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Saturday, January 14, 2017

फिल्‍म समीक्षा : ओके जानू

फिल्‍म रिव्‍यू
ओके जानू
-अजय ब्रह्मात्‍मज
शाद अली तमिल के मशहूर निर्देशक मणि रत्‍नम के सहायक और शागिर्द हैं। इन दिनों उस्‍ताद और शाग्रिर्द की ऐसी जोड़ी कमू दिखाई देती है। शाइ अली अपने उस्‍ताद की फिल्‍मों और शैली से अभिभूत रहते हैं। उन्‍होंने निर्देशन की शुरूआत मणि रत्‍नम की ही तमिल फिल्‍म के रीमेक साथिया से की थी। साथिया में गुलजार का भी यागदान था। इस बार फिर से शाद अली ने अपने उस्‍ताद की फिल्‍म ओके कनमणि को हिंदी में ओके जानू शीर्षक से पेश किया है। इस बार भी गुलजार साथ हैं।
मूल फिल्‍म देख चुके समीक्षकों की राय में शाद अली ने कुछ भी अपनी तरफ से नहीं जोड़ा है। उन्‍होंने मणि रत्‍नम की दृश्‍य संरचना का अनुपालन किया है। हिंदी रीमेक में कलाकार अलग हैं,लोकेशन में थोड़ी भिन्‍नता है,लेकिन सिचुएशन और इमोशन वही हैं। यों समझें कि एक ही नाटक का मंचन अलग स्‍टेज और सुविधाओं के साथ अलग कलाकारों ने किया है। कलाकरों की अपनी क्षमता से दृश्‍य कमजोर और प्रभावशाली हुए हैं। कई बार सधे निर्देशक साधारण कलाकारों से भी बेहतर अभिनय निकाल लेते हैं। उनकी स्क्रिप्‍ट कलाकारों को गा्रे करने का मौका देती है। ओके जानू में ऐसा ही हुआ है। समान एक्‍सप्रेशन से ग्रस्‍त आदित्‍य राय कपूर पहली बार कुछ खुलते और निखरते नजर आए हैं। हां,श्रद्धा कपूर में उल्‍लेखनीय ग्रोथ है। वह तारा की गुत्थियों और दुविधाओं को अच्‍छी तरह व्‍यक्‍त करती है। चेहरा फोकस में हो तो उतरते,बदलते और चढ़ते हर भाव को कैमरा कैद करता है। कलाकार की तीव्रता और प्रवीणता पकड़ में आ जाती है। श्रद्धा कपूर ऐसे क्‍लोज अप दृश्‍यों में संवाद और भावों को अच्‍दी तरह व्‍यक्‍त करती हैं। युवा कलाकारों को संवाद अदायगी पर काम करने की जरूरत है। इसी फिल्‍म में गोपी का किरदार निभा रहे नसीरूद्दीन शाह मामूली और रुटीन दृश्‍यों में भी बगैर मेलोड्रामा के दर्द पैदा करने में सफल रहे हैं। यह उनकी आवाज और संवाद अदायगी का असर है। यहां तक कि लीला सैमसन अपने किरदार को भी ऐसे ही गुणों से प्रभावशाली बनाती हैं।
फिलम की कहानी आज के युवा किरदारों के आग्रह और भ्रम पर केंद्रित है। तारा और आदि आज के युवा ब्रिगेड के प्रतिनिधि हैं। दोनों महात्‍वाकांक्षी हैं और जीवन में समृद्धि चाहते हैं। तारा आर्किटेक्‍अ की आगे की पढ़ाई के लिए पेरिस जाना चाहती है। आदि का ध्‍येय वीडियो गेम रचने में लगता है। वह अमेरिका को आजमाना चाहता है। आदि उसी क्रम में मुंबई आता है। वह ट्रेन से आया है। दोनों उत्‍तर भारतीय हैं। तारा समृद्ध परिवार की लड़की है। आदि मिडिल क्‍लस का है। फिल्‍म में यह गौरतलब है कि आदि को वहडयो गेम का सपना आता है तो निर्देश और सड़कों के दोनों किनारों की दुकानों के साइन बोर्ड हिंदी में लिखे हैं,लेकिन जब वह वीडियो गेम बनाता है तो सब कुछ अंग्रेजी में हो जाता है। शाद अली ने बारीकी से उत्‍तर भारतीय के भाषायी अवरोध और प्रगति को दिखाया है। बहरहाल, इस फिल्‍म में भी दूसरी हिंदी फिल्‍मों की तरह पहली नजर में ही लड़की लड़के को आकर्षित करती है और फिर प्रेम हो जाता है।
ओके जानू प्रेम और करिअर के दोराहे पर खड़ी युवा पीढ़ी के असमंजस बयान करती है। साहचर्य और प्‍यार के बावजूद शादी करने के बजाय लिव इन रिलेशन में रहने के फैसले में कहीं न कहीं कमिटमेंट और शादी की झंझटों की दिक्‍कत के साथ ही कानूनी दांवपेंच से बचने की कामना रहती है। हम लिव इन रिलेशन में रहने और अलग हो गए विख्यात प्रेमियों को देख रहे हैं। उनकी जिंदगी में तलाक की तकलीफ और देनदारी नहीं है। खास कर लड़के ऐसे दबाव से मुक्‍त रहते हैं। आदि और तारा दोनों ही स्‍पष्‍ट हैं कि वे अपने ध्‍येय में संबंध को आड़े नहीं आने देंगे। ऐसा हो नहीं पाता। साथ रहते-रहते उन्‍हें एहसास ही नहीं रहता कि वे कब एक-दूसरे के प्रति कमिटेड हो जाते हैं। उनके सामने गोपी और चारू का साक्ष्‍य भी है। उन दोनों की परस्‍पर निर्भरता और प्रेम आदि और तारा के लिए प्रेरक का काम करते हैं।
अपनी प्रगतिशीलता के बावजूद हम अपनी रूढि़यों से बच नहीं पाते। इसी फिल्‍म में गोपी तारा से पूछते हैं कि वह करिअर और प्‍यार में किसे चुनेगी? यही सवाल आदि से भी तो पूछा जा सकता है। दरअसल, हम लड्कियों के लिए प्‍यार और करिअर की दुविधा खड़ी करते हैं। ओके जानू ऐसे कई प्रसंगों की वजह से सोच और अप्रोच में आधुनिक होने के बावजूद रूढि़यों का पालन करती है।
अवधि- 135 मिनट
तीन स्‍टार 

Friday, June 25, 2010

फिल्‍म समीक्षा रावण

मनोरम दृश्य, कमजोर कथा

-अजय ब्रह्मात्‍मज

मणि रत्‍‌नम की रावण निश्चित ही रामायण से प्रेरित है। अभिषेक बच्चन रावण उर्फ बीरा, ऐश्वर्या राय बच्चन रागिनी उर्फ सीता और विक्रम देव उर्फ राम की भूमिका में हैं। बाकी पात्रों में भी रामायण के चरित्रों की समानताएं रखी गई हैं।मणि रत्‍‌नम इस फिल्म के अनेक दृश्यों में रामायण के निर्णायक प्रसंग ले आते हैं। पटकथा लिखते समय ही मानो हाईलाइट तय कर दिए गए हों और फिर उन घटनाओं के इर्द-गिर्द कहानी बुनी गई हो। इसकी वजह से उन दृश्यों में तो ड्रामा दिखता है, लेकिन आगे-पीछे के दृश्य क्रम खास प्रभाव नहीं पैदा करते। मणि रत्‍‌नम ने राम, सीता और रावण की मिथकीय अवधारणा में फेरबदल नहीं किया है। उन्होंने मुख्य पात्रों के मूल्य, सिद्धांत और क्रिया-कलापों को आज के संदर्भ में अलग नजरिए से पेश किया है।

मणि रत्‍‌नम देश के शिल्पी फिल्मकार हैं। उनकी फिल्में खूबसूरत होती हैं और देश के अन देखे लोकेशन से दर्शकों का मनोरम मनोरंजन करती हैं। रावण में भी उनकी पुरानी खूबियां मौजूद हैं। हम केरल के जंगलों, मलसेज घाट और ओरछा के किले का भव्य दर्शन करते हैं। पूरी फिल्म में प्रकृति के पंचतत्वों में से एक जल विभिन्न रूपों में मौजूद है। फिल्म के सभी पात्र भीगे और गीले नजर आते हैं। नृत्य-गीत, एक्शन और इमोशन के दृश्य पानी से सराबोर हैं। कुछ दृश्यों में तो सामने बारिश हो रही है और पीछे धूप खिली हुई है। पहाड़, नदी और झरने कोहरे में डूबे हैं। प्राचीन इमारतों पर काई जमी है। मणि रत्‍‌नम इन सभी के जरिए फिल्म का भाव और वातावरण तैयार करते हैं। सब कुछ अद्भुत रूप से नयनाभिरामी है।

फिल्म के कथ्य की बात करें तो मणि रत्‍‌नम ने बीरा और देव को आमने-सामने खड़ा करने के साथ उनके बीच रागिनी को विवेक के तौर पर रखा है। रागिनी कुछ समय तक बीरा के साथ रहने और उसके पक्ष को समझने के बाद अपने पति देव के इरादों और उद्देश्यों पर सवाल उठाती है। उसे लगता है कि बीरा गलत नहीं है। सरकार के प्रतिनिधि के रूप में वह अपने पति को देखती है और इस निर्णय पर पहुंचती है कि बीरा ज्यादा मानवीय और नेक है। उसमें एक निश्छलता है। वह अपने समाज के लिए बदले की भावना से उसका अपहरण तो करता है, लेकिन उसे सिर्फ हथियार के तौर पर इस्तेमाल करता है। रागिनी के प्रति उसके मन में प्रेम जागता है, लेकिन वह मर्यादा हीन नहीं है। वह उसे छूता तक नहीं है। बीरा के चंगुल से रागिनी को देव निकाल लेता है और सीता की अग्नि परीक्षा की तरह रागिनी से पॉलीग्राफ टेस्ट की बात करता है। यहां आज की सीता यानि रागिनी बिफरती है और फिर से बीरा के पास पहुंच जाती है। रामायण की कथा का यह विस्तार दर्शक नहीं पचा पाएंगे। हालांकि आखिरकार बीरा मारा जाता है, लेकिन फिल्म का क्लाइमेक्स इस वजह से कमजोर हो जाता है।

कलाकारों में विक्रम सबसे ज्यादा प्रभावित करते हैं। सहयोगी भूमिकाओं में आए निखिल द्विवेदी, रवि किशन और प्रियमणि अपेक्षित योगदान करते हैं। रागिनी के किरदार के द्वंद्व को ऐश्वर्या राय बच्चन ने अच्छी तरह व्यक्त किया है। बीरा के रूप में अभिषेक बच्चन अधिक प्रभावित नहीं करते। वे बीरा के स्वभाव के भिन्न भावों को नहीं ला पाते। हो सकता है कि लेखक-निर्देशक ने उन्हें ऐसी ही हिदायत दी हो,लेकिन उसकी वजह से फिल्म का इंपैक्ट कमजोर हुआ है। बीरा रावण का मुख्य पात्र है और वही चरित्र और अभिनय के लिहाज से कमजोर हो गया है।

** 1/2 ढाई स्टार

Sunday, May 16, 2010

स्‍वागत है साउथ के सुपरस्‍टार विक्रम का 'रावण' में


-अजय ब्रह्मात्‍मज

हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में एक्टर डबल-ट्रिपल रोल निभाते रहे हैं। संजीव कुमार ने नया दिन नयी रात में नौ रोल तो कमल हासन ने दसावतार में दस रोल निभाए। अब साउथ के सुपरस्टार विक्रम नए किस्म का रिकार्ड बना रहे हैं।

विक्रम ने रावण के हिंदी और तमिल दोनों संस्करणों में काम किया है, लेकिन दोनों भाषाओं में दो अलग किरदार निभाए हैं। वे हिंदी संस्करण में देव की भूमिका में नजर आएंगे तो तमिल संस्करण में बीरा के रूप में चौंकाएंगे। संभवत: विश्व सिनेमा में पहली बार किसी अभिनेता को इस किस्म की दोहरी भूमिका निभाने का मौका मिला है।

मणि रत्नम दोनों ही भाषाओं में रावण की शूटिंग साथ-साथ कर रहे थे। उन्होंने देव और बीरा के रूप में विक्रम को बड़ी चुनौती दी थी। विक्रम इस चुनौती पर खरे उतरे हैं। दोनों भाषाओं में रावण देखने के बाद ही दर्शक विक्रम की प्रतिभा के आयामों से परिचित हो सकेंगे।

लगभग बीस सालों से दक्षिण भारत की तमिल, तेलुगू, मलयालम की फिल्मों में छोटी-बड़ी भूमिकाएं निभा रहे विक्रम को हिंदी फिल्मों के दर्शक पहली बार रावण में देखेंगे। मणि रत्नम की नजर में वे बहुत पहले से अटके थे। वे 1994 में बांबे में उनहें मनीषा कोइराला के अपोजिट साइन करना चाहते थे, लेकिन तब विक्रम के बाल लंबे थे, दाढ़ी बढ़ी हुई थी और कद-काठी दुबली थी। विक्रम को बांबे छूटने और मणि रत्नम के साथ काम न कर पाने का अफसोस रहा। उल्लेखनीय है कि तमिल फिल्मों में भी उन्हें आरंभ में बड़ी फिल्में नहीं मिल रही थीं। सरवाइवल के लिए विक्रम ने तमिल फिल्मों में हीरो के रूप में आ रहे दूसरी भाषाओं के एक्टर को आवाज दी। उनकी डबिंग की और स्टारडम के लिए स्ट्रगल करते रहे। लंबे स्ट्रगल के बाद मिली कामयाबी ने उनहें विनम्र बना दिया है। नाम तो उनका विक्रम है, लेकिन स्वभाव और बात-व्यवहार में वे विनम्र और विनोदी हैं। उनका सेंस आफ हयूमर और बातचीत में वन लाइनर याद रह जाता है।

विक्रम ने हिंदी फिल्मों में आने की पहले जोरदार कोशिश नहीं की। कई बार फिल्मों के प्रस्ताव मिले, लेकिन कभी स्क्रिप्ट तो कभी प्रोडक्शन हाउस पसंद न आने की वजह से विक्रम से हिंदी फिल्मों के दर्शक वंचित रहे। वे मजाकिया स्वर में कहते हैं, ''तमिल फिल्मों में बीस साल पहले मेरी एंट्री हुई थी। हिंदी फिल्मों के लिए मैं नया चेहरा हूं, इसलिए बिल्कुल फ्रेश और यंग फील कर रहा हूं। नए एक्टर जैसी ही घबराहट महसूस कर रहा हूं। मालूम नहीं कि हिंदी के दर्शक मुझे कितना पसंद करेंगे? पसंद भी करेंगे या पट से रिजेक्ट कर देंगे।''

रावण की दोहरी भूमिकाओं की चुनौती की बात चलने पर वे बताते हैं, ''निश्चित ही मुश्किल काम था, क्योंकि दोनों ही कैरेक्टर अपने किस्म से इंटेंस और इंपार्टेट हैं। मणि सर दोनों कैरेक्टर की शूटिंग में थोड़ा गैप रखते थे और मुझे तैयार होने का मौका देते थे। हिंदी संस्करण के प्रोमोशन में आप अभिषेक बच्चन को जिस रूप में देख रहे हैं, लगभग वैसा ही रूप तमिल संस्करण में मैंने रखा है। हम दोनों की एक्टिंग स्टाइल का फर्क जरूर दिखेगा। हम सभी लोकेशन पर साथ ही थे, लेकिन मैंने हमेशा यही कोशिश की कि मैं अभिषेक बच्चन को शूट करते हुए नहीं देखूं। यही कोशिश अभिषेक ने भी की। हम दोनों नहीं चाहते थे कि बीरा के अभिनय में हम एक-दूसरे से प्रभावित हों।''

केवल विक्रम और ऐश्वर्या राय ही हिंदी और तमिल दोनों भाषाओं में हैं। ऐश्वर्या राय फिल्म की नायिका हैं। दोनों ही भाषाओं में उन्होंने एक ही किरदार निभाया है, लेकिन उनके सहयोगी कलाकार दोनों भाषाओं में बदल गए हैं। हिंदी में उनके सामने अभिषेक बच्चन हैं तो तमिल में विक्रम हैं। हिंदी में विक्रम सेकेंड लीड देव बने हैं। विक्रम बताते हैं, ''मेरे लिए थोड़ी मुश्किल थी कि तमिल की शूटिंग करते समय ऐश्वर्या के साथ मेरा ऑनस्क्रीन रिलेशन अलग होता था और जब हिंदी वर्सन की शूटिंग करता था तो वह बिल्कुल अलग हो जाता था। मुझे लगता है कि यह ऐश्वर्या राय के लिए भी चुनौती रही होगी कि वे एक ही टाइम फ्रेम में दो अलग-अलग भंगिमाओं में कैसे दिखें? इसके अलावा हम सभी को थोड़ा आराम भी मिल जाता था, लेकिन उन्हें तो हर सीन रिपीट करना पड़ता था। सीन वही रहता था, लेकिन एक्टर बदल जाते थे। भाषा बदल जाती थी।''

विक्रम और ऐश्वर्या राय की केमेस्ट्री की काफी चर्चा है। इस संबंध में पूछने पर वे झेंप जाते हैं और अपने विनोदी अंदाज में बताते हैं, ''बेशक हिंदी मेरे लिए नई लैंग्वेज है, लेकिन रोमांस के लिए जरूरी बाडी लैंग्वेज मेरे लिए नई नहीं है। मैं दक्षिण की भाषाओं में कई फिल्में कर चुका हूं। उनमें हीरोइनों के साथ मेरी जोड़ियां पसंद की गई हैं।''

विक्रम मानते हैं कि मनोरंजन की दुनिया में अब भाषा कोई दीवार नहीं रह गई है। एक्टर नए काम और अनुभव की तलाश में दूसरी भाषाओं की फिल्में कर रहे हैं। उनका मुंबई आकर बसने का कोई इरादा नहीं है। वे भौगोलिक दूरी को बाधा नहीं मानते। भविष्य की योजनाओं के बारे में वे आश्वस्त स्वर में कहते हैं, ''अगर हिंदी फिल्मों के दर्शकों और निर्माताओं को मेरा काम अच्छा लगा और उन्होंने बुलाया तो जरूर हिंदी फिल्में करने आऊंगा। मुंबई में ठहरने का अभी कोई इरादा नहीं है। दक्षिण में मेरे पास हर तरह की फिल्में हैं। मैं सीमित बजट की फिल्में बना रहा हूं, जिनमें यंग एक्टर काम कर रहे हैं!''