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Wednesday, September 20, 2017

रोज़ाना : जितनी बची है,बचा लो विरासत



रोज़ाना
जितनी बची है,बचा लो विरासत
-अजय ब्रह्मात्‍मज
पिछले दिनों राज कपूर निर्मित आरके स्‍टूडियो में भीषण आग लगी। अभी तक कोई ठोस और आधिकारिक विवरण नहीं आया है कि इस आग में क्‍या-क्‍या स्‍वाहा हो गया? स्‍वयं ऋषि कपूर ने जो ट्वीट किया,उससे यही लगता है कि राज कपूर की फिल्‍मों से जुड़ी यादें आग की चपेट में आ गईं। उन्‍होंने ट्वीट किया था कि स्‍टूडियो तो फिर से बन जाएगा,लेकिन आरके फिल्‍म्‍स की फिल्‍मों से जुड़ी स्‍मृतियों और कॉस्‍ट्यूम की क्षति पूरी नहीं की जा सकती। ऋषि कपूर बिल्‍कुल ने सही लिखा। कमी यही है कि कपूर परिवार के वारिसों ने स्‍मृतियों के रख-रखाव का पुख्‍ता इंतजाम नहीं किया था। एक कमरे में सारे कॉस्‍ट्यूम आलमारियों में यों ठूंस कर रखे गए थे,ज्‍यों किसभ्‍ कस्‍बे के ड्राय क्लिनर्स की दुकान हो। हैंगर पर लदे हैंगर और उनसे लटकते कॉस्‍ट्यूम। पूछने पर तब के ज्म्म्ेिदार व्‍यक्ति ने कहा था कि कहां रखें? जगह भी तो होनी चाहिए।
हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री अपनी विरासत के प्रति शुरू से लापरवाह रही है। निर्माता और अभिनेता भी अपनी फिल्‍मों के दस्‍तावेज सहेजने में रुचि नहीं रखते। फिल्‍म निर्माता सक्रिय हो या निष्क्रिय...उनके प्रोडक्‍शन हाउस में कोई ऐसा विभाग और जिम्‍मेदार व्‍यक्ति नहीं होता जो अपनी ही फिल्‍में और उनसे संबंधित सामग्रियां को संभाल कर रखे। अधिकांश निर्माताओं को यह भी पता नहीं है कि देश में राष्‍ट्रीय फिल्‍म अभिलेखागार(एनएफएआई) जैसी एक सरकारी संस्‍था है,जो फिल्‍म दस्‍तावेजों के संरक्षण और रख-रखाव का कार्य करती है। अब तो कुछ निजी संग्रहकर्ता भी आ गए हैं। ऐसे व्‍यक्ति और संगठन फिल्‍मी सामग्रियों की खरीद-बिक्री नहीं करतीं। उनका संरक्षण करती हैं।
आरके स्‍टूडियो में लगी आग को खतरे की घंटी के रूप में लेना चाहिए। राष्‍ट्रीय फिल्‍म अभिलेखागार के अधिकारी और संबंधित मंत्रालय इस संबंध में अभियान चलाए। सभी को बताने-समणने की जरूरत है कि फिल्‍मी सामग्रिया और यादें हमारी बहुमूल्‍य थाती हैं,जिन पर केवल उस प्रोडक्‍शन हाउस या परिवार का अधिकार नहीं है। उन्‍हें सामूहिक विरासत और राष्‍ट्रीय धरोहर का दर्जा मिलना चाहिए। अभी सब कुछ नष्‍ट नहीं हुआ है। अभी कुछ पुराने स्‍टूडियो हैं और कुछ पुराने प्रोडक्‍शन हाउस के जर्जर दफ्तर...हमें वहां बची विरासत को बचाने के प्रयास में लग जाना चाहिए। हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री में सक्रिय व्‍यक्तियों के बीच जागरूकता लाने की भी जरूरत है। वे सचेत रहेंगे तो किसी दुर्घटना और आपदा की स्थिति में भी बहुमूल्‍य सामग्रियों का संरक्षण किया जा सकेगा।
फिलहाल आरके स्‍टूडियो में लगी आग में नष्‍ट हुई साग्रियों का ब्‍योरा आए तो नुकसान की वास्‍तविकता पता चले। फिल्‍म इंडस्‍ट्री को लगे जागें और विरासत के प्रति लापरवाही खत्‍म करें।  

Thursday, September 14, 2017

रोज़ाना - एक दूसरे के पूरक,फिर भी मायानगरी में 'पांच' हो गया 'पान्‍च'

रोजाना

पांच हो गया पान्‍च

- अजय ब्रह्मात्मज

हिंदी दिवस के अवसर पर हिंदी सिनेमा में हिंदी की बात करना उचित है। देश में कहीं न कहीं दस पर परिचर्चा या बहस चल रही होगी। हिंदी सिनेमा में हिंदी के उपयोग,प्रयोग और दुरुपयोग पर लोगों की राय भिन्न हो सकती है,लेकिन इस बात से कोई इंकार नहीं करेगा कि हिंदी सिनेमा के विकास में हिंदी की बड़ी भूमिका रही है। कभी इसे हिंदुस्‍तानी कहा गया,कभी उर्दू मिश्रित हिंदी तो कभी कुछ और। इसके साथ यह कहना भी अनुचित नहीं होगा कि हिंदी के प्रचार-प्रसार में हिंदी फिल्मों का उल्लेखनीय योगदान है। देश के अंदर और विदेशों में हिंदी फिल्मों के माध्यम से दर्शकों ने बोलचाल की व्‍यावहारिक हिंदी सीखी है। हालांकि कोई भी हिंदी फिल्म यह सोचकर नहीं नहीं बनाई गई कि उससे हिंदी भाषा का प्रचार किया जाएगा, फिर भी ऐसे अनेक उदाहरण मिल जाएंगे जहां अहिंदीभाषी दर्शकों ने हिंदी फिल्मों से अपनी हिंदी परिमार्जित की। विदेशी विश्वविद्यालयों में नई पीढ़ी के शिक्षक विद्यार्थियों को हिंदी सिखाने के लिए हिंदी फिल्मों का टूल के रूप में इस्तेमाल करते हैं। कहते हैं इससे विद्यार्थी तेजी से हिंदी सीखते हैं।

इधर हिंदी फिल्‍मों में हिदी का यह सहज रूप भ्रष्‍ट हो रहा है। संवाद के तौर पर बोली जा रही हिंदी मुख्‍य रूप से रोमन में लिखी जा रही है। इससे नई पीढ़ी के अंग्रेजीदां निर्देशकों और कलाकारों को सुविधा तो हो जाती है,लेकिन हिंदी बोलने के लहजे और उच्‍चारण में खोट बढ़ता जा रहा है। पिछले दिनों मशहूर लेखक अतुल तिवारी ने मजेदार किस्‍सा सुनाया। स्‍टार टीवी के अधिकारियों ने उन्‍हें कहा कि आप रोमन में ही हिंदी लिख कर दें। उन्‍होंने पूछा कि मैं स्‍टार का स्‍त्‍र बढ़ गया है कैसे लिखूं। स्‍टार और स्‍तर दोनों को रोमन में लिखने के लिए एसटीएआर लिखना पड़ेगा। नए कलाकार जब आनुनासिक शब्‍दों का उच्‍चारण करते हैं तो वे बिंदी के लिए रोमन में प्रयुक्‍त एन का अलग से उच्‍चारण करते हैं। वे पांच को पान्‍च और आंखें को आन्‍खेंन् बोलते सुनाई पड़ते हैं। ,,,, और से बने शब्‍दों के उच्‍चारण में उन्‍हें दिक्‍कत होती है। बचपन से या बाद में भी हिंदी का नियमित अभ्‍यास नहीं होने की वजह से उन्‍हें अपना गलत उच्‍चारण भी गलत नहीं लगता। चूंकि निर्देशक खुद हिंदी में दक्ष नहीं होता,इसलिए वह आपत्ति भी नहीं करता। कहा और दावा किया जाता है कि डॉयलॉग इंस्‍ट्रक्‍टर भाषा सिखाने के लिए रहते हैं,लेकिन उनका योगदान सिर्फ पर्दे पर नाम के रूप में लक्षित होता है। वास्‍तव में भाषा वैसी ही भ्रष्‍ट रहती है।  

आजकल हिंदी फिल्‍मों के नाम तक हिंदी में नहीं लिखे जा रहे हैं। पर्दे पर सिर्फ अंग्रेजी में फिल्‍म का नाम आता है। पोस्‍टर और फर्स्‍ट लुक में हिंदी फिल्‍मों के नाम बेशर्मी के साथ अंग्रेजी में छापे जाते हैं। दर्शक भी मांग नहीं करते कि उन्‍हें हिंदी में पोस्‍टर मिलें। ताजा फैशन अंग्रेजी-हिंदी मिक्‍स टाइटल हैं,जैसे मुक्‍काBaaz


Thursday, September 7, 2017

रोज़ाना : दर्शकों के दो छोर



रोज़ाना
दर्शकों के दो छोर
-अजय ब्रह्मात्‍मज
पिछले हफ्ते रिलीज हुई शुभ मंगल सावधान और बादशाहो के कलेक्‍शन पवर गौर करने के साथ देश के दर्शकों के दो छोरों को भी समझने की जरूरत है। पहली फिल्‍म बिल्‍कुल नए विषय पर है। हिंदी फिल्‍मों में ऐसे विषय वर्जित माने जाते हैं। पुरुषों के जेंट्स प्राब्‍लम पर आनंद एल राय और आर एस प्रसन्‍ना ने खूबसूरत और प्रेरक फिल्‍म बनाई। उम्‍मीद के बावजूद निर्माता-निर्देशक आश्‍वस्‍त नहीं थे कि उनकी फिल्‍में दर्शकों के बीच स्‍वीकृत होगी। फिल्‍म चली। सीमित बजट की सीमाओं में अच्‍छी चली। खुद निर्माता-निर्देशक हैरान हैं कि उन्‍होंने ऐसे प्रतिसाद के बारे में नहीं सोचा था। उन्‍हें और दूसरे निर्माताओं को हिम्‍मत मिली है कि वे आगे अपने साहस का विस्‍तार करें।
दूसरी तरफ बादशाहो है। आठनें दशक की थीम पर लगभग उसी समय की शैली में बनी इस फिल्‍म के प्रति निर्देशक और कलाकार निश्चित थे। उन्‍हें पूरा यकीन था कि बादशाहो दर्शकों को अच्‍छी लगेगी। समीक्षकों की भिन्‍न राय थी। इस फिल्‍म में हिंदी फिल्‍मों के घिसे-पिटे फामूले का इस्‍तेमाल किया गया था। नए दौर की फिल्‍मों में दृश्‍यों में तार्किकता रखी जाती है। उनमें कार्य-कारण संबंध का खयाल रखा जाता है। बादशाहो में निर्देशक ने परवाह नहीं की। अजय देवगन जैसे नई चेतना के अनुभवी अभिनेता भी दर्शकों के साथ गए। उन्‍होंने पूरे भरोसे के साथ निर्देशक का साथ दिया। नतीजा सभी के सामने है। बादशाहो उल्‍लेखनीय व्‍यवसाय कर रही है। उसे क्लिन हिट माना जा रहा है।
मिजाज और प्रस्तुति में दोनों फिल्‍में मिजाज और प्रस्‍तुति में भिन्‍न हैं। सामान्‍य भाषा में कहें तो पहली मल्‍टीप्‍लेक्‍स की फिल्‍म है और दूसरी सिंगल स्‍क्रीन की फिल्‍म है। कायदे से दोनों फिल्‍मों को उनके हिसाब से ही दर्शक मिलने चाहिए थे,लेकिन व्‍यवसाय के ट्रेंड का अध्ययन  करने वाले पंडितों के मुताबिक दोनों को मिश्रित दर्शक मिले हैं। शहरी दर्शकों ने भी बादशाहो पसंद की और छोटे शहरों के दर्शकों ने शुभ मंगल सावाधान को हाथोंहाथ लिया। वास्‍तव में भारतीय समाज में दर्शकों का स्‍पष्‍ट विभाजन नहीं किया जा सकता। किसी प्रकार के ट्रेड की भविष्‍यवाणी करना संभव नहीं है। दर्श्‍क्‍पिछले हफ्ते की तरह हमेशा ट्रेड पंडितों का चौंकाते रहे हैं। याद करे तो विकी डोनर और हेट स्‍टोरी भी एक ही तारीख को रिलीज हुई थीं और उन दोनों को भी दर्शकों ने पसंद किया था। कई बार निर्माता-निर्देशक रिलीज के समय अपनी फिल्‍मों को लेकर आशंकित रहते हैं। दर्शकों के बीच असमंजस नहीं रहता। ठीक चुनावों की तरह वे स्‍पष्‍ट रहते हैं कि इस बार उन्‍हें फलां फिल्‍म देखनी है या नहीं देखनी है? ट्रेड पंडितों के अनुमान को वे झुठला देते हैं।   

Friday, September 1, 2017

रोज़ाना : मुनाफे का परसेप्‍शन



रोज़ाना
मुनाफे का परसेप्‍शन
-अजय ब्रह्मात्‍मज
बाहुबली या दंगल के निर्माताओं ने तो कभी प्रेस विज्ञप्ति भेजी और न रिलीज के दिन से ढिंढोरा पीटना शुरु किया कि उनकी फिल्‍म मुनाफे में है। गौर करें तो देखेंगे कि लचर और कमजोर फिलमों के लिए निर्माता ऐसी कोशिशें करते हैं। वे रिलीज के पहले से बताने लगते हैं कि हमारी फिल्‍म फायदे में आ चुकी है। फिल्‍म के टेड सर्किल में यह सभी जानते हैं कि जैसे ही किसी निर्माता का ऐसा एसएमएस आता है,वह इस बात की गारंटी होता है कि स्‍वयं निर्माता को भी उम्‍मीद नहीं है। वे आश्‍वस्‍त हो जाते हैं कि फिल्‍म नहीं चलेगी। फेस सेविंग और अपनी धाक बनाए रखने के लिए वे फिल्‍म की लागत और उसके प्रचार और विज्ञापन में हुए खर्च को जोड़ कर एक आंकड़ा देते हैं और फिर बताते हैं कि इस-अस मद(सैटेलाइट,संगीत,ओवरसीज आदि) से इतने पैसे आ गए हैं। अब अगर पांच-दस करोड़ का भी कलेक्‍शन बाक्‍स आफिस से आ गया तो फिल्‍म फायदे में आ जाएगी।
मजेदार तथ्‍य यह है कि ऐसी फिल्‍मों के कलेक्‍शन और कमाई की सचचाई जानने के बावजूद मीडिया और खुद फिल्‍म सर्किल के लोग इस झूठ को स्‍वीकार कर लेते हें। जिसकी फिल्‍म होती है। व‍ि चिल्‍लता है। बाकी मुस्‍कराते हैं। अगली फिल्‍म के समय मुस्‍कराने वाला चिल्‍लाने लगता है और चिल्‍लाने वाला मुस्‍कराने लगता है। सभी फरेब रचते हैं। उस पर यकीन करते हें। फिल्‍मों के कारोबार का यह पहलू रोचक होने के साथ ही दुखद है।
सोशल मीडिया के इस दौर में ट्रेड मैग्‍जीन में कारोबार के आंकड़ों के आने के पहले से माहौल बनाया जाता है। मीडिया के लोगों से सिफारिश की जाती है कि वे निर्माता के दिए गए कलेक्‍शन और कैलकुलेशन ही बताएं और छापें। ताज्‍जुब यह है कि उन आंकड़ों के झूठ को जानते हुए भी वेब साइट और अखबारों में गलत आंकड़े छपते हैं। इन दिनों तो फिल्‍म के स्‍टार की भी मदद ली जा रही है। उन पर दबाव डाला जाता है कि वे इस झूठ को प्रचारित करें। सोशल मीडिया पर उनके प्रशेसंक और भक्‍त भी खुश हो जाते हैं कि उनका स्‍टार पॉपुलर है। उसकी फिल्‍में चल रही हैं।
देखें तो सारा खेल परसेप्‍शन का है। हिंट का परसेप्‍शन बन जाना चाहिए। हंसी तो तब आती है जब स्‍पष्‍ट रूप से नहीं चल रही फिल्‍म के निर्माता और स्‍टार बताते और शेयर करते हें कि फलां राज्‍य के फलां शहर के फलां सिनेमाघर में 6 बजे का शो हाउसफुल रहा। हर कामयाब फिल्‍म का कलेक्‍शन शुक्रवार से रविवार के बीच उत्‍तरोत्‍तर बढ़ता है। कुछ फिल्‍में अपवाद होती हैं जो सोमवार के बाद जोर पकड़ती है। ज्‍यादातर तो सोमवार तक में ही थे जाती हैं।   

Thursday, August 31, 2017

रोज़ाना : बेलौस और बेलाग सलीम खान



रोज़ाना
बेलौस और बेलाग सलीम खान
-अजय ब्रह्मात्‍मज
सलमान खान जिन बातों के लिए बदनाम हैं,उनमें से एक आदत उनके पिता सलीम खान में भी है। सलमान ने अपने पिता से ही यह सीखा होगा। बस पिता की तरह वे उसे अपना हुनर नहीं बना पाए। सलीम खान हर मुद्ददे पर बेलाग दोटूक बालते हैं। उनके बयानों और बातों में कोई डर नहीं रहता। विवादास्‍पद मुद्दों पर भी अपनी राय रखने से वे नहीं हिचकते। मेरा व्‍यक्तिगत अनुभव है कि उनके जवाब विस्‍तृत होते हैं,जिसमें सवाल के हर पहलुओं के साथ उन संभावित सवालों के भी जवाब होते हैं जो बाद में पूछ जा सकते हैं। आज के मीडियाकर्मियों के लिए उनके जवाबों में से प्रासंगिक पक्तियां छांट पाना मुश्किल काम होता है। एक बार मैंने उनका नंबर मांगा और पूछा कि कब फोन करना ठीक होगा। और क्‍या वे फोन उठाते या बुलाने पर आ जाते हैं। उनका जवाब था,मैं तो रौंग नंबर पर आधे घंटे बातें करता हूं। आप फोन करना। खाली रहा तो उठा लूंगा।
यह दीगर सच्‍चाई है कि वे मीडिया से बातें करना अधिक पसंद नहीं करते। बेटे सलमान खान की फिल्‍म रिलीज हो या वे किसी विवाद में उलझे हों तो स्‍पष्‍टीकरण देने आ जाते हैं। करीबी बताते हैं कि उनके बेटे आज भी उनसे बहुत घबराते हैं। अपनी फिल्‍में उन्‍हें दिखाने में हिचकते हैं,क्‍योंकि वे फिल्‍म की कमियां बता देते हैं। सलमान खान की पिछली फिल्‍म ट्यूबलाइट के नहीं चलने का उन्‍हें अंदेशा था। उनकी राय में सलमान खान की प्रचलित इमेज से अलग किरदार होने की वजह से उनके प्रशंसक बिदक गए। उन्‍हें अपना सल्‍लू भाई नहीं दिखा। पिछले दिनों एक इंटरव्‍यू में उन्‍होंने स्‍पष्‍ट शब्‍दों में कहा कि फिल्‍म अच्‍छी थी,लेकिन सलमान खान के उपयुक्‍त नहीं थी। अगर इसमें कोई और स्‍टार होता तो फिल्‍म चल जाती। सलमान खान की फिल्‍म में एक्‍शन और लव नहीं हो और वह लाचार एवं पिटा दिखे तो उसके प्रशंसक कैसे बर्दाश्‍त करेंगे?
इसी इंटरव्‍यू में उन्‍होंने अक्षय की खुली तारीफ की है। उनकी राय में केवल अक्षय कुमार ने समय के साथ खुद को अच्‍छी तरह बदला है। वे परिष्‍कृत हुए हैं। उनकी राय में अजय देवगन,आमिर खान और सलमान खान में भी परिष्‍कार आया है,लेकिन अक्षय कुमार का सफर तो अकल्‍पनीय है। आज वे ऐसे अभिनेता के तौर पर उभरे हैं,जो किसी भी विषय की फिल्‍म कर सकते हैं।
इन दिनों कौन अपने बेटों को छोड़ किसी और की तारीफ करता है? यह सलीम खान की ही सलाहियत है जो वे अक्षय कुमार की उपलब्धियों पर गौर करते हैं।

Wednesday, August 30, 2017

रोज़ाना : बारिश के बहाने गाए तराने



रोज़ाना
बारिश के बहाने गाए तराने
-अजय ब्रह्मात्‍मज
हर मानसून में दो-तीन बार ऐसा होता है कि बारिश की बूंदें समुद्र की लहरों के साथ मिल कर मुंबई शहर के पोर-पोर  को आगोश में लेने के लिए बेताब थीं। दो दिनों चल रही बूंदाबांदी ने मूसलाधार रूप लिया और शहर के यातायात को अस्‍त-व्‍यस्‍त कर दिया। देापहर होने तक पुलिस महकमे से चेतावनी जारी हो गई। संदेश दिया गया कि बहुत जरूरी न हो तो घर से नहीं निकलें। सुबह दफ्तरों को निकल चुके मुंबईकरों के लिए घर लौटना मुश्किल काम रहा। सोशल मीडिया पर अनेक संदेश आने लगे। सभी बारिश में फंसे अपने दोस्‍तों को घर बुलाने लगे। गणेश पूजा के पंडालों ने मुंबईकरों के लिए चाय-पानी और भोजन की खास व्‍यवस्‍था की। यही इस शहर का मिजाज है। बगैर आह्वान के ही सभी नागरिक अपने तई तत्‍पर रहते हैं मदद के लिए।
हिंदी फिल्‍मों में बारिश की ऐसी आपदा नहीं दिखती। फिल्‍मों में बारिश रोमांस अज्ञेर प्रेम का पर्याय है। शुरू से ही बादलों के गरजने और बिजली के चमकने के साथ अकस्‍मात बारिश होने लगती है। हीरो-हीरोइन बारिश का आनंद उठाने के साथ रोमांटिक खयालों में खो जाते हैं। उनके सोए और अनकहे जज्‍बात बारिश के बहाने तराने के रूप में गूंजने लगते हैं। पहले हीरो-हीरोइन की नजदीकियां बढ़ाने और दिखाने के लिए बारिश के दृश्‍य रखने का चलन आम था। ऐसे दृश्‍यों में दोनों की गीली चाहत बरसात में भीग कर भड़कने लगती है। हीरोइन पहले साड़ी और अब किसी भी लिबास में तरबतर होकर हीरो के साथ-साथ पुरुष दर्शकों लुभाती है। समर्थ और अनुभवी फिल्‍मकारों ने इसे सौंदर्य से परिपूर्ण रखा तो चालू फिल्‍मकारों ने कल्‍पना के अभाव में देह प्रदर्शन से दर्शकों को उत्‍तेजित किया। अप्रोच जो भी रहा,निशाने पर फिल्‍म की हीरोइनें रहीं। उन्‍हें मादक अंदाज में पेश कर दर्शकों की दबी और कुंठित भावनाओं को सुलगाया गया। यह अचानक नहीं हुआ है कि अब हिंदी फिल्‍मों में बारिश के दृश्‍य और गाने नहीं के बराबर हो गए हैं। फिल्‍मों में रोमांस का नजरिया और रवैया बदल चुका है।
हिंदी फिल्‍मों में बरसात के गानों पर रिसर्च होना चाहिए। ज्‍यादातर गानों में रोमांस के साथ हीरो-हीरोइन की कामुक इच्‍छाओं को शब्‍द दिया गया है। यों लगता है कि बरसों की दबी ख्‍वाहिश पूरा करने का वक्‍त आ गया है। रिमझिम गिरे सावन,सुलग सुलग जाए मन,बरखा रानी जरा जम के बरसो,भीगी भीगी रुत में तुम हम हम तुम,भीगी भीगी रातों में ऐसी बरसातों में,गी आज सावन की ऐसी झड़ी है जैसे अनेक गीतों के उदाहरण लिए जा सकते हैं। कुछ फिल्‍मों में जरूर बारिश का रिश्‍ता खेती और खुशहाली से जोड़ा गया,लेकिन ऐसी फिल्‍में और दृश्‍य बेहद कम हैं।
  

Tuesday, August 29, 2017

रोज़ाना : नू का न्‍यू तन का टन



रोज़ाना
नू का न्‍यू तन का टन
-अजय ब्रह्मात्मज
माता-पिता ने नाम रखा था नूतन। स्‍कूल में सहपाठी मजाक उड़ाते थे,इसलिए नूतन ने अपने नाम में नू का न्‍यू और तन का टन कर लिया...इस तरह वह नतन से न्‍यूटन हो गया। अमित मासुरकर की फिल्‍म न्‍यूटन में राजकुमार राव शीर्षक भूमिका निभा रहे हैं। उनके साथ रघुवीर यादव,संजय मिश्र,पंकज त्रिपाठी और अंजलि पाटिल मुख्‍य भूमिकाओं में हैं। राजकुमार राव ने हाल ही में रिलीज हुई बरेली की बर्फी में प्रीतम विद्रोही के रोल में दर्शकों का दिल जीता है। हर किरदार के रंग में ढल कर अलग अंदाज में पेश आ रहे राजकुमार राव इस फिल्‍म में एक नए रंग में दिखेंगे। 
 
हिंदी में ऐसी फिल्‍में कम बनती हैं,जो समसामयिक और राजनीतिक होने के साथ मनोरंजक भी हों। न्‍यूटन अमित मासुरकर का साहसी प्रयास है,जिसे आनंद एल राय का जोरदार समर्थन मिल गया है। इस फिल्‍म से जुड़ने के संतोष के बारे में आनंद एल राय कहते हैं,यह फिल्‍म मेरी जरूरत है। इस फिल्‍म से मुझे मौका मिल रहा है कि मैं समाज को कुछ रिटर्न कर सकूं। मेरे लिए ऐसी फिल्‍में लाभ-हानि से परे हैं। इसके पहले निल बटे सन्‍नाटा से जुड़ने पर ऐसा ही संतोष हुआ था। मुझे लगता है कि न्‍यूटन जैसी फिल्‍मों से जुड़ने पर मेरी रीढ़ सीधी हो जाती है। एक ताकत मिलती है। मेरा मुख्‍य काम और फिल्‍में दुनियादारी के प्रभाव में है। उससे निकलने और स्‍वार्थहीन तरीके से कुछ कर पाने का एहसास और मौका देती हैं ऐसी फिल्‍में।

न्‍यूटन को बर्लिन फिल्‍म फेस्टिवल में पुरस्‍कार मिला था। उसके बाद यह फिल्‍म चालीस फेस्टिवल में जा चु‍की है। हर फेस्टिवल से सराहना बटोरने के बाद अब यह देश के सिनेमाघरों में पहुंच रही है। अमित मासुरकर ने इसे रियलिस्‍ट तरीके से शूट किया है। हिंदी फिल्‍मों के ढांचे में रहते हुए यह फिल्‍म वास्‍तविकता का एहसास देगी। अमित मासुरकर के लिए यह फिल्‍म लोकतंत्र के सिद्धांत और व्‍यवहार में प्रचलित फर्क को नायक न्‍यूटन के नजरिए से दर्शाती है। हर बार चुनाव के दिन मतदान केंद्र पर होने वाली घटनाओं की खबरें बताती रहती हैं कि मतदान के दिन लोकतंत्र के कई रूप नजर आते हैं। लोकतंत्र के एक रूप को न्‍यूटन में हम देखेंगे। फिल्‍म का नायक न्‍यूटन एक ईमानदार और कर्तव्‍यनिष्‍ठ युवक है। वह अपने जीवन और कार्य में आदर्श व्‍यवहार करता है। सरकारी दफ्तर में क्‍लर्क की नौकरी कर रहे न्‍सूटन की इलेक्‍शन ड्यूटी लग जाती है। इस ड्यूटी का तत्‍परता से निभाने में वह भारतीय लाकतंत्र और राजनीति के सूक्ष्‍म पहलुओं से परिचित होता है।

Monday, August 28, 2017

रोज़ाना : शब्‍दों से पर्दे की यात्रा



रोज़ाना
शब्‍दों से पर्दे की यात्रा
-अजय ब्रह्मात्‍मज
सिनेमा और साहित्‍य के रिश्‍तों पर लगातार लिखा जाता रहा है। शिकायत भी रही है कि सिनेमा साहित्‍य को महत्‍व नहीं दिया जाता। साहित्‍य पर आधारित फिल्‍मों की संख्‍या बहुत कम है। प्रेमचंद से लेकर आज के साहित्‍यकारों के उदाहरण देकर बताया जाता है कि हिंदी फिल्‍मों में साहित्‍यकारों के लिए कोई जगह नहीं है। शुरू से ही हिदी एवं अन्‍य भारतीय भाषाओं के कुछ साहित्‍यकार हिंदी फिल्‍मों के प्रति अपने प्रेम और झुकाव का संकेत देते रहे हैं,लेकिन व्‍यावहारिक दिक्‍कतों की वजह से वे फिल्‍मों के साथ तालमेल नहीं बिठा पाते। उनके असंतोष को बहुत गंभीरता से लिया जाता है। तालमेल न हो पाने के कारणों की गहराई में कोई नहीं जाता।
हिंदी फिल्‍में लोकप्रिय संस्‍कृति का हिस्‍सा हैं। लोकप्रिय संस्‍कृति में चित्रण और श्लिेषण में दर्शकों का खास खशल रखा जाता है। कोशिश यह र‍हती है कि अधिकाधिक दर्शकों तक पहुंचा जाए। उसके लिए आमफहम भाषा और और परिचित किरदारों का ही सहारा लिया जाता है। लेखकों को इस आम और औसत के साथ एडजस्‍ट करने में दिक्‍कत होती है। उन्‍हें लगता है कि उनके सृजन की कदर नहीं की जा रही है। कॉमन शिकायत है कि कृति की आत्‍मा मर गई। उसका खयाल नहीं रखा गया। हिंदी के शब्‍दों को पर्दे पर लाने की और भी दिक्‍कतें हैं। इन दिनों सबसे बड़ी दिक्‍कत यही है कि अंग्रेजी में पढ़-लिखे और काम कर रहे फिल्‍मकार और लेखक भारतीय भाषाओं की कामचलाऊ जानकारी रखते हैं। उनके पढ़ने और लिखने की दुनिया में भारतीय भाषाएं नहीं हैं। लिहाजा अगर वे कभी साहित्‍य के बारे में सोचते भी हैं तो उन्‍हें अंग्रेजी में लिखी किताबें ही सूझती हैं।
मुंबई में पिछले गुरूवार को मामी(मुंबई एकेडमी ऑफ मूविंग इमेजेज) के तत्‍वावधान में लेखकों,प्रकाशको,विशेषज्ञों और फिल्‍मकारों की बैठक हुई। इसमें लेखकों और प्रकाशकों ने अपनी किताबों की विषयवस्‍तु के बारे में बताया। ऐसी खबर है कि सोनम कनूर और हंसल मेहता समेत अनेक फिल्‍मकारों ने इन किताबों में रुचि दिखाई और उनके अधिकार हासिल किए। मामी की इस पहल का स्‍वागत होना चाहिए। ऐसे मंच मिलें तो शब्‍दों और पर्दे के बीच की दूरी कम होगी। विश्‍व सिनेमा में साहित्‍य पर आधारित फिल्‍में बनती रही हैं। दर्शकों की पसंद बनने के साथ उन्‍हें पुरस्‍कार भी मिले हैं। भात में बांग्‍ला और कन्‍न्‍ड़ भाषाओं की फिल्‍मों में साहित्‍य पर ध्‍यान दिया जाता है। हिंदी फिल्‍मों में साहित्‍य के प्रति फिल्‍मकारों की ललक खत्‍म सी हो गई है।
अगर यह सर्वे किया जाए कि किस फिल्‍मकार ने हाल में कोन सी हिंदी किताब पढ़ी है तो परिणाम हैरतअंगेज होंगे।  

Thursday, August 24, 2017

रोज़ाना : दिलीप साहब की जीवन डोर हैं सायरा बानो



रोज़ाना
दिलीप साहब की जीवन डोर हैं सायरा बानो
-अजय ब्रह्मात्‍मज
कल सायरा बानो का जन्‍मदिन था। हिंदी फिल्‍मों की यह मशहूर अदाकारा शादी के बाद धीरे-धीरे दिलीप कुमार के आसपास सिमट कर रह गईं। बीमार और अल्‍जाइमर के शिकार दिलीप कुमार के साए की तरह उनके साथ हर जगह मौजूद सायरा बानों को देख कर तसल्‍ली होती है। तसल्‍ली होती है कि कुछ संबंध वक्‍त के साथ और मजबूत होते हैं।
11 अक्‍टूबर 1966 को दोनों की शादी हुई। तब सायरा बानो की उम्र महज 22 थी और दिलीप कुमार 44 के थे। अटकलें लगाने के लिए कुख्‍यात फिल्‍म इंडस्‍ट्री में कहा जाता रहा कि यह बेमेल शादी लंबे समय तक नहीं चलेगी। आज हम देख रहे हैं कि शादी के 50 सालों के बाद भी दोनों न केवल एक साथ हैं,बल्कि एक-दूसरे से बेपनाह मोहब्‍बत करते हैं। पिछले कुछ समय से दिलीप कुमार पूरी तरह से सायरा बानो पर निर्भर हैं,लेकिन कभी सायरा बानो के चेहरे पर कोई शिकन नहीं दिखाई देती। व‍ह अपने कोहिनूर के साथ दमकती और मुस्‍कराती रहती हैं। जी हां,सायरा बानो दिलीप कुमार को अपनी जिंदगी का कोहिनूर मानती हैं।
यों लगता है कि सायरा बानो की हथेली में रिमोट की तरह बटन लगे हुए हैं। सार्वजनिक स्‍थानों पर दिलीप साहब का बाएं हाथ की हथेली वह अपनी हथेली में थामे रहती हैं। जैसे ही कोई सामने आता है या कोई और बात होती है तो हथेलियां जुंबिश करती हैं। बगैर कुछ कहे ही दिलीप साहब सब समझ लेते हैं और फिर जरूरत के अनुसार मुस्‍कराते और बोलते हैं। सायरा बानो की हथेली दिलीप साहब को सब कुछ बता देती है। जरूरत पड़ने पर वह उनके कानों में कुछ फुसफुसाती हैं और दिलीप साहब की आंखों में चमक के साथ होठों पर मुस्‍कान तैर जाती है। इधर तबियत बिगड़ने से दिलीप साहब को बार-बार अस्‍पताल जाना पड़ा है। सायरा हमेशा उनके साथ रहीं। दिलीप साहब की देखभाल के साथ उन्‍होंने उनके प्रशंसकों का भी बराबर खयाल रख। अस्‍पताल से उनकी तबियत में हो रहे सुधार की लगातार जानकारी देती रहीं। पिछले दिनों शाह रुख खान ने दिलीप साहब से मुलाकात की तो उन्‍होंने ही तस्‍वीरें शेयर कीं।
सायरा बानो की जिंदगी दिलीप साहब के आसपास और उनकी सोच में ही गुजरी है। 12 साल की उम्र से उनकी दीवानी सायरा बानो आखिरकार दिलीप साहब की जिंदगी में आईं। समर्पित बीवी की भूमिका में आने से पहले उन्‍होंने अभिनय की ल्रबी सफल पारी खेली। दिलीप कुमार के साथ भी कुछ यादगार फिल्‍में कीं। अब तो उन्‍हें फिल्‍मों से संन्‍यास लिए भी चालीस से अधिक साल हो गए।    

Wednesday, August 23, 2017

रोज़ाना : बड़े पर्दे पर बाप-बेटी



रोज़ाना
बड़े पर्दे पर बाप-बेटी
-अजय ब्रह्मात्‍मज
हिंदी फिल्‍मों और हिंदी समाज में बाप की छवि एक निरंकुश की रही है। खास कर बेटियों के मामले में वे अधिक कठोर और निर्मम माने जाते हैं। इधर बाप-बेटी के रिश्‍तों में थेड़ी अंतरंगता आई है,लेकिन अभी तक वह खुलापन नहीं आया है। बेटियां आपने पिता से सीक्रेट शेयर करने में संकोच करती हैं। यों हिंदी समाज की सोच और दायरे में में वे मां से भी अपने दिल की बातें छिपा जाती हैं। बचपन से उन्‍हें उचित-अनुचित की ऐसी परिभाषाओं में पाला जाता है कि वे कथित मर्यादा में दुबकी रहती हैं। फिर भी पिछले दशक में इस रिश्‍ते में आ रहे धीमे बदलाव को महसूस किया जा सकता है।
हाल ही में एक फिल्‍म आई बरेली की बर्फी। इसमें हमें बाप-बेटी के बीच का बदला हुआ प्‍यारा रिश्‍ता दिखा। बरेली के एकता नगर के नरोत्‍तम मिश्रा की बेटी है बिट्टी। यह कहना सही नहीं होगा कि उन्‍होंने उसे बेटों की तरह पाला। फिल्‍म के वॉयस ओवर में लेखक भी चूक गए। उन्‍होंने बिट्टी को नरोत्‍तम मिश्रा का बेटा कहा,क्‍योंकि आदतन उन्‍हें बेटे की उम्‍मीद थी। बहरहाल,हम देखते हैं कि नरोत्‍तम मिश्रा और बिट्टी के बीच अच्‍छी समझदारी है। वे बिट्टी के फैसलों का समर्थन करते हैं। इसकी वजह से कई बार उन्‍हें मां की झिड़की सुनाई पड़ती है। आम घरों में भी बाप यह उलाहना सुनते हैं आप ही ने सिर चढ़ा रखा है। बिगाड़ दिया है बेटी को। नरोत्‍तम मिश्रा को फर्क नहीं पड़ता कि वह किस के साथ बाइक पर बैठ कर जा रही है। या ऑफिस से निकलने के बाद वह कहां जाती है? फिल्‍म की शुरुआत में ही डिब्‍बी में सिगरेट नहीं मिलने पर वे बीवी सुशीला से कहते हैं कि बिट्टी से मांग लाओ। बीवी चौंकती हैं तो वे सहज भाव से कहते है,पीती है
हिंदी फिल्‍मों में बेटियों या महिला किरदारों को आधुनिक और प्रगतिशील दिखाने के घिसे-पिटे टोटके हैं। उनमें सिगरेट और शराब पीना भी है। बरेली की बर्फी भी इस टोटके का इस्‍तेमाल करती है,लेकिन उसे सामान्‍य शौक की तरह ही दिखाया गया है। बाप-बेटी के रिश्‍ते की तीव्रता हमें बेटी के साथ खड़े नरोत्‍तम मिश्रा में दिखती है। पारंपरिक पिता की बेटी की शादी जैसी चिंताओं के बावजूद वे बिट्टी पर कभी दबाव नहीं डालते। उसके दोस्‍तों का घर में स्‍वागत करते हैं। उनके साथ बैठते हैं। उन्‍हें एंटरटेन करते हैं।
हिंदी फिल्‍मों में बाप-बेटी का यह रिश्‍ता दुर्लभ है। इस फिल्‍म के प्रदर्शन के बाद सोशल मीडिया पर बेटियां पोस्‍ट कर रही है...काश,उन्‍हें भी नरोत्‍तम मिश्रा जैसे पिता मिलते? कहना नहीं होगा कि इस पिता को पंकज त्रिपाठी बहुत बारीकी के साथ चरितार्थ किया है। बेटी कृति सैनन भी बराबर सहयोग देती हैं।

Thursday, August 17, 2017

रोज़ाना : हमदर्द शाह रूख खान



रोज़ाना
हमदर्द शाह रूख खान
-अजय ब्रह्मात्‍मज
कल सायरा बानो ने दिलीप कुमार के ट्वीटर हैंडल पर कुछ तस्‍वीरें शेयर कीं। उनमें शाह रूख खान कृशकाय हो चुके महान अभिनेता को सोफे पर आराम से बिठाने की कोशिश कर रहे हैं। ये तस्‍वीरें आंखें नम कर गईं। पहले तो लगा कि सायरा जी को इन अंतरंग क्षणों की तस्‍वीरें नहीं शेयर करनी चाहिए थी। फिर मर्माहत मन ने कहा कि ऐसी तस्‍वीरें धर-परिवार और देश-समाज के बुजुर्गों के प्रति हमारी हमदर्दी की मिसाल बन सकती हैं। फिल्‍मों के फालोअर और शाह रूख खान के प्रशंसक गाहे-बगाहे अपने जीवन में इसे अपना सकते हैं। दिलीप कुमार के प्रति शाह रूख खान के आदर और प्‍यार से फिल्‍म इंडस्‍ट्री वाकिफ है। सायरा जी कई मौकों पर कह चुके हैं कि दिलीप साहेब उन्‍हें अपनी औलाद की तरह मानते हैं। यह किसी भी बीमार पिता और तीमारदार बेटे की तस्‍वीर हो सकती है।
शाह रूख खान के बारे में अनेक गलतफहमियां हैं। अपनी बेरुखी और साफगोई से वे ऐसी इमेज बना चुके हैं कि उन्‍हें किसी की भी नहीं पड़ी है। वे केल खुद और खुद की परवाह करते हैं। हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री के गलाकाट माहौल में ऐसे मिजाज के सुबूत और उाहरण भी मिल जाते हैं। शाह रूख को करीब से जानने वाले बताते हैं कि वे सभी परिचितों,दोस्‍तों और रिश्‍तेदारों का पूरा खयाल रखते हैं। मशहूर व्‍यक्ति जब खयाल करता है तो उसमें पैसे भी खर्च होते हैं। शाह रूख खान इस मामले में दिलदार माने जाते हैं। उन्‍होंने पिछले दिनों एक सीनियर जर्नलिस्‍ट के इलाज का पूरा खर्च उठाया और उसकी कहीं चर्चा नहीं की।
मुमकिन है कुछ लोगों ने आमिर खान के पानी फाउंडेशन के कार्यक्रम में उन्‍हें बोलते सुना हो। पुणे के इस कार्यक्रम में अ‍ामिर खान का जाना था। अचानक स्‍वाइन फ्लू की चपेट में आने से वे नहीं जा सके थे। उन्‍होंने शाह रूख खान से कार्यक्रम संभालने का दोसतना आग्रह किया। खुद खेटिल होने के बावजूद शाह रूख खान ने प्रोग्राम में हिस्‍सा लिया। निमंत्रित श्रोताओं को आमिर खान की कमी नहीं महसूस होने दी। पुरानी कहावत है कि जो वक्‍त्‍-जरूरत पर काम आए,वही दोस्‍त है। शाह रूख खान ने दोस्‍ती की मिसाल पेश की है। आम धारणा है कि खानत्रयी के तीनों खान एक-दूसरे को नापसंद करते हैं। सच्‍चाई यह है कि वे एक-दूसरे की मदद के लिए हमेशा तैयार रहते हैं।
हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री में मतलबी रिश्‍तों की अनेक दास्‍ताने हैं। हर नया व्‍यक्ति सुनाते समय उनमें कुछ नया जोड़ देता है। मजे लेता है। हमें ऐसी पॉजीटिव तस्‍वीरों और हरकतों पर गौर करना चाहिए। इनसे भी सीखना चाहिए।

Wednesday, August 16, 2017

रोज़ाना : ’टॉयलेट...’ से मिली राहत



रोज़ाना
टॉयलेट... से मिली राहत
-अजय ब्रह्मात्‍मज

अक्षय कुमार और भूमि पेडणेकर की फिल्‍म टॉयलेट एक प्रेम कथा के कलेक्‍शन से हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री को राहत मिली है। पिछलें कई महीनों से हर हफ्ते रिलीज हो रही फिल्‍में बाक्‍स आफिस पर खनक नहीं रही थीं। सलमान खान और शाह रूख खान की फिल्‍में बिजनेश की बड़ी उम्‍मीद पर खरी नहीं उतरीं। खबर है कि सलमान खान ने वितरकों के नुकसान की भरपाई की है। इस व्‍यवहार के लिए सलमान खान खान की तारीफ की जा सकती है। इक्षिण भारत में रजनी कांत की फिल्‍में अपेक्षित कमाई नहीं करतीं तो वे भी वितरकों का नुकसान शेयर करते हैं। हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री में महेश भट्ट भी ऐसा करते रहे हैं। इससे लाभ यह होता है कि उम्‍त स्‍टारों या प्रोडक्‍शन हाउस की अगली फिल्‍में उठाने में वितरक आनाकानी नहीं करते। बहरहाल,टॉयलेट एक प्रेम कथा के वीकएंड कलेक्‍शन ने उत्‍साह का संचार किया।
रिलीज के पहले टॉयलेट एक प्रेम कथा के बारे में ट्रेड पंडित असमंजस में थे। फिल्‍म की कहानी की विचित्रता की वजह से वे अक्षय कुमार के होने के बावजूद आशंकित थे। कुछ तो कह रहे थे कि वीकएंड कलेक्‍शन 25 करोड़ भी हो जाए तो गनीमत है। उनकी आशंका के विपरीत फिल्‍म ने 51 करोड़ का कलेक्‍शन किया। पहले दिन शुक्रवार को 13.10 करोड़ का कलेक्‍शन सामान्‍य ही रहा। आप गौर करेंगे कि दर्शकों को पसंद आने पर फिल्‍म का कलेक्‍शन शनिचार और रविवार को बढ़ता है। अगर यह बढ़ोत्‍री 20 प्रतिशत से अधिक हो तो फिल्‍म की सफलता की संभावना बढ़ जाती है। ऐसी फिल्‍मों का कलेक्‍शन भी सोमवार को गिरता है और आधं से कम हो जाता है। टॉयलेट एक प्रेम कथा ने सोमवार को 12 करोड़ का कलेक्‍शन किया। चार दिनों में इस फिल्‍म ने 63 करोड़ का आंकड़ा पार कर लिया है।
हम देख रहे हैं कि अक्षय कुमार फिल्‍म बिजनेश के लिहाज से भरोसेमंद एक्‍टर के तौर पर उभरे हैं। पिछले साल इसी समय के आसपास उनकी रुस्‍तम आई थी और फिल्‍म इंडस्‍ट्री को राहत मिली थी। यह भी कहा जा सकता है कि दूसरे लोकप्रिय स्‍टारों की तरह अक्षय कुमार ने भी अपनी फिल्‍मों की रिलीज के लिए एक त्‍योहार चुन लिया है स्‍वतंत्रता दिवस। 15 अगस्‍त के आसपास रिलीज हुईं उनकी फिल्‍में सफल रही हैं।
कामयाब होने के साथ टॉयलेट एक प्रेम कथा खुले में शौच के खिलाफ जागरूकता बढ़ाने में भी सफल रही। मनोरंजन के साथ मैसेज देने की निर्देशक श्री नारायण सिंह की युक्ति काम आई। मुमकिन है और भी निर्देशक देश के लिए जरूरी मुद्दों पर मनोरंजक फिल्‍में लेकर आएं।

Tuesday, August 15, 2017

रोज़ाना : राष्‍ट्रीय भावना के गीत



रोज़ाना
राष्‍ट्रीय भावना के गीत
-अजय ब्रह्मात्‍मज
इन पंक्तियों को पढ़ने केपहले ही आप के कानों में राष्‍ट्रीय भावना से ओत-प्रोत देशभक्ति के गानों की आवाज आ रही होगी। महानगर,शहर,कस्‍बा और गांव-देहात तक में गली,नुक्‍कड़ और चौराहों पर गूंज रहे गीत स्‍फूर्ति का संचार कर रहे होंगे। अभी प्रभात फेरी का चलन कम हो गया है। स्‍वतंत्रता आंदोलन के समय हर सुबह गली-मोहल्‍लों में प्रभातफेरी की मंडलियां निकला करती थीं। सातवें दशक तक इसका चलन रहा। खास कर 15 अगस्‍त और 26 जनवरी को स्‍कूलों और शिक्षा संस्‍थाओं में इसका आयोजन होता था। तब तक देशभक्त्‍िा और आजादी का सुरूर कायम था। देश जोश के साथ उम्‍मीद में जी रहा था। बाद में बढ़ती गरीबी,असमानता और बदहाली से आजादी से मिले सपने चकनाचूर हुए और मोहभंग हुआ। धीरे-धीरे स्‍वतंत्रता दिवस औपचारिकता हो गई। अवकाश का एक दिन हो गया।

याद करें तो हमारे बचपन में स्‍वतंत्रता दिवस के दिन स्‍कूल जाने का उत्‍साह रहता था। यह उत्‍साह आज भी है,लेकिन शिक्षकों और अभिभावकों की सहभागिता की कमी से पहले सा उमंग नहीं दिखता। केंद्र में राष्‍ट्रवादी सरकार के आने के बाद देशभक्ति की भावना पर जोर देने से नए जोश का संचार हुआ है। नागरिक होने का नाते हमारा फर्ज है कि हम भारतीय होने पर गर्व महसूस करें। आजादी के लिए बलिदान और कुर्बान हुए सेनानियों को याद करते हुए राष्‍ट्र निर्माण के कार्यों में संलग्‍न हो। अपनी भूमिका चुनें और जी-जान से देश की तरक्‍की के लिए काम करें। हमें विकसित देशों के साथ अगली कतार में शामिल होना है। पिछले 70 सालों में रह गई कमियों को दूर करना है और विकास के पथ पर आगे बढ़ना है।

हिंदी फिल्‍मों ने हमेशा राष्‍ट्रीय भावना का प्रचार-प्रसार किया है। आजादी के बाद के सालों की फिल्‍में देखें या गीत सुनें तो आज भी देशभक्ति का जज्‍बा हिलारें मारने लगता है। हिंदी फिल्‍मों के नए-पुराने गीतों की लोकप्रियता का यह आलम है कि उनके बगैर आजादी से संबंधित कोई भी आयोजन अधूरा रहता है। हमवतनों को संबोधित करते ये गीत जोश के साथ उम्‍मीद भी जगाते हैं। साथ रहने और चलने का संदेश देते हैं। उन सेनानियों की कुर्बानियों की याद दिलाते हैं,जिनकी वजह से हमारा देश सदियों की गुलामी से आजाद हुआ। सीमाओं पर तैनात हमारी सेना की जागती चौकस निगाहें ही हमारी नींद,चैन और सुरक्षा का खयाल रखती हैं। फिल्‍मी गीतकारों ने ऐसे वीरों का यथोचित गुणगान किया है। हमें गुनगुनाने के लिए ऐसे गीत दिए हैं कि उनके जरिए हम अपनी श्रद्धा जाहिर कर सकें।

देशथक्ति के इन फिल्‍मी गीतों को गाने-गुनगुनाने के बीच ठहर कर देख लें कि क्‍या हमारे परिवार के सभी सदस्‍यों को राष्‍ट्र गान(जन गण मन) और राष्‍ट्र गीत(वंदे मातरम) याद हैं?

Thursday, August 10, 2017

रोज़ाना : ’चक दे! इंडिया’ के दस साल



रोज़ाना
चक दे! इंडिया के दस साल
-अजय ब्रह्मात्‍मज

यह 2007 की बात है। यशराज फिल्‍म्‍स ने एक साल पहले कबीर खान निर्देशित काबुल एक्‍सप्रेस का निर्माण किया था। फिल्‍म तो अधिक नहीं चली थी,लेकिन उसे अच्‍छी तारीफ मिली थी। उन्‍हें लगा था कि प्रेकानियों से इतर फिल्‍में भी बनायी जा सकती हैं। तब तक जयदीप साहनी यशराज की टीम में शामिल हो चुके थे। वे कुछ दिनों से भारत की महिला हाकी टीम पर रिसर्च कर रहे थे। उन्‍होंने बातों-बातों में आदित्‍य चोपड़ा को अपने विषय के बारे में बताया था। तब तक जयदीप साहनी ने तय नहीं किया था कि वे किताब लिखंगे या फिल्‍म। आदित्‍य चोपड़ा के प्रोत्‍साहन ने जयदीप साहनी को हौसला दिया। उन्‍होंने एक मुश्किल फिल्‍म लिखी। हालांकि फिल्‍म में शाह रूख खान थे,लेकिन उनके साथ कोई एक हीरोइन नहीं बल्कि लड़कियों की जमात थी। उन लड़कियों को लेकर उन्‍हें भारत की महिला हाकी टीम के कोच के रूप में ऐसी टीम तैयार करनी थी,जो जीत कर लौटे।
यह आदित्‍य चोपड़ा की हिम्‍मत और शाह रूख खान का विश्‍वास ही था कि लेखक जयदीप साहनी और निर्देशक शिमित अमीन भारत की एक यादगार फिल्‍म पूरी की। यह फिल्‍म पसंद की गई और समय बीतने के साथ पिछले दस सालों में खेल पर बनी सबसे रोचक फिल्‍म हो गई है। चक दे! इंडिया राष्‍ट्रीय गर्व है। इस फिल्‍म का शीर्षक गीत आज भी स्‍टेडियम और मैदानों में गूंजता है। खिलाडि़यों में जोश भरता है और टीम इंडिया के रूप में खेल में विजयी होने की प्रेरणा देता है। चक दे! इंडिया प्रमाण है कि कुछ फिल्‍में रिलीज के बाद दर्शकों के बीच बड़ी होती हैं। दर्शक ही उन्‍हे पालते और बड़ी बना देते हैं।
चक दे! इंडिया कबीर खान के साथ उन लड़कियों की भी कहानी है,जो टीम इंडिया के रूप में संगठित होती हैं। लक्ष्‍य हासिल करती हैं। कबीर खान कभी भारतीय हाकी टीम के कप्‍तान हुआ करते थे। पाकिस्‍तान से मैच हारने के बाद उन्‍हें बेइज्‍ज्‍त होना पड़ता है। सात सालों के बाद महिला हाकी टीम के कोच के रूप में चुने जाने के बाद वे अपनी बेइज्‍जती को तारीफ में बदलने के मकसद से जुट जाते हैं। पहली चुनौती सभी लड़कियों में टीम भावना पैदा करना और उन्‍हें देश के लिए खेलने की प्रेरणा देना है। लड़कियां हाकी के अलावा सारे खेल खेलती हैं और पर्सनल एजेंडा के तहत स्‍कोर बनाती हैं। उनमें टीम एनर्जी नहीं है। कबीर खान उन्‍हें टीम के तौर पर तैयार करने के बाद मैदान में उतरते हैं। जीत हासिल होती है।
लेखक जयदीप साहनी और निर्देशक शिमित अमीन 10 अगस्‍त,2007 को रिलीज हुई चक दे! इंडिया की कामयाबी का श्रेय दर्शकों को देते हैं। यह फिल्‍म दर्शकों में आशा का संचार करती है। खेल भावना के साथ राष्‍ट्रीय भावना जगाती है। फिल्‍म का शीर्षक गीत चक दे किसी उद्बोधन गीत की तरह झंकृत करता है।

Tuesday, August 8, 2017

रोज़ाना : फिल्‍म प्रचार की नित नई युक्तियां



रोज़ाना
फिल्‍म प्रचार की नित नई युक्तियां
-अजय ब्रह्मात्‍मज
हाल ही में अनुपम खेर ने अपनी नई फिल्‍म रांची डायरीज के पोस्‍टर जारी किए। इस इवेंट के लिए उन्‍होंने मुंबई के उपनगर में स्थित खेरवाड़ी को चुना। 25-30 साल पहले यह फिल्‍मों में संघर्षरत कलाकारों की प्रिय निम्‍न मध्‍यवर्गीय बस्‍ती हुआ करती थी। कमरे और मकान सस्‍ते में मिल जाया करते थे। मुंबई में अनुपम खेर का पहला ठिकाना यहीं था। यहीं 8x10 के एक कमरे में वे चार दोस्‍तों के साथ रहते थे। उनकी नई फिल्‍म रांची डायरीज में छोटे शहर के कुछ लड़के बड़े ख्‍वाबों के साथ जिंदगी की जंग में उतरते हैं। फिल्‍म की थीम अनुपम खेर को अपने अतीत से मिलती-जुलती लगी तो उन्‍होंने पहले ठिकाने को ही इवेंट के लिए चुना लिया। इस मौके पर उन्‍होंने उन दिनों के बारे में भी बताया और अपने संघर्ष का जिक्र किया।
प्रचार के लिए अतीत के लमहों को याद करना और सभी के साथ उसे शेयर करना अनुपम खेर को विनम्र बनाता है। प्रचारकों को अवसर मिल जाता है। इसी बहाने चैनलों और समाचार पत्रों में अतिरिक्‍त जगह मिल जाती है। इन दिनों प्रचारको को हर नई फिल्‍म के साथ प्रचार की नई युक्तियों के बारे में सोचना पड़ता है। फिल्‍म अगर जब हैरी मेट सेजल जैसी बड़ी हो तो युक्तियां भी नायाब और बड़ी होती हैं। मसलन,‍ि‍पछले दिनों बनारस में शाह रूख खान अपनी हीरोइन अनुष्‍का शर्मा को रिझाने के लिए गायक,अभिनेता और भाजपा के सांसद मनोज तिवारी की मदद ले रहे थे। हांलांकि इस प्रचार से फिल्‍म को कोई ताल्‍लुक नहीं था,लेकिन बनारस के लोगों को खुश करने के लिए भोजपुरी के एक लोकप्रिय गीत सहारा लिया गया। लगावेलु जे लिपिस्टिक... इस गीत की पंक्तियों को फेरबदल के मनोज तिवारी ने शाह रूख खान को सिखाया और उसे अनुष्‍का शर्मा के लिए उन्‍होंने गाया। मनोज तिवारी की मदद से किए गए इस प्रचार से सोशल मीडिया पर नाराजगी वायरल हुई। कुछ महीनों पहले किसी स्‍कूल के इवेंट में एक शिक्षिका के गीत गाने के आगह पर मनोज तिवारी ने उन्‍हें फटकार लगाई थी। सभी उसी प्रसंग को याद कर इस इवेंट की भर्त्‍सना करने लगे। प्रचार का उल्‍टा असर हुआ।
एक रोचक कोशिश अनुचित संदर्भ से बेअसर हो गई। प्रचारकों या या फिल्‍म से संबंधि निर्माता,निर्देशक और सितारों को भी मालूम नहीं रहता कि किस इवेंट का क्‍या असर होगा? बस वे दांव खेल रहे होते हैं। फिल्‍मअ चल जाती है तो मान लिया जाता है कि सारी युक्तियां सही थीं। फिल्‍म असफल रहे तो होंठ सिल जाते हैं।

Saturday, August 5, 2017

रोज़ाना : दर्शकों तक नहीं पहुंचती छोटी फिल्‍में



रोज़ाना
दर्शकों तक नहीं पहुंचती छोटी फिल्‍में
-अजय ब्रह्मात्‍मज
बड़े बिजनेश के लोभ में बड़ी फिल्‍मों को बड़ी रिलीज मिलती है। यह दस्‍तूर पुराना है। सिंगल स्‍क्रीन के जमाने में एक ही शहर के अनेक सिनेमाघरों में पॉपुलर फिल्‍में लगाने का चलन था। फिर स्‍टेशन,बस स्‍टेशन और बाजार के पास के सिनेमाघरों में वे फिल्‍म हफ्तों चलती थीं। दूसरे सिनेमा घरों में दूसरी फिल्‍मों को मौका मिल जाता थो। सिंगल स्‍क्रीन में भी सुबह के शो पैरेलल,अंग्रेजी या साउथ की डब फिल्‍मों के लिए सुरक्षित रहते थे। कम में ही गुजारा करने के भारतीय समाज के दर्शन से फिल्‍मों का प्रदर्शन भी प्रेरित था। हर तरह की नई और कभी-कभी पुरानी फिल्‍मों को भी सिनेमाघर मिल जाते थे। तब फर्स्‍ट डे फर्स्‍ट शो या पहले वीकएंड में ही फिल्‍में देखने की हड़बड़ी नहीं रहती थी। छोटी फिल्‍में हफ्तों क्‍या महीनों बाद भी आती थीं तो दर्शक मिल जाते थे।
मल्‍टीप्‍लेक्‍स आने के बाद ऐसा लगा था कि छोटी फिल्‍मों को प्रदर्शन का स्‍पेस मिल जाएगा। शुरू में ऐसा हुआ भी,लेकिन धीरे-धीरे ज्‍यादा कमाई के लिए मल्‍टीप्‍लेक्‍स मैनेजर बड़ी फिल्‍मों को ज्‍यादा शो देने लगे और छोटी फिल्‍मों के शो को टरकाने लगे। शो लगाना पड़ा तो समय ऐसा रखा कि दर्शकों को अलग से समय निकालना पड़े। उन्‍हें प्राइम टाइम नहीं दिया। मल्‍टीप्‍लेक्‍स के इस रवैए की वजह से ही महाराष्‍ट्र में अध्‍यादेश जारी करना पड़ा कि मराठी फिल्‍मों को मल्‍टीप्‍लेक्‍स में प्राइम टाइम के शो मिलें। सभी जानते हैं कि इस कदम से मराठी फिल्‍मों के दर्शक बढ़ हैं और आखिरकार आमदनी बढ़ी है।
हिंदी की छोटी फिल्‍मों के लिए प्रदर्शन की सहूलियतें नहीं बढ़ रही हैं। उन्‍हें वितरक और प्रदर्शक नहीं मिल पाते। ऐसी अनेक फिल्‍में होती हैं,जिन्‍हें देखने से दर्शक वंचित रह जाते हैं। इसी हफ्ते की गुड़गांव को देख लें। शंकर रमन की यह उच्‍च्‍ क्‍वालिटी की फिल्‍म को पर्याप्‍त शो और थिएटर नहीं मिले हैं। यह फिल्‍म पटना जैसे कथित छोटे शहर में नहीं पहुंची है। संचार माध्‍यमों के प्रसार और इंटरनेट के इस दौर में पूरे देश को क्‍वालिटी फिल्‍म की जानकारी दर्शकों को मिल जाती है। वे भी अपने शहर में ऐसी फिल्‍मों का इंतजार करते हैं,लेकिन प्रदर्शक सालों पुरानी धारणा के मुताबिक तय करता है कि किस तरह के दर्शक कैसी फिल्‍म में रुचि लेते हैं? उन्‍होंने ऐसा कोई सर्वे या अध्‍ययन नहीं किया है। बस,मान लिया गया है कि गुड़गांव तो मैट्रो के खास दर्शक ही देखेंगे। नतीजा यह हो रहा है कि छोटी फिल्‍में छोटे शहरों में नहीं पहुंच पा रही हैं।  

Thursday, August 3, 2017

रोज़ाना : नाखुश हैं फिल्‍मकार



रोज़ाना
नाखुश हैं फिल्‍मकार
-अजय ब्रह्मात्‍मज
फिल्‍म और टीवी डायरेक्‍टर्स के संगठन इफ्तडा ने बाबूमोशाय बंदूकबाज को सीबीएफसी की तरफ से मिले 48 कट्स के मामले में विरोध दर्ज किया है। विरोध दर्ज करने के लिए उन्‍होंने बाबूमोशाय बंदूकबाज के डायरेक्‍टर और प्रोड्यूसर के साथ संगठन के अन्‍य सदस्‍य भी हाजिर हुए। इनमें उड़ता पंजाब के डायरेक्‍टर अभिेषेक चौबे और लिपस्टिक अंडर माय बुर्का की डायरेक्‍टा अलंकृता भीवास्‍तव भी थीं। सभी ने सीबीएफसी के साथ हुए अपने कड़वे अनुभवों को शेयर किया। उन्‍होंने आश्‍चर्य व्‍यक्‍त किया कि पिछले तीन सालों में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के मंत्री बदल गए,लेकिन अध्‍यक्ष बने हुए हैं। उन्‍हें नहीं बदला जा रहा है। उनके नेतृत्‍व में सीबीएफसी लगातार अपने फैसलों में नीचे की ओर जा रही है। फिल्‍मकारों की मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं। एक खौफ का माहौल सा बन गया है,जिसमें सर्टिफिकेशन के लिए फिल्‍म जमा करते समय निर्माता-निर्देशक डरे रहते हैं कि मालूम नहीं क्‍या फरमान आए? और उन्‍हें और कितने चक्‍कर लगाने पड़ें।
बामूमोशाय बंदूकबाज उत्‍तर भारत के ग्रामीण इलाके की फिल्‍म है। निर्देशक कुशाण नंदी ने परिवेश और विषय के मुताबिक फिल्‍म के किरदार गढ़े हैं और उन्‍हें वैसी ही भाषा दी है। परीक्षण समिति फिल्‍म देखने के बाद परीक्षण समिति ने कहा कि इसे एडल्‍ट सर्टि‍फिकेट मिलेगा। इसकी लिस्‍ट दे दी गई,जिसमें बोलचाल की भाषा के आमफहम शब्‍द भी थे। अगर किसी फिल्‍म को यानी एडल्‍ट सर्टिफिकेट मिलता है तो उसे कट देने की जरूरत नहीं होती। यहां परीक्षण समिति का तर्क था कि एडल्‍ट फिल्‍में बच्‍चे भी देखते हैं। उनके कानों में ऐसे शब्‍द नहीं आने चाहिए। अब यह सिनेमाघर और स्‍थानीय लॉ एंड आर्डर का काम देख रहे अधिकारियों की जिम्‍मेदारी है कि एडल्‍ट फिल्‍मों में बच्‍चे न आएं। भला सीबीएफसी के सदस्‍य यह तर्क कैसे दे सकते हैं? इतना ही नहीं निर्माता-निर्देशक को निर्णय सुनाते समय एक महिला सदस्‍य ने निर्माता किरण श्रॉफ से पूछा कि महिला होकर आप ऐसी फिल्‍म कैसे बना सकती हैं? अभी वह जवाब दें इसके पहले ही दूसरे पुरुष सदस्‍य की टिप्‍पणी आई,यह महिला कहां हैं? इन्‍होंने तो पैंट-शर्ट पहन रखी है। संबंधित अधिकारियों और सूचना एवं प्रसारण मंत्री स्‍मृति ईरानी को ऐसी टिप्‍पणी का संज्ञान लेना चाहिए। और उचित कार्रवाई करनी चाहिए।
इस विरोध सभा में भुक्‍तभेगी निर्देशकों ने स्‍पष्‍ट कहा और माना कि सीबीएफसी का लापरवाह रवैया गैरजिम्‍मेदाराना है। उसके फैसलों से डर और खौफ का माहौल बन रहा है। फिल्‍म में मुख्‍य किरदार निभा रहे नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने चुटकी ली कि अब अपराधी किरदार गोली चलाने के पहले कहेगा कि आइण्‍ जनाब,मैं आप को गोली मारूंगा। उसके मुंह से गाली नहीं निकलेगी। उन्‍होंने कहा कि ऐसे माहौल में हम कलाकार कैसे किरदारों और परिवेश के हिसाब से लहजा लाएंगे। यही बात सुधीर मिश्रा ने भी कही। उन्‍होंने बताया कि हजारों ख्‍वाहिशें ऐसी के समय सीबीएफसी के सदस्‍य कह रहे थेकि इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी नहीं लगाई थी। और अगर लगाई थी तो उनके नाम का जिक्र न करें। तात्‍पर्य यह है कि यह मर्ज पुराना है। जो समय के साथ और गंभीर हो गया है। अब राजनीतिक नेताओं के नाम और दूसरे अनेक शब्‍दों पर आपत्ति होने लगी है। उन्‍होंने सुझाव दिया कि श्‍याम बेनेगल के नूतृत्‍व में बनी समिति के सुझावों का जल्‍दी से जल्‍दी लागू कर दिया जाए।