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Tuesday, November 4, 2014

क्‍या बुराई है कंफ्यूजन में : श्रद्धा कपूर


-अजय ब्रह्मात्मज
श्रद्धा कपूर पढ़ाई के सिलसिले में अमेरिका के बोस्टन शहर चली गईं थीं। एक बार छुट्टियों में आईं तो उन्हें फिल्मों के ऑफर मिले। तब तक मन नहीं बनाया था कि आगे क्या करना है? कुछ दिनों तक दुविधा रही कि आगे पढ़ाई जारी रखें या फिल्मों के ऑफर स्वीकार करें। श्रद्धा ने दिल की बात सुनी। पढ़ाई छोड़ दी और फिल्म इंडस्ट्री में प्रवेश किया।
-क्या फिल्मों में आने के फैसले के पहले एक्टिंग की कोई ट्रेनिंग वगैरह भी ली थी?
लीना यादव की फिल्म ‘तीन पत्ती’ के पहले मैंने बैरी जॉन के साथ ट्रेनिंग ली। उससे बहुत फायदा हुआ। फिर यशराज फिल्म्स की ‘लव का द एंड’ करते समय डायरेक्टर के साथ ही स्क्रिप्ट रीडिंग की। ‘आशिकी 2’ के पहले मुकेश छाबड़ा के साथ वर्कशॉप किए। वे बहुत मशहूर कास्टिंग डायरेक्टर हैं। ‘हैदर’ की भी कास्टिंग उन्होंने की थी। मुकेश छाबड़ा कमाल के टीचर हैं। अभी हाल में ‘एबीसीडी 2’ के सेट पर भी उनसे मुलाकात हुई। मैं उन्हें ‘तीन पत्ती’ के समय से जानती हूं। तब वे अभिमन्यु रे के सहायक थे। मुकेश छाबड़ा बहुत ही सख्त शिक्षक हैं। रियल टास्क मास्टर..।
-ऐसे टीचर के साथ सीखते समय कोफ्त तो होती होगी?
मुकेश सर अनुशासन चाहते हैं। टास्क मास्टर कहने का यह मतलब नहीं है कि वे तंग करते हैं। सीखने में कोफ्त कैसी? मुझे तो उनके साथ बहुत अच्छा लगता है। उनके वर्कशॉप में बहुत कुछ सीखने को मिलता है।
- शुरू की दो फिल्में न चलने से निराशा तो हुई होगी। कहीं यह एहसास तो हुआ होगा कि करियर शुरू होते ही डगमगाने लगा?
बिल्कुल लगा था ऐसा। ‘आशिकी 2’ में एक लाइन है ‘अंधेरे को अंधेरा नहीं, सिर्फ रौशनी मिटा सकती है’। असफलता के उस अंधेरे में मुझे अपने परिवार से रौशनी मिली। उन्होंने यह बताया और समझाया कि ऐसी असफलताएं आती रहेंगी। सिर्फ फिल्मों में ही ऐसा नहीं होता। दूसरे क्षेत्रों में भी काम करने वालों को आरंभ में स्वीकार नहीं किया जाता। खुद पर विश्वास होना चाहिए। बचपन से देखे गए ख्वाब को इतनी आसानी से छोड़ा तो नहीं जा सकता।
- आप को खुद ‘हैदर’ कैसी लगी?
मैंने रिलीज के दो दिन पहले ‘हैदर’ देखी। उस स्क्रीनिंग में अमिताभ बच्चन भी आए थे। फिल्म देखते समय ही में रोने लगी। फिल्म खत्म होने के बाद मीडिया के सामने जाने के पहले ठीक से आंखों को पोंछा। खुद को संभाला। फिल्म देखकर मैं अवाक रह गई थी। गला रुंध गया था। तब तक विशाल सर निकल गए थे। उन्हें फोन किया तो उनका मोबाइल ऑफ था। रात के डेढ बज रहे थे, इसलिए उनके लैंडलाइन पर फोन नहीं किया। अगली सुबह जब उन्हें बताया तो उन्होंने डांटा कि तुम्हें मुझे जगा देना चाहिए था। मैंने तुम्हारा एक्साइटमेंट मिस किया। अगर तुम्हारा मन था मुझसे बात करने का तो मेरे घर आ जाना चाहिए था।
-‘हैदर’ का अनुभव कैसा रहा? क्या इस फिल्म के अनुभव से श्रद्धा देश और कश्मीर को लेकर अधिक समझदार हुईं?
‘हैदर’ की स्क्रिप्ट पढ़ते समय बहुत सारी चीजें मेरी समझ में नहीं आई थी। यह तो समझ में आ रहा था कि जो मैं नहीं समझ रही हूं, वह कुछ अलग ही बात है। अंदर से इच्छा हुई कि इसके बारे में पता करना चाहिए। फिर मैंने कोशिश की। कश्मीर के बारे में पढ़ा, जाना। ‘हैदर’ जैसी फिल्में हम एक्टर को समझदार बना देती हैं। फिल्म करते हुए हम बहुत सारी चीजें जान जाते हैं। फिल्म देखने के बाद मैंने यह भी सोचा कि विशाल सर ने क्या सोचकर मुझे इस फिल्म का हिस्सा बनाया है। ‘हैदर’ मेरी क्षमताओं से बड़ी फिल्म है। मुझे इतने उम्दा एक्टरों के साथ काम करने का मौका मिला। फिल्म करने के बाद भी मुझे लगता है कि अभी कश्मीर और देश के बारे में बहुत कुछ जानना बाकी है। आप को बताऊं कि फिल्मों में आने के पहले एक बार आमिर खान से मेरी मुलाकात हुई थी। उन्होंने सुझाव दिया था कि फिल्में शुरू करने से पहले पूरा देश देख लो। बाद में यह मुमकिन नहीं होगा। अभी अफसोस होता है कि मैं ऐसा नहीं कर सकी थी। अब तो कहीं आना-जाना मुश्किल है। फिर भी मैं कोई रास्ता निकालूंगी।
-तब्बू के साथ आप के कम दृश्य हैं। फिर भी सेट पर तो उन्हें काम करते हुए देखा होगा। क्या सीखा उनसे?
जब विशाल सर ने बताया कि गजाला की भूमिका तब्बू करेंगी तो मैं खुशी से उछल पड़ी थी। मैं उनकी जबरदस्त फैन हूं। हम सारी अभिनेत्रियां सफलता के रेस में शामिल हैं। तब्बू इनसे अलग हैं। अभी उनके मुकाबले में कोई और अभिनेत्री नहीं है। तब्बू के इर्द-गिर्द भी हम नहीं पहुंच सकते। अगर कोई रोल उनके लिए लिखा गया है तो उसे कोई और निभा भी नहीं सकता। आप ही बताएं गजाला का रोल क्या किसी और अभिनेत्री को दिया जा सकता था? उनका विकल्प नहीं है। उनकी एनर्जी और काम करने की शैली बहुत ही नैचुरल है। सेट पर वे बहुत ही फ्रेंडली रहती हैं। हंसमुख स्वभाव की हैं। कैमरा ऑन होते ही कुछ मिस्ट्री क्रिएट होती है और वह तब्बू नहीं रह जातीं।
-स्कूल में सभी विषयों के अलग-अलग अध्यापक होते हैं। क्या निर्देशकों में भी ऐसी भिन्नता होती है? अगर मैं पूछूं कि आप के निर्देशकों की तुलना टीचरों से की जाए तो वे किस-किस सब्जेक्ट के टीचर होंगे?
विशाल सर मुझे लिटरेचर के टीचर लगते हैं। कोई कविता पढ़ा रहा हो। लीना मैम तो मैथ की टीचर हैं। उनके यहां नंबर और नंबर ही आते रहते हैं। उनकी ‘तीन पत्ती’ याद कर लें। ‘लव का द एंड’ के डायरेक्टर बंपी को बायोलॉजी का टीचर कह सकते हैं। मोहित थिएटर के टीचर होंगे। ड्रामा पढ़ाने वाले।
-अपने कैरेक्टर और एक्टिंग के प्रति आप का क्या अप्रोच रहता है?
मेरा अप्रोच हर दिन बदलता है। मैं पहले से कुछ भी तय नहीं करती। फिल्म शुरू होने के पहले हमेशा कंफ्यूज रहती हूं। अभी मेरी उम्र ही क्या है? सच कहती हूं कि मैं सब कुछ समझ नहीं पाती। रायटर-डायरेक्टर की बात मानती हूं और बहुत थोड़ा अपना दिमाग लगाती हूं। मेरी मां कहती है कि तुम हमेशा अनिर्णय की स्थिति में रहती हो। मुझे लगता है कि यह कोई खराब बात नहीं है। अगर अभी से सब समझ गई तो क्या सीखूंगी?
-अभी क्या कर रही हैं?
फिलहाल वरुण धवन के साथ ‘एबीसीडी 2’ कर रही हूं। एक और बड़े बैनर की फिल्म साइन की है। थोड़ा इंतजार करें। जल्दी ही उसकी घोषणा होगी।

Thursday, October 23, 2014

हमने भी ‘हैदर’ देखी है - मृत्युंजय प्रभाकर


-मृत्युंजय प्रभाकर 



बचपन से मुझे एक स्वप्न परेशान करता रहा है. मैं कहीं जा रहा हूँ और अचानक से मेरे पीछे कोई भूत पड़ जाता है. मैं जान बचाने के लिए बदहवास होकर भागता हूँ. जाने कितने पहाड़-नदियाँ-जंगल लांघता दौड़ता-भागता एक दलदल में गिर जाता हूँ. उससे निकलने के लिए बेतरह हाथ-पाँव मारता हूँ. उससे निकलने की जितनी कोशिश करता हूँ उतना ही उस दलदल में धंसता जाता हूँ. भूत मेरे पीछे दौड़ता हुआ आ रहा है. मैं बचने की आखिर कोशिश करता हूँ पर वह मुझ पर झपट्टा मारता है और तभी मेरी आँखें खुल जाती हैं.  
आँखें खुलने पर एक बंद कमरा है. घुटती हुई सांसें हैं. पसीने से भीगा बदन है. अपनी बेकसी है. भाग न पाने की पीड़ा है. पकड़ लिए जाने का डर है. उससे निकल जाने की तड़प है. एक अजब सी बेचारगी है. फिर भी बच निकलने का संतोष है. जिंदा बच जाने का सुखद एहसास है जबकि जानता हूँ यह मात्र एक स्वप्न है. ‘हैदर’ फिल्म में वह बच्चा जब लाशों से भरे ट्रक में आँखें खोलता है और ट्रक से कूदकर अपने जिंदा होने का जश्न मनाता है तब मैं अपने बचपन के उस डरावने सपने को एक बार फिर जीता हूँ. उसके जिंदा निकल आने पर वैसे ही राहत की सांस लेता हूँ जैसे उस भयावह सपने के टूटने के बाद अपने जिंदा बच जाने पर लेता था. मौत के चंगुल से जिंदा बच जाने की यह ख़ुशी चाहे फिल्म की हो या सपने की, वह निश्चय ही सुकून देने वाली होती है. ‘हैदर’ एक फिल्म होते हुए भी मेरे सपने की ही तरह ‘कश्मीर’ की वह वास्तविकता है जो मुझे भीतर तक परेशान करती है और डराती है. फिल्म के उस मोड़ पर आकर डॉक्टर हिलाल मीर (जिसे नरेन्द्र झा ने कमाल की संजीदगी से निभाया है) का वह संवाद मुझे भीतर तक वेध देता है जब उसकी पत्नी उससे पूछती है, ‘किस तरफ हैं आप?’ और जवाब में डॉक्टर कहता है, ‘ज़िन्दगी के.’ डॉक्टर हिलाल मीर द्वारा एक दहशतगर्द की ज़िन्दगी बचाने की तड़प से शुरू हुई यह फिल्म उसके शायर बेटे हैदर द्वारा एक सरकारी दहशतगर्द की ज़िन्दगी बक्श देने तक कश्मीर का ऐसा रूपक रचती है जो आपको भीतर तक डराती ही नहीं बल्कि खाली कर जाती है.    
  हैदर के बारे में बहुत कुछ लिखा जा चुका है. इतना कि अगर उन सारी समीक्षायों को इकठ्ठा कर छपवा दिया जाए तो एक बेहद ही मोटी पुस्तक का रूप ले ले. इस पर लिखना कोई कार्यकारी या व्यावसायिक मजबूरी भी नहीं है क्यूंकि फिल्म समीक्षा लिखने का पेशा छोड़े भी दो साल हो चुके हैं जब हर हफ्ते दो-तीन फिल्मों पर ३००-३५० शब्दों में पूरे फिल्म को उतार देने की अखबारी जरूरत को पूरा करता था. और अपने इस काम से इतना ऊब चुका था कि उसके बाद आज तक किसी फिल्म पर लिखने की इतनी तीव्र इच्छा नहीं हुई. लेकिन यह फिल्म पहली बार देखे जाने के बाद से ही मुझे लगातार परेशान करती रही. खींचती रही. भीतर तक मथती रही. मेरे उस स्वप्न की ही तरह जिसे मैं कब का भूल चुका था. अमूमन कोई फिल्म अच्छी लग जाए तो उसे दुबारा-तिवारा देखता ही देखता हूँ. क्यूंकि बचपन से ही फिल्म देखना मेरे लिए शौक नहीं बल्कि पेशे की तरह रहा है. हैदर ने भी मुझे अपनी तरफ बार-बार लौटने को विवश किया है.
फिल्म और सपनों के रिश्ते पर पता नहीं कोई बात हुई है या नहीं यह मैं नहीं जानता. संभव हो हुई हो पर मेरी जानकारी में नहीं है. मेरे लिए सपने फिल्म की आदिम अनुभूति की तरह हैं. हम सपने में ज्यादातर अपनी फिल्म ही देख रहे होते हैं. यही कारण है कि फ़िल्में भी हमें हमारे सपनों की तरफ ले जाती हैं. दरअसल ज्यादातर दर्शक फिल्म को भी सपने की ही तरह देख रहे होते हैं. जिसमें नायक की छवि में खुद को देखने की अनुभूति भी शामिल है. पर फिल्म को सपनों में बदल मनुष्य के सबसे सान्द्र अनुभव में तब्दील कर देने की क्षमता बहुत ही कम निर्देशकों में होती है. उस पर भी ऐसी फ़िल्में बहुत कम होती हैं जो उस सपने को हकीक़त से भी ज्यादा करीब ले आती हैं. ‘हैदर’ फिल्म उस सपने की तरह है जो अपनी हकीक़त से भी ज्यादा मानीखेज है. 
यह फिल्म कश्मीर की उस स्याह हकीक़त को सामने लाती है जो आम भारतीय जन-मानस के लोकप्रिय बिम्ब में कहीं से भी शामिल नहीं है. आम भारतीय जन-मानस में आज भी कश्मीर की छवि डल लेक की खूबसूरती और बर्फ से ढंके पहाड़ी चोटियों वाली छवि है जहाँ वह पर्यटन और हनीमून के लिए जाना चाहता है या कि भक्त जनता के लिए हाल के सालों में गढ़ी गई बैष्णो देवी के धार्मिक पर्यटन वाली छवि है. सिनेमा घरों से निकलते ज्यादातर दर्शकों के मन में बसी कश्मीर की उस छवि पर यह फिल्म कुठाराघात करती है इसलिए वह सिनेमा घर से निकलते हुए नकार की मुद्रा में निकलता है क्यूंकि यह फिल्म उसके स्थापित छवि को तोड़ती और उसके बंधे-बंधाए ज्ञान पर हमले बोलती है. यहीं ‘हैदर’ अपने को उन ‘पोपकोर्न’ टाइप फिल्मों से खुद को अलग करती है जो दर्शकों के सपने को ‘खेल’ में बदलकर उनसे भारी मुनाफा तो कमाती हैं लेकिन बदले में उन्हें खाली झुनझुना थमा देती हैं जबकि ‘हैदर’ उन्हें उस हकीक़त से रूबरू कराने की कोशिश करती है जो उन्हें मंजूर नहीं है. ‘कश्मीर’ के इस रूप को स्वीकार करना उनके बने-बनाए छवि का तो नकार है ही, उनके ‘पोपकोर्न’ रूपी ‘राष्ट्रभक्ति’ की भी इतिश्री है जिसे वह ‘लगान’ ‘चक दे इंडिया’ या ‘मैरी कॉम’ जैसी फिल्मों देखते हुए महसूस करता है और उसे ‘पेप्सी’ या ‘कोक’ के साथ ख़ुशी-ख़ुशी डकार लेता है. ‘हैदर’ के खिलाफ आम दर्शकों और चलताऊ समीक्षकों की इतनी तीव्र प्रतिक्रिया के पीछे की वजहों में उनकी खोखली ‘राष्ट्रभक्ति’ है जिसे यह फिल्म खेल कर लौटते हुए बच्चे की तरह रास्ते पर ‘खाली’ पड़े ‘कोक’ के बोतल को एक जोरदार लात लगा देती है.            
हमारा दर्शक जो ५० के दशक के फिल्मों के बिना जातिसूचक नामों वाले नायकों को देखकर बड़ा हुआ और पनपा है वह फिल्मों से उसी मुगालते की मांग करता है जहाँ नायक का पहले से तय कोई जातिसूचक उपनाम न हो. ताकि वह फिल्म देखते हुए अपने उपनाम को उस नायक के नाम में वैसे ही जोड़ दे जैसे वह खुद की छवि को नायक की छवि के ऊपर आरोपित कर देता है और फिल्म रुपी सपने में कभी ‘कैटरीना’ तो कभी ‘दीपिका’ तो कभी ‘सनी लेओनी’ की बाँहों में झूमता है. ‘हैदर’ उस बॉलीवुडीअन सिनेमा का नकार है जो जीवन को लेकर एक तरह का नकली रोमांटिसिज्म दर्शकों के सामने परोसता है. वह सिनेमा जो उनके जीवन, उनके समाज, उनके परिवेश की बात नहीं करता बल्कि एक नकली जीवन, नकली समाज और नकली परिवेश रचता है. सलमान खान उसी बॉलीवुडीअन सिनेमा के प्रतिनिधि स्टार हैं जिसका मजाक इस फिल्म में बनाया गया है. फिल्म में ‘सलमान खान’ एक व्यक्ति या स्टार की तरह नहीं बल्कि एक रूपक की तरह आते हैं जो उसी समुदाय से आया हुआ नायक होकर भी अपने ही समुदाय और देश के लोगों के जीवन की हकीक़त से न सिर्फ मीलों दूर है बल्कि उन्हें एक नकली समाज और परिवेश का स्वप्न भी बेचता है जिसमें वह अपने नकली दबंगई में बार-बार पूछता है ‘दूँ क्या? दूँ क्या?’ जबकि वास्तव में वह उस समाज को कुछ भी देने की स्थिति में नहीं है सिवा ‘चंद’ नकली सपनों के, जो उनके किसी काम के नहीं हैं. इसलिए विशाल भारद्वाज जब हैदर के हाथों सलमानों की हत्या का रूपक रचते हैं तब उनका आशय सलमान या उनके जैसे स्टार नहीं बल्कि उस बॉलीवुड सिनेमा से है जो अपने आवरण और विषयवस्तु में पूरी तरह समय, समाज और अपने परिवेश से कटा हुआ है. जो दर्शकों को नकली सपने दिखाकर गंजों को कंघी बेचने का काम करती है. 
‘हैदर’ फिल्म बॉलीवुड फिल्मों के नकार का रूपक ही नहीं रचती बल्कि उसका सही-सही विकल्प भी देती है. यहाँ फिल्म का परिवेश नायक-नायिकायों के नृत्य के पीछे बदलते बैकड्राप तक ही सीमित नहीं है बल्कि उनके जीवन का हिस्सा है और उन्हें सिर्फ प्रभावित ही नहीं करती बल्कि उनके जीवन की दिशा भी तय करती है. परिवेश ही वह शय है जो हमारा जीवन तय करती है. हम उससे लाख भागने की कोशिश करें या भगा दिए जाएँ लेकिन वह अपनी त्रासदी में हमें खींच ही लेता है जैसे वह हैदर को ‘अलीगढ’ और उसकी प्रेमिका के भाई को ‘बंगलौर’ से खींच लाता है. संभव है हमारे स्टार सलमान खान सोमालिया के परिवेश में पैदा हुए होते तो ‘बन्दूक’ उठाकर कब के शहीद हो गए होते या ‘कालाहांडी’ में आदिवासी बनकर पैदा होते तो ‘भूख’ से लड़ते हुए हड्डियों का ढांचा लिए जीते या अब तक दफन हो गए होते.  कश्मीर का परिदृश्य आज के दौर में सिर्फ ‘हैदर’, ‘लियाकत’, ‘परवेज’ ‘खुर्रम’, ‘जहूर’, ‘रूह्दार’ ‘अर्शिया’ और ‘गजाला’ जैसे लोग पैदा कर सकते हैं क्यूंकि वहां ‘हुसैन मीर’ जैसे लोग रहे नहीं और ‘हिलाल मीर’ को कंसंट्रेशन कैम्पों में डालकर खत्म कर दिया गया है. अब जो बच गया है वो जानता है कि उसे उस आग में कूदना ही है जिसे उसके इर्द-गिर्द घेरे की तरह बना दिया गया है यह जानते हुए की ज़िन्दगी उसके लिए ‘फानी’ है और ‘लाफ़ानी’ होने का एक ही रास्ता है ‘कुर्बानी’. रूह्दार (इरफ़ान ने जिस किरदार को बड़ी शिद्दत से जिया है) फिल्म में सिर्फ डॉक्टर हिलाल मीर की रूह बनकर नहीं आता बल्कि कश्मीर के परिवेश की रूह बनकर आता है जो लोगों को अपने सांचे में ढालता है. उन्हें जाने-अनजाने अपनी ओर खींचता है और हिंसा की उस आग में धकेल देता है जो उसके चारों ओर पसरी हुई है.          
‘रूह्दार’ अगर कश्मीर की रूह है तो ‘गज़ाला’ ‘कश्मीर’ का रूपक पेश करती है. दो व्यक्तियों के बीच चुनाव के मानसिक जाल में औरत के रूप में ‘गज़ाला’ वैसे ही पिसती है जैसे दो हाथियों (हिंदुस्तान और पाकिस्तान) के बीच युद्ध में घास की तरह ‘कश्मीर’ पिस रहा है. और ‘गज़ाला’ के इस दोहरी मानसिकता में ‘हैदर’ ठीक वैसे ही पिसता है जैसे ‘कश्मीर’ में उसके ही बच्चे पिस रहे हैं. ‘गज़ाला’ यहाँ एक औरत और एक सरज़मीन की पीड़ा को एक साथ प्रतिबिंबित करती है. वैसे भी तमाम भारतीय रूपकों में औरत को ज़मीन के तौर पर ही देखा गया है जिसे सींचना पुरुष (आसमान) की ज़िम्मेदारी होती है और वह कभी प्रेम की अनावृष्टि (हिलाल) तो कभी अतिवृष्टि (खुर्रम) की शिकार होती है.       एक स्त्री के रूप में अपने आप को पूरा करने के लिए उठाया गया उसका कोई भी कदम सीधे-सीधे उसके समाज और परिवेश को उप्लावित कर जाता है जिसका शिकार उसकी फसल (उसके बच्चे) होते हैं. यहाँ ‘गजाला’ की आज़ादी ‘कश्मीर’ की आज़ादी के सवाल से एक बार फिर जुड़ जाता है जहाँ दोनों को ‘खुदमुख्तारी’ की दरकार है जिसमें वह अपने को पूर्ण करने का निर्णय खुद ले सके और उसके निजी निर्णय से समाज और परिवेश उप्लावित न हो, न ही उसके बच्चे ‘हैदर’ को इसकी कीमत चुकानी पड़े. ‘गज़ाला’ यहाँ एक साथ एक स्त्री और एक सरज़मीन ‘कश्मीर’ की मह्त्व्कांक्षायों स्वर देती है. वह स्वर जो उस समाज और परिवेश को भी पसंद नहीं है न ही उसके बच्चे को जो उसे किसी भी सूरत में बांटने को तैयार नहीं है. यहाँ पर आकर विशाल थोड़ा चूकते हैं जब वो ‘गज़ाला’ को एक स्त्री से अधिक एक ‘सरज़मीन’ के बिम्ब में गुम्फित कर देते हैं जिससे स्त्री के चुनाव का प्रश्न गौण हो जाता है. फिल्म के अंत में ‘गज़ाला’ द्वारा मानव बम बनकर खुद को उड़ा लेना भी जलते हुए ‘कश्मीर’ का ही रूपक गढ़ता है जहाँ पसरी बर्फ की ख़ामोशी के पीछे जलते हुए लोथड़े हैं, स्टेनगन थामे कटे हुए हाथ हैं, बिना पैरों के चलते ‘खुर्रम’ हैं और हजारों लोगों का खून पसरा है जिसके बीच से होकर ‘हैदर’ को अपना रास्ता तय करना है. अपना समाज बनाना है और अपने परिवेश को रहने लायक, सांस लेने लायक बनाना है ताकि वहां एक बार फिर ‘ज़िन्दगी’ शब्द अपना मायने पा सके.
‘हैदर’ का किरदार अपने होने या न होने, कुछ करने और न करने, पक्ष लेने या न लेने के विभ्रम के बीच जूझते हुए एक व्यक्ति का रूपक है जो सही और गलत के बीच त्रिशंकु सा अटक गया है. वह पिता की हत्या का बदला लेने और न लेने के द्वन्द से कहीं अधिक इस द्वन्द से गुजरता है कि दरअसल उसके और उसके परिवार के साथ हुआ क्या है. कौन से तत्व हैं जो इसके लिए जिम्मेदार हैं. एक अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति वाले इलाके में फंसे एक दिशाहीन युवा का प्रतिनिधि पात्र है ‘हैदर’ जिस पर एक साथ कई तरह के सत्तायों की निगरानी है और वे उसे अपने तरीके से संचालित करना चाहते हैं. मतलब की उसे अपनी ज़िन्दगी किसी और के बनाए खेल में उलझाकर जीना है जहाँ उसकी हैसियत एक खिलोने या कठपुतली भर की हो जाती है जिसकी डोर किसी और के हाथ में होती है. वह अपनी डोर किसी और के हाथ में दे या न दे यह भी उसके द्वंदों में शामिल है और अंत में वह अपनी मां को ‘खुर्रम’ से बचाने और बाप की हत्या का बदला लेने की लड़ाई लड़ता हुआ मां को खो देने के बाद खून से लथ-पथ बर्फीले परिवेश को पीछे छोड़ (जिसमें उसकी मौजी गज़ाला और प्रेमिका अर्शिया की लाश पड़ी है) ‘ज़िन्दगी’ की तलाश में आगे की ओर देखता है (वह भी तब जब कुछ देर पहले ही अर्शिया की लाश को वह कब्र से निकाल अपनी बांहों में समेटे बैठा रहता है) निकल लेता है. यह अतीत से निवृति नहीं बल्कि उससे हासिल सबक से ली हुई सीख है जो उसे उसकी मां ‘गज़ाला’ उसके दादा ‘हुसैन मीर’ के शब्दों में उसे समझाती है कि ‘इंतकाम से सिर्फ इंतकाम पैदा होती है’. हैदर यहाँ ‘कश्मीर’ के बच्चों के लिए या ऐसे किसी भी परिवेश के बच्चे के लिए यह सबक छोड़ जाती है कि हिंसा से उसका कुल हासिल अपनों के जान-माल का नुकसान ही है. 
फिल्म में कश्मीर के हालात की भयावहता कई-कई दृश्यों में सामने आती है, वह चाहे फिल्म के अंत में कब्र खोदने और अपनी ही कब्र खोदकर खुद ही लेटने का झकझोर देने वाला दृश्य हो या एक व्यक्ति के बिना तलाशी खुद के घर में न घुसने की हिम्मत वाला दृश्य हो या सिर्फ इस्लामाबाद कहने मात्र से सेना द्वारा ‘हैदर’ को रोक लेने वाला दृश्य हो, या कदम कदम पर लाइन लगाकर उनकी तलाशी और पहचान पत्र की मांग वाला दृश्य हो, या आधी विधवा हुई लोगों की त्रासदी सामने लाने वाला दृश्य हो, या गायब हुए लोगों की तलाश में लगे परिजन वाला दृश्य हो, या हैदर द्वारा लाल चौक पर ‘हम हैं कि हम नहीं’ सवाल उठाने वाला दृश्य हो. ऐसा लगता है ‘कश्मीर’ कोई स्वतंत्र इलाका न होकर कोई कंसंट्रेशन कैंप में बदल दिया गया है. ‘हैदर’ का संवाद कि ‘पूरा कश्मीर ही एक कंसंट्रेशन कैंप है’ इसे और भी मजबूती देता है. 
‘हैदर’ यूँ तो ‘शेक्सपियर’ के नाटक प्रसिद्ध त्रासदी नाटक ‘हैमलेट’ पर आधारित है. लेकिन इसका रूपान्तरण कमाल का है. इस नाटक को विशाल भारद्वाज और बशारत पीर की जोड़ी ने इस कदर कश्मीर की पृष्ठभूमि में ढाला है कि कहीं से भी यह अनुवाद या रूपांतरण प्रतीत नहीं होता है. ‘शेक्सपियर’ का नाटक ‘हैमलेट’ जहाँ एक शाही परिवार की त्रासदी और बदले की कहानी होकर रह जाती है वहीँ ’हैदर’ एक मध्यवर्गीय परिवार की कहानी की पृष्ठभूमि में ‘कश्मीर’ की भयावहता का राजनीतिक आख्यान बन जाता है. फिल्म का सर्वाधिक राजनीतिक और चमत्कृत कर देने वाला दृश्य वह है जिसमे फ़िल्मकार अफ्प्सा को चुत्स्पा में तब्दील कर उसके निहितार्थ को एक ही झटके में खोलकर रख देता है. हमारे समय में बड़े से बड़े राजनीतिक कलाकार भी इतनी हिम्मत कहाँ कर पाते हैं!                
फिल्म में अभिनेताओं के काम पर अलग से बात करने की जरूरत के बाजवूद उनपर विस्तार में नहीं जायूँगा. फिल्म में सिर्फ शाहिद और श्रद्धा कपूर जैसी व्यावसायिक मजबूरियों को छोड़ दें तो ज्यादातर कलाकार अपने पात्र में पूरी तरह डूबे हुए नजर आते हैं और सबने उत्कृष्ट अभिनय का मुजाहिरा किआ है. तब्बू, इरफ़ान, नरेन्द्र झा, के.के. मेनन, ललित परिमू, अश्वत भट्ट और कुलभूषण खरबंदा जैसे अभिनेताओं ने अपने काम से अभिनय का वह वितान रचा है जो फिल्म को और उसके किरदारों को हमारे भीतर गहरे तक उतरने में मददगार बनते हैं और मेरे ख्याल से एक अच्छे अभिनेता का काम भी यही है. अभिनेता का काम अपने अभिनय से चमत्कृत करना नहीं है जैसा कि आम तौर पर माना जाता है बल्कि उसका काम अपने किरदार को स्क्रिप्ट की रौशनी में पेश करना है और अच्छे अभिनेता वही होते हैं जो ऐसा कर गुजरते हैं. इस फिल्म में अच्छे अभिनेताओं की खान है. हर कोई अपनी भूमिका में फिट और चाक-चौबंद. यही इस फिल्म की ताकत भी है.
फिल्म का असली नायक इसकी कसी हुई स्क्रिप्ट, गीत-संगीत और उससे भी कसे हुए संवाद हैं. पूरी फिल्म में एक या दो जगहों को छोड़कर कहीं भी चलताऊ संवादों का इस्तेमाल नहीं किया गया है. फिल्म में संवाद के रूप में इस्तेमाल किआ गया एक-एक शब्द बोलता हुआ और अपनी पूरी तासीर के साथ उपस्थित होता है. २० वीं शताब्दी के अज़ीम शायर फैज़ अहमद फैज़ की शायरी का बेहद ही सधा हुआ इस्तेमाल इसमें किया गया है. गानों में गुलजार के बोल और विशाल भारद्वाज का संगीत बोलता हुआ प्रतीति होता है और प्रसंगानुकूल है.
एक फिल्म के तौर पर तो यह फिल्म वहां जाकर खड़ी होती है जहाँ इसके इर्द-गिर्द कोई दूसरी फिल्म नहीं ठहरती. फिल्म के तमाम तकनीकी और गैर-तकनीकी पक्षों का ऐसा जादुई कोलाज देखने का मौका बॉलीवुड की फिल्मों में देखने की उम्मीद शायद ही कोई रखता है. सिनेमेटोग्राफी, कला निर्देशन, गीत-संगीत, अभिनय, कहानी और परिदृश्य आदि कई चीज़ों को गुम्फित करती यह फिल्म किसी महाकाव्य की तरह है जिसके दृश्यों का जादू सिनेमा हाल के पर्दों से पसरकर हमें हमेशा के लिए घेर लेते हैं. यह हमें उन सच्चाइयों से जादुई रूप में सपनों की तरह रूबरू करवाते हैं जिनका सामना हम दिन की रौशनी में करने की हिम्मत नहीं जुटा पाते. यह फिल्म पर्दे से उतरकर हमारे भीतर तक पसरती है और हमारे भीतर भी बहुत कुछ पिघला देती है. इसे महसूस करने के लिए हमें कश्मीरी होने की आवश्यकता नहीं है बल्कि महज एक इंसान होना ही काफी है. एक फिल्म या किसी भी कलाकृति की सबसे बड़ी ताकत भी यही होती है कि वह अपना एक परिवेश रचते हुए भी दुनिया के सभी लोगों के लिए होती है. ‘हैदर’ उसकी जीती-जागती मिसाल है.       

Wednesday, October 22, 2014

नकाब है मगर हम हैं कि हम नहीं: कश्मीर और सिनेमा -प्रशांत पांडे

Prashant Pandey
 प्रशांत पांडे
 विशाल भारद्वाज की हैदर के शुरुआती दृश्यों में एक डॉक्टर को दिखाया गया है जो अपने पेशे को धर्म मानकर उस आतंकवादी का भी इलाज करता है जिसे कश्मीर की सेना खोज रही है। फिर एक सीन है जिसमे लोग अपने हाथों में अपनी पहचान लिए घरों से निकले हैं और इस पहचान पंगत में डॉक्टर भी शुमार है। सेना कोई तस्दीक अभियान चलाती दिखती है और फौज की गाड़ी में एक शख्स बैठा है जो उस भीड़ में से पहचान कर रहा है।
गौरतलब है कि पहचान करने वाले व्यक्ति की पहचान एक मास्क से छुपाई गयी है। वो कई लोगों को नफ़रत के साथ चिन्हित करता है, उनमे डॉक्टर की पहचान भी होती है। इस प्रतीकात्मक सीन में ही विशाल ये बात कायम कर देते हैं कि वो फिल्म को किसी तरह का जजमेंटल जामा नहीं पहनायेंगे, बल्कि साहस से सब कुछ कहेंगे। बाद में हालांकि, हिम्मत की जगह इमोशन ले लेते हैं और ये व्यक्तिगत बदले की कहानी, मां बेटे के रिश्ते की कहानी भी बनती है।
कश्मीर की आत्मा को किसी ने इस तरह इससे पहले झकझोरा हो ये मुझे याद नहीं। हालांकि, कश्मीर को लेकर सिनेमा ही सबसे ज्यादा बहस छेड़ता रहा और एक्सप्लोर करने के सिवाय कुछ फिल्मों ने अलग अलग तरीके से कश्मीर की कशमकश को बयां किया।
मुझे लोकेशन दिखाने वाली फिल्मों से ज्यादा याद है रोज़ा, रोज़ा और हैदर एक दृष्टि से समान दिखते हैं मगर सिर्फ एक नज़रिए से क्योंकि रोज़ा में एक पत्नि आतंकियों की कैद में फंसे अपने पति को वापस लाने की लड़ाई लड़ रही है जबकि यहां हैदर अपने पिता को खोज रहा है जो डिसअपियर्ड हैं। हैदर में एक संवाद है कि डिसअपियर्ड लोगों की बीवीयां आधी बेवा (विधवा) कहलाती हैं। रोज़ा के अलावा कश्मीर को करीब से देखने की कोशिश विधु विनोद चोपड़ा ने भी कि गोया कि वो खुद कश्मीर से ताल्लुक रखते हैं उनके FTII पुणे के दिनों के साथी फुनशुक लद्दाखी से मेरी मुलाकात लद्दाख में हुई थी, गौरतलब है कि विधु विनोद चोपड़ा के निर्माण में बनी फिल्म थ्री इडियट्स के केंद्रीय पात्र का नाम फुनशुक वांगड़ु था, विधु के अवचेतन में शायद अपने साथी का नाम रह गया हो क्योंकि फिल्म का क्लाइमैक्स लद्दाख में ही शूट हुआ था।
खैर मिशन कश्मीरउस युवा की कहानी है जिसे कश्मीर की आज़ादी के नाम पर आंकत की राह पर धकेला गया है। ये भी व्यक्तिगत बदले की कहानी है, क्योंकि आतंकी के परिवार को नकाब में छुपे ऑफिसर संजय दत्त की गोलियों का शिकार होना पड़ा था, कसूर उस परिवार का बस इतना था कि उन्होने आतंकवादियों को अपने घर में खौफ की वजह से खाना खिलाया था। याद कीजिए हैदर यहां डॉक्टर कश्मीर का मर्ज़ बन चुके आतंक का इलाज करता है तो उसे मौत मिलती है। एक नकाब मिशन कश्मीर में भी था और एक नकाब हैदर में। क्या माने कि कश्मीर की कशमकश इन नकाबपोशों के कारण है। दरअसल हैदर में एक संवाद में कहा जाता है कि हमारे लिए तो उपर खुदा तो नीचे फौज जायें तो जायें कहां।
कुछ लोग कह रहे हैं कि फौज को ग़लत दिखाया गया है। मैं कहता हूं कि ज़रा सोच के देखिए कि क्योंकि आपको अच्छा लगेगा कि आप दिन रात फौज तो छोड़िए पुलिस से घिरे हों। कर्फ्यू लगता है तो आप बेचैन हो जाते हैं। कश्मीर में तो अघोषित कर्फ्यू जैसा आलम हमेशा रहता है। मैं कश्मीर को करीब से नहीं जानता लेकिन खबरों के बीच रहने की आदत में कश्मीर से जो भी खबर आती है वो सकारात्मक बहुत कम मौकों पर रही। या तो आतंकियों से मुठभेड़ की खबर या तो पाकिस्तान की तरफ से सीज़फायर का उल्लंघन।
एक हालिया फिल्म का ज़िक्र लाज़मी हो जाता है जिसका नाम है हारुद। हारुद के एक दृश्य में लोगों को बसों से उतरने को कहा जाता है, कश्मीर के डाउन टाउन इलाके से आने जाने वाले लोगों को रोज़ाना एक थका देने वाली चेकिंग प्रक्रिया से गुजरने वाले दृश्य को हारुद में हैदर से बेहतर फिल्माया गया है। हारुद को निर्देशित करने वाले आमिर बशीर हैदर में श्रद्धा कपूर के भाई के किरदार में है। गौरतलब है कि हैदर में भी एक ऐसा ही दृश्य बड़ी जल्दी में फिल्माया गया जबकि हैदर हौले हौले चलने वाली फिल्म है।
देखिए मसला वही है कि कश्मीर में तनाव है और रहेगा भी, कश्मीर को पेचीदगी में जीने की आदत, सरकारों, सेपरेटिस्ट ताकतों और यहां तक की समाचारों की भी दी हुई है। इसलिए अगर परदे पर हमारे फिल्मकार उस तनाव को ही दिखाते हों तो इसमे आपत्ति नहीं होनी चाहिए। फैज़ की नज़्म उम्मीद जगाती है तो हैदर के पिता तनाव वाले दिनो में गुनगुनाते हैं….हम देखेंगे, हम देखेंगे लाज़िम है कि हम भी देखेंगे, वो दिन कि जिसका वादा है


Saturday, October 18, 2014

हैदर : कश्मीर के कैनवास पर हैमलेट - जावेद अनीस

-जावेद अनीस 
Javed Anisसियासत बेरहम हो सकती है, कभी कभी यह ऐसा जख्म देती है कि वह नासूर बन जाता है, ऐसा नासूर जिसे कई पीढ़ियाँ ढ़ोने को अभिशप्त होती हैं, आगे चलकर यही सियासत इस नासूर पर बार-बार चोट भी करती जाती है ताकि यह भर ना सके और वे इसकी आंच पर अपनी रोटियां सेकते हुए सदियाँ बिता सकें1947 के बंटवारे ने इन उपमहादीप को कई ऐसे नासूर दिए हैं जिसने कई सभ्यताओं-संस्कृतियों और पहचानों को बाँट कर अलग कर दिया है जैसे पंजाब, बंगाल और कश्मीर भी इस दौरान कश्मीर भारत और पाकिस्तान के लिए अपने-अपने राष्ट्रवाद के प्रदर्शन का अखाड़ा सा बन गया हैपार्टिशन से पहले एक रहे यह दोनों पड़ोसी मुल्क कश्मीर को लेकर दो जंग भी लड़ चुके हैं, छिटपुट संघर्ष तो बहुत आम है आज कश्मीरी फौजी सायों और दहशत के संगिनियों में रहने को मजबूर कर दिए गये हैं खुनी सियासत के इस खेल में अब तो लहू भी जम चूका है आखिर “जन्नत” जहन्नम कैसे बन गया, वजह कुछ भी हो कश्मीर के जहन्नम बनने की सबसे ज्यादा कीमत कश्मीरियो ने ही चुकाई है,सभी कश्मीरियों ने
ऐसी कोई फिल्म याद नहीं आती है जो कश्मीर को इतने संवदेनशीलता के साथ प्रस्तुत करती हो लेकिन शेक्सपियर प्रेमी फ़िल्म डायरेक्टर विशाल भारद्वाज अपनी नयी फिल्म 'हैदर' में कश्मीर और “जन्नत के बाशिंदों” के दर्द को बहुत ही संवेदनशीलता के साथ उकेरने में कामयाब रहे हैइसी बात को लेकर आज दोनों मुल्कों में हंगामा बरपा है, दरअसल भारत और पाकिस्तान दोनों मुल्कों में कश्मीर पर खुल कर और अलग नजरिये से बात करना “टैबू” माना जाता है पाकिस्तान में तो 'हैदर' रिलीज़ ही नहीं हो पायी क्योंकि वहां के सेंसर बोर्ड का मानना है कि फिल्म में कश्मीर को लेकर कुछ विवादास्पद बातें हैं और उन्हें इसके कहानी के कुछ हिस्सों पर एतराज़ है। इधर भारत में भी हैदरको तारीफ के साथ साथ विरोध का भी सामना करना पड़ रहा है,सोशल मीडिया में इसको लेकर काफी विरोध हो रहा है।
लेकिन 'हैदर' कोई कश्मीर पर बनी फिल्म नहीं है और ना ही इसके मेकर ऐसा कोई दावा करते हैं,यह तो शेक्सपियर के मशहूर नाटक “हैमलेट” पर आधारित हैं, विशाल खुद कहते हैं कि ‘मैं 'हैमलेट' को कश्मीर में बनाना चाहता था लेकिन मेरी फिल्म में एक तरह से कश्मीर ही 'हैमलेट' बन गया है’ इससे पहले भी विशाल भारद्वाज “मैकबेथ” और “ओथेले” जैसी शेक्सपियर की रचनाओं पर 'मक़बूल' और 'ओंकारा' जैसी फिल्में बना चुके हैं। लेकिन इस बार उन्होंने “हैमलेट” को 'हैदर' बनाने के लिए ज्यादा यथार्थवादी और संवदेनशील कैनवास को चुना। एक फिल्मकार के लिए 'हैमलेट' और कश्मीर को एक साथ चुनना दो नावों की सवारी की तरह है, लेकिन फिल्म मेकिंग भी रचनाकर्म होता हैं और फिल्म मेकिंग जैसे बाजार पर निर्भर एरिया में दो नावों पर सवारी के लिए हिम्मत और काबलियत दोनों की जरूरत पड़ती है

“हैदर” इंसानी फितरतों-मोहब्बत,फरेब,नफरत,बदला,पछतावा और “जन्नत के बाशिंदों” की कहानी है यह 1990 दशक के कश्मीर की पृष्ठभूमि पर बनी फिल्म है, मुख़्तसर कहानी यू है कि अलीगढ़ में पढ़ रहे हैदर मीर यानी शाहिद कपूर को अपने घर कश्मीर लौटना पड़ता है क्योंकि उसके पिता डॉक्टर हिलाल मीर (नरेंद्र झा) द्वारा एक आतंकवादी का अपने घर में ऑपरेशन करने की वजह से उन्हें आर्मी अपनी गिरफ्त में ले लेती है। इसके बाद से ही डॉक्टर हिलाल लापता हो जाते हैं। हैदर उन्हें ढूढने के लिए निकल पड़ता हैं। इस दौरान हैदर पर पहाड़ टूट पड़ता है जब उसे अपने पिता के मौत के असली वजह का पता चलता है, उसका दुख और क्रोध तब और बढ़ जाता है जब उसे मालूम होता है कि उसकी मां ग़जाला मीर (तब्बू) और उसके चाचा खुर्रम मीर (केके मेनन) के बीच संबंध है। प्रतिशोध की आग में “हैदर” कवि से हत्यारा बन जाता है।

सभी कलाकारों का अभिनय लाजवाब है, तब्बू ने ग़जाला के किरदार को शिद्दत से जिया है, वे अपने किरदार में आये उतार चढाव में बहुत आसानी से उतर जाती हैं इस दौरान उनके चेहरे का भाव देखते ही बनता है। वही शाहिद कपूर ने अभी तक का अपना बेस्ट दिया है, “बिस्मिल” गाने मे वो बेमिसाल रहे हैं, इरफान खान थोड़े से समय के लिए परदे पर आते हैं और महफ़िल लूट ले जाते हैं, एक–आध दृश्यों में उनकी भावप्रणय आंखे और संवाद अदायगी जादू सा जगा देती हैविशाल भारद्वाज निर्देशक के रूप में बेहतरीन रहे हैं उन्होंने दो नावों की सवारी बखूबी निभाई है, उनकी देखरेख में सिनेमा का मिलन जब शेक्सपियर और कश्मीर के साथ होता है तो इस माध्यम की ताकत देखते ही बनती है  

फिल्म के स्क्रिप्टराइटर बशरत पीर हैं जो कि खुद एक कश्मीरी हैं, उन्होंने कश्मीर के दर्द पर “कफ्र्यू नाइट” जैसी किताब लिखी है, शायद उन्हीं की वजह से फिल्म इतनी संवदेनशील बन पड़ी हैहैदर में ख़ामोशी का भी बहुत ही ख़ूबसूरती से उपयोग किया गया है, यहाँ तक कि बेक ग्राउंड म्यूजिक भी बहुत धीमा है।

गुलजार और विशाल की जोड़ी ने उर्दू के नामी शायर “फैज अहमद फैज” की "हम देखेंगे",“कफस (पिंजरा)उदास है यारो”और "आज के नाम" जैसी नज्मों की पंक्तियों को भी फिल्म का हिस्सा बनाया है, फैज़ यहाँ भी रेलेवेंट है और फिल्म में इसका खास असर भी होता है। 
फिल्म में कश्मीर की खूबसरत और बर्फीली वादियाँ भी हैं लेकिन इन्हें खून से सनी और आतंक व खौफ के साए में देख कर हमारे दिलो दिमाग पर अजीब सी सिहरन तारी हो जाती है, दर्द और दहशत भी खूबसूरती का लिबास ओढ़े हुए मालूम पड़ते हैं। खूबसरत कश्मीर “क़ैदख़ाना" सा लगता हैऐसे लगता है कि इसकी खूबसूरती ही इसके गले का फंदा बन गयी है। फिल्म हमें  कश्मीर की रुह तक ले जाती है, इसमें खूबसूरती और शोकगीत एक साथ हैं।
फिल्म में झेलम भी है लेकिन वो भी गायब कश्मीरियों को ढूढती हुई उदास दिखाई पड़ती है

हैदर अपने शुरुआत में ही एलान कर देती है कि वह "जिंदगी की तरफ" है। केवल एक परिवार की कहानी होने के बावजूद, यह कश्मीर से लापता और विस्थापित हुए लोगों की बात करती है फिल्म में अफस्पा (आर्मड फोर्सेज स्पेशल पॉवर एक्ट) भी सवाल उठाया गया है और व्यंग्य में इसे “चुस्पा’, कहा गया गया है।  

फिल्म का बयान है कि कश्मीर हाथियों (भारत और पाकिस्तान) की लड़ाई में पिस रही घास है।  एक दृश्य में एक जवान लड़का अपने घर के अन्दर तब तक नही घुसता है जब तक कि उसकी तलाशी न हो जाये। अस्तित्व की इसी लड़ाई में कश्मीरी युवाओ का प्रतीक हैदर सवाल पूछता फिरता है कि मैं हू या मैं नहीं हूअंत मेंहैदरअपने चाचा खुर्रम की “नजरों के फरेब” का बदला लेने के लिए रिवॉल्वर उठाता तो है मगर गोली नहीं चलाता, वह माँ के पक्ष को चुनता है जो कहती है कि “इन्तक़ाम से सिर्फ़ इन्तक़ाम पैदा होता है”

देश के बाकी हिस्सों में कश्मीरियों को किस नज़र से देखा जाता यह याद दिलाने कि जरूरत नहीं है, पिछले ही दिनों मध्य प्रदेश के उज्जैन में विक्रम विश्वविद्यालय के परिसर और वी.सी. कार्यालय में विश्व हिन्दू परिषद और बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने हंगामा और तोड़फोड़ किया है, विश्वविद्यालय के कुलपति का बस इतना ही दोष था कि उन्होंने जम्मू-कश्मीर में आयी प्राकृतिक आपदा के मद्देनजर विश्वविद्यालय में पढ़ रहे कश्मीरी छात्रों की मदद की अपील की थी। वी.सी. जवाहरलाल कौल जो कि खुद “कश्मीरी पंडित” हैं इस बदसलूकी से इतना आहत हुए कि उन्हें अस्पताल में भर्ती होना पड़ा,वे कुछ दिनों तक आईसीयू में भी रहे, यह है कश्मीरियों को लेकर हमारी संवदेना जो विकराल प्राकृतिक आपदा के समय भी नहीं पसीजती डंडे के बल और अविश्वास के छाए में राष्ट्र निर्माण नहीं होता है, राष्ट्रनिर्माण तो आपसी हितों के सांझा होने से होता है, शेष भारत को अपने गिरेबान में भी झांकना होगा, क्या हमने “कश्मीर मांगोगे तो चीर देंगें” के नारे लगाने के अलावा ऐसी कोई गंभीर कोशिश की है जिससे कश्मीर और कश्मीरियों के विश्वास और कुर्बत को जीता जा सके और हमारे हित साँझा हो सकें। उलटे हम में से कुछ तो अलगाववादियों की तरह उन्हें पंडित और मुसलमान कश्मीरियों में बाँटने की कोशिश में नज़र आते हैं।

मैं ना तो कभी कश्मीर गया हूँ और ना ही शेक्सपियर का हैमलेट” पढ़ा है, लेकिन इस फिल्म ने जहां इन दोनों से मेरा तआरुफ़ बहुत करीब से कराया है वहीँ हमारे वक्त में कश्मीरी होने के दर्द से भी मुड भेड़ कराया है, अपने सौ-दो सौ करोड़ क्लब की अनाप–सनाप फिल्मों पर इतराते वाले बालीवुड में हैदर बनाना बड़े हिम्मत का काम है हमारी फिल्म इंडस्ट्री और दर्शकों को ऐसे फिल्मों पर भी इतराने के लिए समय निकलना चाहिए

हैदर यानी कश्‍मीरियत की त्रासदी

Jagadishwar Chaturvedi- जगदीश्‍वर चतुर्वेदी 
”हैदर” फिल्म पर बातें करते समय दो चीजें मन में उठ रही हैं। पहली बात यह कि कश्मीर के बारे में मीडिया में नियोजित हिन्दुत्ववादी प्रचार अभियान ने आम जनता में एक खास किस्म का स्टीरियोटाइप या अंधविचार बना दिया है। कश्मीर के बारे में सही जानकारी के अभाव में मीडिया का समूचा परिवेश हिन्दुत्ववादी कु-सूचनाओं और कु-धारणाओं से घिरा हुआ है। ऐसे में कश्मीर की थीम पर रची गयी किसी भी रचना का आस्वाद सामान्य फिल्म की तरह नहीं हो सकता। किसी भी फिल्म को सामान्य दर्शक मिलें तब ही उसके असर का सही फैसला किया जा सकता है। दूसरी बात यह कि हिन्दी में फिल्म समीक्षकों का एक समूह है जो फिल्म के नियमों और ज्ञानशास्त्र से रहित होकर आधिकारिकतौर पर फिल्म समीक्षा लिखता रहता है। ये दोनों ही स्थितियां इस फिल्म को विश्लेषित करने में बड़ी बाधा हैं। फिल्म समीक्षा कहानी या अंतर्वस्तु समीक्षा नहीं है।
हैदरफिल्म का समूचा फॉरमेट त्रासदी केन्द्रित है। यह कश्मीरियों की अनखुली और अनसुलझी कहानी है। कश्मीर की समस्या के अनेक पक्ष हैं।फिल्ममेकर ने इसमें त्रासदी को चुना है।यहां राजनीतिक पहलु तकरीबन गायब हैं। इस फिल्म में राजनीति आटे में नमक की तरह मिली हुई है। यहां तक कि भारत की लोकतांत्रिक प्रक्रिया भी इसके फॉरमेट में हाशिए पर है। मूल समस्या है कश्मीर जनता की आतंकी त्रासदी की। काफी अर्सा पहले कश्मीर के आतंकी पहलु पर गोविन्द निहलानी की फिल्म ‘द्रोहकाल’ आई थी, वहां आतंकी हिंसाचार को  कलात्मक ढंग से चित्रित किया गया था, जबकि ”हैदर” में आतंकी हिंसाजनित त्रासदी का चित्रण है। इस अर्थ में इस फिल्म को ”द्रोहकाल” की अगली कड़ी के रूप में भी रखा जा सकता है।
”हैदर” फिल्म में मूलपाठ त्रासदी है, लेकिन अनेक उप-पाठ भी हैं, जो अधूरे हैं। इस फिल्म की खूबी है कि इसमें राष्ट्रवाद कहीं पर नहीं है। साथ ही राजनीतिक संवाद बहुत कम है। इस अर्थ में यह ”द्रोहकाल” से विकसित नजरिए को व्यक्त करने वाली फिल्म है। हिन्दी में कश्मीर पर राजनीतिक फिल्म बने और उसमें राष्ट्रवाद न हो यह हो नहीं सकता, हिन्दी में कश्मीर और आतंकी थीम पर बनी फिल्मों में राष्ट्रवाद और उसके भड़काऊ संवाद खूब आते रहे हैं। लेकिन ”हैदर” इस मामले में अपवाद है। साथ ही मुसलमानों और कश्मीर को लेकर सचेत रूप से मीडिया में प्रचलित स्टीरियोटाइप को भी कलात्मक चुनौती दी गयी है। मसलन, इस फिल्म में मुसलमान कहीं नजर नहीं आते, कश्मीरी नजर आते। मस्जिद-नवाज-मौलवी आदि उनसे जुड़ा समूचा मीडिया स्टीरियोटाइप एकसिरे से गायब है। फिल्ममेकर सचेत रूप में कश्मीरियत को चित्रित करने में सफल रहा है। इस अर्थ में यह फिल्म कश्मीर की समस्या में पिस रहे कश्मीरियों की त्रासदी को सामने लाती है और इस समस्या के हिन्दू-मुसलमान के  नाम पर चल रहे हिन्दुत्ववादी मीडिया प्रचार का कलात्मक निषेध करती है।
इसके अलावा इस फिल्म में बड़े ही संतुलन के साथ सेना और आतंकियों के मानवाधिकार हनन के रूपों के खिलाफ प्रतिवादी भावों और संवेदनाओं को उभारा गया है और उनको मानवाधिकार के फ्रेमवर्क में रखकर पेश किया गया है। त्रासदी यहां इवेंट की बजाय प्रक्रिया के रूप में चित्रित हुई है। त्रासदी जब प्रक्रिया के रूप में आती है तो वह मानवीय भावों-सरोकारों से जोड़ती है, स्मृति में स्पेस पैदा करती है। देश से जोड़ती है। इवेंट में ये संभावनाएं खत्म हो जाती हैं। त्रासदी केन्द्रित होने के कारण समूची फिल्म में दर्शकों की सहानुभूति पीड़ितों के साथ है। वे इस प्रक्रिया में राजनीतिक पूर्वाग्रहों में बहते नहीं हैं, बल्कि फिल्म के अनेक अंश ऐसे हैं जो दर्शक को कश्मीर संबंधी पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर सोचने में मदद करते हैं। यह सच है कि कश्मीर में आतंकी हमलों और सेना की ज्यादती के कारण हजारों औरतें विधवा हुई हैं, हजारों बच्चे अनाथ हुए हैं, उनके कष्टों-पीड़ाओं को हम लोग बहुत कम जानते हैं। कश्मीर भारत का अंग है और कश्मीर में घट रही हिंसा से इस देश को सकारात्मक तौर पर परिचित कराने में हैदरजैसी अनेक फिल्मों की जरूरत है।
”हैदर” फिल्म की खूबी है कि इसमें आतंकी त्रासदी को महज भावुक नहीं रहने दिया। त्रासदी में विवेक पर बल देकर फिल्म मेकर ने त्रासदी को भावुकता से अलग कर दिया। त्रासदी की इमेजों का हम जब भी आस्वाद लेते हैं अभिनेता बार-बार अपने एक्शन से विवेकपूर्ण भूमिका निभाते हैं। प्रत्येक पात्र लोकतांत्रिक ढंग से खुला है, वह कोई काम पर्दे के पीछे से नहीं करता, फिल्म मेकर दर्शक को कयास लगाने का मौका ही नहीं देता। सब कुछ दर्शक के सामने होता है। प्यार, चुम्बन, शैतानियां, मुखबरी, पक्षधरता आदि सबको सीधे दर्शकों के सामने खोलकर रखा गया है इसके चलते इस फिल्म में अंतराल में या प्रच्छन्न ढंग से भावों को मेनीपुलेट करने की कोई संभावना नहीं है।
कश्मीर की त्रासदी ऐतिहासिक पीड़ा है। इसे नकली तर्कों के आधार पर न तो समझा जा सकता है और न पेश किया जा सकता है। यह सामान्य त्रासदी नहीं है। फिल्ममेकर ने इस ऐतिहासिक त्रासदी को फिल्म सौंदर्य के जरिए उद्घाटित किया है। यहां कलात्मक-सौंदर्यात्मक भाषा का भरपूर इस्तेमाल किया है। इस भाषा के जरिए दर्शक के आस्वाद को फिल्ममेकर कॉमनसेंस या स्टीरियोटाइप के धरातल से ऊपर उठाकर ले जाता है। कश्मीर की समस्या को कश्मीरियत की त्रासदी के रूप में चित्रित करना स्वयं में मुश्किल काम है। कश्मीरियत को तो हमारा मीडिया और जनमानस एक सिरे से भूल चुका है, ऐसे में फिल्म मेकर एक काम यह करता है कि वह कश्मीरियत को अस्मिता का आधार बनाता है, वह कश्मीर की समस्या को हिन्दू-मुसलिम समस्या या धर्म के आधार बने भारत-पाक विभाजन का निषेध भी करता है। कश्मीर की त्रासदी को चित्रित करने का मकसद भविष्य में होने वाली त्रासदी को रोकना है। फिल्ममेकर संदेश देता है कि मानवाधिकार सबसे मूल्यवान हैं और उनके हनन का अर्थ है अनिवार्यतः त्रासदी।
यह फिल्म कश्मीर के नकली-विशेषज्ञों की भी प्रकारान्तर से पोल खोलती है। कश्मीर के मसले पर ज्योंही बातें होती हैं हमारे बीच में अचानक नकली कश्मीर विशेषज्ञ आ जा जाते हैं और कश्मीर पर वे नकली तर्कजाल से सारा माहौल घेर लेते हैं। इस तर्कजाल को वे तथ्य के नाम पर घेरना आरंभ करते हैं। कलात्मक अभिव्यक्ति में सत्य-तथ्य दोनों महत्वपूर्ण होते हैं और इन दोनों से भी ज्यादा महत्वपूर्ण है सर्जनात्मक संवेदनाएं। सर्जनात्मक संवेदनाओं के जरिए ”हैदर” में कश्मीरियों की देशभक्ति पुख्ता रूप में सामने आई है। साथ ही कश्मीरी नागरिक की अनुभूतियां, आकांक्षाएं और त्रासदी भी सामने आई हैं। यह फिल्म संदेश देती है कि यह अस्मिता की त्रासदी का दौर भी है। कलात्मक त्रासदी को महसूस करने की चीज है और यह काम फिल्म ने बड़ी सफलता के साथ किया है।
”हैदर” फिल्म में कश्मीरियत को धर्मनिरपेक्ष शांतिमय संस्कृति के रूप में पेश किया गया है। साथ त्रासदी के प्रति आलोचनात्मक नजरिए को सम्प्रेषित करने में फिल्ममेकर सफल रहा है। कश्मीर की त्रासदी अन्य के बहाने से पेश नहीं की गयी है बल्कि सीधे पेश की गयी है। फिल्म में अतीत में लौटने वाले क्षण बहुत कम हैं। सारी फिल्म सीधे वर्तमानकाल में चलती है और भविष्य की ओर सोचने के लिए मजबूर करती है। अस्मिता के कई आयाम हैं मसलन्, प्रतिस्पर्धा, हिंसा, बदला, बदलाव, राष्ट्रीयता, आतंकवाद आदि इनमें से ”हैदर’ का जोर राष्ट्रीयता, बदलाव और शांति पर है।

Sunday, October 12, 2014

फिल्म ‘हैदर’ पर - अरुण माहेश्वरी

Arun Maheshwari
-अरुण माहेश्वरी
आज सचमुच हिन्दी की एक एपिक राजनीतिक फिल्म देखी - हैदर। राजनीतिक यथार्थ और व्यक्तिगत त्रासदियों के अंतरसंबंधों की जटिलताओं की एक अनोखी कहानी। हिन्दी फिल्मों की हदों के बारे हमारी अवधारणा को पूरी तरह से धराशायी करती एक जबर्दस्त कृति। राष्ट्रवादी उन्माद की राजनीति की भारी-भरकम चट्टानों के नीचे दबे जीवन के अंदर ईर्ष्या, द्वेष, डर, आतंक, साजिशों, हत्याओं और लगातार हिंसा से विकृत हो रहे मानवीय रिश्तों का ऐसा सुगठित आख्यान, हिन्दी फिल्मों की मुख्यधारा में मुमकिन है, हम सोच नहीं सकते थे। ‘हैमलेट’ का अवलंब और कश्मीर की अंतहीन त्रासदी - मानवीय त्रासदी के महाख्यान को रचने का शायद इससे सुंदर दूसरा कोई मेल नहीं हो सकता था। विशाल भारद्वाज की इस फिल्म को देखकर तो कम से कम ऐसा ही लगता है।
जब हम यह फिल्म देखने गये, उसके पहले ही सुन रखा था कि यह शेक्सपियर के ‘हैमलेट’ पर अवलंबित एक कश्मीरी नौजवान की कहानी है। हैमलेट और कश्मीर का नौजवान - इन दोनों के बारे में सोच-सोच कर ही काफी रोमांचित था। कितना सादृश्य है दोनों में! कश्मीर खुद ही हैमलेट से किस मायने में कम है ! अपनी दुविधाओं में, प्रतिशोध की धधकती आग, षड़यंत्रों और अतार्किक हिंसा में, महाविनाशकारी त्रासद दुखांत में!
‘हैमलेट’ में क्लाडियस अपने भाई, हैमलेट के पिता की हत्या करके डेनमार्क का राजा बनता है और हैमलेट की मां उसके चाचा की रानी। राज-दरबार में मौत का शोक और शादी का उत्सव - दोनों साथ-साथ होते हैं। अति-संवेदनशील और कुशाग्र हैमलेट यह सब देख कर बदहवास है। क्लाडियस उसे समझाता है - जीवन-मृत्यु तो शाश्वत सत्य है। ‘‘यही होना था - व्यर्थ शोक को मिट्टी में फेंको।’’ तुम्हारे आगे सारा जीवन पड़ा है। शोक से निकलो, तुम्हें धरती के सारे सुख दूंगा। लेकिन हैमलेट ! ‘‘मेरे भीतर जो चल रहा है, वह मातम के दिखावे से परे है।...काश यह पत्थर जिस्म पिघल सकता और ढल जाता ओस की एक बूंद जैसा, या फिर उस अविनाशी ने आत्मघात की मनाही न की होती।’’
पिता की प्रेतात्मा ने हैमलेट को बता दिया था कि उसकी हत्या क्लाडियस ने ही की थी और हैमलेट को इसका बदला लेना है। राजा का मिथ्याचार, मां की कमजोरियां और पोलोनियस जैसे राज्याधिकारियों की राजा के प्रति अंध निष्ठा - इन सबको देख कर प्रतिशोध की आग और आत्मघात की गहरी घुटन से भरा बेचैन और दुविधाग्रस्त हैमलेट पिता की हत्या के दृश्य को नाटक के रूप में पेश करके क्लाडियस को बेनकाब करता है। हैमलेट क्लाडियस को मार डालने की फिराक में और क्लाडियस हैमलेट को। मौका पाकर भी अपने संस्कारों के कारण हैमलेट प्रार्थना कर रहे क्लाडियस को मार कर स्वर्ग में नहीं भेजना चाहता, चूक जाता है। अंत में, पोलोनियस के बेटे लेयर्टीज के साथ तलवारबाजी में जहर बुझी तलवार और जहरीली शराब से क्लाडियस, रानी, हैमलेट सब मारे जाते हैं। पीछे छूट जाते हैं - लाशों का ढेर और उनकी कहानियां। मरते वक्त भी अविश्वास से भरा हुआ हैमलेट होरेशियो से फरियाद करता है, ‘‘ अगर तूने कभी मुझको अपने दिल में जगह दी हो तो छोड़ दे अपनी खुशी थोड़ी देर के लिए और इस जालिम दुनिया में अपनी दर्द की सांसे गिनता हुआ मेरी कहानी कहने के लिए जिन्दा रह।’’
‘हैमलेट’ की इस कथा के संदर्भ में कश्मीर की कहानी की कल्पना कर रहा था। वहां जितने प्रकट मिथ्याचार, प्रतिशोध, साजिश, हत्या और अन्तहीन हिंसा के रूप में शासन और राजनीति के नाम पर जो सबकुछ चलता रहा है और आज भी चल रहा है, उसका अंत ऐसी ही विभत्स विध्वंसक त्रासदियों के अलावा और किसी में नहीं हो सकता। सोच रहा था क्या विशाल भारद्वाज में इतना साहस और शक्ति है कि कश्मीर में हर रोज रची जारही इन त्रासदियों की पीछे छूट रही कथाओं को फिल्म में उतार पायेंगे? कश्मीर की पृष्ठभूमि पर पहले भी कई फिल्में बन चुकी हैं। इसीलिये कब कोई फिल्म मुख्यधारा की फिल्म के अपने तर्क पर चलने लगेगी और सब मटियामेट हो जायेगा, इसका खतरा हमेशा बना हुआ था।
लेकिन यह देखकर बेहद सुखद आश्चर्य हुआ कि विशाल भारद्वाज ने हैमलेट और कश्मीर के जख्मों की कहानी, दोनों का ही इस फिल्म में बखूबी निर्वाह किया है। शेक्सपियर के नाटक हमेशा से उनके प्रिय विषय रहे हैं। इसके पहले ‘मैकबेथ’ पर ‘मकबूल’ और ‘ओथेलो’ पर ‘ओमकारा’ बना चुके हैं। हमने वे दोनों फिल्में ही नहीं देखी, इसलिये उनपर कोई टिप्पणी नहीं कर सकता। वैसे अखबारों में उनकी भी काफी प्रशंसा पढ़ी थी। लेकिन ‘हैमलेट’ एक ऐसा विषय है, जिसके सारी दुनिया में न जाने कितने फिल्म और नाट्य रूपांतरण हुए होंगे। हैमलेट का ‘होने, न होने’ की दुविधाओं में फंसे, प्रतिशोध के नर्क की आग में जलते चरित्र का आकर्षण कभी खत्म नहीं हो सकता। ‘हैमलेट’ नाटक भी कोई व्यक्तिगत त्रासदी मात्र नहीं था। उसके साथ अविभाज्य तौर पर तख्तो-ताज का सवाल, राजनीति का सवाल, डेनमार्क का सवाल जुड़ा हुआ था। ‘हैदर’ की भी विशेषता यह है कि इसमें सिर्फ चरित्र नहीं, पूरा परिवेश ही ‘हैमलेट’ की त्रासदी की कहानी बयान कर रहा है। इसीलिये हम समझते हैं कि यह जरूर ‘मकबूल’ और ‘ओमकारा’ से कुछ अलग है।
शाहिद कपूर और तब्बू के असाधारण अभिनय, पंकज कुमार की सिनेमेटोग्राफी ने इसे फिल्मांकन के उच्चतम अन्तरराष्ट्रीय मानकों के समकक्ष ला दिया है। विशाल भारद्वाज सचमुच साधुवाद के पात्र है। भारतीय फिल्म के इतिहास में ‘हैदर’ को मैं एक महत्वपूर्ण योगदान मानूंगा।

‘हेमलेट’ का प्रतिआख्यान रचती ‘हैदर’ - डाॅ. विभावरी.

Vibhavari Jnu-डाॅ. विभावरी.

पिछले दिनों में 'हैदर' पर काफी कुछ लिखा गया...लेकिन कुछ छूटा रह गया शायद!
एक ऐसे समय में जब विशाल भारद्वाज यह घोषित करते हैं कि वामपंथी हुए बिना वे कलाकार नहीं हो सकते, हैदर का स्त्रीवादी-पाठ एक महत्त्वपूर्ण नुक्ता बन जाता है| अपनी फिल्म में कश्मीर को हेमलेट का प्रतीक बताने वाले भारद्वाज दरअसल अपने हर पात्र में कश्मीर को टुकड़ों-टुकड़ों में अभिव्यक्त कर रहे हैं| ऐसे में गज़ाला और अर्शी की कश्मीरियत न सिर्फ महत्त्वपूर्ण बन जाती है बल्कि प्रतीकात्मकता के एक स्तर पर वह कश्मीर समस्या की मैग्निफाइंग इमेज के तौर पर सामने आती है|
'डिसअपीयरेड (disappeared) लोगों की बीवियां, आधी बेवा कहलाती हैं! उन्हें इंतज़ार करना होता है...पति के मिल जाने का...या उसके शरीर का...' फिल्म में गज़ाला का यह संवाद दरअसल इस सामाजिक व्यवस्था में समूची औरत जाति के रिसते हुए घावों को उघाड़ कर रख देता है| वहीँ अपनी माँ को शक की नज़र से देखते हैदर का यह संवाद कि 'मुझे यकीन है कि आप खुद को नहीं मारतीं|' इस बात को रेखांकित करता है कि एक औरत को ही पितृसत्ता के समक्ष, खुद को साबित करना पड़ता है...और फिल्म के अंत में अपने बेटे के प्रति प्रेम को गज़ाला साबित भी करती है!!! वास्तव में ये दोनों ही संवाद स्त्री की ज़िन्दगी के दो ध्रुव हैं, जिनके बीच उसका जीवन आकार लेता है| पितृसत्ता पर इस हद तक निर्भरता कि स्त्री की अपनी कोई सोच जन्म ही न ले सके- एक ऐसी सच्चाई है जिससे समाज न सिर्फ शर्मसार होता है बल्कि स्त्री के रूप में अपने विकास के सहभागी को लगातार खोता भी रहा है| यहीं पर यह स्पष्ट करना ज़रूरी है कि न सिर्फ स्त्री विषयक नज़रिए से बल्कि अपनी पूरी संवेदना में यह फिल्म 'हैमलेट' का प्रतिआख्यान रचती है| ठीक वैसे ही जैसे अनुराग कश्यप देवदास का प्रतिआख्यान डेव डी में रचते हैं| यह एक महत्त्वपूर्ण कारण है कि ये फिल्में स्त्री-दृष्टि से महत्त्वपूर्ण हो जाती हैं| हेमलेट में जहाँ गरट्रयूड' एक गुमनाम से किरदार के रूप में मौजूद है वहीँ हैदर की गज़ाला फिल्म का केन्द्रीय चरित्र है| जिसकी न सिर्फ अपनी शख्सियत है बल्कि अपनी एक सोच भी है| हेमलेट के बिल्कुल उलट हैदर की गज़ाला एक नकारात्मक किरदार के तौर पर नहीं खुलती बल्कि फिल्म के मध्यांतर से ही उसके प्रति दर्शकों के नज़रिए में फर्क आना शुरू हो जाता है| लिहाज़ा हैदर की माँ 'गज़ाला', हैमलेट की माँ 'गरट्रयूड' नहीं है| 'गज़ाला' अपनी इयत्ता में उस 'मानवी' का प्रतिनिधित्व करती है जो हमारे पुरुषवादी समाज को सहज स्वीकार्य नहीं है|
दूसरा स्त्री-चरित्र अर्शी है जो हैदर की प्रेमिका है जिसका उसके अपने ही पिता द्वारा प्रशासनिक हितों के लिए उपयोग किया जाता है| लेकिन एक महत्त्वपूर्ण बात यह है कि अपने पिता द्वारा छली गयी वही अर्शी अपने  पिता की हत्या के बाद खुद के जीवन को ख़त्म कर लेना बेहतर रास्ता मानती है|
यहाँ एक बड़ा सवाल यह है कि स्त्री की ये विवशता कि उसे अपने आप को प्रमाणित करने के लिए खुद के अस्तित्व को ही ख़त्म करना पड़े- जिन मजबूरियों में जन्म लेती हैं उनके निहितार्थ क्या है?
साहित्यिक कृतियों के अडैप्टेशन से बनने वाले मुख्यधारा सिनेमा में सामान्यतः ऐसे परिवर्तन कर दिए जाते हैं जो ज़्यादातर दर्शकों को पसंद आये दूसरे शब्दों में कहें तो पितृसत्ता सम्बन्धी सोच को तुष्ट करते हों अथवा सामाजिक आदर्शो का निर्वहन सकारात्मक तरीके से करते हों| आंधी, हम आपके हैं कौन जैसी फ़िल्में इसका प्रमाण हैं| यहाँ पर ध्यान देने वाली बात यह भी है कि ज़्यादातर मुख्यधारा सिनेमा स्त्री को देवी(नायिका) या दानवी(वैम्प) के खांचे में फिट करती रहीं हैं| लेकिन आज के बदलते मुख्यधारा सिनेमा ने इन दोनों ही छवियों से इतर स्त्री के मानवी रूप पर खुद को केन्द्रित किया है| पिछले दिनों में आई फ़िल्में लंच बॉक्स, हाइवे, क्वीन जैसी तमाम फ़िल्में इसका प्रमाण हैं| ठीक इसी तर्ज पर हैदर के सन्दर्भ में यह देखना रोचक  है कि विशाल भारद्वाज हेमलेट की दानवी गरट्रयूड को हैदर की मानवी गज़ाला में कैसे परिणत करते हैं!!!
और यहीं पर फिल्म यह सवाल भी उठाती है कि फिल्मांतरण के लिहाज़ से एक फिल्मकार साहित्य में कितने परिवर्तन की छूट ले सकता है? इस सन्दर्भ में विशाल, सत्यजित रे की दृष्टि के पक्ष में खड़े नज़र आते हैं| जो मानती है कि साहित्य पर आधारित सिनेमा फिल्मकार कि पुनर्रचना है| इस लिहाज़ से हैदर विशाल भारद्वाज की पुनर्रचना है| और कई मायनों में यह हेमलेट के बिल्कुल उलट निष्कर्षों पर पहुंचती है| अतः उनकी रचनात्मकता का सम्मान करते हुए यह स्वीकार किया जाना चाहिए कि हैदर की पृष्ठभूमि भले ही हेमलेट पर आधारित हो पर अंततः यह विशाल भरद्वाज की अपनी रचना है| जिसमें उनकी विशिष्ट शैली के साथ ही साथ उनका अपना दर्शन भी जुड़ा है|  
तमाम विमर्शों के साथ ही साथ फिल्म माँ और बेटे के रिश्तों को भी नए सिरे से व्याख्यायित करती है| ठीक वैसे ही जैसे एक ज़माने में महबूब खान ने मदर इंडिया में किया था|
गज़ाला का अपने बेटे से कहा गया यह संवाद कि तेरे पिता की ज़िन्दगी में मेरी कोई अहमियत नहीं थी| दरअसल औरत की अपनी पहचान की तलाश है| इस लिहाज़ से शाहिद कपूर पर फिल्माया गया मोनोलॉग दिल की गर सुनू तो हूँ, दिमाग की तो हूँ नहीं| जान लूं कि जान दूं, मैं रहूँ कि मैं नहीं अपने विस्तार में स्त्री सवालों से भी जुड़ता है| संभवतः इसी सवाल से जूझते हुए अंततः इस फिल्म की स्त्री दिल और दिमाग दोनों की ही सुनकर अपने शरीर को भले ख़त्म कर देती है लेकिन उसका वजूद बाकी रह जाता है...फिल्म ख़त्म होने के बाद भी! 
हेमलेट के बिल्कुल उलट फिल्म इंतकाम के विरोध में आवाज़ उठाती है| इंतकाम से सिर्फ इंतकाम पैदा होता है| अपने भीतर के इस इंतकाम से आज़ाद हुए बगैर हम सही मायनों में आज़ाद नहीं हो सकते| फिल्म का  सूत्र यही है| यद्यपि यह ज़रूर है कि फिल्म के नायक हैदर को इंतकाम की इस आग से निकालने के लिए उसकी माँ गज़ाला को अग्नि-परीक्षा देनी पड़ती है|
देश में आफ्सपा' जैसे क़ानून, न जाने कितने 'हैदर' और 'गज़ाला' पैदा कर रहें हैं इसका हिसाब या तो लिया नहीं जाता या फिर लिया जाना ज़रूरी नहीं समझा जाता!!! कश्मीर में 'ग्वान्तेनामो बे' जैसे तमाम 'डिटेंशन सेंटर' दरअसल समस्या का हल निकालने की बजाय भ्रष्ट व्यवस्था के हित साधन का हथियार बनते जा रहे हैं|
इस पूरी व्यवस्था में निचले पायदान पर मौजूद महिलायें इन विसंगतियों से उपजे दबाव का सबसे आसान शिकार होतीं हैं| इन तकलीफों से जूझती औरत का यह संघर्ष बाहरी ही नहीं बल्कि आतंरिक भी है| पितृसत्तात्मक मूल्यों से लड़ती 'गज़ाला' के चरित्र में ये दोनों संघर्ष स्पष्ट तौर पर दिखते हैं|
इसका सबसे खतरनाक पहलू यह है कि इन प्रताड़नाओं के विरोध का कोई असर हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था पर नहीं दिखता| 'आफ्सपा' के विरोध में चौदह साल से अनशन कर रही इरोम इस बात का जीता जागता प्रमाण है!
बहरहाल साहित्य, सिनेमा और समाज के अंतर्संबंधों की बेहतरीन पड़ताल करती #हैदर के लिए #विशालभारद्वाज के साथ ही साथ अपने खूबसूरत अभिनय केलिए #शाहिदकपूर,#तब्बू,#इरफ़ान #श्रद्धा कपूर और #केकेमेनन को बधाई!