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Friday, May 19, 2017

फिल्‍म समीक्षा : हाफ गर्लफ्रेंड



फिल्‍म रिव्‍यू
हाफ गर्लफ्रेंड

शब्‍दों में लिखना और दृश्‍यों में दिखाना दो अलग अभ्‍यास हैं। पन्‍ने से पर्दे पर आ रही कहानियों के साथ संकट या समस्‍या रहती है कि शब्‍दों के दृश्‍यों में बदलते ही कल्‍पना को मूर्त रूप देना होता है। अगर कथा परिवेश और भाषा की जानकारी व पकड़ नहीं हो तो फिल्‍म हाफ-हाफ यानी अधकचरी हो जाती है। मोहित सूरी निर्देशित हाफ गर्लफ्रेंड के साथ यही हुआ है। फिल्‍म का एक अच्‍छा हिस्‍सा बिहार में है और यकीनन मुंबई की हाफ गर्लफ्रेंड टीम को बिहार की सही जानकारी नहीं है। बिहार की कुछ वास्‍तविक छवियां भी धूमिल और गंदिल रूप में पेश की गई हैं। भाषा,परिवेश और माहौल में हाफ गर्लफ्रेंड में कसर रह जाता है और उसके कारण अंतिम असर कमजोर होता है।
उपन्‍यास के डुमरांव को फिल्‍म में सिमराव कर दिया गया है। चेतन भगत ने उपन्‍यास में उड़ान ली थी। चूंकि बिल गेट्स डुमरांव गए थे,इसलिए उनका नायक डुमरांव का हो गया। इस जोड़-तोड़ में वे नायक माधव को झा सरनेम देने की चूक कर गए। इस छोटी सी चूक की भरपाई में उनकी कहानी बिगड़ गई। मोहित सूरी के सहयोगियों ने भाषा,परिवेश और माहौल गढ़ने में कोताही की है। पटना शहर के चित्रण में दृश्‍यात्‍मक भूलें हैं। सेट या किसी और शहर में फिल्‍माए गए सीन पटना या डुमरांव से मैच ही नहीं करते। पटना में गंगा में जाकर कौन सा ब्रोकर अपार्टमेंट दिखाता है? स्‍टॉल पर लिट्टी लिख कर बिहार बताने और दिखाने की कोशिश में लापरवाही दिखती है। यहां तक कि रिक्‍शा भी किसी और शहर का है... प्रोडक्‍शन टीम इन छोटी बारीकियों पर ध्‍यान दे सकती थी। इस फिल्‍म के भाषा और लहजा पर अर्जुन कपूर के बयान आए थे। बताया गया था कि उन्‍होंने ट्रेनिंग ली थी। अब या तो ट्रेनर ही अयोग्‍य था या अर्जुन कपूर ने सही ट्रेनिंग नहीं ली थी। उनकी भाषा और दाढ़ी बदलती रहती है।
सिमराव से न्‍यूयार्क तक फैली हाफ गर्लफ्रेंड मूल रूप से एक प्रेमकहानी है। मोहित सूरी ने उसे वैसे ही ट्रीट किया है। बिहार दिखाने-बताने में वे असफल रहे हैं,लेकिन प्रेमकहानी के निर्वाह में वे सफल रहते हैं। माधव और रीया की प्रेमकहानी भाषा और इलाके की दीवार लांघ कर पूरी होती है। भौगोलिक दूरियां भी ज्‍यादा मायने नहीं रखती हैं। हिंदी फिल्‍में संयोगों का खेल होती हैं। हाफ गर्लफ्रेंड में तर्क दरकिनार है और संयोगों की भरमार है। बिल गेट्स की बिहार यात्रा और बेटी बचाओ,बेटी पढ़ाओ नारे को जोड़ने में लेखक व निर्देशक को क्‍यों दिक्‍कत नहीं हुई? ऐसे अनेक अतार्किक संयोगों का उल्‍लेख किया जा सकता है।
हाफ गर्लफ्रेंड में वास्‍तविकता की तलाश न करें तो यह आम हिंदी फिल्‍म की प्रेमकहानी के रूप में अच्‍छी लग सकती है। मोहित सूरी रोमांस के पलों का अच्‍छी तरह उभारते हैं। इस फिल्‍म में भी उनकी प्रतिभा दिखती है। वे श्रद्धा कपूर और अर्जुन कपूर को मौके भी देते हैं। दोनों प्रेमी-प्रेमिका के रूप में आकर्षक और एक-दूसरे के प्रति आसक्‍त लगते हैं। प्रेम के उद्दीपन के लिए जब-तब बारिश भी होती रहती है। और फिर गीत-संगीत तो है ही। अर्जुन कपूर और श्रद्धा कपूर ने अपने किरदारों के साथ न्‍याय करने की पूरी कोशिश की है,लेकिन वे स्क्रिप्‍ट की सीमाओं में उलझ जाते हैं। फिल्‍म में माधव झा के दोस्‍तों को व्‍यक्तित्‍व नहीं मिल पाया है। एक शैलेष दिल्‍ली के हॉस्‍टल से न्‍यूयार्क तक है,लेकिन उसकी मौजूदगी और माधव के प्रति उसका रवैया अस्‍पष्‍ट ही रहता है। मां की भूमिका में सीमा विश्‍वास फिल्‍मी पांरिवारिक मां ही रहती हैं।
अवधि- 135 मिनट
** दो स्‍टार

Saturday, January 14, 2017

फिल्‍म समीक्षा : ओके जानू

फिल्‍म रिव्‍यू
ओके जानू
-अजय ब्रह्मात्‍मज
शाद अली तमिल के मशहूर निर्देशक मणि रत्‍नम के सहायक और शागिर्द हैं। इन दिनों उस्‍ताद और शाग्रिर्द की ऐसी जोड़ी कमू दिखाई देती है। शाइ अली अपने उस्‍ताद की फिल्‍मों और शैली से अभिभूत रहते हैं। उन्‍होंने निर्देशन की शुरूआत मणि रत्‍नम की ही तमिल फिल्‍म के रीमेक साथिया से की थी। साथिया में गुलजार का भी यागदान था। इस बार फिर से शाद अली ने अपने उस्‍ताद की फिल्‍म ओके कनमणि को हिंदी में ओके जानू शीर्षक से पेश किया है। इस बार भी गुलजार साथ हैं।
मूल फिल्‍म देख चुके समीक्षकों की राय में शाद अली ने कुछ भी अपनी तरफ से नहीं जोड़ा है। उन्‍होंने मणि रत्‍नम की दृश्‍य संरचना का अनुपालन किया है। हिंदी रीमेक में कलाकार अलग हैं,लोकेशन में थोड़ी भिन्‍नता है,लेकिन सिचुएशन और इमोशन वही हैं। यों समझें कि एक ही नाटक का मंचन अलग स्‍टेज और सुविधाओं के साथ अलग कलाकारों ने किया है। कलाकरों की अपनी क्षमता से दृश्‍य कमजोर और प्रभावशाली हुए हैं। कई बार सधे निर्देशक साधारण कलाकारों से भी बेहतर अभिनय निकाल लेते हैं। उनकी स्क्रिप्‍ट कलाकारों को गा्रे करने का मौका देती है। ओके जानू में ऐसा ही हुआ है। समान एक्‍सप्रेशन से ग्रस्‍त आदित्‍य राय कपूर पहली बार कुछ खुलते और निखरते नजर आए हैं। हां,श्रद्धा कपूर में उल्‍लेखनीय ग्रोथ है। वह तारा की गुत्थियों और दुविधाओं को अच्‍छी तरह व्‍यक्‍त करती है। चेहरा फोकस में हो तो उतरते,बदलते और चढ़ते हर भाव को कैमरा कैद करता है। कलाकार की तीव्रता और प्रवीणता पकड़ में आ जाती है। श्रद्धा कपूर ऐसे क्‍लोज अप दृश्‍यों में संवाद और भावों को अच्‍दी तरह व्‍यक्‍त करती हैं। युवा कलाकारों को संवाद अदायगी पर काम करने की जरूरत है। इसी फिल्‍म में गोपी का किरदार निभा रहे नसीरूद्दीन शाह मामूली और रुटीन दृश्‍यों में भी बगैर मेलोड्रामा के दर्द पैदा करने में सफल रहे हैं। यह उनकी आवाज और संवाद अदायगी का असर है। यहां तक कि लीला सैमसन अपने किरदार को भी ऐसे ही गुणों से प्रभावशाली बनाती हैं।
फिलम की कहानी आज के युवा किरदारों के आग्रह और भ्रम पर केंद्रित है। तारा और आदि आज के युवा ब्रिगेड के प्रतिनिधि हैं। दोनों महात्‍वाकांक्षी हैं और जीवन में समृद्धि चाहते हैं। तारा आर्किटेक्‍अ की आगे की पढ़ाई के लिए पेरिस जाना चाहती है। आदि का ध्‍येय वीडियो गेम रचने में लगता है। वह अमेरिका को आजमाना चाहता है। आदि उसी क्रम में मुंबई आता है। वह ट्रेन से आया है। दोनों उत्‍तर भारतीय हैं। तारा समृद्ध परिवार की लड़की है। आदि मिडिल क्‍लस का है। फिल्‍म में यह गौरतलब है कि आदि को वहडयो गेम का सपना आता है तो निर्देश और सड़कों के दोनों किनारों की दुकानों के साइन बोर्ड हिंदी में लिखे हैं,लेकिन जब वह वीडियो गेम बनाता है तो सब कुछ अंग्रेजी में हो जाता है। शाद अली ने बारीकी से उत्‍तर भारतीय के भाषायी अवरोध और प्रगति को दिखाया है। बहरहाल, इस फिल्‍म में भी दूसरी हिंदी फिल्‍मों की तरह पहली नजर में ही लड़की लड़के को आकर्षित करती है और फिर प्रेम हो जाता है।
ओके जानू प्रेम और करिअर के दोराहे पर खड़ी युवा पीढ़ी के असमंजस बयान करती है। साहचर्य और प्‍यार के बावजूद शादी करने के बजाय लिव इन रिलेशन में रहने के फैसले में कहीं न कहीं कमिटमेंट और शादी की झंझटों की दिक्‍कत के साथ ही कानूनी दांवपेंच से बचने की कामना रहती है। हम लिव इन रिलेशन में रहने और अलग हो गए विख्यात प्रेमियों को देख रहे हैं। उनकी जिंदगी में तलाक की तकलीफ और देनदारी नहीं है। खास कर लड़के ऐसे दबाव से मुक्‍त रहते हैं। आदि और तारा दोनों ही स्‍पष्‍ट हैं कि वे अपने ध्‍येय में संबंध को आड़े नहीं आने देंगे। ऐसा हो नहीं पाता। साथ रहते-रहते उन्‍हें एहसास ही नहीं रहता कि वे कब एक-दूसरे के प्रति कमिटेड हो जाते हैं। उनके सामने गोपी और चारू का साक्ष्‍य भी है। उन दोनों की परस्‍पर निर्भरता और प्रेम आदि और तारा के लिए प्रेरक का काम करते हैं।
अपनी प्रगतिशीलता के बावजूद हम अपनी रूढि़यों से बच नहीं पाते। इसी फिल्‍म में गोपी तारा से पूछते हैं कि वह करिअर और प्‍यार में किसे चुनेगी? यही सवाल आदि से भी तो पूछा जा सकता है। दरअसल, हम लड्कियों के लिए प्‍यार और करिअर की दुविधा खड़ी करते हैं। ओके जानू ऐसे कई प्रसंगों की वजह से सोच और अप्रोच में आधुनिक होने के बावजूद रूढि़यों का पालन करती है।
अवधि- 135 मिनट
तीन स्‍टार 

Friday, June 19, 2015

फिल्‍म समीक्षा : एबीसीडी 2

स्‍टार- **1/2 ढाई स्‍टार

-अजय ब्रह्मात्‍मज 
रैमो डिसूजा की फिल्म ‘एबीसीडी 2’ में डांस है, जोश है, देशभक्ति और अभिमान भी है, वंदे मातरम है, थोड़ा रोमांस भी है...फिल्मों में इनसे ही अलग-अलग संतुष्ट होना पड़ेगा। दृश्ये और प्रसंग के हिसाब से इन भाव और भावनाओं से मनोरंजन होता है। कमी रह गई है तो बस एक उपयुक्त कहानी की। फिल्म सच्ची कहानी पर आधारित है तो कुछ सच्चाई वहां से ले लेनी थी। कहानी के अभाव में यह फिल्म किसी रियलिटी शो का आभास देती है। मुश्किल स्टेप के अच्छेे डांस सिक्वेंस हैं। डांस सिक्वेंस में वरुण धवन और श्रद्धा कपूर दोनों सुरु और विन्नी के किरदार में अपनी लगन से मुग्ध करते हैं। कहानी के अभाव में उनके व्यक्तिगत प्रयास का प्रभाव कम हो जाता है। पास बैठे युवा दर्शक की टिप्पणी थी कि इन दिनों यूट्यूब पर ऐसे डांस देखे जा सकते हैं। मुझे डांस के साथ कहानी भी दिखाओ।

 सुरु और विन्नी मुंबई के उपनगरीय इलाके के युवक हैं। डांस के दीवाने सुरु और विन्नी का एक ग्रुप है। वे स्थानीय स्तुर पर ‘हम किसी से कम नहीं’ कंपीटिशन में हिस्सा लेते हैं। नकल के आरोप में वहां उनकी छंटाई हो जाती है। उसकी वजह से जगहंसाई भी होती है। इस तौहीन के बावजूद उनका जोश ठंडा नहीं होता। वे मशहूर डांसर विष्णु को ट्रेनिंग के लिए राजी करते हैं (विष्णु सर को राजी करने के दृश्य में दोहराव से फिल्म खिंचती है। विष्णु सर अपने फ्लैट में आते समय एक खास जगह पर ही लड़खड़ाते हैं। हंसे नहीं, शायद कैमरे के एंगल से वह सही जगह हो)। बहरहाल, विषणु सर राजी तो होते हैं, लेकिन उनका कुछ और गेम प्लान है। फिल्म में आगे वह जाहिर होता है, फिर भी ड्रामा नहीं बन पाता। ‘एबीसीडी 2’ में ड्रामा की कमी है। इस कमी की वजह से ही सुरु और विन्नी का रोमांस भी नहीं उभर पाता। नतीजतन दोनों के बीच का रोमांटिक सॉन्ग अचानक और गैरजरूरी लगता है। 

प्रभु देवा फिल्मों के बेहतरीन डांसर हैं। बतौर निर्देशक उनकी कुछ फिल्में सफल भी रही हैं। मतलब वे एक्टरों से अभिनय वगैरह भी करवा लेते हैं, किंतु खुद अभिनय करते समय वे निराश करते हैं। उनके लिए कुछ नाटकीय दृश्य रचे भी गए है, लेकिन वे उसमें परफार्म नहीं कर सके हैं। डांस के गुरू के तौर उन्हें कुछ सीन मिल सकते थे। वरुण धवन और श्रद्धा कपूर ने मुश्किल स्टेप भी सहज तरीके से अपनाए हैं। ऐसा नहीं लगता कि वे मेहनत कर रहे हैं। एक्टर दृश्यों को एंजॉय करें तो इफेक्ट गहरा होता है। दोनों अभी दो-तीन फिल्मो ही पुराने हैं। दिख रहा है कि वे हर फिल्म के साथ आगे बढ़ रहे हैं। पर्दे पर लगातार दिखने से स्वीकृति बढ़ती है और परफार्मेंस पसंद आ जाए तो स्टारडम में इजाफा होता है। सुरु और विन्नी की टीम के अन्य सदस्य भी डांस के दृश्यों में उचित योगदान करते हैं। अपनी पहली फिल्म ‘वेलकम टू कराची’ में निराश कर चुकी लॉरेन गॉटलिब ‘एबीसीडी 2’ में जंचती हैं। उनका डांस सिक्वेंस नयनाभिरामी (आई कैचिंग) है।

 रैमो डिसूजा ने फिल्मा में भव्यता रखी है। डांस कंपीटिशन के सेट चकमदार होने के साथ ही आकर्षक हैं। डांस के स्टेप्स नए और प्रभावशाली हैं। यहां तक कि विदेशी टीमों के नृत्यों पर भी पूरा ध्यान दिया गया है। कमी रह गई है सिर्फ कहानी की, जिसका जिक्र पहले भी किया गया। 
 अवधि- 154 मिनट

Tuesday, June 2, 2015

करना होता है यकीन - श्रद्धा कपूर




-अजय ब्रह्मात्‍मज
एबीसीडी 2 डांस और टैलेंट पर आधारित एबीसीडी की सीक्‍वल है। फिल्‍म का संदेश है एनी बॉडी कैन डांस ... पहली फिल्‍म की सफलता के बाद थोड़ पॉपुलर स्‍टारों का लेकर इस फिल्‍म का विस्‍तार किया गया है। इसमें वरूण धवन और श्रद्धा कपूर लीड भूमिकाओं में हैं। फिल्‍म के लिए उन्‍हें डांस की स्‍पंशन ट्रेनिंग भी लेनी पड़ी। पिछले दिनों इस फिल्‍म के एक गाने ओ साथिया,ओ माहिया,बरसा दे इश्‍क की स्‍याहियां गानें के फिल्‍मांकन पर श्रद्धा ने बातें कीं। फिल्‍म का यह खास गाना श्रद्धा कपूर के किरदार की भावनाओं का जाहिर करता है।
- ओ साथिया,ओ माहिया गाने के बारे में क्‍या कहना चाहेंगी ?
0 मुझे यह गाना बहुत पसंद है। सचिन जिगर ने इस गाने में मलोडी दी है। फिल्‍म में यह एक रोमांटिक ट्रैक है। इस गाने में मेरे साथ वरूण धवन भी हैं। मैं अपनी भावनाएं इस गाने में जाहिर करती हूं। फिल्‍म में अच्‍छी तरह समझ में आएगाा कि फिल्‍म में यह गाना क्‍यों रखा गया है ?
- इस गाने में आप का डांस रेगुलर फिल्‍मी डांस से अलग हैं ?
0 जी, मुझे लिरिकल हिप हॉप के लिए कहा गया था। आप गौर करेंगे कि प्रचलन के मताबिक फिल्‍म में छोटे टे नहीं हैं। लंबे टेक हैं। िकट और क्‍लोज अप नहीं हैं। वाइड शॉट भी लिए गए हैं। पूरी फिल्‍म में यही टेकनीक रखी गई है। यह एडिट पैटर्न फिल्‍म के प्रभाव को बढ़ाएगा,क्‍योंकि आप डांस का रिद्म देख सकेंगे।
-क्‍या इमोशनल और ड्रामैटिक सीन भी ऐसे ही लंबे शॉट के हैं ?
0 कोशिश की गई है। हिंदी फिल्‍मों में ऐसा एडिट पैटर्न नहीं देखा होगा। आम दर्शक इंपैक्‍ट महसूस करेगा।
-मुझे एक अनुभवी डायरेक्‍टर ने कहा था कि इन दिनों की अभिनेत्रियां पर्दे पर इमोशन होल्‍ड नहीं कर पाती हैं,इसलिए छोटे शॉट और कट रखने पड़ते हैं। अगर एबीसीडी 2 में लंबे कट हैं तो इसका मतलब आप इमोशन होल्‍ड कर सकते हो।
0 कोशिश तो की है। फिल्‍म देखने के बाद आप बताएं कि मैंने इमाशन ठीक से होल्‍ड किया है कि नहीं ? आप की बात सही है कि आज कल हम जल्‍दी थक जाते हैं या सीन ही ऐसे लिखे जा रहे हैं कि फट से इधर,झट से उधर। निश्चित ही फिल्‍ममेकिंग का पहले जैसा पैशन अभी नहीं रहा। हमारा दिमाग एक साथ कई दिशाओं में दौड़ रहा होता है। अभी की अभिनेत्रियों की जिंदगी बदल गई है। हम मॉडर्न हो गए हैं।
- यह गाना फिल्‍म में कब आता है ?
0 हमलोग रिहर्सल कर रहे हैं। उस रिर्सल के दौरान एहसास जागते हैं और फिर यह गाना आता है। मुझे इस गाने की लीन बॉडी बनानी पड़ी। रेमो सर चाहते थे कि मैं वैसी ही दिखूं।
-अच्‍छा यह बताएं कि गानों के बोल पर डांस करते समय कितना ध्‍यान रहता है ? क्‍या बोलों के मतलब समझती हैं या यो ही होंठ हिला देती हैं ?
0 बगैर बोल समझें इमोशन कहां से आएगा। हैदर में गाना गाया था तो विशाल सर ने बोलों के महत्‍व के बारे में बताया था। तब से मैं ध्‍यान देने लगी हूं। बोल समझ में आ जाएं तो परफारमेंस में कनेक्‍शन दिखता है।


Tuesday, November 4, 2014

क्‍या बुराई है कंफ्यूजन में : श्रद्धा कपूर


-अजय ब्रह्मात्मज
श्रद्धा कपूर पढ़ाई के सिलसिले में अमेरिका के बोस्टन शहर चली गईं थीं। एक बार छुट्टियों में आईं तो उन्हें फिल्मों के ऑफर मिले। तब तक मन नहीं बनाया था कि आगे क्या करना है? कुछ दिनों तक दुविधा रही कि आगे पढ़ाई जारी रखें या फिल्मों के ऑफर स्वीकार करें। श्रद्धा ने दिल की बात सुनी। पढ़ाई छोड़ दी और फिल्म इंडस्ट्री में प्रवेश किया।
-क्या फिल्मों में आने के फैसले के पहले एक्टिंग की कोई ट्रेनिंग वगैरह भी ली थी?
लीना यादव की फिल्म ‘तीन पत्ती’ के पहले मैंने बैरी जॉन के साथ ट्रेनिंग ली। उससे बहुत फायदा हुआ। फिर यशराज फिल्म्स की ‘लव का द एंड’ करते समय डायरेक्टर के साथ ही स्क्रिप्ट रीडिंग की। ‘आशिकी 2’ के पहले मुकेश छाबड़ा के साथ वर्कशॉप किए। वे बहुत मशहूर कास्टिंग डायरेक्टर हैं। ‘हैदर’ की भी कास्टिंग उन्होंने की थी। मुकेश छाबड़ा कमाल के टीचर हैं। अभी हाल में ‘एबीसीडी 2’ के सेट पर भी उनसे मुलाकात हुई। मैं उन्हें ‘तीन पत्ती’ के समय से जानती हूं। तब वे अभिमन्यु रे के सहायक थे। मुकेश छाबड़ा बहुत ही सख्त शिक्षक हैं। रियल टास्क मास्टर..।
-ऐसे टीचर के साथ सीखते समय कोफ्त तो होती होगी?
मुकेश सर अनुशासन चाहते हैं। टास्क मास्टर कहने का यह मतलब नहीं है कि वे तंग करते हैं। सीखने में कोफ्त कैसी? मुझे तो उनके साथ बहुत अच्छा लगता है। उनके वर्कशॉप में बहुत कुछ सीखने को मिलता है।
- शुरू की दो फिल्में न चलने से निराशा तो हुई होगी। कहीं यह एहसास तो हुआ होगा कि करियर शुरू होते ही डगमगाने लगा?
बिल्कुल लगा था ऐसा। ‘आशिकी 2’ में एक लाइन है ‘अंधेरे को अंधेरा नहीं, सिर्फ रौशनी मिटा सकती है’। असफलता के उस अंधेरे में मुझे अपने परिवार से रौशनी मिली। उन्होंने यह बताया और समझाया कि ऐसी असफलताएं आती रहेंगी। सिर्फ फिल्मों में ही ऐसा नहीं होता। दूसरे क्षेत्रों में भी काम करने वालों को आरंभ में स्वीकार नहीं किया जाता। खुद पर विश्वास होना चाहिए। बचपन से देखे गए ख्वाब को इतनी आसानी से छोड़ा तो नहीं जा सकता।
- आप को खुद ‘हैदर’ कैसी लगी?
मैंने रिलीज के दो दिन पहले ‘हैदर’ देखी। उस स्क्रीनिंग में अमिताभ बच्चन भी आए थे। फिल्म देखते समय ही में रोने लगी। फिल्म खत्म होने के बाद मीडिया के सामने जाने के पहले ठीक से आंखों को पोंछा। खुद को संभाला। फिल्म देखकर मैं अवाक रह गई थी। गला रुंध गया था। तब तक विशाल सर निकल गए थे। उन्हें फोन किया तो उनका मोबाइल ऑफ था। रात के डेढ बज रहे थे, इसलिए उनके लैंडलाइन पर फोन नहीं किया। अगली सुबह जब उन्हें बताया तो उन्होंने डांटा कि तुम्हें मुझे जगा देना चाहिए था। मैंने तुम्हारा एक्साइटमेंट मिस किया। अगर तुम्हारा मन था मुझसे बात करने का तो मेरे घर आ जाना चाहिए था।
-‘हैदर’ का अनुभव कैसा रहा? क्या इस फिल्म के अनुभव से श्रद्धा देश और कश्मीर को लेकर अधिक समझदार हुईं?
‘हैदर’ की स्क्रिप्ट पढ़ते समय बहुत सारी चीजें मेरी समझ में नहीं आई थी। यह तो समझ में आ रहा था कि जो मैं नहीं समझ रही हूं, वह कुछ अलग ही बात है। अंदर से इच्छा हुई कि इसके बारे में पता करना चाहिए। फिर मैंने कोशिश की। कश्मीर के बारे में पढ़ा, जाना। ‘हैदर’ जैसी फिल्में हम एक्टर को समझदार बना देती हैं। फिल्म करते हुए हम बहुत सारी चीजें जान जाते हैं। फिल्म देखने के बाद मैंने यह भी सोचा कि विशाल सर ने क्या सोचकर मुझे इस फिल्म का हिस्सा बनाया है। ‘हैदर’ मेरी क्षमताओं से बड़ी फिल्म है। मुझे इतने उम्दा एक्टरों के साथ काम करने का मौका मिला। फिल्म करने के बाद भी मुझे लगता है कि अभी कश्मीर और देश के बारे में बहुत कुछ जानना बाकी है। आप को बताऊं कि फिल्मों में आने के पहले एक बार आमिर खान से मेरी मुलाकात हुई थी। उन्होंने सुझाव दिया था कि फिल्में शुरू करने से पहले पूरा देश देख लो। बाद में यह मुमकिन नहीं होगा। अभी अफसोस होता है कि मैं ऐसा नहीं कर सकी थी। अब तो कहीं आना-जाना मुश्किल है। फिर भी मैं कोई रास्ता निकालूंगी।
-तब्बू के साथ आप के कम दृश्य हैं। फिर भी सेट पर तो उन्हें काम करते हुए देखा होगा। क्या सीखा उनसे?
जब विशाल सर ने बताया कि गजाला की भूमिका तब्बू करेंगी तो मैं खुशी से उछल पड़ी थी। मैं उनकी जबरदस्त फैन हूं। हम सारी अभिनेत्रियां सफलता के रेस में शामिल हैं। तब्बू इनसे अलग हैं। अभी उनके मुकाबले में कोई और अभिनेत्री नहीं है। तब्बू के इर्द-गिर्द भी हम नहीं पहुंच सकते। अगर कोई रोल उनके लिए लिखा गया है तो उसे कोई और निभा भी नहीं सकता। आप ही बताएं गजाला का रोल क्या किसी और अभिनेत्री को दिया जा सकता था? उनका विकल्प नहीं है। उनकी एनर्जी और काम करने की शैली बहुत ही नैचुरल है। सेट पर वे बहुत ही फ्रेंडली रहती हैं। हंसमुख स्वभाव की हैं। कैमरा ऑन होते ही कुछ मिस्ट्री क्रिएट होती है और वह तब्बू नहीं रह जातीं।
-स्कूल में सभी विषयों के अलग-अलग अध्यापक होते हैं। क्या निर्देशकों में भी ऐसी भिन्नता होती है? अगर मैं पूछूं कि आप के निर्देशकों की तुलना टीचरों से की जाए तो वे किस-किस सब्जेक्ट के टीचर होंगे?
विशाल सर मुझे लिटरेचर के टीचर लगते हैं। कोई कविता पढ़ा रहा हो। लीना मैम तो मैथ की टीचर हैं। उनके यहां नंबर और नंबर ही आते रहते हैं। उनकी ‘तीन पत्ती’ याद कर लें। ‘लव का द एंड’ के डायरेक्टर बंपी को बायोलॉजी का टीचर कह सकते हैं। मोहित थिएटर के टीचर होंगे। ड्रामा पढ़ाने वाले।
-अपने कैरेक्टर और एक्टिंग के प्रति आप का क्या अप्रोच रहता है?
मेरा अप्रोच हर दिन बदलता है। मैं पहले से कुछ भी तय नहीं करती। फिल्म शुरू होने के पहले हमेशा कंफ्यूज रहती हूं। अभी मेरी उम्र ही क्या है? सच कहती हूं कि मैं सब कुछ समझ नहीं पाती। रायटर-डायरेक्टर की बात मानती हूं और बहुत थोड़ा अपना दिमाग लगाती हूं। मेरी मां कहती है कि तुम हमेशा अनिर्णय की स्थिति में रहती हो। मुझे लगता है कि यह कोई खराब बात नहीं है। अगर अभी से सब समझ गई तो क्या सीखूंगी?
-अभी क्या कर रही हैं?
फिलहाल वरुण धवन के साथ ‘एबीसीडी 2’ कर रही हूं। एक और बड़े बैनर की फिल्म साइन की है। थोड़ा इंतजार करें। जल्दी ही उसकी घोषणा होगी।

Thursday, October 16, 2014

बापू की लकी बेटी श्रद्धा कपूर


-अजय ब्रह्मात्मज
    इस साल आई ‘एक विलेन’ और ‘हैदर’ की कामयाबी में पिछले साल की ‘आशिकी 2’ की कामयबी जोडऩे से हैटट्रिक बनती है। किसी नई अभिनेत्री के लिए यह बड़ी उपलब्धि है। अब लोग का भूल गए हैं कि उन्होंने ‘तीन पत्ती’ और ‘लव का द एंड’ जैसी फिल्मों में भी काम किया था। श्रद्धा इस सफलता के साथ यह भी जानती हैं कि हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में हर नई रिलीज के साथ शुक्रवार को नया अध्याय आरंभ होता है। कभी कोई चढ़ता है तो कोई फिसलता है। वह कहती हैं,‘मैं फिल्म परिवार से हूं। मैंने बापू का करिअर देखा है। मेरे परिवार में और भी आर्टिस्ट हैं। फिल्में नहीं चली थीं तो परिवार ने ही ढाढस और साहस दिया। मैंने अपना ध्यान काम पर रखा। आज नतीजा सभी के सामने है। इसके लिए मैं अपने निर्देशकों और को-स्टार को सारा श्रेय देना चाहूंगी। हां,इसमें दर्शकों का प्यार भी शामिल है।’ श्रद्धा अपने पिता शक्ति कपूर को बापू पुकारती हैं।
    इस बातचीत के दरम्यान अचानक शक्ति कपूर हॉल में आए तो श्रद्धा ने इतरा कर बताया,‘बापू,इंटरव्यू दे रही हूं।’ पिता के चेहरे पर खुशी,संतुष्टि और गर्व की त्रिवेणी तैर गई। चमकती आंखों से उन्होंने बेटी को दुलारा और कहा,‘खूब अच्छा इंटरव्यू देना मन से।’ फिर मुझे संबोधित करते हुए जानकारी दी,‘आज श्रद्धा की नई गाड़ी आई है। उसने अपने पैसों से यह गाड़ी खरीदी है।’ पिता के इस संबोधन से श्रद्धा भी खिल उठीं। उन्होंने बताया कि मैंने एमएन सीरिज की मर्सीडिज खरीदी है। इसके चुनाव में घर वालों ने मेरी मदद की। अपनी कमाई से कुछ खरीदने का संतोष हर आय समूह के यूथ में होता है। श्रद्धा लगातार सफल फिल्मों का हिस्सा रहीं। साथ ही उन्हें सुर्खियों में रहना और मीडिया संभालना भी आ गया है। बीच में फोटोग्राफरों का एक ग्रुप नाराज हुआ तो उसे उन्होंने बहुत प्यार और आदर से संभाला।
    अपनी इमेज और फिल्मों को लेकर सचेत श्रद्धा घरेलू किस्म की लडक़ी हैं। छोटी-छोटी चीजों का शौक है। जैसे कि अपनी ािडक़ी के बाहर उन्होंने गमले रखे हैं। एक गमले में टमाटर लगाया था। एक ही टमाटर फला,लेकिन वह पौधे में ही लाल हुआ। उसकी मिठास कर बखान करने लगती हैं तो श्रद्धा को सही शब्द नहीं मिल पाते। चूंकि बातचीत हिंदी में चल रही थी,इसलिए वह हिंदी के शब्द खोज रही थीं। परिवार में हिंदी,मराठी और अंग्रेजी बोली जाती है। श्रद्धा तीनों भाषाओं में धाराप्रवाह बातें कर सकती हैं। मेरे सामने ही उन्होंने अपनी बाई से मराठी में बातें कीं।यह भी बताया कि सुनीता बाई ने उन्हें बचपन से देखा और संभाला है। मेरी फिल्में देखने जाती हैं तो आकर खुशी से रोने लगती हैं। प्यार से मुझे इतना चूमती हैं कि मेरा चेहरा लाल हो जाता है। उन्हें नहीं पता कि मैं अब नाम वाली एक्टर हो गई हूं। अभी भी पहले की तरह डांट देती हैं। श्रद्धा कहती हैं,‘जमनाबाई नरसी स्कूल के समय तो हिंदी पर अच्छी पकड़ थी। बाद में यहीं अमेरिकन स्कूल में चली गई। वहां अंग्रेजी माहौल थ। वह भी अमरिकी लहजे का ...स्कूल से निकली तो कॉलेज के लिए अमेरिका के बोस्टन चली गई। लौटने के बाद हिंदी का अभ्यास किया। वैसे सभी बताते हैं कि मेरा उच्चारण सही रहता है। मैं अपने संवाद अच्छी तरह बोल लेती हूं।’
    बचपन से जुहू के इसी अपार्टमेंट में माता-पिता के साथ रह रही श्रद्धा खिडक़ी से झांकते समुद्र की तरफ दिखा कर कहती हैं,‘यह घर 33 साल पुराना है। मैं इसमें रच-बस गई हूं। बापू बताते हैं कि मेरे पैदा होने के बाद उनकी जिंदगी और करिअर में उछाल आया। वे मुझे अपनी लगी बेटी मानते हैं। सच कहूं तो मैं लकी हूं। उन्होंने कभी किसी बात की कमी नहीं होने दी। मेरे फैसलों का समर्थन किया। मुझे लगता है कि अगर बापू का सपोर्ट मिले तो हर लडक़ी अपनी ख्वाहिशें पूरी कर सकती है।’ ‘हैदर’ के लिए मिल रही तारीफ से खु्रश श्रद्धा इन दिनों वरुण धवन के साथ ‘एबीसीडी 2’ की शूटिंग में व्यस्त हो गई हैं।
   

Friday, October 3, 2014

फिल्‍म समीक्षा : हैदर

-अजय ब्रह्मात्‍मज 
1990 में कश्मीर में आम्र्ड फोर्सेज स्पेशल पॉवर एक्ट के लागू होने के बाद सेना के दमन और नियंत्रण से वहां सामाजिक और राजनीतिक स्थिति बेकाबू हो गई थी। कहते हैं कि कश्मीर के तत्कालीन हालात इतने बदतर थे कि हवाओं में नफरत तैरती रहती थी। पड़ोसी देश के घुसपैठिए मजहब और भारत विरोध केनाम पर आहत कश्मीरियों को गुमराह करने में सफल हो रहे थे। आतंक और अविश्वास के उस साये में पीर परिवार परस्पर संबंधों के द्वंद्व से गुजर रहा था। उसमें शामिल गजाला, हैदर, खुर्रम, हिलाल और अर्शिया की जिंदगी लहुलूहान हो रही थी और सफेद बर्फ पर बिखरे लाल छीटों की चीख गूंज रही थी।
विशाल भारद्वाज की 'हैदर' इसी बदहवास दौर में 1995 की घटनाओं का जाल बुनती है। 'मकबूल' और 'ओमकारा' के बाद एक बार फिर विशाल भारद्वाज ने शेक्सपियर के कंधे पर अपनी बंदूक रखी है। उन्होंने पिछले दिनों एक इंटरव्यू में कहा कि प्रकाश झा ने अपनी फिल्मों में नक्सलवाद को हथिया लिया वर्ना उनकी 'हैदर' नक्सलवाद की पृष्ठभूमि में होती। जाहिर है विशाल भारद्वाज को 'हैदर' की पृष्ठभूमि के लिए राजनीतिक उथल-पुथल की दरकार रही होगी। अन्यथा प्रेम, घृणा, प्रतिशोध और प्रेम की कहानी 'हैदर' मुंबई के कारपोरेट और दिल्ली के पॉलिटिकल बैकड्रॉप में से रोचक तरीके से कही जा सकती है। शेक्सपियर का नाटक 'हैमलेट' होने और न होने के प्रश्न को स्थायी प्रासंगिकता देती है। दुनिया भर के फिल्मकार और रंगकर्मी इसे अपने संदर्भ और परिवेश में पेश करते हैं। विशाल भारद्वाज ने कश्मीर चुना है।
विशाल भारद्वाज निस्संदेह अपनी पीढ़ी के समर्थ और संवेदनशील फिल्मकार हैं। बाजार और फैशन के दवाब से परे जाकर वे क्रिएटिव कट्टरता के साथ फिल्में बनाते हैं। अपनी फिल्मों के क्रिटिकल अप्रिसिएशन से संतुष्ट विशाल भारद्वाज को आम दर्शकों की कभी परवाह नहीं रही। इस मामले में वे आत्मनिष्ठ और आत्ममुग्ध फिल्मकार हैं। उनकी फिल्मों में भावना और संवेदना का घनत्व ज्यादा रहता है। कथ्य की इस सघनता से उनका शिल्प भी गाढ़ा और जटिल होता है। अच्छी बात है कि उनकी फिल्मों की अनेक व्याख्याएं हो सकती हैं। विशाल भारद्वाज 'हैदर' में भी सरल नहीं हैं। उन्होंने शेक्सपियर के 'हैमलेट' से प्रेरित 'हैदर' को और परतदार एवं जटिल बना दिया है।
'हैदर' नायक हैदर के प्रतिशोध से ज्यादा गजाला की ग्लानि और दुविधा को लेकर चलती है। अंदर की आंच कम करने की सलाह देते पिता के कथन का मर्म गजाला की आत्मकथन में भी व्यक्त होता है, जब वह बेटे हैदर के सामने अपनी व्यथा जाहिर करती है। जाने-अनजाने फिल्म की मुख्य घटनाओं की वजह बनती गजाला अनायास हैदर से फिल्म की केंद्रीयता छीन लेती है। विशाल भारद्वाज ने 'हैमलेट' की अपनी प्रस्तुति में कुछ किरदार जोड़े हैं। उन्होंने नाटक की नाटकीयता के फिल्म के शिल्प में बखूबी ढाला है। रूहदार दिखता तो अलग किरदार है, लेकिन वह हैदर के पिता की रूह ही है। वही हैदर को इंतकाम केलिए प्रेरित करता है। खुर्रम की वासना और लालसा हैदर की मां पर फरेब डालती है। उसकी आंखों में गोली मार कर इंतकाम लेने के पिता के संदेश से सक्रिय हैदर प्रतिशोध की आग में कवि से हत्यारा बन जाता है।
'हैदर' में सभी कलाकार अपने किरदारों को प्रभावशाली तरीके से जीने की मेहनत करते हैं। इनमें गजाला बनी तब्बू और खुर्रम बने केके मेनन अपने प्रयासों में सफल रहते हैं। हालांकि दोनों अपनी मुग्धकारी प्रतिभाएं अनेक फिल्मों में साबित कर चुके हैं, लेकिन इस फिल्म में विशाल के निर्देशन में उन्हें फिर से निखरते देखना अच्छा लगता है। शाहिद कपूर ने हैदर के बाहरी रूप को अच्छी तरह अंगीकार किया है। वे किरदार के आंतरिक द्वेष और प्रतिशोध को सही अनुपात में आत्मसात नहीं कर सके हैं। श्रद्धा कपूर अदायगी और संवाद अदायगी दोनों में विफल रही हैं। उनका खूबसूरत चेहरा भावों के अनुरूप नहीं बदलता। ललित परिमू, आशीष विद्यार्थी जैसे सहयोगी किरदारों की वेशभूषा पर ध्यान नहीं दिया गया है। इरफान सिद्धहस्त अभिनेता हैं। उनकी मौजूदगी ही काफी लगती है। यहां वे रूहदार को तरजीह देते नहीं दिखाई पड़ते। 'हैदर' की खोज है नरेंद्र झा। हैदर के पिता के रूप में उन्होंने शानदार परफारमेंस दी है।
'हैदर' है तो 1995 के कश्मीर की पृष्ठभूमि पर, लेकिन फिल्म में उस साल की राजनीतिक घटनाओं का कोई रेफरेंस नहीं है। उस साल कश्मीर में विदेशी पर्यटकों की हत्या से लेकर चरार-ए-शरीफ की आगजनी जैसी बड़ी घटनाएं हुई थीं। 'हैदर' में कहीं भी उनका हवाला नहीं मिलता। फिल्म में 'अफ्सपा(आम्र्ड फोर्सेज स्पेशल पॉवर एक्ट) का चुत्जपा भर किया गया है। विशाल भारद्वाज की फिल्मों में लतीफे और मजाकिया किरदार भी रहते हैं। इस फिल्म में अभिनेता सलमान खान के प्रतिरूप बने दोनों सलमान और लतीफों पर हंसी तो आती है, मगर यह हंसी फिल्म के अभिप्राय को कमजोर करती है।
अवधि-161 मिनट 
***1/2 साढ़े तीन स्‍टार 

Friday, June 27, 2014

फिल्‍म समीक्षा : एक विलेन

एंग्री यंग मैन की वापसी 
 -अजय ब्रमात्‍मज 
 गणपति और दुर्गा पूजा के समय मंडपों में सज्जाकार रंगीन रोशनी, हवा और पन्नियों से लहकती आग का भ्रम पैदा करते हैं। दूर से देखें या तस्वीर उतारें तो लगता है कि आग लहक रही है। कभी पास जाकर देखें तो उस आग में दहक नहीं होती है। आग का मूल गुण है दहक। मोहित सूरी की चर्चित फिल्म में यही दहक गायब है। फिल्म के विज्ञापन और नियोजित प्रचार से एक बेहतरीन थ्रिलर-इमोशनल फिल्म की उम्मीद बनी थी। इस विधा की दूसरी फिल्मों की अपेक्षा 'एक विलेन' में रोमांच और इमोशन ज्यादा है। नई प्रतिभाओं की अभिनय ऊर्जा भी है। रितेश देशमुख बदले अंदाज में प्रभावित करते हैं। संगीत मधुर और भावपूर्ण है। इन सबके बावजूद जो कमी महसूस होती है, वह यही दहक है। फिल्म आखिरी प्रभाव में बेअसर हो जाती है।
नियमित रूप से विदेशी फिल्में देखने वालों का 'एक विलेन' में कोरियाई फिल्म 'आई सॉ द डेविलÓ की झलक देख सकते हैं। निस्संदेह 'एक विलेन' का आइडिया वहीं से लिया गया है। उसमें प्रेम और भावना की छौंक लगाने के साथ संगीत का पुट मिला दिया गया है। जैसे कि हम नूडल्स में जीरा और हल्दी डाल कर उसे भारतीय बना देते हैं या इन दिनों चाइनीज भेल खाते हैं, वैसे ही 'एक विलेन' कोरियाई फिल्म का भारतीय संस्करण बन जाती है। चूंकि इस फिल्म के निर्माता ने मूल फिल्म के अधिकार नहीं लिए है, इसलिए ग्लोबल दौर में 'एक विलेन' क्रिएटिव नैतिकता का भी शिकार होती है। हर देश और भाषा के फिल्मकार दूसरी फिल्मों से प्रेरित और प्रभावित होते हैं। कहा ही जाता है कि मूल का पता न चले तो आप मौलिक हैं।
'एक विलेन' मुख्य रूप से गुरु की कहानी है। आठवें और नौवें दशक की हिंदी फिल्मों में ऐ किरदार का नाम विजय हुआ करता था। तब परिवार के कातिलों से बदला लेने में पूरी फिल्म खत्म हो जाती थी। अब ऐसे ग्रे शेड के नायक की कहानी आगे बढ़ती है। सिल्वर स्क्रीन पर अपनी वापसी में एंग्री यंग मैन कुछ और भी करता है। बदला लेने और अपराध की दुनिया में रमने के बाद उसकी जिंदगी में एक लड़की आयशा आती है। आयशा प्राणघातक बीमारी से जूझ रही है। अपनी बची हुई जिंदगी में वह दूसरों की जिंदगी में खुशियां लाना चाहती है। उसे अपने एक काम के लिए गुरु उचित लगता है। इस सोहबत में दोनों का प्रेम होता है। गुरु अपराध की जिंदगी को तिलांजलि दे देता है। वह 9 से 5 की सामान्य जिंदगी में लौटता है, तभी मनोरोगी राकेश के हिंसक व्यवहार से वह फिर से एक बदले की मुहिम में निकल पड़ता है और मोहित सूरी की रोमांचक फिल्म आगे-पीछे की परतों का उजागर करती हुई बढ़ती है।
श्रद्धा कपूर निर्भीक और अकलुष आयशा के किरदार में सहज और स्वाभाविक हैं। मोहित ने उन्हें मुश्किल इमोशन नहीं दिए हैं। मौत के करीब पहुंचने के दर्द और जीने की चाहत के द्वंद्व को श्रद्धा ने व्यक्त किया है। अपनी सुंदर ख्वाहिशों में वह गुरु को बेहिचक शामिल कर लेती है। गुरु के रुप में सिद्धार्थ मल्होत्रा को ठहराव से भरे दृश्य मिले हैं। उन्होंने उन दृश्यों को बखूबी निभाया है। नई पीढ़ी के कलाकारों में सिद्धार्थ दमदार तरीके से अपनी मौजूदगी दर्ज कर रहे हैं। 'एक विलेन' अभिनेता रितेश देशमुख की प्रतिभा के अनदेखे पहलू को सामने ले आती है। वे मनोरोगी और सीरियल किलर के मानस और भाव को पर्दे पर लाने में सफल रहे हैं। तीनों मुख्य कलाकार अपनी भूमिकाओं में जंचते हैं। अगर फिल्म की पटकथा में दहक होती तो 'एक विलेन' इस साल की खास फिल्म हो जाती।
गीत-संगीत में निर्देशक,गीतकार और संगीतकार की मेहनत झलकती है। मिथुन, मनोज मुंतशिर और अंकित तिवारी के शब्द और ध्वनियों में फिल्म के किरदारों का अधूरेपन और टुकड़ा-टुकड़ा जिंदगी को अभिव्यक्ति मिली है। हालांकि संगीत पर आज के दौर का भरपूर असर है,लेकिन शब्दों में संचित उदासी-उम्मीद और निराशा-आशा फिल्म के कथ्य को सघन करती है। निर्देशक ने गीत-संगीत का सार्थक उपयोग किया है।
अवधि: 129 मिनट
*** तीन स्‍टार