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Thursday, August 17, 2017

रोज़ाना : हमदर्द शाह रूख खान



रोज़ाना
हमदर्द शाह रूख खान
-अजय ब्रह्मात्‍मज
कल सायरा बानो ने दिलीप कुमार के ट्वीटर हैंडल पर कुछ तस्‍वीरें शेयर कीं। उनमें शाह रूख खान कृशकाय हो चुके महान अभिनेता को सोफे पर आराम से बिठाने की कोशिश कर रहे हैं। ये तस्‍वीरें आंखें नम कर गईं। पहले तो लगा कि सायरा जी को इन अंतरंग क्षणों की तस्‍वीरें नहीं शेयर करनी चाहिए थी। फिर मर्माहत मन ने कहा कि ऐसी तस्‍वीरें धर-परिवार और देश-समाज के बुजुर्गों के प्रति हमारी हमदर्दी की मिसाल बन सकती हैं। फिल्‍मों के फालोअर और शाह रूख खान के प्रशंसक गाहे-बगाहे अपने जीवन में इसे अपना सकते हैं। दिलीप कुमार के प्रति शाह रूख खान के आदर और प्‍यार से फिल्‍म इंडस्‍ट्री वाकिफ है। सायरा जी कई मौकों पर कह चुके हैं कि दिलीप साहेब उन्‍हें अपनी औलाद की तरह मानते हैं। यह किसी भी बीमार पिता और तीमारदार बेटे की तस्‍वीर हो सकती है।
शाह रूख खान के बारे में अनेक गलतफहमियां हैं। अपनी बेरुखी और साफगोई से वे ऐसी इमेज बना चुके हैं कि उन्‍हें किसी की भी नहीं पड़ी है। वे केल खुद और खुद की परवाह करते हैं। हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री के गलाकाट माहौल में ऐसे मिजाज के सुबूत और उाहरण भी मिल जाते हैं। शाह रूख को करीब से जानने वाले बताते हैं कि वे सभी परिचितों,दोस्‍तों और रिश्‍तेदारों का पूरा खयाल रखते हैं। मशहूर व्‍यक्ति जब खयाल करता है तो उसमें पैसे भी खर्च होते हैं। शाह रूख खान इस मामले में दिलदार माने जाते हैं। उन्‍होंने पिछले दिनों एक सीनियर जर्नलिस्‍ट के इलाज का पूरा खर्च उठाया और उसकी कहीं चर्चा नहीं की।
मुमकिन है कुछ लोगों ने आमिर खान के पानी फाउंडेशन के कार्यक्रम में उन्‍हें बोलते सुना हो। पुणे के इस कार्यक्रम में अ‍ामिर खान का जाना था। अचानक स्‍वाइन फ्लू की चपेट में आने से वे नहीं जा सके थे। उन्‍होंने शाह रूख खान से कार्यक्रम संभालने का दोसतना आग्रह किया। खुद खेटिल होने के बावजूद शाह रूख खान ने प्रोग्राम में हिस्‍सा लिया। निमंत्रित श्रोताओं को आमिर खान की कमी नहीं महसूस होने दी। पुरानी कहावत है कि जो वक्‍त्‍-जरूरत पर काम आए,वही दोस्‍त है। शाह रूख खान ने दोस्‍ती की मिसाल पेश की है। आम धारणा है कि खानत्रयी के तीनों खान एक-दूसरे को नापसंद करते हैं। सच्‍चाई यह है कि वे एक-दूसरे की मदद के लिए हमेशा तैयार रहते हैं।
हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री में मतलबी रिश्‍तों की अनेक दास्‍ताने हैं। हर नया व्‍यक्ति सुनाते समय उनमें कुछ नया जोड़ देता है। मजे लेता है। हमें ऐसी पॉजीटिव तस्‍वीरों और हरकतों पर गौर करना चाहिए। इनसे भी सीखना चाहिए।

Wednesday, August 16, 2017

रोज़ाना : ’टॉयलेट...’ से मिली राहत



रोज़ाना
टॉयलेट... से मिली राहत
-अजय ब्रह्मात्‍मज

अक्षय कुमार और भूमि पेडणेकर की फिल्‍म टॉयलेट एक प्रेम कथा के कलेक्‍शन से हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री को राहत मिली है। पिछलें कई महीनों से हर हफ्ते रिलीज हो रही फिल्‍में बाक्‍स आफिस पर खनक नहीं रही थीं। सलमान खान और शाह रूख खान की फिल्‍में बिजनेश की बड़ी उम्‍मीद पर खरी नहीं उतरीं। खबर है कि सलमान खान ने वितरकों के नुकसान की भरपाई की है। इस व्‍यवहार के लिए सलमान खान खान की तारीफ की जा सकती है। इक्षिण भारत में रजनी कांत की फिल्‍में अपेक्षित कमाई नहीं करतीं तो वे भी वितरकों का नुकसान शेयर करते हैं। हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री में महेश भट्ट भी ऐसा करते रहे हैं। इससे लाभ यह होता है कि उम्‍त स्‍टारों या प्रोडक्‍शन हाउस की अगली फिल्‍में उठाने में वितरक आनाकानी नहीं करते। बहरहाल,टॉयलेट एक प्रेम कथा के वीकएंड कलेक्‍शन ने उत्‍साह का संचार किया।
रिलीज के पहले टॉयलेट एक प्रेम कथा के बारे में ट्रेड पंडित असमंजस में थे। फिल्‍म की कहानी की विचित्रता की वजह से वे अक्षय कुमार के होने के बावजूद आशंकित थे। कुछ तो कह रहे थे कि वीकएंड कलेक्‍शन 25 करोड़ भी हो जाए तो गनीमत है। उनकी आशंका के विपरीत फिल्‍म ने 51 करोड़ का कलेक्‍शन किया। पहले दिन शुक्रवार को 13.10 करोड़ का कलेक्‍शन सामान्‍य ही रहा। आप गौर करेंगे कि दर्शकों को पसंद आने पर फिल्‍म का कलेक्‍शन शनिचार और रविवार को बढ़ता है। अगर यह बढ़ोत्‍री 20 प्रतिशत से अधिक हो तो फिल्‍म की सफलता की संभावना बढ़ जाती है। ऐसी फिल्‍मों का कलेक्‍शन भी सोमवार को गिरता है और आधं से कम हो जाता है। टॉयलेट एक प्रेम कथा ने सोमवार को 12 करोड़ का कलेक्‍शन किया। चार दिनों में इस फिल्‍म ने 63 करोड़ का आंकड़ा पार कर लिया है।
हम देख रहे हैं कि अक्षय कुमार फिल्‍म बिजनेश के लिहाज से भरोसेमंद एक्‍टर के तौर पर उभरे हैं। पिछले साल इसी समय के आसपास उनकी रुस्‍तम आई थी और फिल्‍म इंडस्‍ट्री को राहत मिली थी। यह भी कहा जा सकता है कि दूसरे लोकप्रिय स्‍टारों की तरह अक्षय कुमार ने भी अपनी फिल्‍मों की रिलीज के लिए एक त्‍योहार चुन लिया है स्‍वतंत्रता दिवस। 15 अगस्‍त के आसपास रिलीज हुईं उनकी फिल्‍में सफल रही हैं।
कामयाब होने के साथ टॉयलेट एक प्रेम कथा खुले में शौच के खिलाफ जागरूकता बढ़ाने में भी सफल रही। मनोरंजन के साथ मैसेज देने की निर्देशक श्री नारायण सिंह की युक्ति काम आई। मुमकिन है और भी निर्देशक देश के लिए जरूरी मुद्दों पर मनोरंजक फिल्‍में लेकर आएं।

Tuesday, August 15, 2017

रोज़ाना : राष्‍ट्रीय भावना के गीत



रोज़ाना
राष्‍ट्रीय भावना के गीत
-अजय ब्रह्मात्‍मज
इन पंक्तियों को पढ़ने केपहले ही आप के कानों में राष्‍ट्रीय भावना से ओत-प्रोत देशभक्ति के गानों की आवाज आ रही होगी। महानगर,शहर,कस्‍बा और गांव-देहात तक में गली,नुक्‍कड़ और चौराहों पर गूंज रहे गीत स्‍फूर्ति का संचार कर रहे होंगे। अभी प्रभात फेरी का चलन कम हो गया है। स्‍वतंत्रता आंदोलन के समय हर सुबह गली-मोहल्‍लों में प्रभातफेरी की मंडलियां निकला करती थीं। सातवें दशक तक इसका चलन रहा। खास कर 15 अगस्‍त और 26 जनवरी को स्‍कूलों और शिक्षा संस्‍थाओं में इसका आयोजन होता था। तब तक देशभक्त्‍िा और आजादी का सुरूर कायम था। देश जोश के साथ उम्‍मीद में जी रहा था। बाद में बढ़ती गरीबी,असमानता और बदहाली से आजादी से मिले सपने चकनाचूर हुए और मोहभंग हुआ। धीरे-धीरे स्‍वतंत्रता दिवस औपचारिकता हो गई। अवकाश का एक दिन हो गया।

याद करें तो हमारे बचपन में स्‍वतंत्रता दिवस के दिन स्‍कूल जाने का उत्‍साह रहता था। यह उत्‍साह आज भी है,लेकिन शिक्षकों और अभिभावकों की सहभागिता की कमी से पहले सा उमंग नहीं दिखता। केंद्र में राष्‍ट्रवादी सरकार के आने के बाद देशभक्ति की भावना पर जोर देने से नए जोश का संचार हुआ है। नागरिक होने का नाते हमारा फर्ज है कि हम भारतीय होने पर गर्व महसूस करें। आजादी के लिए बलिदान और कुर्बान हुए सेनानियों को याद करते हुए राष्‍ट्र निर्माण के कार्यों में संलग्‍न हो। अपनी भूमिका चुनें और जी-जान से देश की तरक्‍की के लिए काम करें। हमें विकसित देशों के साथ अगली कतार में शामिल होना है। पिछले 70 सालों में रह गई कमियों को दूर करना है और विकास के पथ पर आगे बढ़ना है।

हिंदी फिल्‍मों ने हमेशा राष्‍ट्रीय भावना का प्रचार-प्रसार किया है। आजादी के बाद के सालों की फिल्‍में देखें या गीत सुनें तो आज भी देशभक्ति का जज्‍बा हिलारें मारने लगता है। हिंदी फिल्‍मों के नए-पुराने गीतों की लोकप्रियता का यह आलम है कि उनके बगैर आजादी से संबंधित कोई भी आयोजन अधूरा रहता है। हमवतनों को संबोधित करते ये गीत जोश के साथ उम्‍मीद भी जगाते हैं। साथ रहने और चलने का संदेश देते हैं। उन सेनानियों की कुर्बानियों की याद दिलाते हैं,जिनकी वजह से हमारा देश सदियों की गुलामी से आजाद हुआ। सीमाओं पर तैनात हमारी सेना की जागती चौकस निगाहें ही हमारी नींद,चैन और सुरक्षा का खयाल रखती हैं। फिल्‍मी गीतकारों ने ऐसे वीरों का यथोचित गुणगान किया है। हमें गुनगुनाने के लिए ऐसे गीत दिए हैं कि उनके जरिए हम अपनी श्रद्धा जाहिर कर सकें।

देशथक्ति के इन फिल्‍मी गीतों को गाने-गुनगुनाने के बीच ठहर कर देख लें कि क्‍या हमारे परिवार के सभी सदस्‍यों को राष्‍ट्र गान(जन गण मन) और राष्‍ट्र गीत(वंदे मातरम) याद हैं?

Thursday, August 10, 2017

रोज़ाना : ’चक दे! इंडिया’ के दस साल



रोज़ाना
चक दे! इंडिया के दस साल
-अजय ब्रह्मात्‍मज

यह 2007 की बात है। यशराज फिल्‍म्‍स ने एक साल पहले कबीर खान निर्देशित काबुल एक्‍सप्रेस का निर्माण किया था। फिल्‍म तो अधिक नहीं चली थी,लेकिन उसे अच्‍छी तारीफ मिली थी। उन्‍हें लगा था कि प्रेकानियों से इतर फिल्‍में भी बनायी जा सकती हैं। तब तक जयदीप साहनी यशराज की टीम में शामिल हो चुके थे। वे कुछ दिनों से भारत की महिला हाकी टीम पर रिसर्च कर रहे थे। उन्‍होंने बातों-बातों में आदित्‍य चोपड़ा को अपने विषय के बारे में बताया था। तब तक जयदीप साहनी ने तय नहीं किया था कि वे किताब लिखंगे या फिल्‍म। आदित्‍य चोपड़ा के प्रोत्‍साहन ने जयदीप साहनी को हौसला दिया। उन्‍होंने एक मुश्किल फिल्‍म लिखी। हालांकि फिल्‍म में शाह रूख खान थे,लेकिन उनके साथ कोई एक हीरोइन नहीं बल्कि लड़कियों की जमात थी। उन लड़कियों को लेकर उन्‍हें भारत की महिला हाकी टीम के कोच के रूप में ऐसी टीम तैयार करनी थी,जो जीत कर लौटे।
यह आदित्‍य चोपड़ा की हिम्‍मत और शाह रूख खान का विश्‍वास ही था कि लेखक जयदीप साहनी और निर्देशक शिमित अमीन भारत की एक यादगार फिल्‍म पूरी की। यह फिल्‍म पसंद की गई और समय बीतने के साथ पिछले दस सालों में खेल पर बनी सबसे रोचक फिल्‍म हो गई है। चक दे! इंडिया राष्‍ट्रीय गर्व है। इस फिल्‍म का शीर्षक गीत आज भी स्‍टेडियम और मैदानों में गूंजता है। खिलाडि़यों में जोश भरता है और टीम इंडिया के रूप में खेल में विजयी होने की प्रेरणा देता है। चक दे! इंडिया प्रमाण है कि कुछ फिल्‍में रिलीज के बाद दर्शकों के बीच बड़ी होती हैं। दर्शक ही उन्‍हे पालते और बड़ी बना देते हैं।
चक दे! इंडिया कबीर खान के साथ उन लड़कियों की भी कहानी है,जो टीम इंडिया के रूप में संगठित होती हैं। लक्ष्‍य हासिल करती हैं। कबीर खान कभी भारतीय हाकी टीम के कप्‍तान हुआ करते थे। पाकिस्‍तान से मैच हारने के बाद उन्‍हें बेइज्‍ज्‍त होना पड़ता है। सात सालों के बाद महिला हाकी टीम के कोच के रूप में चुने जाने के बाद वे अपनी बेइज्‍जती को तारीफ में बदलने के मकसद से जुट जाते हैं। पहली चुनौती सभी लड़कियों में टीम भावना पैदा करना और उन्‍हें देश के लिए खेलने की प्रेरणा देना है। लड़कियां हाकी के अलावा सारे खेल खेलती हैं और पर्सनल एजेंडा के तहत स्‍कोर बनाती हैं। उनमें टीम एनर्जी नहीं है। कबीर खान उन्‍हें टीम के तौर पर तैयार करने के बाद मैदान में उतरते हैं। जीत हासिल होती है।
लेखक जयदीप साहनी और निर्देशक शिमित अमीन 10 अगस्‍त,2007 को रिलीज हुई चक दे! इंडिया की कामयाबी का श्रेय दर्शकों को देते हैं। यह फिल्‍म दर्शकों में आशा का संचार करती है। खेल भावना के साथ राष्‍ट्रीय भावना जगाती है। फिल्‍म का शीर्षक गीत चक दे किसी उद्बोधन गीत की तरह झंकृत करता है।

Tuesday, August 8, 2017

रोज़ाना : फिल्‍म प्रचार की नित नई युक्तियां



रोज़ाना
फिल्‍म प्रचार की नित नई युक्तियां
-अजय ब्रह्मात्‍मज
हाल ही में अनुपम खेर ने अपनी नई फिल्‍म रांची डायरीज के पोस्‍टर जारी किए। इस इवेंट के लिए उन्‍होंने मुंबई के उपनगर में स्थित खेरवाड़ी को चुना। 25-30 साल पहले यह फिल्‍मों में संघर्षरत कलाकारों की प्रिय निम्‍न मध्‍यवर्गीय बस्‍ती हुआ करती थी। कमरे और मकान सस्‍ते में मिल जाया करते थे। मुंबई में अनुपम खेर का पहला ठिकाना यहीं था। यहीं 8x10 के एक कमरे में वे चार दोस्‍तों के साथ रहते थे। उनकी नई फिल्‍म रांची डायरीज में छोटे शहर के कुछ लड़के बड़े ख्‍वाबों के साथ जिंदगी की जंग में उतरते हैं। फिल्‍म की थीम अनुपम खेर को अपने अतीत से मिलती-जुलती लगी तो उन्‍होंने पहले ठिकाने को ही इवेंट के लिए चुना लिया। इस मौके पर उन्‍होंने उन दिनों के बारे में भी बताया और अपने संघर्ष का जिक्र किया।
प्रचार के लिए अतीत के लमहों को याद करना और सभी के साथ उसे शेयर करना अनुपम खेर को विनम्र बनाता है। प्रचारकों को अवसर मिल जाता है। इसी बहाने चैनलों और समाचार पत्रों में अतिरिक्‍त जगह मिल जाती है। इन दिनों प्रचारको को हर नई फिल्‍म के साथ प्रचार की नई युक्तियों के बारे में सोचना पड़ता है। फिल्‍म अगर जब हैरी मेट सेजल जैसी बड़ी हो तो युक्तियां भी नायाब और बड़ी होती हैं। मसलन,‍ि‍पछले दिनों बनारस में शाह रूख खान अपनी हीरोइन अनुष्‍का शर्मा को रिझाने के लिए गायक,अभिनेता और भाजपा के सांसद मनोज तिवारी की मदद ले रहे थे। हांलांकि इस प्रचार से फिल्‍म को कोई ताल्‍लुक नहीं था,लेकिन बनारस के लोगों को खुश करने के लिए भोजपुरी के एक लोकप्रिय गीत सहारा लिया गया। लगावेलु जे लिपिस्टिक... इस गीत की पंक्तियों को फेरबदल के मनोज तिवारी ने शाह रूख खान को सिखाया और उसे अनुष्‍का शर्मा के लिए उन्‍होंने गाया। मनोज तिवारी की मदद से किए गए इस प्रचार से सोशल मीडिया पर नाराजगी वायरल हुई। कुछ महीनों पहले किसी स्‍कूल के इवेंट में एक शिक्षिका के गीत गाने के आगह पर मनोज तिवारी ने उन्‍हें फटकार लगाई थी। सभी उसी प्रसंग को याद कर इस इवेंट की भर्त्‍सना करने लगे। प्रचार का उल्‍टा असर हुआ।
एक रोचक कोशिश अनुचित संदर्भ से बेअसर हो गई। प्रचारकों या या फिल्‍म से संबंधि निर्माता,निर्देशक और सितारों को भी मालूम नहीं रहता कि किस इवेंट का क्‍या असर होगा? बस वे दांव खेल रहे होते हैं। फिल्‍मअ चल जाती है तो मान लिया जाता है कि सारी युक्तियां सही थीं। फिल्‍म असफल रहे तो होंठ सिल जाते हैं।

Saturday, August 5, 2017

रोज़ाना : दर्शकों तक नहीं पहुंचती छोटी फिल्‍में



रोज़ाना
दर्शकों तक नहीं पहुंचती छोटी फिल्‍में
-अजय ब्रह्मात्‍मज
बड़े बिजनेश के लोभ में बड़ी फिल्‍मों को बड़ी रिलीज मिलती है। यह दस्‍तूर पुराना है। सिंगल स्‍क्रीन के जमाने में एक ही शहर के अनेक सिनेमाघरों में पॉपुलर फिल्‍में लगाने का चलन था। फिर स्‍टेशन,बस स्‍टेशन और बाजार के पास के सिनेमाघरों में वे फिल्‍म हफ्तों चलती थीं। दूसरे सिनेमा घरों में दूसरी फिल्‍मों को मौका मिल जाता थो। सिंगल स्‍क्रीन में भी सुबह के शो पैरेलल,अंग्रेजी या साउथ की डब फिल्‍मों के लिए सुरक्षित रहते थे। कम में ही गुजारा करने के भारतीय समाज के दर्शन से फिल्‍मों का प्रदर्शन भी प्रेरित था। हर तरह की नई और कभी-कभी पुरानी फिल्‍मों को भी सिनेमाघर मिल जाते थे। तब फर्स्‍ट डे फर्स्‍ट शो या पहले वीकएंड में ही फिल्‍में देखने की हड़बड़ी नहीं रहती थी। छोटी फिल्‍में हफ्तों क्‍या महीनों बाद भी आती थीं तो दर्शक मिल जाते थे।
मल्‍टीप्‍लेक्‍स आने के बाद ऐसा लगा था कि छोटी फिल्‍मों को प्रदर्शन का स्‍पेस मिल जाएगा। शुरू में ऐसा हुआ भी,लेकिन धीरे-धीरे ज्‍यादा कमाई के लिए मल्‍टीप्‍लेक्‍स मैनेजर बड़ी फिल्‍मों को ज्‍यादा शो देने लगे और छोटी फिल्‍मों के शो को टरकाने लगे। शो लगाना पड़ा तो समय ऐसा रखा कि दर्शकों को अलग से समय निकालना पड़े। उन्‍हें प्राइम टाइम नहीं दिया। मल्‍टीप्‍लेक्‍स के इस रवैए की वजह से ही महाराष्‍ट्र में अध्‍यादेश जारी करना पड़ा कि मराठी फिल्‍मों को मल्‍टीप्‍लेक्‍स में प्राइम टाइम के शो मिलें। सभी जानते हैं कि इस कदम से मराठी फिल्‍मों के दर्शक बढ़ हैं और आखिरकार आमदनी बढ़ी है।
हिंदी की छोटी फिल्‍मों के लिए प्रदर्शन की सहूलियतें नहीं बढ़ रही हैं। उन्‍हें वितरक और प्रदर्शक नहीं मिल पाते। ऐसी अनेक फिल्‍में होती हैं,जिन्‍हें देखने से दर्शक वंचित रह जाते हैं। इसी हफ्ते की गुड़गांव को देख लें। शंकर रमन की यह उच्‍च्‍ क्‍वालिटी की फिल्‍म को पर्याप्‍त शो और थिएटर नहीं मिले हैं। यह फिल्‍म पटना जैसे कथित छोटे शहर में नहीं पहुंची है। संचार माध्‍यमों के प्रसार और इंटरनेट के इस दौर में पूरे देश को क्‍वालिटी फिल्‍म की जानकारी दर्शकों को मिल जाती है। वे भी अपने शहर में ऐसी फिल्‍मों का इंतजार करते हैं,लेकिन प्रदर्शक सालों पुरानी धारणा के मुताबिक तय करता है कि किस तरह के दर्शक कैसी फिल्‍म में रुचि लेते हैं? उन्‍होंने ऐसा कोई सर्वे या अध्‍ययन नहीं किया है। बस,मान लिया गया है कि गुड़गांव तो मैट्रो के खास दर्शक ही देखेंगे। नतीजा यह हो रहा है कि छोटी फिल्‍में छोटे शहरों में नहीं पहुंच पा रही हैं।  

Thursday, August 3, 2017

रोज़ाना : नाखुश हैं फिल्‍मकार



रोज़ाना
नाखुश हैं फिल्‍मकार
-अजय ब्रह्मात्‍मज
फिल्‍म और टीवी डायरेक्‍टर्स के संगठन इफ्तडा ने बाबूमोशाय बंदूकबाज को सीबीएफसी की तरफ से मिले 48 कट्स के मामले में विरोध दर्ज किया है। विरोध दर्ज करने के लिए उन्‍होंने बाबूमोशाय बंदूकबाज के डायरेक्‍टर और प्रोड्यूसर के साथ संगठन के अन्‍य सदस्‍य भी हाजिर हुए। इनमें उड़ता पंजाब के डायरेक्‍टर अभिेषेक चौबे और लिपस्टिक अंडर माय बुर्का की डायरेक्‍टा अलंकृता भीवास्‍तव भी थीं। सभी ने सीबीएफसी के साथ हुए अपने कड़वे अनुभवों को शेयर किया। उन्‍होंने आश्‍चर्य व्‍यक्‍त किया कि पिछले तीन सालों में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के मंत्री बदल गए,लेकिन अध्‍यक्ष बने हुए हैं। उन्‍हें नहीं बदला जा रहा है। उनके नेतृत्‍व में सीबीएफसी लगातार अपने फैसलों में नीचे की ओर जा रही है। फिल्‍मकारों की मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं। एक खौफ का माहौल सा बन गया है,जिसमें सर्टिफिकेशन के लिए फिल्‍म जमा करते समय निर्माता-निर्देशक डरे रहते हैं कि मालूम नहीं क्‍या फरमान आए? और उन्‍हें और कितने चक्‍कर लगाने पड़ें।
बामूमोशाय बंदूकबाज उत्‍तर भारत के ग्रामीण इलाके की फिल्‍म है। निर्देशक कुशाण नंदी ने परिवेश और विषय के मुताबिक फिल्‍म के किरदार गढ़े हैं और उन्‍हें वैसी ही भाषा दी है। परीक्षण समिति फिल्‍म देखने के बाद परीक्षण समिति ने कहा कि इसे एडल्‍ट सर्टि‍फिकेट मिलेगा। इसकी लिस्‍ट दे दी गई,जिसमें बोलचाल की भाषा के आमफहम शब्‍द भी थे। अगर किसी फिल्‍म को यानी एडल्‍ट सर्टिफिकेट मिलता है तो उसे कट देने की जरूरत नहीं होती। यहां परीक्षण समिति का तर्क था कि एडल्‍ट फिल्‍में बच्‍चे भी देखते हैं। उनके कानों में ऐसे शब्‍द नहीं आने चाहिए। अब यह सिनेमाघर और स्‍थानीय लॉ एंड आर्डर का काम देख रहे अधिकारियों की जिम्‍मेदारी है कि एडल्‍ट फिल्‍मों में बच्‍चे न आएं। भला सीबीएफसी के सदस्‍य यह तर्क कैसे दे सकते हैं? इतना ही नहीं निर्माता-निर्देशक को निर्णय सुनाते समय एक महिला सदस्‍य ने निर्माता किरण श्रॉफ से पूछा कि महिला होकर आप ऐसी फिल्‍म कैसे बना सकती हैं? अभी वह जवाब दें इसके पहले ही दूसरे पुरुष सदस्‍य की टिप्‍पणी आई,यह महिला कहां हैं? इन्‍होंने तो पैंट-शर्ट पहन रखी है। संबंधित अधिकारियों और सूचना एवं प्रसारण मंत्री स्‍मृति ईरानी को ऐसी टिप्‍पणी का संज्ञान लेना चाहिए। और उचित कार्रवाई करनी चाहिए।
इस विरोध सभा में भुक्‍तभेगी निर्देशकों ने स्‍पष्‍ट कहा और माना कि सीबीएफसी का लापरवाह रवैया गैरजिम्‍मेदाराना है। उसके फैसलों से डर और खौफ का माहौल बन रहा है। फिल्‍म में मुख्‍य किरदार निभा रहे नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने चुटकी ली कि अब अपराधी किरदार गोली चलाने के पहले कहेगा कि आइण्‍ जनाब,मैं आप को गोली मारूंगा। उसके मुंह से गाली नहीं निकलेगी। उन्‍होंने कहा कि ऐसे माहौल में हम कलाकार कैसे किरदारों और परिवेश के हिसाब से लहजा लाएंगे। यही बात सुधीर मिश्रा ने भी कही। उन्‍होंने बताया कि हजारों ख्‍वाहिशें ऐसी के समय सीबीएफसी के सदस्‍य कह रहे थेकि इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी नहीं लगाई थी। और अगर लगाई थी तो उनके नाम का जिक्र न करें। तात्‍पर्य यह है कि यह मर्ज पुराना है। जो समय के साथ और गंभीर हो गया है। अब राजनीतिक नेताओं के नाम और दूसरे अनेक शब्‍दों पर आपत्ति होने लगी है। उन्‍होंने सुझाव दिया कि श्‍याम बेनेगल के नूतृत्‍व में बनी समिति के सुझावों का जल्‍दी से जल्‍दी लागू कर दिया जाए।

Wednesday, August 2, 2017

रोज़ाना : आजादी का पखवाड़ा



रोज़ाना
आजादी का पखवाड़ा
-अजय ब्रह्मात्‍मज
15 अगस्‍त तक चैनल और समाचार पत्रों में आजादी की धमक मिलती रहेगी। मॉल और बाजार भी इंडपेंडेस सेल के प्रचार से भर जाएंगे। गली,नुक्‍कड़ और चौराहों पर तिरंगा ल‍हराने लगेगा। आजादी का 70 वां साल है,इसलिए उमंग ज्‍यादा रहेगी। जश्‍न होना भी चा‍हिए। आजाद देश के तौर पर हम ने चहुमुखी तरक्‍की की है। अभी और ऊचाइयां हासिल करनी हैं। समृद्ध और विकसित देशों के करीब पहुंचना है। जरूरी है कि हम आजादी का महत्‍व समझें और उसे के भावार्थ को जान-जन तक पहुंचाएं। बिल्‍कुल जरूरी नहीं है कि दुश्‍मनों के होने पर ही देशहित और राष्‍ट्र की बातें की जाएं या उन बातों के लिए एक दुश्‍मन चुन लिया जाए। अभी यह चलन बनता जा रहा है कि हम पड़ोसी देशों की दुश्‍मनी के नाम पर ही राष्‍ट्र की बातें करते हैं। वास्‍तव में अपनी कमियों से मुक्ति और आजादी की लड़ाई हमें लड़नी है। हर फ्रंट पर देश पिछड़ता और फिसलता दिख रहा है। उसे रोकना है। विकास के रास्‍तों को सुगम करना है। परस्‍पर सौहार्द और समझदारी के साथ आगे बढ़ना है। राजनीतिक दांव-पेंच में न फंस कर हमें देश के हित में सोचना और कार्य करना होगा। सरकारें बदलती रहेंगी और उनके साथ नीतियां भी बदलती रहेंगी। हमें चौकस रहना होगा। देखना होगा कि देश की लोकतांत्रिक सोच पर आंच न आए। सृजन के क्षेत्र में कार्यरत संस्‍कृतिकर्मियों की अभिव्‍यक्ति की आजादी बनी रहे।
फिल्‍मों की बात करें तो मामला गंभीर नजर आता है। आए दिन सीबीएफसी के फैसलों की वजह से फिल्‍मों पर पाबंदियां लग रही है। उन्‍हें बेवजह शब्‍दों को म्‍यूट करना पड़ रहा है और दृयों को छोटा या काटना पड़ रहा है। समाज यह धारणा बन रही है कि फिल्‍मकार गैरजरूरी और अश्‍लील सामग्रियां ही परोसना चाहते हैं। सीबीएफसी उन पर रोक लगा कर माज की शुचिता का बचाव कर रही है। इंदु सरकार जैसी राजनीतिक परिप्रेक्ष्‍य की फिल्‍मों से राजनीतिक व्‍यक्तियों और नेताओं के नाम हटाने के निर्देश दिए गए थे। कुछ फिल्‍में अभी तक कोर्ट के फैसलों का इंतजार कर रही हैं। सीबीएफसी कुछ मामलों में कोर्ट के आदेशों की भी अवमानना कर रहा है। सभी हैरत में हैं। सत्‍तारूढ़ पार्टी के हिमायती भी सीबीएफसी के वर्तमान अध्‍यक्ष के प्रति सरकार का रवैया नहीं समझ पा रहे हैं। उन्‍हें भी आश्‍चर्य होता है कि क्‍या सरकार को ऐसा एक योग्‍य व्‍यक्ति नहीं मिल पर रहा है,जो पहलाज निहलानी को पदस्‍थापित कर सके। पिछलें दिनों सीबीएफसी के सदस्‍यों ने एक फिल्‍म की महिला निर्माता के पहनावे को लेकर छींटाकशी करने की धृष्‍टता की। यह मानसिकता आजादी की पहचान नहीं है। 70 सालों के बाद हम पीछे की तरफ जा रहे हैं। उल्‍टे कदमों की यह राह हमें प्रगति की ओर नहीं ले जा सकती।
एक देश के तौर पर हमें सोचना होगा। हमें अभिव्‍यक्ति के संकटों को खत्‍म करना होगा ताकि आजादी और आजादी की भावना बरकरार रहे। देश की विविधता के मद्देनजर हर तरह के विचार को खिलने और निखरने का मौका मिले। आजादी के पखवाड़े में दूरदर्शन और दूसरे चैनल आजादी की फिल्‍मों के प्रसारण से आजादी के जज्‍बे को मजबूत बना सकते हैं। बता सकते हैं कि आज के संदर्भ में आजादी के मायने क्‍या हैं? किन क्षेत्रों में किस स्‍तर पर अभी आजादी बाकी है।  

Saturday, July 29, 2017

रोज़ाना : रिलीज तक व्‍यस्‍त रहते हैं निर्देशक



रोज़ाना
रिलीज तक व्‍यस्‍त रहते हैं निर्देशक
-अजय ब्रह्मात्‍मज
पिछले दिनों रणबीर कपूर के पिता ऋषि कपूर जग्‍गा जासूस के निर्देशक अनुराग बसु पर भड़के हुए थे। उन्‍होंने अनुराग बसु की लेट-लतीफी की खिंचाई की। बताया कि फिल्‍म की रिलीज के दो दिन पहले तक वे पोस्‍ट प्रोडक्‍शन में लगे हुए थे। उन्‍होंने फिल्‍म किसी को नहीं दिखाई। और फिल्‍म रिलीज हुई तो ऋषि कपूर समेत कई दर्शकों को पसंद नहीं आई। ऋषि कपूर की शिकायत का आशय यह था कि अगर वक्‍त रहते शुभचिंतक फिल्‍म देख लेते तो वे आवश्‍यक सुधार की सलाह देते। तब शायद फिल्‍म की ऐसी आलोचना नहीं होती। कहना मुश्किल है कि क्‍या होता? अगर रिलीज के पहले दिखा और ठोक-बजा कर रिलीज की सारी फिल्‍में सफल होतीं तो ऋषि कपूर की कोई भी फिल्‍म फ्लॉप नहीं हुई होती। फिल्‍मों की सफलता-असफलता बिल्‍कुल अलग मसला है। उस मसले से इतर यह आज की सच्‍चाई है कि तकनीकी सुविधाओं के चलते निर्देशक और उनकी तकनीकी टीम अंतिक क्षणों तक फिल्‍म में तब्‍दीलियां करती रहती हैं। उनकी यही मंशा रहती है कि कोई कमी या कसर ना रह जाए।
मुमकिन है इससे फिल्‍म को संवारने में मदद मिलती हो। फिलम को अंतिम रूप देने के पहले निर्देशक सब कुछ ठीक कर लेना चाहते हैं। यह लगभग किसी पार्टी या अवसर के लिए सजने के समान है। आप आईने के सामने खड़ी हो जाती हैं और अपनी एक-एक लट या साड़ी की चुनट ठीक करने लगती हैं। चेहरे पर लिपस्टिक से लेकर बिंदी और अन्‍य मेकअप ठीक करने लगती हैं। आईने के सामने से हटने का मन नहीं करता और इवेंट के लिए देर हो रही होती है। या फिर किसी यात्रा पर निकलने के पहले अंतिम समय में पैकिंग करते हैं और हड़बड़ी में सूटकेश बंद नहीं होता। यकीन मानें फिल्‍मों की रिलीज के पहले का असमंजस इनसे कई गुना बड़ा होता है। निर्देशक चाहता है कि वह मुकममल फिल्‍म पेश करे। इस कोशिश में ज्‍यादातर निर्देशक अपने फिल्‍म के प्रचार से हाथ खींच लेते हैं। उन्‍हें लगता है कि मीडिया और दर्शक का इंटरेस्‍ट तो स्‍टार में रहता है। अगर स्‍टार इंटरव्‍यू दे रहे हैं तो उसका काम हो रहा है। फिल्‍म प्रचारित हो रही है। सच्‍चाई और प्रभाव इससे अलग है।
किसी भी फिल्‍म के बारे में लेखक और निर्देशक ही सबसे ज्‍यादा विस्‍तार से बता सकते हैं। वे फिल्‍म के विषय और संदर्भ के बारे में बता सकते हैं। स्‍टार आने रोल के बारे में बता सकते हैं,लेकिन उनकी नकेल कसी रहती है। उन्‍हें हिदायत रहती है कि वे कुछ ऐसा न बता जाएं कि फिल्‍म की कहानी पता चल जाए। इस संकोच में पूरे इंटरव्‍यू मीडियाकर्मी को टहला रहे होते हैं। अब चूंकि मीडिसकर्मी भी अनुभवों से जान गए हैं कि स्‍टार कुछ बताएगा नहीं तो वे भी टहलते रहते हैं। ऐसे इंटरव्‍यू एंटअेन तो करते हैं,लेकिन फिल्‍म के बारे में नहीं बताते। वे फिल्‍म का दर्शक नहीं तैयार करते।
मेरा मानना है कि केवल लेखक और निर्देशक ही फिल्‍म के बारे में संदर्भगत जानकारी दे सकते हैं। उन्‍हें आगे आना चाहिए। समय निकालना चाहिए। रिलीज के दो हफते पहले से खुद को खाली रखना चाहिए। वर्ना वही होता है जल्‍दबाजी में मांग के बदले कनपटटी में सिंदूर डाल दिया जाता है।

Saturday, July 22, 2017

रोज़ाना : पूरी हो गई मंटो की शूटिंग



22 जुलाई,2017
रोज़ाना
पूरी हो गई मंटो की शूटिंग
-अजय ब्रह्मात्‍मज
नंदिता दास ने मंटो की शूटिंग पूरी कर ली। अब वह एडीटिंग में जुटेंगी। खुशखबर का यह एक रोचक पड़ाव है। फिल्‍म पूरी होने और रिलीज होने के पहले ऐसे अनेक पड़ावों से गुजरना पड़ता है। मंटो जैसी फिल्‍म हो तो हर पड़ाव के बाद आगे का मोड अनिश्चित दिशा में होता है। अंदाजा नहीं रहता कि सब कुछ ठीक तरीके से आगे बढ़ रहा है या रास्‍ते में कहीं भटक गए और फिल्‍म रिलीज तक नहीं पहुंच सकी। इन आशंकाओं में समाज और सिनेमा के कथित ठेकेदार भी होते हैं,जो आपत्तियों की लाठी भंजते रहते हैं। उन्‍हें हर प्रकार की क्रिएटिविटी से दिक्‍कत होती है। नंदिता दास संवेदनशील और जागरूक अभिनेत्री व निर्देशक हैं। अभी का समाज जागरुकों से कुछ ज्‍यादा ही खफा है। बहराहाल,शूटिंग पूरी होने की शुभकामनाओं के साथ नंदिता दास को बधाइयां कि वह ऐसे वक्‍त में मंटो को लेकर आ रही हैं,जो भीतरी तौर पर पार्टीशन के मरोड़ से गुजर रहा है। संदेह का धुंआ उठता है और हर छवि धुंधली हो जाती है। आकृतियां लोप होने लगती हैं। केवल शोर सुनाई पड़ता है। एक भीड़ होती है,जो सूजन और सामयिक सोच के खिलाफ चिल्‍ला रही होती है। लुंचन कर रही होती है।
मंटो पर बन रही नंदिता दास की फिल्‍म की शूटिंग का पूरा होना इसलिए खुश खबर है कि इसके पहले के प्रयासों में निर्देशकों को शूटिंग करने तक का मौका नहीं मिल पाया। मेरी जानकारी में तीन योजनाएं बनीं और फ्लोर पर जाने के पहले ही रद्द कर दी गईं। कभी बजट तो कभी कलाकार और सबसे बड़ा यह असमंजस कि क्‍या दर्शक विवादास्‍पद और विरोधाभासी लेखक सआदत हसन मंटो को बड़े पर्दे पर देखना चाहेंगे। मंटो ने खूब लिखा है। अपने समकालीनों पर भी लिखा है। मंटो पर भी लिखा गया है। सभी ने अपने तरीके से मुटो को समझने की कोशिश की है। मंटो की ऐसी कोई मुकम्‍मल छवि नहीं है,जिससे सभी सहमत हों। इस अंतर्विरोध के बावजूद इस तथ्‍य से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि मंटो ने अपने वक्‍त के जख्‍मों को कुरेदा और हरा रखा। उन्‍होंने मरहम लगाने की कोशिश नहीं की। उनके इस रवैए से तब की सत्‍ता खफा रही है और आज भी अनेक नाखुश हैं। एक सच्‍चाई यह भी है कि मंटो के बारे में सभी बातें करते हैं,लेकिन उन्‍हें पढ़ते नहीं हैं। जो पढ़ते हैं,वे मंटो की सोच नहीं अपनाते। सृजन के अन्‍य क्ष्‍ेत्रों में भी यही प्रवृति चल रही है। नाम चलाते रहो,काम दरकिनार कर दो।
नंदिता दास ने मंटो के भारत से पाकिस्‍तान जाने से लेकर लाहौर में बीती उनकी बाकी जिंदगी को अपनी फिल्‍म में समेटा है। इन सालों में मंटो सबसे अधिक व्‍यथित,विचलित और व्‍यग्र थे। नंदिता दास की फिल्‍म में नवाजुद्दीन सिद्दीकी मंटो को पर्दे पर उतार रहे हैं। हमें पार्टीशन के दौर की एक बेहतरीन फिल्‍म का इंतजार है। फिल्‍मों में इस दौर को हमेशा नजरअंदाज किया गया।

Wednesday, June 28, 2017

रोज़ाना : शाह रूख खान की ईद



रोज़ाना
शाह रूख खान की ईद
-अजय ब्रह्मात्‍मज
ईद के मौके पर शाह रूख खान बुलाते हैं। वे मीडियाकर्मियों को ईद की दावत देते हैं। इस दावत में देर-सबेर वे शामिल होते हैं। मीडियाकर्मियों से जत्‍थे में मिलते हैं। उनसे अनौपचारिक बातें करते हैं। अफसोस कि ये अनौपचारिक बातें भी रिकार्ड होती हैं। अगले दिन सुर्खियां बनती हैं। अब न तो फिल्‍म स्‍टार के पास सब्र है और न पत्रकारों के पास धैर्य...स्‍टार की हर बात खबर होती है। वे खुद भी पीआर के प्रेशर में में हर मौके को खबर बनाने में सहमति देने लगे हैं। या कम से कम तस्‍वीरें तो अगले दिन आ ही जाती हैं। चैनलों पर फटेज चलते हैं। सभी के करोबार को फायदा होता है।
हर साल ईद के मौके पर सलमान खान की फिल्‍में रिलीज हो रही हैं और शाह रूख खान से ईद पर उनकी अगली फिल्‍मों की बातें होती हैं,जो दीवाली या क्रिसमस पर रिलीज के लिए तैयार हो रही होती हैं। वक्‍त ऐसा आ गया है कि पत्रकार हर मुलाकात को आर्टिकल बनाने की फिक्र में रहते हैं। उन पर संपादकों और सहयोगी प्रकाशनों का अप्रत्‍यक्ष दबाव रहता है। अघोषि प्रतियोगिता चल रही होती है। सभी दौड़ रहे होते हैं। इस दौड़ में सभी पहले पहुंचना चाहते हैं। अच्‍छा है कि जो पिछड़ जाए,वह भी विजेता माना जाता है।
इस ईद की बात करें तो बारिश की वजह से शाह रूख खान ने अपने बंगले मननत के पास के पांचसितारा होटल में लंच का इंतजाम किया था। वे आए। घोषित समय से डेढ़-दो घंटे देर से आना उनके लिए सामान्‍य बात है। अगर किसी इवेंट पर किसी दिन वे समय पर आ जाएं तो आश्‍चर्य होगा और अनेक पत्रकार उस इवेंअ पर उनसे मिल नहीं पाएंगे। पत्रकारों ने भी स्‍टारों के हिसाब से मार्जिन तय कर लिया है। केवल अमिताभ बच्‍चन और आमिर खान समय के पाबंद हैं। बहरहाल,शाह रूख ने हमारे जत्‍थे से कुछ रोचक बातें कीं। बाद में दूसरे जत्‍थों के बीच भी उन्‍होंने लगभा वे ही बातें कीं। मसलनएईद की रात बच्‍चों के लिए खाना बनाने की बात। उन्‍होंने हमें विस्‍तार से बताया कि जब हैरी मेट सेजल की शूटिंग के दौरान अपने मेजबान से सीखी। मेजबान मियां-बीवी ने शाह रूख खान को इतालवी व्‍यंजनों के पाक विधि सिखाई। अगर बनाते समय कुद भूल जाता है तो गूगल है ही मदद के लिए। और हो,छठे-छमाही खाने बनाने के शौकीन सभी पतियों और मर्दां की तरह शाह रूख खान भी किचेन में बहुत कुछ फैला देते हैं।
शाह रूख खान की ईद से आया कि अब त्‍योहारों के ऐसे सार्वजनिक आयोजन फिल्‍म इंडस्‍ट्री में कम हो गए हैं। पहले होली,दीवाली और ईद पर ऐसे कई आयोजन होते थे। उनसे खबरें भी नहीं जुड़ी रहती थीं। सभी त्‍योहार के रंग में रहते थे। यह चिंता नहीं रहती थी कि क्‍यो बोलें और कैसे दिखें? मीडिया के प्रकोप और सोशल मीडिया के आतंक ने त्‍योहारों का जश्‍न छीन लिया है। सब कुछ रुटीन और फैशन सा हो गया है। हर हाथ में मोबाइल के साथ आए कैमरे और सेल्‍फी की धुन ने त्‍योहारों की लय तोड़ दी है।

Tuesday, June 27, 2017

रोज़ाना : एयरपोर्ट लुक



रोज़ाना
एयरपोर्ट लुक
-अजय ब्रह्मात्‍मज
मिलीभगत है। ज्‍यादातर बार फोटोग्राफर को मालूम रहता है कि कब कौन सी सेलिब्रिटी कहां मौजूद रहेगी। उनकी पीआर मशीनरी सभी फोटोग्राफर और मीडियाकर्मियों को पूर्वसूचना दे देते हैं। विदेशों की तरह भारत में पापाराजी नहीं हैं। यहां दुर्लभ तस्‍वीरों और खबरों की भी सामान्‍य कीमत होती है। विदेशों में एक दुर्लभ तस्‍वीर के लिए फोटोग्राफर भारी खर्च करते हैं और धैर्य से घात लगाए रते हैं। यह बंसी डाल कर मछली पकड़ने से अधिक अनिश्चित और वक्‍तलेवा काम होता है। मुंबई में फिल्‍मी सितारों की निजी गतिविधियों की जानकारी छठे-छमाही ही तस्‍वीरों में कैद होकर आती है। बाकी सब पूर्वनियोजित है,जो खबरों की तरह परोसा जा रहा है।
ऐसी ही पूर्वनियोजित खबरों व तस्‍वीरों में इन दिनों एयरपोर्ट लुक का चलन बढ़ा है। एयरपोर्ट लुक उस खास तस्‍वीर के लिए इस्‍तेमाल किया जाता है,जो मुंबई से बाहर जाते-आते समय एयरपोर्ट के अराइवल और डिपार्चर के बाहर फिल्‍मी सितारों उतारी जाती हैं। गौर करेंगे कि कुछ फिल्‍मी हस्तियों की तस्‍वीरें बार-बार आती हैं। इसका चलन इतना ज्‍यादा बढ़ गया है कि उम्रदराज और कम लोकप्रिय सितारों को भी ऐसी तस्‍वीरों के लिए तैयार रहना पड़ता है। उन्‍हें अपने लुक और ड्रेस का खास खयाल रखना पड़ता है। उन्‍हें यह भी खखल रखना पड़ता है कि हेयर स्‍टाइल,ज्‍वेलरी व अक्‍सेसरीज और ड्रेस में रिपीटिशन न हो। इसके लिए सितारों की टीम चौकस रहती है। कई बार एयरपोर्ट लुक की तस्‍वीरों के साथ सारे ब्रांड की जानकारी रहती है। बताया जाता है कि पर्स किस ब्रांड का है और चश्‍मा किस ब्रांड का है...आप अंदाजा लगा सकते हैं कि यह जानकारी स्‍टार की पीआर टीम ही देती है। प्रचलित और लोकप्रिय सितारों की इमेज को इससे लाभ होता होगा,लेकिन आउट ऑफ जॉब और कम फिल्‍में कर रही सितारों को जबरन इस मुश्किल से गुजरना होता है।
पिछले दिनों एक मुलाकात में भीदेवी कोफ्त जाहिर कर रही थीं। उन्‍हें निजी काम से लगातार चेन्‍नई जाना होता है। कुछ घरेलू और पारिवारिक काम होते हैं। वह सुबह जाती हैं और शाम तक लौट आती है। इधर कुछ दिनों से अब उन्‍हें भी खयाल रखना पड़ता है कि आते-जाते समय एक ही ड्रेस न हो। और वह पूरे मेकअप में रहें। कुछ सितारों का यह अतिरिक्‍त खर्च लगता है,लेकिन सभी कर रहे हैं तो उन्‍हें भी करना पड़ता है। आप न करें और कभी किसी फोटोग्राफर के कैमरे में सामान्‍य तस्‍वीर कैद हो गई तो अगले दिन वही तस्‍वीर अखबारों में होगी और नीचे कुछ सवाल छोड़ दिए जाएंगे।
सचमुच,ग्‍लैमर की दुनिया में बने और टिके रहने की अपनी समस्‍याएं हैं। हम चाहते भी हैं कि हमारे पसंदीदा सितारे हमेशा सज-धज में रहें। अभिनेत्रियों की मुश्किलें ज्‍यादा रहती हैं,क्‍योंकि उनकी सज-धज में विकल्‍प और चुनौतियां हैं। अभिनेता तो जैसे-तैसे भी दिख सकते हैं। उन्‍हें अधिक फर्क नहीं पड़ता। अभिनेत्रियों की छवि खराब हुई या उनकी स्‍टाइल फीकी पड़ी तो दस तरह की बातें होने लगती हैं। कुछ पत्र-पत्रिकाओं में उन्‍हें थम्‍स डाउन मिलता है। बताया जाता है कि उनका फैशन सेंस अपडेटेड नहीं है।

Thursday, June 22, 2017

रोज़ाना : झकास अनिल कपूर



रोज़ाना
झकास अनिल कपू
-अजय ब्रह्मात्‍मज

अनीस बज्‍मी की मुबारकां के ट्रेलर लांच के मौके पर अनिल कपूर मौजूद थे। मंच पर उनकी उर्जा देख कर सभी खुश थे। उन्‍हें इस उम्र(61 वर्ष) में भी उर्जावान देख कर हैरानी नहीं होती। वे अपने समकालीनों में सबसे चुस्‍त-दुरुस्‍त हैं। वे लगातार काम कर रहे हैं। उन्‍होंने अभी तक अपने जूते नहीं टांगे हैं। इसकी कोई संीाावना भी नहीं है। इसी ट्रेलर लांच में जब आतिया शेट्टी और इलियाना डिक्रूज उन्‍हें बार-बार सर संबोधित कर रही थीं तो उन्‍होंने बिफर कर कहा,क्‍या कभी मैंने तुम दोनों को मैथ्‍स या साइंस पढ़ाया है या मुझे ब्रिटेन की महारनी ने सर का खिताब दिया है। प्‍लीज मुझे सर न कहो। अनिल कपूर की यही झकास अदा है। वे जवानों के बीच उनसे भी अधिक जवान दिखते हैं। वे नहीं चाहते कि उन्‍हें बुजुर्ग बता कर दरकिनार कर दिया जाए। डेनी डेंजोग्‍पा उनके नियमित कसरत की तारीफ करते हैं। शूटिंग की व्‍यस्‍तता के बीच भी वे वाक और रन के लिए समय निकाल लेते हैं।
अड़तीस साल हो गए। सन् 1979 में अनिल कपूर ने उमेश मेहरा की फिल्‍म हमारे तुम्‍हारे में एक छोटी भूमिका निभाई थी। यों कैमरे के सामने वे 1971 में ही आ गए थे। 1971 में बन रही तू पायल मैं गीत में शशि कपूर के बचपन के रोल में अनिल कपूर थे। यह फिल्‍म रिलीज नहीं हो पाई थी। बापू की तेलुगू फिल्‍म वंश वृक्षम में उन्‍हें पहली प्रमुख भूमिका मिली थी। हिंदी में वो सात दिन उनकी पहली फिल्‍म थी। अड़तीस सालों में सैंकड़ों फिल्‍में करने के बाद भी अनिल कपूर अपनी पीढ़ी के अभिनेताओं में पूरे दम-खम के साथ सक्रिय हैं। अभी भतीजे अर्जुन कपूर के साथ उनकी फिल्‍म मुबारकां आएगी। अर्जुन कपूर के डबल रोल की इस फिल्‍म में उनका महत्‍वपूर्ण किरदार है। ठीक है कि उन्‍हें फिल्‍मों में अमिताभ बच्‍चन की तरह केंद्रीय भूमिकाएं नहीं मिल पा रही हैं,लेकिन फिल्‍मों में उनकी मौजूदगी नजरअंदाज नहीं होती।
सुरिन्‍दर कपूर के मझले बेटे अनिल कपूर ने परिवार के साथ मुश्किल दिनों में संघर्ष किया। चेंबूर साधारण मध्‍यवर्गीय बस्तियों में उनकी परवरिश हुई। वहां के शब्‍द,मुहावरे और चाल-ढाल उनके व्‍यक्तित्‍व का हिस्‍सा हैं। उन्‍होंने ही हिंदी फिल्‍मों में झकास शब्‍द प्रचलित किया। झकास का मतलब बेहतरीन व अतिउत्‍तम होता है। उनके डांसिंग स्‍टेप्‍य में चेंबूर की बस्तियों कर मस्‍ती रहती है। डांस के झटके और ठुमकों से वे मुंबई के आम दर्शकों को प्रभावित करते हैं। अनिल कपूर ने फिल्‍मी करिअर में भिन्‍न मिजाज की फिल्‍में कीं और उन्‍हें संजीदगी से पर्दे पर उतारा। उनके किरदारों का भोलापन हमेशा पसंद किया गया। वे अपने किरदारों को पूरे उमंग और उर्जा के साथ निभाते हैं।
कम लोग जानते हैं कि उनके पिता सुरिन्‍दर कपूर ने फिल्‍मों में साधारण शुरुआत की थी। कभी उनके परिवार को राज कपूर के गैरेज में भी रहना पड़ा था। बाद में वे शम्‍मी कपूर की पूर्व पत्‍नी गीता बाली के सेक्रेटरी बन गए थे। यहां से उनकी जिंदगी में बदलाव आया। परिवार की हालत सुधरी। सुरिन्‍दर कपूर के परिवार की तीसरी पीढ़ी की सोनम कपूर और राज कपूर के परिवार की तीसरी पीढ़ी के रणबीर कपूर संजय लीला भंसाली की फिल्‍म सांवरिया में एक साथ लांच हुए थे। अनिल कपूर के परिवार की यह अनकही कहानी है।

Wednesday, June 21, 2017

रोज़ाना : फ्लेवर,फन और ज्‍वॉय



रोज़ाना
फ्लेवर,फन और ज्‍वॉय
-अजय ब्रह्मात्‍मज
गौर किया होगा...इम्तियाज अली ने अपनी फिल्‍म 'जब हैरी मेट सेजल' के पहले लुक और नाम की घोषणा दो पोस्‍टरों के साथ की थी। बाद में दोनों पोस्‍टर को एक पोस्‍टर में डाल कर पूरा नाम लिखा गया। इस फिल्‍म के नाम की चर्चा अभी तक नहीं थमी है। कुछ इसे इम्तियाज अली की पुरानी फिल्‍म से प्रेरित मानते हैं तो कुछ इसे लेखक-निर्देशक(इम्तियाज स्‍वयं) की सोच और कल्‍पना का दिवालियापन समझ रहे हैं। यह नाम चल तो रहा है,लेकिन गति नहीं पकड़ सका है। जब हैरी मेट सेजल की संपूर्णता टुकड़ों में ही अपनी प्रेम कथा परोसेगी।
हाल ही में जब हैरी मेट सेजल के मिनी ट्रेलर जारी किए गए। इस ट्रेलर को जारी करने के दो दिन पहले इम्तियाज अली और शाह रूख खान मीडिया से मिले थे। उन्‍होंने प्रायवेट स्‍क्रीनिंग के दौरान अपनी बातें रखी थं और बताया था कि वे ऐसा क्‍यों कर रहे हैं। दो-तीन छोटी झलकियों के बाद एक गाना जारी किया जाएगा। कोशिश यह है कि दर्शक फिल्‍म के फ्लेवर,फन और ज्‍वॉय के लिए तैयार हो सकें। इम्तियाज अली इसे नए मिजाज की फिल्‍म मानते हैं,इसलिए पारंपरिक ट्रेलर लाकर स्‍वाद नहीं बिगाड़ना चाहते। क्‍या यह उनकी मार्केटिंग स्‍ट्रेटजी मात्र है या सचमुच फिल्‍म की भिन्‍नता की वजह से उन्‍हें यह तरकीब अपनानी पड़ी है।
हर नई फिल्‍म की रिलीज के समय बड़े स्‍टारों की घबराहट अति पर होती है। वे दर्शकों तक पहुंचने में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहते। नई तरकीबें अपनाते हैं। दर्शकों को चौंकाते हें। पूरी कोशिश रहती है कि दर्शक आकर्षण या जिज्ञासा पूरी करने सिनेमाघरों में पहुंचें। फिर फिल्‍म अच्‍छी लगे तो दोबारा-तिबारा आएं। इन दिनों फिल्‍में देखना मंहगा काम हो गया है। फिर भी दर्शक दोबारा-तिबारा आते हैं। उनसे ही फिल्‍में हिट होती हैं। चूंकि शा रूख खान अपने समकालीन दोनों खानों से थोड़े पिछड़ चुके है,इसलिए उन्‍हें जबरदस्‍त कामयाबी की जरूरत है। फिल्‍मों के बड़े स्‍टारों को स्‍वयं या आपस में दो-चार असफलताओं से फर्क नहीं पड़ता हो,लेकिन प्रशंसकों का जोश ठंडा पड़ता है। दर्शक भी घटते हैं।
इर्शक और प्रशंसक दो श्रे‍णियां हैं। लोकप्रिय स्‍टारों को दोनों की जरूरत पड़ती है। सोशल मीव रहते हैं। वे अपने प्रिय स्‍टारों के लिए माहौल बनाते हैं। नए दौर में ट्वीटर और फेसबुक जैसे सोशल मीडिया के फैन क्‍लब,ग्रुप और हैंडल स्‍टार के नौकरी साफ्ता स्‍टाफ चलाने लगे हैं। मूड और माहौल बनाने में उनकी भूमिका होती है। हालांकि कोई भी स्‍टार स्‍वीकार नहीं करता,लेकिन सोशल मीडिया पर अधिकांश एक्टिविटी स्‍टार की मर्जी और जानकरी में होती है।
यह देखना रोचक होगा कि टुकड़ों में दी गई झलकियों से इम्तियाज अली और शाह रूख खान कितने दर्शक बना पाते हैं? दोनों की पिछली फिल्‍में थोड़ी नरम पही हैं।

Tuesday, June 20, 2017

रोज़ाना : क्‍या ‘कन्‍हैया’ मिल पाएगा प्रधानमंत्री से



रोज़ाना
क्‍या कन्‍हैया मिल पाएगा प्रधानमंत्री से
-अजय ब्रह्मात्‍मज
चौंके नहीं, कन्‍हैया राकेश ओमप्रकाश मेहरा की आगामी फिल्‍म मेरे प्रिय प्रधान मंत्री का बाल नायक है। वह मुंबई के गांधीनगर(कल्पित) चाल में रहता है। अपनी मां के लिए व‍ि चिंतित है। चाल में शौखलय का इंतजाम न होने से उसकी मां को खुले में शौच के लिए जाना होता है। वह अपनी मां के लिए शौचालय बनवाना चाहता ह। इस कोशिश में उसे पता चलता है कि देश के प्रधान मंत्री उसकी मदद कर सकते हैं। वे स्‍वच्‍छ भारत भारत अभियान में शौच पर बहुत जोर देते हैं। यहां तक कि लाल किले के प्राचीर से भी उन्‍होंने देशवासियों का आह्वान किया था। कन्‍हैया उन्‍हें चिट्ठी लिखता है। वह उनसे मिलने की कोशिश करता है,लेकिन...
राकेश ओमप्रकाश मेहरा को इस फिल्‍म का आयडिया पसंद आया। लगभग चार साल पहले वाया दिल्‍ली बिहार से मुंबई आए मनोज मैरता ने इस फिल्‍म के आयडिया पर काम किया। उन्‍हें इस फिल्‍म का आयडिया जमुनापार के इलाके में में दिल्‍ली मैट्रो से सफर के दौरान हुआ। उन्‍होने जमुना के किनारे झ़ग्‍गी-झोंपड़ी के औरतों और मर्दो को डब्‍बा उठाए शौच के लिए लिए जाते और पानी के पाईप के आसचास शौच करते देखा। उन्‍होंने व‍हीं कन्‍हैया और उसकी मां की यह कहानी सोची। मुंबई आने के बाद मनोज मैरता दबंग के लेखक दिलीप शुक्‍ला के सहायक हो गए। उन्‍होंने दिलीप शुक्‍ला से अपना आयडिया शेयर किया। दिलीप शुक्‍ला की सलाह थी कि इसे लिख डालो। बतौर लेखक यह तुम्‍हारा करिअर बदल देगा। मनोज ने फिल्‍म लिखने के साथ उसके निर्देशन का भी इरादा किया। वे फिल्‍म के निर्देशन की कोशिशों में नगे। तभी उनकी मुलाकात रोकश ओमप्रकाश मेहरा से हुई। मेहरा को फिल्‍म का आय‍डिया बहुत पसंद आया। न्‍होंने इसे निर्देशित करने की बात कही।
इस बीच राकेश ओमप्रकाश मेहरा महात्‍वाकांक्षी फिल्‍म मिर्जिया की शूटिंग में व्‍यस्‍त हो गए। उससे फ्री होने के बाद उन्‍होंने मेरे प्‍यारे प्रधान मंत्री की शूटिंग आरंभ की है। कन्‍हैया की भूमिका के लिए अनेक बच्‍चों के ऑडिशन के बाद उन्‍होंने ओम का चुनाव किया। उसके साथ और चार बच्‍चे हैं। कन्‍हैया की मां की भूमिका अंजलि पाटिल निभा रही हैं। राकेश ओमप्रकाश मेहरा की फिल्‍मों की भव्‍यता और पैमाने के लिहाज से यह सीमित बजट की फिल्‍म है। इसमें हिंदी फिल्‍मों के परिचित और चर्चित चेहरे भी नहीं हैं के हिसाब से अपनी बड़ी फिल्‍म मानते हैं।
संयोग देखें कि भगत सिंह के जीवन से प्रेरित रंग दे बसंती के समय जैसे भगत सिंह पर अनेक फिल्‍में आ गई थीं,वैसे ही मेरे प्रिय प्रधान मंत्री के समय शौच के विषय पर दूसरी फिल्‍में भी आ रही हैं। उनमें अक्षय कुमार की टॉयलेट एक प्रेम कथा पर सभी का ध्‍यान लगा है।  

Saturday, June 17, 2017

रोज़ाना : अनेक व्‍यक्तियों का पुंज होता है एक किरदार



रोज़ाना
अनेक व्‍यक्तियों का पुंज होता है एक किरदार
-अजय ब्रह्मात्‍मज

फिल्‍म रिलीज होने के पहले या बाद में हम लेखकों से बातें नहीं करते। सभी मानते हें कि किसी जमाने में सलीम-जावेद अत्‍यंत लोकप्रिय और मंहगे लेखक थे। उस जमाने में भी फिल्‍मों की रिलीज के समय उनके इंटरव्‍यू नहीं दपते थे। उन्‍होंने बाद में भी विस्‍तार से नहीं बताया कि जंजीर के विजय को कैसे सोचा और गढ़ा। कुछ मोटीज जानकारियां आज तक मीडिया में तैर रही हैं। अमिताभ बच्‍चन स्‍वयं अपने किरदारों के बारे में अधिक बातें नहीं करते। वे लेखकों और निर्देशकों को सारा श्रेय देकर खुद छिप जाते हैं। अगर हिंदी फिल्‍मों के किरदारों को लेकर विश्‍लेषणात्‍मक बातें की जाएं तो कई रोचक जानकारियां मिलेंगी। क्‍यों कोई किरदार दर्शकों का चहेता बन जाता है और उसे पर्दे पर जी रहा कलाकार भी उन्‍हें भा जाता है? इसे खोल पाना या डिकोड कर पाना मुश्किल काम है।
अगर फिल्‍म किसी खास चरित्र पर नहीं है या बॉयोपिक नहीं है तो हमेशा प्रमुख चरित्र अनेक व्‍यक्तियों का पुंज होता है। जीवन में ऐसे वास्‍तविक चरित्रों का मिलना मुश्किल है। सबसे पहले लेखक लिखते समय अपने चरित्रों का स्‍केच और उनके अर्तसंबंधों का ग्राफ तैयार करता है। हिंदी फिल्‍मों का नायक चरित्र परतदार होता है। ये परतें विभिन्‍न व्‍यक्तियों से अती हैं। लेखक अनेक व्‍यक्तियों के समुच्‍चय से एक किरदार गढ़ता है। शायर निदा फाजली ने कहा था... हर आदमी में होते हैं. दस-बीस आदमी. जिसको भी देखना हो. कई बार देखना... उन्‍होंने फिल्‍मों के अनुभव से ही ऐसी बात कही होगी। लेखकों के गढ़ने के बाद ये किरदार निर्देशक के पास पहुंचते हैं। वह उन्‍हें सोच और दृष्टि देता है। लेखक के गढ़न को अभिव्‍यक्ति देता है। इसके बाद कलाकार अपनी विशेषताओं के अनुरूप ही उस किरदार को पर्दे पर जीता है। वह उस किरदार में अपने अनुभव और साक्ष्‍य से व्‍यक्तियों को जोड़ता है। कई बार कलाकार नाम लेकर बता देते हें कि उन्‍होंने फलां फिल्‍म का किरदार किस व्‍यक्ति पर आधारित किया था।
अगले हफ्ते सलमान खान की ट्यूबलाइट रिलीज होगी। इस फिल्‍म में सलमान खान की मासूमियत दर्शकों को भा रही है। उन्‍हें यह किरदार बजरंगी भाईजान का ही विस्‍तार लग रहा है। मंदबुद्धि के इस सीधे-सादे किरदार को निभाने में सलमान खान को काफी मशक्‍कत करनी पड़ी है। पिछले दिनों एक इंटरव्‍यू में उन्‍होंने बताया कि इस फिल्‍म के लक्ष्‍मण बिष्‍ट को उन्‍होंने मुख्‍य रूप से सत्‍या और परवेज के गुणों से विकसित किया है। बता दें कि सत्‍या महेश मांजरेकर के बेटे हैं। वे इन दिनों सलमान खान की संगत में रहते हैं। सलमान खान ने चेहरे का भाव सत्‍या से लिया है। उनकी सादगी और भोलेपन को अपना लिया है। इसके अलावा अपने डुप्‍लीकेट परवेज के भी गुण अपनाए हैं। सलमान खान के सेट पर परवेज हमेशा मौजूद रहते हें। असिस्‍टैंट उन्‍हें खड़ा कर ही शॉट की तैयारी करते हैं और लाइटिंग करते हैं। कभी-कभी लौंग शॉट में भी परवेज को सलमान खान की जगह खड़ा कर दिया जाता है। सलमान खान पहले ही बता चुके हैं कि उनकी कॉमिक टाइमिंग सोहैल खान से प्रेरित है। नाराजगी और गुस्‍सा दिखाने के लिए वे अपने डैड या अरबाज खान के भाव चुरा लेते हैं।
फिल्‍म देखते समय जरूरी नहीं है कि आप सलमान खान में इन व्‍यक्तियों की खोज करें।

Wednesday, June 14, 2017

रोज़ाना : चाहिए यूपी की कहानी

रोज़ाना
चाहिए यूपी की कहानी
-अजय ब्रह्मात्‍मज

पिछले दिनों फिल्‍मों में स्क्रिप्‍ट और संवाद लिख चुके जयपुर,राजस्‍थान के मूल निवासी रामकुमार सिंह ने दो ट्वीट किए। उन्‍होंने ट्वीट में राजस्थान की मुख्‍यमंत्री वसुंधरा राजे को टै किया और लिखा... मैडम, हम राजस्थान की कहानी सिनेमा में कहना चाहते हैं पर निर्माता हमसे यूपी की कहानी मांगते हैं, क्योंकि वहां सब्सिडी मिलती है। अगले ट्वीट में उन्‍होंने आग्रह किया... बॉलीवुड में राजस्थान और राजस्थानियों के बारे में कुछ सोचिये मैडम प्लीज।
रामकुमार सिंह की इस व्‍यथा के दो पहलू स्‍पष्‍ट हैं। एक तो राजस्‍थान में कोई ठोस फिल्‍म नीति नहीं हैं। हालांकि पारंपरिक तौर पर राजे-रजवाड़ों के किलों की शूटिंग के लिए हिंदी फिल्‍मकार राजस्‍थान जाते रहे हैं। हाल ही में राजस्‍थान की पृष्‍ठभूमि की पद्मावती की शूटिंग में संजय लीला भंसाली की शूटिंग में विध्‍न पड़ा और उन्‍हें उन दृश्‍यों की शूटिंग के लिए नासिक जाना पड़ा और मुंबई आना पड़ा। राजस्‍थान में सुविधाएं मिल जाती हैं,लेकिन किसी प्रकार की रियायत या सब्सिडी की व्‍यवस्‍था नहीं है। राजस्‍थान की प्रादेशिक फिल्‍म इंडस्‍ट्री का हाल अच्‍छा नहीं है। बहुत कम फिल्‍में बनती हैं और जो बनती हैं उनका स्‍तर श्‍लघनीय नहीं होता। यूपी या झारखंड की जैसी राजस्‍थान की फिल्‍म नीति नहीं होने से निर्माताओं का ध्‍यान उधर नहीं जाता और स्‍थानीय प्रतिभाओं को प्रोत्‍साहन नहीं मिलता। राजस्‍थान से मुंबई आए कहानीकार और फिल्‍मकार अपनी माटी और भाषा की कहानियों के बदले चालू किस्‍म की हिंदी फिल्‍में लिखने लगते हैं। स्‍वयं रामकुमार सिंह ने जेड प्‍लस की स्क्रिप्‍ट के बाद सरकार 3 के संवाद लिखे। उनकी पहली व्‍यथा रोचक है कि निर्माता यूपी की कहानियां मांगते हैं,क्‍योंकि वहां सब्सिडी मिलती है। यह सच्‍चाई है और इस सच्‍चाई ने हिंदी फिल्‍मों को भ्रष्‍ट भी किया है। निर्माता लेखकों से जबरन यूपी की कहानियां लिखवाते हैं और निर्देशकों को शूटिंग के लिए यूपी ले जाने हैं।
पिछले दिनों ऐसी अनेक हिंदी फिल्‍में आई,जिनकी कहानी यूपी की थी या फिर जिनकी शूटिंग यूपी में की गई थी। याद होगा कि अखिलेश यादव की यूपी की सरकार के दिनों में जारी फिल्‍म सब्सिडी की वजह से अनेक फिल्‍में यूपी पहुंच गई थी। यूपी में सरकार बदलने के बाद निर्माता ठिठके हैं,लेकिन माना जा रहा है यूपी की फिल्‍म नीति वैसे ही चलती रहेगी। अभी पिछले दिनों आई फिल्‍म बहन होगी तेरी देखते हुए साफ लग रहा था कि फिल्‍म की कथाभूमि और पृष्‍ठभूमि में कोई तालमेल नहीं है। लखनऊ के एक मोहल्‍ले में पंजाबी परिवार और पहाड़ी परिवार की लड़की-लड़के के बीच की प्रेमकहानी विश्‍वसनीय नहीं लग रही थी। ऊपर से एक हरियाणवी कनेक्‍शन भी आ गया था। साफ दिख रहा था कि दिल्‍ली की पृष्‍टभूमि पर लिखी गई कहानी को जबरन लखनऊ में रोप दिया गया है।
अगर आर्गेनिक तरीके से यूपी की कहानी नहीं होगी तो सिर्फ सब्सिडी के लालच में यूपी की छौंक देने से न तो फिल्‍म का स्‍वाद यूपी का होगा और न ही दर्शकों को फिल्‍म जंचेगी। हां,निर्माताओं को अपनी लागत का कुछ हिस्‍सा भले ही सब्सिडी के रूप में मिल मिल जाएगा।