से प्रभावित प्रेम जीवन और कर्म में खास सोच रखता है। निर्देशक ने शाखा के प्रतिगामी असर का इशारा भर किया है। तिवारी परिवार का यह लड़का ऑडियो कैसेट की दुकान चलाता है। कुमारा शानू उसकी कमजोरी हैं। उनके अलावा वह पिता की चप्पल और परीक्षा में अंग्रेजी भी उसकी कमजोरी है। तिवारी परिवार अपने लाडले की शादी पढ़ी-लिखी सर्विसवाली बहू से कर देना चाहते हैं। वे उसके मोटापे को नजरअंदाज करते हैं। प्रेम न चाहते हुए भी पिता और परिवार के दबाव में शादी कर लेता है। वह अपनी पत्नी संध्या को कतई पसंद नहीं करता। एक बार गुस्से में वह कुछ ऐसा कह जाता है कि आहत संध्या उसे छोड़ कर चली जाती है। बात तलाक तक पहुंचती है। फैमिली कोर्ट उन्हें छह महीने तक साथ रहने का आदेश देता है ताकि वे एक-दूसरे को समझ सकें। इसी दौर में प्रेम और संध्या करीब आते हैं। और आखिरकार ¸ ¸ ¸
    निर्देशक शरद कटारिया ने उत्तर भारत के निम्न मध्यवर्गीय परिवारों की रोजमर्रा जिंदगी से यह कहानी चुन ली है। बेमेल शादी के बहाने वे कई जरूरी मुद्दों को भी छूते चलते हें। फिल्म में प्रसंगवश सामाजिक विसंगतियों पर करारा व्यंग्य भी है। लेखक-निर्देशक ने संयमित तरीके से हरिद्वार के माहौल को रचा है। उन्होंने अपने चरित्रों को लार्जर दैन लाइफ नहीं होने दिया है। फिल्म में मध्यवर्गीय परिवारों के दैनंदिन प्रसंग और रिश्तों के ढंग हैं। प्रेम और संध्या के परिवारों के सदस्यों को भी निर्देशक ने स्वाभाविक रखा है। उनके व्यवहार, प्रतिक्रिया और संवादों से फिल्म के प्रभाव का घनत्व बढ़ता है।
    कलाकारों में संजय मिश्रा और सीमा पाहवा की तारीफ करनी होगी। उनकी जोड़ी को हम रजत कपूर की ‘आंखों देखी’ में देख चुके हैं। इन दोनों कलाकारों ने आयुष्मान खुरााना और भूमि पेंडणेकर का काम आसान कर दिया है। भूमि पेंडणेकर की यह पहली फिल्म है। बगैर आयटम सौंग और अंग प्रदर्शन के भी वह अपील करती हैं। यह अलग बात है कि भविष्य की फिल्मों के लिए उन्हें अलग से मेहनत करनी होगी। संध्या के किरदार के लिए वह उपयुक्त हैं। उन्होंने अपने किरदार को नार्मल और नैचुरल रखा है। सालों बाद हिंदी फिल्मों में बुआ दिखी है। बुआ के रूप में शीबा चड्ढा अच्छी और चुटीली हैं।
    वरुण ग्रोवर और अनु मलिक के गीत-संगीत में पीरियड का पूरा ध्यान रखा गया है। वे उस पीरियड के संगीत की नकल में भोंडे नहीं हुए हैं। वरुण ग्रोवर के गीतों में आमफहम भाषा और अभिव्यक्ति रहती है। वह यहां भी है। इस फिल्म की भाषा मल्टीप्लेक्स के दर्शकों को वैसी ही लग सकती है, जैसे सिंगल स्क्रीन के दर्शकों को अंग्रेजी अंग्रेजी मिश्रित भाषा लगती है। उत्तर भारत के दर्शक मल्टीप्लेक्स और सिंगल स्क्रीन में इस फिल्म का आनंद उठाएंगे।
अवधि- 111 मिनट
 *** १/२ साढ़े तीन स्टार