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Thursday, May 18, 2017

मैंने सुनी दिल की आवाज़ : इरफान



मैंने सुनी दिल की आवाज़ : इरफान
‘हिंदी मीडियम’ ऊपरी तौर पर भाषाई विभेद की चीज लगे, पर यह अन्य पहलुओं की भी बातें करता है। इसमें नायक की भूमिका निभा रहे इरफान इसकी अहमियत से वाकिफ कराते हैं।
    -अजय ब्रह्मात्‍मज
-अभी मैं जिस इरफान से बात कर रहा हूं, वो एक्टर इरफान है, स्टार इरफान या वो इरफान जिसे हम सालों से जानते हैं।
0 अक्सर जब हम में बदलाव आते हैं तो लोगों को लगने लगता है कि बंदा बदल सा गया है। इससे मुझे दिक्कत होती है। तब्‍दीली अपरिहार्य है। हरेक का सफर यही होता है कि आप कल वैसा न रहें, जो कल थे। मैं अब क्या हूं, वह मुझे नहीं मालूम। अदाकारी मेरा शौक था। तभी मैंने इसमें कदम रखा। यह मुझे मेरे पागलपन से बचा कर रखता है। बाकी मीडिया ने मुझे किस उपाधि से नवाजा है, यह उनका प्यार है। यह उपाधि आज तो मुझ पर लागू हो रही है, चार साल बाद ऐसा नहीं होगा। मुझे इन उपाधियों व परिभाषाओं से दिक्कत है। असल में यह हमारी असुरक्षा की उपज है। इससे हम खुद को तसल्ली दे लेते हैं कि हम विषय विशेष या खुद के बारे में सब कुछ जान चुके हैं। मुझे असुरक्षाओं से कोई प्रॉब्लम नहीं है। इंसान की इससे बड़ी असुक्षा क्या होगी कि आखिरकार क्या होगा। इन चीजों के बजाय मुझे खुद और कायनात को गढ़ने वाले में रूचि है।
-आप में पहले जो बेताबी, अस्थिरता व बिखराव थे, वे इस लंबे सफर में कम हुए हैं।
0 जी हां। मैं खुद को सौभाग्यशाली मानता हूं, जो अंदर की आवाज सुन उसके दिखाए रस्ते पर चला और यहां तक पहुंच गया। मेरे ख्‍याल से अंत:करण की आवाज सुन जो काम किया जाता है, वे बड़े अच्छे नतीजे देते हैं। भीतर जो बिखराव है, उससे समझदारी से डील करने की जरूरत होती है। उसे  देखने की कला डेवलप करें। तब वह काबू में रहेगा। हां, अगर वह आप ही को ड्राइव करने लगे तो मामला गड़बड़ है।
-एक थ्‍योरी तो यह भी है कि भीतर केयॉस यानी कोलाहल है तो रचनात्‍मकता पुष्पित-पल्‍लवित होती रहती है।
0 हम जिसे कोलाहल मानते हैं, वह ढेर सारी शक्तियों का कॉलिजन है। हम जिस कायनात में रह रहे हैं, उसकी फिजिक्स यही है। बुनियादी नियम यही है कि विपरीत शक्तियां टकराती हैं तो विनाश होता है। उसके बाद ही अगला पड़ाव सृजन का है। हम मूरख व अज्ञानी उस टक्कर को अंत का नाम दे देते हैं। टकराहट, कोलाहल अवश्‍यंभावी है।
-‘हिंदी मीडियम’ का संयोग क्यों और कैसे बना।
मैं दरअसल एक तरह का रिमार्क यानी तबसरा ढूंढ रहा था। ऐसी फिल्‍म, जिससे हर कोई कनेक्ट करे। वे एंटरटेन हों। फिल्म देखते हुए खिलखिलाएं और जब हॉल से बाहर निकलें तो साथ कुछ लेकर जाएं। बहरहाल, इसका सब्जेक्‍ट अंग्रेजी कल्चर की बातें करता है, कि कैसे यह हमारी जरूरत बन जाता है। साथ ही भाषाई विभेद का असर भी। हिंदीभाषी प्रतिभावान होकर भी पिछड़ते हैं। फिल्‍म में भी मैं एक ऐसे शख्‍स की भूमिका में हूं, जिसकी अंग्रेजीदां पत्नी अंग्रेजी के सिंड्रोम से ग्रस्त है। वह बंदा अपनी बीवी के लिए हर कुछ कर चुका है। चांदनी चौक पर बड़ा सा एंपोरियम भी खोल चुका है। बेपनाह मुहब्बत करता है, पर बेगम के भीतर खालीपन है। दरअसल उसकी वाइफ उससे अंग्रेजी बेहतर करने पर जोर देती है, इससे वो बंदा सहमत नहीं है। उसे नहीं लगता कि अंग्रेजी उसकी जरूरत है। मैं उस किरदार के इस ढीठपने से प्रभावित हुआ।
- आज पूरा मिडिल क्लास कौन्वेंट स्कूल में अपने बच्चे को भेज रहा है। अंग्रेजी के इस आतंक पर आप क्या कहना चाहेंगे।
0 असल में अंग्रेजी को हमारी जरूरत बना दी गई है। यह अकस्मात नहीं हुआ है। अब कोलोनाइजेशन दूसरी तरह से होता है कंट्री का। इसकी शुरूआत लैंग्‍वेज से होती है। आप अपने यहां दूसरे देश की भाषा को अपना कर उसे पॉपुलर करते हैं। उसके बाद का पड़ाव कल्चर की ओर ले जाता है। वहां का कल्चर यहां लोकप्रिय हुआ तो विदेशी माल यहां पॉपुलर हो जाते हैं। मनोवैज्ञानिक तौर पर आप दूसरी भाषा को अपनी जिंदगी बेहतर करने की गरज से अपनाते हैं। आप अपने आप उसकी गिरफ्त में आ जाते हो। अंग्रेजी भी इस वजह से फैली है। इसके परिणाम हम देख रहे हैं। अपनी सोसायटी में पहनावे से लेकर व्‍यापारिक व प्रशासनिक मॉड्यूल तक हम उन्हीं का अख्तियार कर चुके हैं। जब तक हम किसी अच्छी सोच का मॉडल नहीं बनेंगे, तब तलक मुकाबला नहीं कर सकते। हम अनुसरण करने वाले ही बनकर रह जाते हैं।
-संपर्क भाषा तो अलग चीज है। इन दिनों कौशल की बजाय भाषा को तरजीह दी जाने लगी है। आप भी हिंदीभाषी हैं। क्या आप को भी अंग्रेजी न आने के चलते फजीहत झेलनी पड़ी कभी।
0 जी ऐसा कई बार हुआ है। मुझे नसीहत दी गई। एहसास कराया गया कि आप को वह भाषा भी आती है, तो आप की देहभाषा में क्यों नहीं झलकती। असल वजह यह थी कि मुझे जो चीज पसंद नहीं आती तो मैं उससे जुड़े कनविक्‍शन को ओढ नहीं सकता। हां, यह जरूर है कि अगर आप अंग्रेजी व चाइनीज फिल्में करना चाहते हैं तो आप को वह भाषा आनी चाहिए। मसला यह है कि अपने यहां व अंतरराष्‍ट्रीय स्तर पर भी अंग्रेजी को मानक बना दिया गया है। बाकी उसे सपोर्ट करने के लिए अंग्रेजी तो है ही।
-अपनी हीरोइन सबा कमर के बारे में बताएं?
0 सबा कमर के चुनाव की खास वजह रही। यहां की कई हीरोइनें मां बनने को तैयार नहीं थीं। हमें ऐसी अभिनेत्री चाहिए थी,जो ग्‍लैमरस दिखे और इस किरदार को ढंग से कैरी कर ले। सबा कमर में ये खूबियां मिलीं। मैं उनके अलावा दीपक डोबरियाल का नाम लेना चाहूंगा। वे कमाल के एक्‍टर हैं। उनके साथ मेरी खूब संगत बैठी।