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Friday, September 23, 2016

फिल्‍म समीक्षा : बैंजो



मराठी फ्लेवर
-अजय ब्रह्मात्‍मज
मराठी फिल्‍मों के पुरस्‍कृत और चर्चित निर्देशक रवि जाधव की पहली हिंदी फिल्‍म है बैंजो। उन्‍होंने मराठी में बाल गंधर्व,नटरंग और बालक पालक जैसी फिल्‍में निर्देशित की हैं। इनमें से बालक पालक के निर्माता रितेश देशमुख थे। प्रोड्यूसर और डायरेक्‍टर की परस्‍पर समझदारी और सराहना ही बैंजो की प्रेरणा बनी। इसके साथ ही दोनों मराठी हैं। बैंजो के विषय और महत्‍व को दोनों समझते हैं। लेखक-निर्देशक रवि जाधव और एक्‍टर रितेश देशमुख की मध्‍यवर्गीय परवरिश ने बैंजो को फिल्‍म का विषय बनाने में योगदान किया। बैंजो निम्‍न मध्‍यर्गीय वर्ग के युवकों के बीच पॉपुलर सस्‍ता म्‍यूजिकल इंस्‍ट्रूमेंट है। महाराष्‍ट्र के साथ यह देश के दूसरे प्रांतों में भी लोकप्रिय है। मुंबई में में इसकी लोकप्रियता के अनेक कारणों में से सार्वजनिक गणेश पूजा और लंबे समय तक मिल मजदूरों की रिहाइश है। निर्देशक रवि जाधव और निर्माता कृषिका लुल्‍ला को बधाई।
बैंजोकी कहानी कई स्‍तरों पर चलती है। तराट(रितेश देशमुख),ग्रीस(धर्मेश येलांडे),पेपर(आदित्‍य कुमार) और वाजा(राम मेनन) मस्‍ती के लिए बैंजो बजाते हैं। चारों के पेशे अलग-अलग है,लेकिन त्‍योहारों और अवसरों पर उनकी म्‍यूजिकल संगत होती रहती है। संयो से उनके संगीत का एक टुकड़ा न्‍यूयॉर्क पहुंच जाता है। भारतीयू मूल की क्रिस(नरगिस फाखर) उस संगीत की खोज में मुंबई आती है। यहां उसकी मुलाकात तराट से हो जाती है। पहली ही मुलाकात में तराट को क्रिस अच्‍छी लगती है। हिंदी फिल्‍मों में प्रेम का यह फार्मूला कहानी के मूल उद्देश्‍य से भटका देता है। बैजो में भी यही हुआ है। तराट और क्रिस के रोमांटिक ट्रैक में बैंजो का ट्रैक गड्डमड्ड हो गया है। फिर भी रवि जाधव बैंजो बजाने वालों के दर्द और आनंद को पर्दे पर लाने में एक सीमा तक सफल रहते हैं। कहानी में बिल्‍डर,माफिया,करपोरेटर और दूसरे ट्रैक से भी कहानी भटकती है।
रितेश देशमुख पारदर्शी अभिनेता है। परफारमेंस में उनकी ईमानदारी झलकती है। कामेडी और सेक्‍स कामेडी में उनकी प्रतिभा का दुरूपयोग होता रहा है। बैंजो उन्‍हें प्रतिभा प्रदर्शन का बेहतरीन मौका देती है। उन्‍होंने लगन और ऊर्जा के साथ इस किरदार को निभाया है। उनकी मोजूदगी फिल्‍म में मराठी लोकेल और फ्लेवर ले आती है। निर्देशक पर इसे हिंदी फिल्‍म बनाने का दबाव रहा होगा,तभी यह फिल्‍म स्‍थानीय विशेषता के बावजूद बार-बार मेनस्‍ट्रीम सिनेमा के फार्मूले में घुसती है। कलाकारों का सटीक चुनाव फिल्‍म की खासियत है। आदित्‍य कुमार,धर्मेया येलांडे और राम मेनन ने अपने किरदारों को स्‍थनीय रंग और तेवर दिया है। भाष,लहजा और एटीट्यूड में वे अपने किरदारों की खूबियां जाहिर करते हैं। लेखक ने तीनों सहयोगी किरदारों को बराबर अवसर दिए हैं। नरगिस फाखरी को खुद के व्‍यक्तित्‍व से बहुत अलग नहीं जाना था,इसलिए वह भी ठीक लगी हैं।
हिंदी में स्‍थानीय विशेषताओं की फिल्‍में बनती रहनी चाहिए। बैंजो में मुंबई के उस चालीस प्रतिशत बस्‍ती की कहानी है,जहां मेनस्‍ट्रीमा हिंदी फिल्‍मों के कैमरे नहीं जाते हैं। अगर कभी गए भी तो उनके ग्रे शेड ही नजर आते हैं। इस फिल्‍म में शहर की मलिन बस्तियां जिंदगी और जोश से लबरेज हैं। स्‍थानीय फ्लेवर की फिल्‍मों का मेनस्‍ट्रीम सिनेमा के तत्‍वों से उनका कम घालमेल हो तो हम हिंदी सिनेमा का विस्‍तार कर पाएंगे। बैंजो अच्‍छी कोशिश है।
अवधि- 138 मिनट
*** तीन स्‍टार

Wednesday, September 21, 2016

सीक्‍वेल हों गई जिंदगी - रितेश देशमुख




-अजय ब्रह्मात्‍मज
रितेश अभी कोई शूटिंग नहीं कर रहे हैं। उनकी दाढ़ी बढ़ रही है। खास आकार में बढ़ रही है। पूछने पर वह बताते हैं,छोड़ दी है। हां,एक शेप दे रहा हूं। मराठी में छत्रपति शिवाजी महाराज फिल्‍म करने वाला हूं1 उसका लुक टेस्‍ट चलता रहता है। अभी वह फिल्‍म लिखी जा रही है। उस फिल्‍म की स्क्रिप्‍ट पूरी होगी,तभी शूट पर जा सकते हैं। उसमें वीएफएक्‍स वगैरह भी रहेगा। यह मेरी पहली पीरियड फिल्‍म होगी।
रितेश देशमुख की बैंजो आ रही है। मराठी फिल्‍मों के निर्देशक रवि जाधव ने इसे निर्देशित किया है। फिल्‍म में लाल रंग मुखर है। रितेश वजह बताते हैं, फिल्‍म में पहले पानी का इस्‍तेमाल होना था। महाराष्‍ट्र में सूखे की वजह से उसे हम ने गुलाल में बदल दिया। पोस्‍टर और प्रोमो में गुलाल का वही लाल रंग दिख रहा है। बैंजो एक ऐसा इंस्‍ट्रुमेंट है कि उसकी धुन पर लोग थिरकने लगते हैं। उल्‍लास छा जाता है। त्‍योहारों और खुशी के मौकों पर यह बजाया जाता है। बैंजो बजाने वाले भी रंगीन और खुश मिजाज के होते हैं।
निर्देशक रवि जाधव के साथ रितेश देशमुख का पुराना संपर्क रहा है। दोनों मराठी हैं। इसके अलावा रवि जाधव ने रितेश देशुमख के निर्माण में बनी मराठी फिल्‍म बालक पालक का निर्देशन किया था। लंबे समय से दोनों साथ में काम करने के इच्‍छुक थे। बैंजो का संयोग बना तो रितेश राजी हो गए। रितेश कहते हैं, यह यूनिक स्‍टोरी है। हिंदी फिल्‍मों में मुझे ऐसा किरदार नहीं मिला है। और फिर रवि पर भरोसा है। वह मुझे समझते हैं। एक अंतराल के बाद आप मुझे कुछ अलग करते देखेंगे।
रितेश को अपनी कामेडी या सेक्‍स कामेडी फिल्‍मों का अफसोस नहीं है। वे स्‍वीकार करते हैं कि उनमें से कुछ अच्‍छी बनीं और कुछ दर्शकों को अधिक पसंद नहीं आईं। वे समझाते हैं, हमारी इंडस्‍ट्री में यह चलन है कि अगर कोई एक्‍टर किसी एक रोल में जंच जाता है तो उसे वैसे ही रोल मिलने लगते हैं। एक अजीब चक्र बन जाता है। सीक्‍वल आने लगते हैं। एक्‍टर उसी में बिजी हो जाता है। मेरी अनेक फिल्‍मों के दो-तीन सीक्‍वल बन चुके हैं। मेरा चालीस प्रतिशत करिआ तो सीक्‍वल में ही निकल गया है। कभी एक विलेन जैसी फिल्‍मों से राहत मिलती है। कभी लेई भारी आ जाती है। मैं बैंजो को भी वैसी ही अलग फिल्‍म के तौर पर देख रहा हूं।
बैंजो को लकर रितेश काफी उत्‍साहित हैं। वे अपने किरदार और फिल्‍म के बारे में बताते हैं, मेरे किरदार का नाम तराट है। तराट मतलब बेवड़ा...शराबी। वह एंग्री है। एटीट्यूड में रहता है। रंगीनमिजाज और म्‍यूजिकल है। मुझे पूरा भरोसा है कि यह पसंद आएगी,क्‍योंकि यह यूनिक है। ज्‍यादातर लोअर मिडिल क्‍लास से आए युवक ही बैंजो बजाते हैं। अभी तो बड़े स्‍केल पर बैंड ग्रुप बन गए हैं,जिमें बैंजो के साथ और भी इंस्‍ट्रुमेंट रहते हैं1 अभी फ्यूजन हो चुका है। पहले ज्‍यादातर गरीब तबके लोग ही बैंजो अपनाते और बजाते थे। इस फिलम की बात करें तो नरगिस फाखरी का किरदार बैंजो का एक म्‍यूजिकल पीस सुन कर ल्‍यूयार्क से मुंबई आती है। वह उसके बारे में पता करना चाहती है। यहां आने पर वह तराट से मिलती है। तराट उसे बता नहीं रहा कि वह म्‍यूजिकल पीस उसी का बजाया हुआ है। उसे लगता है कि बैंजो से इज्‍जत कम होती है1 पता चलना पर वह उसे छोड़ देगी। और फिर ड्रामा,दिक्‍कतें,मुंबई की जिंदगी आदि बहुत कुछ है। बैंजो स्‍ट्रीट म्‍यूजिसियन को आवाज देता है। उन्‍हें प्‍लेटफार्म देता है।
रवि जाधव मराठी संस्‍कृति और भाषा के जानकार है। क्‍या उनकी यह फिल्‍म हिंदी में मराठी फ्लेवर लेकर आएगी? रितेश स्‍पष्‍ट करते हैं, फिल्‍म की पृष्‍ठभूमि मुंबई की है। यहां का कास्‍मोपोलिटन मिजाज है। फिल्‍म में एक इमोशन है,जो चार लड़कों और एक लड़की के बीच की कहानी है। फ्लेवर तो रहेगा,लेकिन वह मराठी नहीं होकर मुंबइया होगा। मैं जल्‍दी ही निशिकांत कामथ के साथ मराठी फिल्‍म मावली आरंभ करूंगा। रितेश जोर देकर कहते हैं,मैं जिस इलाके से आता हूं,वहां की भाषा से खास लगाव है। मैं मराठी हूं। हिंदी के बाद मराठी में काम करने की इच्‍छा थी। वह भी किया। आगे भी करता रहूंगा। जहां की मेरी पैदाइश है,वहां का तो हक बनता है। मैं मराठी स्‍पेस को अच्‍छी तरह समझता हूं। मेरी पत्‍नी जेनिलिया ने मुझे इंस्‍पायर किया। उसने इतनी सारी भाषाओं में फिल्‍में की हैं।

Friday, June 27, 2014

फिल्‍म समीक्षा : एक विलेन

एंग्री यंग मैन की वापसी 
 -अजय ब्रमात्‍मज 
 गणपति और दुर्गा पूजा के समय मंडपों में सज्जाकार रंगीन रोशनी, हवा और पन्नियों से लहकती आग का भ्रम पैदा करते हैं। दूर से देखें या तस्वीर उतारें तो लगता है कि आग लहक रही है। कभी पास जाकर देखें तो उस आग में दहक नहीं होती है। आग का मूल गुण है दहक। मोहित सूरी की चर्चित फिल्म में यही दहक गायब है। फिल्म के विज्ञापन और नियोजित प्रचार से एक बेहतरीन थ्रिलर-इमोशनल फिल्म की उम्मीद बनी थी। इस विधा की दूसरी फिल्मों की अपेक्षा 'एक विलेन' में रोमांच और इमोशन ज्यादा है। नई प्रतिभाओं की अभिनय ऊर्जा भी है। रितेश देशमुख बदले अंदाज में प्रभावित करते हैं। संगीत मधुर और भावपूर्ण है। इन सबके बावजूद जो कमी महसूस होती है, वह यही दहक है। फिल्म आखिरी प्रभाव में बेअसर हो जाती है।
नियमित रूप से विदेशी फिल्में देखने वालों का 'एक विलेन' में कोरियाई फिल्म 'आई सॉ द डेविलÓ की झलक देख सकते हैं। निस्संदेह 'एक विलेन' का आइडिया वहीं से लिया गया है। उसमें प्रेम और भावना की छौंक लगाने के साथ संगीत का पुट मिला दिया गया है। जैसे कि हम नूडल्स में जीरा और हल्दी डाल कर उसे भारतीय बना देते हैं या इन दिनों चाइनीज भेल खाते हैं, वैसे ही 'एक विलेन' कोरियाई फिल्म का भारतीय संस्करण बन जाती है। चूंकि इस फिल्म के निर्माता ने मूल फिल्म के अधिकार नहीं लिए है, इसलिए ग्लोबल दौर में 'एक विलेन' क्रिएटिव नैतिकता का भी शिकार होती है। हर देश और भाषा के फिल्मकार दूसरी फिल्मों से प्रेरित और प्रभावित होते हैं। कहा ही जाता है कि मूल का पता न चले तो आप मौलिक हैं।
'एक विलेन' मुख्य रूप से गुरु की कहानी है। आठवें और नौवें दशक की हिंदी फिल्मों में ऐ किरदार का नाम विजय हुआ करता था। तब परिवार के कातिलों से बदला लेने में पूरी फिल्म खत्म हो जाती थी। अब ऐसे ग्रे शेड के नायक की कहानी आगे बढ़ती है। सिल्वर स्क्रीन पर अपनी वापसी में एंग्री यंग मैन कुछ और भी करता है। बदला लेने और अपराध की दुनिया में रमने के बाद उसकी जिंदगी में एक लड़की आयशा आती है। आयशा प्राणघातक बीमारी से जूझ रही है। अपनी बची हुई जिंदगी में वह दूसरों की जिंदगी में खुशियां लाना चाहती है। उसे अपने एक काम के लिए गुरु उचित लगता है। इस सोहबत में दोनों का प्रेम होता है। गुरु अपराध की जिंदगी को तिलांजलि दे देता है। वह 9 से 5 की सामान्य जिंदगी में लौटता है, तभी मनोरोगी राकेश के हिंसक व्यवहार से वह फिर से एक बदले की मुहिम में निकल पड़ता है और मोहित सूरी की रोमांचक फिल्म आगे-पीछे की परतों का उजागर करती हुई बढ़ती है।
श्रद्धा कपूर निर्भीक और अकलुष आयशा के किरदार में सहज और स्वाभाविक हैं। मोहित ने उन्हें मुश्किल इमोशन नहीं दिए हैं। मौत के करीब पहुंचने के दर्द और जीने की चाहत के द्वंद्व को श्रद्धा ने व्यक्त किया है। अपनी सुंदर ख्वाहिशों में वह गुरु को बेहिचक शामिल कर लेती है। गुरु के रुप में सिद्धार्थ मल्होत्रा को ठहराव से भरे दृश्य मिले हैं। उन्होंने उन दृश्यों को बखूबी निभाया है। नई पीढ़ी के कलाकारों में सिद्धार्थ दमदार तरीके से अपनी मौजूदगी दर्ज कर रहे हैं। 'एक विलेन' अभिनेता रितेश देशमुख की प्रतिभा के अनदेखे पहलू को सामने ले आती है। वे मनोरोगी और सीरियल किलर के मानस और भाव को पर्दे पर लाने में सफल रहे हैं। तीनों मुख्य कलाकार अपनी भूमिकाओं में जंचते हैं। अगर फिल्म की पटकथा में दहक होती तो 'एक विलेन' इस साल की खास फिल्म हो जाती।
गीत-संगीत में निर्देशक,गीतकार और संगीतकार की मेहनत झलकती है। मिथुन, मनोज मुंतशिर और अंकित तिवारी के शब्द और ध्वनियों में फिल्म के किरदारों का अधूरेपन और टुकड़ा-टुकड़ा जिंदगी को अभिव्यक्ति मिली है। हालांकि संगीत पर आज के दौर का भरपूर असर है,लेकिन शब्दों में संचित उदासी-उम्मीद और निराशा-आशा फिल्म के कथ्य को सघन करती है। निर्देशक ने गीत-संगीत का सार्थक उपयोग किया है।
अवधि: 129 मिनट
*** तीन स्‍टार 

Friday, June 20, 2014

फिल्‍म समीक्षा : हमशकल्‍स

-अजय ब्रह्मात्‍मज
साजिद खान की 'हमशकल्स' वास्तव में हिंदी फिल्मों के गिरते स्तर में बड़बोले 'कमअकल्स' के फूहड़ योगदान का ताजा नमूना है। इस फिल्म में पागलखाने के नियम तोडऩे की एक सजा के तौर पर साजिद खान की 'हिम्मतवाला' दिखायी गयी है। भविष्य में कहीं सचमुच 'हमशकल्स' दिखाने की तजवीज न कर दी जाए। साजिद खान जैसे घनघोर आत्मविश्वासी इसे फिर से अपनी भूल मान कर दर्शकों से माफी मांग सकते हैं, लेकिन उनकी यह चूक आम दर्शक के विवेक को आहत करती है। बचपना और बचकाना में फर्क है। फिल्मों की कॉमेडी में बचपना हो तो आनंद आता है। बचकाने ढंग से बनी फिल्म देखने पर आनंद जाता है। आनंद जाने से पीड़ा होती है। 'हमशकल्स' पीड़ादायक फिल्म है।
साजिद खान ने प्रमुख किरदारों को तीन-तीन भूमिकाओं में रखा है। तीनों हमशकल्स ही नहीं, हमनाम्स भी हैं यानी उनके एक ही नाम हैं। इतना ही नहीं उनकी कॉमेडी भी हमशक्ली है। ये किरदार मौके-कुमौके हमआगोश होने से नहीं हिचकते। डायलॉगबाजी में वे हमआहंग (एक सी आवाजवाले) हैं। उनकी सनकी कामेडी के हमऔसाफ (एकगुण) से खिन्नता और झुंझलाहट बढ़ती है। 'हमशकल्स' में कलाकारों और निर्माता-निर्देशक की हमखयाली और हमखवासी से कोफ्त हो सकती है। हिंदी फिल्मों के ये हमजौक और हमजल्सा हुनरबाज हमदबिस्तां(सहपाठी) लगते हैं। सच कहूं तो उन्हें दर्शकों से कोई हमदर्दी नहीं है। इस मायने में साजिद खान की हमशीर (बहन) फराह खान ज्यादा काबिल और माकूल डायरेक्टर हैं। फिर भी साजिद खान की हमाकत (मूर्खता) देखें कि उन्होंने इस फिल्म को किशोर कुमार और जिम कैरी जैसे हुनरमंद कलाकारों को समर्पित किया है और परोसा है कॉमेडी के नाम पर फूहड़ मनोरंजन। भला किशोर कुमार और साजिद खान मनोरंजन के हमरंगी हो सकते हैं?
'हमशकल्स' में सैफ अली खान, रितेश देशमुख और राम कपूर हैं। इन तीनों में केवल रितेश देशमुख अपनी काबिलियत से सुकून देते हैं। यहां तक कि लड़कियों का रूप धारण करने पर भी तीनों में केवल वही अपने नाज-ओ-अंदाज से लड़कीनुमा लगते हैं। सैफ अली खान ने पहली बार ऐसी कॉमेडी की है। अफसोस कि उन्हें केवल जीभ निकालने और पुतलियों को नाक के समीप लाना ही आता है। चेहरे पर उम्र तारी है। उनके लिए बच्चा, कुत्ता, समलैंगिक और लड़की बनना भी भारी है। मार्के की बात है कि किसी भी स्थिति-परिस्थिति में उनके बाल नहीं बिगड़ते। राम कपूर का इस्तेमाल इनकी प्रतिभा से अधिक डीलडौल के लिए हुआ है। बिकनी में वे बर्दाश्त के बाहर हो गए हैं। फिल्म की अभिनेत्रियां साजिद खान की अन्य फिल्मों की तरह केवल नाच-गाने और देहदर्शन के लिए हैं। तमन्ना भाटिया, ईशा गुप्ता और बिपाशा बसु को कुछ दृश्य और संवाद भी मिल गए हैं। फिल्म पूरी होने के बाद बिपाशा बसु का एंड प्रोडक्ट से क्यों मोहभंग हुआ था? उनके बयान का औचित्य समझ में नहीं आता। फिल्म शुरुआत से अंत तक निकृष्ट है। यह बात तो शूटिंग आरंभ होते ही समझ में आ गई होगी। बहरहाल, इस निम्नस्तरीय फिल्म में भी कॉमेडी के नाम पर दी गई घटिया हरकतों के बावजूद सतीश शाह की मौजूदगी तारीफ के काबिल है।
इतना ही नहीं। यह फिल्म 159 मिनट से अधिक लंबी है। बेवकूफियों का सिलसिला खत्म ही नहीं होता। हंसी लाने की कोशिश में गढ़े गए लतीफों और दृश्य मुंबइया भाषा में दिमाग का दही करते रहते हैं। दर्शकों के दिमाग के साथ धैर्य की भी परीक्षा लेती है 'हमशकल्स'। अगर आप नीली दवा पीकर आदमी के भौंकने और कुत्तों जैसी हरकतें करने पर बार-बार हंस सकते हैं, बड़ों के बच्चों जैसे तुतलाने पर मुस्कराने लगते हों और दो दृश्यों के बीच कोई संबंध या तर्क न खोजते हों तो आप 'हमशकल्स' देख सकते हैं। अन्यथा मनोरंजन के नाम पर तिगुना उत्पीडऩ हो सकता है।
अवधि-159 मिनट
* एक स्‍टार

Monday, June 16, 2014

टाइमिंग का कमाल है कामेडी -रितेश देशमुख


-अजय ब्रह्मात्मज
    अभिनेता रितेश देशमुख मराठी फिल्मों के निर्माता भी हैं। इस साल उन्हें बतौर निर्माता राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला है। हिंदी में बतौर अभिनेता उनकी दो फिल्में ‘एक विलेन’ और ‘हमशकल्स’ आ रही है। सृजन के स्तर पर उनका दो व्यक्तित्व नजर आता है। यहां उन्हें अपने व्यक्तित्व के दो पहलुओं पर बातें की हैं।
- निर्माता और अभिनेता के तौर पर आपका दो व्यक्तित्व दिखाई पड़ता है? बतौर निर्माता आप मराठी में गंभीर और संवेदनशील फिल्में बना रहे हैं तो अभिनेता के तौर पर बेहिचक चालू किस्म की फिल्में भी कर रहे हैं। इन दोनों के बीच संतुलन और समझ बनाए रखना मुश्किल होता होगा?
0 बतौर निर्माता जब मैं ‘बालक पालक’, ‘येलो’ और ‘लेई भारी’ का निर्माण करता हूं तो उनके विषय मेरी पसंद के होते हैं। मैं तय करता हूं कि मुझे किस तरह की फिल्में बनानी है। वहां सारा फैसला मेरे हाथ में होता है। जब फिल्मों में अभिनय करता हूं तो वहां विषय पहले से तय रहते हैं। स्क्रिप्ट लिखी जा चुकी होती है। उनमें जो रोल मुझे ऑफर किया जाता है उन्हीं में से कुछ मैं चुनता हूं। हां, अगर जैसी फिल्मों का मैं निर्माण करता हूं, वैसी ही फिल्में मुझे ऑफर हों तो जरूर करूंगा। निजी तौर पर मुझे वैसी फिल्में पसंद हैं। दर्शक जिन फिल्मों में मुझे देख रहे हैं वे फिल्में मुझे दी गई हैं। अभी मैं हिंदी फिल्में बनाने की स्थिति में नहीं हूं। कल को संभव हुआ तो हिंदी में भी ‘बालक पालक’ जैसी फिल्में बनाऊंगा।
- क्या मान लिया जाए कि आपका एक्टिंग करिअर आपकी पसंद से नहीं चल रहा है?
0 ना ना ़ ़ ़ मैं अपनी पसंद की ही फिल्में चुनता हूं। मुझे जो दस फिल्में मिलती हैं उनमें से ही एक चुनता हूं। वह एक मेरी पसंद होती है। समस्या यह है कि कोई एक फिल्म चल जाती है तो उसी तरह की फिल्में मिलने लगती है। ‘हमशकल्स’ के पहले मैंने जो चार कामेडी फिल्में की हैं वे सभी सिक्वल हैं। उनमें मुझे रहना ही था। कायदे से देखें तो मैंने कोई नई फिल्म की ही नहीं है। ‘हमशकल्स’ उस लिहाज से ‘तेरे नाल लव हो गया’, ‘एक विलेन’ और ‘हमशकल्स’ नई फिल्में हैं। ‘एक विलेन’ जैसी फिल्म आती है तो कुछ अलग करने का अहसास होता है। एक्सेल प्रोडक्शन के लिए करण अंशुमान के लिए ‘बैंगिस्तान’ करूंगा। यह आतंकवाद पर सटायर है।
- ‘एक विलेन’ में आप अलग रूप में नजर आ रहे हैं?
0 पिछले कुछ सालों से नया ट्रेंड आया है कि स्टार को उसकी इमेज से अलग रोल और फिल्म दो। कोशिश रहती है कि एक्टर नए अंदाज और रूप में दिखे। हम कलाकारों के लिए यह अच्छा समय है। गोविंदा जैसे अभिनेता भी डार्क रोल कर रहे हैं।
- आप स्वभाव से विनोदी हैं या फिल्में करते-करते ऐसा स्वभाव बन गया है?
0 यह क्रिकेट की तरह होता है। आप जितनी अधिक प्रैक्टिस करेंगे आपकी टाइमिंग उतनी अच्छी होती जाएगी। जन्मजात तो कुछ भी नहीं होता। हम सभी में प्रतिभा रहती है। अभ्यास और व्यवहार से हम निखरते हैं। सभी कलाकारों की टाइमिंग अलग-अलग होती है। ह्यूमर की बेसिक समझ रहती है। लतीफे का पंच मालूम होना चाहिए। अलग-अलग डायरेक्टर और एक्टर के साथ काम करने के बाद उनके साथ टाइमिंग मैच करनी होती है। मैं अच्छा ऑबजर्वर हूं। उनसे सीखने की कोशिश करता हूं। कामेडी, टाइमिंग और जोक्स। सही समय पर हो तो असरदार होता है।
- पुराने कलाकारों में आप किन्हें पसंद करते हैं?
0 किशोर कुमार, महमूद, कादर खान, संजीव कुमार और गोविंदा ... इन सभी की टाइमिंग अलग-अलग है। अप्रोच अलग है। महमूद साहब की एक्टिंग इन योर फेस होती थी। उनके सामने हीरो भी घबराते थे। किशोर दा की एनर्जी गजब की थी। वे कामेडी परफार्म करते थे। आपका ध्यान खींच लेते थे। उनके ठीक विपरीत संजीव कुमार थे। संपूर्ण अभिनेता। उनके चेहरे पर कोई भाव नहीं रहता था, लेकिन अपनी शैली से वे हंसा देते थे।
- क्या ह्यूमर और कामेडी का सांस्कृतिक और भाषायी आधार होता है?
0 बिल्कुल होता है। कोई भी सिचुएशन युनिवर्सल हो सकती है, लेकिन उसका ट्रीटमेंट, पंचलाइन और डायलॉग संस्कृति और भाषा विशेष से तय होगा। केले के छिलके पर फिसलकर किसी भी देश में लोग गिरें तो आप हंसेंगे। बस प्रतिक्रिया की भाषा अलग होगी। यह सिटकॉम हुआ।
- साहित्य में हास्य और विनोद का राजनीतिक दृष्टिकोण भी रहता है। क्या फिल्मों में ऐसा नहीं हो सकता?
0 हो सकता है। इस तरफ हमारे फिल्मकारों का अभी ध्यान नहीं गया है। राजनीतिक व्यंग्य बहुत ही प्रभावशाली हो सकता है। शायद हम लिख नहीं पा रहे हैं। अगर कुछ लिख भी रहे हैं तो उसके मुताबिक फिल्म नहीं बन पा रही है। ऐसी छोटी-मोटी सफल कोशिशें चल रही हैं। उन्हें दर्शक पसंद भी कर रहे हैं। मेरी फिल्म ‘बैंगिस्तान’ धर्म और आतंकवाद पर सटायर है।

Saturday, July 28, 2012

फिल्‍म समीक्षा : क्‍या सुपर कूल हैं हम

फूहड़ एडल्ट कामेडी
-अजय ब्रह्मात्‍मज
सचिन यार्डी की क्या सुपर कूल हैं हम अपने उद्देश्य में स्पष्ट है। उन्होंने घोषित रूप से एक एडल्ट कामेडी बनाई है। एडल्ट कामेडी के लिए जरूरी नटखट व्यवहार,द्विअर्थी संवाद,यौन उत्कंठा बढ़ाने के हंसी-मजाक और अश्लील दृश्य फिल्म में भरे गए हैं। उनके प्रति लेखक-निर्देशक ने किसी प्रकार की झिझक नहीं दिखाई है। पिछले कुछ सालों में इस तरह की फिल्मों के दर्शक भी तैयार हो गए हैं। जस्ट वयस्क हुए युवा दर्शकों के बीच ऐसी फिल्मों का क्रेज किसी लतीफे के तरह प्रचलित हुआ है। संभव है ऐसे दर्शकों को यह फिल्म पर्याप्त मनोरंजन दे।
आदि और सिड संघर्षरत हैं। आदि एक्टर बनना चाहता है और सिड की ख्वाहिश डीजे बनने की है। दोनों अपनी कोशिशों में लगातार असफल हो रहे हैं। कुछ सिक्वेंस के बाद उन्हें अपनी फील्ड में स्ट्रगल की परवाह नहीं रहती। वे लड़कियों के पीछे पड़ जाते हैं। लेखक-निर्देशक उसके बाद से उनके प्रेम की उच्छृंखलताओं में रम जाते हैं। वही इस फिल्म का ध्येय भी है। क्या सुपर कूल हैं हम में स्तरीय कामेडी की उम्मीद करना फिजूल है। फूहड़ता और द्विअर्थी संवादों की झड़ी लगी रहती है। फिल्म के दो नायकों से बात नहीं बनती तो 3जी बाबा के रूप में चंकी पांडे और सनकी बिजनेशमैन मार्लो के रूप में अनुपम खेर को लाया जाता है। मार्लो का नाम हमेशा मारलो पुकारा जाता है। एडल्ट कामेडी के नाम पर नामों के उच्चारण तक में अश्लीलता लाई गई है। फिल्म की संरचना एपिसोडिक रखी गई है। कोशिश है कि हर एपिसोड में हंसने का पर्याप्त मसाला मिले।
फिल्म में रोहित शेट्टी और सुनीता मेनन को रियल किरदारों की तरह दिखाने का अनोखा प्रयास है। दोनों अपनी भूमिकाओं को निभा ले जाते हैं और गरिमा बनाए रखते हैं। तुषार कपूर और रितेश देशमुख ने अपने चरित्रों को बेधड़क तरीके से निभाया है। उन्हें ऊलजलूल हरकतें करने,कपड़े उतारने और चढ्डी सरकाने में शर्म नहीं महसूस होती है। यह नए प्रकार की एक्टिंग है। दोनों अपने चरित्रों को पूरे आत्मविश्वास से निभाते हैं। अनुपम खेर और चंकी पांडे की फूहड़ता दिखाई देती है। नेहा शर्मा और सारा जेन डायस की भूमिकाएं दोनों नायकों के साथ दर्शकों की उत्तेजना बनाए रखने की है। उन्हें वैसे ही दृश्य और कपड़े दिए गए हैं।
फिल्म का गीत-संगीत भी थीम के अनुकूल है। निरर्थक शब्दों को तेज धुनों के साथ पेश कर संगीत का रोमांच पैदा किया गया है,जिसे दोनों मुख्य कलाकार बेशर्मी के साथ पर्दे पर नृत्य की अदाओं में जाहिर करते हैं।
**1/2 ढाई स्टार

Saturday, February 25, 2012

फिल्‍म समीक्षा : तेरे नाल लव हो गया

रियल प्रेमियों का रील रोमांस-अजय ब्रह्मात्‍मज

मनदीप कुमार की फिल्म तेरे नाल लव हो गया की शूटिंग के दरम्यान जेनेलिया का सरनेम डिसूजा ही था। फिल्म के पर्दे पर वह जेनेलिया देशमुख के नाम से आई हैं। दस सालों के रोमांस के बाद रितेश देशमुख और जेनेलिया डिसूजा ने फिल्म की रिलीज के पहले शादी कर ली। रियल लाइफ प्रेमी को उनकी रियल शादी के तुरंत बाद पर्दे पर देखते समय सहज कौतूहल हो सकता है कि पर्दे पर दोनों की केमिस्ट्री कैसी है? हिंदी फिल्मों की प्रेमकहानी के आलोचक मानते हैं कि पर्दे पर नायक-नायिका अंतरंग दृश्यों में भी एक दूरी बनाए रखते हैं। वह दूरी ही प्रेमहानी का प्रभाव कम कर देती है।

तेरे नाल लव हो गया देखते समय ऐसे आलोचकों की धारणा दूर हो सकती है। रितेश देशमुख और जेनेलिया डिसूजा के बीच किसी किस्म की दूरी नहीं है। दोनों ही एक-दूसरे को सपोर्ट करते हैं और पर्दे पर प्रेमियों की अंतरंगता जाहिर करते हैं। तेरे नाल लव हो गया की यह खूबी उसे विशेष बना देती है। पंजाब-हरियाणा के आसपास पूरी कहानी घूमती है। वीरेन को अपने पिता का गैरकानूनी धंधा नहीं भाता।

वह ईमानदारी से पैसे कमा कर अपनी टूरिस्ट कंपनी खोलना चाहता है। वह भट्टी के यहां ऑटो चलाता है। एक दिन वह अपना सपना भट्टी से शेयर करता है। भट्टी उसके सपने को अपना बना लेता है। वीरेन अपने सपने के चकनाचूर होने पर दोस्तों क उकसावे पर आकर भट्टी से भिड़ जाता है। उसी समय भट्टी की बेटी मिनी की अनचाही सगाई हो रही होती है। मिनी वहां मचे हड़बोंग में वीरेन से खुद का अगवा करा लेती है। यहां से शुरू कहानी अगना होकर वीरेन केगांव उसे पिता चौधरी के पास पहुंचती है। उसके बाद इमोशन,कंफ्यूजन और चौधरी की ललकार का ड्रामा चलता है। ईमानदार और सच्चा वीरेन खुद को कायर कहलाना पसंद नहीं करता। वह पहली और आखिरी बार पिता के अगवे के धंधे पर अमल करता है। वह मिनी से शादी कर उसे अगवा कर लेता है।

इस रोमांटिक कामेडी में मनदीप कुमार ने हिंदी फिल्मों के आजमाए पुराने फार्मूले पर ही अमल किया है,इसलिए संभावनाओं और मुख्य कलाकारों के सहयोग के बाद भी फिल्म साधारण ही रह जाती है। रितेश और जेनेलिया अपने रोल में परफेक्ट हैं। लंबे समय के बाद ओम पुरी में संजीदगी नजर आती है। मिनी के मंगेतर बने कलाकार का काम अच्छा है। गूंगे चाचा की मौजूदगी भी याद रहती है। इस फिल्म में ग्रामीण परिवेश को निर्देशक ने अच्छी तरह से फिल्म में उकेरा है। बार-बार यह लगता है कि फिल्म अभी उठेगी,लेकिन हर बार उम्मीद पर परनी फिर जाता है।

**1/2 ढाई स्टार

Tuesday, November 3, 2009

फिल्‍म समीक्षा: अलादीन

फैंटैसी से सजी है अलादीन
-अजय ब्रह्मात्‍मज

अलादीन और उसके जादुई चिराग का जिन्न हिंदी फिल्मों में आए तो हिंदी फिल्मों की सबसे बड़ी समस्या प्यार में उलझ गए। लड़के और लड़की का मिलन हिंदी फिल्मों की ऐसी समस्या है, जो हजारों फिल्मों के बाद भी जस की तस बनी हुई है। हर फिल्म में यह समस्या नए सिरे से शुरू होती है। अलादीन को जिन्न मिलता है, लेकिन अलादीन की तीन इच्छाएं प्रेम तक ही सीमित हैं- जैसमीन, जैसमीन और जैसमीन। अलादीन को जैसमीन से मिलाने में ही जिन्न का वक्त निकलता है। बीच में थोड़ी देर के लिए खलनायक रिंग मास्टर आता है।

सुजॉय घोष ने अलादीन और उसके जिन्न को लेकर आधुनिक फैंटेसी गढ़ी है। इस फैंटैसी में स्पेशल इफेक्ट का सुंदर और उचित उपयोग किया गया है। काल्पनिक शहर ख्वाहिश और उसका विश्वविद्यालय भव्य हैं। इस शहर में ऐसा लगता है कि मुख्य रूप से स्टूडेंट ही रहते हैं, क्योंकि शहर की गलियों में दूसरे चरित्र नहीं दिखाई पड़ते। हां, डांस सीन हो, पार्टी हो या नाच-गाना हो तो अचानक सैकड़ों जन आ जाते हैं। फैंटेसी फिल्म है, इसलिए कुछ भी संभव है। ऊपर से हिंदी फिल्म की फैंटेसी है तो लेखक-निर्देशको हर तरह की छूट लेने की आजादी है। सुजॉय घोष ने आजादी लेकर रोचक तरीके से फिल्म बनाई है।

अलादीन स्पेशल इफेक्ट, जिन्न की जादूगरी और अलादीन चटर्जी के भोलेपन के कारण बच्चों को अच्छी लग सकती है। वयस्क दर्शकों के लिए यह फिल्म अनर्गल और अनुचित हो सकती है, लेकिन बच्चों को अलादीन और जिन्न की अतार्किक कहानी और फैंटेसी में सृजित दुनिया भा सकती है। किरदारों का चमत्कारिक व्यवहार बाल दर्शकों को ज्यादा पसंद आता है। अलादीन में कामिक्स के तत्व हैं। खास कर अमिताभ बच्चन और संजय दत्त की वेशभूषा और स्टाइल अच्छी लगती है। अमिताभ बच्चन के मसखरे अंदाज में एक मस्ती रहती है। हम देखते हैं कि उनकी उम्र सहज हास्य में आड़े नहीं आई है।

इस फिल्म में रितेश देशमुख अपने भोलेपन से प्रभावित करते हैं। उनके चेहरे में एक मासूमियत है, जो लगातार हास्य किरदारों को निभाने की वजह से अपने प्रति दर्शकों की सहानुभूति गढ़ लेती है। इस फिल्म में वह अकेले नायक हैं। हालांकि उन्हें अमिताभ बच्चन और संजय दत्त का साथ मिला है, लेकिन अपने दृश्यों को उन्होंने उचित तरीके से निभाया है।

अलादीन में स्पेशल इफेक्ट प्रभावशाली है और बताता है कि हम तकनीकी रूप से कितना आगे बढ़ चुके हैं। कहीं भी झटका नहीं लगता। कुछ भी नकली नहीं लगता। सुजॉय की तकनीकी टीम ने उत्कृष्ट काम किया है।


Friday, June 20, 2008

दे ताली: उलझी कहानी

-अजय ब्रह्मात्मज
प्रचार के लिए बनाए गए प्रोमो धोखा भी देते हैं। दे ताली ताजा उदाहरण है। इस फिल्म के विज्ञापनों से लग रहा था कि एक मनोरंजक और यूथफुल फिल्म देखने को मिलेगी। फिल्म में मनोरंजन तो है, लेकिन कहानी के उलझाव में वह उभर नहीं पाता। ईश्वर निवास के पास मिडिल रेंज के ठीक-ठाक एक्टर थे, लेकिन उनकी फिल्म साधारण ही निकली। दे ताली देखकर ताली बजाने का मन नहीं करता।
तीन दोस्तों अमु, अभी और पगलू की दोस्ती और उनके बीच पनपे प्यार को एक अलग एंगल से रखने की कोशिश में ईश्वर निवास कामयाब नहीं हो पाए। दोस्ती और प्रेम की इस कामिकल कहानी में लाया गया ट्विस्ट नकली और गढ़ा हुआ लगता है। साथ-साथ रहने के बावजूद एक-दूसरे के प्रति मौजूद प्यार को न समझ सकने के कारण सारी गलतफहमियां होती हैं। इन गलतफहमियों में रोचकता नहीं है।
ईश्वर निवास ने शूल जैसी फिल्म से शुरुआत की थी, लेकिन उसके बाद की अपनी फिल्मों में वह लगातार निराश कर रहे हैं। या तो उन्हें सही स्क्रिप्ट नहीं मिल पा रही है या कुछ बड़ा करने के चक्कर में वह फिसल जा रहे हैं। दे ताली जैसी फिल्म की कल्पना उनकी सीमाओं को जाहिर कर रही है। कुछ नया करने से पहले उन्हें अपनी सारी फिल्में एक बार देख लेनी चाहिए ताकि, वह उनकी भूलों से भविष्य में बच सकें।
अभिनेताओं में केवल रितेश देशमुख ही संतुष्ट करते हैं। उन्होंने अपने किरदार को पूरी ईमानदारी से निभाया है। आफताब शिवदासानी और रिम्मी सेन को किरदार अच्छे मिले थे, लेकिन उन्हें पर्दे पर उतारने में उनकी संजीदगी नजर नहीं आती। आयशा टाकिया में ग्लैमर है। मुस्कुराना, नृत्य करना या होंठ दिखाना ही एक्टिंग है तो आयशा टाकिया जबरदस्त एक्ट्रेस हैं। फिल्म के गीत-संगीत में दम है, लेकिन फिल्म में उसका उचित उपयोग नहीं हो पाया है। फिल्म खत्म होने के बाद गीत देने का चलन निर्माता-निर्देशक की फिजूलखर्ची ही है। दर्शक थिएटर से निकलने की हड़बड़ी में ऐसे गीत का आनंद नहीं उठा पाते।